अध्याय 17 - श्रद्धा के विभाग
अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सूज्य यजन्ते श्रद्धयान्विता: ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तम: ॥ १॥
अर्जुन: उवाच--अर्जुन ने कहा; ये--जो; शास्त्र-विधिम्--शास्त्रों के विधान को;
उत्सृज्य--त्यागकर; यजन्ते--पूजा करते हैं; श्रद्धबा--पूर्ण श्रद्धा से; अन्विता:--युक्त;
तेषाम्--उनकी; निष्ठा-- श्रद्धा; तु--लेकिन; का--कौनसी; कृष्ण--हे कृष्ण;
सत्त्वम्--सतोगुणी; आहो--अथवा अन्य; रज:--रजोगुणी; तमः--तमोगुणी |
अर्जुन ने कहा-हे कृष्ण! जो लोग शास्त्र के नियमों का
पालन न करके अपनी कल्पना के अनुसार पूजा करते हैं,
उनकी स्थिति कौन सी है? वे सतोगुणी हैं, रजोगुणी हैं या
तमोगुणी ?
*
अश्रीथगवानुवाच
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रुणु ॥ २॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; त्रि-विधा--तीन प्रकार की; भवति--होती है;
श्रद्धा-- श्रद्धा; देहिनामू--देहधारियों की; सा--वह; स्व-भाव-जा--प्रकृति के गुण
के अनुसार; सात्त्विकी--सतोगुणी; राजसी--रजोगुणी; च-- भी; एव--निश्चय ही;
तामसी--तमोगुणी; च--तथा; इति--इस प्रकार; ताम्--उसको; श्रुणु--मुझसे सुनो |
भगवान् ने कहा--देहधारी जीव द्वारा अर्जित गुणों के
अनुसार उसकी श्रद्धा तीन प्रकार की हो सकती है--
सतोगुणी, रजोगुणी अथवा तमोगुणी। अब इसके विषय में
मुझसे सुनो।
*
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
भ्रद्धामयोयं पुरुषो यो यच्छुद्धः स एवं सः ॥ ३॥
सत्त्व-अनुरूपा--अस्तित्व के अनुसार; सर्वस्य--सबों की; श्रद्धा-- श्रद्धा, निष्ठा;
भवति--हो जाती है; भारत--हे भरतपुत्र; श्रद्धा-- श्रद्धा; मय:ः--से युक्त; अयमू--
यह; पुरुष: --जीवात्मा; यः--जो; यत्--जिसके होने से; श्रद्ध:-- श्रद्धा; सः--इस
प्रकार; एव--निश्चय ही; सः--वह |.
है भरतपुत्र! विभिन्न गुणों के अन्तर्गत अपने अपने
अस्तित्व के अनुसार मनुष्य एक विशेष प्रकार की श्रद्धा
विकसित करता है। अपने द्वारा अर्जित गुणों के अनुसार ही
जीव को विशेष श्रद्धा से युक्त कहा जाता है।
*
यजसन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसा: ।
प्रेतान्भूतगणां श्वान्ये यजन्ते तामसा जना: ॥ ४॥
यजन्ते--पूजते हैं; सात्त्तिका:--सतोगुण में स्थित लोग; देवान्ू--देवताओं को; यक्ष-
रक्षांसि--असुरगण को; राजसा:--रजोगुण में स्थित लोग; प्रेतान्ू--मृतकों की
आत्माओं को; भूत-गणान्-- भूतों को; च--तथा; अन्ये-- अन्य; यजन्ते-- पूजते हैं;
तामसा:--तमोगुण में स्थित; जना:--लोग |
सतोगुणी व्यक्ति देवताओं को पूजते हैं, रजोगुणी यक्षों व
राक्षसों की पूजा करते हैं और तमोगुणी व्यक्ति भूत-प्रेतों को
पूजते हैं।
*
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जना: ।
दम्भाहड्डारसंयुक्ताः कामरागबलान्विता: ॥ |
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतस: ।
मां चैवान्त: शरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयान् ॥ ६॥
अशास्त्र--जो शास्त्रों में नहीं है; विहितम्--निर्देशित; घोरम्--अन्यों के लिए हानिप्रद;
तप्यन्ते--तप करते हैं; ये--जो लोग; तप:ः--तपस्या; जना:--लोग; दम्भ--घमण्ड;
अहड्लार--तथा अहंकार से; संयुक्ता: --प्रवृत्त; काम--काम; राग--तथा आसक्ति का;
बल--बल पूर्वक; अन्विता: --प्रेरित; कर्षयन्त:--कष्ट देते हुए; शरीर-स्थम्--शरीर के
भीतर स्थित; भूत-ग्रामम्--भौतिक तत्त्वों का संयोग; अचेतस:-- भ्रमित मनोवृत्ति
वाले; माम्ू--मुझको; च-- भी; एव--निश्चय ही; अन्त:-- भीतर; शरीर-स्थम्--शरीर
में स्थित; तानू--उनको; विद्द्धि--जानो; आसुर-निश्चयान्-- असुर |.
