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अध्याय बीस: शिक्षाष्टक प्रार्थनाएँ

प्रेमोद्भावित-हर्षेद्वेग-दैन्यार्ति-मिश्रितम् ।लपितं गौरचन्द्रस्य भाग्यवद्भिर्निषेव्यते ॥

१॥

केवल अति भाग्यशाली व्यक्ति ही श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रलापों का आस्वादन करेगा, क्योंकि वे हर्ष, ईष्र्या, उद्वेग, दैन्य तथा संताप से मिश्रित हैं और सभी प्रेमावेश से उत्पन्न होते हैं।

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत चन्द्र की जय हो तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! एइ-मत महाप्रभु वैसे नीलाचले ।।रजनी-दिवसे कृष्ण-विरहे विह्वले ॥

३॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु इस तरह से जगन्नाथ पुरी ( नीलाचल) में निवास कर रहे थे, तब वे रात-दिन लगातार कृष्ण के विरह से अभिभूत रहते थे।

स्वरूप, रामानन्द,—एइ दुइजन-सने । रात्रि-दिने रस-गीत-श्लोक आस्वादने ॥

४॥

वे स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रामानन्द राय, इन दो संगियों के साथ रात-दिन दिव्य आनन्दमय गीतों तथा श्लोकों का आस्वादन करते थे।

नाना-भाव उठे प्रभुर हर्ष, शोक, रोष । दैन्योद्वेग-आर्ति उत्कण्ठा, सन्तोष ॥

५॥

वे विविध दिव्य भावों के लक्षणों यथा हर्ष, शोक, रोष, दैन्य, उद्वेग, संताप, उत्कण्ठा तथा सन्तोष का आस्वादन करते।

सेइ सेइ भावे निज-श्लोक पड़िया ।।श्लोकेर अर्थ आस्वादये दुइ-बन्धु ला ॥

६॥

वे अपने बनाये श्लोक सुनाते और उनके अर्थ तथा भाव बतलाते। इस तरह वे अपने इन दो मित्रों के साथ उनका आस्वादन करके आनन्द लेते।

कोन दिने कोन भावे श्लोक-पठन । सेइ श्लोक आस्वादिते रात्रि जागरण ॥

७॥

कभी-कभी महाप्रभु किसी विशेष भाव में डूब जाते और उससे सम्बन्धित श्लोक सुनाकर तथा उसका आस्वादन करते हुए रातभर जगे रहते।

हर्षे प्रभु कहेन,–शुन स्वरूप-राम-राय । नाम-सङ्कीर्तन कलौ परम उपाय ॥

८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने परम हर्ष में कहा, हे स्वरूप दामोदर तथा रामानन्द राय, तुम मुझसे जान लो कि इस कलियुग में पवित्र नामों का कीर्तन ही मुक्ति का सर्वसुलभ साधन है।

सङ्कीर्तन-यज्ञे कलौ कृष्ण-आराधन ।।सेइ त' सुमेधा पाय कृष्णेर चरण ॥

९॥

इस कलियुग में कृष्ण की आराधना की विधि यह है कि भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन द्वारा यज्ञ किया जाय। जो ऐसा करता है, वह निश्चय ही अत्यन्त बुद्धिमान है और वह कृष्ण के चरणकमलों में शरण प्राप्त करता है।

कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् ।यज्ञैः सङ्कीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सु-मेधसः ॥

१०॥

कलियुग में बुद्धिमान व्यक्ति निरन्तर कृष्ण नाम का गायन करने वाले ईश्वर के अवतार की पूजा करने के लिए संकीर्तन करते हैं। यद्यपिउनका वर्ण श्याम नहीं है, तो भी वे साक्षात् कृष्ण हैं। वे अपने पार्षदों, सेवकों, अस्त्रों तथा विश्वस्त संगियों से युक्त हैं।'

नाम-सङ्कीर्तन हैते सर्वानर्थ-नाश ।सर्व-शुभोदय, कृष्ण-प्रेमेर उल्लास ॥

११॥

एकमात्र भगवान् कृष्ण के नाम का कीर्तन करने से मनुष्य समस्त अवांछित अभ्यासों से मुक्त हो सकता है। यह समस्त सौभाग्य के उदय कराने तथा कृष्ण-प्रेम की तरंगों के प्रवाह को शुभारम्भ कराने का साधन है।

चेतो-दर्पण-मार्जनं भव-महा-दावाग्नि-निर्वापणं | श्रेय:-कैरव-चन्द्रिका-वितरणं विद्या-वधू-जीवनम् । आनन्दाम्बुधि-वर्धनं प्रति-पदं पूर्णामृतास्वादनंसर्वात्म-स्नपनं परं विजयते श्री कृष्ण-सङ्कीर्तनम् ॥

१२॥

भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम के संकीर्तन की परम विजय हो, जो हृदय रूपी दर्पण को स्वच्छ बना सकता है और भवसागर रूपी प्रज्वलित अग्नि के दुःखों का शमन कर सकता है। यह संकीर्तन उस वर्धमान चन्द्रमा के समान है, जो समस्त जीवों के लिए सौभाग्य रूपी श्वेत कमल का वितरण करता है। यह समस्त विद्या का जीवन है। कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन दिव्य जीवन के आनन्दमय सागर विस्तार करता है। यह सबों को शीतलता प्रदान करता है और मनुष्य को प्रति पग पर पूर्ण अमृत का आस्वादन करने में समर्थ बनाता है।

सङ्कीर्तन हैते पाप-संसार-नाशन । चित्त-शुद्धि, सर्व-भक्ति-साधन-उद्गम ॥

१३॥

हरे कृष्ण मन्त्र का सामूहिक कीर्तन करने से मनुष्य संसार कीपापमय स्थिति का विनाश कर सकता है, अपने मलीन हृदय को स्वच्छ कर सकता है और सभी प्रकार की भक्ति का उदय कर सकता है।

कृष्ण-प्रेमोद्गम, प्रेमामृत-आस्वादन ।। कृष्ण-प्राप्ति, सेवामृत-समुद्रे मज्जन ॥

१४॥

कीर्तन के फलस्वरूप मनुष्य में कृष्ण-प्रेम का उदय होता है और वह दिव्य आनन्द का आस्वादन करता है। अन्ततोगत्वा उसे कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त होता है और वह उनकी भक्ति में लग जाता है, मानो वह प्रेम के महासागर में निमग्न हो रहा हो।

उठिल विषाद, दैन्य, पड़े आपन-श्लोक । ग्राहार अर्थ शुनि' सब ग्राय दुःख-शोक ॥

१५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के अन्तर में विषाद तथा दैन्य भावों का उदय हो आया और वे स्वनिर्मित दूसरा श्लोक सुनाने लगे। उस श्लोक का अर्थ सुनकर मनुष्य सारे दुःख तथा शोक को भूल सकता है।

