अध्याय दस: भगवान की जगन्नाथ पुरी में वापसी
तं वन्दे गौर-जलदं स्वस्य स्रो दर्शनामृतैः ।। विच्छेदावग्रह-म्लान-भक्त-शस्यान्यजीवयत् ॥
१॥
मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जो वर्षा की कमी से कष्ट पा रहे भक्तरूपी धान्य के खेतों में जल बरसाने वाले बादल की तरह हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु का वियोग सूखे की तरह है, किन्तु जब महाप्रभु लौटते हैं, तो उनकी उपस्थिति उस अमृत-वर्षा की तरह है, जो सूखते हुए अनाज पर बरसकर उसे नष्ट होने से बचा लेती है।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैत आचार्य की जय हो तथा भगवान् चैतन्य के समस्त भक्तों की जय हो! पूर्वे ग्रबे महाप्रभु चलिला दक्षिणे । प्रतापरुद्र राजा तबे बोलाइल सार्वभौमे ॥
३॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु दक्षिण भारत के लिए चल पड़े, तब राजा प्रतापरुद्र ने सार्वभौम भट्टाचार्य को अपने महल में बुलाया।
वसिते आसन दिल करि' नमस्कारे ।महाप्रभुर वार्ता तबे पुछिल ताँहारे ॥
४॥
जब सार्वभौम भट्टाचार्य राजा से मिले, तो राजा ने उन्हें सम्मानपूर्वक आसन प्रदान किया और श्री चैतन्य महाप्रभु का समाचार पूछा।
शुनिलाङ तोमार घरे एक महाशय । गौड़ हइते आइला, तेंहो महा-कृपामय ॥
५॥
राजा ने भट्टाचार्य से कहा, मैंने सुना है कि बंगाल से एक महापुरुष आये हैं, जो आपके घर ठहरे हैं। मैंने यह भी सुना है कि वे अत्यन्त कृपालु हैं।
तोमारे बहु कृपा कैला, कहे सर्व-जन । कृपा करि' कराह मोरे ताँहार दर्शन ॥
६॥
मैंने यह भी सुना है कि इस महापुरुष ने आप पर महती कृपा की है। जो भी हो, विभिन्न लोगों से मैं यही सुन रहा हूँ। अब आप कृपा करके मेरी उनसे भेंट कराकर मुझे कृतार्थ करें।
भट्ट कहे,—ये शुनिला सब सत्य हय । ताँर दर्शन तोमार घटन ना हय ॥
७॥
भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, आपने जो कुछ भी सुना है, वह सत्य है। किन्तु जहाँ तक भेंट करने की बात है, उसका प्रबन्ध कर पाना अत्यन्त कठिन है।
विरक्त सन्यासी तेंहो रहेन निर्जने ।स्वप्नेह ना करेन तेहो राज-दरशने ॥
८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु संन्यासी हैं और सांसारिक मामलों से अत्यधिक विरक्त हैं। वे निर्जन स्थान में ठहरते हैं और सपने में भी किसी राजा से भेंट नहीं करते।
तथापि प्रकारे तोमा कराइताम दरशन ।सम्प्रति करिला तेंहो दक्षिण गमन ॥
९॥
इतने पर भी मैं आपकी भेंट कराने का प्रयास करता, किन्तु वे हाल ही में दक्षिण भारत के भ्रमण पर गये हैं।
राजा कहे,—जगन्नाथ छाड़ि' केने गेला ।।भट्ट कहे,—महान्तेर एइ एक लीला ॥
१०॥
राजा ने पूछा, उन्होंने जगन्नाथ पुरी को क्यों छोड़ा?' भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, महापुरुषों की लीलाएँ ही ऐसी हैं।
तीर्थ पवित्र करिते करे तीर्थ-भ्रमण ।सेइ छले निस्तारये सांसारिक जन ॥
११॥
“बड़े-बड़े सन्त तीर्थस्थानों को पवित्र बनाने के लिए उनकी यात्रा करते हैं। इसीलिए चैतन्य महाप्रभु अनेक तीर्थों का भ्रमण कर रहे हैं और अनेकानेक बद्धजीवों का उद्धार कर रहे हैं।
भवद्विधा भागवतास्तीर्थी-भूताः स्वयं विभो ।तीर्थी-कुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः-स्थेन गदा-भृता ॥
१२॥
आप जैसे सन्त पुरुष साक्षात् तीर्थ हैं। वे अपनी शुद्धता के कारण भगवान् के चिरन्तन संगी हैं, अतएव वे तीर्थों को भी शुद्ध कर सकते हैं।'
वैष्णवेर एइ हय एक स्वभाव निश्चल ।।तेंहो जीव नहेन, हन स्वतन्त्र ईश्वर ॥
१३॥
। वैष्णव तीर्थस्थानों की यात्रा उन्हें पवित्र बनाने तथा पतित बद्धजीवों का उद्धार करने के लिए करता है। यह वैष्णवों का कर्तव्य है। वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु जीव नहीं, अपितु साक्षात् पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् हैं। फलस्वरूप वे पूर्णतः स्वतन्त्र नियन्ता हैं, फिर भी भक्तरूप में वे भक्त के कार्य करते हैं।
राजा कहे,—तौरै तुमि ग्राइते केने दिले ।।पाय पड़ि' ग्रल करि' केने ना राखिले ॥
१४॥
यह सुनकर राजा ने कहा, आपने उन्हें क्यों जाने दिया? आपने उनके चरणकमलों पर गिरकर उन्हें यहीं क्यों नहीं रखा? भट्टाचार्य कहे,—तेंहो स्वयं ईश्वर स्वतन्त्र ।साक्षात्श्रीकृष्ण, तेहो नहे पर-तन्त्र ॥
१५ ॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और वे पूर्ण तथा स्वतन्त्र हैं। साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण होने के कारण वे किसी पर आश्रित नहीं हैं।
तथापि राखिते ताँरै बहु ग्रन कैलँ।।ईश्वरेर स्वतन्त्र इच्छा, राखिते नारिलें ॥
१६॥
फिर भी मैंने उन्हें यहाँ रखने के लिए बहुत प्रयत्न किया, किन्तु वे परम भगवान् हैं तथा पूर्णतया स्वतन्त्र हैं, अतएव मैं इसमें सफल नहीं हो सका।
राजा कहे,——भट्ट तुमि विज्ञ-शिरोमणि ।तुमि ताँरै 'कृष्ण' कह, ताते सत्य मानि ॥
१७॥
राजा ने कहा, हे भट्टाचार्य, मैं जिन्हें जानता हूँ उनमें से आप सर्वाधिक विद्वान तथा अनुभवी व्यक्ति हैं। अतएव जब आप श्री चैतन्य महाप्रभु को भगवान् कृष्ण कहते हैं, तो मैं इसको सत्य के रूप में स्वीकार करता हूँ।
पुनरपि इहाँ ताँर हैले आगमन । एक-बार देखि करि सफल नयन ॥
१८ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु जब पुनः यहाँ आयें, तो मैं अपने नेत्रों को सफल बनाने के लिए उनका एक बार दर्शन करना चाहता हूँ।
भट्टाचार्य कहे, तेंहो आसिबे अल्प-काले । रहिते ताँरे एक स्थान चाहिये विरले ॥
१९॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, श्री चैतन्य महाप्रभु शीघ्र ही लौट आयेंगे। मैं उनके लिए एक उत्तम स्थान चाहता हूँ, जो एकान्त तथा शान्त हो।
ठाकुरेर निकट, आर हइबे निर्जने । ए-मत निर्णय करि' देह' एक स्थाने ॥
२०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु का निवासस्थान एकान्त में हो तथा जगन्नाथ मन्दिर के निकट भी। आप इस प्रस्ताव पर विचार करें और उनके लिए एक अच्छा-सा स्थान दें।
राजा कहे,—ऐछे काशी-मिश्रेर भवन । ठाकुरेर निकट, हय परम निर्जन ॥
२१॥
राजा ने उत्तर दिया, आप जैसा चाहते हैं, काशी मिश्र का घर वैसा ही है। वह मन्दिर के निकट है और अत्यन्त निर्जन तथा शान्त भी है।
एत कहि' राजा रहे उत्कण्ठित हजा। भट्टाचार्य काशी-मिश्रे कहिल आसिया ॥
२२॥
यह कहकर राजा महाप्रभु के पुनरागमन के लिए अत्यन्त आतुर । उठे। तब सार्वभौम भट्टाचार्य काशी मिश्र के घर राजा की इच्छा त्यातला गये।
काशी-मिश्र कहे,—आमि बड़ भाग्यवान् । मोर गृहे 'प्रभु-पादेर' हबे अवस्थान ॥
२३॥
जब काशी मिश्र ने यह प्रस्ताव सुना तो उन्होंने कहा, मैं पर। भाग्यवान् हूँ कि समस्त प्रभुओं के स्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु मेरे घर । ठहरेंगे।
