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अध्याय 15

15.1 अलर्क के ध्यानयोग का उदाहरण देकर पितामहों का परशुराम जी को समझाना और परशुराम जी का तपस्या के द्वारा सिद्धि प्राप्त करना---

पितरों ने कहा- ब्राह्मणश्रेष्ठ! इसी विषय में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है, उसे सुनकर तुम्हें वैसा ही आचरण करना चाहिये। पहले की बात है, अलर्क नाम से प्रसिद्ध एक राजर्षि थे, जो बड़े ही तपस्वी, धर्मज्ञ, सत्यावादी, महात्मा और दृढ़ प्रतिज्ञ थे। उन्होंने अपने धनुष की सहायता से समुद्रपर्यन्त इस पृथ्वी को जीतकर अत्यन्त दुष्कर पराक्रम कर दिखाया था। इसके पश्चात उनका मन सूक्ष्मतत्त्व की खोज में लगा। महामते! वे बड़े-बड़े कर्मों का आरम्भ त्याग कर एक वृक्ष के नीचे जा बैठे और सूक्ष्मतत्त्व की खोज के लिये इस प्रकार चिन्ता करने लगे।

15.2 अलर्क कहने लगे- मुझे मन से ही बल प्राप्त हुआ है, अत: वही सबसे प्रबल है। मन को जीत लेने पर ही मुझे स्थायी विजय प्राप्त हो सकती है। मैं इन्द्रियरूपी शत्रुओं से घिरा हुआ हूँ, इसलिये बाहर के शत्रुओं पर हमला न करके इन भीतरी शत्रुओं को ही अपने बाणों का निशाना बनाऊँगा। यह मन चंचलता के कारण अभी मनुष्यों से तरह-तरह के कर्म कराता है, अत: अब मैं मन पर ही तीखे बाणों का प्रहार करूँगा। मन बोला- अलर्क! तुम्हारे ये बाण मुझे किसी तरह नहीं बींध सकते। यदि इन्हें चलाओंगे तो ये तुम्हारे ही मर्मस्थानों को चीर डालेंगे और मर्म स्थानों के चीरे जाने पर तुम्हारी ही मृत्यु होगी, अत: तुम अन्य प्रकार के बाणों का विचार करो, जिनसे तुम मुझे मार सकोगे। यह सुनकर अलर्क ने थोड़ी देर तक विचार किया, इसके बाद वे (नासिका को लक्ष्य करके) बोले।

15.3 अलर्क ने कहा- मेरी यह नासिका अनेक प्रकार की सुगन्धियों का अनुभव करके भी फिर उन्हीं की इच्छा करती है, इसलिये इन तीखे बाणों मैं इस नासिका पर ही छोड़ूँगा। नासिका बोली- अलर्क! ये बाण मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इनसे तो तुम्हारे ही मर्म विदीर्ण होंगे और मर्म स्थानों का भेदन हो जाने पर तुम्हीं मरोगे, अत: तुम दूसरे प्रकार के बाणों का अनुसंधान करो, जिससे तुम मुझे मार सकोगे। नासिका का यह कथन सुनकर अलर्क कुछ देर विचार करने के पश्चात (जिह्वा को लक्ष्य करके) कहने लगे।

15.4 अलर्क ने कहा- यह रसना स्वादिष्ट रसों का उपभोग करके फिर उन्हें ही पाना चाहती है। इसलिये अब इसी के ऊपर अपने तीखे सायकों का प्रहार करूँगा। जिह्वा बोली- अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तो तुम्हारे ही मर्म स्थानों को बींधेंगे। मर्म स्थानों के बिंध जाने पर तुम्हीं मरोगे। अत: दूसरे प्रकार के बाणों का प्रबन्ध सोचो, जिनकी सहायता से तुम मुझे मार सकोगे। यह सुनकर अलर्क कुछ देर तक सोचते विचारते रहे, फिर (त्वचा पर कुपित होकर) बोले।

15.5 अलर्क ने कहा- यह त्वचा नाना प्रकार के स्पर्शों का अनुभव करके फिर उन्हीं की अभिलाषा किया करती है, अत: नाना प्रकार के बाणों से मारकर इस त्वचा को ही विदीर्ण कर डालूँगा। त्वचा बोली- अलर्क! ये बाण किसी प्रकार मुझे अपना निशाना नहीं बना सकते। ये तो तुम्हारा ही मर्म विदीर्ण करेंगे और मर्म विदीर्ण होने पर तुम्हीं मौत के मुख में पड़ोगे। मुझे मारने के लिये तो दूसरी तरह के बाणों की व्यवस्था सोचो, जिनसे तुम मुझे मार सकोगे।

