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अध्याय अठारह: प्रभु को समुद्र से बचाना

शरज्योत्स्ना-सिन्धोरवकलनया जात-यमुनाभ्रमाद्धावन् योऽस्मिन्हरि-विरह-तापार्णव इव ।। निमग्नो मूच्र्छालः पयसि निवसन्रात्रिमखिलांप्रभाते प्राप्तः स्वैरवतु स शची-सूनुरिह नः ॥

१॥

शरद की चाँदनी रात में समुद्र देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु को उसमें यमुना नदी का भ्रम हो गया। कृष्ण विरह से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण वे दौड़कर समुद्र में कूद गये और सम्पूर्ण रात्रि जल में अचेतन पड़े रहे। प्रातःकाल उनके आत्मीय भक्तों ने उन्हें पाया। ऐसे शची माता के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी दिव्य लीलाओं से हमारी रक्षा करें।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! एइ-मते महाप्रभु नीलाचले वैसे ।।रात्रि-दिने कृष्ण-विच्छेदार्णवे भासे ॥

३॥

इस तरह जगन्नाथपुरी में रहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु रात-दिन कृष्ण के विरह रूपी समुद्र में तैरते रहे।

शरत्कालेर रात्रि, सब चन्द्रिका-उज्वल ।।प्रभु निज-गण लञा बेड़ान रात्रि-सकल ॥

४॥

शरद ऋतु की रात में जब पूर्ण चन्द्रमा हर वस्तु को प्रकाशमान कर रहा था, तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ रात भर भ्रमण करते रहे।

उद्याने उद्याने भ्रमेन कौतुक देखिते ।।रास-लीलार गीत-श्लोक पड़िते शुनिते ॥

५॥

वे भगवान् कृष्ण की लीलाएँ देखते तथा रासलीला विषयक गीतों तथा श्लोकों को सुनते-सुनाते एक बगीचे से दूसरे बगीचे में भ्रमण करते रहे।

प्रभु प्रेमावेशे करेन गान, नर्तन ।। कभु भावावेशे रास-लीलानुकरण ॥

६ ॥

वे प्रेमावेश में नाचते गाते रहे और कभी-कभी भावावेश में रासनृत्य का अनुकरण करते रहे।

कभु भावोन्मादे प्रभु इति-उति धाय ।। भूमे पड़ि' कभु मूच्र्छा, कभु गड़ि' ग्राय ॥

७॥

वे भावोन्माद में कभी इधर-उधर दौड़ते और कभी भूमि पर गिरकर लुढ़कने लगते। कभी वे पूर्णतया अचेत हो जाते।

रास-लीलार एक श्लोक ग्रबे पड़े, शुने । पूर्ववत्तबे अर्थ करेन आपने ॥

८॥

जब वे स्वरूप दामोदर को रासलीला से सम्बन्धित कोई श्लोक पढ़ते सुनते या स्वयं कोई श्लोक सुनाते, तब वे स्वयं उसकी व्याख्या करते, जैसाकि वे पहले कर चुके थे।

एइ-मत रास-लीलाय हय व्रत श्लोक। सबार अर्थ करे, पाय कभु हर्ष-शोक ॥

९॥

इस तरह उन्होंने रासलीला से सम्बन्धित सारे श्लोकों का अर्थ बतलाया। कभी-कभी वे अत्यन्त खिन्न हो जाते, तो कभी अत्यन्त हर्षित हो जाते।

से सब श्लोकेर अर्थ, से सब 'विकार' । से सब वर्णिते ग्रन्थ हय अति-विस्तार ॥

१०॥

उन सारे श्लोकों की तथा महाप्रभु के शरीर में हुए समस्त विकारों की पूर्ण व्याख्या करने के लिए बहुत बड़े ग्रन्थ की आवश्यकता होगी।

द्वादश वत्सरे ग्रे ये लीला क्षण-क्षणे ।। अति-बाहुल्य-भये ग्रन्थ ना कैलँ लिखने ॥

११॥

कहीं इस ग्रन्थ का आकार न बढ़ जाय, इस भय से मैंने महाप्रभु की सारी लीलाओं के विषय में नहीं लिखा, क्योंकि वे बारह वर्षों तक प्रतिदिन प्रति क्षण इन लीलाओं को सम्पन्न करते रहे।

पूर्वे ग्रेड देखीजाछि दिग्दरशन ।तैछे जानिह 'विकार' ‘प्रलाप' वर्णन ॥

१२ ॥

जैसा मैं पहले इंगित कर चुका हूँ, मैं महाप्रभु के प्रलापों तथा शारीरिक विकारों का संक्षिप्त वर्णन ही कर रहा हूँ।

सहस्र-वदने ग्रबे कहये 'अनन्त' ।।एक-दिनेर लीलार तबु नाहि पाय अन्त ॥

१३॥

यदि अपने एक हजार फनों से अनन्त देव श्री चैतन्य महाप्रभु की एक दिन की ही लीलाओं का वर्णन करना चाहें, तो उनके लिए इनका पूरी तरह से वर्णन कर पाना असम्भव होगा।

कोटि-युग पर्यन्त यदि लिखये गणेश ।एक-दिनेर लीलार तबु नाहि पाय शेष ॥

१४॥

यदि शिव के पुत्र तथा देवताओं के पटु लिपिक गणेश जी, महाप्रभु की एक दिन की लीलाओं का पूरी तरह से वर्णन करने का प्रयास करोड़ों युगों तक करें, तो भी वे उनकी सीमा नहीं पा सकेंगे।

भक्तेर प्रेम-विकार देखि' कृष्णेर चमत्कार! ।। कृष्ण यार ना पाय अन्त, केबा छार आर? ॥

१५॥

भगवान् कृष्ण तक अपने भक्तों के भाव विकारों को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं। यदि स्वयं कृष्ण ऐसे भावों की सीमाओं को अनुमान नहीं लगा सकते, तो अन्य लोग कैसे लगा सकेंगे? भक्त-प्रेमार व्रत दशा, ग्रे गति प्रकार । ग्रत दुःख, व्रत सुख, ग्रतेक विकार ॥

१६ ॥

कृष्ण ताहा सम्यक् ना पारे जानिते ।भक्त-भाव अङ्गीकरे ताहा आस्वादिते ॥

१७॥

स्वयं कृष्ण भी अपने भक्तों की दशा, प्रगति, सुख तथा दुःख एवं प्रेमभावों को पूरी तरह नहीं समझ पाते। इसलिए वे इन भावों का पूर्ण आस्वादन करने हेतु भक्त की भूमिका अंगीकार करते हैं।