एइ-मत पुरुषोत्तम-वासी मृत जन । प्रभुके मिलिते सबार उत्कण्ठित मन ॥
२४॥
इस तरह जगन्नाथ पुरी अर्थात् पुरुषोत्तम के सारे निवासी श्री चैतन्य महाप्रभु से फिर से भेंट करने के लिए परम उत्सुक हो गये।
सर्व-लोकेर उत्कण्ठा ग्रबे अत्यन्त बाड़िल । महाप्रभु दक्षिण हैते तबहि आइल ॥
२५॥
जब जगन्नाथ पुरी के सारे निवासी पुनः महाप्रभु से भेंट करने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो गये, तभी महाप्रभु दक्षिण भारत से लौट आये।
शुनि' आनन्दित हैल सबाकार मन ।। सबे आसि' सार्वभौमे कैल निवेदन ॥
२६॥
महाप्रभु की वापसी के बारे में सुनकर सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न हुए और वे सभी लोग सार्वभौम भट्टाचार्य के पास जाकर इस प्रकार बोले।
प्रभुर सहित आमा-सबार कराह मिलने । तोमार प्रसादे पाइ प्रभुर चरण ॥
२७॥
।कृपा करके श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ हमारी भेंट कराने की व्यवस्था कर दें। आपकी कृपा के बल पर ही हमें महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त हो सकती है।
भट्टाचार्य कहे,—कालि काशी-मिश्रेर घरे । प्रभु ग्राइबेन, ताहाँ मिलाब सबारे ॥
२८॥
भट्टाचार्य ने लोगों से कहा, महाप्रभु कल काशी मिश्र के घर पर होंगे। तभी मैं आप लोगों की उनसे मिलने की व्यवस्था करूंगा।
आर दिन महाप्रभु भट्टाचार सङ्गे।।जगन्नाथ दरशन कैल महा-रङ्गे ॥
२९॥
अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु आ गये और वे बड़े ही उत्साहपूर्वक सार्वभौम भट्टाचार्य के साथ भगवान जगन्नाथ के मन्दिर में दर्शन करणे गये।
महाप्रसाद दिया ताहाँ मिलिला सेवक-गण ।महाप्रभु सबाकारे कैल आलिङ्गन ॥
३०॥
। भगवान जगन्नाथ के सारे सेवकों ने चैतन्य महाप्रभु को भगवान् का प्रसाद लाकर दिया। तब बदले में, चैतन्य महाप्रभु ने उन सबका आलिंगन किया।
दर्शन करि' महाप्रभु चलिला बाहिरे ।भट्टाचार्य आनिल ताँरै काशी-मिश्र-घरे ॥
३१॥
भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु मन्दिर से बाहर आ गये। फिर भट्टाचार्य उन्हें काशी मिश्र के घर ले गये।।
काशी-मिश्र आसि' पड़िल प्रभुर चरणे ।। गृह-सहित आत्मा ताँरे कैल निवेदने ॥
३२॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु काशी मिश्र के घर आये, तो वे तुरन्त उनके अरणकमलों पर गिर पड़े और उन्होंने स्वयं को तथा अपने सारे घर-बार को उनकी शरण में दे दिया।
प्रभु चतुर्भुज-मूर्ति ताँरै देखाइल । आत्मसात्करि' तारे आलिङ्गन कैले ॥
३३॥
तब महाप्रभु ने काशी मिश्र को अपना चतुर्भुज स्वरूप दिखलाया। महाप्रभु ने उसकी सेवा स्वीकार की और उसे गले लगाया।
तबे महाप्रभु ताहाँ वसिला आसने ।चौदिके वसिला नित्यानन्दादि भक्त-गणे ॥
३४॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने लिए तैयार किये गये आसन पर बैठ गये और नित्यानन्द प्रभु समेत सारे भक्तगण उनके चारों ओर बैठ गये।
सुखी हैला देखि' प्रभु वासार संस्थान ।। येइ वासाय हय प्रभुर सर्व-समाधान ॥
३५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निवासस्थान को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए, जिसमें उनकी सारी आवश्यकताओं को पूरा करने का ध्यान रखा गया था।
सार्वभौम कहे,—प्रभु, योग्य तोमार वासा । तुमि अङ्गीकार कर, काशी-मिश्रेर आशा ॥
३६॥
इसके बाद सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु की दाहिनी ओर बैठकर पुरुषोत्तम अर्थात् जगन्नाथ पुरी के सारे निवासियों का परिचय कराने लगे।।
प्रभु कहे,—एइ देह तोमा-सबाकार ।। ग्रेइ तुमि कह, सेइ सम्मत आमार ॥
३७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, 'यह मेरा शरीर आप सबका है। अतएव आप लोग जो भी कहेंगे, वह मुझे स्वीकार है।
तबे सार्वभौम प्रभुर दक्षिण-पश्र्थेि वसि' ।मिलाइते लागिला सब पुरुषोत्तम-वासी ॥
३८॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, “यह स्थान आपके अनुकूल है। कृपया इसे स्वीकार करें; ऐसी काशी मिश्र की आशा है।
एइ सब लोक, प्रभु, वैसे नीलाचले ।उत्कण्ठित हाछे सबे तोमा मिलिबारे ॥
३९॥
भट्टाचार्य ने कहा, “हे प्रभु, ये नीलाचल के सारे निवासी आपसे । मिलने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो रहे हैं।
तृषित चातक ग्रैछे करे हाहाकार । तैछे एइ सब,—सबे कर अङ्गीकार ॥
४०॥
। आपकी अनुपस्थिति में ये सारे लोग प्यासे चातकों की तरह निराश होकर रोदन कर रहे थे। कृपया इन्हें अपनी शरण में लें।
जगन्नाथ-सेवक एइ, नाम-जनार्दन । अनवसरे करे प्रभुर श्री-अङ्ग-सेवन ॥
४१॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने सर्वप्रथम जनार्दन का परिचय देते हुए कहा, यह भगवान जगन्नाथ का सेवक जनार्दन है। यह भगवान् की तब सेवा करता है, जब उनके दिव्य शरीर को नया बनाया जाता है।
कृष्णदास-नाम एइ सुवर्ण-वेत्र-धारी । शिखि माहाति-नाम एइ लिखनाधिकारी ॥
४२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने बतलाया, यह कृष्णदास है, जो सोने का एक दण्ड लिए रहता है और यह है शिखि माहिति जो लेखन अधिकारी प्रद्युम्न-मिश्र इँह वैष्णव प्रधान । जगन्नाथेर महा-सोयार इँह 'दास' नाम ॥
४३॥
यह प्रद्युम्न मिश्र है, जो सारे वैष्णवों का मुखिया है। यह जगन्नाथजी का महान् सेवक है और इसका नाम 'दास' है।
मुरारि माहाति ईंह–शिखि-माहातिर भाइ ।तोमार चरण विनु आर गति नाइ ॥
४४॥
यह शिखि माहिति का भाई मुरारि माहिती है। आपके चरणकमलों के अतिरिक्त इसका अन्य कोई आश्रय नहीं है।
चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण । विष्णुदास,—इँह ध्याये तोमार चरण ॥
४५ ॥
ये चन्दनेश्वर, सिंहेश्वर, मुरारि ब्राह्मण तथा विष्णुदास हैं। ये सभी निरन्तर आपके चरणकमलों का ध्यान करने में लगे रहते हैं।
प्रहरराज महापात्र इँह महा-मति ।। परमानन्द महापात्र इँहार संहति ॥
४६॥
ये परमानन्द प्रहरराज हैं, जो महापात्र नाम से भी जाने जाते हैं। ये अत्यधिक बुद्धिमान हैं।
ए-सब वैष्णव-एइ क्षेत्रेर भूषण । एकान्त-भावे चिन्ते सबे तोमार चरण ॥
४७॥
ये सारे शुद्ध भक्त जगन्नाथ पुरी के आभूषणों के समान सेवा करते हैं। ये सभी आपके चरणकमलों का अविचलित भाव से ध्यान करते हैं।
तबे सबे भूमे पड़े दण्डवत् हा ।सबा आलिङ्गिला प्रभु प्रसाद करिया ॥
४८॥
इस परिचय के बाद सारे लोग जमीन पर डण्डे की तरह गिर पड़े। श्री चैतन्य महाप्रभु ने हर एक पर कृपा करके उन सबका आलिंगन किया।
हेन-काले आइला तथा भवानन्द राय ।।चारि-पुत्रे-सङ्ग पड़े महाप्रभुर पाय ॥
४९।। तभी भवानन्द राय अपने चार पुत्रों के साथ आये और वे सभी श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े।
सार्वभौम कहे,——एइ राय भवानन्द ।।इँहार प्रथम पुत्र राय रामानन्द ॥
