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अध्याय 35

35.1 सत्त्व और पुरुष की भिन्नता, बुद्धिमान की प्रंशसा, पंच्चभूतों के गुणों का विस्तार और परमात्मा की श्रेष्ठता का वर्णन---

ब्रह्मा जी बोले- श्रेष्ठ महर्षियों! तुम लोगों ने जो विषय पूछा है, उसे अब मैं कहूँगा। गुरु ने सुयोग्य शिष्य को पाकर जो उपदेश दिया है, उसे तुम लोग सुनो। उस विषय को यहाँ पूर्णतया सुनकर अच्छी प्रकार धारण करो। सब प्राणियों की अहिंसा ही सर्वोत्तम कर्तव्य है- ऐसा माना गया है। यह साधन उद्वेग रहित, सर्वश्रेष्ठ और धर्म को लक्षित कराने वाला है। निश्चय को साक्षात करने वाले लोग कहते हैं कि ‘ज्ञान ही परम कल्याण का साधन है।’ इसलिये परम शुद्ध ज्ञान के द्वारा ही मनुष्य सब पापों से छूट जाता है। जो लोग प्राणियों की हिंसा करते हैं, नास्तिक वृत्ति का आश्रय लेते हैं और लोभ तथा मोह में फँसे हुए हैं, उन्हें नरक में गिरना पड़ता है। जो लोग सावधान होकर सकाम कर्मों का अनुष्ठान करते हैं, वे बार-बार इस लोक में जन्म ग्रहण करके सुखी होते हैं। जो विद्वान समत्वयोग में स्थित हो श्रद्धा के साथ कर्तव्य कर्मों का अनुष्ठान करते हैं और उनके फल में आसक्त नहीं होते, वे धीर और उत्तम दृष्टि वाले माने गये हैं।

35.2 श्रेष्ठ महर्षियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि सत्त्व और क्षेत्रज्ञ का परस्पर संयोग और वियोग कैसे होता है? इस विषय को ध्यान देकर सुनो। इन दोनों में यहाँ यह विषय विषयिभाव सम्बन्ध माना गया है। इनमें पुरुष तो सदा विषयी और सत्त्व विषय माना जाता है। पूर्व अध्याय में मच्छर और गूलर के उदाहरण से यह बात बतायी जा चुकी है कि भोगा जाने वाला अचेतन सत्त्व नित्य स्वरूप क्षेत्रज्ञ को नहीं जानता, किंतु जो क्षेत्रज्ञ है वह इस प्रकार जानता है कि जो भोगता है वह आत्मा है और जो भोगा जाता है, वह सत्त्व है।

35.3 मनीषी पुरुष सत्त्व को द्वन्द्वयुक्त कहते हैं और क्षेत्रज्ञ निर्द्वन्द्व, निष्फल, नित्य और निर्गुण स्वरूप है। वह क्षेत्रज्ञ समभाव से सर्वत्र भली-भाँति स्थित हुआ ज्ञान का अनुसरण करता है। जैसे कमल का पत्ता निर्लिप्त रहकर जल को धारण करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ सदा सत्त्व का उपभोग करता है। जैसे कमल के पत्ते पर पड़ी हुई जल की चंचल बूँद उसे भिगो नहीं पाती, उसी प्रकार विद्वान पुरुष समस्त गुणों से सम्बन्ध रखते हुए भी किसी से लिप्त नहीं होता। अत: क्षेत्रज्ञ पुरुष वास्विक में असंग है, इसमें संदेह नहीं है। यह निश्चित बात है कि पुरुष के भोगने योग्य द्रव्यमात्र की संज्ञा सत्त्व है तथा जैसे द्रव्य और कर्ता का सम्बन्ध है, वैसे ही इन दोनों का सम्बन्ध है। जैसे कोई मनुष्य दीपक लेकर अन्धकार में चलता है, वैसे ही परम तत्त्व को चाहने वाले साधक सत्त्व रूप दीपक के प्रकाश में साधन मार्ग पर चलते हैं। जब तक दीपक में द्रव्य और गुण रहते हैं, तभी तक वह प्रकाश फैलाता है। द्रव्य और गुण का क्षय हो जाने पर ज्योति भी अन्तर्धान हो जाती है। इस प्रकार सत्त्वगुण तो व्यक्त है और पुरुष अव्यक्त माना गया है। ब्रह्मर्षियों! इस तत्त्व को समझो। अब मैं तुम लोगों से आगे की बात बताता हूँ।