नाम्नामकारि बहुधा निज-सर्व-शक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः । एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि ।दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥

१६॥

हे प्रभु, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, आपके पवित्र नाम में जीव के लिए सर्व सौभाग्य निहित है, अतः आपके अनेक नाम हैं यथा कृष्ण तथा गोविन्द, जिनके द्वारा आप अपना विस्तार करते हैं। आपने अपने इन नामों में अपनी सारी शक्तियाँ भर दी हैं और उनका स्मरण करने के लिए कोई निश्चित नियम भी नहीं हैं। हे प्रभु, यद्यपि आप अपने पवित्र नामों की उदारतापूर्वक शिक्षा देकर पतित बद्ध जीवों पर ऐसी कृपा करते हैं, किन्तु मैं इतना अभागा हूँ कि मैं पवित्र नाम का जप करते समय अपराध करता हूँ, अतः मुझ में जप करने के लिए अनुराग उत्पन्न नहीं हो पाता है।'

अनेक-लोकेर वाञ्छा—अनेक-प्रकार ।कृपाते करिल अनेक-नामेर प्रचार ॥

१७॥

चूंकि लोगों की इच्छाओं में विविधता है, इसीलिए आपने कृपा करके विविध नामों का वितरण किया है।

खाइते शुइते ग्रथा तथा नाम लय । काल-देश-नियम नाहि, सर्व सिद्धि हय ॥

१८॥

देश या काल से निरपेक्ष जो व्यक्ति खाते तथा सोते समय भी पवित्र नाम का उच्चारण करता है, वह सर्व सिद्धि प्राप्त करता है।

सर्व-शक्ति नामे दिला करिया विभाग ।।आमार दुर्दैव, नामे नाहि अनुराग!! ॥

१९॥

आपने अपने हर नाम में अपनी पूरी शक्ति भर दी है, किन्तु मैं इतना अभागा हूँ कि मुझमें आपके पवित्र नाम के कीर्तन के प्रति कोई अनुराग नहीं है।

ये-रूपे लइले नाम प्रेम उपजय ।।ताहार लक्षण शुन, स्वरूप-राम-राय ॥

२०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रामानन्द राय, मुझसे तुम उन लक्षणों को सुनो, जिस प्रकार मनुष्य को अपने सुप्त कृष्ण-प्रेम को सुगमता से जागृत करने के लिए हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करना चाहिए।

तृणादपि सु-नीचेन तरोरिव सहिष्णुना ।अमानिना मान-देन कीर्तनीयः सदा हरिः ॥

२१॥

जो अपने आपको घास से भी तुच्छ मानता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु है तथा जो निजी सम्मान न चाहकर अन्यों को आदर देने के लिए सदैव तत्पर रहता है, वह सदैव भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन अत्यन्त सुगमता से कर सकता है।'

उत्तम हञा आपनाके माने तृणाधम ।।दुइ-प्रकारे सहिष्णुता करे वृक्ष-सम ॥

२२॥

ये उसके लक्षण हैं, जो हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करता है। यद्यपि वह अति उत्तम होता है, किन्तु वह अपने आपको धरती की घास से भी तुच्छ मानता है और वृक्ष की तरह वह दो प्रकार से सब कुछ सहन करता है।

वृक्ष ग्रेन काटिलेह किछु ना बोलये ।शुका मैलेह कारे पानी ना मागय ॥

२३॥

जब वृक्ष को काटा जाता है, तब वह कुछ बोलता नहीं है और सूखते रहने पर भी कभी किसी से पानी नहीं माँगता।

येइ ग्रे मागये, तारे देय आपन-धन ।घर्म-वृष्टि सहे, आनेर करये रक्षण ॥

२४॥

वृक्ष हर किसी को अपने फल, फूल तथा जो भी उसके पास होता है, दे देता है। वह तपती धूप तथा वर्षा की झड़ी को सहन करता है, फिर भी वह अन्यों को आश्रय देता है।

उत्तम हा वैष्णव हबे निरभिमान । जीवे सम्मान दिबे जानि' 'कृष्ण'-अधिष्ठान ॥

२५॥

यद्यपि वैष्णव अत्युच्च व्यक्ति होता है, तो भी वह निरभिमानी होता है और हर एक को कृष्ण का रहने का स्थान समझकर उसका आदर करता है।

एइ-मत हा ग्रेइ कृष्ण-नाम लय ।श्री-कृष्ण-चरणे ताँर प्रेम उपजय ॥

२६॥

यदि कोई इस तरह से कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करता है, तो वह निश्चय ही कृष्ण के चरणकमलों के प्रति अपना सुप्त प्रेम जागृत कर लेगा।

कहिते कहिते प्रभुर दैन्य बाड़िला ।‘शुद्ध-भक्ति' कृष्ण-ठाजि मागिते लागिला ॥

२७॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु इस तरह बोल रहे थे, तो उनका दैन्य बढ़ गया और वे कृष्ण से शुद्ध भक्ति सम्पन्न कर पाने के लिए प्रार्थना करने लगे।

प्रेमेर स्वभाव याहाँ प्रेमेर सम्बन्ध ।।सेइ माने,—कृष्ण मोर नाहि प्रेम-गन्ध' ॥

२८॥

जहाँ भी भगवत्प्रेम का सम्बन्ध होता है, इसका स्वाभाविक लक्षण यही है कि भक्त अपने आपको भक्त नहीं समझता। बल्कि वह सदैव यही सोचता है कि उसमें कृष्ण के प्रति रंच मात्र भी प्रेम नहीं है।

न धनं न जनं न सुन्दरींकवितां वा जगदीश कामये । मम जन्मनि जन्मनीश्वरेभवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥

२९॥

हे जगदीश, मुझे भौतिक सम्पत्ति, भौतिकतावादी अनुयायी, सुन्दर पत्नी या आलंकारिक भाषा में वर्णित सकाम कर्मों की कामना नहीं है। मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि मैं जन्म-जन्मांतर आपकी अहैतुकी भक्ति करता रहूँ।'

धन, जन नाहि मागों, कविता सुन्दरी ।।‘शुद्ध-भक्ति' देह' मोरे, कृष्ण कृपा करि ॥

३०॥

हे कृष्ण, मैं आपसे न तो भौतिक सम्पत्ति चाहता हूँ, न अनुयायी, न सुन्दर स्त्री या सकाम कर्मों का फल चाहता हूँ। मेरी तो यही प्रार्थना है। कि आप अपनी अहैतुकी कृपा से मुझे जन्म-जन्मांतर अपनी शुद्ध भक्ति प्रदान करें।

अति-दैन्ये पुनः मागे दास्य-भक्ति-दान ।आपनारे करे संसारी जीव-अभिमान ॥

३१॥

अपने आपको भौतिक जगत् का बद्धजीव समझते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यन्त दीनतापूर्वक पुनः भगवान् की सेवा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की।