15.6 त्वचा की बात सुनकर अलर्क ने थोड़ी देर तक विचार किया, फिर (श्रोत को सुनाते हुए) कहा- अलर्क बोले- यह श्रोत्र बारंबार नाना प्रकार के शब्दों को सुनकर उन्हीं की अभिलाषा करता है, इसलिये मैं इन तीखे बाणों को श्रोत्र-इन्द्रिय के ऊपर चलाऊँगा। श्रोत्र ने कहा- अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तुम्हारे ही मर्म स्थानों को विदीर्ण करेंगे। तब तुम जीवन से हाथ धो बैठोगे। अत: तुम अन्य प्रकार के बाणों की खोज करो, जिनसे मुझे मार सकोगे। यह सुनकर अलर्क ने कुछ सोच विचार कर (नेत्र को सुनाते हुए) कहा।

15.7 अलर्क बोल- यह आँख भी अनेकों बार विभिन्न रूपों का दर्शन करके पुन: उन्हीं को देखना चाहती है। अत: मैं इसे अपने तीखे तीरों से मार डालूँगा। आँख ने कहा- अलर्क! ये बाण मुझे किसी प्रकार नहीं छेद सकते। ये तुम्हारे ही मर्मस्थानों को बींध डालेंगे और मर्म विदीर्ण हो जाने पर तुम्हें ही जीवन से हाथ धोना पड़ेगा। अत: दूसरे प्रकार के सायकों का प्रबन्ध सोचो, जिनकी सहायता से तुम मुझे मार सकोगे। यह सुनकर अलर्क ने कुछ देर विचार करने के बाद (बुद्धि को लक्ष्य करके) यह बात कही।

15.8 अलर्क ने कहा- यह बुद्धि अपनी ज्ञानशक्ति से अनेक प्रकार का निश्चय करती है, अत: इस बुद्धि पर ही अपने तीक्ष्ण सायकों का प्रहार करूँगा। बुद्धि बोली- अलर्क! ये बाण मेरा किसी प्रकार भी स्पर्श नहीं कर सकते। इनसे तुम्हारा ही मर्म विदीर्ण होगा और मर्म विदीर्ण होने पर तुम्हीं मरोगे। जिनकी सहायता से मुझे मार सकोगे, वे बाण तो कोई और ही हैं। उनके विषय में विचार करो।

15.9 ब्राह्मण ने कहा- देवि! तदनन्तर अलर्क ने उसी पेड़ के नीचे बैठकर घोर तपस्या की, किंतु उसे मन बुद्धि सहित पाँचों इन्द्रियों को मारने योग्य किसी उत्तम बाण का पता न चला। तब वे सामर्थ्यशाली राजा एकाग्रचित्त होकर विचार करने लगे। विप्रवर! बहुत दिनों तक निरन्तर सोचने विचारने के बाद बुद्धिमानों में श्रेष्ठ राजा अलर्क को योग से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी साधन नहीं प्रतीत हुआ। वे मन को एकाग्र करके स्थिर आसन से बैठ गये और ध्यानयोग का साधन करने लगे। इस ध्यान योग रूप एक ही बाण से मारकर उन बलशाली नरेश ने समस्त इन्द्रियों को सहसा परास्त कर दिया। वे ध्यान योग के द्वारा आत्मा में प्रवेश करके परम सिद्धि (मोक्ष) को प्राप्त हो गये। इस सफलता से राजर्षि अलर्क को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस गाथा का गान किया- 15.10 ‘अहो! बड़े कष्ट की बात है कि अब तक मैं बाहरी कामों में ही लगा रहा और भोगों की तृष्णा से आबद्ध होकर राज्य की ही उपासना करता रहा। ध्यान योग से बढ़कर दूसरा कोई उत्तम सुख का साधन नहीं है, यह बात तो मुझे बहुत पीछे मालूम हुई है।’ (पितामहों ने कहा-) बेटा परशुराम! इन सब बातों को अच्छी तरह समझकर तुम क्षत्रियों का नाश न करो। घोर तपस्या में लग जाओ, उसी से तुम्हें कल्याण प्राप्त होगा। अपने पितामहों के इस प्रकार कहने पर महान सौभाग्यशाली जमदग्निनन्दन परशुराम जी ने कठोर तपस्या की और इससे उन्हें परम दुर्लभ सिद्धि प्राप्त हुई।

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