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अध्याय सत्रह: युवावस्था में भगवान चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ

वन्दे स्वैराद्भुतेहं तं चैतन्यं यत्प्रसादतः ।।ग्रवनाः सुमनायन्ते कृष्ण-नाम-प्रजल्पकाः ॥

१॥

मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनकी कृपा से अशुद्ध यवन भी भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करने से पूरी तरह सुसंस्कृत बन जाते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु की शक्ति ही ऐसी है।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ।।२।। श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की जय हो! कैशोर-लीलार सूत्र करिल गणन। यौवन-लीलार सूत्र करि अनुक्रम ॥

३॥

मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की कैशोर-लीला का सारांश दे चुका हूँ। अब मैं उनकी यौवन-लीलाओं को क्रमानुसार वर्णन करूंगा।

विद्या-सौन्दर्य-सद्वेश-सम्भोग-नृत्य-कीर्तनैः । प्रेम-नाम-प्रदानैश्च गौरो दीव्यति यौवने ॥

४॥

अपनी विद्वत्ता, सौन्दर्य और सुन्दर वेश का प्रदर्शन करके चैतन्य महाप्रभु ने नृत्य किया, संकीर्तन किया तथा सुप्त कृष्ण-प्रेम को जगाने के लिए भगवान् के पवित्र नाम का वितरण किया। इस तरह श्री गौरसुन्दर अपनी यौवन-लीलाओं में काफी चमके।

यौवन-प्रवेशे अङ्गेर अङ्ग विभूषण । दिव्य वस्त्र, दिव्य वेश, माल्य-चन्दन ॥

५॥

जैसे चैतन्य महाप्रभु युवावस्था में प्रविष्ट हुए, वे सुन्दर आभूषण और सुन्दर वस्त्र धारण करते, फूलों की माला पहनते और चन्दन-लेप करते।

विद्यार औद्धत्ये काहों ना करे गणन ।। सकल पण्डित जिनि' करे अध्यापन ॥

६ ॥

अपनी शिक्षा से गर्वित एवं अन्य किसी की परवाह न करने वाले श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने अध्ययन-काल में समस्त कोटि के पण्डितों को परास्त कर दिया।

वायु-व्याधि-च्छले कैल प्रेम परकाश ।।भक्त-गण लञा कैल विविध विलास ॥

७॥

महाप्रभु ने युवावस्था में शारीरिक वायु विकार के बहाने कृष्ण के प्रति अपना भावमय प्रेम प्रदर्शित किया। इस तरह अपने अन्तरंग संगियों के साथ मिलकर उन्होंने विविध लीलाओं का आस्वादन किया।

तबेत करिला प्रभु गयाते गमन ।।ईश्वर-पुरीर सङ्गे तथाइ मिलन ॥

८॥

इसके बाद महाप्रभु गया चले गये। वहाँ उनकी भेंट श्रील ईश्वर पुरी से हुई।

दीक्षा-अनन्तरे हैल, प्रेमेर प्रकाश ।। देशे आगमन पुनः प्रेमेर विलास ॥

९॥

गया में श्री चैतन्य महाप्रभु ने ईश्वर पुरी से दीक्षा ग्रहण की और उसी के तुरन्त बाद उनमें भगवत्प्रेम के चिह्न दिखाई दिये। घर लौटने पर भी उनमें ऐसे लक्षण प्रकट हुए।

शचीके प्रेम-दान, तबे अद्वैत-मिलन । अद्वैत पाइल विश्वरूप-दरशन ॥

१०॥

। तत्पश्चात् महाप्रभु ने अपनी माता शचीदेवी द्वारा अद्वैत आचार्य के चरणकमलों पर किये गये अपराध को क्षमा करके, उन्हें कृष्ण-प्रेम प्रदान किया। इस तरह अद्वैत आचार्य से भेंट हुई और उन्हें बाद में भगवान् के विश्वरूप का दर्शन मिला।

प्रभुर अभिषेक तबे करिल श्रीवास।खाटे वसि' प्रभु कैला ऐश्वर्य प्रकाश ॥

११॥

। तत्पश्चात् श्रीवास ठाकुर ने चैतन्य महाप्रभु का अभिषेक किया। महाप्रभु ने खाट के ऊपर बैठे-बैठे दिव्य ऐश्वर्य प्रकाशित किया।

तबे नित्यानन्द-स्वरूपेर आगमन । प्रभुके मिलिया पाइल घडू-भुज-दर्शन ॥

१२॥

श्रीवास ठाकुर के घर पर इस उत्सव के बाद नित्यानन्द प्रभु का वहाँ आगमन हुआ और जब वे चैतन्य महाप्रभु से मिले, तो उन्हें महाप्रभु के षड्-भुज रूप के दर्शन करने का अवसर मिला।

प्रथमे षडू-भुज ताँरै देखाइल ईश्वर ।।शङ्ख-चक्र-गदा-पद्म-शाई-वेणु-धर ॥

१३॥

एक दिन चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को शंख, चक्र, गदा, कमल, धनुष तथा वंशी धारण किया हुआ अपना षड्भुज रूप दिखलाया।

तबे चतुर्भुज हैला, तिन अङ्ग वक्र ।दुइ हस्ते वेणु बाजाय, दुये शङ्ख-चक्र ॥

१४॥

तत्पश्चात् त्रिभंगी होकर उन्होंने अपना चतुर्भुज रूप दिखलाया। वे अपने दो हाथों से मुरली बजा रहे थे और अन्य दो हाथों में शंख तथा चक्र धारण किये थे।

तबे त' द्वि-भुज केवल वंशी-वदन ।। श्याम-अङ्ग पीत-वस्त्र व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

१५॥

। अन्त में महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को महाराज नन्द के पुत्र कृष्ण का द्विभुज रूप दिखलाया, जिसमें वे मात्र वंशी बजा रहे थे और अपने श्याम वर्ण शरीर पर पीत-वस्त्र धारण किये थे।

तबे नित्यानन्द-गोसाजिर व्यास-पूजन ।। नित्यानन्दावेशे कैल मुघल धारण ॥

१६॥

। तब नित्यानन्द प्रभु ने भगवान् श्री गौरसुन्दर की व्यास-पूजा अर्थात् गुरु-पूजा करने का प्रबन्ध किया। किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु के भाव में आकर मूषल धारण कर लिया।

तबे शची देखिल, राम-कृष्ण- दुइ भाई ।तबे निस्तारिल प्रभु जगाइ-माधाइ ॥

१७॥

तत्पश्चात् शचीदेवी ने कृष्ण तथा बलराम दोनों भाइयों को चैतन्य तथा नित्यानन्द के स्वरूपों में देखा। तब महाप्रभु ने जगाई तथा माधाइ नामक दो भाइयों का उद्धार किया।

तबे सप्त-प्रहर छिला प्रभु भावावेशे ।।यथा तथा भक्त-गण देखिल विशेषे ॥

१८॥

इस घटना के बाद महाप्रभु इक्कीस घण्टों तक भावातिरेक की स्थिति में रहे और सारे भक्तों ने उनकी विशेष लीलाएँ देखीं।

वराह-आवेश हैला मुरारि-भवने । ताँर स्कन्धे चड़ि' प्रभु नाचिला अङ्गने ॥

१९॥

एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु को वराह-अवतार का भावावेश हुआ, तो वे मुरारि गुप्त के कंधों पर चढ़ गये। फिर मुरारि गुप्त के आँगन में दोनों नाचने लगे।

तबे शुक्लाम्बरेर कैल तण्डुल-भक्षण । 'हरेर्नाम' श्लोकेर कैल अर्थ विवरण ॥

२०॥

इसके बाद महाप्रभु ने शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी द्वारा दिया हुआ कच्चा चावल खाया और बृहन्नारदीय पुराण में उल्लिखित हरेर्नाम श्लोक का विस्तार से भावार्थ बतलाया।

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामेव केवलम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

२१॥

इस कलियुग में आत्म-साक्षात्कार के लिए भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन, भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन, भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय नहीं है, अन्य कोई उपाय नहीं है, अन्य कोई उपाय नहीं है।

कलि-काले नाम-रूपे कृष्ण-अवतार । नाम हैते हय सर्व-जगत्निस्तार ॥

२२ ॥

दाढूर्य लागि' ‘हरेर्नाम'-उक्ति तिन-वार ।। इस कलियुग में भगवान् के पवित्र नाम अर्थात् हरे कृष्ण महामन्त्र भगवान् कृष्ण का अवतार है। केवल पवित्र नाम के कीर्तन से मनुष्य भगवान् की प्रत्यक्ष संगति कर सकता है। जो कोई भी ऐसा करता है, उसका निश्चित रूप से उद्धार हो जाता है।

जड़ लोक बुझाइते पुनः ‘एव'-कार ॥

२३॥

इस श्लोक में बल देने के लिये एव(निश्चय ही ) शब्द को तीन बार दोहराया गया है और इसमें हरेर्नाम ( भगवान् का पवित्र नाम) भी तीन बार दोहराया गया है, जिससे सामान्य लोग इसे समझ सकें।

‘केवल'-शब्दे पुनरपि निश्चय-करण ।। ज्ञान-योग-तप-कर्म-आदि निवारण ॥

२४॥

‘केवल' शब्द का प्रयोग ज्ञान, योग, तप तथा सकाम कर्म जैसी अन्य विधियों का निषेध करने वाला है।

अन्यथा ये माने, तार नाहिक निस्तार। नाहि, नाहि, नाहिए तिन 'एव'-कार ॥

२५॥

। यह श्लोक स्पष्ट बतलाता है कि जो कोई अन्य मार्ग स्वीकार करता है, उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता। इसीलिए तीन बार 'अन्य कुछ नहीं, अन्य कुछ नहीं, अन्य कुछ नहीं,' कहा गया है, जो आत्म-साक्षात्कार की असली विधि पर बल देता है।

तृण हैते नीच हा सदा लबे नाम । आपनि निरभिमानी, अन्ये दिबे माने ॥

२६॥

निरन्तर पवित्र नाम का कीर्तन करने के लिए मनुष्य को रास्ते में उगी घास से भी विनीत होना चाहिए और निजी सम्मान की कामना से रहित होना चाहिए, किन्तु अन्यों को पूरा आदर देना चाहिए।

तरु-सम सहिष्णुता वैष्णव करिबे ।भर्सन-ताड़ने काके किछु ना बलिबे ॥

२७॥

भगवन्नाम-कीर्तन में संलग्न व्यक्ति में वृक्ष जैसी सहनशीलता होनी चाहिए। डाँटे-फटकारे जाने पर भी बदले की भावना से उसे किसी से कुछ नहीं कहना चाहिए।

काटिलेह तरु ग्रेन किछु ना बोलय । शुकाइया मरे, तबु जल ना मागय ॥

२८॥

। यदि कोई वृक्ष को काटता भी है, तो भी वह प्रतिरोध नहीं करता, न ही वह सूखने और मरने पर किसी से जल की याचना करता है।

एइ-मत वैष्णव कारे किछु ना मागिब । अयाचित-वृत्ति, किंवा शाक-फल खाइब ॥

२९॥

इस प्रकार वैष्णव को किसी से कुछ भी नहीं माँगना चाहिए। यदि कोई बिना माँगे ही कुछ देता है, तो उसे स्वीकार करना चाहिए, किन्तु यदि कुछ न मिले, तो वैष्णव को शाक तथा फल जो भी मिल सकें, उन्हें खाकर सन्तुष्ट होना चाहिए।

सदा नाम लइब, ग्रथा-लाभेते सन्तोष ।। एइत आचार करे भक्ति-धर्म-पोष ॥

३०॥

मनुष्य को सदा नाम-कीर्तन करने के सिद्धान्त का दृढ़ता से पालन करना चाहिए और उसे जो कुछ आसानी से मिल जाए, उसी से सन्तुष्ट होना चाहिए। ऐसे भक्तिमय आचरण से उसकी भक्ति सुदृढ़ बनी रहती है।

तृणादपि सु-नीचेन तरोरिव सहिष्णुना । अमानिना मान-देन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥

३१॥

जो अपने आपको घास से भी अधिक तुच्छ मानता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु है और जो किसी से निजी सम्मान की अपेक्षा नहीं रखता, फिर भी दूसरों को सम्मान देने के लिए सदा तत्पर रहता है, वह सरलता से सदा भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन कर सकता है।

ऊर्ध्व-बाहु करि' कहों, शुन, सर्व-लोक।नाम-सूत्रे गाँथि' पर कण्ठे एइ श्लोक ॥

३२॥

मैं अपने हाथ ऊपर उठाकर घोषित कर रहा हूँ, कृपया हर कोई मुझे सुनें! इस श्लोक को पवित्र नाम के धागे में पिरोकर निरन्तर स्मरण करने के लिए अपने गले में पहन लें।

प्रभु-आज्ञाय कर एइ श्लोक आचरण ।अवश्य पाइबे तबे श्री-कृष्ण-चरण ॥

३३।। इस श्लोक में श्री चैतन्य महाप्रभु ने जो सिद्धान्त बतलाये हैं, उनका दृढ़ता से पालन करना चाहिए। यदि कोई चैतन्य महाप्रभु तथा गोस्वामियों के चरणचिह्नों का अनुसरण करता रहे, तो उसे जीवन का चरम लक्ष्य अर्थात् श्रीकृष्ण के चरणकमल अवश्य प्राप्त होंगे।

तबे प्रभु श्रीवासेर गृहे निरन्तर ।।रात्रे सङ्कीर्तन कैल एक संवत्सर ॥

३४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु पूरे एक वर्ष तक हर रात्रि को श्रीवास ठाकुर के घर पर हरे कृष्ण मंत्र का सामूहिक कीर्तन नियमित रूप से चलाते रहे।

कपाट दिया कीर्तन करे परम आवेशे । पाषण्डी हासिते आइसे, ना पाय प्रवेशे ॥

३५॥

यह भावपूर्ण कीर्तन दरवाजे बन्द करके किया जाता था, जिससे हँसी उड़ाने की दृष्टि से आने वाले अविश्वासी लोग प्रवेश न कर सकें।

कीर्तन शुनि' बाहिरे तारा ज्वलि' पुड़ि' मरे । श्रीवासेरे दुःख दिते नाना मुक्ति करे ॥

३६॥

। इस तरह अविश्वासी लोग मानो जलकर राख हो गये और ईष्र्या से मर । गये। बदला लेने के लिए उन्होंने श्रीवास ठाकुर को अनेक प्रकार से कष्ट पहुँचाने की योजना बनाई।

एक-दिन विप्र, नाम-'गोपाल चापाल' । पाषण्डि-प्रधान सेइ दुर्मुख, वाचाल ॥

३७॥

भवानी-पूजार सब सामग्री ला ।रात्रे श्रीवासेर द्वारे स्थान लेपार ॥

३८॥

एक दिन जब रात में श्रीवास ठाकुर के घर के भीतर कीर्तन चल रहा था, तब गोपाल चापाल नामक एक ब्राह्मण, जो नास्तिकों (पाषण्डियों) का अगुवा था और बहुत बातूनी तथा बोलने में अक्खड़ था, श्रीवास ठाकुर के द्वार के बाहर दुर्गादेवी की पूजन-सामग्री रख आया।

कलार पात उपरे थुइल ओड़-फुल ।। हरिद्रा, सिन्दूर आर रक्त-चन्दन, तण्डुल ॥

३९॥

उसने केले के पत्ते के ऊपर पूजा की सामग्री रखी थी, जिसमें ओड़फूल, हल्दी, सिन्दूर, लाल-चन्दन का लेप तथा चावल थे।

मद्य-भाण्ड-पाशे धरि' निज-घरे गेल ।। प्रातः-काले श्रीवास ताहा त देखिले ॥

४०॥

इस सामग्री के पास उसने एक शराब का घड़ा रख दिया था। प्रात:काल जब श्रीवास ठाकुर ने अपना दरवाजा खोला, तो उन्हें यह सारी सामग्री दिखाई दी।