अयि नन्द-तनुज किङ्करंपतितं मां विषमे भवाम्बुधौ । कृपया तव पाद-पङ्कज | स्थित-धूली-सदृशं विचिन्तय ॥

३२॥

हे प्रभु, हे महाराज नन्द के पुत्र कृष्ण!' मैं आपका सनातन सेवक हूँ, किन्तु अपने ही सकाम कर्मों के कारण मैं अज्ञान के इस भयावह समुद्र में गिर गया हूँ। अब आप मुझ पर अहैतुकी कृपा करें। मुझे अपने चरणकमलों की धूलि का एक कण मानें।'

तोमार नित्य-दास मुइ, तोमा पासरिया ।। पड़ियाछों भवार्णवे माया-बद्ध हञा ॥

३३॥

मैं आपका नित्यदास हूँ, किन्तु मैंने आपको भुला दिया है। अब मैं अज्ञान के सागर में पतति हुआ हूँ और बहिरंगा शक्ति द्वारा बद्ध हुआ हूँ।

कृपा करि' कर मोरे पद-धूलि-सम ।। तोमार सेवक करों तोमार सेवन ॥

३४॥

आप अपने चरणकमलों की धूल के कणों में मुझे स्थान देकर मुझ पर अहैतुकी कृपा करें, जिससे मैं आपके सनातन सेवक के रूप में आपकी सेवा में लग सकें।

पुनः अति-उत्कण्ठा, दैन्य ह-इल उद्गम । कृष्ण-ठाजि मागे प्रेम-नाम-सङ्कीर्तन ॥

३५॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु में सहज दीनता तथा उत्कण्ठा का उदय हुआ। उन्होंने कृष्ण से प्रार्थना की कि प्रेमावेश में महामन्त्र का कीर्तन करने के लिए वे उन्हें सामर्थ्य दें।

नयनं गलदश्रु-धारयावदनं गद्गद-रुद्धया गिरा । पुलकैर्निचितं वपुः कदातव नाम-ग्रहणे भविष्यति ॥

३६॥

हे प्रभु, कब आपके पवित्र नाम का कीर्तन करते हुए मेरे नेत्र प्रवहमान अश्रुओं से पूरित होकर सुशोभित होंगे? कब आपके पवित्र नाम का कीर्तन करते हुए दिव्य आनन्द में मेरी वाणी अवरूद्ध होगी और मेरे शरीर में रोमांच उत्पन्न होगा?' प्रेम-धन विना व्यर्थ दरिद्र जीवन । 'दास' करि' वेतन मोरे देह प्रेम-धन ॥

३७॥

भगवत्प्रेम के बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे अपने सनातन सेवक के रूप में स्वीकार करें और वेतन के रूप में मुझे भगवत्प्रेम प्रदान करें।

रसान्तरावेशे ह-इल वियोग-स्फुरण । उद्वेग, विषाद, दैन्ये करे प्रलपन ॥

३८॥

कृष्ण के वियोग के कारण महाप्रभु में उद्वेग, विषाद तथा दैन्य नामक विविध रसों का उदय हो आया। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु उन्मत्त की तरह बोलने लगे।

युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम् ।शून्यायितं जगत्सर्वं गोविन्द-विरहेण मे ॥

३९॥

हे गोविन्द, आपके वियोग में एक क्षण मुझे एक युग सा प्रतीत हो रहा है। मेरे नेत्रों से वर्षाधारा के समान अश्रु की धाराएँ प्रवाहित हो रही हैं और मैं सारे जगत् को शून्य सा देखता हूँ।

उद्वेगे दिवस ना याय, ‘क्षण' हैल ‘युग'-सम । वर्षार मेघ-प्राय अश्रु वरिषे नयन ॥

४०॥

उद्वेग के कारण मेरा दिन नहीं कटता, क्योंकि हर क्षण मुझे एक युग जैसा प्रतीत होता है। निरन्तर अश्रुपात करने से मेरी आँखें वर्षा ऋतु के बादलों जैसी बनी हुई हैं।

गोविन्द-विरहे शून्य ह-इल त्रिभुवन ।। तुषानले पोड़े,—ग्रेन ना ग्राय जीवन ॥

४१॥

गोविन्द के विरह के कारण तीनों जगत् शून्य बन चुके हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मैं जीवित ही मन्द अग्नि में जला जा रहा हूँ।

कृष्ण उदासीन ह-इला करिते परीक्षण ।।सखी सब कहे,—‘कृष्णे कर उपेक्षण' ॥

४२॥

भगवान् कृष्ण मेरे प्रेम की परीक्षा लेने के लिए मुझसे उदासीन हो गये हैं और मेरी सखियाँ कहती हैं, 'अच्छा हो कि तुम कृष्ण की उपेक्षा करो।

एतेक चिन्तिते राधार निर्मल हृदय ।। स्वाभाविक प्रेमार स्वभाव करिल उदय ॥

४३॥

जब श्रीमती राधारानी इस प्रकार सोच रही थीं, तब उनमें स्वाभाविक प्रेम के गुण प्रकट हो गये, क्योंकि उनका हृदय शुद्ध था।

ईष्र्या, उत्कण्ठा, दैन्य, प्रौढ़ि, विनय ।। एत भाव एक-ठाजि करिल उदय ॥

४४॥

फिर तुरन्त ही ईष्र्या, अत्यन्त उत्कण्ठा, दैन्य, उत्साह तथा विनय के भाव-लक्षण एक साथ प्रकट हो उठे।

एत भावे राधार मन अस्थिर ह-इला ।। सखी-गण-आगे प्रौढ़ि-श्लोक ये पड़िला ॥

४५॥

उस भाव में श्रीमती राधारानी का मन क्षुब्ध था, अतएव उन्होंने अपनी गोपी-सखियों से उत्तम भक्ति का एक श्लोक कहा।

सेइ भावे प्रभु सेई श्लोक उच्चारिला ।श्लोक उच्चारिते तद्रूप आपने ह-इला ॥

४६॥

भाव के उस उन्माद में श्री चैतन्य महाप्रभु ने वह श्लोक सुनाया और ज्योंही उन्होंने श्लोक पढ़ा, उन्हें लगा कि वे श्रीमती राधारानी हैं।

आश्लिष्य वा पाद-रतां पिनष्टं माम्। अदर्शनान्मर्म-हतां करोतु वो । यथा तथा वा विदधातु लम्पटोमत्प्राण-नाथस्तु स एव नापरः ॥

४७॥

अपने चरणकमलों पर पड़ी हुई इस दासी का कृष्ण गाढ़ आलिंगन करें या अपने पाँवों तले कुचल डालें अथवा कभी अपना दर्शन न देकर मेरा हृदय तोड़ दें। आखिर वे लम्पट हैं और जो चाहें सो कर सकते हैं, तो भी वे मेरे हृदय के परम आराध्य प्रभु हैं।'