जो लोग दम्भ तथा अहंकार से अभिभूत होकर
शास्त्रविरुद्ध कठोर तपस्या और ब्रत करते हैं, जो काम तथा
आसक्ति द्वारा प्रेरित होते हैं जो मूर्ख हैं तथा जो शरीर के
भौतिक तत्त्वों को तथा शरीर के भीतर स्थित परमात्मा को
कष्ट पहुँचाते हैं, वे असुर कहे जाते हैं।
*
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रिय: ।
यज्ञस्तपस्तथा दान तेषां भेदमिमं श्रुणु ॥ ७॥
आहार:--भोजन; तु--निश्चय ही; अपि-- भी; सर्वस्थ--हर एक का; त्रि-विध:--तीन
प्रकार का; भवति--होता है; प्रिय:--प्यारा; यज्ञ:--यज्ञ; तप:ः--तपस्या; तथा--और;
दानम्ू--दान; तेषाम्--उनका; भेदम्-- अन्तर; इमम्--यह; श्रूणु--सुनो
यहाँ तक कि प्रत्येक व्यक्ति जो भोजन पसन्द करता है,
वह भी प्रकृति के गुणों के अनुसार तीन प्रकार का होता है।
यही बात यज्ञ, तपस्या तथा दान के लिए भी सत्य है। अब
उनके भेदों के विषय में सुनो।
*
आयु:सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धना: ।
रस्याः स्निग्धा: स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रिया: ॥ ८ ॥
कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥ ९॥
यातयाम॑ं गतरसं पूर्ति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजन तामसप्रियम् ॥ १०॥
आयु:--जीवन काल; सत्त्व--अस्तित्व; बल--बल; आरोग्य--स्वास्थ्य; सुख--
सुख; प्रीति--तथा संतोष; विवर्धना: --बढ़ाते हुए; रस्या:--रस से युक्त; स्निग्धा: --
चिकना; स्थिरा:--सहिष्णु; हद्याः--हदय को भाने वाले; आहारा:--भोजन;
सात्त्विक--सतोगुणी; प्रिया:--अच्छे लगने वाले ।
कदु-कड़वे, तीते; अम्ल--खट्टे; लवण--नमकीन; अति-उष्ण-- अत्यन्त गरम;
तीक्षण--चटपटे; रूक्ष--शुष्क; विदाहिन:--जलाने वाले; आहारा: -- भोजन;
राजसस्य--रजोगुणी के; इष्टाः--रुचिकर; दुःख--दुःख; शोक--शोक; आमय--
रोग; प्रदा:--उत्पन्न करने वाले।
यात-यामम्-- भोजन करने से तीन घंटे पूर्व पकाया गया; गत-रसम्--स्वादरहित;
पूति--दुर्गधयुक्त; पर्युषितम्ू--बिगड़ा हुआ; च-- भी; यत्--जो; उच्छिष्टमू-- अन्यों
का जूठन; अपि-- भी; च--तथा; अमेध्यम्--अस्पृश्य; भोजनम्-- भोजन; तामस--
तमोगुणी को; प्रियम्-प्रिय |
जो भोजन सात्त्विक व्यक्तियों को प्रिय होता है, वह आयु
बढ़ाने वाला, जीवन को शुद्ध करने वाला तथा बल,
स्वास्थ्य, सुख तथा तृप्ति प्रदान करने वाला होता है। ऐसा
भोजन रसमय, स्निग्ध, स्वास्थ्यप्रद तथा हृदय को भाने वाला
होता है।
अत्यधिक तिक्त, खट्टे, नमकीन, गरम, चटपटे, शुष्क