बड़ बड़ लोक सब आनिल बोलाइया । सबारे कहे श्रीवास हासिया हासिया ॥

४१॥

श्रीवास ठाकुर ने पड़ोस के सारे प्रतिष्ठित लोगों को बुलाया और हँसते-हँसते उनसे इस प्रकार कही।

नित्य रात्रे करि आमि भवानी-पूजन ।। आमार महिमा देख, ब्राह्मण-सज्जन ॥

४२॥

हे महाशयों, मैं हर रात देवी भवानी की पूजा करता हूँ। चूँकि पूजा की सारी सामग्री यहाँ उपस्थित है, अतएव समस्त आदरणीय ब्राह्मणों तथा उच्च जाति के सदस्यों, आप मेरी स्थिति को समझ सकते हैं।

तबे सब शिष्ट-लोक करे हाहाकार ।ऐछे कर्म हेथा कैल को दुराचार ॥

४३॥

तब वहाँ एकत्र सारे सज्जन हाहाकार करके बोले, यह क्या? यह क्या? किसने यह बदमाशी की है? वह पापी कौन है? हाड़िके आनिया सब दूर कराइल । जल-गोमय दिया सेइ स्थान लेपाइल ॥

४४॥

उन्होंने एक झाड़ लगाने वाले (हाड़ी) को बुलाया, जिसने सारी पूजा-सामग्री दूर फेंकी और उस स्थान को जल तथा गोबर से लीपकर शुद्ध किया।

तिन दिन रहि' सेइ गोपाल-चापाल ।।सर्वाङ्गे हेइल कुष्ठ, वहे रक्त-धार ॥

४५ ॥

तीन दिनों के बाद गोपाल चापाल को कोढ़ हो गया और उसके सारे शरीर में घाव होकर उसमें से रक्त निकलने लगा।

सर्वाङ्ग बेड़िल कीटे, काटे निरन्तर । असह्य वेदना, दुःखे चलये अन्तर ॥

४६॥

उसके सारे शरीर में कीड़े पड़ गये और वे उसे निरन्तर काटने लगे। गोपाल चापाले को असह्य पीड़ा होने लगी। उसका सारा शरीर कष्ट से जलने लगा।

गङ्गा-घाटे वृक्ष-तले रहे त' वसिया ।। एक दिन बले किछु प्रभुके देखिया ॥

४७॥

चूंकि कोढ़ छूत का रोग है, इसलिए गोपाल चापाल गाँव छोड़कर गंगा नदी के किनारे एक वृक्ष के नीचे जा बैठा। एक दिन उसने चैतन्य महाप्रभु को उधर से जाते देखा, तो उनसे वह इस तरह बोला।

ग्राम-सम्बन्धे आमि तोमार मातुल ।। भागिना, मुइ कुष्ठ-व्याधिते हञाछि व्याकुल ॥

४८॥

हे भांजे, मैं गाँव के नाते आपका मामा लगता हूँ। देखो ने इस कुष्ठरोग के आक्रमण ने मुझे किस तरह पीड़ित कर रखा है।

लोक सब उद्धारिते तोमार अवतार । मुजि बड़ दुखी, मोरे करह उद्धार ॥

४९॥

आप ईश्वर के अवतार हैं और अनेक पतितात्माओं का उद्धार कर रहे हैं। मैं भी अत्यन्त दुःखी पतितात्मा हूँ। कृपा करके मेरा भी उद्धार कीजिये।

एत शुनि' महाप्रभुर हइल क्रुद्ध मन ।। क्रोधावेशे बले तारे तर्जन-वचन ॥

५०॥

यह सुनकर चैतन्य महाप्रभु अत्यधिक क्रोधित प्रतीत हुए और उसी क्रोधावेश में उन्होंने उसे कुछ प्रताड़ना-भरे शब्द कहे।

आरे पापि, भक्त-द्वेषि, तोरे न उद्धारिमु ।। कोटि-जन्म एइ मते कीड़ाय खाओयाइमु ॥

५१॥

अरे पापी, शुद्ध भक्तों से द्वेष करने वाले, मैं तुम्हारा उद्धार नहीं करूंगा! मैं चाहूंगा कि तुम इसी तरह करोड़ों वर्षों तक इन कीड़ों से काटे जाते रहो।।

श्रीवासे कराइलि तुइ भवानी-पूजन । कोटि जन्म हबे तोर रौरवे पतन ॥

५२॥

तुमने कुछ ऐसा किया जिससे लगे कि श्रीवास ठाकुर देवी भवानी की पूजा करते हैं। केवल इसी अपराध के लिए तुम्हें करोड़ों जन्मों तक नारकीय जीवन बिताना पड़ेगा।

पाषण्डी संहारिते मोर एइ अवतार ।पाषण्डी संहारि' भक्ति करिमु प्रचार ॥

५३॥

पाषंडियों ( असुरों) को मारने के लिए और उन्हें मारने के बाद भक्ति-सम्प्रदाय का प्रचार करने हेतु मैं इस अवतार में प्रकट हुआ हूँ।

एत बलि' गेला प्रभु करिते गङ्गा-स्नान । सेइ पापी दुःख भोगे, ना ग्राय पराण ॥

५४॥

यह कहकर महाप्रभु गंगास्नान करने चले गये और उस पापी के प्राण नहीं निकले, अपितु वह कष्ट भोगता रहा।

सन्यास करिया ग्रबे प्रभु नीलाचले गेला । तथा हैते ग्रबे कुलिया ग्रामे आइला ॥

५५॥

तबे सेइ पापी प्रभुर लइल शरण ।हित उपदेश कैल हइया करुण ॥

५६॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु संन्यास लेने के बाद जगन्नाथ पुरी गये और फिर लौटकर कुलिया गाँव आये, तब उस पापी ने महाप्रभु के चरणकमलों की शरण ग्रहण की। तब महाप्रभु ने कृपा करके उसके लाभ के लिए उसे उपदेश दिया।

श्रीवास पण्डितेर स्थाने आछे अपराध ।। तथा ग्राह, तेंहो यदि करेन प्रसाद ॥

५७॥

तबे तोर हबे एइ पाप-विमोचन । ग्रदि पुनः ऐछे नाहि कर आचरण ॥

५८॥

। महाप्रभु ने कहा, तुमने श्रीवास ठाकुर के चरणकमलों पर अपराध किया है। अतएव सबसे पहले तुम वहाँ जाओ और उनसे कृपा की याचना करो। तब यदि वे तुम्हें आशीर्वाद देते हैं और तुम फिर से ऐसे पाप नहीं करते, तो तुम इन पापफलों से मुक्त कर दिये जाओगे।

तबे विप्र लइले आसि श्रीवास शरण ।।ताँहार कृपाय हैल पाप-विमोचन ॥

५९॥

तब वह ब्राह्मण गोपाल चापाल श्रीवास ठाकुर के पास गया और उसने उनके चरणकमलों की शरण ली और श्रीवास ठाकुर की कृपा से वह सारे पापों के फल से मुक्त हो गया।

आर एक विप्र आइल कीर्तन देखिते ।द्वारे कपाट, ना पाइल भितरे ग्राइते ॥

६०॥

एक दूसरा ब्राह्मण कीर्तन देखने आया, किन्तु दरवाजा बन्द था, अतएव वह भीतर नहीं जा पाया।

फिरि' गेल विप्र घरे मने दुःख पाजा।।आर दिन प्रभुके कहे गङ्गाय लाग पाञा ॥

६१॥

वह दुःखी मन से घर लौट गया, किन्तु दूसरे दिन गंगा के तट पर वह महाप्रभु से मिला तो उनसे बोला।

शापिब तोमारे मुञि, पाछि मनो-दुःख ।पैता छिण्डिया शापे प्रचण्ड दुर्मुख ॥

६२॥

वह ब्राह्मण कटुभाषी था और दूसरों को शाप देने में पटु था। उसने अपना जनेऊ तोड़ डाला और घोषित किया, अब मैं तुम्हें शाप दूंगा, क्योंकि तुम्हारे व्यवहार से मुझे घोर कष्ट हुआ है।

संसार-सुख तोमार हउक विनाश ।शाप शुनि' प्रभुर चित्ते हइल उल्लास ॥

६३॥

उस ब्राह्मण ने महाप्रभु को शाप दिया, तुम सारे भौतिक सुखों से वंचित हो जाओगे! जब महाप्रभु ने इसे सुना, तो उन्हें मन ही मन अधिक हर्ष हुआ।

प्रभुर शाप-वार्ता ग्रेइ शुने श्रद्धावान् ।। ब्रह्म-शाप हैते तार हय परित्राण ॥

६४॥

जो कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति उस ब्राह्मण द्वारा महाप्रभु के शाप देने की बात को सुनता है, वह समस्त ब्रह्मशापों से छूट जाता है।

मुकुन्द-दत्तेरे कैल दण्ड-परसाद ।। खण्डिल ताहार चित्तेर सब अवसाद ॥

६५॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुकुन्द दत्त को प्रसाद-रूप में दण्ड दिया और इस तरह उसके सारे मानसिक अवसाद को दूर कर दिया।

आचार्यु-गोसाजिरे प्रभु करे गुरु-भक्ति ।।ताहाते आचार्य बड़ हय दुःख-मति ॥

६६ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अद्वैत आचार्य को अपने गुरु के रूप में सम्मान देते थे, किन्तु अद्वैत आचार्य उनके ऐसे व्यवहार से अत्यधिक दुःखी थे।

भङ्गी करि' ज्ञान-मार्ग करिल व्याख्यान ।क्रोधावेशे प्रभु तारे कैल अवज्ञान ॥

६७॥

अतः विनोदपूर्वक वे ज्ञान-मार्ग की व्याख्या करने लगे और महाप्रभु ने क्रोध में आकर ऊपरी तौर पर उनका अनादर किया।

तबे आचार्य-गोसाजिर आनन्द हड्ल ।लज्जित हइया प्रभु प्रसाद करिल ॥

६८॥

तब अद्वैत आचार्य अत्यधिक हर्षित हुए। महाप्रभु यह समझ गये और कुछ-कुछ लज्जित हुए, किन्तु उन्होंने अद्वैत आचार्य को इच्छित वर दिया।

मुरारि-गुप्त-मुखे शुनि' राम-गुण-ग्राम । ललाटे लिखिल ताँर 'रामदास' नाम ॥

६९ ॥

मुरारि गुप्त भगवान् रामचन्द्र के महान् भक्त थे। जब महाप्रभु ने उनके मुँह से भगवान् रामचन्द्र की महिमा सुनी, तो उन्होंने तुरन्त उनके मस्तक पर 'रामदास' ( भगवान् रामचन्द्र का नित्य दास ) लिख दिया।

श्रीधरेर लौह-पात्रे कैल जल-पान ।समस्त भक्तेरे दिल इष्ट वर-दान ॥

७० ॥

एक बार चैतन्य महाप्रभु कीर्तन के बाद श्रीधर के घर गये और वहाँ उन्होंने उनके एक टूटे-फूटे लोहे के बर्तन में पानी पिया। तत्पश्चात् उन्होंने सारे भक्तों को इच्छित वर दिये।

हरिदास ठाकुरेरे करिल प्रसाद ।आचार्य-स्थाने मातार खण्डाइल अपराध ॥

७१॥

इस घटना के बाद महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर को आशीर्वाद दिया और अद्वैत आचार्य के घर पर अपनी माता के अपराध का खंडन किया।

भक्त-गणे प्रभु नाम-महिमा कहिल ।शुनिया पडुया ताहाँ अर्थ-वाद कैल ॥

७२॥

एक बार महाप्रभु ने भक्तों से नाम की महिमा बताई, किन्तु कुछ सामान्य विद्यार्थियों ने सुनकर उसकी मनगढंत व्याख्या की।

नामे स्तुति-वाद शुनि' प्रभुर हैल दुःख ।।सबारे निषेधिल,—इहार ना देखिह मुख ॥

७३॥

जब किसी विद्यार्थी ने पवित्र नाम की महिमा की अतिशयोक्तियुक्त प्रार्थना के रूप में व्याख्या दी, तो चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त दुःखी हो उठेऔर उन्होंने तुरन्त सबको भविष्य में उस विद्यार्थी का मुँह भी न देखने के लिए चेतावनी दी।

सगणे सचेले गिया कैल गङ्गा-स्नान ।। भक्तिर महिमा ताहाँ करिल व्याख्यान ॥

७४॥

महाप्रभु ने बिना कपड़े उतारे अपने संगियों समेत गंगा नदी में स्नान किया। वहाँ उन्होंने भक्ति की महिमा की व्याख्या की।

ज्ञान-कर्म-योग-धर्मे नहे कृष्ण वश ।कृष्ण-वश-हेतु एक—प्रेम-भक्ति-रस ॥

७५ ॥

ज्ञान, कर्म या इन्द्रियों को वश में करने के लिए योग के मार्ग का अनुसरण करके भगवान् कृष्ण को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। भगवान् कृष्ण की प्रसन्नता का एकमात्र कारण उनकी शुद्ध प्रेमाभक्ति है।

न साधयति मां ग्रोगो न साङ्ख्यं धर्म उद्धव ।न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो ग्रथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥

७६ ॥

[ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण ने कहा : 'हे उद्धव, न तो अष्टांग योग द्वारा, न ही निर्विशेष अद्वैतवाद द्वारा, न परम सत्य विषयक वैश्लेषिक अध्ययन (सांख्य) द्वारा, न वेदों के अध्ययन द्वारा, न तपस्या, न दान द्वारा, न संन्यास द्वारा मुझे उतना प्रसन्न किया जा सकता है, जितना कि मेरी अनन्य भक्ति विकसित करके किया जा सकता है।

मुरारिके कहे तुमि कृष्ण वश कैला ।शुनिया मुरारि श्लोक कहिते लागिला ॥

७७॥

तब चैतन्य महाप्रभु ने मुरारि गुप्त की प्रशंसा यह कहते हुए की, तुमने भगवान् कृष्ण को प्रसन्न कर लिया है। यह सुनकर मुरारि गुप्त ने श्रीमद्भागवत का एक श्लोक सुनाया।

क्वाहं दरिद्रः पापीयान् क्व कृष्णः श्री-निकेतनः । ब्रह्म-बन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥

७८॥

चूँकि मैं गरीब, पापी ब्रह्मबन्धु मात्र हूँ, अर्थात् ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न होकर भी ब्राह्मण-योग्यता से रहित हूँ और आप, हे भगवान् कृष्ण, लक्ष्मीदेवी के आश्रय हैं, इसलिए मेरे लिए यह आश्चर्यजनक ही है कि आपने अपनी भुजाओं से मेरा आलिंगन किया है।

एक-दिन प्रभु सब भक्त-गण ला ।। सङ्कीर्तन करि' वैसे श्रम-युक्त हा ॥

७९॥

एक दिन महाप्रभु ने अपने सभी भक्तों के साथ मिलकर संकीर्तन किया और जब सभी लोग थक गये, तो वे बैठ गये।

एक आम्र-बीज प्रभु अङ्गने रोपिल ।। तत्क्षणे जन्मिल वृक्ष बाड़िते लागिल ॥

८०॥

तब महाप्रभु ने आँगन में एक आम की गुठली बोई और तुरन्त ही वह गुठली वृक्ष का रूप धारण करके बढ़ने लगी।

देखिते देखिते वृक्ष हइल फलित ।। पाकिल अनेक फल, सबेइ विस्मित ॥

८१॥

लोगों के देखते-देखते वह वृक्ष बढ़ गया और उसमें फल लग गये। और वे फल पकने भी लगे। इस तरह सारे लोग आश्चर्यचकित रह गये।"

शत दुइ फल प्रभु शीघ्र पाड़ाइल ।।प्रक्षालन करि' कृष्णे भोग लागाइल ॥

८२॥

महाप्रभु ने तुरन्त ही उसमें से लगभग दो सौ फल तोड़े और धोने के बाद उनका कृष्ण को भोग लगाया।