आमि–कृष्ण-पद-दासी, तेहो-रस-सुख-राशि,आलिङ्गिया करे आत्म-साथ ।। किबा ना देय दरशन, जारेन मोर तनु-मन,तबु तेहो—मोर प्राण-नाथ ॥

४८॥

मैं कृष्ण के चरणकमलों की दासी हूँ। वे दिव्य सुख तथा रस के मूर्तिमन्त स्वरूप हैं। यदि वे चाहें तो मेरा गाढ़ आलिंगन कर सकते हैं और मुझे अपने साथ एकात्मता का अनुभव करा सकते हैं। अथवा मुझे अपना दर्शन न देकर वे मेरे मन तथा शरीर को जलाकर क्षार कर करते हैं। फिर भी वे ही मेरे प्राणनाथ हैं।

सखि हे, शुन मोर मनेर निश्चय किबी अनुराग करे, किबा दुःख दिया मारे, । मोर प्राणेश्वर कृष्ण–अन्य नय ॥

४९॥

हे सखी, तुम मेरे मन का निर्णय सुन लो। समस्त परिस्थितियों में कृष्ण ही मेरे जीवन के स्वामी हैं, चाहे वे मुझसे प्रेम करें या दुःख दे देकर मुझे मार डालें।

छाड़ि' अन्य नारी-गण, मोर वश तनु-मन,मोर सौभाग्य प्रकट करिया ।। ता-सबारे देय पीड़ा, आमा-सने करे क्रीड़ा,सेइ नारी-गणे देखा ॥

५०॥

कभी-कभी कृष्ण अन्य गोपियों का साथ छोड़ देते हैं और उनकातन तथा मन मेरे द्वारा नियन्त्रित होता है। इस तरह वे मेरे सौभाग्य को प्रकट करते हैं और मेरे साथ प्रेमालाप करके अन्यों को पीड़ा पहुँचाते हैं।

किबा तेहो लम्पट, शठ, धृष्ट, सकपट,अन्य नारी-गण करि' साथ । मोरे दिते मनः-पीड़ा, मोर आगे करे क्रीड़ा,तबु तेंहो––मोर प्राण-नाथ ॥

५१॥

अथवा, चूंकि वे ठहरे अत्यन्त चतुर धृष्ट लम्पट जिसमें धोखा देने की प्रवृत्ति है, इसीलिए वे अन्य स्त्रियों का साथ करते हैं। तब वे उनके साथ, मेरे ही सामने मेरे मन को पीड़ा पहुँचाने के लिए प्रेमक्रीड़ा करने लगते हैं। इतने पर भी वे मेरे प्राणनाथ हैं।

ना गणि आपन-दुःख, सबे वाञ्छि ताँर सुख, ताँर सुख–आमार तात्पर्य । मोरे यदि दिया दुःख, ताँर हैल महा-सुख,सेइ दुःख–मोर सुख-वर्य ॥

५२॥

मुझे अपनी खुद की पीड़ा की चिन्ता नहीं है। मैं तो कृष्ण के सुख की ही कामना करती हैं, क्योंकि उनका सुख ही मेरे जीवन का लक्ष्य है। किन्तु यदि वे मुझे पीड़ा देने में ही महान् सुख का अनुभव करते हैं, तो वह पीड़ा मेरा सबसे श्रेष्ठ सुख है।

ये नारीरे वाञ्छे कृष्ण, तार रूपे सतृष्ण,तारे ना पाञा हय दुःखी । मुइ तार पाय पड़ि', लञा ग्राङ हाते धरि', क्रीड़ा कराना तौरै करों सुखी ॥

५३॥

यदि कृष्ण किसी अन्य स्त्री के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर उसके साथ रमण करना चाहते हैं, किन्तु दुःखी रहते हैं कि वे उसे नहीं पा सकते, तो मैं उसके पाँवों पर गिरकर उसका हाथ पकड़कर कृष्ण के पास लाती हूँ और उनकी प्रसन्नता के लिए उसे कृष्ण के साथ क्रीड़ा करने के लिए छोड़ देती हूँ।

कान्ता कृष्ण करे रोष, कृष्ण पाय सन्तोष,सुख पाय ताड़न-भर्सने ।। ग्रथा-योग्य करे मान, कृष्ण ताते सुख पान, | छाड़े मान अल्प-साधने ॥

५४॥

जब कोई प्रिया गोपी कृष्ण से क्रोध प्रकट करती है, तो कृष्ण अत्यन्त तुष्ट होते हैं। निस्सन्देह, जब उनकी ऐसी गोपी द्वारा भर्त्सना की जाती है, तब वे अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। वह उपयुक्त ढंग से अपना गर्व प्रदर्शित करती है और कृष्ण उस मुद्रा का आनन्द लूटते हैं। तब वह कुछ प्रयत्न के बाद अपना गर्व छोड़ देती है।

सेइ नारी जीये केने, कृष्ण-मर्म व्यथा जाने,तबु कृष्णे करे गाढ़ रोष । निज-सुखे माने काज, पडुक तार शिरे वाज, | कृष्णेर मात्र चाहिये सन्तोष ॥

५५॥

जो स्त्री जानती है कि कृष्ण का हृदय दुःखी है और फिर भी वह उनके प्रति अपना गहरा रोष प्रकट करती है, ऐसी स्त्री क्यों जीवित रहती है? वह अपने ही सुख में रुचि लेती है। मैं ऐसी स्त्री को धिक्कारती हूँ। उसके सिर पर वज्र गिरे, क्योंकि हम तो केवल कृष्ण का सुख चाहती है।

ये गोपी मोर करे द्वेषे, कृष्णेर करे सन्तोषे,कृष्ण ग्रारे करे अभिलाष ।। मुई तार घरे ग्रा, तारे सेवों दासी हुआ,तबे मोर सुखेर उल्लास ॥

५६॥

यदि मुझसे ईर्ष्या करने वाली कोई गोपी कृष्ण को तुष्ट करती है और कृष्ण उसे चाहने लगते हैं, तो मैं उसके घर जाने में नहीं हिचकेंगी और उसकी दासी बन जाऊँगी, क्योंकि तब मेरा सुख जाग्रत हो उठेगा।

कुष्ठी-विप्रेर रमणी, पतिव्रता-शिरोमणि,पति लागि' कैला वेश्यार सेवा ।। स्तम्भिल सूर्येर गति, जीयाइल मृत पति, तुष्ट कैल मुख्य तिन-देवा ॥