तथा जलन उत्पन्न करने वाले भोजन रजोगुणी व्यक्तियों को
प्रिय होते हैं। ऐसे भोजन दुख, शोक तथा रोग उत्पन्न करने
वाले हैं।खाने से तीन घंटे पूर्व पकाया गया, स्वादहीन, वियोजित
एवं सड़ा, जूठा तथा अस्पृश्य वस्तुओं से युक्त भोजन उन
लोगों को प्रिय होता है, जो तामसी होते हैं।
*
अफलाकादुक्षिभिर्यज्ञो विधिदिष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्त्विक: ॥ ११॥
अफल-आकाडूक्षिभि:--फल की इच्छा से रहित; यज्ञ:--यज्ञ; विधि-दिष्ट: --शास्त्रों
के निर्देशानुसार; यः--जो; इज्यते--सम्पन्न किया जाता है; यष्टव्यम्--सम्पन्न किया
जाना चाहिए; एव--निश्चय ही; इति--इस प्रकार; मन:--मन में; समाधाय--स्थिर
करके; सः--वह; सात्त्विक:--सतोगुणी
यज्ञों में वही यज्ञ सात्त्विक होता है, जो शास्त्र के
निर्देशानुसार कर्तव्य समझ कर उन लोगों के द्वारा किया जाता
है, जो फल की इच्छा नहीं करते।
*
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ १२॥
अभिसन्धाय--इच्छा कर के; तु--लेकिन; फलम्ू--फल को; दम्भ--घमंड; अर्थम्--
के लिए; अपि-- भी; च--तथा; एव--निश्चय ही; यत्--जो; इज्यते--किया जाता है;
भरत-श्रेष्ट--हे भरतवंशियों में प्रमुख; तम्--उस; यज्ञम्--यज्ञ को; विदर्द्धि--जानो;
राजसमू--रजोगुणी
लेकिन हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ किसी भौतिक लाभ के लिए
या गर्ववश किया जाता है, उसे तुम राजसी जानो।
*
विधिहीनमसूष्टान्न॑ मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञ तामसं परिचक्षते ॥ १३॥
विधि-हीनम्--शास्त्रीय निर्देश के बिना; असृष्ट-अन्नम्--प्रसाद वितरण किये बिना;
मन्त्र-हीनम्--वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना; अदक्षिणम्--पुरोहितों को
दक्षिणा दिये बिना; श्रद्धा-- श्रद्धा; विरहितम्--विहीन; यज्ञम्--यज्ञ को; तामसम्--
तामसी; परिचक्षते--माना जाता है|
जो यज्ञ शास्त्र के निर्देशों की अवहेलना करके, प्रसाद
वितरण किये बिना, वैदिक मन्त्रों का उच्चारण किये बिना,
पुरोहितों को दक्षिणा दिये बिना तथा श्रद्धा के बिना सम्पन्न
किया जाता है, वह तामसी माना जाता है।
*
देवद्विजगुरुप्राज़पूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४॥
देव--परमेश्वर; द्विज--ब्राह्मण; गुरु --गुरु; प्राज्ल--तथा पूज्य व्यक्तियों की; पूजनम्--
पूजा; शौचम्--पवित्रता; आर्जवम्ू--सरलता; ब्रह्मचर्यम्--ब्रह्मचर्य; अहिंसा--
अहिंसा; च--भी; शारीरम्--शरीर सम्बन्धी; तपः--तपस्या; उच्यते--कहा जाता है।.