रक्त-पीत-वर्ण,–नाहि अष्ठि-वल्कल ।एक जनेर पेट भरे खाइले एक फल ॥

८३॥

ये फल लाल तथा पीले थे, उनमें न तो गुठली थी, न छिलका और एक ही फल खाने से मनुष्य का पेट भर सकता था।

देखियो सन्तुष्ट हैला शचीर नन्दन । सबाके खाओयाल आगे करिया भक्षण ॥

८४॥

आमों का गुण देखकर महाप्रभु अत्यन्त सन्तुष्ट हुए और पहले स्वयं खाने के बाद अन्य सभी भक्तों को खिलाए।

अष्ठि-वल्कल नाहि,—अमृत-रसमय । एक फल खाइले रसे उदर पूरय ॥

८५ ॥

फलों में गुठली या छिलका नहीं था। वे सभी अमृत के समान मीठे रस से भरे थे और इतने मीठे थे कि एक ही फल खाने से मनुष्य पूरी तरह सन्तुष्ट हो जाए।

एइ-मत प्रतिदिन फले बार मास । वैष्णवे खायेन फल,—प्रभुर उल्लास ॥

८६॥

इस तरह बारहों महीने प्रतिदिन उस वृक्ष में फल लगते रहे और वैष्णवजन उन्हें खाते रहे, जिससे महाप्रभु को परम सन्तोष मिलता था।

एइ सब लीला करे शचीर नन्दन ।अन्य लोक नाहि जाने विना भक्त-गण ॥

८७॥

ये हैं शची-पुत्र की गुह्य लीलाएँ। भक्तों के अतिरिक्त इस घटना को अन्य कोई नहीं जानता।।

एइ मत बार-मास कीर्तन-अवसाने ।आम्र-महोत्सव प्रभु करे दिने दिने ॥

८८॥

इस प्रकार महाप्रभु प्रतिदिन संकीर्तन करते और बारहों मास संकीर्तन के बाद प्रतिदिन आम खाने का उत्सव मनाया जाता था।

कीर्तन करिते प्रभु आइल मेघ-गण ।आपन-इच्छाय कैल मेघ निवारण ॥

८९॥

। एक बार जब महाप्रभु कीर्तन कर रहे थे, तो आकाश में बादल छा गये; महाप्रभु ने अपनी इच्छा से तुरन्त ही उन्हें बरसने से रोक दिया।

एक-दिन प्रभु श्रीवासेरे आज्ञा दिल ।।‘बृहत्सहस्र-नाम' पड़, शुनिते मन हैल ॥

९०॥

एक दिन महाप्रभु ने श्रीवास ठाकुर से बृहत् सहस्रनाम ( विष्णु सहस्रनाम ) पढ़ने के लिए कहा, क्योंकि महाप्रभु को उस समय उन्हें सुनने की इच्छा हुई।

पड़िते आइला स्तवे नृसिंहेर नाम ।शुनिया आविष्ट हैला प्रभु गौरधाम ॥

९१॥

। जब वे विष्णु सहस्रनाम पढ़ रहे थे, तो भगवान् नृसिंह का पवित्र नाम आया। नृसिंह नाम सुनते ही महाप्रभु भाव में पूरी तरह निमग्न हो गये।

नृसिंह-आवेशे प्रभु हाते गदा ला ।। पाषण्डी मारिते ग्राय नगरे धाइया ॥

९२॥

चैतन्य महाप्रभु भगवान् नृसिंह देव के आवेश में सारे नास्तिकों का वध करने के लिए उद्यत होकर हाथ में गदा लेकर नगर की सड़कों में दौड़ने लगे।

नृसींह-आवेश देखि' महा-तेजोमय ।। पथ छाड़ि' भागे लोक पाञआ बड़ भय ॥

९३॥

लोग उन्हें नृसिंह भगवान् के आवेश में अत्यन्त भयानक रूप में देखकर एवं उनके क्रोध से भयभीत होकर सड़कों से दौड़कर इधर-उधर भाग गये।

लोक-भय देखि' प्रभुर बाह्य हइल । श्रीवास-गृहेते गिया गदा फेलाइल ॥

९४॥

लोगों को इस तरह भयभीत देखकर महाप्रभु को बाह्य चेतना आई, अतएव वे श्रीवास ठाकुर के घर लौट आये और गदा फेंक दी।

श्रीवासे कहेन प्रभु करिया विषाद ।।लोक भये पाय,—मोर हय अपराध ॥

९५॥

महाप्रभु खिन्न हुए और उन्होंने श्रीवास ठाकुर से कहा, जब मैंने भगवान् नृसिंह देव का आवेश धारण किया, तो लोग बहुत भयभीत हो उठे, अतएव मैं रुक गया, क्योंकि लोगों में भय उत्पन्न करना अपराध है।

श्रीवास बलेन,—ये तोमार नाम लय । तार कोटि अपराध सब हय क्षय ॥

९६ ॥

श्रीवास ठाकुर ने उत्तर दिया, जो व्यक्ति आपका पवित्र नाम लेता है, उसके एक करोड़ अपराध भी तुरन्त क्षय हो जाते हैं।

अपराध नाहि, कैले लोकेर निस्तार ।। ये तोमा' देखिल, तार छुटिल संसार ॥

९७ ॥

नृसिंह रूप प्रकट करके आपने कोई अपराध नहीं किया। बल्कि जिस किसी व्यक्ति ने आपको उस आवेश में देखा, वह तुरन्त ही भौतिक अस्तित्व से मुक्त हो गया।

एत बलि' श्रीवास करिल सेवन । तुष्ट हा प्रभु आइला आपन-भवन ॥

९८॥

यह कहकर श्रीवास ठाकुर ने महाप्रभु की पूजा की, जिससे वे परम तुष्ट हुए और अपने घर चले गये।

आर दिन शिव-भक्त शिव-गुण गाय ।। प्रभुर अङ्गने नाचे, डमरु बाजाय ॥

९९॥

दूसरे किसी दिन शिवजी का कोई महान् भक्त महाप्रभु के घर आया और वह शिवजी के गुणों का वर्णन कर-करके आँगन में नाचने और अपना डमरू बजाने लगा।

महेश-आवेश हैला शचीर नन्दन ।तार स्कन्धे चड़ि नृत्य कैल बहु-क्षण ॥

१०० ॥

तब चैतन्य महाप्रभु शिवजी के भावावेश में उस व्यक्ति के कंधे पर चढ़ गये और इस तरह लम्बे समय तक दोनों साथ-साथ नाचते रहे।

आर दिन एक भिक्षुक आइला मागिते ।। प्रभुर नृत्य देखि नृत्य लागिल करिते ॥

१०१॥

दूसरे किसी दिन एक भिक्षुक महाप्रभु के घर भिक्षा माँगने आया। किन्तु जब उसने महाप्रभु को नाचते देखा, तो वह भी नाचने लगा।

प्रभु-सङ्गे नृत्य करे परम उल्लासे ।। प्रभु तारे प्रेम दिल, प्रेम-रसे भासे ॥

१०२ ॥

वह महाप्रभु के साथ नाचने लगा, क्योंकि उसे कृष्ण-प्रेम की कृपा प्राप्त हुई थी। इस प्रकार वह भगवत्प्रेम के रस में बहने लगा।

आर दिने ज्योतिष सर्वज्ञ एक आइल । ताहारे सम्मान करि' प्रभु प्रश्न कैल ॥

१०३॥

दूसरे किसी दिन एक ज्योतिषी आया, जो भूत, वर्तमान और भविष्य-सभी जानने वाला माना जाता था। अतएव महाप्रभु ने उसका सम्मान किया और उससे यह प्रश्न पूछा।

के आछिर्लं आमि पूर्व जन्मे कह गणि' ।गणिते लागिला सर्वज्ञ प्रभु-वाक्य शुनि' ॥

१०४॥

महाप्रभु ने पूछा, कृपया मुझे अपनी ज्योतिष-गणना से बतायें कि मैं पिछले जन्म में कौन था? महाप्रभु की यह बात सुनकर ज्योतिषी तुरन्त गणना करने लगा।

गणि' ध्याने देखे सर्वज्ञ,—महा-ज्योतिर्मय । अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्ड सबार आश्रय ॥

१०५॥

उस सर्वज्ञ ज्योतिषी ने गणना और ध्यान के माध्यम से महाप्रभु के अत्यन्त ओजस्वी शरीर को देखा, जो अनन्त वैकुण्ठ-लोकों का आश्रय स्थल है।

परम-तत्त्व, पर-ब्रह्म, परम-ईश्वर ।।देखि' प्रभुर मूर्ति सर्वज्ञ हइल फाँफर ॥

१०६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को उसी परम सत्य परम ब्रह्म, भगवान् के रूप में देखकर वह ज्योतिषी किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया।

बलिते ना पारे किछु, मौन हइल ।।प्रभु पुनः प्रश्न कैल, कहिते लागिल ॥

१०७॥

। वह ज्योतिषी आश्चर्यचकित होकर मौन रह गया। वह कुछ बोल नहीं सका। किन्तु जब महाप्रभु ने फिर वही प्रश्न पूछा, तो उसने इस प्रकार उत्तर दिया।

पूर्व जन्मे छिला तुमि जगताश्रय ।परिपूर्ण भगवान् सर्वेश्वग्नमय ॥

१०८॥

हे प्रभु! पिछले जन्म में आप समस्त सृष्टि के आश्रय, सब ऐश्वर्यों से पूर्ण भगवान् थे।

पूर्वे ग्रैछे छिला तुमि एबेह से-रूप ।दुर्विज्ञेय नित्यानन्द तोमार स्वरूप ।। १०९॥

। आप अब भी वही भगवान् हैं, जो अपने पूर्वजन्म में थे। आपका स्वरूप अचिन्त्य एवं सनातन आनन्दमय है।

प्रभु हासि' कैला,—तुमि किछु ना जानिला ।पूर्वे आमि आछिलाँ जातिते गोयाला ॥

११०॥

जब ज्योतिषी महाप्रभु के विषय में बड़ी बातें कर रहा था, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसे रोका और हँसते हुए कहा, हे महोदय, मुझे लगता है कि आप ठीक से नहीं जानते कि मैं कौन था, क्योंकि मैं जानता हूँ कि पिछले जन्म में मैं ग्वालबाल था।

गोप-गृहे जन्म छिल, गाभीर राखाल ।सेइ पुण्ये हैलाँ एबे ब्राह्मण-छाओयाल ॥

१११॥

मैं अपने पिछले जन्म में ग्वालों के परिवार में उत्पन्न हुआ था और मैंने गायों तथा बछड़ों को संरक्षण प्रदान किया था। ऐसे पुण्यकर्मों के ही कारण अब मैं ब्राह्मण-पुत्र के रूप में आया हूँ।

सर्वज्ञ कहे आमि ताहा ध्याने देखिलाँ।। ताहाते ऐश्वर्घ देखि' फाँफर हइलाँ ॥

११२॥

ज्योतिषी ने कहा, मैंने ध्यान में जो कुछ देखा वह ऐश्वर्यमय था, इसीलिए मैं भ्रमित हो गया।

सेइ-रूपे एइ-रूपे देखि एकाकार । कभु भेद देखि, एइ मायाय तोमार ॥

११३॥

मुझे इसमें कोई सन्देह नहीं है कि आपका यह स्वरूप तथा ध्यान में देखा गया स्वरूप एक ही हैं। यदि मुझे भेद कोई दिखता है, तो यह आपकी माया का काम है।

ये हओ, से हओ तुमि, तोमाके नमस्कार ।।प्रभु तारे प्रेम दिया कैल पुरस्कार ॥

११४॥

वह सर्वज्ञ ज्योतिषी इस नतीजे पर पहुँचा, आप जो भी और जो कुछ भी हैं, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ! तब महाप्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपा से उसे भगवत्प्रेम प्रदान किया और उसकी सेवा का उसे फल मिल गया।

एक दिन प्रभु विष्णु-मण्डपे वसिया । ‘मधु आन', 'मधु आन' बलेन डाकिया ॥

११५॥

एक दिन महाप्रभु विष्णु-मन्दिर की बारादरी में बैठकर जोर-जोर से पुकारने लगे, थोड़ा शहद लाओ! थोड़ा शहद लाओ! नित्यानन्द-गोसाञि प्रभुर आवेश जानिल ।।गङ्गा-जल-पात्र आनि' सम्मुखे धरिल ॥

११६॥

नित्यानन्द प्रभु गोसांई श्री चैतन्य महाप्रभु के भावावेश को समझ गये, अतएव उन्होंने संकेत के रूप में एक बर्तन में गंगाजल लाकर उनके सम्मुख रख दिया।

जल पान करिया नाचे हा विह्वल ।।यमुनाकर्षण-लीला देखये सकल ॥

११७॥

उस जल को पने के बाद भगवान् चैतन्य इतने भावाविष्ट हो गये कि वे नाचने लगे। इस प्रकार सबने यमुना-आकर्षण-लीला देखी।

मद-मत्त-गति बलदेव-अनुकार । आचार्य शेखर ताँरे देखे रामाकार ॥

११८॥

जब महाप्रभु बलदेव के भावावेश में मधु पीकर उन्मत्त होकर घूम रहे। थे, तो आचार्यों में प्रमुख ( आचार्य शेखर) अद्वैत आचार्य ने उन्हें बलराम के रूप में देखा।

वनमाली आचार्य देखे सोणार लाङ्गल । सबे मिलि' नृत्य करे आवेशे विह्वल ॥

११९॥

वनमाली आचार्य ने बलराम के हाथ में सोने का हल देखा और सारे भक्त एकत्र होकर आवेश में आकर नाचने लगे।

एइ-मत नृत्य हइल चारि प्रहर। सन्ध्याय गङ्गा-स्नान करि' सबे गेला घेर ॥

१२०॥

इस प्रकार वे बारह घंटों तक नाचते रहे और संध्या-समय गंगा में स्नान करने के बाद अपने अपने घर चले गये।

नगरिया लोके प्रभु झबे आज्ञा दिला ।।घरे घरे सङ्कीर्तन करिते लागिला ॥

१२१॥

महाप्रभु ने नवद्वीप के सारे नागरिकों को हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करने का आदेश दिया और वे घर-घर में नियमित रूप से संकीर्तन करने लगे।

‘हरये नमः, कृष्ण यादवाय नमः ।।गोपाल गोविन्द राम श्री-मधुसूदन' ॥

१२२॥

[ सारे भक्त हरे कृष्ण महामन्त्र के साथ यह लोकप्रिय गीत भी गाने लगे हरये नमः कृष्ण यादवाय नमः / गोपाल गोविन्द राम श्री मधुसूदन।

मृदङ्ग-करताल सङ्कीर्तन-महाध्वनि ।‘हरि' ‘हरि'–ध्वनि विना अन्य नाहि शुनि ॥

१२३॥

जब इस तरह संकीर्तन आन्दोलन आरम्भ हो गया, तो नवद्वीप में ‘हरि!' ‘हरि!' शब्दों की ध्वनि एवं मृदंग तथा करताल बजने की ध्वनि के अतिरिक्त कोई अन्य ध्वनि किसी को सुनाई नहीं पड़ती थी।

शुनिया ये क्रुद्ध हैल सकल ग्रवन । काजी-पाशे आसि' सबे कैल निवेदन ॥

१२४॥

हरे कृष्ण मन्त्र की गुंजायमान ध्वनि सुनकर स्थानीय मुसलमानों ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर काजी के पास शिकायत की।

क्रोधे सन्ध्या-काले काजी एक घरे आइल ।। मृदङ्ग भाङ्गिया लोके कहिते लागिल ॥

१२५॥

क्रोध से भरा चाँद काजी एक दिन संध्या-समय एक घर में आया और जब उसने देखा कि कीर्तन चल रहा है, तो उसने मृदंग तोड़ डाला और फिर इस प्रकार बोला।

एत-काल केह नाहि कैल हिन्दुयानि ।।एबे ये उद्यम चालाओ कार बल जानि' ॥

१२६॥

आज तक तुम सबने हिन्दू धर्म के नियम-सिद्धान्तों का पालन नहीं किया, किन्तु अब बड़े उत्साह से करने लगे हो। क्या मैं जान सकता हूँ कि किसके बल पर ऐसा कर रहे हो? केह कीर्तन ना करिह सकल नगरे । आजि आमि क्षमा करि' ग्राइतेछों घरे ॥