कृष्णेरे नाचाय प्रेमा, भक्तेरे नाचार्य । आपने नाचये,—तिने नाचे एक-ठाजि ॥

१८॥

कृष्ण का प्रेम कृष्ण तथा उनके भक्तों को नचाता है और स्वयं भी नाचता है। इस तरह तीनों ही एक साथ एक स्थान में नाचते हैं।

प्रेमार विकार वर्णिते चाहे ग्रेइ जन ।चान्द धरिते चाहे, ग्रेन हा 'वामन' ॥

१९॥

जो व्यक्ति कृष्ण के प्रेम-विकारों का वर्णन करना चाहता है, वह उस बौने के समान है, जो आकाश में स्थित चन्द्रमा को पकड़ने का प्रयास करता है।

वायु प्रैछे सिन्धु-जलेर हरे एक 'कण' ।कृष्ण-प्रेम-कण तैछे जीवेर स्पर्शन ॥

२०॥

जिस तरह वायु समुद्र के जल की एक बूंद को ही उड़ा ले जा सकती है, उसी तरह जीव कृष्ण के प्रेम रूपी सागर के केवल एक कण का ही। स्पर्श कर सकता है।

क्षणे क्षणे उठे प्रेमार तरङ्ग अनन्त ।। जीव छार काहाँ तार पाइबेक अन्त? ॥

२१॥

प्रेम के उस सागर में क्षण प्रति क्षण अनन्त लहरें उठती हैं। भला एक तुच्छ जीव किस तरह उनकी सीमाओं का अनुमान लगा सकता है? श्री-कृष्ण-चैतन्य ग्नाहा करेन आस्वादन । सबे एक जाने ताहा स्वरूपादि 'गण' ॥

२२॥

स्वरूप दामोदर गोस्वामी जैसे व्यक्ति ही पूरी तरह जान सकते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु अपने कृष्ण-प्रेम में क्या आस्वादन करते हैं।

जीव हा करे येइ ताहार वर्णन ।।आपना शोधिते तार छोंये एक 'कण' ॥

२३॥

जब कोई सामान्य जीव श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का वर्णन करता है, तब वह स्वयं उस महासागर की एक बूंद को स्पर्श करके अपने आपको पवित्र बनाता है।

एइ-मत रासेर श्लोक-सकल-इ पड़िला ।शेषे जल-केलिर श्लोक पड़िते लागिला ॥

२४॥

इस तरह रासलीला विषयक सारे के सारे श्लोक सुनाये गये। तब अन्त में जल-क्रीड़ा विषयक लीला का श्लोक सुनाया गया।

ताभिर्युतः श्रममपोहितुमङ्ग-सङ्गघृष्ट-स्रजः स कुच-कुङ्कुम-रञ्जितायाः ।गन्धर्व-पालिभिरनुद्रुत आविशद्वाःश्रान्तो गजीभिरिभ-राडू इव भिन्न-सेतुः ॥

२५॥

जिस तरह हाथियों का स्वतन्त्र प्रमुख अपनी हथिनियों के साथ जल में प्रवेश करता है, उसी तरह वैदिक नैतिकता के सिद्धान्तों से परे कृष्ण ने गोपियों समेत यमुना में प्रवेश किया। उनका वक्षस्थल गोपियों के उरोजों के संपर्क में आने के कारण उनके गले की माला मर्दित हो गई। थी और वह लाल कुंकुम चूर्ण से रँग गई थी। उस माला की सुगन्ध से आकृष्ट होकर भौंरे कृष्ण का पीछा करने लगे मानों गन्धर्व लोक के दैवी जीव हों। इस तरह भगवान् कृष्ण ने रासलीला की थकान को दूर किया।

एइ-मत महाप्रभु भ्रमिते भ्रमिते ।आइटोटा हैते समुद्र देखेन आचम्बिते ॥

२६॥

इस तरह आइटोटा मन्दिर के निकट भ्रमण करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने सहसा समुद्र देखा।

चन्द्र-कान्त्ये उछलित तरङ्ग उज्वल ।झलमल करे,--ग्रेन 'यमुनार जल' ॥

२७॥

चन्द्रमा के उज्वल प्रकाश से चमकती समुद्र की ऊँची-ऊँची लहरें यमुना नदी के जल जैसी झलमल कर रही थीं।

ग्नमुनार भ्रमे प्रभु धा चलिला ।।अलक्षिते ग्राइ' सिन्धु-जले झाँप दिला ॥

२८॥

समुद्र को यमुना नदी समझकर महाप्रभु तेजी से दौड़े और अन्यों के देखे बिना जल में कूद पड़े।

पड़ितेइ हैल मूच्र्छा, किछुइ ना जाने ।कभु डुबाय, कभु भासाय तरङ्गेर गणे ॥

२९॥

समुद्र में गिरते ही उनकी चेतना चली गई और वे यह न समझ सके कि वे कहाँ हैं। वे कभी लहरों के नीचे डूब जाते और कभी उनके ऊपर तैरते रहते।

तरङ्गे वहिया फिरे,--ग्रेन शुष्क काष्ठ ।के बुझिते पारे एइ चैतन्येर नाट? ॥

३०॥

लहरें उन्हें इधर-उधर बहा ले गईं मानो कोई सुखे काठ का लट्ठा हो। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा किये जाने वाले इस नाटकीय प्रदर्शन को कौन समझ सकता है? कोणार्केर दिके प्रभुरे तरङ्गे ला ग्राय ।।कभु डुबाबा राखे, कभु भासा ला ग्राय ॥

३१॥

लहरें कभी महाप्रभु को डुबो देतीं और कभी ऊपर तैराये रखतीं। इस तरह वे उन्हें कोणार्क मन्दिर की ओर बहा ले गईं।

यमुनाते जल-केलि गोपी-गण-सङ्गे।।कृष्ण करेन–महाप्रभु मग्न सेइ रङ्गे ॥

३२॥

भगवान् कृष्ण ने गोपियों के साथ यमुना के जल में जो लीलाएँ की थीं, श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हीं लीलाओं में पूरी तरह निमग्न थे।

इहाँ स्वरूपादि-गण प्रभु ना देखियो ।‘काहाँ गेला प्रभु?' कहे चमकित हा ॥

३३॥

इस बीच स्वरूप दामोदर इत्यादि सारे भक्तों ने जब श्री चैतन्य महाप्रभु को नहीं देखा, तो वे सभी चकित होकर यह पूछते हुए उनको खोजने लगे कि, महाप्रभु कहाँ चले गये? मनो-वेगे गेला प्रभु, देखिते नारिला ।प्रभुरे ना देखिया संशय करिते लागिला ॥