५०॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने आगे बतलाया, ये भवानन्द राय हैं, जिनके प्रथम पुत्र रामानन्द राय हैं।
तबे महाप्रभु ताँरे कैल आलिङ्गन ।स्तुति करि' कहे रामानन्द-विवरण ॥
५१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भवानन्द राय का आलिंगन किया और बड़े ही आदर के साथ उनके पुत्र रामानन्द राय का बखान किया।
रामानन्द-हेन रत्न झाँहार तनय ।। ताँहार महिमा लोके कहन ना ग्राय ॥
५२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भवानन्द राय का यह कहकर सम्मान किया, जिस व्यक्ति को रामानन्द राय जैसा पुत्र-रत्न हो, उसकी महिमा का वर्णन इस मर्त्यलोक में नहीं किया जा सकता।
साक्षात्पाण्डु तुमि, तोमार पत्नी कुन्ती । पञ्च-पाण्डव तोमार पञ्च-पुत्र महा-मति ॥
५३॥
आप साक्षात् महाराज पाण्डु हैं और आपकी पत्नी साक्षात् कुन्ती हैं। आपके सारे के सारे पुत्र अत्यन्त बुद्धिमान हैं, जो पाँचों पाण्डवों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
राय कहे,—आमि शूद्र, विषयी, अधम । तबु तुमि स्पर्श,—एइ ईश्वर-लक्षण ॥
५४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा की गई प्रशंसा सुनकर भवानन्द राय ने निवेदन किया, “मैं चार वर्षों में चौथा (शूद्र) हूँ और सांसारिक कार्यों में लगा रहने वाला प्राणी हूँ। मैं अत्यन्त पतित हूँ, फिर भी आपने मेरा स्पर्श किया। यह इसका प्रमाण है कि आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
निज-गृह-वित्त-भृत्य-पञ्च-पुत्र-सने ।।आत्मा समर्पिलें आमि तोमार चरणे ॥
५५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा की प्रशंसा करते हुए भवानन्द राय ने यह भी कहा, 'मैं अपने घर, धन, नौकरों तथा पाँचों पुत्र समेत आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ।
एइ वाणीनाथ रहिबे तोमर चरणे ।ग्रबे ग्रेइ आज्ञा, ताहा करिबे सेवने ॥
५६॥
। यह वाणीनाथ नामक मेरा पुत्र आपके चरणकमलों में रहकर आपके आदेशों का तुरन्त पालन करेगा और आपकी सेवा करता रहेगा।
आत्मीय-ज्ञाने मोरे सङ्कोच ना करिबे । येइ ग्रबे इच्छा, तबे सेइ आज्ञा दिबे ॥
५७॥
हे प्रभु, कृपया आप मुझे अपना सम्बन्धी (आत्मीय) समझें। आप जब भी जो चाहें, उसके लिए आदेश देने में तनिक भी संकोच नहीं करें।
प्रभु कहे,—कि सङ्कोच, तुमि नह पर ।।जन्मे जन्मे तुमि आमार सवंशे किङ्कर ॥
५८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भवानन्द राय की बात यह कहते हुए मान ली, मैं बिना संकोच के स्वीकार करता हूँ, क्योंकि आप पराये नहीं हैं। आप जन्म-जन्मांतर अपने परिवार सहित मेरे सेवक रहते आये हैं।
दिन-पाँच-सात भितरे आसिबे रामानन्द । ताँर सङ्गे पूर्ण हबे आमार आनन्द ॥
५९॥
पाँच-सात दिनों के ही भीतर श्री रामानन्द आने वाले हैं। ज्यों ही ये आ जायेंगे, हमारी सारी इच्छाएँ पूरी हो जायेंगी। मुझे उनके संग में अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता है।
एत बलि' प्रभु ताँरै कैल आलिङ्गन ।। ताँर पुत्र सब शिरे धरिल चरण ॥
६० ॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने भवानन्द का आलिंगन किया। फिर उन्होंने उनके पुत्रों के सिरों पर अपने चरणकमल रखे।
तबे महाप्रभु ताँरे घरे पाठाइल ।। वाणीनाथ-पट्टनायके निकटे राखिल ॥
६१॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने भवानन्द राय को उनके घर वापस भेज दिया और अपनी निजी सेवा में केवल वाणीनाथ पट्टनायक को रख लिया।
भट्टाचार्य सब लोके विदाय कराइल ।। तबे प्रभु काला-कृष्णदासे बोलाइल ॥
६२॥
फिर सार्वभौम भट्टाचार्य ने सभी लोगों से विदा होने के लिए कहा। तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने काला कृष्णदास को बुलवाया, जो उनके साथ दक्षिण भारत की यात्रा में गया था।
प्रभु कहे,—भट्टाचार्य, शुनह ईंहार चरित । दक्षिण गियाछिल ईंह आमार सहित ॥
६३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे भट्टाचार्य, जरा इस आदमी के चरा पर विचार कीजिये, जो मेरे साथ दक्षिण भारत गया था।
भट्टथारि-काछे गेला आमारे छाड़िया ।। भट्टथारि हैते इँहारे आनिहुँ उद्धारिया ॥
६४॥
इसने भट्टथारियों के साथ रहने के लिए मेरा संग छोड़ दिया था, किन्तु मैं उनकी संगति से बचाकर इसे यहाँ लाया हूँ।
एबे आमि इहाँ आनि' करिलाङ विदाय ।। ग्राहाँ इच्छा, ग्राह, आमा-सने नाहि आर दाय ॥
६५॥
मैं इसे यहाँ लाया हूँ, अतएव मैं इसे अब विदा कर रहा हूँ। अब वह जहाँ चाहे जा सकता है, क्योंकि मैं आगे इसके लिए उत्तरदायी नहीं हूँ।
एत शुनि' कृष्णदास कान्दिते लागिल ।।मध्याह्न करिते महाप्रभु चलि' गेल ॥
६६॥
यह सुनकर कि महाप्रभु ने उसका परित्याग कर दिया है, काला कृष्णदास रोने लगा। किन्तु महाप्रभु ने उसकी परवाह नहीं की और वे अपना दोपहर का भोजन करने तुरन्त चले गये।
नित्यानन्द, जगदानन्द, मुकुन्द, दामोदर ।।चारि-जने युक्ति तबे करिला अन्तर ॥
६७॥
इसके बाद नित्यानन्द प्रभु, जगदानन्द, मुकुन्द तथा दामोदर आदि अन्य भक्त किसी युक्ति पर विचार करने लगे।
गौड़-देशे पाठाइते चाहि एक-जन ।‘आइ'के कहिबे ग्राइ, प्रभुर आगमन ॥
६८॥
महाप्रभु के चारों भक्तों ने विचार किया, हमें ऐसा एक व्यक्ति चाहिए, जो बंगाल जाकर शचीमाता को श्री चैतन्य महाप्रभु के जगन्नाथ पुरी आने की सूचना दे सके।
अद्वैत-श्रीवासादि व्रत भक्त-गण ।सबेइ आसिबे शुनि' प्रभुर आगमन ॥
६९ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के आगमन का समाचार सुनकर अद्वैत तथा श्रीवास जैसे भक्त उन्हें मिलने के लिए निश्चित रूप से आना चाहेंगे।
एइ कृष्णदासे दिब गौड़े पाठात्रा । एत कहि' तारे राखिलेन आश्वासिया ॥
७० ॥
यह कहकर कि, कृष्णदास को हम बंगाल क्यों न भेज दें उन सबने कृष्णदास को महाप्रभु की सेवा में लगाये रखा और उसे आश्वस्त किया।
आर दिने प्रभु-स्थाने कैल निवेदन ।। आज्ञा देह' गौड़-देशे पाठाइ एक-जन ॥
७१॥
अगले दिन भक्तों ने श्री चैतन्य महाप्रभु से निवेदन किया, “कृपा करके एक व्यक्ति को बंगाल जाने की अनुमति प्रदान करें।
तोमार दक्षिण-गमन शुनि' शची ‘आइ' ।। अद्वैतादि भक्त सब आछे दुःख पाइ' ॥
७२॥
माता शची तथा अद्वैत प्रभु आदि भक्तगण दक्षिण भारत भ्रमण से आपके पुनरागमन का समाचार न पाकर अत्यन्त दुःखी हैं।
एक-जन ग्राइ' कहुक्शुभ समाचार ।। प्रभु कहे,—सेइ कर, ये इच्छा तोमार ॥
७३॥
एक व्यक्ति बंगाल जाकर उन्हें जगन्नाथ पुरी में आपके पुनरागमन का शुभ समाचार दे आये। यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आप लोग जो चाहें तय करें।
तबे सेइ कृष्णदासे गौड़े पाठाइल । वैष्णव-सबाके दिते महा-प्रसाद दिल ॥
७४॥
इस तरह काला कृष्णदास बंगाल भेज दिया गया और वहाँ बाँटे जाने के लिए उसे भगवान जगन्नाथ का पर्याप्त प्रसाद दे दिया गया।