१२७॥

कोई भी व्यक्ति नगर की सड़कों में संकीर्तन नहीं करेगा। हाँ, आज मैं इस अपराध को क्षमा करके घर वापस जा रहा हूँ।

आर यदि कीर्तन करिते लाग पाइमु । सर्वस्व दण्डिया तार जाति ग्रे लइमु ॥

१२८॥

यदि अगली बार मैंने किसी को ऐसा संकीर्तन करते देखा, तो दण्डस्वरूप न केवल उसकी सारी सम्पत्ति जब्त कर लूंगा, अपितु उसे मुसलमान भी बना दूंगा।

एत बलि' काजी गेल,–नगरियो लोक ।। प्रभु-स्थाने निवेदिल पाजा बड़ शोक ॥

१२९॥

यह कहकर काजी घर चला गया, किन्तु हरे कृष्ण कीर्तन करने से वर्जित किये जाने के फलस्वरूप दुःखी भक्तों ने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपना दुःखड़ा कह सुनाया।

प्रभु आज्ञा दिल–ग्राह करह कीर्तन । मुञि संहारिमु आजि सकल ग्रवन ॥

१३०॥

महाप्रभु चैतन्य ने आज्ञा दी, जाओ, संकीर्तन करो। मैं आज सारे मुसलमानों को मार डालूंगा! घरे गिया सबे लोक करये कीर्तन । काजीर भये स्वच्छन्द नहे, चमकित मन ॥

१३१॥

सारे नागरिक घर लौटकर संकीर्तन करने लगे, किन्तु काजी के आदेश के कारण वे चिन्तामुक्त न थे; वे सदैव चिन्ता से घिरे रहते थे।

ता-सभार अन्तरे भय प्रभु मने जानि ।।कहिते लागिला लोके शीघ्र डाकि' आनि' ॥

१३२॥

। लोगों के मन में घर कर गई चिन्ता को समझते हुए महाप्रभु ने उन सबको बुलाया और उनसे इस प्रकार कहा।

नगरे नगरे आजि करिमु कीर्तन ।।सन्ध्या-काले कर सभे नगर-मण्डन ॥

१३३॥

मैं प्रत्येक नगर-नगर में जाकर सन्ध्या-समय संकीर्तन करूंगा। अतएव तुम लोग संध्या-समय नगर को सजाओ।

सन्ध्याते देउटि सबे ज्वाल घरे घरे । देख, कोन काजी आसि' मोरे माना करे ॥

१३४॥

संध्या-समय घर-घर में मशाल जलाओ। मैं हर एक की रक्षा करूंगा। मैं देखूगा कि कौन सा काजी आकर हमारे कीर्तन को रोकता है। एत कहि' सन्ध्या-काले चाले गौरराय ।। कीर्तनेर कैल प्रभु तिन सम्प्रदाय ॥

१३५॥

संध्या-समय भगवान् गौरसुन्दर बाहर गये और कीर्तन करने के लिए उन्होंने तीन मंडलियाँ बना लीं।।

आगे सम्प्रदाये नृत्य करे हरिदास ।।मध्ये नाचे आचार्य-गोसाञि परम उल्लास ॥

१३६ ॥

मंडली के आगे-आगे ठाकुर हरिदास नाच रहे थे और मंडली के बीच में परम हर्ष के साथ अद्वैत आचार्य नाच रहे थे।

पाछे सम्प्रदाये नृत्य करे गौरचन्द्र ।ताँर सङ्गे नाचि' बुले प्रभु नित्यानन्द ॥

१३७॥

भगवान् गौरसुन्दर पीछे वाली मंडली में नाच रहे थे और श्री नित्यानन्द प्रभु नाचते हुए चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ चल रहे थे।

वृन्दावन-दास इहा 'चैतन्य-मङ्गले' ।।विस्तारि' वर्णियाछेन, प्रभु-कृपा-बले ॥

१३८ ॥

महाप्रभु की कृपा से श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने इस घटना का विस्तृत वर्णन चैतन्य-मंगल( अब चैतन्य भागवत) में किया है।

एइ मत कीर्तन करि' नगरे भ्रमिला ।भ्रमिते भ्रमिते सभे काजी-द्वारे गेला ॥

१३९॥

इस तरह कीर्तन करते हुए नगर के हर गली-कूचे की परिक्रमा करते हुए अन्त में वे काजी के दरवाजे पर पहुँचे।

तर्ज-गर्ज करे लोक, करे कोलाहल ।।गौरचन्द्र-बले लोक प्रश्रय-पागल ॥

१४० ॥

क्रोध से फुसफुसाते और गर्जना करते हुए सारे लोग महाप्रभु के संरक्षण में ऐसा करते हुए पागल हो उठे।

कीर्तनेर ध्वनिते काजी लुकाइल घरे ।तर्जन गर्जन शुनि' ना हय बाहिरे ॥

१४१॥

हरे कृष्ण मन्त्र के कीर्तन की ऊँची गर्जना से काजी निश्चय ही अत्यधिक डर गया और वह अपने कमरे में छिप गया। लोगों को इस प्रकार विरोध करते और अत्यन्त क्रोध में बुदबुदाते सुनकर काजी अपने घर से बाहर नहीं आ सका।

उद्धत लोक भाङ्गे काजीर घर-पुष्पवन ।।विस्तारि' वर्णिला इहा दास-वृन्दावन ॥

१४२॥

स्वाभाविक रूप से लोग बहुत उत्तेजित हो गये थे और वे काजी के घर को तथा फूलों के बगीचे को तोड़-फोड़कर उसके किये का बदला लेने लगे। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है।

तबे महाप्रभु तार द्वारेते वसिला ।भव्य-लोक पाठाइया काजीरे बोलाइला ॥

१४३॥

तत्पश्चात् जब महाप्रभु काजी के घर पहुँच गये, तो वे दरवाजे पर बैठ गये और काजी को बुलाने कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों को भेजा।

दूर हइते आइला काजी माथा नोयाइया ।। काजीरे वसाइला प्रभु सम्मान करिया ॥

१४४॥

जब काजी अपना सिर झुकाये आया, तो महाप्रभु ने उसका सम्मान किया और उसे बैठने के लिए आसन दिया।

प्रभु बलेन, आमि तोमार आइलाम अभ्यागत ।। आमि देखि लुकाइला, ए-धर्म केमत ॥

१४५ ॥

महाप्रभु ने मैत्रीपूर्वक कहा, हे महोदय, मैं आपके घर अतिथि के रूप में आया हूँ, किन्तु आप हैं कि मुझे देखकर अपने कमरे में छिप गये। यह कैसा शिष्टाचार है? काजी कहे—तुमि आइस क्रुद्ध हइया ।तोमा शान्त कराइते रहिनु लुकाइया ॥

१४६॥

काजी ने कहा, आप मेरे घर अत्यन्त क्रोधित होकर आये हैं। आपको शान्त करने के लिए मैं तुरन्त आपके सामने नहीं आ पाया, वरन् अपने आपको छुपा लिया।

एबे तुमि शान्ता हैले, आसि, मिलिलाँ ।भाग्य मोर, तोमा हेन अतिथि पाइलाँ ॥

१४७॥

चूंकि अब आप शान्त हो चुके हैं, इसलिए मैं आपके पास आया हूँ। यह मेरा अहोभाग्य है कि मैं आप जैसे महान् अतिथि का स्वागत कर रहा हूँ।

ग्राम-सम्बन्धे ‘चक्रवर्ती' हय मोर चाचा ।।देह-सम्बन्धे हैते हय ग्राम-सम्बन्ध साँचा ॥

१४८ ॥

गाँव के नाते नीलाम्बर चक्रवर्ती ठाकुर मेरे चाचा लगते थे। ऐसा नाता शारीरिक सम्बन्ध से अधिक सुदृढ़ होता है।

नीलाम्बर चक्रवर्ती हय तोमार नाना । से-सम्बन्धे हओ तुमि आमार भागिना ॥

१४९॥

। नीलाम्बर चक्रवर्ती तुम्हारे नाना हैं, अतएव तुम इस नाते मेरे भांजे हुए।

भागिनार क्रोध मामा अवश्य सहये । मातुलेर अपराध भागिना ना लय ॥

१५०॥

जब भांजा अधिक नाराज होता है, तब मामा सहता है और जब मामा कोई अपराध करता है, तो भांजा उस पर ध्यान नहीं देता।

एइ मत देंहार कथा हय ठारे-ठोरे ।। भितरेर अर्थ केह बुझिते ना पारे ॥

१५१॥

इस तरह महाप्रभु तथा काजी एक दूसरे से संकेतों से बातें करते रहे, किन्तु कोई बाहरी व्यक्ति उनकी वार्ता के आन्तरिक अर्थ को नहीं समझ सकता था।

प्रभु कहे,---प्रश्न लागि' आइलाम तोमार स्थाने । काजी कहे,—आज्ञा कर, ये तोमार मने ॥

१५२॥

महाप्रभु ने कहा, हे मामा, मैं आपके घर आपसे कुछ प्रश्न पूछने आया हूँ। काजी ने उत्तर दिया, आपका स्वागत है। अपने मन की बात मुझे बतलाओ।

प्रभु कहे,—गो-दुग्ध खाओ, गाभी तोमार माता । वृष अन्न उपजाय, ताते तेंहो पिता ॥

१५३॥

महाप्रभु ने कहा, आप गाय का दूध पीते हैं, अतएव गाय आपकी माता हुई। और बैल आपके भरण के लिए अन्न उपजाता है, इसलिए वह आपका पिता हुआ।

पिता-माता मारि' खाओ-एबा को धर्म । को बले कर तुमि ए-मत विकर्म ॥

१५४॥

चूँकि गाय तथा बैल आपके माता-पिता हैं, तो फिर आप उन्हें मारकर कैसे खा सकते हैं? यह कैसा धर्म है? आप किस बल पर ऐसे पापकर्म करने का दुस्साहस करते हैं? काजी कहे,—तोमार ग्रैछे वेद-पुराण ।। तैछे आमार शास्त्र केताब 'कोराण' ॥

१५५॥

काजी ने उत्तर दिया, जिस तरह आपके शास्त्र हैं, जिन्हें वेद तथा पुराण कहते हैं, उसी तरह हमारा भी पवित्र शास्त्र है, जो कुरान कहलाता है।

सेई शास्त्रे कहे,—प्रवृत्ति-निवृत्ति-मार्ग-भेद ।।निवृत्ति-मार्गे जीव-मात्र-वधेर निषेध ॥

१५६ ॥

कुरान के अनुसार उन्नति के दो मार्ग हैं-भोग की प्रवृत्ति को प्रबल करना तथा भोग की प्रवृत्ति को कम करना। आसक्ति कम करने के मार्ग (निवृत्ति मार्ग ) में पशुओं की हत्या निषिद्ध है।

प्रवृत्ति-मार्गे गो-वध करिते विधि हय । शास्त्र-आज्ञाय वध कैले नाहि पाप-भय ॥

१५७॥

भौतिक कार्यकलापों के मार्ग में गोवध का नियम है। यदि शास्त्र के निर्देशानुसार ऐसा वध किया जाए, तो इसमें पाप नहीं लगता।

तोमार वेदेते आछे गो-वधेर वाणी ।।अतएव गो-वध करे बड़ बड़ मुनि ।। १५८॥

उस काजी ने एक विद्वान के रूप में श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, आपके वैदिक शास्त्रों में गोवध का आदेश मिलता है। इसी आदेश के बल पर बड़े-बड़े मुनि गोवध वाले (गोमेध) यज्ञ करते थे।

प्रभु कहे,—वेदे कहे गो-वध निषेध ।।अतएव हिन्दु-मात्र ना करे गो-वध ॥

१५९ ॥

काजी के कथन का प्रतिवाद करते हुए महाप्रभु ने तुरन्त कहा, वेदों का स्पष्ट आदेश है कि गोवध न किया जाए। अतएव कोई भी हिन्दू गोवध करने से बचता है।

जियाइते पारे ग्रदि, तबे मारे प्राणी ।।वेद-पुराणे आछे हेन आज्ञा-वाणी ॥

१६०॥

वेदों तथा पुराणों में स्पष्ट कहा गया है कि यदि कोई किसी जीव को पुनर्जीवित कर सकता है, तो वह प्रयोग के निमित्त उसे मार सकता है।

अतएव जरगव मारे मुनि-गण । वेद-मन्त्रे सिद्ध करे ताहार जीवन ॥

१६१॥

इसलिए महान् मुनिगण कभी-कभी वृद्ध गायों को मारते थे और सिद्धि के लिए वे वैदिक स्तोत्रों का उच्चारण करके उन्हें जीवित कर लेते थे।

जरगव हा युवा हय आर-वार । ताते तार वध नहे, हय उपकार ॥

१६२॥

ऐसी वृद्ध तथा अशक्त गायों का वध एवं उनको फिर से युवा बनाना वास्तव में वध करना नहीं, अपितु बड़े ही लाभ का कर्म था।

कलि-काले तैछे शक्ति नाहिक ब्राह्मणे ।। अतएव गो-वध केह ना करे एखने ॥

१६३॥

। पूर्वकाल में ब्राह्मणों में इतना सामर्थ्य होता था कि वे वैदिक स्तोत्रों द्वारा ऐसे प्रयोग करते थे, किन्तु अब कलियुग के कारण ब्राह्मण उतने समर्थ नहीं रहे। अतएव गायों तथा बैलों को फिर से युवा बनाने के लिए उनका वध करना वर्जित है।

अश्वमेधं गवालम्भं सन्यासं पल-पैतृकम् । देवरेण सुतोत्पत्ति कलौ पञ्च विवर्जयेत् ॥

१६४॥

इस कलियुग में पाँच कर्म वर्जित हैं-अश्वमेध यज्ञ करना, गोमेध यज्ञ करना, संन्यास ग्रहण करना, पूर्वजों को मांस का पिण्डदान देना तथा अपने भाई की पत्नी से पुत्र उत्पन्न करना।'

तोमरा जीयाइते नार,—वध-मात्र सार । नरक हइते तोमार नाहिक निस्तार ॥

१६५॥

चूँकि आप मुसलमान लोग मरी गायों को जीवित नहीं कर सकते, अतएव आप उनके वध के लिए उत्तरदायी हो। इसलिए आप नरक जा रहे हो और आपके मोक्ष के लिए कोई मार्ग नहीं है।

गो-अङ्गे व्रत लोम, तत सहस्र वत्सर । गो-वधी रौरव-मध्ये पचे निरन्तर ॥

१६६॥

गोवध करने वालों को उतने हजार वर्षों तक नरक में सड़ना पड़ता है, जितने रोएँ उस गाय के शरीर में होते हैं।

तोमा-सबार शास्त्र-कर्ता- सेह भ्रान्त हैल । ना जानि' शास्त्रेर मर्म ऐछे आज्ञा दिल ॥

१६७॥

। आपके शास्त्रों में अनेक त्रुटियाँ और भ्रान्तियाँ हैं। इनके रचयिताओं ने ज्ञान का सार न जानने के कारण, ऐसे आदेश दिये, जो विवेक एवं तर्क के विरुद्ध थे।

शुनि' स्तब्ध हैल काजी, नाहि स्फुरे वाणी ।।विचारिया कहे काजी पराभव मानि' ॥

१६८॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु के इन कथनों को सुनकर काजी तर्कहीन हो गया और आगे एक भी शब्द न बोल सका। इस तरह पूर्ण विचार करके काजी ने हार स्वीकार कर ली और इस प्रकार कहा।

तुमि ग्रे कहिले, पण्डित, सेइ सत्य हय ।। आधुनिक आमार शास्त्र, विचार-सह नय ॥

१६९॥

। । हे निमाइ पण्डित, आपने जो कुछ कहा है, वह पूरी तरह सत्य है। हमारे शास्त्र हाल ही में विकसित हुए हैं और निश्चित रूप से वे तर्कसंगत तथा विचारपूर्ण नहीं हैं।