परमेश्वर, ब्राह्मणों, गुरु, माता-पिता जैसे गुरुजनों की
पूजा करना तथा पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ही
शारीरिक तपस्या है।
*
अनुद्वेगकरं वाक्य सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाड्मयं तप उच्यते ॥ १५॥
अनुद्वेग-करम्--श्षुब्ध न करने वाले; वाक्यम्--शब्द; सत्यम्--सच्चे; प्रिय--प्रिय;
हितम्ू--लाभप्रद; च--भी; यत्--जो; स्वाध्याय--वैदिक अध्ययन का;
अभ्यसनम्--अभ्यास; च--भी; एव--निश्चय ही; वाक्ू-मयम्--वाणी की; तपः--
तपस्या; उच्यते--कही जाती है।.
सच्चे, भाने वाले, हितकर तथा अन्यों को क्षुब्ध न करने
वाले वाक्य बोलना और वैदिक साहित्य का नियमित
पारायण करना--यही वाणी की तपस्या है।
*
मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥ १६॥
मनः-प्रसाद:--मन की तुष्टि; सौम्यत्वम्--अन्यों के प्रति कपट भाव से रहित; मौनम्--
गम्भीरता; आत्म-- अपना; विनिग्रह:--नियन्त्रण, संयम; भाव--स्वभाव का;
संशुद्धि:ः--शुद्धी करण; इति--इस प्रकार; एतत्--यह; तप:--तपस्या; मानसमू--मन
की; उच्यते--कही जाती है|.
तथा संतोष, सरलता, गम्भीरता, आत्म-संयम एवं जीवन
की शुद्धि--ये मन की तपस्याएँ हैं।
*
भ्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाइुक्षिभिर्युक्तै: सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७॥
श्रद्धया-- श्रद्धा समेत; परया--दिव्य; तप्तम्--किया गया; तपः--तप; तत्--वह;
त्रि-विधम्--तीन प्रकार के; नरैः--मनुष्यों द्वारा; अफल-आकाड्क्षिभि:--फल की
इच्छा न करने वाले; युक्तै:--प्रवृत्त; सात्त्तिकमू--सतोगुण में; परिचक्षते--कहा जाता
है।.
भौतिक लाभ की इच्छा न करने वाले तथा केवल परमेश्वर में प्रवृत्त मनुष्यों द्वारा दिव्य श्रद्धा से सम्पन्न यह तीन
प्रकार की तपस्या सात्त्विक तपस्या कहलाती है।
*
सत्कारमानपूजार्थ तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्त राजसं चलमश्चुवम् ॥ १८॥
सत््-कार--आदर; मान--सम्मान; पूजा--तथा पूजा; अर्थम्--के लिए; तपः--
तपस्या; दम्भेन--घमंड से; च-- भी; एब--निश्चय ही; यत्--जो; क्रियते--किया
जाता है; ततू--वह; इह--इस संसार में; प्रोक्तम्ू--कहा जाता है; राजसम्--रजोगुणी;
चलमू--चलायमान; अश्रुवम्--क्षणिक |.