तबे गौड़-देशे आइला काला-कृष्णदास ।। नवद्वीपे गेल तेह शची-आइ-पाश ॥
७५ ॥
तब काला कृष्णदास बंगाल गया, जहाँ सर्वप्रथम वह माता शची को मिलने नवद्वीप पहुँचा।
महा-प्रसाद दिया ताँरे कैले नमस्कार । दक्षिण हैते आइला प्रभु,—कहे समाचार ॥
७६॥
शची माता के पास पहुँचकर काला कृष्णदास ने प्रथम उन्हें नमस्कार किया और महाप्रसाद भेंट किया। फिर उसने यह शुभ समाचार दिया कि श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी दक्षिण भारत की यात्रा से लौट आये हैं।
शुनिया आनन्दित हैल शचीमातार मन ।। श्रीवासादि आर ग्रत व्रत भक्त-गण ॥
७७॥
इस शुभ समाचार से माता शची तथा श्रीवास ठाकुर इत्यादि नवद्वीप के सारे भक्तों को परम आनन्द हुआ।
शुनिया सबार हैल परम उल्लास । अद्वैत-आचार्य-गृहे गेला कृष्णदास ॥
७८ ॥
महाप्रभु की पुरी में वापसी सुनकर सभी लोग अत्यन्त हर्षित हुए। इसके बाद कृष्णदास अद्वैत आचार्य के घर गया।
आचार्येरे प्रसाद दिया करि' नमस्कार । सम्यक्कहिल महाप्रभुर समाचार ॥
७९॥
नमस्कार करने के बाद कृष्णदास ने अद्वैत आचार्य को महाप्रसाद दिया। फिर उसने उनसे महाप्रभु का समाचार विस्तार में बतलाया।
शुनि' आचार्य-गोसाजिर आनन्द हइल ।। प्रेमावेशे हुङ्कार बहु नृत्य-गीत कैल ॥
८०॥
जब अद्वैत आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु के लौट आने का समाचार सुना, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रेमावेश में आकर हुँकार की और बहुत देर तक नृत्य और कीर्तन करते रहे।
हरिदास ठाकुरेर हैल परम आनन्द ।।वासुदेव दत्त, गुप्त मुरारि, सेन शिवानन्द ॥
८१॥
। यह शुभ समाचार पाकर हरिदास ठाकुर परम प्रसन्न हुए। इसी तरह वासुदेव दत्त, मुरारि गुप्त तथा शिवानन्द सेन भी प्रसन्न हुए।
आचार्यरत्न, आर पण्डित वक्रेश्वर । आचार्यनिधि, आर पण्डित गदाधर ॥
८२॥
। इस शुभ समाचार से आचार्यरत्न, वक्रेश्वर पण्डित, आचार्यनिधि तथा गदाधर पण्डित सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्रीराम पण्डित आर पण्डित दामोदर । श्रीमान्पण्डित, आर विजय, श्रीधर ॥
८३॥
राघव पंडित, अद्वैत आचार्य का पुत्र तथा समस्त भक्तगण अत्यन्त प्रसन्न हुए। मैं कहाँ तक और भक्तों के नामों का वर्णन करूं? राघव-पण्डित, आर आचार्य नन्दन । कतेक कहिब आर ग्रत प्रभुर गण ॥
८४॥
राघव पंडित, अद्वैत आचार्य का पुत्र तथा समस्त भक्तगण अत्यन्त प्रसन्न हुए। मैं कहाँ तक और भक्तों के नामों का वर्णन करूं? शुनिया सबार हैल परम उल्लास ।।सबे मेलि' गेला श्री-अद्वैतेर पाश ॥
८५॥
। वे सभी अत्यन्त प्रसन्न थे, और सभी मिलकर अद्वैत आचार्य के घर आये।
आचार सबे कैले चरण वन्दन ।आचार्य-गोसाङि सबारे कैल आलिङ्गन ॥
८६॥
सारे भक्तों ने अद्वैत आचार्य के चरणकमलों पर नमस्कार किया, और अद्वैत आचार्य ने उन सबका आलिंगन किया।
दिन दुइ-तिन आचार्य महोत्सव कैल ।।नीलाचल ग्राइते आचार्य मुक्ति दृढ़ कैल ॥
८७॥
तब अद्वैत आचार्य ने एक उत्सव मनाया, जो दो-तीन दिनों तक चला। तत्पश्चात् उन सबने जगन्नाथ पुरी जाने का दृढ़ संकल्प किया।
सबे मेलि' नवद्वीपे एकत्र हो ।नीलाद्रि चलिल शचीमातार आज्ञा लञा ॥
८८॥
सारे भक्त नवद्वीप में एकत्र हुए और शची माता की आज्ञा लेकर नीलाद्रि अर्थात् जगन्नाथ पुरी के लिए चल दिये।
प्रभुर समाचार शुनि' कुलीन-ग्राम-वासी ।सत्यराज-रामानन्द मिलिला सबे आसि' ॥
८९॥
सत्यराज, रामानन्द तथा अन्य भक्त जो कुलीन ग्राम के निवासी थे, आकर अद्वैत आचार्य के साथ हो लिए।
मुकुन्द, नरहरि, रघुनन्दन खण्ड हैते ।।आचार ठाजि आइला नीलाचल ग्राइते ॥
९० ॥
मुकुन्द, नरहरि, रघुनन्दन तथा अन्य सब लोग खण्ड नामक स्थान से अद्वैत आचार्य के घर आये, जिससे वे उनके साथ जगन्नाथ पुरी जा सकें।
से-काले दक्षिण हैते परमानन्द-पुरी ।।गङ्गा-तीरे-तीरे आइला नदीया नगरी ॥
९१॥
। उसी समय परमानन्द पुरी दक्षिण भारत से आ गये। वे गंगा नदी के किनारे-किनारे यात्रा करते हुए अन्ततः नदिया नगरी पहुँचे।
आइर मन्दिरे सुखे करिला विश्राम ।।आई ताँरे भिक्षा दिली करिया सम्मान ॥
९२॥
नवद्वीप में परमानन्द पुरी ने शचीमाता के घर में ही अपना रहने और भोजन करने का स्थान बनाया। वे उन्हें हर वस्तु बड़े ही आदर के साथ देती थीं।
प्रभुर आगमन तेंह ताहाँजि शुनिल ।। शीघ्र नीलाचल ग्राइते ताँर इच्छा हैल ॥
९३॥
जब परमानन्द पुरी शचीमाता के घर पर रह रहे थे, तभी उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के जगन्नाथ पुरी लौटने का समाचार सुना। अतएव उन्होंने शीघ्रातिशीघ्र वहाँ जाने का निश्चय किया।
प्रभुर एक भक्त–‘द्विज कमलाकान्त' नाम । ताँरे ला नीलाचले करिला प्रयाण ॥
९४॥
वहाँ पर श्री चैतन्य महाप्रभु का एक भक्त था, जिसका नाम द्विज कमलाकान्त था, जिसे परमानन्द पुरी अपने साथ जगन्नाथ पुरी लेते गये।
सत्वरे आसिया नँह मिलिला प्रभुरे । प्रभुर आनन्द हैल पाञा तोहार ॥
९५॥
परमानन्द पुरी शीघ्र ही श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर आ पहुँचे। महाप्रभु उन्हें देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
प्रेमावेशे कैल ताँर चरण वन्दन ।।तँह प्रेमावेशे कैल प्रभुरे आलिङ्गन ॥
९६॥
महाप्रभु ने अत्यन्त प्रेमावेश में परमानन्द पुरी के चरणकमलों की पूजा की और परमानन्द पुरी ने भी महाप्रभु का प्रेमावेश में आलिंगन किया।
प्रभु कहे,—तोमा-सङ्गे रहिते वाञ्छा हय ।।मोरे कृपा करि' कर नीलाद्रि आश्रय ॥
९७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कृपया मेरे साथ रुकें और जगन्नाथ पुरी की शरण ग्रहण करके मेरे ऊपर कृपा करें।
पुरी कहे,—तोमा-सङ्गे रहिते वाञ्छा करि' ।गौड़ हैते चलि' आइलाङ नीलाचल-पुरी ॥
९८॥
परमानन्द पुरी ने कहा, मैं भी आप के साथ रहना चाहता हूँ। सीलिए मैं गौड़ देश (बंगाल) से जगन्नाथ पुरी आया हूँ।
दक्षिण हैते शुनि' तोमार आगमन ।शची आनन्दित, आर व्रत भक्त-गण ॥
१९॥
'नवद्वीप में माता शची तथा अन्य सारे भक्त दक्षिण भारत से आपका पुनरागमन सुनकर अत्यन्त आनन्दित हुए।
सबे आसितेछेन तोमारे देखिते ।।ताँ-सबार विलम्ब देखि' आइलाङ त्वरिते ॥
१०० ॥
वे सभी आपके दर्शन के लिए यहाँ आ रहे हैं। किन्तु जब मैंने देखा कि वे विलम्ब कर रहे हैं, तो मैं तुरन्त अकेले ही चला आया।
काशी-मिश्रर आवासे निभृते एक घर ।प्रभु ताँरै दिल, आर सेवार किङ्कर ॥
१०१॥
काशी मिश्र के घर में एक एकान्त कमरा था, जिसे श्री चैतन्य महाप्रभु ने परमानन्द पुरी को दे दिया। उन्होंने एक सेवक भी दिया।
आर दिने आइला स्वरूप दामोदर ।।प्रभुर अत्यन्त मर्मी, रसेर सागर ॥
१०२॥
अगले दिन स्वरूप दामोदर भी आ गये। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के घनिष्ठ मित्र थे और दिव्य रसों के सागर थे।
‘पुरुषोत्तम आचार्य' ताँर नाम पूर्वाश्रमे ।। नवद्वीपे छिला तेंह प्रभुर चरणे ॥
१०३॥