५७॥

कुष्ठरोग से पीड़ित ब्राह्मण की पत्नी ने अपने पति को तुष्ट करने के लिए एक वेश्या की सेवा करके अपने आपको सर्वश्रेष्ठ सती के रूप में प्रकट किया। इस तरह उसने सूर्य की गति रोक दी, अपने मृत पति को जीवित किया और तीन प्रमुख देवताओं ( ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर) को तुष्ट किया।

कृष्ण-मोर जीवन, कृष्ण–मोर प्राण-धन,कृष्ण–मोर प्राणेर पराण ।। हृदय-उपरे धरों, सेवा करि' सुखी करों,एइ मोर सदा रहे ध्यान ॥

५८॥

कृष्ण मेरे प्राण हैं। कृष्ण मेरे जीवन के धन हैं। निस्सन्देह, वे मेरे प्राण के भी प्राण हैं। इसलिए मैं उन्हें सदा अपने हृदय में रखती हूँ और सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ। इसी पर मेरा निरन्तर ध्यान रहता हैं।

मोर सुख–सेवने, कृष्णेर सुख–सङ्गमे, अतएव देह देङदान ।।कृष्ण मोरे ‘कान्ता' करि', कहे मोरे ‘प्राणेश्वरि', मोर हय 'दासी'-अभिमान ॥

५९॥

मेरा सुख तो कृष्ण की सेवा में है और कृष्ण का सुख मेरे साथ संयोग में है। इसीलिए मैं अपना शरीर कृष्ण के चरणकमलों पर दान देती हूँ। वे मुझे अपनी प्रिया के रूप में स्वीकार करके मुझे सर्वाधिक प्रिये (प्रिया ) कहकर पुकारते हैं। तभी मैं अपने आपको उनकी दासी करके मानती हूँ।

कान्त-सेवा-सुख-पूर, सङ्गम हैते सुमधुर,ताते साक्षी–लक्ष्मी ठाकुराणी ।। नारायण-हृदि स्थिति, तबु पाद-सेवाय मति,सेवा करे 'दासी'-अभिमानी ॥

६०॥

मेरे प्रेमी की सेवा सुख का घर है और प्रेमी के प्रत्यक्ष संयोग की अपेक्षा अधिक मधुर है। इसका प्रमाण लक्ष्मीजी हैं, क्योंकि वे नारायण के हृदय पर निरन्तर रहते हुए भी उनके चरणकमलों की सेवा करना चाहती हैं। इसीलिए वे अपने आपको दासी मानती हैं और उनकी निरन्तर सेवा करती हैं।

एइ राधार वचन, विशुद्ध-प्रेम-लक्षण, आस्वादये श्री-गौर-राय । भावे मन नहे स्थिर, सात्त्विके व्यापे शरीर,मन-देह धरण ना ग्राय ॥

६१॥

श्रीमती राधारानी के ये कथन श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा आस्वादन किये गये शुद्ध कृष्ण-प्रेम के लक्षणों को प्रदर्शित करते हैं। उस प्रेमावेश में उनका मन अस्थिर रहता था। उनके सारे शरीर में दिव्य प्रेम के विकार व्याप्त हो जाते और वे अपने शरीर तथा मन को धारण नहीं कर पाते थे।

व्रजेर विशुद्ध-प्रेम,– ग्रेन जाम्बू-नद हेम, | आत्म-सुखेर ग्राहाँ नाहि गन्ध ।। से प्रेम जाना 'ते लोके, प्रभु कैला एइ श्लोके,पदे कैला अर्थेर निर्बन्ध ॥

६२॥

वृन्दावन में शुद्ध भक्ति जाम्बू नदी में सुनहले कण के समान है। वृन्दावन में निजी इन्द्रियतृप्ति का रंच मात्र भी अस्तित्त्व नहीं है। ऐसे ही शुद्ध प्रेम को इस भौतिक जगत् में विज्ञापित करने हेतु श्री चैतन्य महाप्रभु ने पिछला श्लोक लिखा है और उसकी व्याख्या की है।

एइ-मत महाप्रभु भावाविष्ट हो ।प्रलाप करिला तत् तत् श्लोक पड़िया ॥

६३। इस तरह प्रेमावेश से अभिभूत होकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्मत्त की तरह बोलकर उपयुक्त श्लोक सुनाये।

पूर्वे अष्ट-श्लोक करि' लोके शिक्षा दिला ।।सेई अष्टे-श्लोकर अर्थ आपने आस्वादिला ॥

६४॥

महाप्रभु ने पहले इन आठ श्लोकों की रचना सामान्य जनों को शिक्षा देने के लिए की थी। अब उन्होंने स्वयं इन श्लोकों के अर्थ का आस्वादन किया, जिन्हें शिक्षाष्टक कहा जाता है।

प्रभुर 'शिक्षाष्टक'-श्लोक येइ पड़े, शुने । कृष्णे प्रेम-भक्ति तार बाड़े दिने-दिने ॥

६५॥

यदि कोई व्यक्ति श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा लिखित इन शिक्षाष्टक श्लोकों को सुनाता या सुनता है, तो कृष्ण के प्रति उसका प्रेमावेश तथा भक्ति दिन प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं।

यद्यपिह प्रभु–कोटी-समुद्र-गम्भीर ।। नाना-भाव-चन्द्रोदये हयेन अस्थिर ॥

६६॥

यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु करोड़ों समुद्रों के समान गहन तथा गम्भीर हैं, किन्तु जब उनके विविध भावों का चन्द्रमा उदय होता है, तब वे अस्थिर हो जाते हैं।

येइ ग्रेइ श्लोक जयदेव, भागवते ।। रायेर नाटके, ग्रेड आर कर्णामृते ॥

६७॥

सेइ सेइ भावे श्लोक करिया पठने ।।सेइ सेइ भावावेशे करेन आस्वादने ॥

६८ ॥

जब जब श्री चैतन्य महाप्रभु जयदेव कृत 'गीत गोविन्द, ‘श्रीमद्भागवत,' रामानन्द राय कृत 'जगन्नाथ वल्लभ नाटक' तथा बिल्व मंगल ठाकुर कृत 'कृष्ण कर्णामृत' के श्लोक पढ़ते, तब तब वे उन श्लोकों के भावों से अभिभूत हो उठते। इस तरह वे उनके तात्पर्यों का आस्वादन करते।

द्वादश वत्सर ऐछे दशा–रात्रि-दिने ।कृष्ण-रस आस्वादये दुइ-बन्धु-सने ॥

६९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु बारह वर्षों तक रात-दिन ऐसी अवस्था में रहे। उन्होंने अपने दोनों मित्रों के साथ उन श्लोकों के अर्थ का आस्वादनकिया, जो कृष्णभावनामृत के दिव्य आनन्द तथा रस के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है।

सेइ सब लीला-रस आपने अनन्त । सहस्र-वदने वर्णि' नाहि पान अन्त ॥

७० ॥

हजार मुखों वाले अनन्तदेव भी श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के दिव्य आनन्द का वर्णन करते हुए अन्त नहीं पाते।

