अध्याय इक्कीसवाँ: भगवान श्रीकृष्ण की ऐश्वर्य और मधुरता
अगत्येक-गतिं नत्वा हीनार्थाधिक-साधकम् ।श्री-चैतन्यं लिखाम्यस्य माधुर्यैश्वर्य-शीकरम् ॥
१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करते हुए मैं उनके ऐश्वर्य तथा माधुर्य के एक कणमात्र का वर्णन करता हूँ। वे आध्यात्मिक ज्ञान से रहित पतित बद्धात्माओं के लिए अत्यन्त हितकारी हैं और वे उन लोगों के लिए एकमात्र आश्रय हैं, जो जीवन के वास्तविक लक्ष्य को नहीं जानते।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैत आचार्य की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! सर्व स्वरूपेर धाम-परव्योम-धामे ।।पृथक्-पृथक् वैकुण्ठ सब, नाहिक गणने ॥
३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, भगवान् के सारे दिव्य रूप आध्यात्मिक आकाश में पाये जाते हैं। वे उस धाम में वैकुण्ठ लोकों की अध्यक्षता करते हैं, किन्तु उन वैकुण्ठ लोकों की कोई गणना नहीं है।
शत, सहस्र, अयुत, लक्ष, कोटी-योजन ।एक एक वैकुण्ठेर विस्तार वर्णन ॥
४॥
प्रत्येक वैकुण्ठ लोक की चौड़ाई आठ सौ, आठ हजार, अस्सी हजार, आठ लाख, आठ करोड़ मील है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक वैकुण्ठ लोक का विस्तार हमारी मापने की शक्ति के परे है।
सब वैकुण्ठ–व्यापक, आनन्द-चिन्मय ।पारिषद-षडैश्वर्य-पूर्ण सब हय ॥
५॥
प्रत्येक वैकुण्ठ लोक विस्तृत है और आध्यात्मिक आनन्द से निर्मित है। इसके सारे निवासी भगवान् के पार्षद हैं और उनमें स्वयं भगवान् जैसा ही पूर्ण ऐश्वर्य पाया जाता है। वैकुण्ठलोक इस तरह स्थित हैं।
अनन्त वैकुण्ठ एक एक देशे यार ।।सेड़ परव्योम-धामेर के करु विस्तार ॥
६ ॥
चूंकि सारे वैकुण्ठ लोक परव्योम के किसी एक एक कोने में स्थित हैं, अतः उसे परव्योम को कौन माप सकता है? अनन्त वैकुण्ठ-परव्योम ग्रार दल-श्रेणी ।।सर्वोपरि कृष्णलोक 'कर्णिकार' गणि ॥
७॥
परव्योम के आकार की तुलना कमल के फूल से की जाती है। इस फूल का सबसे ऊपरी भाग कर्णिका कहलाता है और उसी कर्णिको के भीतर कृष्ण का धाम है। इस आध्यात्मिक कमल फूल की पंखुड़ियाँ ही अनेक वैकुण्ठ लोक हैं।
एइ-मत घडू-ऐश्वर्य, स्थान, अवतार ।ब्रह्मा, शिव अन्त ना पाय-जीव कोन् छार ॥
८ ॥
प्रत्येक वैकुण्ठ लोक दिव्य आनन्द, पूर्ण ऐश्वर्य तथा स्थान से पूर्ण है और हर एक में अवतारों का निवास है। यदि ब्रह्माजी तथा शिवजी आध्यात्मिक आकाश तथा वैकुण्ठ लोकों की लम्बाई तथा चौड़ाई नहीं माप सकते, तो भला सामान्य जीव किस तरह उनकी कल्पना कर सकता है।
को वेत्ति भूमन्भगवन्यरात्मन्योगेश्वरोतीर्भवतस्त्रि-लोक्याम् । क्व वा कथं वा कति वा कदेति । विस्तारयन्क्रीड़सि ग्रोग-मायाम् ॥
९॥
हे परम पूर्ण! हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्! हे परमात्मा, समस्त योगशक्तियों के स्वामी! आपकी लीलाएँ इन संसारों में लगातार चलती रहती हैं, किन्तु इसका अनुमान कौन लगा सकता है कि आप कहाँ, कैसे, और कब अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं और अपनी लीलाएँ प्रकट कर रहे हैं? इन कार्यों के रहस्य को कोई नहीं समझ सकता।'
एइ-मत कृष्णेर दिव्य सद्गुण अनन्त ।। ब्रह्मा-शिव-सनकादि ना पाय याँर अन्त ॥
१०॥
कृष्ण के आध्यात्मिक गुण भी अनन्त हैं। ब्रह्माजी, शिवजी तथा चारों कुमार जैसे महापुरुष भी भगवान् के इन दिव्य गुणों का पार नहीं पा सकते।
गुणात्मनस्तेऽपि गुणान्विमातुं । हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य । कालेन त्रैर्वा विमिताः सु-कल्यैर्भू-पांशवः खे मिहिका द्यु-भासः ॥
११ ॥
भले ही समय आने पर बड़े बड़े वैज्ञानिक ब्रह्माण्ड के सारे परमाणुओं, आकाश के सारे नक्षत्रों तथा ग्रहों तथा बर्फ के सारे कणों की गणना कर लें, किन्तु उनमें से ऐसा कौन है, जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अनन्त दिव्य गुणों की गणना कर सके? वे समस्त जीवों के लाभ के लिए इस धरातल पर अवतरित होते हैं।'
ब्रह्मादि रहु सहस्र-वदने 'अनन्त' ।।निरन्तर गाय मुखे, ना पाय गुणेर अन्त ॥
१२॥
ब्रह्माजी की तो कोई बात ही नहीं, हजार सिर वाले भगवान् अनन्त भी भगवान् के दिव्य गुणों का पार नहीं पा सकते, यद्यपि वे निरन्तर उनका महिमागान करते रहते हैं।
नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते | माया-बलस्य पुरुषस्य कुतोऽवरा ग्रे ।। गायन् गुणान् दश-शतानने आदि-देवः ।शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम् ॥
१३॥
यदि मैं, ब्रह्मा तथा तुम्हारे बड़े भाई, महान् ऋषि तथा मुनि विविध शक्तियों से युक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का पार नहीं पा सकते, तो फिर उन्हें और कौन समझ सकता है? यद्यपि हजार फनों वाले भगवान् शेषनिरन्तर उनके दिव्य गुणों का कीर्तन करते हैं, फिर भी वे भगवान् के कार्यकलापों का अभी तक पार नहीं पा सके हैं।'
सेहो रहु—सर्वज्ञ-शिरोमणि श्री-कृष्ण ।।निज-गुणेर अन्त ना पाजा हयेन सतृष्ण ॥
१४॥
अनन्तदेव को भी जाने दें, स्वयं भगवान् कृष्ण भी अपने दिव्य गुणों का अन्त नहीं पा सकते। निश्चय ही, वे स्वयं उन्हें जानने के लिए सदैव उत्सुक रहते हैं।
द्यु-पतय एव ते न य॒युरन्तमनन्ततयात्वमपि ग्रदन्तराण्ड-निचया ननु सावरणाः । ख इव रजांसि वान्ति वयसा सह ग्रच्छूतयस्त्वयि हि फलन्त्यतन्निरसनेन भवन्निधनाः ॥
१५ ॥
हे प्रभु, आप अनन्त हैं। ब्रह्माजी समेत उच्चतर ग्रह-मण्डलों के प्रमुख आधिष्ठाता देवता भी आपका पार नहीं पा सकते। न ही स्वयं आप अपने गुणों की सीमा पा सकते हैं। आकाश में परमाणुओं की तरह सात आवरणों से युक्त असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और वे सब कालक्रमानुसार घूम रहे हैं। वेदविद्या में निपुण सारे लोग भौतिक तत्त्वों को हटाते हुए आपको खोज रहे हैं। इस तरह लगातार खोज करते हुए वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आपमें हर वस्तु पूर्ण है। इस तरह आप हर वस्तु के आश्रय हैं। यह समस्त वैदिक पण्डितों का निष्कर्ष है।'
सेह रहु व्रजे ग्रबे कृष्ण अवतार । ताँर चरित्र विचारिते मन ना पाय पार ॥
१६॥
इन सारे तर्को, न्याय, नकारात्मक अथवा सकारात्मक प्रक्रियाओं से अलग जब वृन्दावन में कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में। विद्यमान थे, तब उनके लक्षणों तथा कार्यकलापों का अध्ययन करके कोई उनकी शक्तियों का पार नहीं पा सका।
प्राकृताप्राकृत सृष्टि कैला एक-क्षणे ।। अशेष-वैकुण्ठाजाण्ड स्व-स्व-नाथ-सने ॥
१७॥
भगवान् ने वृन्दावन में समस्त भौतिक तथा आध्यात्मिक लोकों की रचना क्षण-भर में कर दी। उन सबकी सृष्टि उनके अधिष्ठाताओं समेत की गई।
ए-मत अन्यत्र नाहि शुनिये अद्भुत । याहार श्रवणे चित्त हुये अवधूत ॥
१८॥
हमें ऐसी अद्भुत बातें अन्यत्र सुनाई नहीं पड़तीं। उन घटनाओं के श्रवण मात्र से मनुष्य का चित्त उत्तेजित होकर विमल हो जाता है।
कृष्ण-वत्सैरसङ्ख्यातैः–शुकदेव-वाणी ।।कृष्ण-सङ्गे कत गोप–सङ्ख्या नाहि जानि ॥
१९॥
शुकदेव गोस्वामी के अनुसार कृष्ण के पास अनन्त बछड़े तथा ग्वालबाल थे। उनकी सही-सही संख्या कोई नहीं गिन सकता था।