जब स्वरूप दामोदर श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण में नवद्वीप में निवास कर रहे थे, तब उनका नाम पुरुषोत्तम आचार्य था।
प्रभुर सन्यास देखि' उन्मत्त हा । सन्यास ग्रहण कैल वाराणसी गिया ॥
१०४॥
जब उन्होंने देखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास ग्रहण कर लिया है, तो पुरुषोत्तम आचार्य उन्मत्त हो उठे और संन्यास ग्रहण करने तुरन्त वाराणसी गये।
‘चैतन्यानन्द' गुरु ताँर आज्ञा दिलेन ताँरै ।।वेदान्त पड़िया पड़ाओ समस्त लोकेरे ॥
१०५॥
संन्यास के अन्त में उनके गुरु चैतन्यानन्द भारती ने उन्हें आदेश दिया, वेदान्त-सूत्र पढ़ो और अन्यों को इसकी शिक्षा दो।
परम विरक्त तेंह परम पण्डित ।।काय-मने आश्रियाछे श्री-कृष्ण-चरित ॥
१०६॥
स्वरूप दामोदर परम विरक्त तथा महान् पण्डित थे। उन्होंने आत्मा तथा मन से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण की।
‘निश्चिन्ते कृष्ण भजिब' एइ त' कारणे ।उन्मादे करिल तेह सन्यास ग्रहणे ॥
१०७॥
वे बिना किसी उपद्रव के श्रीकृष्ण की पूजा करने के लिए अत्यन्त उत्सुक रहते थे, इसीलिए प्रायः उन्मादावस्था में उन्होंने संन्यास स्वीकार कर लिया।
सन्यास करिला शिखा-सूत्र-त्याग-रूप ।। योग-पट्ट ना निल, नाम हैल ‘स्वरूप' ॥
१०८ ॥
संन्यास ग्रहण करने के बाद पुरुषोत्तम आचार्य ने नियमानुसार अपनी चोटी तथा जनेऊ तो त्याग दिये, किन्तु उन्होंने गेरुवा वस्त्र नहीं स्वीकार किया। उन्होंने संन्यासी पदवी भी नहीं स्वीकार की, अपितु नैष्ठिक ब्रह्मचारी बने रहे।
गुरु-ठाजि आज्ञा मागि' आइला नीलाचले ।।रात्रि-दिने कृष्ण-प्रेम-आनन्द-विह्वले ॥
१०९॥
अपने संन्यास-गुरु से आज्ञा लेकर स्वरूप दामोदर नीलाचल गये और वहाँ उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण ग्रहण की। फिर वे अहर्निश कृष्ण के प्रेम में आनन्दविह्वल होकर भगवान् की प्रेममयी सेवा में दिन रस का आस्वादन करने लगे।
पाण्डित्येर अवधि, वाक्य नाहि कारो सने ।निर्जने रहये, लोक सब नाहि जाने ॥
११०॥
। स्वरूप दामोदर पाण्डित्य की पराकाष्ठा थे, किन्तु वे किसी से एक शब्द भी नहीं बोलते थे। वे निर्जन स्थान में रहते थे और कोई यह नहीं जान सका कि वे कहाँ थे।
कृष्ण-रस-तत्त्ववेत्ता, देह—प्रेम-रूप ।साक्षात्महाप्रभुर द्वितीय स्वरूप ॥
१११॥
। श्री स्वरूप दामोदर साक्षात् प्रेमस्वरूप थे और कृष्ण-रस के ज्ञान को पूर्णतया जानने वाले थे। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के द्वितीय विस्तार के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि-रूप थे। ग्रन्थ, श्लोक, गीत केह प्रभु-पाशे आने ।।स्वरूप परीक्षा कैले, पाछे प्रभु शुने ॥
११२॥
। यदि कोई पुस्तक लिखता, श्लोक तथा गीत बनाता और उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष सुनाना चाहता, तो सर्वप्रथम स्वरूप दामोदर उनकी परीक्षा करते और फिर शुद्ध रूप में उसे महाप्रभु के सामने रखते। केवल तभी श्री चैतन्य महाप्रभु सुनने के लिए राजी होते।
भक्ति-सिद्धान्त-विरुद्ध, आर रसाभास ।।शुनिते ना हय प्रभुर चित्तेर उल्लास ॥
११३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु कभी-भी भक्ति के सिद्धान्तों के विरुद्ध पुस्तकें या श्लोक नहीं सुनना चाहते थे। वे रसाभास अर्थात् दिव्य रसों का अतिक्रमण भी नहीं सुनना चाहते थे।
अतएव स्वरूप आगे करे परीक्षण । शुद्ध हय व्रदि, प्रभुरे करा'न श्रवण ॥
११४॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी सारे साहित्य का परीक्षण यह जानने के लिए करते थे कि उनके निष्कर्ष सही हैं या नहीं। केवल तभी वे उसे श्री चैतन्य महाप्रभु को सुनाये जाने की अनुमति देते थे।
विद्यापति, चण्डीदास, श्री-गीत-गोविन्द ।।एइ तिन गीते करा'न प्रभुर आनन्द ॥
११५॥
श्री स्वरूप दामोदर विद्यापति तथा चण्डीदास के गीत तथा जयदेव गोस्वामी कृत श्री गीत गोविन्द पढ़ा करते थे। वे इन गीतों को गाकर श्री चैतन्य महाप्रभु को अत्यन्त आनन्दित किया करते थे।
सङ्गीते—गन्धर्व-सम, शास्त्रे बृहस्पति ।। दामोदर-सम आर नाहि महा-मति ॥
११६॥
। स्वरूप दामोदर गन्धर्वो के तुल्य दक्ष गायक थे और शास्त्र चर्चा में वे देवताओं के पुरोहित बृहस्पति के समान थे। अतएव यह निष्कर्ष निकलता है कि स्वरूप दामोदर जैसा कोई अन्य महापुरुष नहीं था।
अद्वैत-नित्यानन्देर परम प्रियतम ।श्रीवासादि भक्त-गणेर हय प्राण-सम ॥
११७॥
श्री स्वरूप दामोदर अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु को परम प्रिय थे, और वे श्रीवास ठाकुर आदि सभी भक्तजनों के प्राणों के तुल्य थे।
सेइ दामोदर आसि' दण्डवत् हैला ।चरणे पड़िया श्लोक पड़िते लागिला ॥
११८॥
। वही स्वरूप दामोदर जगन्नाथ पुरी आकर श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और नमस्कार करने के बाद उन्होंने एक श्लोक सुनाया।
हेलोडूनित-खेदया विशदया प्रोन्मीलदामोदयाशाम्यच्छास्त्र-विवादया रस-दया चित्तार्पितोन्मादया । शश्वद्भक्ति-विनोदया स-मदया माधुर्घ-मर्यादयाश्री-चैतन्य दयानिधे तक्या भूयादमन्दोदया ॥
११९॥
हे कृपा के सागर श्री चैतन्य महाप्रभु! आपकी शुभ कृपा जाग्रत हो, जो सभी प्रकार के भौतिक दुःखों को आसानी से भगाने वाली है। आपकी कृपा से हर वस्तु शुद्ध तथा आनन्दमय बन जाती है। निस्सन्देह, आपकी कृपा दिव्य आनन्द को जगाती है और भौतिक सुख को आच्छादित कर देती है। आपकी शुभ कृपा से विभिन्न शास्त्रों के मतभेद विनष्ट हो जाते हैं। आपकी शुभ कृपा दिव्य रसों को उंडेलती है, जिससे हृदय आनन्दमग्न हो जाता है। आपकी हर्ष से युक्त कृपा सदैव भक्ति को उद्दीप्त करती है और माधुर्य प्रेम को महिमान्वित करती है। आपकी अहैतुकी कृपा मेरे हृदय में दिव्य आनन्द को जाग्रत करे।
उठा महाप्रभु कैल आलिङ्गन ।दुइ-जने प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥
१२०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर को उनके पैरों पर खड़ा कर उनका आलिगंन किया। वे दोनों ही प्रेमावेश में अचेत हो गये।
कत-क्षणे दुइ जने स्थिर ग्रबे हैला ।तबे महाप्रभु ताँरै कहिते लागिला ॥
१२१॥
जब दोनों ने धैर्य-धारण किया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु कहने लगे।"
तुमि ग्रे आसिबे, आजि स्वप्नेते देखिल ।।भाल हैल, अन्ध ग्रेन दुइ नेत्र पाइल ॥
१२२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैंने सपने में देखा कि तुम आ रहे हो, अतएव यह अत्यन्त शुभ है। मैं तो अंधे व्यक्ति के समान था, किन्तु तुम्हारे आने से मुझे फिर से दृष्टि मिल गई है।
स्वरूप कहे,—प्रभु, मोर क्षम' अपराध । तीमा छाड़ि' अन्यत्र गेनु, करिनु प्रमाद ॥
१२३॥
स्वरूप ने कहा, हे प्रभु, कृपया आप मेरा अपराध क्षमा करें। मैंने अन्यत्र जाने के लिए आपका संग छोड़ दिया था, और यही मेरी सबसे बड़ी भूल थी।
