अध्याय पंद्रह: भगवान की पौगंड-लीला
कु-मनाः सु-मनस्त्वं हि याति यस्य पदाब्जयोः । सु-मनोऽर्पण-मात्रेण तं चैतन्य-प्रभुं भजे ॥
१॥
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में सादर नमस्कार करता हूँ, क्योंकि उनके चरणकमलों पर फूल चढ़ाने मात्र से ही बड़े से बड़ा । भौतिकतावादी भी भक्त बन जाता है।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।जयाद्वैतचन्द्र, जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की जय हो! पौगण्ड-लीलार सूत्र करिये गणन ।पौगण्ड-वयसे प्रभुर मुख्य अध्ययन ॥
३॥
अब मैं चैतन्य महाप्रभु की पाँच वर्ष की आयु से लेकर दस वर्ष की आयु तक की लीलाओं का संक्षिप्त वर्णन करने जा रहा हूँ। इस अवधि में उन्होंने मुख्य रूप से अध्ययन का कार्य किया।
पौगण्ड-लीला चैतन्ये-कृष्णस्याति-सुविस्तृता ।विद्यारम्भ-मुखा पाणि-ग्रहणान्ता मनो-हरा ॥
४॥
पौगण्ड अवस्था के अन्तर्गत महाप्रभु की लीलाएँ अत्यन्त व्यापक रहीं। उनका मुख्य कार्य उनकी शिक्षा ही रहा और उसके बाद उनका अन्यन्त सुन्दर ढंग से विवाह हुआ।
गङ्गादास पण्डित-स्थाने पड़ेन व्याकरण ।श्रवण-मात्रे कण्ठे कैल सूत्र-वृत्ति-गण ॥
५॥
। जब महाप्रभु श्री गंगादास पण्डित के यहाँ व्याकरण पढ़ रहे थे, तो वे व्याकरण के सारे नियम एवं परिभाषाएँ एक बार सुनकर ही तुरन्त कण्ठस्थ कर लेते थे।
अल्प-काले हैला पञ्जी-टीकाते प्रवीण ।।चिर-कालेर पडुया जिने हइया नवीन ॥
६॥
वे शीघ्र ही पञ्जी-टीका की व्याख्या करने में दक्ष हो गये, जिससे नये होने पर भी समस्त विद्यार्थियों में वे सबसे आगे हो गये।
ध्ययन-लीला प्रभुर दास-वृन्दावन ।‘चैतन्य-मङ्गले' कैल विस्तारि वर्णन ॥
७॥
श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने अपनी पुस्तक चैतन्य-मंगल ( बाद में इसका नाम चैतन्य-भागवत पड़ा) में महाप्रभु की अध्ययन-लीला का बड़े विस्तार से वर्णन किया है।
एक दिन मातार पदे करिया प्रणाम ।।प्रभु कहे, माता, मोरे देह एक दान ॥
८॥
एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी माता के चरणकमलों पर गिरकर उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें एक वस्तु का दान दें।
माता बले,—ताइ दिब, ग्रा तुमि मागिबे ।।प्रभु कहे,—एकादशीते अन्न ना खाइबे ॥
९॥
उनकी माता ने कहा मेरे प्रिय पुत्र, जो तुम माँगोगे वही मैं दूंगी। तब महाप्रभु बोले, प्रिय माता, कृपया आप एकादशी के दिन अन्न न खायें।
शची कहे,—ना खाइबे, भाल-इ कहिला ।सेइ हैते एकादशी करिते लागिला ॥
१०॥
माता शची ने कहा, तुमने बहुत अच्छा कहा। मैं एकादशी के दिन अन्न नहीं खाऊँगी। उस दिन से वे एकादशी के दिन उपवास रखने लगीं।
तबे मिश्र विश्वरूपेर देखियो यौवन ।कन्या चाहि' विवाह दिते करिलेन मन ॥
११॥
तत्पश्चात् विश्वरूप को युवक हुआ देखकर जगन्नाथ मिश्र ने कोई कन्या ढूंढकर उसका विवाह कर देना चाहा।
विश्वरूप शुनि' घर छाड़ि पलाइला ।सन्यास करिया तीर्थ करिबारे गेला ॥