कल्पित आमार शास्त्र,—आमि सब जानि ।।जाति-अनुरोधे तबु सेइ शास्त्र मानि ॥

१७०॥

। मुझे पता है कि हमारे शास्त्र कल्पना तथा भ्रान्तियों से भरे हैं, तथापि अपर्याप्त आधार होने पर भी एक मुसलमान होने के नाते अपने समुदाय के निमित्त, मैं उन्हें स्वीकार करता हूँ।

सहजे ग्रवन-शास्त्रे अदृढ़ विचार । हासि' ताहे महाप्रभु पुछेन आर-बार ॥

१७१॥

काजी ने अन्त में कहा, मांसाहारी यवनों के शास्त्रों के तर्क सुदृढ़ नहीं हैं। यह कथन सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने हँसते हुए उससे इस प्रकार पूछा।

आर एक प्रश्न करि, शुन, तुमि मामा ।।यथार्थ कहिबे, छले ना वञ्छिबे आमा' ॥

१७२॥

। हे मामा, मैं आपसे दूसरा प्रश्न करना चाहता हूँ। कृपया आप सच सच बतलायें। आप मुझे छलने का प्रयास न करें।

तोमार नगरे हय सदा सङ्कीर्तन ।वाद्य-गीत-कोलाहल, सङ्गीत, नर्तन ॥

१७३॥

आपके नगर में सदैव पवित्र नाम को कीर्तन होता रहता है। सदैव संगीत की ध्वनि, गान और नृत्य चलता रहता है।

तुमि काजी-हिन्दु-धर्म-विरोधे अधिकारी ।एबे ये ना कर माना बुझिते ना पारि ॥

१७४॥

मुसलमान मैजिस्ट्रेट (काजी) होने के नाते आप हिन्दू उत्सवों को मनाने का विरोध कर सकते हैं, किन्तु अब आप उन्हें नहीं रोकते। मैं इसका कारण नहीं समझ सकता।

काजी बले—सभे तोमाय बले ‘गौरहरि' ।। सेइ नामे आमि तोमाय सम्बोधन करि ॥

१७५॥

काजी ने कहा, सभी लोग आपको गौरहरि कहते हैं। कृपया अब मुझे भी आप इसी नाम से पुकारने दें।

शुन, गौरहरि, एइ प्रश्नेर कारण ।निभृत हओ यदि, तबे करि निवेदन ॥

१७६ ॥

हे गौरहरि, कृपया सुनिये! यदि आप एकान्त स्थान में आयें, तो मैं कारण समझा दूंगा।

प्रभु बले,—ए लोक आमार अन्तरङ्ग हय ।स्फुट करि' कह तुमि, ना करिह भय ॥

१७७॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, ये सारे लोग मेरे अन्तरंग साथी हैं। आप निःसंकोच भाव से कहें। इनसे डरने की कोई बात नहीं है।

काजी कहे,—ग्रबे आमि हिन्दुर घरे गिया । कीर्तन करिलॅ माना मृदङ्ग भाङ्गिया ॥

१७८॥

सेइ रात्रे एक सिंह महा-भयङ्कर ।।नर-देह, सिंह-मुख, गर्जये विस्तर ॥

१७९॥

काजी ने कहा, जब मैं हिन्दू के घर गया और वहाँ मैंने मृदंग तोड़ा और संकीर्तन करने की मनाही कर दी, तो उसी रात मैंने सपने में एक भयानक गर्जन करता हुआ सिंह देखा, जिसका शरीर तो मनुष्य जैसा था, किन्तु उसका मुख सिंह जैसा था।

शयने आमार उपर लाफ दिया चड़ि' ।। अट्ट अट्ट हासे, करे दन्त-कड़मड़ि ॥

१८० ॥

जब मैं सो रहा था, तब वह सिंह मेरी छाती पर कूद पड़ा; वह अट्टहास कर रहा था और अपने दाँत कटकटा रहा था।

मोर बुके नख दिया घोर-स्वरे बले ।फाड़िमु तोमार बुक मृदङ्ग बदले ॥

१८१॥

सिंह ने मेरी छाती पर अपने नाखून गढ़ाते हुए भयानक स्वर में कहा, 'चूंकि तुमने मृदंग तोड़ा है, इसलिए मैं तुम्हारी छाती को अभी फाड़ देने जा रहा हूँ।

मोर कीर्तन माना करिस्, करिमु तोर क्षय ।।आङ्खि मुदि' काँपि आमि पाजा बड़ भय ॥

१८२ ॥

तुमने मेरे संकीर्तन पर प्रतिबन्ध लगाया है, अतएव मैं तुम्हारा विनाश कर दूंगा!' उससे डरकर मैंने अपनी आँखें बन्द कर लीं और काँपने लगा।

भीत देखि' सिंह बले हइया सदय ।। तोरे शिक्षा दिते कैलु तोर पराजय ॥

१८३॥

मुझे इस तरह डरा हुआ देखकर सिंह बोला, 'तुम्हें सबक सिखाने के लिए ही मैंने तुम्हें पराजित किया है, किन्तु अब मुझे तुम पर कृपालु होना चाहिए।

से दिन बहुत नाहि कैलि उत्पात । तेजि क्षमा करि' ना करिनु प्राणाघात ॥

१८४॥

उस दिन तुमने कोई बड़ा उत्पात नहीं मचाया, इसलिए मैंने तुम्हें क्षमा कर दिया है और तुम्हारे प्राण नहीं लिये।

ऐछे यदि पुनः कर, तबे ना सहिमु । सवंशे तोमारे मारि यवन नाशिमु ॥

१८५॥

किन्तु यदि तुम फिर से ऐसा कार्य करोगे, तो मैं सहन नहीं करूंगा। तब मैं तुम्हें, तुम्हारे सारे परिवार को और सारे मांसाहारी यवनों को मार डालूंगा।

एत कहि' सिंह गेल, आमार हैल भय । एइ देख, नख-चिह्न अमोर हृदय ॥

१८६॥

। यह कहकर सिंह चला गया, किन्तु मैं उससे बहुत ही भयभीत था। देखिये न मेरे हृदय पर बने उसके नाखूनों के चिह्नों को! एत बलि' काजी निज-बुक देखाइल ।।शुनि' देखि' सर्व-लोक आश्चर्य मानिल ॥

१८७॥

इस वर्णन के बाद काजी ने अपनी छाती दिखाई। उसकी बातें सुनकर तथा चिह्नों को देखकर सारे लोग इस विस्मयकारी घटना को मान गये।

काजी कहे,—इहा आमि कारे ना कहिल ।सेइ दिन आमार एक पियादा आइल ॥

१८८॥

काजी ने कहा, मैंने इस घटना की बात किसी से नहीं की, किन्तु उसी दिन मेरा एक अर्दली ( सेवक ) मुझसे मिलने आया।

आसि' कहे,—गेलु मुजि कीर्तन निषेधिते ।।अग्नि उल्का मोर मुखे लागे आचम्बिते ॥

१८९॥

मेरे पास आकर उस अर्दली ने कहा, 'जब मैं संकीर्तन रोकने गया, तो सहसा मेरे मुँह पर आग की लपटें टकरा गईं।

पुड़िल सकल दाड़ि, मुखे हैल व्रण । ग्रेड पेयादा ग्राय, तार एइ विवरण ॥

१९०॥

मेरी दाढ़ी जल गई और मेरे गालों पर फफोले पड़ गये।' जो भी अर्दली वहाँ गया, उसने वैसा ही विवरण दिया।

ताहा देखि' रहिनु मुजि महा-भय पाजा। कीर्तन ना वर्जिह, घरे रहों त' वसिया ॥

१९१॥

यह देखकर मैं अत्यधिक डर गया। मैंने उनसे संकीर्तन को न रोककर घर पर बैठने के लिए कहा।

तबे त' नगरे हइबे स्वच्छन्दे कीर्तन ।शुनि' सब म्लेच्छ आसि' कैल निवेदन ॥

१९२॥

तब सारे मांसाहारी यवनों ने यह सुनकर कि नगर में स्वच्छन्द संकीर्तन होगा, आकर निवेदन किया।

नगरे हिन्दुर धर्म बाड़िल अपार ।।‘हरि' ‘हरि' ध्वनि बइ नाहि शुनि आर ॥

१९३॥

हिन्दू धर्म असीम रूप से बढ़ गया है, क्योंकि सदैव 'हरि! हरि!' की ध्वनि होती है। हमें इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं सुनाई पड़ता।'

आर म्लेच्छ कहे, हिन्दु 'कृष्ण कृष्ण' बलि' ।।हासे, कान्दे, नाचे, गाय, गड़ि ग्राय धूलि ॥

१९४॥

एक यवन ने कहा, ‘हिन्दू कृष्ण, कृष्ण कहते हैं और वे हँसते हैं, रोते हैं, नाचते हैं, कीर्तन करते हैं और जमीन पर गिरकर धूलि में लोटते हैं।

‘हरि' ‘हरि' करि' हिन्दु करे कोलाहल । पातसाह शुनिले तोमार करिबेक फल ॥

१९५॥

हिन्दू लोग हरि, हरि का उच्चारण करके कोलाहल मचाते हैं। यदि राजा ( पातसाह) इसे सुन ले, तो निश्चय ही आपको दण्ड देगा।'

तबे सेइ झवनेरे आमि त’ पुछिल । हिन्दु हरि' बले, तार स्वभाव जानिल ॥

१९६।। तब मैंने इन यवनों से पूछा, मैं जानता हूँ कि ये हिन्दू स्वभाव से हरि, हरि का उच्चारण करते हैं।

तुमित ग्रवन हआ केने अनुक्षण ।। हिन्दुर देवतार नाम लह कि कारण ॥

१९७॥

हिन्दू लोग हरि का नाम इसलिए लेते हैं, क्योंकि वह उनके ईश्वर का नाम है। किन्तु तुम लोग मांसभक्षी मुसलमान हो। फिर तुम लोग हिन्दुओं के ईश्वर का नाम क्यों लेते हो?' म्लेच्छ कहे,—हिन्दुरे आमि करि परिहास ।केह केह—कृष्णदास, केह—रामदास ॥

१९८॥

उस म्लेच्छ ने उत्तर दिया, 'कभी-कभी मैं हिन्दुओं से मजाक करता हूँ। उनमें से कुछ कृष्णदास कहलाते हैं और कुछ रामदास।

केह-हरिदास, सदा बले ‘हरि' 'हरि' ।।जानि कार घरे धन करिबेक चुरि ॥

१९९॥

उनमें से कुछ हरिदास कहलाते हैं। वे सदैव हरि, हरि का उच्चारण करते हैं। इस तरह मैंने सोचा कि ये किसी के घर से धन चुरायेंगे।

सेइ हैते जिह्वा मोर बले ‘हरि' ‘हरि' ।।इच्छा नाहि, तबु बले,—कि उपाय करि ॥

२०० ॥

तभी से मेरी जीभ भी निरन्तर 'हरि, हरि' ध्वनि का उच्चारण करती है। यद्यपि मेरी इच्छा नहीं होती कि इसे कहूँ, किन्तु तो भी मेरी जीभ वही कहे जाती है। मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं।'

आर म्लेच्छ कहे, शुन-आमि त' एइ-मते । हिन्दुके परिहास कैनु से दिन हइते ॥

२०१॥

जिह्वा कृष्ण-नाम करे, ना माने वर्जन ।। ना जानि, कि मन्त्रौषधि जाने हिन्दु-गण ॥

२०२॥

दूसरे यवन ने कहा, 'कृपया, मेरी सुनें। जिस दिन से मैंने कुछ हिन्दुओं के साथ इस तरह मजाक किया है, तब से मेरी जीभ हरे कृष्ण का मन्त्र जपने लगी है और उसे त्यागती नहीं। मैं नहीं जानता कि ये हिन्दू कौन-सा मन्त्र और कौन-सी जड़ी-बूटी जानते हैं?' एत शुनि' ता'-सभारे घरे पाठाइल ।हेन-काले पाषण्डी हिन्दु पाँच-सात आइल ॥

२०३॥

यह सब सुनने के बाद मैंने सारे म्लेच्छों को अपने-अपने घरों को भेज दिया। तब पाँच-सात नास्तिक हिन्दू मेरे पास आये।

आसि' कहे, हिन्दुर धर्म भाङ्गिल निमाई ।।ये कीर्तन प्रवर्ताइल, कभुशुनि नाइ ॥

२०४॥

। मेरे पास आकर कुछ हिन्दुओं ने शिकायत की, निमाइ पण्डित ने तो हिन्दू धर्म के सिद्धान्तों को तोड़ दिया है। उसने संकीर्तन प्रणाली चलाई है, जिसे हमने किसी भी शास्त्र में नहीं सुना।

मङ्गलचण्डी विषहरि करि' जागरण । ता'ते वाद्य, नृत्य, गीत,—योग्य आचरण ॥

२०५॥

जब हम मंगलचण्डी तथा विषहरि की पूजा के लिए रात्रि-जागरण करके धार्मिक उत्सव मनाते हैं, तब बाजा बजाना, नाचना तथा कीर्तन करना निस्सन्देह उचित प्रथा है।

पूर्वे भाल छिल एइ निमाइ पण्डित । गया हैते आसिया चालाय विपरीत ॥

२०६॥

। निमाइ पण्डित पहले तो बहुत अच्छा लड़का था, किन्तु जब से वह गया से होकर लौटा है, वह अलग आचरण करने लगा है।

उच्च करि' गाय गीत, देय करतालि ।मृदङ्ग-करताल-शब्दे कर्णे लागे तालि ॥

२०७॥

अब वह सभी प्रकार के गाने जोर से गाता है, तालियाँ बजाता है, मृदंग और करताल बजाता है तथा इतनी ऊँची आवाज में शोर करता है। कि हमारे कान बहरे हो जाते हैं।

ना जानि,—कि खाजा मत्त हा नाचे, गाय ।।हासे, कान्दे, पड़े, उठे, गड़ागड़ि ग्राय ॥

२०८॥

हमें समझ में नहीं आता कि वह क्या खाता है, जिससे उन्मत्त होकर वह नाचता है, गाता है, कभी हँसता है, रोता है, गिरता है, कूदता है और भूमि पर लोटने लगता है।

नगरियाके पागल कैल सदा सङ्कीर्तन ।रात्रे निद्रा नाहि ग्राइ, करि जागरण ॥

२०९॥

उसने संकीर्तन करके सारे लोगों को एक तरह से पागल बना दिया है। रात में हम सो नहीं पाते, हम सदा जागते रहते हैं।

‘निमाञि' नाम छाड़ि' एबे बोलाय 'गौरहरि' ।। हिन्दुर धर्म नष्ट कैल पाषण्ड सञ्चारि' ॥

२१०॥

अब उसने अपना निमाइ नाम छोड़कर 'गौरहरि' नाम शुरु किया है। उसने हिन्दू धर्म के धार्मिक सिद्धान्तों को नष्ट कर दिया है और अविश्वासियों के अधर्म का सूत्रपात किया है।

कृष्णेर कीर्तन करे नीच बाड़ बाड़। एइ पापे नवद्वीप हइबे उजाड़ ॥

२११॥

अब नीच जाति के लोग भी बारम्बार हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कर रहे हैं। इस पापकर्म के कारण सारा नवद्वीप नगर वीरान हो जायेगा।

हिन्दु-शास्त्रे 'ईश्वर' नाम–महा-मन्त्र जानि ।।सर्व-लोक शुनिले मन्त्रेर वीर्य हय हानि ॥

२१२॥

। हिन्दू शास्त्र के अनुसार ईश्वर का नाम सबसे शक्तिशाली मन्त्र है। यदि हर कोई नाम-संकीर्तन सुनता है, तो मन्त्र की शक्ति जाती रहेगी।