35.4 जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे हजार उपाय करने पर भी ज्ञान नहीं होता और जो बुद्धिमान है वह चौथाई प्रयत्न से भी ज्ञान पाकर सुख का अनुभव करता है। ऐसा विचार कर किसी उपाय से धर्म के साधन का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये, क्योंकि उपाय को जानने वाला मेधावी पुरुष अत्यन्त सुख का भागी होता है। जैसे कोई मनुष्य यदि राह खर्च का प्रबन्ध किये बिना ही यात्रा करता है तो उसे मार्ग में बहुत क्लेश उठाना पड़ता है अथवा वह बीच ही में मर भी सकता है। ऐसे ही (पूर्व जन्मों के पुण्यों से ही पुरुष) योग मार्ग के साधन में लगने पर योग सिद्धि रूप फल कठिनता से पाता है अथवा नहीं भी पाता। पुरुष का अपना कल्याण साधन ही उसके पूर्वजन्म के शुभाशुभ संस्कारों को बताने वाला है। जैसे पहले न देखे हुए दूर के रास्ते पर जब मनुष्य सहसा पैदल ही चल पड़ता है (तो वह अपने गन्तव्य स्थान पर नहीं पहुँच पाता), यही दशा तत्त्व ज्ञान से रहित अज्ञानी पुरुष की होती है।

35.5 किंतु उसी मार्ग पर घोड़े जुते हुए शीर्घ गामी रथ के द्वारा यात्रा करने वाला पुरुष जिस प्रकार शीघ्र ही अपने लक्ष्य स्थान पर पहुँच जाता है तथा वह ऊँचे पर्वत पर चढ़कर नीचे पृथ्वी की ओर नहीं देखता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुषों की गति होती है। देखो, रथ के द्वारा जाने वाला भी मूर्ख मनुष्य ऊँचे पर्वत के पास पहुँचकर कष्ट पाता रहता है, किंतु बुद्धिमान मनुष्य जहाँ तक रथ जाने का मार्ग है वहाँ तक रथ से जाता है और जब रथ का रास्ता समाप्त हो जाता है तब वह उसे छोड़कर पैदल यात्रा करता है। इसी प्रकार तत्त्व और योगविधि को जानने वाला बुद्धिमान एवं गुणज्ञ पुरुष अच्छी तरह समझ बूझकर उत्तरोतर आगे बढ़ता जाता है। जैसे कोई पुरुष मोहवश बिना नाव के ही भयंकर समुद्र में प्रवेश करता है और दोनों भुजाओं से ही तैरकर उसके पार होने का भरोसा रखता है तो निश्चय ही वह अपनी मौत बुलाना चाहता है (उसी प्रकार ज्ञान नौका का सहारा लिये बिना मनुष्य भवसागर से पार नहीं हो सकता)।

35.6 जिस तरह जल मार्ग के विभाग को जानने वाला बुद्धिमान पुरुष सुन्दर डाँड वाली नाव के द्वारा अनायास ही जल पर यात्रा करके शीघ्र समुद्र से तर जाता है एवं पार पहुँच जाने पर नाव की ममता छोड़कर चल देता है, (उसी प्रकार संसार सागर से पार हो जाने पर बुद्धिमान पुरुष पहले के साधन सामग्री की ममता छोड़ देता है।) यह बात रथ पर चलने वाले और पैदल चलने वाले के दृष्टान्त से पहले भी कही जा चुकी है। परंतु स्नेहवश मोह को प्राप्त हुआ मनुष्य ममता से आबद्ध होकर नाव पर सदा बैठे रहने वाले मल्लाह की भाँति वहीं चक्कर काटता रहता है। नौका पर चढ़कर जिस प्रकार स्थल पर विचरण करना सम्भव नहीं है तथा रथ पर चढ़कर जल में विचरण करना सम्भव नहीं बताया गया है, इसी प्रकार किये हुए विचित्र कर्म अलग-अलग स्थान पर पहुँचाने वाले हैं। संसार में जिनके द्वारा जैसा कर्म किया गया है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त होता है। जो गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द से युक्त नहीं है तथा मुनि लोग बुद्धि के द्वारा जिसका मनन करते हैं, वह ‘प्रधान’ कहलाता है।