जो तपस्या दंभपूर्वक तथा सम्मान, सत्कार एवं पूजा
कराने के लिए सम्पन्न की जाती है, वह राजसी ( रजोगुणी )
कहलाती है। यह न तो स्थायी होती है न शाश्वत।
*
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थ वा तत्तामसमुदाहतम् ॥ १९॥
मूढ--मूर्ख; ग्राहेण--प्रयत्त से; आत्मन:--अपने ही; यत्--जो; पीडया--उत्पीड़न
द्वारा; क्रियते--की जाती है; तप:ः--तपस्या; परस्य--अन्यों को; उत्सादन-अर्थम्--
विनाश करने के लिए; वा--अथवा; तत्--वह; तामसम्--तमोगुणी; उदाहतम्--कही
जाती है।
मूर्खतावश आत्म-उत्पीड़न के लिए या अन्यों को विनष्ट
करने या हानि पहुँचाने के लिए जो तपस्या की जाती है, वह
तामसी कहलाती है।
*
दातव्यमिति यद्यानं दीयतेडनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्यानं सात्त्विकं स्पृतम् ॥ २०॥
दातव्यम्-देने योग्य; इति--इस प्रकार; यत्--जो; दानम्--दान; दीयते--दिया जाता
है; अनुपकारिणे-- प्रत्युपकार की भावना के बिना; देशे--उचित स्थान में; काले--
उचित समय में; च-- भी; पात्रे--उपयुक्त व्यक्ति को; च--तथा; तत्--वह; दानम्--
दान; सात्त्विकम्--सतोगुणी, सात्त्विक; स्मृतम्ू--माना जाता है।
जो दान कर्तव्य समझकर, किसी प्रत्युपकार की आशा
के बिना, समुचित काल तथा स्थान में और योग्य व्यक्ति को
दिया जाता है, वह सात्त्विक माना जाता है।
*
यत्तु प्रत्युपकारार्थ फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्ठं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१॥
यत्--जो; तु--लेकिन; प्रति-उपकार-अर्थम्--बदले में पाने के उद्देश्य से; फलम्ू--
'फल को; उद्दिश्य--इच्छा करके; वा--अथवा; पुन:--फिर; दीयते--दिया जाता है;
च-भी; परिक्लिषप्टम्-पश्चात्ताप के साथ; तत्ू--उस; दानम्--दान को; राजसम्--
रजोगुणी; स्मृतम्--माना जाता है,
किन्तु जो दान प्रत्युपकार की भावना से या कर्म फल की
इच्छा से या अनिच्छापूर्वक किया जाता है, वह रजोगुणी
( राजस ) कहलाता है।
*
अदेशकाले यद्यानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहतम् ॥ २२॥
अदेश--अशुद्ध स्थान; काले--तथा अशुद्ध समय में; यत्--जो; दानम्--दान;
अपात्रेभ्य:--अयोग्य व्यक्तियों को; च-- भी; दीयते--दिया जाता है; असत्-कृतम्--
सम्मान के बिना; अवज्ञातमू--समुचित ध्यान दिये बिना; तत्--वह; तामसम्--
तमोगुणी; उदाहतम्--कहा जाता है
तथा जो दान किसी अपवित्र स्थान में, अनुचित समय में,
किसी अयोग्य व्यक्ति को या बिना समुचित ध्यान तथा आदर से दिया जाता है, वह तामसी कहलाता है।
*
तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविध: स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्व यज्ञाश्व विहिता: पुरा ॥ २३॥
०--परम का सूचक; तत्--वह; सत्--शा श्वत; इति--इस प्रकार; निर्देश:--संकेत;
ब्रह्मण: --ब्रह्म का; त्रि-विध: --तीन प्रकार का; स्मृत:--माना जाता है; ब्राह्मणा:--
ब्राह्मण लोग; तेन--उससे; वेदा:ः --वैदिक साहित्य; च-- भी; यज्ञा:--यज्ञ; च-- भी;
विहिता: --प्रयुक्त; पुरा--आदिकाल में |
सृष्टि के आदिकाल से ३» तत् सत् ये तीन शब्द परब्रह्म
को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे हैं। ये तीनों
सांकेतिक अभिव्यक्तियाँ ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मंत्रों का