तोमार चरणे मोर नाहि प्रेम-लेश ।। तोमा छाड़ि' पापी मुजि गेनु अन्य देश ॥
१२४॥
हे प्रभु, आपके चरणकमलों के प्रति मेरा रंचमात्र भी प्रेम नहीं है। यदि ऐसा होता, तो मैं दूसरे देश क्यों जाता? अतएव मैं सबसे बड़ा पापी व्यक्ति हूँ।
मुजि तोमा छाड़िल, तुमि मोरे ना छाड़िला ।।कृपा-पाश गले बान्धि' चरणे आनिला ॥
१२५॥
मैंने तो आपका साथ छोड़ दिया, किन्तु आपने मुझे नहीं छोड़ा। आपने अपनी कृपारूपी रस्सी से मेरे गले को बाँधकर पुनः मुझे अपने चरणकमलों पर वापस ला दिया है।
तबे स्वरूप कैल निताइर चरण वन्दन ।नित्यानन्द-प्रभु कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥
१२६॥
तब स्वरूप दामोदर ने नित्यानन्द प्रभु के चरणकमलों की वन्दना की और नित्यानन्द प्रभु ने प्रेमवश उनका आलिंगन किया।
जगदानन्द, मुकुन्द, शङ्कर, सार्वभौम । सबा-सङ्गे ग्रथा-योग्य करिल मिलन ॥
१२७॥
नित्यानन्द प्रभु की वन्दना करने के बाद स्वरूप दामोदर जगदानन्द, मुकुन्द, शंकर तथा सार्वभौम से यथायोग्य रीति से मिले।
परमानन्द पुरीर कैले चरण वन्दन । पुरी-गोसाजि ताँरे कैल प्रेम-आलिङ्गन ॥
१२८॥
स्वरूप दामोदर ने परमानन्द पुरी के चरणकमलों की भी वन्दना की और परमानन्द पुरी ने उलटकर प्रेमवश उनका आलिंगन किया।
महाप्रभु दिल ताँरे निभृते वासा-घर । जलादि-परिचय़ लागि' दिल एक किङ्कर ॥
१२९॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर को एक एकान्त निवासस्थान दे दिया और एक सेवक से कहा कि वह उन्हें पानी तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ देता रहे।
आर दिन सार्वभौम-आदि भक्त-सङ्गे।। वसिया आछेन महाप्रभु कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥
१३०॥
अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु सार्वभौम भट्टाचार्य इत्यादि भक्तों के साथ बैठकर कृष्ण-लीलाओं की चर्चाएँ करते रहे।
हेन-काले गोविन्देर हैल आगमन ।दण्डवत्करि' कहे विनय-वचन ॥
१३१॥
। उसी समय गोविन्द वहाँ आ गये। उन्होंने प्रणाम करने के बाद विनीत होकर इस प्रकार कहा।
ईश्वर-पुरीर भृत्य,–'गोविन्द' मोर नाम ।पुरी-गोसाजिर आज्ञाय आइनु तोमार स्थान ॥
१३२॥
मैं ईश्वर पुरी का सेवक हूँ। मेरा नाम गोविन्द है। मैं अपने गुरु की आज्ञा का पालन करके यहाँ आया हूँ।
सिद्ध-प्राप्ति-काले गोसाजि आज्ञा कैल मोरे ।कृष्ण-चैतन्य-निकटे रहि सेविह ताँहारे ॥
१३३॥
सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करने के लिए इस मर्त्यलोक से विदा होने के पूर्व ईश्वर पुरी ने मुझसे कहा कि मुझे श्री चैतन्य महाप्रभु के पास जाना चाहिए और उनकी सेवा करनी चाहिए।
काशीश्वर आसिबेन सब तीर्थ देखिया ।।प्रभु-आज्ञाय मुञि आइनु तोमा-पदे धाज्ञा ॥
१३४॥
काशीश्वर भी सारे तीर्थों का भ्रमण करने के बाद यहाँ आयेगा। किन्तु मैं तो अपने गुरु की आज्ञानुसार आपके चरणकमलों पर उपस्थित होने के लिए शीघ्र चला आया।"
गोसाजि कहिल, ‘पुरीश्वर' वात्सल्य करे मोरे । कृपा करि' मोर ठाजि पाठाइला तोमारे ॥
१३५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मेरे गुरु ईश्वर पुरी मुझ पर सदैव पिता जैसा स्नेह करते थे। इसीलिए उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपावश तुम्हें यहाँ भेजा है।
एत शुनि' सार्वभौम प्रभुरे पुछिल । पुरी-गोसाजि शूद्र-सेवक काँहे त' राखिल ॥
१३६॥
यह सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु से पूछा, ईश्वर पुरी ने शूद्र को सेवक के रूप में क्यों रखा? प्रभु कहे,—ईश्वर हय परम स्वतन्त्र ।ईश्वरेर कृपा नहे वेद-परतन्त्र ।। १३७।। । श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, 'भगवान् तथा मेरे गुरु ईश्वर पुरी दोनों ही पूर्ण स्वतन्त्र हैं। अतएव भगवान् तथा ईश्वर पुरी दोनों की कृपा किसी वैदिक नियम के अधीन नहीं है।
ईश्वरेर कृपा जाति-कुलादि ना माने ।विदुरेर घरे कृष्ण करिला भोजने ॥
१३८॥
'पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कृपा जाति-पाँति के बन्धन से सीमित नहीं रहती। यद्यपि विदुर शूद्र थे, किन्तु कृष्ण ने उनके घर भोजन किया।
स्नेह-लेशापेक्षा मात्र श्री-कृष्ण-कृपार । स्नेह-वश हञा करे स्वतन्त्र आचार ॥
१३९॥
भगवान् कृष्ण की कृपा एकमात्र स्नेह पर निर्भर है। केवल स्नेह के वशीभूत होकर कृष्ण स्वतन्त्र रूप से आचरण करते हैं।
मर्यादा हैते कोटि सुख स्नेह-आचरणे । परमानन्द हय ग्रार नाम-श्रवणे ॥
१४० ॥
फलस्वरूप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ स्नेह-आचरण मर्यादाआचरण की अपेक्षा लाखों गुना सुख प्रदान करने वाला है। भक्त भगवान् का पवित्र नाम सुनकर ही दिव्य आनन्द में मग्न हो जाता है।"
एत बलि' गोविन्देरे कैल आलिङ्गन ।। गोविन्द करिल प्रभुर चरण वन्दन ॥
१४१॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोविन्द का आलिंगन किया और गोविन्द ने भी महाप्रभु के चरणकमलों की वन्दना की।
प्रभु कहे,—भट्टाचार्य, करह विचार ।गुरुर किङ्कर हय मान्य से आमार ॥
१४२॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य से आगे कहा, “आप इस पर विचार करें। गुरु का सेवक मेरे लिए सदैव आदरणीय है।
ताँहारे आपन-सेवा कराइते ना युयाय । गुरु आज्ञा दियाछेन, कि करि उपाय ॥
१४३॥
अतएव यह उचित नहीं होगा कि गुरु का सेवक मेरी निजी सेवा करे। फिर भी मेरे गुरु ने यह आदेश दिया है। तो मैं क्या करूं? भट्ट कहे,—गुरुर आज्ञा हय बलवान् ।।गुरु-आज्ञा ना लङ्घिये, शास्त्र--प्रमाण ॥
१४४॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, “गुरु का आदेश अत्यन्त बलवान होता है और उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। यही प्रामाणिक शास्त्रों का आदेश है।
स शुश्रुवान्मातरि भार्गवेणपितुर्नियोगात्प्रहृतं द्विषद्वत् । प्रत्यगृहीदग्रज-शासनं तद्आज्ञा गुरूणां ह्यविचारणीया ॥
१४५॥
अपने पिता की आज्ञा पाकर परशुराम ने अपनी माता रेणुका को मार डाला, मानो वह कोई शत्रु रही हो। भगवान् रामचन्द्र के छोटे भाई लक्ष्मण यह सुनकर तुरन्त अपने बड़े भाई की सेवा में लगकर उनके आदेशों का पालन करने लगे। गुरु की आज्ञा का बिना किसी विचार के पालन किया जाना चाहिए।'
निर्विचारं गुरोराज्ञा मया कार्या महात्मनः ।श्रेयो ह्येवं भवत्याश्च मम चैव विशेषतः ॥
१४६॥
पिता जैसे महान् व्यक्ति की आज्ञा का पालन बिना विचारे करना चाहिए, क्योंकि ऐसी आज्ञा हम दोनों का सौभाग्य है। विशेषतया मेरे लिए सौभाग्य है। तबे महाप्रभु ताँरै कैल अङ्गीकार ।।आपन-श्री-अङ्ग-सेवाय दिल अधिकार ॥
१४७॥
सार्वभौम भट्टाचार्य के ऐसा कहने पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोविन्द का आलिंगन किया और उसे अपने शरीर की सेवा करने के लिए लगा लिया। प्रभुर प्रिय भृत्य करि' सबे करे मान ।सकल वैष्णवेर गोविन्द करे समाधान ॥