एक एक गोप करे ये वत्स चारण । कोटि, अर्बुद, शङ्ख, पद्म, ताहार गणन ॥
२० ॥
हर ग्वालबाल करोड़, अर्बुद, शंख तथा पद्म तक की गिनती में बछड़े चरा रहा था। उनकी गणना की यही विधि है।
वेत्र, वेणु, दल, शृङ्ग, वस्त्र, अलङ्कार । गोप-गणेर व्रत, तार नाहि लेखा-पार ॥
२१॥
सारे ग्वालबालों के पास असंख्य बछड़े थे। इसी तरह उनकी छड़ियाँ, बाँसुरियाँ, कमल के फूल, सींग के बाजे, वस्त्र तथा आभूषणभी असंख्य थे। उनके विषय में लिखकर उनकी संख्या सीमित नहीं की जा सकती।
सबे हैला चतुर्भुज वैकुण्ठेर पति ।।पृथक्-पृथक् ब्रह्माण्डेर ब्रह्मा करे स्तुति ॥
२२॥
तब सारे ग्वालबाल वैकुण्ठपति चतुर्भुज नारायण बन गये, और विभिन्न ब्रह्माण्डों के पृथक्-पृथक् ब्रह्मा उन भगवानों की स्तुति करने लगे।
एक कृष्ण-देह हैते सबार प्रकाशे । क्षणेके सबाइ सेइ शरीरे प्रवेशे ॥
२३॥
ये सारे दिव्य शरीर कृष्ण के ही शरीर से उद्भूत हुए और क्षण-भर में ही वे सभी पुनः उनके शरीर में प्रवेश कर गये।
इहा देखि' ब्रह्मा हैला मोहित, विस्मित ।। स्तुति करि' एइ पाछे करिला निश्चित ॥
२४॥
जब इस ब्रह्माण्ड के ब्रह्मा ने यह लीला देखी, तो वे आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने स्तुति करने के बाद यह निर्णय किया।
ये कहे ‘कृष्णेर वैभव मुजि सब जानों' ।। से जानुक, काय-मने मुञि एइ मानों ॥
२५॥
ब्रह्मा ने कहा, 'यदि कोई कहता है कि वह कृष्ण के ऐश्वर्यों के विषय में सब कुछ जानता है, तो वह भले ही ऐसा सोचता रहे। किन्तु जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं तो अपने शरीर तथा मन से इस तरह मानता हूँ।
एइ ये तोमार अनन्त वैभवामृत-सिन्धु ।। मोर वाङ्मनो-गम्य नहे एक बिन्दु ॥
२६॥
हे प्रभु, आपका वैभव असीम अमृत सागर के समान है। मैं मौखिक रूप से या मानसिक रूप से इस सागर की एक बूंद का भी अनुभव नहीं कर सकता हूँ।
जानन्त एवं जानन्तु किं बहूक्त्या न में प्रभो ।। मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः ॥
२७॥
ऐसे लोग भी हैं, जो यह कहते हैं कि, मैं कृष्ण के विषय में सब जानता हूँ। उन्हें ऐसा सोचने दें। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं इस विषय में अधिक नहीं कहना चाहता। हे प्रभु, मुझे इतना ही कहने दें। जहाँ तक आपके वैभव का सम्बन्ध है, वे मेरे मन, शरीर तथा शब्दों की पहुँच के बाहर हैं।'
कृष्णेर महिमा रहु केबा तार ज्ञाता ।वृन्दावन-स्थानेर देख आश्चर्य विभुता ॥
२८॥
भगवान् कृष्ण की महिमा बनी रहे! भला उन सबसे अवगत कौन हो सकता है? उनके धाम वृन्दावन में अनेक अद्भुत वैभव हैं। कृपया उन्हें देखने का प्रयत्न तो करें।
षोल-क्रोश वृन्दावन,शास्त्रेर प्रकाशे ।।तार एक-देशे वैकुण्ठाजाण्ड-गण भासे ॥
२९॥
प्रामाणिक शास्त्रों के कथन के अनुसार वृन्दावन सोलह कोस तक (३२ मील) फैला हुआ है। फिर भी सारे वैकुण्ठ लोक तथा असंख्य ब्रह्माण्ड इस क्षेत्र के एक कोने में ही स्थित हैं।
अपार ऐश्वर्य कृष्णेर–नाहिक गणन ।शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दरशन ॥
३०॥
कृष्ण के ऐश्वर्य का अनुमान लगा पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। वह असीम है। फिर भी जिस तरह वृक्ष की शाखाओं से होकर चन्द्रमा दिखता है, उसी तरह मैं संकेत मात्र करना चाहता हूँ।
ऐश्वर्य कहिते स्फुरिल ऐश्वर्य-सागर ।मनेन्द्रिय डुबिला, प्रभु हइला फाँपर ॥
३१ ॥
कृष्ण के दिव्य ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु के मन में ऐश्वर्य का सागर लहराने लगा और उनका मन तथा उनकी इन्द्रियाँ उसी सागर में निमग्न हो गईं। इस तरह वे विक्षुब्ध हो उठे।
भागवतेर ऐइ श्लोक पड़िला आपने ।।अर्थ आस्वादिते सुखे करेन व्याख्याने ॥
३२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीमद्भागवत का निम्नलिखित श्लोक स्वयं | सुनाया और इसके अर्थ के आस्वादन के लिए वे स्वयं ही इसकी व्याख्या करने लगे।
स्वयं त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीशः।स्वाराज्य-लक्ष्म्याप्त-समस्त-कामः । बलिं हरद्भिश्चिर-लोक-पालैःकिरीट-कोटीड़ित-पाद-पीठः ॥
३३॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण तीनों लोकों तथा तीन प्रमुख देवताओं ( ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव) के स्वामी हैं। कोई न तो उनके तुल्य है, न उनसे बढ़कर है। उनकी सारी इच्छाएँ उनकी आध्यात्मिक शक्तिद्वारा जो स्वराज्य लक्ष्मी के नाम से जानी जाती है, पूरी होती हैं। सारे लोकों के अधिष्ठाता देव पूजा के समय अपना अपना कर चुकाते हैं तथा भेटें प्रदान करते समय अपने मुकुटों से भगवान् के चरणकमलों का स्पर्श करते हैं। इस प्रकार वे उन भगवान् की स्तुति करते हैं।'
परम ईश्वर कृष्ण स्वयं भगवान् ।।ताते बड़, ताँर सम केह नाहि आन ॥
३४॥
कृष्ण आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं; अतएव वे सबसे महान् हैं। न तो कोई उनके बराबर है, न कोई उनसे बढ़कर है।
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः ।। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्व-कारण-कारणम् ॥
३५॥
गोविन्द नाम से विख्यात कृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीरशाश्वत, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक है। वे सबके उद्गम हैं। समस्त कारणों के कारण होने से उनका कोई अन्य उद्गम नहीं है।
ब्रह्मा, विष्णु, हर,—एइ सृष्ट्यादि-ईश्वर ।तिने आज्ञाकारी कृष्णेर, कृष्ण–अधीश्वर ॥
३६ ।। इस भौतिक सृष्टि के मुख्य अधिष्ठाता देव ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव हैं। फिर भी वे केवल भगवान् कृष्ण के आदेशों का पालन करते हैं, क्योंकि कृष्ण उन सबके स्वामी हैं।
सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः ।।विश्वं पुरुष-रूपेण परिपाति त्रि-शक्ति-धृक् ॥
३७॥
[ ब्रह्माजी ने कहा :‘पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की इच्छानुसार मैं सृजन करता हूँ, शिवजी विनाश करते हैं और वे स्वयं क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में भौतिक प्रकृति के सारे कार्यकलापों का पालन करतेहैं। इस तरह भगवान् विष्णु भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के परम नियन्ता हैं।
ए सामान्य, अधीश्वरेर शुन अर्थ आर ।जगत्कारण तिन पुरुषावतार ॥
३८ ॥
यह तो एक सामान्य विवरण मात्र है। अब कृपया त्र्यधीश का दूसरा अर्थ समझने का प्रयास करें। विष्णु के तीन पुरुष अवतार भौतिक सृष्टि के मूल कारण हैं।
महा-विष्णु, पद्मनाभ, क्षीरोदक-स्वामी ।एइ तिन--स्थूल-सूक्ष्म-सर्व-अन्तर्यामी ॥
३९ ॥
महाविष्णु, पद्मनाभ तथा क्षीरोदकशायी विष्णु, ये तीनों ही समस्त स्थूल तथा सूक्ष्म अस्तित्व के परमात्मा हैं।
एइ तिन--सर्वाश्रय, जगतीश्वर ।एहो सब कला-अंश, कृष्ण-अधीश्वर ॥
४० ॥
यद्यपि महाविष्णु, पद्मनाभ तथा क्षीरोदकशायी विष्णु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के आश्रय तथा अधीश्वर (नियन्ता ) हैं, फिर भी वे कृष्ण के पूर्ण अंश या पूर्ण अंश के भी अंश हैं। अतएव वे आदि भगवान् हैं।