३४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु मन के वेग से भागे थे। कोई उन्हें नहीं देख सका अतः वे कहाँ थे उसके विषय में सारे लोग संशय में थे।

‘जगन्नाथ देखिते किबा देवालये गेला? ।।अन्य उद्याने किबी उन्मादे पड़िला? ॥

३५॥

क्या महाप्रभु जगन्नाथजी के मन्दिर गये हैं या वे उन्मत्ततावश किसी उद्यान में गिर पड़े हैं? गुण्डिचा-मन्दिरे गेला, किबा नरेन्द्ररे? ।।चटक-पर्वते गेला, किबा कोणार्केरे?' ॥

३६॥

हो सकता है कि वे गुण्डिचा मन्दिर गये हैं या नरेन्द्र सरोवर अथवा चटक पर्वत गये हैं। हो सकता है कि वे कोणार्क के मन्दिर में गये हों।

एत बलि' सबे फिरे प्रभुरे चाहिया ।।समुद्रेर तीरे आइला कत जन लजा ॥

३७॥

इस तरह बातें करते हुए भक्त जन महाप्रभु को खोजने के लिए इधरउधर घूमने लगे। अन्त में वे अन्य अनेक लोगों समेत समुद्र के किनारे आये।।

चाहिये बेड़ाइते ऐछे रात्रि-शेष हैल ।'अन्तर्धान है-इला प्रभु', निश्चय करिल ॥

३८ ॥

इस तरह महाप्रभु की खोज करते हुए रात बीत गई। अतः उन्होंने निश्चय किया, अब श्री चैतन्य महाप्रभु अन्तर्धान हो गये हैं।

प्रभुर विच्छेदे कार देहे नाहि प्राण ।अनिष्टा-शङ्का विना कार मने नाहि आन ॥

३९॥

महाप्रभु के वियोग में सबों को ऐसा लग रहा था मानो उनके प्राण निकल चुके हों। सभी भक्तों ने यह निष्कर्ष निकाला कि अवश्य ही कोई दुर्घटना घटी है। इसके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं सोच पाये।

अनिष्ट-शङ्कीनि बन्धु-हृदयानि भवन्ति हि ॥

४०॥

कोई सम्बन्धी या घनिष्ठ मित्र अपने प्रिय के अनिष्ट के प्रति सदैव भयभीत रहता है।"

समुद्रेर तीरे आसि' झुकति करिला ।।चिरायु-पर्वत-दिके कत-जन गेला ॥

४१॥

जब वे समुद्र के किनारे आये, तो उन्होंने परस्पर विचार-विमर्श किया। तब उनमें से कुछ लोग श्री चैतन्य महाप्रभु को ढूंढ़ने चटक पर्वत गये।

पूर्व-दिशाय चले स्वरूप लञा कत जन ।सिन्धु-तीरे-नीरे करेन प्रभुर अन्वेषण ॥

४२॥

स्वरूप दामोदर अन्यों के साथ महाप्रभु को समुद्र के किनारे अथवा जल में ढूंढते हुए पूर्व की ओर बढ़े।

विषादे विह्वल सबे, नाहिक 'चेतन'।तबु प्रेमे बुले करि' प्रभुर अन्वेषण ॥

४३॥

सारे लोग खिन्नता से विह्वल थे और लगभग अचेत जैसे हो गये थे, किन्तु प्रेमवश वे सभी महाप्रभु को खोजने के लिए इधर-उधर घूमते रहे।

देखेन–एक जालिया आइसे कान्धे जाल करि' ।हासे, कान्दे, नाचे, गाय, बले ‘हरि' ‘हरि' ॥

४४॥

समुद्र तट से होकर जाते हुए सबों ने एक मछुआरे को आते देखा, जो अपने कन्धे पर अपना जाल लिये था। वह हँसता, रोता, नाचता तथा गाता हरि, हरि का उच्चारण किये जा रहा था।

जालियार चेष्टा देखि' सबार चमत्कार ।।स्वरूप-गोसाजि तारे पुछेन समाचार ॥

४५ ॥

मछुआरे के कार्यकलाप को देखकर सारे लोग आश्चर्यचकित हो गये। इसलिए स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने उससे समाचार पूछा।

कह, जालिया, एइ दिके देखिला एक-जन? ।।तोमार एइ दशा केने,—कहत' कारण? ॥

४६ ।। उन्होंने कहा, हे मछुआरे, तुम ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हो? क्या तुमने इधर किसी व्यक्ति को देखा है? तुम्हारे इस व्यवहार का क्या कारण है? कृपा करके हमसे कहो।

जालिया कहे,—इहाँ एक मनुष्य ना देखिल । जाल वाहिते एक मृतक मोर जाले आइल ॥

४७॥

मछुआरे ने उत्तर दिया, मैंने यहाँ एक भी व्यक्ति को नहीं देखा, किन्तु जल में अपना जाल डालते समय मैंने एक शव को पकड़ा है।

बड़ मत्स्य बलि' आमि उठाइर्तुं यतने । मृतक देखिते मोर भय हैल मने ॥

४८॥

मैंने यह सोचकर कि कोई बड़ी मछली है उसे बड़ी सावधानी से उठाया, किन्तु ज्योंहीं मैंने देखा कि यह एक शव है, तो मेरे मन में अति भय व्याप्त हो गया।

जाल खसाइते तार अङ्ग-स्पर्श ह-इल ।। स्पर्श-मात्रे सेइ भूत हृदये पशिल ॥

४९॥

जब मैं जाल छुड़ाने का प्रयास कर रहा था, तब मैंने उस शरीर का स्पर्श किया और ज्योंही मैंने उसे स्पर्श किया, एक भूत मेरे हृदय में प्रविष्ट हो गया।

भये कम्प हैल, मोर नेत्रे वहे जल ।।गद्गद वाणी, रोम उठिल सकल ॥

५०॥

मैं भय से काँप उठा और मेरी आँखों से आंसू बहने लगे, मेरी वाणी अवरुद्ध होने लगी और मेरे शरीर के सारे रोम खड़े हो गये।

किबा ब्रह्म-दैत्य, किबा भूत, कहने ना ग्राय ।दर्शन-मात्रे मनुष्येर पैशे सेइ काय ॥

५१॥

मैं नहीं जानता कि वह शव किसी मृत ब्राह्मण का भूत था या किसी सामान्य व्यक्ति का, किन्तु ज्योंही कोई इसे देखता है, तो यह उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है।

शरीर दीघल तार–हात पाँच-सात । एकेक-हस्त-पद तार, तिन तिन हात ॥

५२॥

इस भूत का शरीर बहुत लम्बा, पाँच-सात हाथ तक है। उसकी भुजाएँ तथा टाँगें तीन-तीन हाथ लम्बी हैं।