ग्रामेर ठाकुर तुमि, सब तोमार जन । निमाइ बोलाइया तारे करह वर्जन ॥

२१३॥

मान्यवर, आप इस नगर के शासक हैं। चाहे हिन्दू हों या मुसलमान, सभी आपके सरंक्षण में हैं। अतएव आप कृपया निमाइ पण्डित को बुलायें और उससे नगर छोड़ने के लिए कहें।'

तबे आमि प्रीति-वाक्य कहिल सबारे । सबे घरे ग्राह, आमि निषेधिब तारे ॥

२१४॥

उनकी शिकायतें सुनने के बाद मैंने मीठी वाणी में उनसे कहा, ‘आप लोग घर जाएँ। मैं अवश्य ही निमाइ पण्डित को इस हरे कृष्ण आन्दोलन को चालू रखने से मना कर दूंगा।'

हिन्दुर ईश्वर बड़ ग्रेइ नारायण ।। सेइ तुमि हओ,—हेन लय मोर मन ॥

२१५॥

मैं जानता हूँ कि नारायण हिन्दुओं के परमेश्वर हैं और मेरी समझ में आप वही नारायण हैं। मैं अपने अन्तःकरण में ऐसा अनुभव करता हूँ।

एत शुनि' महाप्रभु हासिया हासिया ।कहिते लागिला किछु काजिरे छुडिया ॥

२१६॥

काजी को इस प्रकार सुन्दर वचन बोलते हुए सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसका स्पर्श किया और हँसते हुए इस प्रकार बोले।

तोमार मुखे कृष्ण-नाम,—ए बड़ विचित्र । पाप-क्षय गेल, हैला परम पवित्र ॥

२१७॥

आपके मुख से कृष्ण के पवित्र नाम के उच्चारण ने आश्चर्य कर दिखाया है। इसने आपके सारे पापकर्मों के फलों को निर्मूल कर दिया है। अब आप नितान्त शुद्ध बन गये हैं।

‘हरि' 'कृष्ण' 'नारायण'लैले तिन नाम । बड़ भाग्यवान्तुमि, बड़ पुण्यवान् ॥

२१८॥

चूंकि आपने हरि, कृष्ण तथा नारायण-भगवान् के इन तीन पवित्र नामों का उच्चारण किया है, अतएव आप निस्सन्देह, परम भाग्यशाली और पुण्यात्मा हैं।

एत शुनि' कोजीर दुइ चक्षे पड़े पानि ।। प्रभुर चरण छुङि बले प्रिय-वाणी ॥

२१९॥

यह सुनकर काजी की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने तुरन्त ही महाप्रभु के चरणकमलों का स्पर्श किया और मीठी वाणी में इस प्रकार कहा।

तोमार प्रसादे मोर घुचिल कुमति ।। एइ कृपा कर,—ग्नेन तोमाते रहु भक्ति ॥

२२०॥

केवल आपकी कृपा से ही मेरे बुरे विचार दूर हो सके हैं। अब मुझ पर कृपा करें, जिससे मेरी भक्ति आप पर स्थिर रहे।

प्रभु कहे,—एक दान मागिये तोमाय ।सङ्कीर्तन वाद ट्रैछे नहे नदीयाय ॥

२२१॥

महाप्रभु ने कहा, मैं आपसे एक दान माँगता हूँ। आप वचन दें कि कम-से-कम नदिया जिले में यह संकीर्तन आन्दोलन रोका नहीं जायेगा।

काजी कहे,—मोर वंशे ग्रत उपजिबे ।ताहाके 'तालाक' दिब,–कीर्तन ना बाधिबे ॥

२२२॥

काजी ने कहा, भविष्य में मेरे वंश में जितने भी लोग उत्पन्न होंगे, उन्हें मैं यह कड़ी चेतावनी देता हूँ कि कोई भी संकीर्तन आन्दोलन को न रोके।

शुनि' प्रभु 'हरि' बलि' उठिला आपनि । उठिल वैष्णव सब करि' हरि-ध्वनि ॥

२२३॥

यह सुनकर महाप्रभु हरि! हरि! कहते हुए उठ खड़े हुए। उनके पीछे पीछे अन्य सारे वैष्णव भी पवित्र नाम की ध्वनि करते हुए खड़े हो गये।

कीर्तन करिते प्रभु करिला गमन । सङ्गे चलि' आइसे काजी उल्लसित मन ॥

२२४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कीर्तन करने चले गये और काजी भी प्रसन्न मन से उनके साथ गया।

काजीरे विदाय दिल शचीर नन्दन ।नाचिते नाचिते आइला आपन भवन ॥

२२५॥

महाप्रभु ने काजी से घर लौट जाने के लिए कहा। उसके बाद शचीमाता के पुत्र महाप्रभु नाचते-नाचते अपने घर आये।

एइ मते काजीरे प्रभु करिला प्रसाद ।इहा येइ शुने तार खण्डे अपराध ॥

२२६॥

यह घटना काजी तथा उस पर भगवान् की कृपा से सम्बन्धित है। जो भी इसे सुनता है, वह सारे अपराधों से छूट जाता है।

एक दिन श्रीवासेर मन्दिरे गोसाजि ।नित्यानन्द-सङ्गे नृत्य करे दुइ भाई ॥

२२७॥

एक दिन नित्यानन्द प्रभु तथा श्री चैतन्य महाप्रभु दोनों भाई श्रीवास ठाकुर के पवित्र घर में नृत्य कर रहे थे।

श्रीवास-पुत्रेर ताहाँ हैल परलोक ।तबु श्रीवासेर चित्ते ना जन्मिल शोक ॥

२२८॥

उस समय एक विपत्ति आ पड़ी-श्रीवास ठाकुर के पुत्र का देहान्त हो गया। फिर भी श्रीवास ठाकुर रंच-भर भी दुःखी नहीं हुए।

मृत-पुत्र-मुखे कैल ज्ञानेर कथन ।आपने दुइ भाइ हैला श्रीवास-नन्दन ॥

२२९॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने मृत पुत्र से ज्ञान की बातें कहलवाई और तब दोनों भाई स्वयं श्रीवास ठाकुर के पुत्र बन गये।

तबे त' करिला सब भक्ते वर दान । उच्छिष्ट दिया नारायणीर करिल सम्मान ॥

२३०॥

। तत्पश्चात् महाप्रभु ने अपने सभी भक्तों को वरदान दिया। उन्होंने नारायणी के प्रति विशेष सम्मान प्रकट करते हुए उसे अपना शेष बचा प्रसाद दिया।

श्रीवासेर वस्त्र सिंये दरजी झवन । प्रभु तारे निज-रूप कराइल दर्शन ॥

२३१॥

एक दर्जी था जो मांसभक्षी था, किन्तु वह श्रीवास ठाकुर के कपड़े सिला करता था। महाप्रभु ने उस पर कृपा करके उसे अपना स्वरूप दिखलाया।

‘देखिनु' ‘देखिनु' बलि' हइल पागल ।।प्रेमे नृत्य करे, हैल वैष्णव आगल ॥

२३२॥

मैंने देख लिया है! मैंने देख लिया है! कहते हुए तथा भावविभोर होकर पागल की तरह नाचते हुए वह दर्जी उच्च कोटि का वैष्णव बन गया।

आवेशेते श्रीवासे प्रभु वंशी त' मागिल । श्रीवास कहे,—वंशी तोमार गोपी हरि' निल ॥

२३३॥

भाव में महाप्रभु ने श्रीवास ठाकुर से अपनी वंशी माँगी, किन्तु श्रीवास ठाकुर ने उत्तर दिया, आपकी वंशी तो गोपियों ने चुरा ली है।

शुनि' प्रभु 'बल' ‘बल' बलेन आवेशे ।।श्रीवास वर्णेन वृन्दावन-लीला-रसे ॥

२३४॥

यह उत्तर सुनकर महाप्रभु ने आवेश में कहा, बोलते चलो! बोलते चलो! इस प्रकार श्रीवास ने श्री वृन्दावन की लीलाओं के दिव्य रस का वर्णन किया।

प्रथमेते वृन्दावन-माधुर्य वर्णिल ।शुनिया प्रभुर चित्ते आनन्द बाड़िल ॥

२३५॥

सबसे पहले श्रीवास ठाकुर ने वृन्दावन-लीलाओं की दिव्य मधुरता का वर्णन किया, जिन्हें सुनकर महाप्रभु के चित्त में हर्ष अत्यन्त बढ़ने लगा।

तबे 'बल' 'बल' प्रभु बले वार-वार ।पुनः पुनः कहे श्रीवास करिया विस्तार ॥

२३६॥

तत्पश्चात् महाप्रभु ने उनसे बारम्बार कहा, बोलते चलो! बोलते चलो! इस तरह श्रीवास ने वृन्दावन की लीलाओं का वर्णन विस्तार से बारम्बार किया।

वंशी-वाद्ये गोपी-गणेर वने आकर्षण ।ताँ-सबार सङ्गे ग्रैछे वन-विहरण ॥

२३७॥

श्रीवास ठाकुर ने विस्तार से बतलाया कि किस तरह गोपियाँ कृष्ण की वंशी की धुन से वृन्दावन के जंगलों की ओर आकृष्ट हुई थीं और किस तरह वे जंगल में उनके साथ साथ विहार करती थीं।

ताहि मध्ये छय-ऋतु लीलार वर्णन ।।मधु-पान, रासोत्सव, जल-केलि कथन ॥

२३८॥

श्रीवास पण्डित ने छह ऋतुओं में की गई सारी लीलाओं का वर्णन किया। उन्होंने मधु-पान करने, रास नृत्य रचाने, यमुना में तैरने तथा अन्य ऐसी घटनाओं का वर्णन किया।

‘बल' 'बल' बले प्रभु शुनिते उल्लास । श्रीवास कहेन तबे रास रसेर विलास ॥

२३९॥

जब महाप्रभु ने अत्यन्त हर्षित होकर सुनते हुए कहा, कहते चलो! कहते चलो! तब श्रीवास ठाकुर ने रासलीला का वर्णन किया, जो दिव्य रस से भरपूर है।

कहिते, शुनिते ऐछे प्रातः काल हैल ।।प्रभु श्रीवासेरे तोषि' आलिङ्गन कैल ॥

२४०॥

इस तरह महाप्रभु को कहते-कहते और श्रीवास ठाकुर को सुनातेसुनाते प्रात:काल हो गया, तो महाप्रभु ने श्रीवास ठाकुर का आलिंगन करके उन्हें तुष्ट किया।

तबे आचार घरे कैल कृष्ण-लीला ।। रुक्मिणी-स्वरूप प्रभु आपने हइला ॥

२४१॥

तत्पश्चात् श्री चन्द्रशेखर आचार्य के घर में कृष्ण की लीलाओं का नाटकीय अभिनय हुआ। स्वयं महाप्रभु ने कृष्ण की मुख्य पटरानी रुक्मिणी का अभिनय किया।

कभु दुर्गा, लक्ष्मी हय, कभु वा चिच्छक्ति ।। खाटे वसि' भक्त-गणे दिला प्रेम-भक्ति ॥

२४२॥

महाप्रभु कभी देवी दुर्गा का अभिनय करते, कभी लक्ष्मी, या मुख्य शक्ति योगमाया का। पलंग पर बैठकर उन्होंने सारे उपस्थित भक्तों को भगवत्प्रेम प्रदान किया।

एक-दिन महाप्रभुर नृत्य-अवसाने । एक ब्राह्मणी आसि' धरिल चरणे ॥

२४३॥

एक दिन जब महाप्रभु ने अपना नृत्य समाप्त किया, तभी एक स्त्री, किसी ब्राह्मण की पत्नी, वहाँ आई और उसने महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए।

चरणेर धूलि सेइ लय वार वार ।।देखियो प्रभुर दुःख हइल अपार ॥

२४४॥

ज्योंही वह स्त्री बारम्बार उनके चरणों की धूल लेने लगी, महाप्रभु को अपार दुःख हुआ।

सेइ-क्षणे धाज्ञा प्रभु गङ्गाते पड़िल ।। नित्यानन्द-हरिदास धरि' उठाइल ॥

२४५ ॥

वे तुरन्त ही दौड़े-दौड़े गंगा नदी में गये और उस स्त्री के पापफलों को दूर करने के लिए नदी में कूद पड़े। नित्यानन्द प्रभु तथा हरिदास ठाकुर ने उन्हें पकड़कर नदी से निकाला।

विजय आचार घरे से रात्रे रहिला । प्रातःकाले भक्त सबे घरे ला गेला ॥

२४६॥

उस रात महाप्रभु विजय आचार्य के घर पर रुके। प्रातःकाल महाप्रभु अपने भक्तों को साथ लेकर घर लौट आये।

एक-दिन गोपी-भावे गृहेते वसिया ।। ‘गोपी' 'गोपी' नाम लय विषण्ण हञा ॥

२४७॥

एक दिन महाप्रभु गोपियों के भाव में अपने घर बैठे हुए थे। वे विरह से अत्यन्त खिन्न होकर गोपी! गोपी! पुकार रहे थे।

एक पड़या आइल प्रभुके देखिते । ‘गोपी' ‘गोपी' नाम शुनि' लागिल बलिते ॥

२४८॥

महाप्रभु का दर्शन करने आया हुआ एक विद्यार्थी चकित था कि वे गोपी! गोपी! पुकार रहे हैं। अतएव वह इस प्रकार बोला।

कृष्ण-नाम ना लओ केने, कृष्ण-नाम-धन्य ।। ‘गोपी' ‘गोपी' बलिले वा किबा हय पुण्य ॥

२४९॥

आप भगवान् कृष्ण के यशस्वी एवं पवित्र नाम का उच्चारण करने के बदले ‘गोपी, गोपी' क्यों पुकार रहे हैं? आप ऐसा करने से कौन-सा पुण्य प्राप्त करेंगे? शुनि' प्रभु क्रोधे कैल कृष्णे दोषोद्गार ।ठेङ्गा ला उठिला प्रभु पडुया मारिबार ॥

२५०॥

मूर्ख विद्यार्थी की बात सुनकर महाप्रभु बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने अनेक प्रकार से भगवान् कृष्ण को फटकार लगाई। फिर वे लाठी उठाकर उस विद्यार्थी को मारने उठे।

भये पलाय पड़या, प्रभु पाछे पाछे धाय ।। आस्ते व्यस्ते भक्त-गण प्रभुरे रहाय ॥

२५१॥

वह विद्यार्थी डर के मारे भागा, तो महाप्रभु उसके पीछे दौड़ने लगे। किन्तु भक्तों ने किसी तरह उन्हें रोका।

प्रभुरे शान्त करि' आनिल निज घरे ।पडुया पलाया गेल पडुया-संभारे ॥

२५२ ॥

भक्तों ने महाप्रभु को शान्त किया और उन्हें घर ले आये। वह विद्यार्थी भागकर अन्य विद्यार्थियों की टोली में गया।

पडुया सहस्र ग्राहाँ पड़े एक-ठाजि ।प्रभुर वृत्तान्त द्विज कहे ताहाँ झाइ ॥

२५३॥

वह ब्राह्मण विद्यार्थी भागकर वहाँ गया, जहाँ एक हजार विद्यार्थी एकसाथ पढ़ रहे थे। वहाँ उसने उनसे इस घटना का वर्णन किया।

शुनि' क्रोध कैले सब पड़यार गण । सबे मेलि' करे तबे प्रभुर निन्दन ॥

२५४॥

यह घटना सुनकर सारे विद्यार्थी अत्यधिक क्रुद्ध हो गये और एकजुट होकर महाप्रभु की आलोचना करने लगे।

सब देश भ्रष्ट कैल एकला निमात्रि ।। ब्राह्मण मारिते चाहे, धर्म-भय नाइ ॥

२५५॥

उन्होंने आरोप लगाया, अकेले निमाई पण्डित ने ही सारा देश भ्रष्ट कर दिया है। वह कुलीन ब्राह्मण को आघात पहुँचाना चाहता है। उसे धार्मिक सिद्धान्तों से कोई भय नहीं रहा।