यस्यैक-निश्वसित-कालमथावलम्ब्यजीवन्ति लोम-विल-जा जगदण्ड-नाथाः । विष्णुर्महान्स इह ग्रस्य कला-विशेषोगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥
४१॥
ब्रह्मा तथा संसारों के अन्य स्वामी महाविष्णु के रोमकूपों से प्रकट होते हैं और उनके एक निश्वास की अवधि तक जीवित रहते हैं। मैं आदि भगवान् गोविन्द की वन्दना करता हूँ, क्योंकि महाविष्णु इनके पूर्ण अंश के अंश हैं।'
एइ अर्थ—मध्यम, शुन 'गूढ़ अर्थ आर ।।तिन आवास-स्थान कृष्णेर शास्त्रे ख्याति ग्रार ॥
४२॥
यह तो मध्यम अर्थ है। अब इसका गुह्य अर्थ सुनो। भगवान् कृष्ण के तीन निवासस्थान हैं, जो प्रामाणिक शास्त्रों से भलीभाँति जाने जाते हैं ‘अन्त:पुर'-गोलोक-श्री-वृन्दावन ।।याहाँ नित्य-स्थिति माता-पिता-बन्धु-गण ॥
४३॥
अन्तरंग आवास (अन्तःपुर) गोलोक वृन्दावन कहलाता है। यहीं पर Fष्ण के अपने सखा, पार्षद, पिता तथा माता रहते हैं।
मधुरैश्वर्य-माधुर्घ-कृपादि-भाण्डार ।।योगमाया दासी ग्राहाँ रासादि लीला-सारे ॥
४४॥
वृन्दावन कृष्ण की कृपा का एवं माधुर्य-प्रेम के मधुर वैभव का भण्डार है। यहीं पर आध्यात्मिक शक्ति दासी बनकर समस्त लीलाओं के मार रासनृत्य का प्रदर्शन करती है।
करुणा-निकुरम्ब-कोमले | मधुरैश्वर्य-विशेष-शालिनि । जयति व्रज-राज-नन्दने। न हि चिन्ता-कणिकाभ्युदेति नः ॥
४५ ॥
परमेश्वर की कृपा के कारण वृन्दावन धाम अत्यन्त कोमल है और माधुर्य-प्रेम के कारण यह विशेष रूप से ऐश्वर्ययुक्त है। यहाँ पर महाराज नन्द के पुत्र की दिव्य महिमाओं का प्रदर्शन होता है। ऐसी दशा में हमारे भीतर थोड़ी-सी भी चिन्ता उत्पन्न नहीं होती।'" तार तले परव्योम-विष्णुलोक'-नाम ।नारायण-आदि अनन्त स्वरूपेर धाम ॥
४६॥
वृन्दावन लोक के नीचे परव्योम है, जो विष्णु-लोक कहलाता है। यहाँ पर असंख्य वैकुण्ठ लोक हैं, जिनका नियन्त्रण नारायण तथा कृष्ण के अन्य असंख्य विस्तारों द्वारा किया जाता है।
‘मध्यम-आवास' कृष्णेर-घडू-ऐश्वर्य-भाण्डार ।अनन्त स्वरूपे याहाँ करेन विहार ॥
४७॥
परव्योम जो कि छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण है, भगवान् कृष्ण का मध्यम आवास है। यहीं पर कृष्ण के अनन्त रूप अपनी लीला का विलास करते हैं।
अनन्त वैकुण्ठ याहाँ भण्डार-कोठरि ।। पारिषद-गणे षडू-ऐश्वर्ये आछे भरि' ॥
४८॥
यहाँ पर असंख्य वैकुण्ठ लोक हैं, जो कोषागार की विभिन्न कोठरियों के समान हैं और समस्त ऐश्वर्यों से पूरित हैं। इन असंख्य लोकों में छः ऐश्वर्यों से समृद्ध कृष्ण के नित्य संगी बसते हैं।
गोलोक-नाम्नि निज-धाम्नि तले च तस्य । देवी-महेश-हरि-धामसु तेषु तेषु ।। ते ते प्रभाव-निचया विहिताश्च येन ।गोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥
४९॥
गोलोक वृन्दावन धाम के नीचे देवी-धाम, महेश-धाम तथा हरिधाम नामक लोक हैं। वे विभिन्न प्रकार से ऐश्वर्यपूर्ण हैं। उनकी व्यवस्था आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द द्वारा की जाती है। मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ।
प्रधान-परम-व्योम्नोरन्तरे विरजा नदी ।।वेदाङ्ग-स्वेद-जनितैस्तोयैः प्रस्राविता शुभा ॥
५०॥
आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों के बीच विरजा नदी है। यह जल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वेदाङ्ग के शरीर से निकले पसीने से उत्पन्न है। इस प्रकार यह नदी प्रवाहित होती है।
तस्याः पारे पर-व्योम त्रि-पाद्भूतं सनातनम् । अमृत शाश्वते नित्यमनन्तं परमं पदम् ॥
५१॥
विरजा नदी से आगे आध्यात्मिक प्रकृति है, जो अखंड, नित्य, अव्यय तथा असीम है। यह परम धाम है, जहाँ भगवान् का तीन चौथाई ऐश्वर्य विद्यमान है। यह परव्योम अर्थात् आध्यात्मिक आकाश कहलाता है।
तार तले 'बाह्यावास' विरजार पार ।। अनन्त ब्रह्माण्ड माहाँ कोठरि अपार ॥
५२॥
विरजा नदी के उस पार बाह्य आवास है, जो अनन्त ब्रह्माण्डों से पूर्ण है और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में असंख्य प्रकार के आवास हैं।
‘देवी-धाम' नाम तार, जीव ग्रार वासी । जगल्लक्ष्मी राखि' रहे ग्राहाँ माया दासी ॥
५३॥
बहिरंगा शक्ति का आवास देवी-धाम कहलाता है और इसके निवासी बद्धात्माएँ हैं। यहीं पर भौतिक शक्ति दुर्गा अनेक ऐश्वर्यशाली दासियों के साथ निवास करती हैं।
एइ तिन धामेर हय कृष्ण अधीश्वर ।।गोलोक-परव्योम–प्रकृतिर पर ॥
५४॥
कृष्ण सारे धामों के परम स्वामी हैं, जिनमें गोलोक-धाम, वैकुण्ठ धाम तथा देवी-धाम सम्मिलित हैं। परव्योम तथा गोलोक-धाम इस भौतिक जगत् देवी-धाम से परे हैं।
चिच्छक्ति-विभूति-धाम–त्रिपादैश्वर्य-नाम । मायिक विभूति-एक-पाद अभिधान ॥
५५॥
आध्यात्मिक जगत् को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शक्ति तथा ऐश्वर्य को तीन चौथाई भाग ( त्रिपाद) माना जाता है, जबकि यह भौतिक जगत् केवल एक चौथाई ( एक पाद) शक्ति होता है। यही हमारी जानकारी है।
त्रि-पाद्विभूतेर्धामत्वात्रि-पाद्भूतं हि तत्पदम् । विभूतिमयिकी सर्वा प्रोक्ता पादात्मिका ग्रतः ॥
५६॥
चूँकि आध्यात्मिक जगत् भगवान् की तीन चौथाई शक्ति से बना है, इसलिए यह त्रिपादभूत कहलाता है। भौतिक जगत् भगवान् की एक चौथाई शक्ति से बना होने के कारण एकपाद कहलाता है।'
त्रिपाद-विभूति कृष्णेर–वाक्य-अगोचर । एक-पाद विभूतिर शुनह विस्तार ॥
५७॥
भगवान् की तीन चौथाई शक्ति हमारी वर्णन शक्ति के परे है। अतः उनकी शेष एक चौथाई शक्ति के विषय में विस्तार से सुनें।
अनन्त ब्रह्माण्डेर व्रत ब्रह्मा-रुद्र-गण ।चिर-लोक-पाल-शब्दे ताहार गणन ॥
५८॥
वास्तव में ब्रह्माण्डों की वास्तविक संख्या का पता लगा पाना बहुत कठिन है। प्रत्येक ब्रह्माण्ड के अपने-अपने ब्रह्मा तथा शिव होते हैं, जो चिर लोकपाल कहलाते हैं। इसलिए इनकी भी कोई गिनती नहीं है।
एक-दिन द्वारकाते कृष्ण देखिबारे ।।ब्रह्मा आइला,—द्वार-पाल जानाइल कृष्णेरे ॥
५९॥
एक बार जब कृष्ण द्वारका में राज्य कर रहे थे, तब ब्रह्माजी उन्हें मिलने आये और द्वारपाल ने तुरन्त ही कृष्ण को ब्रह्माजी के आगमन की जानकारी दी।
कृष्ण कहेन'को ब्रह्मा, कि नाम ताहार?' । द्वारी आसि' ब्रह्मारे पुछे आर बार ॥
६०॥
जब कृष्ण को यह बताया गया, तो उन्होंने तुरन्त ही द्वारपाल से पूछा, 'कौन से ब्रह्मा? उनका नाम क्या है?' अतः द्वारपाल लौट गया और उसने ब्रह्मा से पूछा।
विस्मित हा ब्रह्मा द्वारीके कहिला । ‘कह गिया सनक-पिता चतुर्मुख आइला' ॥
६१ ॥
जब द्वारपाल ने पूछा, 'कौन से ब्रह्मा?' तो ब्रह्मा को आश्चर्य हुआ। उन्होंने द्वारपाल से कहा, 'जाकर भगवान् कृष्ण को सूचित करो कि चारों कुमारों के पिता चतुर्मुख ब्रह्मा आये हैं।
कृष्णे जानाजा द्वारी ब्रह्मारे लञा गेला ।।कृष्णेर चरणे ब्रह्मा दण्डवत् कैला ॥
६२॥
तब द्वारपाल ने भगवान् कृष्ण से ब्रह्मा का विवरण बतलाया और भगवान् कृष्ण ने उसे आज्ञा दी कि उन्हें भीतर आने दिया जाए। द्वारपाल ब्रह्मा को भीतर ले गया और ज्योंही ब्रह्मा ने भगवान् कृष्ण को देखा, उन्होंने उनके चरणकमलों में नमस्कार किया।
कृष्ण मान्य-पूजा करि' तौरे प्रश्न कैल।।‘कि लागि' तोमार इहाँ आगमन हैल?' ॥