जीव क्षुद्र-बुद्धि को ताहा पारे वर्णिते? । तार एक कणा स्पर्श आपना शोधिते ॥

७१॥

तो भला एक सामान्य जीव अपनी क्षुद्र बुद्धि द्वारा किस तरह ऐसी लीलाओं का वर्णन कर सकता है? फिर भी मैं अपने आपको शुद्ध करने के लिए उनके एक कण को छूने का प्रयास कर रहा हूँ।

ग्रत चेष्टा, ग्रत प्रलाप,–नाहि पारावार । सेई सब वर्णिते ग्रन्थ हय सुविस्तार ।। ७२ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलापों तथा उनके उन्माद के शब्दों की कोई सीमा नहीं है। इसलिए उन सबों का वर्णन करने से इस ग्रन्थ का कलेवर बहुत अधिक बढ़ जायेगा।

वृन्दावन-दास प्रथम ये लीला वर्णिल ।। सेइ-सब लीलार आमि सूत्र-मात्र कैल ॥

७३॥

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने जिन लीलाओं का सर्वप्रथम वर्णन किया है, उनको मैंने केवल संक्षिप्त में दे दिया है।

ताँर त्यक्त 'अवशेष' सङ्क्षेपे कहिल । लीलार बाहुल्ये ग्रन्थ तथापि बाड़िल ॥

७४॥

अतएव सेइ-सब लीला ना पारि वर्णिबारे ।।समाप्ति करिढु लीलाके करि' नमस्कारे ॥

७५ ॥

चूँकि सारी लीलाओं का विस्तार से वर्णन कर पाना असम्भव है, इसलिए मैं यह वर्णन समाप्त करूंगा और उन्हें सादर नमस्कार करूंगा।

ये किछु कहिलें एइ दिग्दरशन ।।एइ अनुसारे हवे तार आस्वादन ॥

७६॥

मैंने जो कुछ कहा है, वह मात्र संकेत है, किन्तु इस संकेत का अनुसरण करने पर मनुष्य श्री चैतन्य महाप्रभु की सारी लीलाओं का आस्वादन कर सकता है।

प्रभुर गम्भीर-लीला ना पारि बुझिते । बुद्धि-प्रवेश नाहि ताते, ना पारि वर्णिते ॥

७७॥

मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की अत्यन्त गम्भीर तथा अर्थपूर्ण लीलाओं को नहीं समझ सकता। मेरी बुद्धि उनमें प्रवेश नहीं कर सकती, इसलिए मैं उनका उचित रीति से वर्णन नहीं कर सका।

सब श्रोता वैष्णवेर वन्दिया चरण । चैतन्य-चरित्र-वर्णन कैलँ समापन ॥

७८ ॥

अपने समस्त वैष्णव पाठकों के चरणकमलों में सादर नमस्कार करके मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के चरित्र का यह वर्णन समाप्त करूंगा।

आकाश–अनन्त, ताते ग्रैछे पक्षि-गण । यार व्रत शक्ति, तत करे आरोहण ॥

७९॥

आकाश असीम है, किन्तु अनेक पक्षी अपनी अपनी क्षमता के अनुसार ऊँची से ऊँची उड़ान भरते हैं।

ऐछे महाप्रभुर लीला----नाहि ओर-पार ।। 'जीव' हा केबा सम्यक् पारे वर्णिबार? ॥

८०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ असीम आकाश के समान हैं। तब भला कोई सामान्य जीव उन सबका वर्णन कैसे कर सकता है? वित् बुद्धिर गति, ततेक वर्णिलँ । समुद्रेर मध्ये ग्रेन एक कण छुडिलें ॥

८१॥

मैंने अपनी बुद्धिभर उनका वर्णन करने का प्रयास किया है, मानो मैं महासागर के बीच में एक बूंद का स्पर्श करने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

नित्यानन्द-कृपा-पात्र- वृन्दावन-दास ।चैतन्य-लीलाय तेंहो येन 'आदि-व्यास' ॥

८२॥

वृन्दावन दास ठाकुर श्री नित्यानन्द प्रभु के प्रिय भक्त हैं, अतएव वे श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का वर्णन करने में आदि व्यासदेव हैं।

ताँर आगे यद्यपि सब लीलार भाण्डार ।तथापि अल्प वर्षिया छाड़िलेन आर ॥

८३॥

यद्यपि वृन्दावन दास ठाकुर के पास, अपनी सीमाओं के अन्तर्गत, श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का पूरापूरा भण्डार था, किन्तु उन्होंने अधिकांश को छोड़कर केवल अल्पांश का वर्णन किया है।

ग्रे किछु वर्णिलँ, सेह सङ्क्षेप करिया ।।लिखिते ना पारेन, तबु राखियाछेन लिखिया ॥

८४॥

मैंने जिस अंश का वर्णन किया है, वह वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा छोड़ दिया गया था। किन्तु उन्होंने इन लीलाओं का वर्णन न करने पर भी हमें एक सारांश प्रदान किया है।

चैतन्य-मङ्गले तेंहो लिखियाछे स्थाने-स्थाने ।सेइ वचन शुन, सेइ परम-प्रमाणे ॥

८५॥

उन्होंने 'चैतन्य मंगल' (चैतन्य भागवत ) नामक अपनी पुस्तक में अनेक स्थलों पर इन लीलाओं का वर्णन किया है। मैं अपने पाठकों से अनुरोध करता हूँ कि वे इस पुस्तक को सुनें, क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है।

सङ्क्षेपे कहिलँ, विस्तार ना ग्राय कथने । विस्तारिया वेद-व्यास करिब वर्णने ॥

८६॥

मैंने बहुत ही संक्षेप में लीलाओं का वर्णन किया है, क्योंकि उनका पूरी तरह से वर्णन कर पाना मेरे लिए असम्भव है। किन्तु भविष्य में वेदव्यास उनका विस्तार से वर्णन करेंगे।

चैतन्य-मङ्गले इहा लिखियाछे स्थाने-स्थाने । सत्य कहेन,–'आगे व्यास करिब वर्णने' ॥

८७॥

चैतन्य मंगल में श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने अनेक स्थानों पर यह यथार्थ सत्य लिखा है कि भविष्य में व्यासदेव इनका विस्तार से वर्णन करेंगे।

चैतन्य-लीलामृत-सिन्धु–दुग्धाब्धि-समान । तृष्णानुरूप झारी भरि' तेंहो कैला पान ॥

८८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की अमृतमयी लीलाओं का सागर क्षीर सागर के समान है। वृन्दावन दास ठाकुर ने अपनी तृष्णा के अनुसार अपनी झारी ( पात्र) भरी और उस सागर से पान किया।