पुनः यदि ऐछे करे मारिब ताहरे ।। कोन् वा मानुष हय, कि करिते पारे ॥

२५६॥

यदि वह फिर से ऐसा निर्मम कार्य करता है, तो हम अवश्य ही बदला लेंगे और उसे मारेंगे। वह कौन सा ऐसा महत्त्वपूर्ण व्यक्ति है कि हमें ऐसा करने से रोक सकता है? प्रभुर निन्दाय सबार बुद्धि हैल नाश ।। सुपठित विद्या कारओ ना हय प्रकाश ॥

२५७॥

जब सारे विद्यार्थियों ने श्री चैतन्य महाप्रभु की निन्दा करते हुए ऐसा निश्चय किया, तब उनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई। यद्यपि वे सभी विद्वान थे, किन्तु इस अपराध के कारण उनमें ज्ञान का सार प्रकट नहीं हो रहा था।

तथापि दाम्भिक पड़या नम्र नाहि हय ।ग्राहाँ ताहाँ प्रभुर निन्दा हासि' से करय ॥

२५८ ॥

किन्तु दम्भी विद्यार्थी विनीत नहीं हुए। उल्टे वे इस घटना की चर्चा कहीं भी और सर्वत्र करते रहे। वे हँसी-हँसी में महाप्रभु की आलोचना करते रहे।

सर्व-ज्ञ गोसाजि जानि' सबार दुर्गति ।घरे वसि' चिन्ते ता'-सबार अव्याहति ॥

२५९॥

सर्वज्ञ होने के नाते श्री चैतन्य महाप्रभु इन विद्यार्थियों की दुर्गति समझ गये। फलतः वे घर पर ही बैठकर उनको उबारने पर विचार करने लगे।

ग्रत अध्यापक, आर ताँर शिष्य-गण । धर्मी, कर्मी, तपो-निष्ठ, निन्दक, दुर्जन ॥

२६०॥

महाप्रभु ने सोचा, सारे तथाकथित अध्यापक तथा विज्ञानी एवं उनके विद्यार्थी धर्म के नियमों, सकाम कर्मों तथा तपस्या का पालन करते हैं, फिर भी वे साथ-साथ निन्दक एवं धूर्त होते हैं।

एइ सब मोर निन्दा-अपराध हैते ।आमि ना लओयाइले भक्ति, ना पारे लइते ॥

२६१॥

यदि मैं इन्हें भक्ति के लिए प्रेरित न करूं, तो निन्दा अपराध करने के कारण इनमें से कोई भी भक्ति ग्रहण न कर सकेगा।

निस्तारिते आइलाम आमि, हैल विपरीत ।ए-सब दुर्जनेर कैछे हइबेक हित ॥

२६२॥

मैं समस्त पतितों का उद्धार करने आया हूँ, किन्तु अभी तो इसके ठीक विपरीत घटना घटी। इन धूर्ते का किस तरह उद्धार हो सकता है? ये किस तरह लाभान्वित हो सकते हैं? आमाके प्रणति करे, हय पाप-क्षय ।तबे से इहारे भक्ति लओयाइले लय ॥

२६३ ॥

। यदि ये धूर्त मुझे नमस्कार करें, तो इनके सारे पापों के फल विनष्ट । हो जाएँ। फिर यदि मैं इन्हें प्रेरित करूँ, तो ये भक्ति करने लगेंगे।

मोरे निन्दा करे ये, ना करे नमस्कार ।ए-सब जीवेरे अवश्य करिब उद्धार ॥

२६४॥

मुझे इन सभी पतितों को अवश्य ही उद्धार करना चाहिए, जो मेरी निन्दा करते हैं और मुझे नमस्कार नहीं करते।

अतएव अवश्य आमि सन्यास करिब ।।सन्यासि-बुद्ध्ये मोरे प्रणत हइब ॥

२६५ ॥

मैं संन्यास आश्रम स्वीकार करूँगा, क्योंकि इस प्रकार लोग मुझे संन्यासी जानकर नमस्कार करेंगे।

प्रणतिते ह'बे इहार अपराध क्षय ।निर्मल हृदये भक्ति कराइब उदय ॥

२६६॥

। नमस्कार करने से उनके सारे पाप कर्मों के फल दूर हो जायेंगे। फिर मेरी कृपा से उनके शुद्ध हृदयों में भक्ति जाग्रत होगी।

ए-सब पाषण्डीर तबे हइबे निस्तार ।।आर कोन उपाय नाहि, एइ झुक्ति सार ॥

२६७॥

इस संसार के सारे श्रद्धाविहीन धूर्ते ( पाखण्डियों) का उद्धार इसी विधि से हो सकता है। दूसरा कोई विकल्प नहीं है। तर्क को सार यही है।

एइ दृढ़ मुक्ति करि' प्रभु आछे घरे । केशव भारती आइला नदीया-नगरे ॥

२६८ ॥

इस दृढ़ निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद महाप्रभु घर पर ही रहे। इसी समय केशव भारती नदिया नगरी में पधारे।

प्रभु ताँरै नमस्करि' कैल निमन्त्रण । भिक्षा कराइयो ताँरै कैल निवेदन ॥

२६९॥

महाप्रभु ने उनको सादर नमस्कार किया और उन्हें अपने घर पर आमंत्रित किया। उन्हें अच्छी तरह से भोजन कराने के बाद महाप्रभु ने उनसे निवेदन किया।

तुमि त' ईश्वर बट, साक्षालारायण ।।कृपा करि' कर मोर संसार मोचन ॥

२७० ॥

हे महाशय, आप साक्षात् नारायण हैं। अतएव मुझ पर कृपा करें। कृपया मेरा इस भवबन्धन से उद्धार करें।

भारती कहेन, तुमि ईश्वर, अन्तर्यामी ।ग्रे कराह, से करिब, स्वतन्त्र नहि आमि ॥

२७१॥

केशव भारती ने महाप्रभु को उत्तर दिया, आप परम ईश्वर, परमात्मा हैं। मैं वहीं करूंगा जो आप मुझसे करायेंगे। मैं आपसे स्वतन्त्र नहीं हूँ।

एत बलि' भारती गोसाञि काटोयाते गेला ।महाप्रभु ताहा ग्राइ' सन्यास करिला ॥

२७२॥

यह कहकर गुरु केशव भारती अपने गाँव कटवा वापस चले गये। श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ जाकर संन्यास ग्रहण कर लिया।

सङ्गे नित्यानन्द, चन्द्रशेखर आचार्य ।।मुकुन्द-दत्त,—एइ तिन कैल सर्व कार्य ॥

२७३ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास ग्रहण किया, तब सारे आवश्यक कार्य सम्पन्न करने के लिए उनके साथ तीन व्यक्ति थे-नित्यानन्द प्रभु, चन्द्रशेखर आचार्य तथा मुकुन्द दत्त।

एइ आदि-लीलार कैल सूत्र गणन ।विस्तारि वर्णिला इहा दास वृन्दावन ॥

२७४॥

इस तरह मैंने आदिलीला की घटनाओं का संक्षेप में वर्णन किया है। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने इनका विस्तृत वर्णन ( चैतन्य-भागवत में) किया है।

ग्रशोदा-नन्दन हैला शचीर नन्दन ।चतुर्विध भक्त-भाव करे आस्वादन ॥

२७५ ॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जो माता यशोदा के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे, वे ही अब माता शची के पुत्र रूप में प्रकट हुए हैं और चार प्रकार के भक्ति भावों का आस्वादन कर रहे हैं।

स्व-माधुर्य राधा-प्रेम-रस आस्वादिते ।। राधा-भाव अङ्गी करियाछे भाल-मते ॥

२७६ ॥

। कृष्ण के प्रति श्रीमती राधारानी के प्रेम के रस का आस्वादन करने तथा कृष्णरूप आनन्द के आगार को समझने के लिए ही स्वयं कृष्ण ने श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में राधारानी के भाव को अंगीकार किया।

गोपी-भाव ग्राते प्रभु धरियाछे एकान्त ।व्रजेन्द्र-नन्दने माने आपनार कान्त ॥

२७७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन गोपियों का भाव स्वीकार किया, जो व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण को अपने प्रियतम के रूप में मानती हैं।

गोपिका-भावेर एइ सुदृढ़ निश्चय ।।व्रजेन्द्र-नन्दन विना अन्यत्र ना हय ॥

२७८ ॥

यह सुदृढ़ निष्कर्ष निकलता है कि गोपिकाओं का भाव केवल कृष्ण के ही साथ सम्भव है, किसी अन्य के साथ नहीं।

श्यामसुन्दर, शिखिपिच्छ-गुञ्जा-विभूषण ।। गोप-वेश, त्रि-भङ्गिम, मुरली-वदन ॥

२७९॥

उनका रंग श्यामल है, सिर पर मोरपंख है, गुन्जा माला है और ग्वालों जैसी वेशभूषा है। उनका शरीर तीन स्थानों से मुड़ा है और वे होंठो पर बांसुरी रखे हुए हैं।

इहा छाड़ि' कृष्ण यदि हय अन्याकार । गोपिकार भाव नाहि याय निकट ताहार ॥

२८०॥

यदि भगवान् कृष्ण अपने इस आदि रूप को छोड़कर कोई अन्य विष्णु-रूप धारण करते हैं, तो उनके निकट जाने पर भी गोपियों में भाव जाग्रत नहीं होता।

गोपीनां पशुपेन्द्र-नन्दन-जुषो भावस्य कस्तां कृती विज्ञातुं क्षमते दुरूह-पदवी-सञ्चारिणः प्रक्रियाम् । आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन्भुजैजिष्णुभिर्ग्रासां हन्त चतुर्भिरद्भुत-रुचि रागोदयः कुञ्चति ॥

२८१॥

एक बार भगवान् श्रीकृष्ण ने खेल-खेल में चार विजयी हाथों वाले तथा अत्यन्त सुन्दर स्वरूप वाले नारायण का रूप प्रकट किया। किन्तु इस उत्कृष्ट रूप को देखकर गोपियों की ऊर्मिपूर्ण भावनाएँ संकुचित हो गईं। अतएव विद्वान व्यक्ति भी उन गोपियों के भावों को नहीं समझ सकते, जो नन्द महाराज के पुत्र भगवान् कृष्ण के मूल स्वरूप पर केन्द्रित हैं। कृष्ण के परम रस में गोपियों के अद्भुत भाव आध्यात्मिक जीवन में सबसे बड़ा रहस्य हैं।

वसन्त-काले रास-लीला करे गोवर्धने ।।अन्तर्धान कैला सङ्केत करि' राधा-सने ॥

२८२ ॥

वसन्त ऋतु में जब रासनृत्य चल रहा था, तो कृष्ण सहसा घटनास्थल से यह दिखाने के लिए अन्तर्धान हो गये कि वे श्रीमती राधारानी के साथ एकान्त वास चाहते हैं।

निभृत-निकुञ्ज वसि' देखे राधार बाट ।अन्वेषिते आइला ताहाँ गोपिकार ठाट ॥

२८३॥

कृष्ण एकान्त कुंज में बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे कि श्रीमती राधारानी उधर से गुजरें। किन्तु तभी गोपियाँ वहाँ आ पहुँची, जैसे कि कोई खोजी सैन्य दल हो।

दूर हैते कृष्णे देखि' बले गोपी-गण ।एइ देख कुबेर भितर व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

२८४॥

दूर से कृष्ण को देखकर गोपियों ने कहा, जरा देखो न! ये रहे कुंज के भीतर नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण।

गोपी-गण देखि' कृष्णेर हइल साध्वस ।। लुकाइते नारिल, भये हैला विवश ॥

२८५॥

। ज्योंही कृष्ण ने सारी गोपियों को देखा, वे भावविह्वल हो उठे। इस तरह वे अपने आपको छिपा नहीं सके और भयवश वे हतप्रभ हो गये।

चतुर्भुज मूर्ति धरि' आछेन वसिया । कृष्ण देखि' गोपी कहे निकटे आसिया ॥

२८६॥

कृष्ण अपना चतुर्भुज नारायण रूप धारण करके वहाँ बैठ गये। जब सारी गोपियाँ आईं, तो उन्हें देखकर वे इस प्रकार बोलीं।

‘इहों कृष्ण नहे, इहों नारायण मूर्ति' ।एत बलि' ताँरै सभे करे नति-स्तुति ॥

२८७॥

ये कृष्ण नहीं, भगवान् नारायण हैं। यह कहकर उन्होंने नमस्कार किया और उनकी सादर स्तुति इस प्रकार की।

नमो नारायण, देव करह प्रसाद ।।कृष्ण-सङ्ग देह' मोर घुचाह विषाद ॥

२८८॥

हे भगवान् नारायण, हम आपको सादर नमस्कार करती हैं। आप हम पर कृपालु हों। कृपया आप हमें कृष्ण की संगति प्रदान करें और इस प्रकार हमारे शोक को दूर करें।

एत बलि नमस्करि' गेला गोपी-गण ।। हेन-काले राधा आसि' दिला दरशन ॥

२८९॥

ऐसा कहने के बाद तथा नमस्कार करके सारी गोपियाँ इधर-उधर चली गईं। तब श्रीमती राधारानी आईं और भगवान् कृष्ण के समक्ष प्रकट हुईं।

राधा देखि' कृष्ण ताँरै हास्य करिते ।सेइ चतुर्भुज मूर्ति चाहेन राखिते ॥

२९०॥

जब भगवान् कृष्ण ने राधारानी को देखा, तो उन्होंने उनके साथ परिहास करने के लिए अपना चतुर्भुज रूप बनाये रखना चाहा।

लुकाइला दुइ भुज राधार अग्रेते ।। बहु ग्रन कैला कृष्ण, नारिल राखिते ॥

२९१॥

किन्तु श्रीमती राधारानी के सम्मुख श्रीकृष्ण को अपनी दो अतिरिक्त भुजाएँ छिपानी पड़ी। कृष्ण ने उनके सामने अपनी चारों भुजाएँ रखने का पूरा प्रयत्न किया, किन्तु वे ऐसा कर पाने में पूरी तरह विफल रहे।

राधार विशुद्ध-भावेर अचिन्त्य प्रभाव ।।ये कृष्णेरे कराइला द्वि-भुज-स्वभाव ॥

२९२॥

राधारानी के शुद्ध भाव का प्रभाव अचिन्त्य रूप से इतना महान् है। कि उसने कृष्ण को अपना आदि द्विभुज रूप धारण करने के लिए बाध्य कर दिया।

रासारम्भ-विधौ निलीय वसता कुल्ले मृगाक्षी-गणैर्दृष्टं गोपयितुं स्वमुद्धरे-धिया य़ा सुष्ठ सन्दर्शिता । राधायाः प्रणयस्य हन्त महिमा ग्रस्य श्रियो रक्षितुंसा शक्या प्रभविष्णुनापि हरिणा नासीच्चतुर्बाहुता ॥

२९३॥

रासनृत्य प्रारम्भ होने के पूर्व भगवान् कृष्ण ने परिहासवश अपने आप को कुंज में छिपा लिया। जब मृगली के समान नेत्रों वाली गोपियाँ आयीं, तो अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के द्वारा कृष्ण ने अपने आपको छिपाने के लिए अपना सुन्दर चतुर्भुज रूप प्रकट किया। किन्तु जब श्रीमती राधारानी वहाँ आईं, तो वे उनके सामने अपना वह चतुर्भुज रूप नहीं रख पाये। यह श्रीमती राधा के प्रेम की अद्भुत महिमा है।

सेइ व्रजेश्वर–इहँ जगन्नाथ पिता । सेइ व्रजेश्वरी–इहँ शचीदेवी माता ॥

२९४॥

व्रजभूमि के राजा नन्द अब श्री चैतन्य महाप्रभु के पिता जगन्नाथ मिश्र हैं और व्रजभूमि की महारानी माता यशोदा चैतन्य महाप्रभु की माता शचीदेवी हैं।