१४८॥
सभी व्यक्ति गोविन्द को श्री चैतन्य महाप्रभु का प्रियतम दास समझकर उसका सम्मान करते थे और गोविन्द सारे वैष्णवों की सेवा करता था तथा उनकी आवश्यकताओं का ध्यान रखता था।"
छोटे-बड़-कीर्तनीया दुइ हरिदास ।।रामाइ, नन्दाइ रहे गोविन्देर पाश ॥
१४९॥
बड़ा हरिदास तथा छोटा हरिदास, दोनों जो गायक (कीर्तनिये ) थे तथा रामाइ और नन्दाइ भी गोविन्द के साथ रहते थे।"
गोविन्देर सङ्गे करे प्रभुर सेवन ।गोविन्देर भाग्य-सीमा ना ग्राय वर्णन ॥
१५०॥
वे सभी श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा करने के लिए गोविन्द के साथ रहते थे। अतः कोई भी गोविन्द के सौभाग्य का अनुमान नहीं लगा सकता था।"
आर दिने मुकुन्द-दत्त कहे प्रभुर स्थाने ।ब्रह्मानन्द भारती आइला तोमार दरशने ॥
१५१॥
अगले दिन मुकुन्द दत्त ने श्री चैतन्य महाप्रभु को सूचना दी, आपके दर्शन हेतु ब्रह्मानन्द भारती आये हैं।"
आज्ञा देह' यदि ताँरै आनिये एथाइ ।प्रभु कहे,—गुरु तेंह, ग्राब ताँर ठाजि ॥
१५२॥
फिर मुकुन्द दत्त ने महाप्रभु से पूछा, क्या मैं उन्हें यहाँ ले आऊँ? तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, ब्रह्मानन्द भारती मेरे गुरुतुल्य हैं। अच्छा यही होगा कि मैं उनके पास जाऊँ।"
एत बलि' महाप्रभु भक्त-गण-सङ्गे । चलि' आइला ब्रह्मानन्द-भारतीर आगे ॥
१५३ ॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्तगण ब्रह्मानन्द भारती के समक्ष आये।"
ब्रह्मानन्द परियाछे मृग-चर्माम्बर । ताहा देखि' प्रभु दुःख पाइला अन्तर ॥
१५४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्त उनके निकट पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि वे मृगचर्म पहने थे। यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त दुःखी हुए।"
देखिया त छद्म कैल ग्रेन देखे नाजि ।। मुकुन्देरे पुछे, काहाँ भारती-गोसाजि ॥
१५५ ॥
ब्रह्मानन्द भारती को मृगचर्म के वेश में देखकर चैतन्य महाप्रभु ने ऐसा बहाना बनाया मानों वे उन्हें नहीं देख रहे हैं। इसके विपरीत उन्होंने मुकुन्द दत्त से कहा, मेरे गुरु ब्रह्मानन्द भारती कहाँ हैं?" मुकुन्द कहे,—एइ आगे देख विद्यमान । प्रभु कहे, तेह नहेन, तुमि अगेयान ॥
१५६ ॥
मुकुन्द दत्त ने उत्तर दिया, ये ब्रह्मानन्द भारती आपके समक्ष हैं। महाप्रभु ने कहा, तुम गलत कह रहे हो। ये ब्रह्मानन्द भारती नहीं हैं।
अन्येरे अन्य कह, नाहि तोमार ज्ञान ।।भारती-गोसाञि केने परिबेन चाम ॥
१५७॥
तुम किसी दूसरे की बात कर रहे होगे, क्योंकि निश्चित रूप से ये ब्रह्मानन्द भारती नहीं हैं। तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है। भला ब्रह्मानन्द भारती क्यों मृगचर्म पहनने लगे?" शुनि' ब्रह्मानन्द करे हृदये विचारे । मोर चर्माम्बर एइ ना भाय इँहारे ॥
१५८॥
जब ब्रह्मानन्द भारती ने यह सुना तो उन्होंने सोचा, मेरा मृगचर्म श्री चैतन्य महाप्रभु को अच्छा नहीं लग रहा है।"
भाल कहेन,—चर्माम्बर दम्भ लागि' परि । चर्माम्बर-परिधाने संसार ना तरि ॥
१५९॥
इस तरह अपनी त्रुटि स्वीकार करते हुए ब्रह्मानन्द भारती ने सोचा, उन्होंने ठीक ही कहा है। मैं इस मृगचर्म को केवल प्रतिष्ठा के लिए ही धारण करता हूँ। मैं केवल मृगचर्म पहनकर अज्ञान के सागर को पार नहीं कर सकता।
आजि हैते ना परिब एइ चर्माम्बर।।प्रभु बहिर्वास आनाइला जानिया अन्तर ॥
१६० ॥
। आज से मैं यह मृगचर्म धारण नहीं करूंगा। जैसे ही ब्रह्मानन्द भारती ने यह निश्चय किया, वैसे ही श्री चैतन्य महाप्रभु उनके मन की बात जान गये और उन्होंने तुरन्त ही संन्यासी के वस्त्र मँगा भेजे।"
चर्माम्बर छाड़ि' ब्रह्मानन्द परिल वसन ।।प्रभु आसि' कैल ताँर चरण वन्दन ॥
१६१॥
ज्योंही ब्रह्मानन्द भारती ने अपना मृगचर्म त्याग दिया और संन्यासी के वस्त्र पहन लिए, त्योंही श्री चैतन्य महाप्रभु ने आकर उनके चरणकमलों में नमस्कार किया।
भारती कहे,—तोमार आचार लोक शिखाइते ।पुनः ना करिबे नति, भय पाङ चित्ते ॥
१६२॥
ब्रह्मानन्द भारती ने कहा, आप अपने आचरण के द्वारा सामान्य जनता को शिक्षा देते हैं। मैं आपकी इच्छा के विरुद्ध कुछ भी नहीं करूँगा, अन्यथा आप मुझे नमस्कार भी नहीं करेंगे और मेरी उपेक्षा करोगे। मुझे इसी का डर है।"
साम्प्रतिक 'दुइ ब्रह्म' इहाँ 'चलाचल' ।जगन्नाथ–अचल ब्रह्म, तुमि त' सचल ॥
१६३॥
इस समय मुझे दो ब्रह्म दिख रहे हैं-एक ब्रह्म हैं भगवान जगन्नाथ जो गतिमान नहीं हैं और दूसरे ब्रह्म आप हैं, जो सचल हैं। भगवान् जगन्नाथ पूज्य अर्चाविग्रह हैं और वे अचल ब्रह्म हैं। किन्तु आप तो श्री चैतन्य महाप्रभु हैं और आप यहाँ-वहाँ चलते-फिरते रहते हैं। आप दोनों एक ही ब्रह्म अर्थात् भौतिक प्रकृति के स्वामी हैं, किन्तु आप दो भूमिकाएँ निभा रहे हैं-एक सचल की और दूसरी अचल की। इस तरह जगन्नाथ पुरी या पुरुषोत्तम में अब दो ब्रह्म निवास कर रहे हैं।"
तुमि–गौर-वर्ण, तेह-श्यामल-वर्ण ।दुइ ब्रह्मे कैल सब जगत्तारण ॥
१६४॥
। दोनों ब्रह्मों में से आप गोरे रंग के हो और दूसरे ब्रह्म भगवान जगन्नाथ साँवले हैं। किन्तु आप दोनों ही सारे जगत् का उद्धार कर रहे हैं।
प्रभु कहे,—सत्य कहि, तोमार आगमने ।दुइ ब्रह्म प्रकटिल श्री-पुरुषोत्तमे ॥
१६५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, “वास्तव में, सच्ची बात तो यह है कि आपकी उपस्थिति से जगन्नाथ पुरी में अब दो ब्रह्म हैं।
‘ब्रह्मानन्द' नाम तुमि–गौर-ब्रह्म 'चल' ।श्याम-वर्ण जगन्नाथ वसियाछेन ‘अचल' ॥
१६६॥
ब्रह्मानन्द तथा गौरहरि-दोनों ही सचल हैं, किन्तु श्याम-वर्ण वाले जगन्नाथ दृढ़ता से बैठे हैं और अचल हैं।"
भारती कहे, सार्वभौम, मध्यस्थ हा ।।इँहार सने आमार 'न्याय' बुझ' मन दिया ॥
१६७॥
ब्रह्मानन्द भारती ने कहा, हे सार्वभौम भट्टाचार्य, आप मेरे तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच इस तर्क में मध्यस्थ बनो।"
'व्याप्य' 'व्यापक'-भावे 'जीव'-'ब्रह्मे' जानि ।।जीव–व्याप्य, ब्रह्म–व्यापक, शास्त्रेते वाखानि ॥
१६८ ॥
ब्रह्मानन्द भारती ने कहा, जीव स्थानीय है, जबकि परम ब्रह्म सर्वव्यापक है। यह शास्त्रों का निर्णय है।"
चर्म घुचा कैल आमारे शोधन ।। दोंहार व्याप्य-व्यापकत्वे एइ त' कारण ॥
१६९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने मेरा मृगचर्म छुड़ाकर मुझे निर्मल बना दिया है। यह इसका प्रमाण है कि वे सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान हैं और मैं उनके अधीन हूँ।"
सुवर्ण-वर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।। सन्यास-कृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥
१७०॥