ताँर झारी-शेषामृत किछु मोरे दिला । ततेके भरिल पेट, तृष्णा मोर गेला ॥

८९॥

वृन्दावन दास ठाकुर ने जो भी दुग्ध, उच्छिष्ट रूप में मेरे लिए छोड़ा है, वह मेरा पेट भरने के लिए पर्याप्त है। अब मेरी तृष्णा पूरी तरह से बुझ गई है।

अमि–अति-क्षुद्र जीव, पक्षी राङ्गा-दुनि । से ग्रैछे तृष्णाय पिये समुद्रेर पानी ॥

९० ॥

तैछे आमि एक कण छुडिलें लीलार ।।एइ दृष्टान्ते जानिह प्रभुर लीलार विस्तार ॥

९१॥

मैं छोटी लाल चोंच वाले पक्षी की तरह एक नगण्य जीव हूँ। जिस तरह यह पक्षी अपनी तृष्णा बुझाने के लिए समुद्र का जल पीता है, उसी तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के समुद्र में से केवल एक बूंद का स्पर्श किया है। इस उदाहरण से आप सब समझ सकते हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ कितनी अपार विस्तीर्ण हैं।"

‘आमि लिखि',—एह मिथ्या करि अनुमान ।आमार शरीर काष्ठ-पुतली-समान ॥

९२॥

मैं यह निष्कर्ष निकालँ कि, मैंने लिखा है तो यह गलत ज्ञान है, क्योंकि मेरा शरीर तो कठपुतली के समान है।

वृद्ध जरातुर आमि अन्ध, बधिर ।। हस्त हाले, मनो-बुद्धि नहे मोर स्थिर ॥

९३॥

मैं वृद्ध हो गया हूँ और असामर्थ्य से सताया हुआ हूँ। मैं लगभग अन्धा तथा बहरा हूँ, मेरे हाथ काँपते हैं और मेरे मन तथा बुद्धि अस्थिर हैं।

नाना-रोग-ग्रस्त,—चलिते वसिते ना पारि । पञ्च-रोग-पीड़ा-व्याकुल, रात्रि-दिने मरि ॥

९४॥

अनेक रोगों से ग्रस्त होने के कारण न तो मैं ठीक से चल पाता हूँ, न ठीक से बैठ पाता हूँ। मैं सदैव पाँच प्रकार के रोगों से व्याकुल रहता हूँ। मैं दिन या रात में किसी भी समय मर सकता हूँ।

पूर्वे ग्रन्थे इहा करियाछि निवेदन ।तथापि लिखिये, शुन इहार कारण ॥

९५॥

मैं पहले ही अपनी असमर्थताओं का लेखा-जोखा दे चुका हूँ। किन्तु फिर भी मैं लिख रहा हूँ, इसका कारण आप लोग कृपया सुनें।

श्री-गोविन्द, श्री-चैतन्य, श्री-नित्यानन्द । श्री-अद्वैत, श्री-भक्त, आर श्री-श्रोतृ-वृन्द ॥

९६॥

श्री-स्वरूप, श्री-रूप, श्री-सनातन ।। श्री-रघुनाथ-दास श्री-गुरु, श्री-जीव-चरण ॥

९७॥

इँहा-सबार चरण-कृपाय लेखाय आमारे ।। आर एक हय, तेहो अति-कृपा करे ॥

९८॥

मैं यह ग्रन्थ श्री गोविन्द देव, श्री चैतन्य महाप्रभु, भगवान् नित्यानन्द, श्री अद्वैत आचार्य, अन्य भक्तगण तथा इस ग्रन्थ के पाठकगण एवं श्री स्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, अपनेगुरु श्री रघुनाथ दास गोस्वामी तथा श्री जीव गोस्वामी के चरणकमलों की कृपा से लिख रहा हूँ। एक अन्य परम पुरुष ने भी मुझ पर विशेष कृपा की है।

श्री-मदन-गोपाल मोरे लेखाय आज्ञा करि' ।। कहिते ना ग्रुयाय, तबु रहिते ना पारि ॥

९९॥

वृन्दावन के श्री मदनमोहन अर्चाविग्रह ने मुझे आदेश दिया, जिसके कारण मैं यह ग्रन्थ लिखने को बाध्य हुआ। यद्यपि इसको प्रकट नहीं करना चाहिए था, किन्तु मैं प्रकट कर रहा हूँ, क्योंकि मैं मौन नहीं रह सकता।

ना कहिले हय मोर कृतघ्नता-दोष ।। दम्भ करि बलि' श्रोता, ना करिह रोष ॥

१००॥

यदि मैं इस बात को प्रकट न करता, तो मैं भगवान् के प्रति अकृतज्ञता का दोषी होता। इसीलिए हे पाठकों, आपलोग मुझे अधिक गर्वित मानकर मुझ पर रुष्ट न हों।

तोमा-सबार चरण-धूलि करिनु वन्दन ।। ताते चैतन्य-लीला हैल ग्रे किछु लिखन ॥

१०१॥

क्योंकि मैंने आप सबों के चरणकमलों की वन्दना की है, इसीलिए मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में जो कुछ लिखा है, वह सम्भव हो पाया है।

एबे अन्त्य-लीला-गणेर करि ।‘' कैले पाइ लीलार 'आस्वाद' ॥

१०२ ॥

अब मैं अन्त्य लीला की समस्त लीलाओं को दुहराता हूँ, क्योंकि ऐसा करने से मैं उन लीलाओं का पुनः आस्वादन कर सकेंगी।

प्रथम परिच्छेदे-रूपेर द्वितीय-मिलन ।तार मध्ये दुइ-नाटकेर विधान-श्रवण ॥

१०३॥

प्रथम अध्याय में बताया गया है कि रूप गोस्वामी किस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु से दूसरी बार मिले और किस तरह महाप्रभु ने उनके दो नाटकों (विदग्ध माधव तथा ललित माधव ) को सुना।

तार मध्ये शिवानन्द-सङ्गे कुकुर आइला ।। प्रभु तारे कृष्ण कहाआ मुक्त करिला ॥

१०४॥

इसी अध्याय में शिवानन्द सेन के कुत्ते की घटना का भी उल्लेख है, जिससे महाप्रभु ने कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण कराया और इस तरह वह कुत्ता मुक्त हो गया।

द्वितीये-छोट-हरिदासे कराइला शिक्षण । तार मध्ये शिवानन्देर आश्चर्य दर्शन ॥

१०५॥

दूसरे अध्याय में महाप्रभु ने शिक्षा देने के उद्देश्य से छोटे हरिदास को दण्ड दिया। इसी अध्याय में शिवानन्द सेन के अद्भुत दर्शन का वर्णन भी है।