६३॥
ब्रह्मा द्वारा पूजा किये जाने के बाद भगवान् कृष्ण ने भी उपयुक्त शब्दों से उनका सम्मान किया। तब भगवान् कृष्ण ने उनसे पूछा, 'आप यहाँ किस लिए आये हैं?' ब्रह्मा कहे,–'ताहा पाछे करिब निवेदन । एक संशय मने हय, करह छेदन ॥
६४॥
पूछे जाने पर ब्रह्माजी ने तुरन्त उत्तर दिया, यह तो मैं बाद में बतलाऊँगा कि मैं किस लिए आया हूँ। पहले तो मेरे मन में एक सन्देह है, जिसे मैं चाहता हूँ कि आप कृपया दूर कर दें।
‘कोन् ब्रह्मा?' पुछिले तुमि कोन् अभिप्राये?।। आमा बइ जगते आर को ब्रह्मा हये?' ॥
६५॥
आपने यह क्यों पूछा कि कौन-सा ब्रह्मा आपको मिलने आया है? ऐसे प्रश्न का क्या अभिप्राय है? क्या इस ब्रह्माण्ड के भीतर मेरे अतिरिक्त कोई अन्य ब्रह्मा भी है?' शुनि' हासि' कृष्ण तबे करिलेन ध्याने । असङ्ख्य ब्रह्मार गण आइला तत-क्षणे ॥
६६॥
यह सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कुराये और तुरन्त ध्यानमग्न हो गये। देखते ही देखते वहाँ असंख्य ब्रह्मा आ गये।
दश-बिश-शत-सहस्र-अयुत-लक्ष-वदन । कोट्यर्बुद मुख कारो, ना ग्राय गणन ॥
६७॥
इन ब्रह्माओं के शिरों की संख्या भिन्न-भिन्न थी। किसी के दस शिर थे, तो किसी के बीस, किसी के सौ शिर थे तो किसी के हजार, किसी के दस हजार तो किसी के एक लाख, किसी के एक करोड़ तथा किसी के एक अर्बुद शिर थे। उनके मुखों की संख्या की गणना कोई नहीं कर सकता।
रुद्र-गण आईला लक्ष कोटि-वदन ।। इन्द्र-गण आइला लक्ष कोटि-नयन ॥
६८॥
उस समय वहाँ अनेक शिव भी आये, जिनके लाखों तथा करोड़ों विविध शिर थे। अनेक इन्द्र भी आये और इनके भी सारे शरीरों में लाखोंकरोड़ों आँखें थीं।
देखि चतुर्मुख ब्रह्मा फाँपर हइला ।।हस्ति-गण-मध्ये ग्रेन शशक रहिला ।। ६९॥
जब इस ब्रह्माण्ड के चतुर्मुख ब्रह्मा ने कृष्ण का इतना सारा वैभव देखा, तो वे हैरान रह गये और उन्होंने अपने आपको अनेक हाथियों के बीच एक खरगोश के समान समझा।
आसि' सबै ब्रह्मा कृष्ण-पाद-पीठ-आगे । दण्डवत् करिते मुकुट पाद-पीठे लागे ।। ७० ।। जितने भी ब्रह्मा कृष्ण को मिलने आये, उन सबने उनके चरणकमलों में नमस्कार किया और जब उन्होंने ऐसा किया, तो उनके मुकुटों ने भगवान् के चरणकमलों का स्पर्श किया।
कृष्णेर अचिन्त्य-शक्ति लखिते केह नारे ।ग्रत ब्रह्मा, तत मूर्ति एक-इ शरीरे ॥
७१॥
भगवान् कृष्ण की अचिन्त्य शक्ति का अनुमान कोई भी नहीं लगा सकता। वहाँ जितने ब्रह्मा थे, वे सभी कृष्ण के एक ही शरीर में स्थित थे।
पाद-पीट-मुकुटाग्र-सङ्खट्टे उठे ध्वनि ।पाद-पीठे स्तुति करे मुकुट हेन जानि' ॥
७२॥
जब सारे मुकुट कृष्ण के चरणकमलों पर एकसाथ टकराए, तोतुमुल ध्वनि उत्पन्न हुई। ऐसा लग रहा था, मानों स्वयं मुकुट कृष्ण के चरणकमलों की स्तुति कर रहे हों।
ड़-हाते ब्रह्मा-रुद्रादि करये स्तवन ।।बड़ कृपा करिला प्रभु, देखाइला चरण ॥
७३॥
हाथ जोड़े सारे ब्रह्मा तथा शिव कृष्ण की स्तुति करने लगे, 'हे प्रभु, आपने हम पर बड़ी कृपा की है। हम आपके चरणकमलों का दर्शन पाने में समर्थ हो सके।
भाग्य, मोरे बोलाइला 'दास' अङ्गीकरि' ।।कोनाज्ञा हय, ताहा करि शिरे धरि ॥
७४॥
तब सबने कहा, 'यह मेरा परम सौभाग्य है कि आपने मुझे अपना दास समझकर बुलाया है। अब बतायें कि आपकी क्या आज्ञा है, जिसे मैं शिरोधार्य करूं।'
कृष्ण कहे,—तोमा-सबा देखिते चित्त हैल । ताहा लागि' एक ठाजि सबा बोलाइल ॥
७५ ॥
भगवान् कृष्ण ने उत्तर दिया, चूंकि मैं तुम सबको एक साथ देखना चाहता था, इसलिए मैंने तुम सबको यहाँ बुलाया है।
सुखी हओ सबे, किछु नाहि दैत्य-भय? ।। तारा कहे,–'तोमार प्रसादे सर्वत्र-इ जय ॥
७६॥
तुम सभी सुखी हो। क्या असुरों से तुमको कोई डर है?' उन्होंने उत्तर दिया, 'आपकी कृपा से हम सर्वत्र विजयी होते हैं।
सम्प्रति पृथिवीते ग्रेबा हैयाछिल भार । अवतीर्ण हा ताहा करिला संहार' ॥
७७॥
पृथ्वी पर जो कुछ भार था, उसे आपने उसी ग्रह पर अवतरित होकर दूर कर दिया है।'
द्वारकादि-विभु, तार एइ त प्रमाण ।‘आमार-इ ब्रह्माण्डे कृष्ण' सबार हैल ज्ञान ॥
७८ ॥
यह द्वारका के वैभव का प्रमाण है : सारे ब्रह्माओं ने सोचा, 'अभी कृष्ण मेरे क्षेत्र में विराजमान हैं।'
कृष्ण-सह द्वारका-वैभव अनुभव हैल ।।एकत्र मिलने केह काहो ना देखिल ॥
७९॥
इस तरह हर एक ने द्वारका के वैभव को देखा। यद्यपि वे सभी वहाँ एकत्र थे, किन्तु किसी ने अपने सिवा अन्य किसी को नहीं देखा।
तबे कृष्ण सर्व-ब्रह्मा-गणे विदाय दिला ।दण्डवत् ही सबे निज घरे गेला ॥
८०॥
तब कृष्ण ने सभी ब्रह्माओं को विदा किया और वे सब नमस्कार करके अपने-अपने घर चले गये।
देखि' चतुर्मुख ब्रह्मार हैल चमत्कार ।।कृष्णेर चरणे आसि' कैला नमस्कार ॥
८१॥
इतना सारा वैभव देखकर इस ब्रह्माण्ड के चार शिरों वाले ब्रह्मा आश्चर्यचकित रह गये। पुनः कृष्ण के चरणकमलों के पास आकर उन्होंने नमस्कार किया।
ब्रह्मा बले,—पूर्वे आमि ग्रे निश्चय करिहुँ ।तार उदाहरण आमि आजि त' देखिलें ॥
८२॥
तब ब्रह्मा ने कहा, 'इसके पूर्व मैंने अपने ज्ञान के विषय में जो निश्चय किया था, उसकी सम्पुष्टि मैंने आज स्वयं कर ली है।
जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो ।।मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः ॥
८३॥
ऐसे लोग भी हैं, जो यह कहते हैं कि, मैं कृष्ण के विषय में सब जानता हूँ। वे भले ही ऐसा सोचते रहें। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं इस विषय में अधिक नहीं कहना चाहता । हे प्रभु, मुझे इतना ही कहने दें। जहाँ तक आपके ऐश्वर्यों का सम्बन्ध है, वे सब मेरे मन, शरीर तथा वाणी की पहुँच से बाहर हैं।'
कृष्ण कहे, एइ ब्रह्माण्ड पञ्चाशत्कोटि ग्रोजन ।अति क्षुद्र, ताते तोमार चारि वदन ॥
८४॥
कृष्ण ने कहा, 'तुम्हारे ब्रह्माण्ड का व्यास ४ अरब मील तक का है, अतएव यह सारे ब्रह्माण्डों में सबसे छोटा है। इसलिए तुम्हारे केवल चार सिर हैं।
कोन ब्रह्माण्ड शत-कोटि, कोन लक्ष-कोटि ।।कोन नियुत-कोटि, कोन कोटि-कोटि ॥
८५॥
कुछ ब्रह्माण्ड व्यास (डायमीटर) में सौ करोड़ (१ बिलियन) योजन, कोई एक लाख करोड़ योजन, तो कोई दस लाख करोड़ योजन, तो कोई-कोई करोड़-करोड़ योजन के हैं। इस तरह उनका क्षेत्रफल लगभग अनन्त है।
ब्रह्माण्डानुरूप ब्रह्मार शरीर-वदन ।एइ-रूपे पालि आमि ब्रह्माण्डेर गण ॥
८६॥
ब्रह्माण्ड के आकार के अनुसार ही ब्रह्मा के शरीर में इतने सिर होते हैं। इस तरह मैं असंख्य ब्रह्माण्डों का पालन करता हूँ।
‘एक-पाद विभूति' इहार नाहि परिमाण ।'त्रि-पाद विभूति र केबा करे परिमाण ॥
८७॥
जब इस भौतिक जगत् में व्याप्त मेरी एक चौथाई शक्ति की लम्बाई तथा चौड़ाई को ही कोई नहीं माप सकता, तो भला आध्यात्मिक जगत् में प्रकट होने वाली मेरी तीन चौथाई शक्ति को कौन माप सकता है?' तस्याः पारे पर-व्योम त्रिपाद्भूतं सनातनम् ।।अमृतं शाश्वतं नित्यमनन्तं परमं पदम् ॥
८८॥
विरजा नदी के उस पार आध्यात्मिक प्रकृति है, जो अविनाशी, शाश्वत, अव्यय तथा असीम है। यह वह परम धाम है, जिसमें भगवान् का तीन चौथाई वैभव स्थित है। यह परव्योम अर्थात् आध्यात्मिक आकाश कहलाता है।'
तबे कृष्ण ब्रह्मारे दिलेन विदाय ।।कृष्णेर विभूति-स्वरूप जानान ना ग्राय ॥
