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अध्याय 28

28.1 चराचर प्राणियों के अधिपतियों का, धर्म आदि के लक्षणों का और विषयों की अनुभूति के साधनों का वर्णन तथा क्षेत्रज्ञ की विलक्षणता---

ब्रह्मा जी ने कहा- महर्षियों! मनुष्यों का राजा तो रजोगुण से युक्त क्षत्रिय है। सवारियों में हाथी, बनवासियों में सिंह, समस्त पुशओं में भेड़ और बिल में रहने वालों में सर्प, गौओं में बैल एवं स्त्रियों में पुरुष प्रधान है। बरगद, जामुन, पीपल, सेमल, शीशम, मेषश्रृंग (मेढ़ासिंगी) और पोले बाँस- ये इस लोक में वृक्षों के राजा हैं, इसमें संदेह नहीं है। हिमवान, पारियात्र, सह्य, विन्ध्य, त्रिकूट, श्वेत, नील, भास, कोष्ठवान, पर्वत, गुरुस्कन्ध, महेन्द्र और माल्यवान पर्वत- ये सब पर्वत पर्वतों के अधिपति हैं। गणों के मरुद्गण, ग्रहों के सूर्य और नक्षत्रों के चन्द्रमा अधिपति हैं। यमराज पितरों के और समुद्र सरिताओं के स्वामी हैं। वरुण जल के और इन्द्र मरुद्गणों के स्वामी कहे जाते हैं। उष्ण प्रभा के अधिपति सूर्य हैं और ताराओं के स्वामी चन्द्रमा कहे गये हैं। भूतों के नित्य अधीश्वर अग्निदेव हैं तथा ब्राह्मणों के स्वामी बृहस्पति हैं। औषधियों के स्वामी सोम हैं तथा बलवानों में श्रेष्ठ विष्णु हैं। रूपों के अधिपति सूर्य और पशुओं के ईश्वर भगवान शिव हैं।

28.2 दीक्षा ग्रहण करने वालों के यज्ञ और देवताओं के इन्द्र अधिपति हैं। दिशाओं की स्वामिनी उत्तर दिशा है एवं ब्राह्मणों के राजा प्रतापी सोम हैं। सब प्रकार के रत्नों के स्वामी कुबेर, देवताओं के स्वामी इन्द्र और प्रजाओं के स्वामी प्रजापति हैं। यह भूतों के अधिपतियों का सर्ग है। मैं ही सम्पूर्ण प्राणियों का महान अधीश्वर और बह्ममय हूँ। मुझसे अथवा विष्णु से बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है। ब्रह्ममय महाविष्णु ही सबके राजाधिराज हैं, उन्हीं को ईश्वर समझना चाहिये। वे श्रीहरि सबके कर्ता हैं, किंतु उनका कोई कर्ता नहीं है। वे विष्णु ही मनुष्य, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, सर्प, राक्षस, देव, दानव और नाग सबके अधीश्वर हैं। कामी पुरुष जिनके पीछे फिरते हैं, उन सब में सुन्दर नेत्रों वाली स्त्री प्रधान है एवं जो माहेश्वरी, महादेवी और पार्वती नाम से कही जाती हैं उन मंगलमयी उमादेवी की स्त्रियों में सर्वोत्तम जानो तथा रमण करने योग्य स्त्रियों में स्वर्ण विभूषित अप्सराएँ प्रधान हैं।

28.3 राजा धर्म पालन के इच्छुक होते हैं और ब्राह्मण धर्म के सेतु हैं। अत: राजा को चाहिये कि वह सदा ब्राह्मणों का रक्षा का प्रयत्न करे। जिन राजाओं के राज्य में श्रेष्ठ पुरुषों को कष्ट होता है, वे अपने समस्त राजोचित गुणों से हीन हो जाते और मरने के बाद नीच गति को प्राप्त होते हैं। द्विजवरो! जिनके राज्य में श्रेष्ठ पुरुषों की सब प्रकार से रक्षा की जाती है, वे महामना नरेश इस लोक में आनन्द के भीगी होते हैं और परलोक में अक्षय सुख प्राप्त करते हैं, ऐसा समझो। अब मैं सबके नियत धर्म के लक्षणों का वर्णन करता हूँ। अहिंसा सबसे श्रेष्ठ धर्म है और हिंसा अधर्म का लक्षण (स्वरूप) है। प्रकाश देवताओं का और यज्ञ आदि कर्म मनुष्यों का लक्षण हैं। शब्द आकाश का, वायु स्पर्श का, रूप तेज का और रस जल का लक्षण है। गन्ध सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करने वाली पृथ्वी का लक्षण है तथा स्वर व्यंजन की शुद्धि से युक्त वाणी का लक्षण शब्द हैं।