सेइ नन्द-सुत—इहँ चैतन्य-गोसान्नि । सेइ बलदेव-इहँ नित्यानन्द भाई ॥

२९५॥

जो पहले नन्द महाराज के पुत्र थे, वे अब श्री चैतन्य महाप्रभु हैं और जो पहले कृष्ण के भाई बलदेव थे, वे अब नित्यानन्द प्रभु, श्री चैतन्य महाप्रभु के भाई हैं।

वात्सल्य, दास्य, सख्य–तिन भावमये ।सेइ नित्यानन्दकृष्ण-चैतन्य-सहाय ॥

२९६॥

श्री नित्यानन्द प्रभु को सदैव वात्सल्य, दास्य तथा सख्य भाव का अनुभव होता है। वे श्री चैतन्य महाप्रभु की सदा उसी तरह से सहायता करते हैं।

प्रेम-भक्ति दिया तेंहो भासा 'ल जगते ।ताँर चरित्र लोके ना पारे बुझिते ॥

२९७ ॥

श्री नित्यानन्द प्रभु ने दिव्य प्रेमाभक्ति का वितरण करके सारे जगत् को आप्लावित कर दिया। उनके चरित्र तथा उनके कार्यों को कोई नहीं समझ सकता।

अद्वैत-आचार्य-गोसाञि भक्त-अवतार ।कृष्ण अवतारिया कैला भक्तिर प्रचार ॥

२९८ ॥

श्रील अद्वैत आचार्य प्रभु एक भक्त के अवतार-रूप में प्रकट हुए। वे कृष्ण की श्रेणी में हैं, किन्तु वे इस धरा पर भक्ति का प्रचार करने के लिए अवतरित हुए।

सख्य, दास्य, दुइ भाव सहज ताँहार ।।कभु प्रभु करेन ताँरे गुरु-व्यवहार ॥

२९९॥

उनके सहज भाव सदा सख्य तथा दास्य भाव के स्तर पर होते थे, किन्तु महाप्रभु कभी-कभी उनके साथ अपने आध्यात्मिक गुरु जैसा व्यवहार करते थे।

श्रीवासादि ग्रत महाप्रभुर भक्त-गण ।निज निज भावे करेन चैतन्य-सेवन ॥

३००॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी भक्तगण जिनमें श्रीवास ठाकुर प्रमुख हैं, अपनी अपनी भावपूर्ण मनोदशा से महाप्रभु की सेवा करते हैं।

पण्डित-गोसाजि आदि याँर येइ रस ।सेइ सेई रसे प्रभु हन ताँर वश ॥

३०१॥

महाप्रभु के सारे निजी पार्षद यथा गदाधर पण्डित, स्वरूप दामोदर, रामानन्द राय तथा रूप गोस्वामी आदि छहों गोस्वामी अपने-अपने दिव्य रसों में स्थित हैं। इस तरह महाप्रभु विभिन्न दिव्य रसों के वशीभूत हो जाते हैं।

तिहँ श्याम,—वंशी-मुख, गोप-विलासी ।इहँ गौर कभु द्विज, कभु त' सन्यासी ॥

३०२ ॥

कृष्ण-लीला में भगवान् का वर्ण साँवला है। वे वंशी बजाते हुए ग्वालबाल की तरह आनन्दमग्न रहते हैं। अब वही व्यक्ति गौरवर्ण धारण करके कभी ब्राह्मण के रूप में लीला करते हैं और कभी संन्यासी के रूप में।

अतएव आपने प्रभु गोपी-भाव धरि' ।व्रजेन्द्र-नन्दने कहे ‘प्राण-नाथ' करि' ॥

३०३ ॥

इसीलिए स्वयं भगवान् गोपी भाव धारण करके अब नन्द महाराज के पुत्र को हे मेरे प्राणनाथ! हे मेरे प्रिय पति! कहकर सम्बोधित करते है।

सेई कृष्ण, सेइ गोपी,—परम विरोध ।।अचिन्त्य चरित्र प्रभुर अति सुदुर्बोध ॥

३०४॥

वे कृष्ण हैं, फिर भी उन्होंने गोपी-भाव धारण किया है। ऐसा क्यों है? यही तो भगवान् का अचिन्त्य चरित्र है, जिसे समझ पाना अत्यन्त कठिन है।

इथे तर्क करि' केह ना कर संशय । कृष्णेर अचिन्त्य-शक्ति एई मत हय ॥

३०५॥

संसारी तर्को के द्वारा महाप्रभु के चरित्र के विरोधाभासों को नहीं समझा जा सकता। फलस्वरूप किसी को इस सम्बन्ध में कोई संशय नहीं करना चाहिए। मनुष्य को केवल कृष्ण की अचिन्त्य शक्ति को समझने का प्रयास करना चाहिए, अन्यथा वह यह नहीं समझ सकेगा कि ऐसे विरोध किस तरह सम्भव होते हैं।

अचिन्त्य, अद्भुत कृष्ण-चैतन्य-विहार। चित्र भाव, चित्र गुण, चित्र व्यवहार ॥

३०६॥

श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अचिन्त्य तथा अद्भुत हैं। उनका भाव अद्भुत है, उनके गुण अद्भुत हैं और उनको व्यवहार अद्भुत है।

तर्के इहा नाहि माने येइ दुराचार । कुम्भीपाके पचे, तार नाहिक निस्तार ॥

३०७॥

यदि कोई व्यर्थ ही इन संसारी तर्कों में उलझा रहता है और इसे स्वीकार नहीं करता, वह कुम्भीपाक नरक में तेल में उबलता रहता है। उसका उद्धार नहीं होता।

अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् । प्रकृतिभ्यः परं ग्रच्च तदचिन्त्यस्य लक्षणम् ॥

३०८॥

भौतिक प्रकृति से परे कोई भी दिव्य बात अचिन्त्य कहलाती है, जबकि सारे तर्क संसारी होते हैं। चूंकि संसारी तर्क दिव्य विषयों को स्पर्श भी नहीं कर पाते, अतएव मनुष्य को संसारी तर्को से दिव्य विषयों को समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

अद्भुत चैतन्य-लीलाय याहार विश्वास ।। सेइ जन ग्राय चैतन्येर पद पाश ॥

३०९॥

जिस व्यक्ति की चैतन्य महाप्रभु की अद्भुत लीलाओं में दृढ़ निष्ठा है, वही उनके चरणकमलों तक पहुँच पाता है।

प्रसङ्गे कहिल एइ सिद्धान्तेर सार। इहा येइ शुने, शुद्ध-भक्ति हय तार ॥

३१०॥

इस आख्यान में मैंने भक्ति के सार को बतलाया है। जो कोई भी इसे सुनता है, उसमें भगवान् की शुद्ध भक्ति विकसित होती है।

लिखित ग्रन्थेर यदि करि । तबे से ग्रन्थेर अर्थ पाइये आस्वाद ॥

३११॥

यदि मैं पहले से लिखी बातों की पुनरावृत्ति करूँ, तो इस शास्त्र के प्रयोजन का आस्वादन कर सकें।

देखि ग्रन्थे भागवते व्यासेर आचार ।।कथा कहि' करे वार वार ॥

३१२॥

हम श्रीमद्भागवत शास्त्र में इसके रचयिता श्री व्यासदेव के आचरण को देख सकते हैं। वे कथा कहकर उसको बारम्बार दोहराते हैं।

ताते आदि-लीलार करि परिच्छेद गणन ।।प्रथम परिच्छेदे कैलँ‘मङ्गलाचरण' ॥

३१३ ॥

अतएव मैं आदिलीला के अध्यायों की गणना करूंगा। पहले अध्याय के अन्तर्गत मैं गुरु को नमस्कार करता हूँ, क्योंकि यह शुभ लेखन का प्रारम्भ है।

द्वितीय परिच्छेदे चैतन्य-तत्त्व-निरूपण' । स्वयं भगवान् येई व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

३१४॥

दूसरे अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु के तत्त्व की व्याख्या की गई है। वे महाराज नन्द के पुत्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं।

तेहो त' चैतन्य-कृष्ण-शचीर नन्दन । तृतीय परिच्छेदे जन्मेर 'सामान्य' कारण ॥

३१५॥

श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु, जो स्वयं कृष्ण हैं, अब माता शची के पुत्ररूप में प्रकट हुए हैं। तृतीय अध्याय में उनके प्राकट्य के सामान्य कारण का वर्णन है।

तहिं मध्ये प्रेम-दान–'विशेष' कारण । युग-धर्म- कृष्ण-नाम-प्रेम-प्रचारण ॥

३१६॥

। तीसरे अध्याय में भगवत्प्रेम के वितरण का विशेष वर्णन हुआ है। इसमें युगधर्म का भी वर्णन है, जो भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का सहजता से वितरण और उनसे प्रेम करने की विधि का प्रचार करना है।

चतुर्थे कहिलें जन्मेर 'मूल' प्रयोजन ।।स्व-माधुर्य-प्रेमानन्द-रस-आस्वादन ॥

३१७॥

चौथे अध्याय में उनके प्राकट्य के प्रमुख कारण का वर्णन है, जो उन्हीं की दिव्य प्रेमाभक्ति तथा उनके ही माधुर्य के रस का आस्वादन करने के लिए है।

पञ्चमे 'श्री-नित्यानन्द'-तत्त्व निरूपण ।। नित्यानन्द हैला राम रोहिणी-नन्दन ॥

३१८॥

पाँचवें अध्याय में श्री नित्यानन्द प्रभु के तत्त्व का वर्णन हुआ है, जो रोहिणी-पुत्र बलराम ही हैं।

षष्ठ परिच्छेदे 'अद्वैत-तत्त्वे र विचार ।अद्वैत-आचार्य—महा-विष्णु-अवतार ॥

३१९॥

छठे अध्याय में अद्वैत आचार्य के तत्त्व पर विचार किया गया है। वे महाविष्णु के अवतार हैं।

सप्तम परिच्छेदे ‘पञ्च-तत्त्वे'र आख्यान ।पञ्च-तत्त्व मिलि' त्रैछे कैला प्रेम-दान ॥

३२०॥

सातवें अध्याय में पंचतत्त्व-श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु, श्री अद्वैत, गदाधर तथा श्रीवास का वर्णन है। वे सभी भगवत्प्रेम का सर्वत्र प्रचार करने के लिए संयुक्त हुए हैं।

अष्टमे 'चैतन्य-लीला-वर्णन'-कारण ।एक कृष्ण-नामेर महा-महिमा-कथन । ३२१॥

आठवें अध्याय में श्री चैतन्य की लीलाओं का वर्णन किये जाने का कारण दिया गया है। इसमें कृष्ण-नाम की महानता का भी वर्णन हुआ है।

नवमेते 'भक्ति-कल्प-वृक्षेर वर्णन' ।।श्री-चैतन्य-माली कैला वृक्ष आरोपण ॥

३२२॥

नवें अध्याय में भक्तिरूपी कल्पवृक्ष का वर्णन है। श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं माली हैं, जिन्होंने इसका आरोपण किया।

दशमेते मूल-स्कन्धेर 'शाखादि-गणन' ।।सर्व-शाखा-गणेर ग्रैछे फल-वितरण ॥

३२३ ॥

दसवें अध्याय में मुख्य तने की शाखाओं-उपशाखाओं एवं उनके फलों के वितरण का वर्णन हुआ है।

एकादशे नित्यानन्द-शाखा-विवरण' ।द्वादशे 'अद्वैत-स्कन्ध शाखार वर्णन' ॥

३२४॥

ग्याहरवें स्कन्ध में श्री नित्यानन्द प्रभु की शाखा (वंश) का वर्णन है। बारहवें अध्याय में श्री अद्वैत प्रभु नामक शाखा का वर्णन है।

त्रयोदशे महाप्रभुर ‘जन्म-विवरण' ।।कृष्ण-नाम-सह त्रैछे प्रभुर जनम ॥

३२५ ॥

तेरहवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु के जन्म का वर्णन है, जो कृष्ण-नाम कीर्तन चलते समय हुआ।

चतुर्दशे 'बाल्य-लीला'र किछु विवरण ।।पञ्चदशे ‘पौगण्ड-लीला'र सङ्क्षेपे कथन ॥

३२६॥

चौदहवें अध्याय में महाप्रभु की कुछ बाल-लीलाओं का वर्णन है। पंद्रहवें अध्याय में महाप्रभु की पौगण्ड-लीलाओं का संक्षिप्त वर्णन हुआ है।

षोड़श परिच्छेदे ‘कैशोर-लीला' र उद्देश ।। सप्तदशे ‘यौवन-लीला' कहिलें विशेष ॥

३२७॥

सोलहवें अध्याय में, मैंने कैशोर अवस्था ( युवावस्था के पूर्व ) की लीलाओं का संकेत किया है। सत्रहवें अध्याय में विशेषतया उनकी युवावस्था की लीलाओं का वर्णन हुआ है।

एइ सप्तदश प्रकार आदि-लीलार प्रबन्ध । द्वादश प्रबन्ध ताते ग्रन्थ-मुखबन्ध ॥

३२८॥

इस तरह प्रथम स्कन्ध में सत्रह प्रकार के विषय हैं, जो आदिलीला के नाम से विख्यात हैं। इनमें से बारह इस ग्रंथ के आमुख के रूप में हैं।

पञ्च-प्रबन्धे पञ्च-रसेर चरित । सङ्क्षेपे कहिलॆ अति,—ना कैलें विस्तृत ॥

३२९॥

मैंने आमुख के अध्यायों के पश्चात् पाँच अध्यायों में पाँच दिव्य रसों का वर्णन किया है। मैंने विस्तृत वर्णन की अपेक्षा इनका संक्षिप्त वर्णन किया है।

वृन्दावन-दास इहाचैतन्य-मङ्गले' ।। विस्तारि' वर्णिला नित्यानन्द-आज्ञा-बले ॥

३३०॥

श्री नित्यानन्द प्रभु के आदेश तथा बल पर श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने अपने ग्रंथ चैतन्य-मंगल में उन विषयों का विस्तार से वर्णन किया है, जिनका वर्णन मैंने नहीं किया।

श्री-कृष्ण-चैतन्य-लीला—अद्भुत, अनन्त । ब्रह्मा-शिव-शेष याँर नाहि पाय अन्त ॥

३३१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अद्भुत एवं अनन्त हैं। ब्रह्माजी, शिवजी तथा शेषनाग जैसे भी उनका पार नहीं पा सकते।

ये येइ अंश कहे, शुने सेइ धन्य ।। अचिरे मिलिबे तारे श्री-कृष्ण-चैतन्य ॥

३३२॥

कोई भी व्यक्ति, जो इस विस्तृत विषय के किसी भी अंश को कहता या सुनता है, उसे बहुत जल्दी ही श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की अहैतुकी कृपा प्राप्त हो जायेगी।

श्री-कृष्ण-चैतन्य, अद्वैत, नित्यानन्द ।। श्रीवास-गदाधरादि व्रत भक्त-वृन्द ॥

३३३॥

[ यहाँ लेखक पुन: पंचतत्त्व का वर्णन करते हैं। श्रीकृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानन्द, श्री अद्वैत, गदाधर, श्रीवास तथा महाप्रभु के सारे भक्तों! ग्रत ग्रत भक्त-गण वैसे वृन्दावने । नम्र हञा शिरे धरों सबार चरणे ॥

३३४॥

। मैं वृन्दावन के समस्त निवासियों को सादर नमस्कार करता हूँ। मैं विनीत भाव से उनके चरणकमलों को अपने शीश पर रखना चाहता हूँ।

श्री-स्वरूप-श्री-रूप-श्री-सनातन । श्री-रघुनाथ-दास, आर श्री-जीव-चरण ॥

३३५॥

शिरे धरि वन्दों, नित्य करों ताँर आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

३३६॥

मैं गोस्वामियों के चरणकमलों को अपने सिर पर रखना चाहता हूँ। उनके नाम हैं श्री स्वरूप दामोदर, श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री रघुनाथ दास गोस्वामी तथा श्री जीव गोस्वामी। उनके चरणकमलों को अपने सिर पर रखकर और सदा उनकी सेवा करने की आशा से मैं श्रीकृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्रीचैतन्यचरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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