८९॥
इस तरह कृष्ण ने इस ब्रह्माण्ड के चतुर्मुख ब्रह्मा को विदा किया। इस तरह हम समझ सकते हैं कि कृष्ण की शक्ति के परिमाण की कोई भी गणना नहीं कर सकता।
‘अधीश्वर'-शब्देर अर्थ 'गूढ़' आर हय ।।‘त्रि'-शब्दे कृष्णेर तिन लोक कय ॥
९० ॥
त्र्यधीश्वर' शब्द का अर्थ अत्यन्त गूढ़ है, जो यह बतलाता है कि कृष्ण के अधिकार में तीन विभिन्न लोक या प्रकृतियाँ हैं।
गोलोकाख्य गोकुल, मथुरा, द्वारावती । एइ तिन लोके कृष्णेर सहजे नित्य-स्थिति ॥
९१॥
लोक तीन हैं-गोकुल ( गोलोक ), मथुरा तथा द्वारका। कृष्ण इन्हीं तीनों स्थानों में शाश्वत निवास करते हैं।
अन्तरङ्ग-पूर्णेश्वर्य-पूर्ण तिन धाम ।।तिनेर अधीश्वर–कृष्ण स्वयं भगवान् ॥
९२॥
ये तीनों स्थान अन्तरंगा शक्तियों से पूर्ण हैं और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण उनके सर्वेसर्वा हैं।
पूर्व-उक्त ब्रह्माण्डेर व्रत दिक्पाल । अनन्त वैकुण्ठावरण, चिर-लोक-पाल ॥
९३ ॥
ताँ-सबार मुकुट कृष्ण-पाद-पीठ-आगे ।। दण्डवत् काले तार मणि पीठे लागे ॥
९४॥
जैसाकि पहले कहा जा चुका है, सारे ब्रह्माण्डों तथा वैकुण्ठ लोकों के समस्त अधिष्ठाता देवों के मुकुटों की मणियों ने भगवान् को नमस्कार करते समय उनके सिंहासन तथा चरणकमलों का स्पर्श किया है।
मणि-पीठे ठेकाठेकि, उठे झन्झनि ।।पीठेर स्तुति करे मुकुट–हेन अनुमानि ॥
९५ ॥
जब सारे अधिष्ठाता देवों के मुकुटों की मणियाँ भगवान् के सिंहासन तथा उनके चरणकमलों के साथ टकराईं, तो झनझन की आवाज उत्पन्न हुई और ऐसा लगता था, मानो सारे मुकुट कृष्ण के चरणकमलों की स्तुति कर रहे हों।
निज-चिच्छक्ते कृष्ण नित्य विराजमान ।चिच्छक्ति-सम्पत्तिर 'षडू-ऐश्वर्य' नाम ॥
९६॥
इस तरह कृष्ण सदैव अपनी आध्यात्मिक शक्ति में स्थित रहते हैं और इस शक्ति का वैभव षडैश्वर्य कहलाता है।
सेइ स्वाराज्य-लक्ष्मी करे नित्य पूर्ण काम । अतएव वेदे कहे 'स्वयं भगवान् ॥
९७ ॥
चूंकि उनके पास आध्यात्मिक शक्तियाँ हैं, जो उनकी सारी इच्छाओं की पूर्ति करती हैं, अतएव कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् माने जाते हैं। यह वेदों का कथन है।
कृष्णेर ऐश्वर्य–अपार अमृतेर सिन्धु ।।अवगाहिते नारि, तार छुइनँ एक बिन्दु ॥
९८॥
कृष्ण की असीम शक्तियाँ अमृत के सागर के समान हैं। चूंकि उस सागर में कोई स्नान नहीं कर सकता, इसलिए मैंने उसकी एक बूंद का स्पर्श मात्र किया है।
ऐश्वर्य कहिते प्रभुर कृष्ण-स्फूर्ति हैल । माधुर्ये मजिल मन, एक श्लोक पड़िल ॥
९९ ॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस तरह से कृष्ण के ऐश्वर्य तथा उनकी आध्यात्मिक शक्तियों का वर्णन किया, तब उनके भीतर कृष्ण-प्रेम जाग उठा। उनका मन माधुर्य-प्रेम की माधुरी में निमग्न हो गया और उन्होंने श्रीमद्भागवत का निम्नलिखित श्लोक सुनाया।
ग्रन्मर्त्य-लीलौपयिकं स्व-योगमाया-बलं दर्शयता गृहीतम् । विस्मापनं स्वस्य च सौभगधेःपरं पदं भूषण-भूषणाङ्गम् ॥
१०० ॥
भगवान् कृष्ण ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए इस भौतिक जगत् में अपनी लीलाओं के उपयुक्त एक रूप प्रकट किया। यह रूप उनके लिए भी अद्भुत था और सौभाग्य-सम्पदा का परम धाम था। उसके अंग इतने सुन्दर थे कि वे उनके शरीर में धारण किये हुए आभूषणों के सौन्दर्य को बढ़ा रहे थे।'
कृष्णेर व्रतेक खेला, सर्वोत्तम नर-लीला,नर-वपु ताहार स्वरूप । गोप-वेश, वेणु-कर, नव-किशोर, नट-वर,नर-लीलार हय अनुरूप ॥
१०१॥
भगवान् कृष्ण की अनेक लीलाएँ हैं, जिनमें मनुष्य रूप में उनकी लीलाएँ सर्वोत्तम हैं। उसका मनुष्य रूप सर्वोत्कृष्ट दिव्य रूप है। इस रूप में वे ग्वालबाल हैं। वे अपने हाथ में वंशी लिये रहते हैं और उनकी कैशोरावस्था नित्य नूतन बनी रहती है। वे एक दक्ष नर्तक भी हैं। यह सब मनुष्य रूप में उनकी लीलाओं के सर्वथा अनुरूप है।
कृष्णेर मधुर रूप, शुन, सनातन ये रूपेर एक कण, डुबाय सब त्रिभुवन, ।सर्व प्राणी करे आकर्षण ॥
१०२॥
हे प्रिय सनातन, कृष्ण का मधुर आकर्षक दिव्य रूप इतना सुन्दर है। जरा इसे समझने का प्रयास करो। कृष्ण के सौन्दर्य के ज्ञान का एक अंश भी तीनों जगतों को प्रेम के समुद्र में डुबो सकता है। वे तीनों जगतों के सारे जीवों को आकर्षित करने वाले हैं।
योगमाया चिच्छक्ति, विशुद्ध-सत्त्व-परिणति,तार शक्ति लोके देखाइते ।। एइ रूप-रतन, भक्त-गणेर गूढ़-धन, प्रकट कैला नित्य-लीला हैते ॥
१०३ ॥
भगवान् कृष्ण का दिव्य रूप जगत् को उनकी अन्तरंगा शक्ति द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। यह शक्ति शुद्ध सत्त्व का रूपान्तर है। रत्न जैसा यह रूप भक्तों का अत्यन्त गुप्त धन है। यह रूप कृष्ण की सनातन लीलाओं से प्रकट होता है।
रूप देखि' आपनार, कृष्णेर हैल चमत्कार,आस्वादिते मने उठे काम ।। 'स्व-सौभाग्य' याँर नाम, सौन्दर्यादि-गुण-ग्राम, एइ-रूप नित्य तार धाम ॥
१०४॥
कृष्ण का अपना अद्भुत स्वरूप इतना महान् है कि वह कृष्ण को भी अपनी खुद की संगति का आस्वादन करने के लिए आकृष्ट करता है। इस तरह कृष्ण उसका आस्वादन करने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो उठते है। सम्पूर्ण सौन्दर्य, ज्ञान, सम्पत्ति, बल, यश तथा त्याग–ये कृष्ण के छह ऐश्वर्य हैं। वे अपने इन ऐश्वर्यों में सदा स्थित रहते हैं।
भूषणेर भूषण अङ्ग, ताहें ललित त्रि-भङ्ग,ताहार उपर भूधनु-नर्तन ।। तेरछे नेत्रान्त बाण, तार दृढ़ सन्धान, विन्धे राधा-गोपी-गण-मन ॥
१०५॥
उस शरीर को आभूषण सहलाते हैं, किन्तु कृष्ण का दिव्य शरीर इतना सुन्दर है कि यह उनके द्वारा पहने गये आभूषणों को सुन्दर बना देता है। इसलिए कृष्ण का शरीर आभूषणों का आभूषण कहलाता है। उनके खड़े होने का त्रिभंगी ढंग उस स्वरूप को भी चार चाँद लगा देता है। इन समस्त सुन्दर लक्षणों के भी ऊपर कृष्ण की आँखें नृत्य करती है और कटाक्ष करती हैं, जो श्रीमती राधारानी तथा गोपियों के मनों को भेदने वाले बाणों का काम करती हैं। जब बाण लक्ष्यभेद कर लेता है, तो उनके मन विचलित हो उठते हैं।
ब्रह्माण्डोपरि परव्योम, ताहाँ ये स्वरूप-गण,ताँ-सबार बले हरे मन ।। पति-व्रता-शिरोमणि, याँरे कहे वेद-वाणी, आकर्षये सेइ लक्ष्मी-गण ॥
१०६॥
कृष्ण के शरीर का सौन्दर्य इतना आकर्षक है कि वह न केवल इस भौतिक जगत् के देवताओं तथा जीवों को आकृष्ट करता है, अपितुनारायण समेत परव्योम के उन समस्त पुरुषों को भी आकृष्ट करने वाला है, जो कृष्ण के विस्तार हैं। इस तरह समस्त नारायणों के मन कृष्ण के शारीरिक सौन्दर्य द्वारा आकृष्ट हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, इन नारायणों की पत्नियाँ, लक्ष्मियाँ, जिन्हें वेदों में सवाधिक पतिव्रता कहा गया है, कृष्ण के अद्भुत सौन्दर्य द्वारा आकृष्ट हो जाती हैं।
चड़ि' गोपी-मनोरथे, मन्मथेर मन मथे,नाम धरे ‘मदन-मोहन'। जिनि' पञ्चशर-दर्प, स्वयं नव-कन्दर्प, रास करे ला गोपी-गण । १०७॥