अस्थि-सन्धि छुटिले चर्म करे नड़-बड़े । ताहा देखि' प्राण कार नाहि रहे धड़े ॥

५३॥

चमड़ी के नीचे के इसके सारे के सारे हड्डियों के जोड़ अलगअलग हो गये हैं और पूरी तरह से ढीले हो चुके हैं। कोई इसे देख नहीं सकता, न उसे देखने पर कोई जीवित रह सकता है।

मड़ा-रूप धरि' रहे उत्तान-नयन ।। कभु गों-गों करे, कभु रहे अचेतन ॥

५४॥

उस भूत ने शव का रूप धारण कर लिया है, किन्तु उसकी आँश्ये खुली हुई हैं। कभी वह गों गों का शब्द करता है और कभी अचेत पड़ा रहता है।

साक्षात् देखेछौं,—मोरे पाइल सेइ भूत । मुइ मैले मोर कैछे जीवे स्त्री-पुत् ॥

५५॥

मैंने उस भूत को प्रत्यक्ष देखा है और वह मेरे चारों ओर घूम रहा है। किन्तु यदि मैं मर जाऊँ, तो मेरी पत्नी तथा बच्चों की देखभाल कौन करेगा? सेइ त' भूतेर कथा कहन ना ग्राय ।ओझा-ठाजि ग्राइछों,—यदि से भूत छाड़ाय ॥

५६॥

उस भूत के बारे में कुछ कह पाना सचमुच बहुत कठिन है, किन्तु मैं कोई ओझा को ढूंढने जा रहा हूँ और मैं उससे पूछूगा कि क्या वह मुझे इससे छुटकारा दिला सकता है? एका रात्र्ये बुलि' मत्स्य मारिये निर्जने । भूत-प्रेत आमार ना लागे ‘नृसिंह'-स्मरणे ॥

५७ ॥

मैं रात में एकान्त स्थानों में मछली मारता फिरता हूँ; फिर भी भूत प्रेत मुझे नहीं छू पाते, क्योंकि मैं नृसिंह देव की स्तुति का स्मरण करता हूँ । एइ भूत नृसिंह-नामे चापये द्विगुणे । ताहार आकार देखिते भय लागे मने ॥

५८ ॥

किन्तु यह भूत मेरे द्वारा नृसिंह मन्त्र का उच्चारण करने पर दूनी शक्ति से मुझे पछाड़ देता है। इस भूत को देखते ही मेरे मन में अत्यधिक भय उठने लगता है।

ओथा ना ग्राइह, आमि निषेधि तोमारे । ताहाँ गेले सेइ भूत लागिबे सबारे ॥

५९॥

आप वहाँ मत जायें। मैं आपको मना करता हूँ। यदि आप जायेंगे, तो वह भूत आप सबको पकड़ लेगा।

एत शुनि' स्वरूप-गोसाबि सब तत्त्व जानि' ।जालियारे किछु कय सुमधुर वाणी ॥

६० ॥

यह सुनकर स्वरूप दामोदर इस बात की पूरी हकीकत समझ गये ।। वे उस मछुआरे से मधुर वाणी में बोले।

‘आमि-बड़ ओझा जानि भूत छाड़ाइते' ।।मन्त्र पड़ि' श्री-हस्त दिला ताहार माथाते ॥

६१॥

उन्होंने कहा, मैं एक प्रसिद्ध ओझा हूँ और मैं जानता हूँ कि तुम्हें इस भूत से कैसे छुड़ाना होगा। तब उन्होंने कुछ मन्त्र पढ़े और मछुआरे के सिर पर अपना हाथ रखा।

तिन चापड़ मारि' कहे,–'भूत पलाइल ।।भय ना पाइह'बलि' सुस्थिर करिल ॥

६२॥

उन्होंने उस मछुआरे को तीन थप्पड़ लगाये और कहा, अब भूत भाग गया है। डरो मत। यह कहकर उन्होंने मछुआरे को सान्त्वना दी।

एके प्रेम, आरे भय, द्विगुण अस्थिर ।।भय-अंश गेल,—से हैल किछु धीर ॥

६३॥

मछुआरा उन्मत प्रेम से प्रभावित था, किन्तु भयभीत भी था। इस तरह वह दुगुना चंचल हो गया था। किन्तु अब उसका भय शमित हो चुका था और वह कुछ सामान्य हो गया था।

स्वरूप कहे, याँरे तुमि कर 'भूत'-ज्ञाने।भूत नहे—तेंहो कृष्ण-चैतन्य भगवान् ॥

६४॥

स्वरूप दामोदर ने मछुआरे से कहा, हे महाशय, जिसे तुम भूत मान रहे हो वह वास्तव में भूत नहीं, अपितु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु हैं।

प्रेमावेशे पड़िला तेंहो समुद्रेर जले ।। तौरे तुमि उठाइला अपनार जाले ॥

६५॥

प्रेमावेश के कारण महाप्रभु समुद्र में गिर पड़े और तुमने उन्हें अपने जाल में पकड़कर उनकी रक्षा की है।

ताँर स्पर्शे ह-इल तोमार कृष्ण-प्रेमोदय । भूत-प्रेत-ज्ञाने तोमार हैल महा-भय ॥

६६ ॥

उनके स्पर्श मात्र से तुम्हारा सुप्त कृष्ण-प्रेम जाग उठा है, किन्तु तुमने उन्हें भूत मान लिया था, इसीलिए तुम उनसे इतना अधिक डरे हुए। थे।

एबे भय गेल, तोमार मन हैल स्थिरे ।काहाँ ताँरै उठाछ, देखाह आमारे ॥

६७ ॥

अब चूंकि तुम्हारा भय जा चुका है और तुम्हारा मन शान्त है, अतएव मुझे दिखलाओ कि वे कहाँ हैं? जालिया कहे,–प्रभुरे देख्याछों बार-बार ।।तेहो नहेन, एइ अति-विकृत आकार ॥

६८॥

मछुआरे ने उत्तर दिया, मैंने महाप्रभु को कई बार देखा है, किन्तु वे यह नहीं हैं। यह शरीर तो अत्यन्त विकृत है।

स्वरूप कहे,–ताँर हय प्रेमेर विकार ।अस्थि-सन्धि छाड़े, हय अति दीर्घाकार ॥

६९ ॥

स्वरूप दामोदर ने कहा, महाप्रभु का शरीर ईश्वर-प्रेम के कारण विकृत हो जाता है। कभी उनकी हड्डियों के जोड़ अलग हो जाते हैं और उनका शरीर अत्यन्त लम्बा हो जाता है।