१२॥
यह सुनकर विश्वरूप ने तुरन्त गृहत्याग कर दिया और वे संन्यास लेकर एक तीर्थस्थान से दूसरे तीर्थस्थान की यात्रा करने निकल गये।
शुनि, शची-मिश्रेर दुःखी हैल मन ।।तबे प्रभु माता-पितार कैल आश्वासन ॥
१३॥
जब शचीमाता तथा जगन्नाथ मिश्र ने अपने ज्येष्ठ पुत्र विश्वरूप के चले जाने का समाचार सुना, तो वे अत्यन्त दुःखी हुए, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें ढाढ़स बँधाने का प्रयास किया।
भाल हैल,—विश्वरूप सन्यास करिल ।पितृ-कुल, मातृ-कुल, दुइ उद्धारिल ॥
१४॥
महाप्रभु ने कहा, हे माता तथा पिता! यह अच्छा ही हुआ कि विश्वरूप ने संन्यास ग्रहण कर लिया है, क्योंकि इस तरह उसने अपने पितृ-कुल तथा अपने मातृ-कुल दोनों का ही उद्धार कर दिया है।
आमि त' करिब तोमा' मुँहार सेवन ।।शुनिया सन्तुष्ट हैल पिता-मातार मन ॥
१५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने माता-पिता को आश्वासन दिया, मैं आप दोनों की सेवा करूँगा। इस तरह उनके माता-पिता के मन को सन्तोष हो गया।
एक-दिन नैवेद्य-ताम्बूल खाइया ।।भूमिते पड़िला प्रभु अचेतन हो ॥
१६ ॥
। एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने अर्चाविग्रह पर चढ़ी पान-सुपारी खा ली, जिससे उन्हें नशा चढ़ गया और वे अचेत होकर जमीन पर गिर पड़े।
आस्ते-व्यस्ते पिता-माता मुखे दिल पानि ।सुस्थ ही कहे प्रभु अपूर्व काहिनी ॥
१७॥
जब उनके माता-पिता ने हड़बड़ी में उनके मुँह पर पानी छिड़का, तो उन्हें होश आया और उन्होंने ऐसी आश्चर्यजनक बात सुनाई, जो उन्होंने पहले कभी नहीं सुनी थी।
एथा हैते विश्वरूप मोरे ला गेला ।।सन्यास करह तुमि, आमारे कहिला ॥
१८॥
महाप्रभु ने कहा, विश्वरूप मुझ यहा से कहा बोले कि मैं भी संन्यास ग्रहण कर लें।
आमि कहि,–आमार अनाथ पिता-माता ।।आमि बालक, सन्यासेर किबी जानि कथा ॥
१९॥
मैंने विश्वरूप से कहा, 'मेरे माता-पिता असहाय हैं और मैं भी अभी बच्चा ही हूँ। मैं संन्यास के बारे में क्या जानूं? गृहस्थ हइया करिब पिता-मातार सेवन ।इहाते-इ तुष्ट हबेन लक्ष्मी-नारायण ॥
२०॥
बाद में मैं गृहस्थ बनूंगा और इस तरह माता-पिता की सेवा करूंगा, क्योंकि इससे भगवान् नारायण तथा उनकी पत्नी लक्ष्मीदेवी अत्यधिक तुष्ट होंगी।'
तबे विश्वरूप इहाँ पाठाइल मोरे ।।माताके कहिओ कोटि कोटि नमस्कारे ॥
२१॥
तभी विश्वरूप ने मुझे घर लौटा दिया और कहा, 'माता शची देवी से मेरा कोटि-कोटि नमस्कार कहना।
एई मत नाना लीला करे गौरहरि ।कि कारणे लीला,—इहा बुझिते ना पारि ॥
२२॥
इस प्रकार चैतन्य महाप्रभु ने अनेक लीलाएँ कीं, किन्तु उन्होंने ऐसा क्यों किया मैं समझ नहीं सकता।
कत दिन रहि' मिश्र गेला पर-लोक ।माता-पुत्र मुँहार बाड़िल हृदि शोक ॥
२३ ॥
कुछ दिनों के बाद जगन्नाथ मिश्र इस संसार से दिव्य लोक को चले गये। इससे माता तथा पुत्र दोनों ही हृदय से अत्यन्त शोकाकुल हो गये।
बन्धु-बान्धव असि' मुँहा प्रबोधिल ।।पितृ-क्रिया विधि-मते ईश्वर करिल ॥
२४॥