गोपियों पर कृपा करते हुए उनके मनरूपी रथों पर चढ़कर तथा उनसे प्रेममयी सेवा प्राप्त करने के लिए कृष्ण कामदेव की भाँति उनके मनों को आकृष्ट करते हैं। इसलिए वे मदनमोहन अर्थात् कामदेव को आकृष्ट करने वाले भी कहलाते हैं। कामदेव के पाँच बाण हैं, जो रूप, स्वाद, गन्ध, शब्द तथा स्पर्श के द्योतक होते हैं। कृष्ण इन पाँचों बाणों के स्वामी हैं और वे कामदेव जैसे सौन्दर्य द्वारा गोपियों के मनों को जीतते हैं, यद्यपि उन्हें अपने अपूर्व सौन्दर्य का बड़ा गुमान है। कृष्ण नवीन कामदेव बनकर उनके मनों को आकृष्ट करते हैं और रासलीला करते हैं।
निज-सम सखा-सङ्गे, गो-गण-चारण रङ्गे, वृन्दावने स्वच्छन्द विहार ।। ग्राँर वेणु-ध्वनि शुनि', स्थावर-जङ्गम प्राणी, पुलक, कम्प, अश्रु वहे धार ॥
१०८॥
जब भगवान् कृष्ण अपने ही समान अपने मित्रों के साथ वृन्दावन में विचरण करते हैं, तब असंख्य गौवें चरती रहती हैं। यह भगवान् का एक अन्य अनन्दमय विहार है। जब वे अपनी बाँसुरी बजाते हैं, तो सारे जीव-जिसमें वृक्ष, पौधे, पशु तथा मनुष्य सम्मिलित हैं,-काँपने लगते है और हर्ष से पूरित हो उठते हैं। उनकी आँखों से निरन्तर अश्रुधारा बहने लगती है।
मुक्ता-हार—बक-पाँति, इन्द्र-धनु-पिञ्छ तति, पीताम्बर विजुरी-सञ्चार ।। कृष्ण नव-जलधर, जगत्-शस्य-उपर,वरिषये लीलामृत-धार ॥
१०९॥
कृष्ण द्वारा गले में पहनी मोती की माला श्वेत बगुलों की पंक्ति जैसी लगती है। उनके बालों में लगा मोरपंख इन्द्रधनुष जैसा और उनके पीले वस्त्र आकाश में बिजली जैसे लगते हैं। कृष्ण नये उठे हुए बादल जैसे लगते हैं और गोपियाँ खेत में खिले नये गेहूँ जैसी लगती हैं। इन नई खिली फसलों पर पर अमृतमयी लीलाओं की निरन्तर वर्षा होती है और ऐसा लगता है कि गोपियाँ कृष्ण से उसी तरह जीवन रश्मियाँ प्राप्त कर रही हैं, जिस तरह वर्षा से विविध प्रकार की फसलें जीवन प्राप्त करती हैं।
माधुर्य भगवत्ता-सार, व्रजे कैल परचार,ताहा शुक–व्यासेर नन्दन ।। स्थाने स्थाने भागवते, वर्णियाछे जानाइते,ताहा शुनि' माते भक्त-गण ॥
११०॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण अपने आकर्षक सौन्दर्य समेत छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं, जिसके कारण वे गोपियों के साथ माधुर्य-प्रेम में रत होते हैं। ऐसी माधुरी उनके गुणों का सार है। व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी ने श्रीमद्भागवत में स्थान-स्थान पर कृष्ण की इन लीलाओं का वर्णन किया है, जिन्हें सुनकर भक्तगण भगवत्प्रेम में उन्मत्त हो उठते हैं।
कहिते कृष्णेर रसे, श्लोक पड़े प्रेमावेशे,प्रेमे सनातन-हात धरि' ।। गोपी-भाग्य, कृष्ण गुण, ग्रे करिल वर्णन, भावावेशे मथुरा-नागरी ॥
१११॥
जिस तरह मथुरा की स्त्रियों ने वृन्दावन की गोपियों के भाग्य तथा कृष्ण के दिव्य गुणों का भावमय वर्णन किया है, उसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण के विभिन्न रसों का वर्णन किया और वे प्रेमभाव से भभिभूत हो गये। उन्होंने सनातन गोस्वामी का हाथ थामकर निम्नलिखित श्लोक पढ़ा।
गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपंलावण्य-सारमसमोर्ध्वमनन्य-सिद्धम् । दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुरापम् । एकान्त-धाम ग्रशसः श्रिय ऐश्वरस्य ॥
११२॥
गोपियों ने कौन-सी तपस्या की होगी? वे कृष्ण के रूप के उस अमृत को अपनी आँखों से सदा पीती हैं, जो लावण्य का सार है और जिसकी न तो समानता हो सकती है, न जिसको लाँधा जा सकता है। वह लावण्य सौन्दर्य, यश तथा ऐश्वर्य का एकमात्र धाम है। वह स्वयं-सिद्ध, चिर-नवीन तथा अद्वितीय है।'
तारुण्यामृत-पारावार, तरङ्ग लावण्य-सार,ताते से आवर्त भावोद्गम ।। वंशी--ध्वनि-चक्रवात, नारीर मन-तृण-पात,ताहा डुबाय, ना हय उद्गम् ॥
११३।। श्रीकृष्ण के शरीर का सौन्दर्य चिर यौवन के सागर की एक तरंग की भाँति है। उस महासागर में प्रेमभाव का उदय भंवर के समान है। कृष्ण की वंशी की ध्वनि चक्रवात की तरह है और गोपियों के चंचल मन सूखे पत्तों और तिनकों की तरह हैं। जब वे चक्रवात में गिर जाते हैं, तो फिर ऊपर कभी नहीं उठते, अपितु कृष्ण के चरणकमलों में ही निरन्तर पड़े रहते हैं।
सखि हे, कोन् तप कैल गोपी-गण कृष्ण-रूप-सुमाधुरी, पिबि' पिबि' नेत्र भरि', । श्लाघ्य करे जन्म-तनु-मन ॥
११४॥
हे प्रिय सखी, गोपियों ने कौन-सी कठिन तपस्या की है कि वे उनकी दिव्य सुन्दरता तथा माधुरी को अपनी आँखों से जी भरकर पी रही हैं? इस तरह वे अपने जन्म, शरीर तथा मन को सफल बनाती हैं।
ये माधुरीर ऊर्ध्व आन, नाहि ग्रार समान,परव्योमे स्वरूपेर गणे ।। →हो सब-अवतारी, परव्योम-अधिकारी, ए माधुर्य नाहि नारायणे ॥
११५ ॥
गोपियों द्वारा कृष्ण के सौन्दर्य की जिस माधुरी का आस्वादन किया जाता है, वह अद्वितीय है। उस भावमयी माधुरी के समान या उससे बढ़कर कुछ भी नहीं है। यहाँ तक कि वैकुण्ठ लोकों के अधिष्ठाता नारायणों में भी वह माधुरी नहीं है। निस्सन्देह, नारायण-पर्यन्त कृष्ण के सारे अवतारों में से किसी में भी ऐसा दिव्य सौन्दर्य नहीं है।
ताते साक्षी सेइ रमा, नारायणेर प्रियतमा,पतिव्रता-गणेर उपास्या ।। तिंहो ये माधुर्य-लोभे, छाड़ि' सब काम-भोगे,व्रत करि' करिला तपस्या ॥
११६ ॥
नारायण की प्रियतमा लक्ष्मी इस सम्बन्ध में स्पष्ट प्रमाण हैं। लक्ष्मी की पूजा सारी पतिव्रता स्त्रियाँ करती हैं। उन्हीं लक्ष्मी ने कृष्ण की अद्वितीय माधुरी द्वारा मुग्ध होकर उनके साथ भोग करने की इच्छा से ही सब कुछ त्याग दिया, इस प्रकार उन्होंने कठोर व्रत लिया और कठिन तपस्या की।
सेइ त' माधुर्य-सार, अन्य-सिद्धि नाहि तार, | सिंहो माधुर्यादि-गुण-खनि ।।आर सब प्रकाशे, ताँर दत्त गुण भासे,ग्राहाँ ग्रत प्रकाशे कार्य जानि ॥
११७॥
कृष्ण के शरीर की मधुर कान्ति का सार इतना पूर्ण है कि उससे बढ़कर कोई पूर्णता नहीं है। वे दिव्य गुणों की नित्य खान हैं। उनके अन्य रूपों तथा व्यक्तिगत विस्तारों में ऐसे गुणों का केवल आंशिक प्रदर्शन ही होता है। इस तरह हम उनके समस्त निजी व्यक्तिगत विस्तारों को समझ पाते हैं।
गोपी-भाव-दरपण, नव नव क्षणे क्षण, तार आगे कृष्णेर माधुर्य ।। दोहे करे हुड़ाहुड़ि, बाड़े, मुख नाहि मुड़ि, नव नव दोंहार प्राचुर्घ ॥
११८॥
गोपियाँ तथा कृष्ण दोनों ही पूर्ण हैं। गोपियों का प्रेमभाव उस दर्पण के समान है, जो प्रतिक्षण नूतन होता जाता है और कृष्ण की शारीरिक कान्ति तथा माधुरी को प्रतिबिम्बित करता है। इस तरह एक होड़ सी लग जाती है। चूंकि दोनों पक्षों में से कोई हार नहीं मानता, इसलिए उनकी लीलाएँ नवीनतर होती जाती हैं और दोनों पक्षों में निरन्तर वृद्धि होती जाती है।
कर्म, तप, योग, ज्ञान, विधि-भक्ति, जप, ध्यान,इहा हैते माधुर्य दुर्लभ ।। केवल ये राग-मार्गे, भजे कृष्यो अनुरागे, | तारे कृष्ण-माधुर्य सुलभ ॥
११९॥
कृष्ण तथा गोपियों के पारस्परिक व्यवहार से उत्पन्न दिव्य रसों का आस्वादन कर्म, तप, योग, ज्ञान, विधि-भक्ति, मन्त्र योग या ध्यान द्वारा नहीं किया जा सकता। इस माधुरी का आस्वादन केवल मुक्त पुरुषों के स्वतःस्फूर्त रागानुग प्रेम द्वारा किया जा सकता है, जो परम अनुराग के साथ कृष्ण-नाम का कीर्तन करते हैं।
सेइ-रूप व्रजाश्रय, ऐश्वर्य-माधुर्यमय, | दिव्य-गुण-गण-रत्नालय । आनेर वैभव-सत्ता, कृष्ण-दत्त भगवत्ता,कृष्ण-सर्व-अंशी, सर्वाश्रय ॥