शुनि, सेइ जालिया आनन्दित ह-इल ।सबा ला गेल, महाप्रभुरे देखाइल ॥

७० ॥

यह सुनकर मछुआरा अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने अपने साथ सारे भक्तों को ले जाकर उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु का स्थान दिखलाया।

भूमिते पड़ि' आछे प्रभु दीर्घ सब कार्य ।जले श्वेत-तनु, वालु लागियाछे गाय ॥

७१॥

महाप्रभु भूमि पर लेटे थे। उनका शरीर लम्बा तथा जल से सफेद रंग का हो गया था। वे सिर से पाँव तक बालू से सने थे।

अति-दीर्घ शिथिल तनु-चर्म नट्काय । दूर पथ उठाना घरे आनान ना ग्राय ॥

७२ ॥

महाप्रभु का शरीर लम्बा हो गया था और उनकी चमड़ी ढीली होकर लटक रही थी। उन्हें उठाकर लम्बी दूरी तक घर ले जाना असम्भव था।

आर्द्र कौपीन दूर करि' शुष्क पराञा । बहिर्वासे शोयाइला वालुका छाड़ा ॥

७३॥

भक्तों ने उनका गीला कौपीन हटाया और उसके स्थान पर सूखा कौपीन पहनाया। तब उन्होंने महाप्रभु को उत्तरीय वस्त्र पर लिटाकर उनके शरीर की बालू हटाई।

सबे मेलि' उच्च करि' करेन सङ्कीर्तने । उच्च करि' कृष्ण-नाम कहेने प्रभुर काणे ॥

७४॥

उन सबों ने महाप्रभु के कान में कृष्ण का उच्च स्वर से पवित्र नाम लेकर संकीर्तन किया।

कत-क्षणे प्रभुर काणे शब्द परशिल ।। हुङ्कार करिया प्रभु तबहि उठिल ॥

७५ ॥

कुछ समय के बाद महाप्रभु के कान में पवित्र नाम की ध्वनि प्रविष्ट हुई, तो वे उच्च हुंकार करते हुए तुरन्त उठ खड़े हुए।

उठितेइ अस्थि सब लागिल निज-स्थाने । ‘अर्ध-बाह्ये' इति उति करेन दरशने ॥

७६॥

उनके उठते ही उनकी हड्डियाँ अपने सही स्थानों पर आ गईं। महाप्रभु ने आर्ध बाह्य चेतना से इधर-उधर देखा।

तिन-दशाय महाप्रभु रहेन सर्व-काल ।। ‘अन्तर्दशा', ‘बाह्य-दशा’, ‘अर्ध-बाह्य' आर ॥

७७॥

महाप्रभु सभी समय चेतना की तीन दशाओं-अन्तः, बहिः तथा अर्धबाह्य दशाओं में से किसी एक में रहते थे।

अन्तर्दशार किछु घोर, किछु बाह्य-ज्ञान । सेइ दशा कहे भक्त 'अर्ध-बाह्य'-नाम ॥

७८ ॥

जब महाप्रभु अन्त:चेतना में गम्भीरता से मग्न रहते हुए भी कुछ बाह्य चेतना प्रदर्शित करते थे, तो भक्त उनकी इस दशा को अर्धबाह्य कहते थे।

‘अर्ध-बाह्ये' कहेन प्रभु प्रलाप-वचने । आकाशे कहेन प्रभु, शुनेन भक्त-गणे ॥

७९॥

इस अर्धबाह्य चेतना में श्री चैतन्य महाप्रभु उन्मत्त की तरह बातें करते थे। भक्तगण उन्हें आकाश से बातें करते स्पष्ट रूप से देख सकते थे।

कालिन्दी देखिया आमि गेलाङवृन्दावन ।। देखि,—जल-क्रीड़ा करेन व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

८०॥

उन्होंने कहा, यमुना नदी को देखकर मैं वृन्दावन चला गया। वहाँ मैंने नन्द महाराज के पुत्र को जल में क्रीड़ा करते देखा।

राधिकादि गोपी-गण-सङ्गे एकत्र मेलि' ।यमुनार जले महा-रङ्गे करेन केलि ॥

८१॥

भगवान् कृष्ण श्रीमती राधारानी इत्यादि गोपियों के साथ यमुना के जल में थे। वे अत्यन्त क्रीड़ामय ढंग से लीलाएँ कर रहे थे।

तीरे रहि' देखि आमि सखी-गण-सङ्गे।। एक-सखी सखी-गणे देखाय सेइ रङ्गे ॥

८२॥

मैंने यह लीला गोपियों के साथ यमुना के किनारे खड़े होकर देखी। एक गोपी दूसरी गोपियों को राधा तथा कृष्ण की जल लीला दिखला रही थी।

पट्ट-वस्त्र, अलङ्कारे, समर्पिया सखी-करे,सूक्ष्म-शुक्ल-वस्त्र-परिधान ।। कृष्ण ला कान्ता-गण, कैला जलावगाहन,जल-केलि रचिला सुठाम ॥

८३॥

सारी गोपियों ने अपने रेशमी वस्त्र तथा आभूषण अपनी सखियों को सौंप दिये और महीन सफेद वस्त्र धारण कर लिया। भगवान् कृष्ण ने अपनी प्रिय गोपियों को साथ लेकर स्नान किया और यमुना के जल में अत्युत्तम लीलाएँ सम्पन्न कीं।

सखि हे, देख कृष्णेर जल-केलि-रङ्गे कृष्ण मत्त करि-वर, चञ्चल कर-पुष्कर, । गोपी-गण करिणीर सङ्गे ॥

८४॥

हे सखियों, जरा कृष्ण की जलक्रीड़ा को तो देखो! कृष्ण की चंचल हथेलियाँ कमल के फूल समान हैं। कृष्ण उन्मत्त हाथियों के सरदार लगते हैं और उनके साथ की गोपियाँ हथिनियों जैसी हैं।

आरम्भिला जल-केलि, अन्योन्ये जल फेलाफेलि,हुड़ाहुड़ि, वर्षे जल-धार । सबे जय-पराजय, नाहि किछु निश्चय,जल-ग्रुद्ध बाड़िल अपार ॥

८५॥

जल क्रीड़ा प्रारम्भ हुई और हर कोई आगे-पीछे जल उछालने लगा। जल की प्रबल उथल-पुथल में यह निश्चित नहीं हो पा रहा था कि कौन सा पक्ष जीत रहा है और कौन सा हार रहा है। यह जल युद्ध ( जलकेलि ) की क्रीड़ा अपार रीति से बढ़ती गई।