28.4 चिन्तन मन का और निश्चय बुद्धि का लक्षण है, क्योंकि मनुष्य इस जगत में मन के द्वारा चिन्तन की हुई वस्तुओं का बुद्धि से ही निश्चय करते हैं, निश्चय के द्वारा ही बुद्धि जानने में आती है, इसमें संदेह नहीं है। मन का लक्षण ध्यान है और श्रेष्ठ पुरुष का लक्षण बाहर से व्यक्त नहीं होता (वह स्वसंवेद्य हुआ करता है)। योग का लक्षण प्रवृत्ति और संन्यास का लक्षण ज्ञान है। इसलिये बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि वह ज्ञान का आश्रय लेकर यहाँ संन्यास ग्रहण करे। ज्ञानयुक्त संन्यास मौत और बुढ़ापा को लाँघकर सब प्रकार के द्वन्द्वों से परे हो अज्ञानान्धकार के पार पहुँचकर परमगति को प्राप्त होता है।

28.5 महर्षियो! यह मैंने तुम लोगों से लक्षणों सहित धर्म का विधिवत वर्णन किया। अब यह बतला रहा हूँ कि किस गुण को किस इन्द्रिय से ठीक-ठीक ग्रहण किया जाता है। पृथ्वी का जो गन्ध नामक गुण है, उसका नासिका के द्वारा ग्रहण होता है और नासिका में स्थित वायु उस गन्ध का अनुभव कराने में सहायक होती है। जल का स्वाभाविक गुण रस है, जिसका जिह्वा के द्वारा ग्रहण किया जाता है और जिह्वा में स्थित चन्द्रमा उस रस के आस्वादन में सहायक होता है। तेज का गुण रूप है और वह नेत्र में स्थित सूर्य देवता की सहायता से नेत्र के द्वारा सदा देखा जाता है। वायु का स्वाभाविक गुण स्पर्श है, जिसका त्वचा के द्वारा ज्ञान होता है और त्वचा में स्थित वायुदेव उस स्पर्श का अनुभव कराने में सहायक होता है। आकाश के गुण शब्द का कानों के द्वारा ग्रहण होता है और कान में स्थित सम्पूर्ण दिशाएँ शब्द के श्रवण में सहायक बतायी गयी हैं।

28.6 मन का गुण चिन्तन है, जिसका बुद्धि के द्वारा ग्रहण किया जाता है और हृदय में स्थित चेतन (आत्मा) मन के चिन्तन कार्य में सहायता देता है। निश्चय के द्वारा बुद्धि का और ज्ञान के द्वारा महत्तत्त्व का ग्रहण होता है। इनके कार्यों से ही इनकी सत्ता का निश्चय होता है और इसी से इन्हें व्यक्त माना जाता है, किंतु वास्वत में तो अतीन्द्रिय होने के कारण ये बुद्धि आदि अव्यक्त ही हैं, इसमें संशय नहीं है।

28.7 नित्य क्षेत्रज्ञ आत्मा का कोई ज्ञापन लिंग नहीं है, क्योंकि वह (स्वयं प्रकाश और) निर्गुण है। अत: क्षेत्रज्ञ अलिंग (किसी विशेष लक्षण से रहित) है, अत: केवल ज्ञान ही उसका लक्षण (स्वरूप) माना गया है। गुणों की उत्पत्ति और लय के कारण भूत अव्यक्त प्रकृति को क्षेत्र कहते हैं। मैं उसमें संलग्न होकर सदा उसे जानता और सुनता हूँ। आत्मा क्षेत्र को जानता है, इसलिये वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है।

28.8 क्षेत्रज्ञ आदि, मध्य और अन्त से युक्त समस्त उत्पत्तिशील अचेतन गुणों के कार्य को और उनकी क्रिया को भी भली-भाँति जानता है, किंतु बारंबार उत्पन्न होने वाले गुण आत्मा को नहीं जान पाते। जो गुणों और गुणों के कार्यों से अत्यन्त परे हैं, उस परम महान सत्यस्व रूप क्षेत्रज्ञ को कोई नहीं जानता, परंतु वह सबको जानता है। अत: इस लोक में जिसके दोषों का क्षय हो गया है, वह गुणातीत धर्मज्ञ पुरुष सत्त्व (बुद्धि) और गुणों का परित्याग करके क्षेत्रज्ञ के शुद्ध स्वरूप परमात्मा में प्रवेश कर जाता है। क्षेत्रज्ञ सुख-दुखादि द्वन्द्वों से रहित, किसी को नमस्कार न करने वाला, स्वाहाकार रूप यज्ञादि कर्म न करने वाला, अचल और अनिकेत है। वही महान विभु है।

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