१२०॥
कृष्ण तथा गोपियों के बीच ऐसा भावमय आदान-प्रदान केवल वृन्दावन में सम्भव है, जो दिव्य प्रेम के ऐश्वर्य से ओतप्रोत है। कृष्ण का स्वरूप समस्त दिव्य गुणों का मूल स्रोत है। यह रत्नों की खान के समान है। कृष्ण के व्यक्तिगत विस्तारों के पास जितना ऐश्वर्य होता है, उसे कृष्ण द्वारा प्रदत्त समझा जाना चाहिए। अत: कृष्ण आदि स्रोत हैं तथा सबके आश्रय हैं।
श्री, लज्जा, दया, कीर्ति, धैर्य, वैशारदी मति,एइ सब कृष्णे प्रतिष्ठित । सुशील, मृदु, वदान्य, कृष्ण-सम नाहि अन्य,कृष्ण करे जगतेर हित ।। १२१॥
सौन्दर्य, विनम्रता, दया, कीर्ति, धैर्य तथा दक्ष बुद्धि-ये सभी कृष्ण में प्रकट होते हैं। किन्तु इनके अतिरिक्त भी उनमें सदाचार, मृदुता तथा उदारता के अन्य गुण पाये जाते हैं। वे सारे जगत् के लिए कल्याण-कार्य भी करते हैं। ये सारे गुण नारायण जैसे अंशों में दृष्टिगोचर नहीं होते।
कृष्ण देखि' नाना जन, कैले निमिषे निन्दन,व्रजे विधि निन्दे गोपी-गण ।। सेइ सब श्लोक पड़ि', महाप्रभु अर्थ करि',| सुखे माधुर्घ करे आस्वादन ॥
१२२॥
कृष्ण को देखकर विविध लोग अपनी पलकों के झपकने की निन्दा करते हैं। विशेषतया वृन्दावन में सारी गोपियाँ आँखों के इस दोष के लिए ब्रह्मा की निन्दा करती हैं। इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीमद्भागवत के कुछ श्लोक सुनाये और उनकी विस्तृत व्याख्या की। इस तरह उन्होंने बहुत ही सुख के साथ दिव्य माधुरी का आस्वादन किया।
ग्रस्याननं मकर-कुण्डल-चारु-कर्णभ्राजकपोल-सुभगं स-विलास-हासम् । नित्योत्सवं न ततृपुट्टशिभिः पिबन्त्यो ।नार्यो नराश्च मुदिताः कुपिता निमेश्च ॥
१२३॥
सारे पुरुष तथा स्त्रियाँ भगवान् कृष्ण के चमकते मुख तथा उनके कानों से लटकते मकराकृति कुण्डलों की शोभा देखने के अभ्यस्त थे। उनका सुन्दर स्वरूप, उनके गाल तथा खिलवाड़ करती हँसी-ये सब मिलकर नेत्रों के लिए निरन्तर उत्सव बने रहते हैं, किन्तु आँखों का झपकना ऐसा अवरोध बन जाता है, जिससे वे उस शोभा को देख नहीं पाते। इसी कारण से पुरुष तथा स्त्रियाँ स्रष्टा ( ब्रह्माजी ) के ऊपर अत्यन्त क्रुद्ध थीं।
अटति ग्नद्भवानह्नि काननंत्रुटिर्युगायते त्वामपश्यताम् । कुटिल-कुन्तलं श्री-मुखं च ते | जड़ उदीक्षतां पक्ष्म-कृशाम् ॥
१२४॥
हे कृष्ण, जब आप दिन में जंगल चले जाते हो और हम आपके सुन्दर मुख को, जो सुन्दर सुंघराले केशों से घिरा हुआ है, नहीं देखतीं तब आधे क्षण का समय हमारे लिए एक युग के बराबर लगता है। तब हम उस स्रष्टा को, जिसने आपको देखने वाली आँखों के ऊपर पलकें लगा दी हैं, मात्र मूर्ख समझती हैं।'
काम-गायत्री-मन्त्र-रूप, हय कृष्णेर स्वरूप,सार्ध-चब्बिश अक्षर तार हय । से अक्षर 'चन्द्र' हय, कृष्णो करि' उदय, त्रिजगत् कैला काममय ॥
१२५ ॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण वैदिक मन्त्र काम-गायत्री से अभिन्न हैं, जो साढ़े चौबीस अक्षरों से रचित है। वे अक्षर उन चन्द्रमाओं के सदृश हैं, जो कृष्ण में उदित होते हैं। इस तरह तीनों जगत् काममय हो जाते हैं।
सखि हे, कृष्ण-मुख-द्विज-राज-राज कृष्ण-वपु-सिंहासने, वसि' राज्य-शासने, ।।करे सङ्गे चन्द्रेर समाज ॥
१२६॥
कृष्ण का मुख समस्त चन्द्रमाओं का राजा है और कृष्ण का शरीर सिंहासन है। इस तरह राजा चन्द्रमाओं के समाज पर शासन करता है।
दुइ गण्ड सुचिक्कण, जिनि' मणि-सुदर्पण,सेई दुइ पूर्ण-चन्द्र जानि ।। ललाटे अष्टमी-इन्दु, ताहाते चन्दन-बिन्दु,सेइ एक पूर्ण-चन्द्र मानि ॥
१२७॥
कृष्ण के दोनों गाल चमकीले मणियों जैसे हैं। दोनों पूर्ण चन्द्रमा माने जाते हैं। उनका ललाट अर्धचन्द्रमा माना गया है और वहाँ लगे चन्दन के बिन्दु को पूर्ण चन्द्रमा माना गया है।
कर-नख-चान्देर हाट, वंशी-उपर करे नाट,तार गीत मुरलीर तान ।। पद-नख-चन्द्र-गण, तले करे नर्तन,नूपुरेर ध्वनि ग्रार गान ॥
१२८॥
उनके हाथ के नाखून अनेक पूर्ण चन्द्रमा हैं और वे उनके हाथ की वंशी पर नृत्य करते हैं। उनका गीत उस वंशी की तान है। उनके पाँवों के नाखून भी अनेक पूर्ण चन्द्रमा हैं, जो भूमि पर नृत्य करते हैं। उनका गीत उनके नूपुरों की झंकार है।
नाचे मकर-कुण्डल, नेत्र—लीला-कमल,विलासी राजा सतत नाचाय ।। भू-धनु, नेत्र–बाण, धनुर्गुण–दुइ काण,नारी-मन-लक्ष्य विन्धे ताय ॥
१२९॥
कृष्ण का मुख विलासी राजा है। उनका वह पूर्ण चन्द्रमा रूप मुख उनके मकराकृति कुण्डलों तथा कमलनेत्रों को नचाने वाला है। उनकी भौहें धनुष के समान हैं और उनकी आँखें बाणों जैसी हैं। उनके कान उस धनुष की डोरी पर स्थित हैं और जब उनकी आँखें उनके कानों तक फैलती हैं, तब कृष्ण गोपियों के हृदयों को बींध देते हैं।
एइ चान्देर बड़ नाट, पसारि' चान्देर हाट,विनिमूले विलाय निजामृत ।। काहों स्मित-ज्योत्स्नामृते, काँहारे अधरामृते,सब लोक करे आप्यायित ॥
१३०॥
उनके मुख का नृत्य करता स्वरूप अन्य सभी पूर्ण चन्द्रमाओं से बाजी मार ले जाता है और पूर्ण चन्द्रमाओं के बाजार (हाट) को विस्तृत करता है। कृष्ण के मुख का अमृत अमूल्य होते हुए भी सबमें वितरित किया जाता है। कुछ उनकी मृदु हँसी की चन्द्र-किरणों को खरीदते हैं, तो कुछ उनके होठों के अमृत को। इस तरह वे सबको तुष्ट करते हैं।
विपुलायतारुण, मदन-मद-घूर्णन,मन्त्री ग्रार ए दुइ नयन ।। लावण्य-केलि-सदन, जन-नेत्र-रसायन,सुखमय गोविन्द-वदन ॥
१३१॥
कृष्ण के दो विस्फारित लाल लाल नेत्र हैं। ये राजा के दो मन्त्री हैं। और सुन्दर नेत्रों वाले कामदेव के गर्व का दमन करने वाले हैं। सुख से पूर्ण गोविन्द का वह मुख सौन्दर्य विलास का घर है और यह सबके नेत्रों को अत्यन्त सुहावना लगता है।
याँर पुण्य-पुञ्ज-फले, से-मुख-दर्शन मिले,दुइ आङ्खि कि करिबे पाने ? ।। द्विगुण बाड़े तृष्णा-लोभ, पिते नारे—मनः-क्षोभ,दुःखे करे विधिर निन्दने ॥
१३२॥
यदि किसी को भक्ति द्वारा पुण्यकर्मों का फल प्राप्त होता है और वह कृष्ण के मुख का दर्शन पा लेता है, तो वह अपनी केवल दो आँखों से क्या आस्वादन कर सकता है? तब कृष्ण के अमृतमय मुख को देखने से उसका लोभ तथा उसकी तृष्णा दोनों दुगुने बढ़ जाते हैं। उस अमृत को ठीक से पी न सकने के कारण मनुष्य दुःखी होता है और स्रष्टा की आलोचना इसलिए करने लगता है कि उसने दो से अधिक आँखें क्यों नहीं दीं।
ना दिलेक लक्ष-कोटि, सबे दिला आङ्घि दुटि,ताते दिला निमिष-आच्छादन । विधि–जड़ तपोधन, रस-शून्य तार मन, | नाहि जाने योग्य सृजन ॥
१३३॥
जब कृष्ण का मुख देखने वाला इस तरह असन्तुष्ट हो जाता है, तो वह सोचने लगता है, ‘विधाता ने मुझे लाखों-करोड़ों आँखें क्यों नहीं दीं? उसने मुझे केवल दो ही आँखें क्यों दीं? यहाँ तक कि ये दोनों आँखें भी पलक झपकने के कारण विचलित हो उठती हैं, जिससे मैं कृष्ण के मुख को लगातार देख नहीं पाता।' इस तरह मनुष्य विधाता को कोसता है कि वह कठिन तपस्या में लगे रहने के कारण शुष्क तथा रसविहीन है। ‘विधाता केवल एक शुष्क ( रसशून्य) स्रष्टा है। वह यह भी नहीं जानता कि किस तरह वस्तुओं का सृजन किया जाए और उन्हें उचित स्थानों पर रखा जाए।