वर्षे स्थिर तड़िगण, सिचे श्याम नव-घन, घन वर्षे तड़ित् उपरे ।। सखी-गणेर नयन, तृषित चातक-गण,सेइ अमृत सुखे पान करे ॥

८६ ।। गोपियाँ बिजली की स्थिर रेखाओं जैसी थीं और कृष्ण श्याम मेघ के तुल्य थे। बिजली ने बादल के ऊपर जल छिड़कना शुरू किया और बादल ने बिजली पर। गोपियों की आँखें तृषित पपीहों की तरह बादल के अमृततुल्य जल को सुखपूर्वक पिये जा रही थीं।

प्रथमे युद्ध जलाजलि', तबे युद्ध' कराकरि',तार पाछे युद्ध मुखामुखि' ।। तबे मुद्ध'हृदाहृदि', तबे हैलरदारदि', तबे हैल ग्रुद्ध 'नखानखि' ॥

८७॥

जब युद्ध प्रारम्भ हो गया, तो उन्होंने एक दूसरे पर पानी उछाला। तब उन्होंने हाथ से हाथ, फिर मुख से मुख, छाती से छाती, दाँत से दाँत और अन्त में नाखून से नाखून की लड़ाई की।

सहस्र-करे जल सेके, सहस्र नेत्रे गोपी देखे,सहस्र-पदे निकट गमने । सहस्र-मुख-चुम्बने, सहस्र-वपु-सङ्गमे, गोपी-नर्म शुने सहस्र-काणे ॥

८८ ॥

हजारों हाथों ने पानी उछाला और गोपियों ने कृष्ण को हजारों आँखों से देखा। वे हजारों पाँवों से उनके निकट आईं और उन्होंने हजारों मुखों से उनका चुम्बन किया। हजारों शरीरों ने उनका आलिंगन किया। गोपियों ने हजारों कानों से उनके परिहास-वचन सुने।

कृष्ण राधा ला बले, गेला कण्ठ-दघ्न जले, | छाड़िला ताहाँ, याहाँ अगाध पानी ।। तेंहो कृष्ण-कण्ठ धरि', भासे जलेर उपरि,गजोत्खाते ट्रैछे कमलिनी ॥

८९॥

कृष्ण श्रीमती राधारानी को बलपूर्वक दूर बहाकर उनके गले तक पानी के भीतर ले गये। तब उन्होंने उन्हें वहाँ पर छोड़ दिया, जहाँ पानी बहुत गहरा था। किन्तु उन्होंने कृष्ण का गला पकड़ लिया और पानी के ऊपर इस तरह तैरती रहीं, मानो हाथी की सैंड द्वारा तोड़ा गया कमल का फूल हो।

ग्रत गोप–सुन्दरी, कृष्ण तत रूप धरि', सबार वस्त्र करिला हरणे ।। यमुना-जल निर्मल, अङ्ग करे झलमल,सुखे कृष्ण करे दरशने ॥

१०॥

जितनी गोपियाँ थीं, कृष्ण ने उतने ही रूपों में अपना विस्तार कर लिया और तब उनके पहने हुए सारे वस्त्रों को छीन लिया। यमुना नदी को जल निर्मल था, अतः कृष्ण ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक गोपियों के झलमलाते अंगों का दर्शन किया।

पद्मिनी-लता-सखी-चय, कैल कारो सहाय,तरङ्ग-हस्ते पत्र समर्पिल । । केह मुक्त-केश-पाश, आगे कैल अधोवास, | हस्ते केह कञ्चुलि धरिल ॥

९१॥

कमलनाल गोपियों के मित्र थे, जिन्होंने कमल की पत्तियाँ देकर उनकी सहायता की। कमलों ने यमुना की लहरों रूपी अपने हाथों से विशाल गोल पत्तियों को पानी की सतह पर फैलाकर गोपियों के शरीरों को ढक दिया। कुछ गोपियों ने अपने शरीर के अधोभागों को ढकने के लिए अपने बालों को खोलकर अपने सामने का वस्त्र बना लिया और अपने हाथों रूपी चोलियों से अपने स्तनों को ढक लिया।

कृष्णेर कलह राधा-सने, गोपी-गण सेइ-क्षणे,हेमाब्ज-वने गेला लुकाइते ।। आकण्ठ-वपु जले पैशे, मुख-मात्र जले भासे, पद्म-मुखे ना पारि चिनिते ॥

९२॥

| तब कृष्ण ने श्रीमती राधारानी से झगड़ना शुरू किया और सारी गोपियाँ श्वेत कमल पुष्यों के समूह में छिप गईं। उन्होंने अपने शरीरों को गले तक पानी में डुबो दिया। केवल उनके मुख ही पानी की सतह पर तैर रहे थे और ये मुख कमलों से अलग पहचाने नहीं जा रहे थे।

एथा कृष्ण राधा-सने, कैला ग्रे आछिल मने, |गोपी-गण अन्वेषिते गेला । तबे राधा सूक्ष्म-मति, जानिया सखीर स्थिति,सखी-मध्ये आसिया मिलिला ॥

९३॥

अन्य गोपियों की अनुपस्थिति में भगवान् कृष्ण ने श्रीमती राधारानी के साथ स्वतन्त्र होकर इच्छानुसार व्यवहार किया। जब गोपियाँ कृष्ण की खोज करने लगीं, तो श्रीमती राधारानी, अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि वाली होने तथा अपनी सखियों की स्थिति जानने के कारण तुरन्त ही जाकर उनके बीच मिल गईं।

ग्रत हेमाब्ज जले भासे, तत नीलाब्ज तार पाशे,आसि' आसि' करये मिलन । नीलाब्जे हेमाब्जे ठेके, युद्ध हय प्रत्येके,कौतुके देखे तीरे सखी-गण ॥

९४॥

जल में अनेक श्वेत कमल तैर रहे थे और उतने ही नीलकमल पास आ गये। जब वे पास आये, तो श्वेत तथा नीले कमलों की भिड़न्त हुई और वे एक दूसरे से युद्ध करने लगे। गोपियाँ यमुना के किनारे से बड़े ही विनोद से यह दृश्य देख रही थीं।

चक्रवाक-मण्डल, पृथक्पृथक् गुगल,जल हैते करिल उद्गम । उठिल पद्म-मण्डल, पृथक्पृथक् झुगल, चक्रवाके कैल आच्छादन ॥

९५॥

जब गोपियों के उन्नत उरोज, जो कि चक्रवाक पक्षियों के गोलमटोल शरीरों के सदृश थे, जल में से पृथक्-पृथक् जोड़ों में बाहर आये, तो कृष्ण के नीलकमल सदृश हाथ उन्हें ढकने के लिए ऊपर उठ गये।