उच्चारण करते समय तथा ब्रह्म को संतुष्ट करने के लिए यज्ञों
के समय प्रयुक्त होती थीं।
*
तस्माद्३» इत्युदाहत्य यज्ञदानतपःक्रिया: ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ता: सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ २४॥
तस्मात्ू--अतएव; ३४७--ओम् से प्रारम्भ करके; इति--इस प्रकार; उदाहत्य--संकेत
करके; यज्ञ-यज्ञ; दान--दान; तप:ः--तथा तप की; क्रिया: --क्रियाएँ; प्रवर्तन्ते--
प्रारम्भ होती हैं; विधान-उक्ता:--शास्त्रीय विधान के अनुसार; सततम्--सदैव; ब्रह्म-
वादिनाम्--अध्यात्मवादियों या योगियों की |
अतएव योगीजन ब्रह्म की प्राप्ति के लिए शास्त्रीय विधि
के अनुसार यज्ञ, दान तथा तप की समस्त क्रियाओं का
शुभारम्भ सदैव ओम से करते हैं।
*
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रिया: ।
दानक्रियाश्व विविधा: क्रियन्ते मोक्षकाड्क्षिभि: ॥ २५॥
तत्--वह; इति--इस प्रकार; अनभिसन्धाय--बिना इच्छा किये; फलमू--फल;
यज्ञ-यज्ञ; तप:--तथा तप की; क्रिया:--क्रियाएँ; दान--दान की; क्रिया: --
क्रियाएँ; च-- भी; विविधा:--विभिन्न; क्रियन्ते--की जाती हैं; मोक्ष-काड्क्षिभि: --
मोक्ष चाहने वालों के द्वारा),
मनुष्य को चाहिए कि कर्मफल की इच्छा किये बिना
विविध प्रकार के यज्ञ, तप तथा दान को 'तत्' शब्द कह कर
सम्पन्न करे। ऐसी दिव्य क्रियाओं का उद्देश्य भव-बन्धन से
मुक्त होना है।
*
सद्धावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मण तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥ २६॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थिति: सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७॥
सत्-भावे--ब्रह्म के स्वभाव के अर्थ में; साधु-भावे-- भक्त के स्वभाव के अर्थ में;
च--भी; सत्--सत् शब्द; इति--इस प्रकार; एतत्--यह; प्रयुज्यते--प्रयुक्त किया
जाता है; प्रशस्ते--प्रामाणिक; कर्मणि--कर्मों में; तथा-- भी; सत्-शब्दः --सत् शब्द;
पार्थ--हे पृथापुत्र; युज्यते--प्रयुक्त किया जाता है; यज्ञे--यज्ञ में; तपसि--तपस्या में;
दाने--दान में; च-- भी; स्थिति:--स्थिति; सत्ू--ब्रह्म; इति--इस प्रकार; च--तथा;
उच्यते--उच्चारण किया जाता है; कर्म--कार्य; च-- भी; एव--निश्चय ही; तत्--उस;
अर्थीयम्ू--के लिए; सत्--ब्रह्म; इति--इस प्रकार; एव--निश्चय ही; अभिधीयते--
कहा जाता है.
परम सत्य भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है और उसे सत् शब्द
से अभिहित किया जाता है। हे पृथापुत्र! ऐसे यज्ञ का
सम्पन्नकर्ता भी 'सत्' कहलाता है जिस प्रकार यज्ञ, तप तथा
दान के सारे कर्म भी जो परमपुरुष को प्रसन्न करने के लिए
सम्पन्न किये जाते हैं, 'सत्' हैं।
*
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥ २८ ॥
अश्रद्धया--श्रद्धारहित; हुतम्--यज्ञ में आहुति किया गया; दत्तम्--प्रदत्त; तप:--
तपस्या; तप्तम्--सम्पन्न; कृतम्--किया गया; च--भी; यत्--जो; असत्--झूठा;
इति--इस प्रकार; उच्यते--कहा जाता है; पार्थ--हे पृथापुत्र; न--कभी नहीं; च--
भी; तत्--वह; प्रेत्य--मर कर; न उ--न तो; इह--इस जीवन में |
हे पार्थ! श्रद्धा के बिना यज्ञ, दान या तप के रूप में जो
भी किया जाता है, वह नश्वर है। वह 'असत्' कहलाता है और
इस जन्म तथा अगले जन्म--दोनों में ही व्यर्थ जाता है।
*