ग्ने देखिबे कृष्णानन, तार करे द्वि-नयन, विधि हा हेन अविचार ।। मोर ग्रदि बोले धरे, कोटि आङ्घि तार करे, तबे जानि ग्रोग्य सृष्टि तार ॥
१३४॥
स्रष्टा कहता है, जो कृष्ण के सुन्दर मुख का दर्शन करना चाहते हैं, उनकी दो ही आँखें हों। जरा इस स्रष्टा कहलाने वाले व्यक्ति द्वारा प्रदर्शित अविचार को तो देखो। यदि वह मेरा परामर्श मानता, तो वह कृष्ण का मुख देखने वाले को करोड़ों आँखें देता। यदि वह मेरे इस परामर्श को मान ले, तो मैं कहूँगा कि वह अपने कार्य में पटु है।'
कृष्णाङ्ग-माधुर्य–सिन्धु, सुमधुर मुख इन्दु,अति-मधु स्मित–सुकिरणे । ए-तिने लागिल मन, लोभे करे आस्वादन, श्लोक पड़े स्वहस्त-चालने ॥
१३५ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य रूप की उपमा सागर से दी गई है। उस सागर के ऊपर श्रीकृष्ण का मुख रूपी चन्द्रमा विशेष रूप से अद्भुत दृश्य है और इससे भी अधिक अद्वितीय दूसरा दृश्य उनकी मुस्कान है, जो अत्यन्त मधुर है और चन्द्रमा की चमकीली किरणों जैसी है। सनातन गोस्वामी से ये बातें बतलाते-बतलाते श्री चैतन्य महाप्रभु एक-एक करके सारी बातें स्मरण करने लगे। उन्होंने भावावेश में अपने हाथ हिलाते हुए एक श्लोक सुनाया।
मधुरं मधुरं वपुरस्य विभोर्मधुरं मधुरं वदनं मधुरम् ।। मधु-गन्धि मृदु-स्मितमेतदहोमधुरं मधुरं मधुरं मधुरम् ॥
१३६ ॥
हे प्रभु, कृष्ण का दिव्य शरीर अत्यन्त मधुर है और उनका मुख उनके शरीर से भी अधिक मधुर है। उनके मुख पर मृदु हँसी, जो मधुगन्ध की तरह है, और भी मधुर है।'
सनातन, कृष्ण-माधुर्य—अमृतेर सिन्धु मोर मन–सन्निपाति, सब पिते करे मति, । दुर्दैव-वैद्य ना देय एक बिन्दु ॥
१३७॥
हे सनातन, कृष्ण की मधुरता अमृत के सिन्धु जैसी है। यद्यपि मेरा मन इस समय सन्निपात से ग्रस्त है और मैं उस समूचे समुद्र को पी लेना चाहता हूँ, किन्तु दुर्दैव वैद्य मुझे उसकी एक बूंद भी पीने की अनुमति नहीं दे रहा।
कृष्णाङ्ग लावण्य-पूर, मधुर हैते सुमधुर,ताते ग्रेइ मुख सुधाकर ।। मधुर हैते सुमधुर, ताहा हइते सुमधुर, तार ग्रेइ स्मित ज्योत्स्ना-भर ॥
१३८॥
कृष्ण का शरीर आकर्षक रूपों की नगरी है और यह मधुर से मधुरतर है। उनका चन्द्रमा जैसा मुख और भी मधुर है और उस चन्द्रमा जैसे मुख पर परम मन्द हँसी चाँदनी की किरणों जैसी है।
मधुर हैते सुमधुर, ताहा हैते सुमधुर,ताहा हैते अति सुमधुर । आपनार एक कणे, व्यापे सब त्रिभुवने, देश-दिक् व्यापे झार पूर ॥
१३९॥
कृष्ण की हँसी सर्वाधिक मधुर है। उनकी हँसी उस पूर्ण चन्द्रमा की तरह है, जो अपनी किरणों को तीनों लोकों में--गोलोक वृन्दावन, वैकुण्ठ तथा देवी-धाम अर्थात् भौतिक जगत् में–बिखेरता है। इस तरह कृष्ण की उज्वल सुन्दरता दशों दिशाओं में फैल जाती है।
स्मित-किरण-सुकपूर, पैशे अधर-मधुरे,सेइ मधु माताय त्रिभुवने ।वंशी-छिद्र आकाशे, तार गुण शब्दे पैशे,ध्वनि-रूपे पाञा परिणामे ॥
१४०॥
उनकी मन्द मुस्कान तथा सुगन्धित प्रकाश की तुलना कपूर से की जा सकती है, जो उनके ओठों की मधुरता में प्रविष्ट हो जाता है। वही मधुरता ध्वनि बनकर उनकी बाँसुरी के छेदों से आकाश में व्याप्त हो जाती है।
से ध्वनि चौदिके धाय, अण्ड भेदि वैकुण्ठे ग्राय,बले पैशे जगतेर काणे ।। सबा मातोयाल करि', बलात्कारे आने धरि',विशेषतः मुवतीर गणे ॥
१४१॥
कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि चारों दिशाओं में व्याप्त हो जाती है। यद्यपि कृष्ण अपनी बाँसुरी इस ब्रह्माण्ड के भीतर बजाते हैं, किन्तु इसकी ध्वनि ब्रह्माण्ड के आवरण को भेदकर वैकुण्ठ लोक तक जाती है। इस तरह यह ध्वनि सारे निवासियों के कानों में प्रवेश करती है। यह विशेष रूप से गोलोक वृन्दावन धाम में प्रवेश करती है और व्रजभूमि की पुवतियों के मनों को आकृष्ट करके उन्हें बलपूर्वक वहाँ ले जाती है, जहाँ अब्ण उपस्थित होते हैं।
ध्वनि-बड़ उद्धत, पतिव्रतार भाङ्गे व्रत,पति-कोल हैते टानि' आने ।। वैकुण्ठेर लक्ष्मी-गणे, येइ करे आकर्षणे,तार आगे केबी गोपी-गणे ॥
१४२॥
कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि बड़ी उद्धत है और यह समस्त पतिव्रताओं के व्रतों को भंग करती है। इसकी ध्वनि उन्हें बलात् उनके पतियों की गोदों से निकाल लेती है। उनकी बाँसुरी की ध्वनि वैकुण्ठ लोकों की लक्ष्मियों तक को आकृष्ट करती है, तो भला वृन्दावन की असहाय युवतियों के विषय में क्या कहा जाए? नीवि खसाय पति-आगे, गृह-धर्म कराय त्यागे,बले धरि' आने कृष्ण-स्थाने ।। लोक-धर्म, लज्जा, भय, सब ज्ञान लुप्त हय,ऐछे नाचाय सब नारी-गणे ॥
१४३॥
उनकी बाँसुरी की ध्वनि उनके पतियों के समक्ष उनके अधोवस्त्र की गाँठों को ढीला कर देती है। इस तरह गोपियाँ अपने घर का कामकाज त्यागकर कृष्ण के समक्ष आने के लिए बाध्य हो जाती हैं। इस तरह उनका सारा सामाजिक शिष्टाचार, लज्जा तथ भय भाग जाते हैं। उनकी बाँसुरी की ध्वनि सारी स्त्रियों को नचा देती है।
काणेर भितर वासा करे, आपने ताँहा सदा स्फुरे,अन्य शब्द ना देय प्रवेशिते । आन कथा ना शुने काण, आन बलिते बोलय आन,एई कृष्णेर वंशीर चरिते ॥
१४४॥
उनकी बाँसुरी की ध्वनि उस पक्षी के समान है, जो गोपियों के कानों के भीतर अपना घोंसला बनाता है और वहीं पर सदा बना रहता है। वह उनके कानों में किसी अन्य ध्वनि को प्रविष्ट नहीं होने देती। निस्सन्देह, गोपियाँ न तो और कुछ सुन पाती हैं, न ही किसी और बात पर ध्यान एकाग्र कर पाती हैं, न ही वे समुचित उत्तर दे पाती हैं। कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि के प्रभाव ऐसे ऐसे हैं।
पुनः कहे बाह्य-ज्ञाने, आन कहिते कहिलै आने,कृष्ण-कृपा तोमार उपरे । मोर चित्त-भ्रम करि', निजैश्वर्य-माधुरी, मोर मुखे शुनाय तोमारे ॥
१४५ ॥
पुनः अपनी बाह्य चेतना में आकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से कहा, मैं जो चाहता था वह नहीं कह पाया। भगवान् कृष्ण तुम पर अत्यन्त कृपालु हैं, क्योंकि मेरे मन को भ्रमित करके उन्होंने अपना निजी ऐश्वर्य तथा माधुरी प्रकट की है। उन्होंने ये सारी बातें तुम्हारी जानकारी के लिए मुझसे सुनवा दी हैं।
आमि त' बाउल, आन कहिते आन कहि ।। कृष्णोर माधुर्यामृत-स्रोते ग्राइ वहि' ॥
१४६॥
चूँकि मैं उन्मत्त हो चुका हूँ, इसलिए मैं कुछ का कुछ कह रहा हूँ। इसका कारण यह है कि मैं भगवान् कृष्ण की दिव्य माधुरी के अमृतसागर मी तरंगों द्वारा बहाये लिए जा रहा हूँ।
तबे महाप्रभु क्षणेक मौन करि' रहे।मने एक करि' पुनः सनातने कहे ॥
१४७॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु एक क्षण तक मौन रहे। अन्त में अपने मन को सन्तुलित करते हुए वे पुनः सनातन गोस्वामी से बोले।
कृष्णेर माधुरी आर महाप्रभुर मुखे ।।इहा ग्रेई शुने, सेइ भासे प्रेम-सुखे ॥
१४८॥
यदि किसी को श्रीचैतन्य-चरितामृत के इस अध्याय में कृष्ण की माधुरी के विषय में सुनने का अवसर प्राप्त होता है, तो वह निश्चित रूप से भगवत्प्रेम के दिव्य आनन्दसागर में तैरने का पात्र होगा।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१४९ ॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए एवं उनकी कृपा की सदैव कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