उनके शरीर का रंग सुनहला है और उनका सारा शरीर पिघले सोने जैसा है। उनके शरीर का अंग-प्रत्यंग सुडौल है तथा चन्दन से लेप किया हुआ है। संन्यास ग्रहण करके महाप्रभु सदैव सन्तुलित रहते हैं। वे हरे । कृष्ण मन्त्र के कीर्तन के अपने उद्देश्य में दृढ़ हैं और वे अपने द्वैत निर्णय तथा अपनी शान्ति में दृढ़ता से स्थित हैं।'" एइ सब नामेर इँह हय निजास्पद ।। चन्दनाक्त प्रसाद-डोर-श्री-भुजे अङ्गद ॥
१७१॥
विष्णुसहस्र-नाम-स्तोत्र के श्लोक में उल्लिखित सारे लक्षण श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में प्रकट हैं। उनकी भुजाएँ चन्दन-लेप एवं श्री जगन्नाथजी पर चढ़े डोरे से सुसज्जित हैं और ये उनके आभूषण-रूप कंकण हैं।"
भट्टाचार्य कहे,—भारती, देखि तोमार जय ।। प्रभु कहे,—ग्रेइ कह, सेइ सत्य हय ॥
१७२॥
यह सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य ने अपना निर्णय यह कहते हुए सुनाया, हे ब्रह्मानन्द भारती, मैं देख रहा हूँ कि आप विजयी हो। इस पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त उत्तर दिया, ब्रह्मानन्द भारती ने जो कुछ कहा है उसे मैं स्वीकार करता हूँ। यह मेरे लिए बिल्कुल सही है।"
गुरु-शिष्य-न्याये सत्य शिष्येर पराजय । भारती कहे,—एहो नहे, अन्य हेतु हय ॥
१७३॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने आपको शिष्य और ब्रह्मानन्द भारती को अपने गुरु के रूप में स्वीकार किया। तब उन्होंने कहा, यह शिष्य अपने गुरु से तर्क में निश्चय ही हार गया है। ब्रह्मानन्द भारती ने तुरन्त प्रतिवाद करते हुए कहा आपकी हार का कारण यह नहीं है। कारण कुछ दूसरा ही है।"
भक्त ठाजि हार' तुमि, ए तोमार स्वभाव । आर एक शुन तुमि आपन प्रभाव ॥
१७४॥
यह आपका स्वाभाविक गुण है कि आप अपने भक्तों के हाथों अपनी पराजय स्वीकार करते हैं। आपकी एक दूसरी भी महिमा है, जिसे आप सावधान होकर सुनो।"
आजन्म करिनु मुञि 'निराकार'-ध्यान । तोमा देखि' ‘कृष्ण' हैल मोर विद्यमान ॥
१७५ ॥
मैं जन्म से ही निर्विशेष ब्रह्म का ध्यान करता रहा हूँ, किन्तु जब से आपको देखा है, मुझे कृष्ण की पूरी-पूरी अनुभूति हो गई है।
कृष्ण-नाम स्फुरे मुखे, मने नेत्रे कृष्ण ।तोमाके तद्रूप देखि' हृदय सतृष्ण ॥
१७६॥
। ब्रह्मानन्द भारती कहते रहे, जब से मैंने आपको देखा है, तब से मैं । अपने मन में भगवान् कृष्ण की उपस्थिति का अनुभव कर रहा हूँ और उन्हें अपनी आँखों के सामने देख रहा हूँ। अब मैं भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहता हूँ। इसके अतिरिक्त, मैं अपने हृदय में आपको कृष्ण मानता हूँ, अतएव मैं आपकी सेवा करने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ।"
बिल्वमङ्गल कैल ग्रैछे दशा आपनार ।इहाँ देखि' सेइ दशा हइल आमार ॥
१७७॥
। बिल्वमंगल ठाकुर ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साक्षात्कार के लिए अपनी निर्विशेष अनुभूति त्याग दी। अब मैं देख रहा हूँ कि मेरी दशा भी उन्हीं जैसी हो रही है, क्योंकि अब यह बदल चुकी है।
अद्वैत-वीथी-पथिकैरुपास्याःस्वानन्द-सिंहासन-लब्ध-दीक्षाः ।। शठेन केनापि वयं हठेनदासी-कृता गोप-वधू-विटेन ॥
१७८ ॥
। ब्रह्मानन्द भारती इस निष्कर्ष पर पहुँचे, यद्यपि मैं अद्वैत मार्ग पर चलने वालों द्वारा पूजित था तथा योग पद्धति द्वारा आत्म-साक्षात्कार में दीक्षित था, किन्तु गोपियों से परिहास करने वाले एक चतुर बालक ने बलपूर्वक मुझे एक दासी के रूप में परिणत कर दिया है।"
प्रभु कहे,—कृष्णे तोमार गाढ़ प्रेमा हय । ग्राहाँ नेत्र पड़े, ताहाँ श्री कृष्ण स्फुरय ॥
१७९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, कृष्ण के प्रति आप में अगाध प्रेम है, अतएव आप जहाँ भी देखते हैं, आपकी कृष्ण-चेतना बढ़ती जाती है।"
भट्टाचार्य कहे, दोंहार सुसत्य वचन ।।आगे ग्रदि कृष्ण देन साक्षात्दरशन ॥
१८० ॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, आप दोनों के कथन सही हैं। कृष्ण अपनी कृपा के माध्यम से साक्षात् दर्शन देते हैं।"
प्रेम विना कभु नहे ताँर साक्षात्कार ।। इँहार कृपाते हय दरशन इँहार ॥
१८१॥
कृष्ण-प्रेम के बिना हम उनका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं कर सकते। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से ब्रह्मानन्द भारती को भगवान् का साक्षात्कार हो सका।"
प्रभु कहे,—'विष्णु' ‘विष्णु', कि कह सार्वभौम । ‘अति-स्तुति' हय एइ निन्दार लक्षण ॥
१८२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा,अरे सार्वभौम भट्टाचार्य, यह आप क्या कह रहे हैं? हे विष्णु! मुझे बचाओ! ऐसी स्तुति निन्दा का दूसरा रूप है।"
एत बलि' भारतीरे ला निज-वासा आइला ।भारती-गोसाजि प्रभुर निकटे रहिला ॥
१८३॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ब्रह्मानन्द भारती को अपने साथ अपने निवासस्थाने ले गये। उस क्षण से ब्रह्मानन्द भारती महाप्रभु के साथ रहने लगे।"
रामभद्राचार्य, आर भगवानाचार्य ।।प्रभु-पदे रहिला मुँहे छाड़ि' सर्व कार्य ॥
१८४॥
बाद में रामभद्र आचार्य तथा भगवान् आचार्य भी उनके साथ आ गये। वे अपने अपने उत्तरदायित्व को छोड़कर श्री चैतन्य महाप्रभु के आश्रय में रहे।"
काशीश्वर गोसाजि आइला आर दिने ।सम्मान करिया प्रभु राखिला निज स्थाने ।। १८५॥
अगले दिन काशीश्वर गोसांई भी आ गये। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका बड़ा सम्मान किया और वे भी उन्हीं के साथ रहने लगे।"
प्रभुके ला करा'न ईश्वर दरशन । आगे लोक-भिड़ सब करि' निवारण ॥
१८६॥
काशीश्वर महाप्रभु को जगन्नाथ मन्दिर के भीतर ले जाया करता था। वह भीड़ में महाप्रभु के आगे-आगे रहता और लोगों को दूर रखता, जिससे लोग उनका स्पर्श न कर सकें।"
ग्रत नद नदी ग्रैछे समुद्रे मिलय ।।ऐछे महाप्रभुर भक्त याहाँ ताहाँ हय ॥
१८७॥
जिस तरह सारी नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, उसी तरह देश के सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण में आने लगे।"
सबे आसि' मिलिला प्रभुर श्री-चरणे ।। प्रभु कृपा करि' सबाय राखिल निज स्थाने ॥
१८८॥
चूंकि सारे भक्त उनकी शरण में आने लगे, अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सब पर कृपा की और उन्हें अपने संरक्षण में रख लिया।"
एइ त कहिल प्रभुर वैष्णव-मिलन ।। इहा येइ शुने, पाय चैतन्य-चरण ॥
१८९॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ समस्त वैष्णवों के मिलन का वर्णन किया है। जो भी इस वर्णन को सुनता है, वह अन्ततः उनके चरणकमलों की शरण प्राप्त करता है।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१९०॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए तथा उनका अनुगमन करते हुए, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