उठिल बहु रक्तोत्पल, पृथक्पृथक् झुगल,पद्म-गणेर कैल निवारण । ‘पद्म' चाहे लुटि' निते, ‘उत्पल' चाहे राखिते','चक्रवाक' लागि' मुँहार रणे ॥

९६॥

गोपियों के हाथ, जो कि लालकमल के फूलों के समान थे, नीले फूलों को रोकने के लिए जोड़ी बनाकर जल के बाहर उठे। नीले कमलों ने श्वेत चक्रवाक पक्षियों को लूटना चाहा और लालकमलों ने उनकी रक्षा करने का प्रयास किया। इस तरह दोनों के बीच युद्ध हुआ।

पद्मोत्पल–अचेतन, चक्रवाक सचेतन,चक्रवाके पद्म आस्वादय । इहाँ वँहार उल्टा स्थिति, धर्म हैल विपरीति,कृष्णेर राज्ये ऐछे न्याय हय ॥

९७॥

नीलकमल सूर्यदेव के मित्र हैं और वे सभी एक साथ रहते हैं, किन्तु नीलकमल चक्रवाकों को लूटते रहते हैं। किन्तु लालकमल रात में खिलते हैं, अतएव वे चक्रवाकों के लिए अपरिचित अथवा शत्रु हैं। फिर भी कृष्ण की लीलाओं में गोपियों के कर रूप ये लालकमल उनके चक्रवाक रूपी स्तनों की रक्षा करते हैं। यह विरोध अलंकार है।

मित्रेर मित्र सह-वासी, चक्रवाके लुटे आसि', कृष्णेर राज्ये ऐछे व्यवहार । अपरिचित शत्रुर मित्र, राखे उत्पल, ए बड़ चित्र,एइ बड़‘विरोध-अलङ्कार' ॥

९८ ॥

नीले तथा लाल कमल तो अचेतन वस्तु हैं, जबकि चक्रवाक पक्षी चेतन तथा सजीव हैं। तो भी प्रेमवश नीले कमल चक्रवाकों का भोग करने लगे। यह उनके स्वाभाविक व्यवहार के विपरीत है, किन्तु कृष्ण के राज्य में ऐसे विपर्यय तो उनकी लीलाओं के नियम हैं।

अतिशयोक्ति, विरोधाभास, दुइ अलङ्कार प्रकाश,करि' कृष्ण प्रकट देखाइल ।। ग्राहा करि' आस्वादन, आनन्दित मोर मन, | नेत्र-कर्ण-युग्म जुड़ाइल ॥

९९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, कृष्ण ने अपनी लीलाओं में अतिशयोक्ति तथा विरोधाभास अलंकारों का प्रदर्शन किया। इनका आस्वादन करने से मेरे मन को हर्ष हुआ और इससे मेरे कान तथा नेत्र पूर्णतया तुष्ट हो गये।

ऐछे विचित्र क्रीड़ा करि', तीरे आइला श्री-हरि,सङ्गे ला सब कान्ता-गण ।।गन्ध-तैल-मर्दन, आमलकी-उद्वर्तन,सेवा करे तीरे सखी-गण ॥

१००॥

ऐसी अद्भुत लीलाएँ करने के बाद भगवान् श्रीकृष्ण अपनी सभी प्रिय गोपिकाओं को साथ लेकर यमुना नदी के किनारे पर आ गये। तब नदी के किनारे खड़ी गोपियों ने कृष्ण तथा अन्य गोपियों के शरीरों पर सुगन्धित तेल मलकर तथा आमलकी फल का लेप लगाकर सेवा की।

पुनरपि कैल स्नान, शुष्क-वस्त्र परिधान,रत्न-मन्दिरे कैला आगमन । वृन्दा-कृत सम्भार, गन्ध-पुष्प-अलङ्कार,वन्य-वेश करिल रचन ॥

१०१॥

तत्पश्चात् सबों ने पुनः स्नान किया और फिर सूखे वस्त्र पहनने के बाद वे छोटे से रत्न-मन्दिर में गये, जहाँ वृन्दा नामक गोपी ने उन्हें सुगन्धित फूलों, हरी पत्तियों तथा अन्य सभी प्रकार के आभूषणों से सजाकर उनकी वन्य वेशभूषा बना दी।

वृन्दावने तरु-लता, अद्भुत ताहार कथा,बार-मास धरे फुल-फल ।। वृन्दावने देवी-गण, कुञ्ज-दासी व्रत जन, फल पाड़ि' आनिया सकल ॥

१०२ ॥

वृन्दावन में वृक्ष तथा लताएँ अद्भुत हैं, क्योंकि वे बारहों महीने सभी प्रकार के फल तथा फूल उत्पन्न करते हैं। वृन्दावन की कुंजों में। गोपियाँ तथा दासियाँ इन फलों तथा फूलों को तोड़कर राधा तथा कृष्ण के पास ले आई।

उत्तम संस्कार करि', बड़ बड़ थाली भरि',रत्न-मन्दिरे पिण्डार उपरे । भक्षणेर क्रम करि', धरियाछे सारि सारि,आगे आसन वसिबार तरे ॥

१०३ ॥

गोपियों ने सारे फलों के छिलके उतार दिये और उन्हें रत्नमन्दिर के चबूतरे पर बड़ी-बड़ी थालियों में लाकर रख दिये। उन्होंने खाने के लिए फलों को पंक्तियों में सजा दिया और इसके सामने बैठने के लिए आसन बना दिया।

एक नारिकेल नाना-जाति, एक आम्र नाना भाति,कला, कोलि—विविध-प्रकार । पनस, खर्जुर, कमला, नारङ्ग, जाम, सन्तरा,द्राक्षा, बादाम, मेओया व्रत आर ॥

१०४॥

फलों में नाना प्रकार के नारियल तथा आम, केले, बेर, कटहल, खजूर, कमला, नारंगी, जाम, संतरे, अंगूर, बादाम तथा सभी प्रकार के मेवे थे।

खरमुजा, क्षीरिका, ताल, केशुर, पानी-फल, मृणाल, बिल्व, पीलु, दाडिम्बादि ग्रत ।। कोन देशे कार ख्याति, वृन्दावने सब-प्राप्ति,सहस्र-जाति, लेखा ग्राय कत? ॥

१०५॥

वहाँ खरबूजा, क्षीरिका, ताड़ के फल, केशुर, पानीफल, कमल के फल, बेल, पीलु, अनार तथा अन्य कई फल थे। इनमें से कुछ भिन्न-भिन्न स्थानों में विविध नामों से जाने जाते हैं, किन्तु वे सभी वृन्दावन में इतने हजार प्रकारों में सदैव उपलब्ध रहते हैं कि कोई उनका वर्णन नहीं कर सकता।