35.7 प्रधान का दूसरा नाम अव्यक्त है। अव्यक्त का कार्य महत्तत्त्व है और प्रकृति से उत्पन्न महत्तत्त्व का कार्य अहंकार है। अहंकार से पंच महाभूतों को प्रकट करने वाले गुण की उत्पत्ति हुई है। पंच महाभूतों के कार्य हैं रूप, रस आदि विषय। वे पृथक-पृथक गुणों के नाम से प्रसिद्ध हैं। अव्यक्त प्रकृति कारण रूपा भी है और कार्यरूपा भी। इसी प्रकार महत्तत्त्व के भी कारण और कार्य दोनों ही स्वरूप सुने गये हैं। अहंकार भी कारण रूप तो है ही, कार्य रूप में भी बारम्बार परिणत होता रहता है। पंच महाभूतों (पंचतन्मात्राओं) में भी कारणत्व और कार्यत्व दोनों धर्म हैं। वे शब्दादि विषयों को उत्पन्न करते हैं, इसलिये ऐसा कहा जाता है कि वे बीजधर्मी हैं। उन पाँचों भूतों के विशेष कार्य शब्द आदि विषय हैं। उन विषयों का प्रवर्तक चित्त है। पंचमहाभूतों में से आकाश में एक ही गुण माना गया है।

35.8 वायु के गुण बतलाये जाते हैं। तेज तीन गुणों से युक्त कहा गया है। जल के चार गुण हैं। पृथ्वी के पाँच गुण समझने चाहिये। यह देवी स्थावर जंगम प्राणियों से भरी हुई, समस्त जीवों को जन्म देने वाली तथा शुभ और अशुभ का निर्देश करने वाली है। विप्रवरो! शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध- ये ही पृथ्वी के पाँच गुण जानने चाहिये। इनमें भी गन्ध उसका खास गुण है। गन्ध अनेक प्रकार की मानी गयी है। मैं उस गन्ध के गुणों का विस्तार के साथ वर्णन करूँगा। इष्ट (सुगन्ध), अनिष्ट (दुर्गन्ध), मधुर, अम्ल, कटु, निर्हारी (दूर तक फैलने वाली), मिश्रित, स्निग्ध, रुक्ष और विशद- ये पार्थिव गन्ध के दस भेद समझने चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप, रस- ये जल के चार गुण माने गये हैं (इनमें रस ही जल का मुख्य गुण है)। अब मैं रस विज्ञान का वर्णन करता हूँ। रस के बहुत से भेद बताये गये हैं। मीठा, खट्टा, कड़ुआ, तीता, कसैला और नमकीन- इस प्रकार छ: भेदों में जलमय रस का विस्तार बताया गया है। शब्द, स्पर्श और रूप- ये तेज के तीन गुण कहे गये हैं। इनमें रूप ही तेज की मुख्य गुण है। रूप के भी कई भेद माने गए हैं।

35.9 शुक्ल, कृष्ण, रक्त, नील, पाती, अरुण, छोटा, बड़ा, मोटा, दुबला, चौकोना और गोल-इस प्रकार तैजस् रूप का बारह प्रकार से विस्तार सत्यवादी धर्मज्ञ वृद्ध ब्राह्मणों के द्वारा जानने योग्य कहा जाता है। शब्द और स्पर्श- ये वायु के दो गुण जानने योग्य कहे जाते हैं। इनमें भी स्पर्श ही वायु का प्रधान गुण है। स्पर्श भी कई प्रकार का माना गया है। रूखा, ठंडा, गरम, स्निग्ध, विशद, कठिन, चिकना, श्लक्ष्ण (हल्का), पिच्छिल, कठोर और कोमल- इन बारह प्रकारों से वायु के गुण स्पर्श का विस्तार तत्त्वदर्शी धर्मज्ञ सिद्ध ब्राह्मणों द्वारा विधिवत बतलाया गया है। आकाश का शब्दमात्र एक ही गुण माना गया है। उस शब्द के बहुत से गुण हैं। उनका विस्तार के साथ वर्णन करता हूँ।

35.10 षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम्, निषाद, धैवत, इष्ट (प्रिय), अनिष्ट (अप्रिय) और सहंत (श्लिष्ट)- इस प्रकार विभाग वाले आकाशजनित शब्द के दस भेद हैं। आकाश सब भूतों में श्रेष्ठ हैं। उससे श्रेष्ठ अहंकार, अहंकार से श्रेष्ठ बुद्धि, उस बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा, उससे श्रेष्ठ अव्यक्त प्रकृति और प्रकृति से श्रेष्ठ पुरुष है।

35.11 जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतों की श्रेष्ठता और न्यूनता का ज्ञाता, समस्त कर्मों की विधि का जानकार और सब प्राणियों को आत्मभाव से देखने वाला है, वह अविनाशी परमात्मा को प्राप्त करता है।

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