चैतन्य महाप्रभु तथा उनकी माता को धीरज बँधाने के लिए मित्रजन तथा सम्बन्धी लोग वहाँ आये। चैतन्य महाप्रभु, यद्यपि साक्षात् भगवान् थे, तथापि उन्होंने वैदिक विधि से अपने मृत पिता का संस्कार सम्पन्न किया।
कत दिने प्रभु चित्ते करिला चिन्तन ।।गृहस्थ हइलाम, एबे चाहि गृह-धर्म ॥
२५॥
कुछ दिनों के बाद महाप्रभु ने सोचा, मैंने संन्यास नहीं लिया और चूँकि मैं घर पर रहता हूँ, अतएव यह मेरा कर्तव्य है कि गृहस्थ की तरह कर्म करूं।
गृहिणी विना गृह-धर्म ना हय शोभन ।एत चिन्ति' विवाह करते हैल मन ॥
२६॥
चैतन्य महाप्रभु ने विचार किया, पत्नी बिना गृहस्थ जीवन का कोई अर्थ नहीं है। इस तरह उन्होंने विवाह करने का निश्चय किया।
न गृहं गृहमित्याहुगृहिणी गृहमुच्यते । तया हि सहितः सर्वान्पुरुषार्थान्समश्नुते ॥
२७॥
घर-मात्र घर नहीं होता। यह तो पत्नी है, जो घर को सार्थक बनाती है। यदि कोई अपनी पत्नी के साथ घर में रहता है, तो वे दोनों मिलकर मनुष्य जीवन के समस्त हितों ( पुरुषार्थों ) को पूरा कर सकते हैं।
दैवे एक दिन प्रभु पड़िया आसिते ।। वल्लभाचार कन्या देखे गङ्गा-पथे ॥
२८॥
एक दिन जब महाप्रभु पाठशाला से वापस आ रहे थे, तब अचानक उन्होंने वल्लभाचार्य की पुत्री देखी, जो गंगाजी की ओर जा रही थी।
पूर्व-सिद्ध भाव वँहार उदय करिले । दैवे वनमाली घटक शची-स्थाने आइल ॥
२९ ॥
महाप्रभु तथा लक्ष्मीदेवी के मिलने पर उनके सम्बन्ध जागृत हुए, जो पहले से तय हो चुके थे और संयोग से विवाह तय कराने वाला ( घटक) वनमाली शचीमाता से मिलने आ गया।
शचीर इङ्गिते सम्बन्ध करिल घटन।लक्ष्मीके विवाह कैल शचीर नन्दन ॥
३०॥
शचीदेवी का संकेत पाकर, वनमाली घटक ने विवाह पक्का करा दिया और इस प्रकार निर्धारित समय पर महाप्रभु ने लक्ष्मीदेवी के साथ विवाह कर लिया।
विस्तारिया वर्णिला ताहा वृन्दावन-दास ।एइ त' पौगण्ड-लीलार सूत्र-प्रकाश ॥
३१ ॥
वृन्दावन दास ठाकुर ने महाप्रभु की इन समस्त पौगण्ड-लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया है। मैंने तो उन्हीं लीलाओं का केवल संक्षिप्त रूप प्रस्तुत किया है।
पौगण्ड वयसे लीला बहुत प्रकार ।वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार ॥
३२॥
महाप्रभु ने अपनी पौगण्ड अवस्था में नाना प्रकार की लीलाएँ की हैं। और श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने इन सबका विस्तार से वर्णन किया है।
अतएव दिंमात्र इहाँ देखाइल ।।‘चैतन्य-मङ्गले' सर्व-लोके ख्यात हैल ॥
३३॥
मैंने तो इन लीलाओं का संकेत-मात्र किया है, क्योंकि वृन्दावन दास ठाकुर ने अपनी पुस्तक चैतन्य-मंगल ( अब चैतन्य-भागवत ) में इन सबका विस्तार से वर्णन किया है।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
३४॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए और सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उन्हीं के चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