गङ्गाजल, अमृतकेलि, पीयूषग्रन्थि, कर्पूरकेलि,सरपूरी, अमृति, पद्मचिनि खण्ड-क्षीरसार-वृक्ष, घरे करि' नाना भक्ष्य,राधा ग्राहा कृष्ण लागि' आनि ॥

१०६ ।। श्रीमती राधारानी ने घर पर दूध तथा मिश्री से अनेक प्रकार की मिठाईंयाँ बनाई थीं, यथा गंगाजल, अमृतकेलि, पीयूषग्रंथि, कपूरकेलि, सरपूरी, अमृति, पद्मचिनि तथा खण्डक्षीरसार वृक्ष। तब वे इन सबों को कृष्ण के लिए ले आई थीं।

भक्ष्येर परिपाटी देखि', कृष्ण हैला महा-सुखी,वसि' कैले वन्य भोजन ।। सङ्गे ला सखी-गण, राधा कैला भोजन,मुँहे कैला मन्दिरे शयन ॥

१०७॥

जब कृष्ण ने भोजन की उत्तम व्यवस्था देखी, तो वे प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये और उन्होंने वन्य भोजन किया। तब श्रीमती राधारानी तथा उनकी गोपी सखियों ने शेष बचे हुए का भोजन किया और उसके बाद कृष्ण तथा राधा उस रत्नमन्दिर में एक ही साथ लेट गये।

केह करे वीजन, केह पाद-सम्वाहन,केह कराय ताम्बूल भक्षण । राधा-कृष्ण निद्रा गेला, सखी-गण शयन कैला,देखि' आमार सुखी हैल मन ॥

१०८।। कुछ गोपियाँ राधा तथा कृष्ण पर पंखा झल रही थीं, कुछ उनके पाँव दबा रही थीं और कुछ उन्हें पान खिला रही थीं। जब राधा तथा कृष्ण सो गये, तो सारी गोपियाँ भी लेट गईं। जब मैंने यह देखा, तो मेरा मन अत्यन्त आनन्दित हुआ।

हेन-काले मोरे धरि, महा-कोलाहल करि',तुमि-सब इहाँ लजा आइला ।। काँहा यमुना, वृन्दावन, काँहा कृष्ण, गोपी-गण, सेइ सुख भङ्ग कराइला! ॥

१०९।। एकाएक तुम लोगों ने घोर शब्द उत्पन्न किया और मुझे उठाकर फिर से यहाँ ले आये। अब यमुना नदी कहाँ है? कहाँ है वृन्दावन? कहाँ हैं कृष्ण तथा गोपियाँ? तुम लोगों ने तो मेरे सुखद स्वप्न को भंग कर दिया! एतेक कहिते प्रभुर केवल 'बाह्य' हैल । स्वरूप-गोसाजिरे देखि' ताँहारे पुछिल ॥

११०॥

इस तरह कहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी बाह्य चेतना में पूरी तरह फिर से लौट आये। स्वरूप दामोदर गोस्वामी को देखकर महाप्रभु ने पूछा।

‘इहाँ केने तोमरा आमारे ला आइला?'। स्वरूप-गोसाञि तबे कहिते लागिला ॥

१११॥

उन्होंने पूछा, तुम मुझे यहाँ क्यों ले आये? तब स्वरूप दामोदर ने उन्हें उत्तर दिया।

यमुनार भ्रमे तुमि समुद्रे पड़िला ।।समुद्रेर तरङ्गे आसि, एत दूर आइला! ॥

११२॥

आप समुद्र को यमुना नदी समझकर उसमें कूद पड़े थे। आप समुद्र की लहरों से इतनी दूर बहाकर लाये गये हो।

एइ जालिया जाले करि' तोमा उठाइल । तोमार परशे एइ प्रेमे मत्त ह-इल ॥

११३॥

इस मछुआरे ने आपको अपने जाल में पकड़ा और जल से आपको बचाया। अब वह आपका स्पर्श करने से कृष्ण के प्रेमावेश में पागल हो गया है।

सब रात्रि सबे बेड़ाइ तोमारे अन्वेषिया ।। जालियार मुखे शुनि' पाइनु आसिया ॥

११४॥

हम लोग आपको रात भर खोजते रहे। इस मछुआरे से सुनकर हम यहाँ आये, तो हमें आप मिल गये।

तुमि मूच्र्छा-छले वृन्दावने देख क्रीड़ा । तोमार मूच्र्छा देखि' सबे मने पाइ पीड़ा ॥

११५॥

जब आप बाह्य रूप से अचेत थे, तभी आपने वृन्दावन में लीलाएँ देखीं, किन्तु जब हम लोगों ने आपको अचेत देखा, तो हमारे मनों में महान् पीड़ा हुई।

कृष्ण-नाम ल-इते तोमार' अर्ध-बाह्य' ह-इल । ताते ये प्रलाप कैला, ताहा ये शुनिल ॥

११६॥

किन्तु जब हम लोगों ने कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण किया, तो आपको अर्ध चेतना आई और हम आपको उन्मत्त की तरह बोलते सुनते रहे।

प्रभु कहे, स्वप्ने देखि' गेलाङवृन्दावने । देखि, कृष्ण रास करेन गोपीगण-सने ॥

११७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं स्वप्न में वृन्दावन चला गया, जहाँ मैंने भगवान् कृष्ण को सारी गोपियों के साथ रास नृत्य करते देखा।

जल-क्रीड़ा करि' कैला वन्य-भोजने । देखि' आमि प्रलाप कैलँ–हेन लय मने ॥

११८॥

जल में क्रीड़ा करने के बाद कृष्ण ने वन्य भोजन का आनन्द लिया। मैं समझ सकता हूँ कि इसे देखने के बाद मैंने अवश्य ही उन्मत्त की तरह बातें की होंगी।

तबे स्वरूप-गोसाजि तैरै स्नान कराञा । प्रभुरे लञा घर आइला आनन्दित हा ॥

११९॥

तत्पश्चात् स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को समुद्र में नहलाया और तब वे उन्हें अत्यन्त आनन्दित भाव से घर ले आये।

एइ त कहिलँ प्रभुर समुद्र-पतन ।इहा येइ शुने, पाय चैतन्य-चरण ॥

१२०॥

इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के समुद्र में गिरने की घटना का वर्णन किया है। जो भी इस लीला को सुनेगा, वह निश्चय ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त करेगा।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१२१॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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