तृतीये-हरिदासेर महिमा प्रचण्ड । दामोदर-पण्डित कैला प्रभुरे वाक्य-दण्ड ॥

१०६ ॥

तीसरे अध्याय में हरिदास ठाकुर की प्रचण्ड महिमाओं का वर्णन हुआ है। इसमें इसका भी उल्लेख है कि दामोदर पण्डित ने किस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु की आलोचना की।

प्रभु 'नाम' दिया कैला ब्रह्माण्ड-मोचन ।। हरिदास करिला नामेर महिमा-स्थापन ॥

१०७॥

इस तीसरे अध्याय में इसका भी वर्णन है कि चैतन्य महाप्रभु ने किस तरह ब्रह्माण्ड को भगवान् का पवित्र नाम प्रदान करके हर एक का उद्धार किया। इसमें इसका भी वर्णन है कि हरिदास ठाकुर ने अपने व्यावहारिक दृष्टान्त से किस तरह पवित्र नाम की महिमा की स्थापना की।

चतुर्थे–श्री-सनातनेर द्वितीय-मिलन । देह-त्याग हैते ताँर करिला रक्षण ॥

१०८॥

चौथे अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु से सनातन गोस्वामी की द्वितीय भेट तथा सनातन द्वारा आत्महत्या किये जाने से महाप्रभु द्वारा उन्हें बचाने का वर्णन हुआ है।

ज्यैष्ठ-मासेर धूपे ताँरै कैला परीक्षण ।।शक्ति सञ्चारिया पुनः पाठाइला वृन्दावन ॥

१०९॥

चौथे अध्याय में यह भी बतलाया गया है कि ज्येष्ठ मास (मई-जून) की धूप में सनातन गोस्वामी की किस तरह परीक्षा ली गई और तब उन्हें शक्ति प्रदान करके पुनः वृन्दावन भेज दिया गया।

पञ्चमे—प्रद्युम्न-मिश्रे प्रभु कृपा करिला । राय-द्वारा कृष्ण-कथा तौरै शुनाइला ॥

११०॥

पाँचवे अध्याय में बताया गया है कि महाप्रभु ने प्रद्युम्न मिश्र पर किस तरह कृपा की और रामानन्द राय से उसे कृष्ण कथा सुनवाई।

तार मध्ये 'बाङ्गाल'-कविर नाटक-उपेक्षण । स्वरूप-गोसाञि कैला विग्रहेर महिमा-स्थापन ॥

१११॥

इसी अध्याय में यह भी वर्णन किया गया है कि स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने एक बंगाली कवि के नाटक को अस्वीकार करके किस तरह अर्चाविग्रह की महिमा की स्थापना की।

षष्ठेरघुनाथ-दास प्रभुरे मिलिला ।।नित्यानन्द-आज्ञाय चिड़ा-महोत्सव कैला ॥

११२॥

छठे अध्याय में रघुनाथ दास गोस्वामी की श्री चैतन्य महाप्रभु से भेंटका तथा नित्यानन्द प्रभु के आदेश पर चिउड़ा उत्सव सम्पन्न किये जाने का वर्णन हुआ है।

दामोदर-स्वरूप-ठाञि ताँरै समर्पिल ।‘गोवर्धन-शिला', 'गुञ्जा-माला' ताँरे दिल ॥

११३॥

उस अध्याय में यह भी बताया गया है कि महाप्रभु ने किस तरह रघुनाथ दास गोस्वामी को स्वरूप दामोदर गोस्वामी के संरक्षण में रख दिया और उन्हें गोवर्धन पर्वत का एक पत्थर तथा घुघुची ( छोटे शंख) की माला प्रदान की।

सप्तम-परिच्छेदे वल्लभ भट्टर मिलन ।नाना-मते कैला ताँर गर्व खण्डन ॥

११४॥

सातवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु की वल्लभ भट्ट से भेंट का तथा अनेक प्रकार से उसके मिथ्या गर्व के खण्डन का वर्णन हुआ है।

अष्टमे–रामचन्द्र-पुरीर आगमन ।ताँर भये कैला प्रभु भिक्षा सङ्कोचन ॥

११५॥

आठवें अध्याय में रामचन्द्रपुरी के आगमन तथा उनके भय से श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा अपने भोजन में कमी करने का वर्णन है।

नवमे–गोपीनाथ-पट्टनायक-मोचन ।त्रिजगतेर लोक प्रभुर पाइल दरशन ॥

११६॥

नवें अध्याय में गोपीनाथ पट्टनायक के उद्धार का तथा तीनों लोकों द्वारा श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन का उल्लेख है।

दशमे–कहिलें भक्त-दत्त-आस्वादन ।राघव-पण्डितेर ताहाँ झालिर साजन ॥

११७॥

दसवें अध्याय में मैंने यह बताया है कि किस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों द्वारा दिये हुए भोजन का आस्वादन किया और इसी के साथ मैंने इसका भी वर्णन किया है कि राघव पंडित की थैलियों में तरहतरह के प्रसाद किस प्रकार सजाये गये थे।

तार मध्ये गोविन्देर कैला परीक्षण ।।तार मध्ये परिमुण्डा-नृत्येर वर्णन ॥

११८॥

इसी अध्याय में महाप्रभु द्वारा गोविन्द की परीक्षा लिये जाने का तथा उनके द्वारा मन्दिर में नृत्य किये जाने का वर्णन हुआ है।

एकादशे—हरिदास-ठाकुरेर निर्माण ।भक्त-वात्सल्य ग्राहाँ देखाइला गौर भगवान् ॥

११९॥

ग्यारहवें अध्याय में हरिदास ठाकुर के तिरोधान का तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा अपने भक्तों पर स्नेह किये जाने का वर्णन है।

द्वादशे–जगदानन्देर तैल-भञ्जन ।नित्यानन्द कैला शिवानन्देरे ताड़न ।।१२०॥

बारहवें अध्याय में जगदानन्द पण्डित द्वारा तैल पात्र के तोड़े जाने का तथा भगवान् नित्यानन्द द्वारा शिवानन्द सेन की ताड़ना का वर्णन हुआ है।

त्रयोदशे- जगदानन्द मथुरा ग्राइ' आइला ।महाप्रभु देव-दासीर गीत शुनिला ॥

१२१॥

तेरहवें अध्याय में जगदानन्द पंडित के मथुरा जाने और लौटने का तथा संयोगवश श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा एक देवदासी युवती द्वारा गाये गये गीत के सुने जाने का उल्लेख हुआ है।

रघुनाथ-भट्टाचार्येर ताहाङिमिलन ।प्रभु ताँरै कृपा करि' पाठाइला वृन्दावन ॥

१२२॥

इसी तेरहवें अध्याय में रघुनाथ भट्ट की श्री चैतन्य महाप्रभु से भेंट और महाप्रभु की अहैतुकी कृपा से उनके वृन्दावन भेजे जाने का भी वर्णन है।

चतुर्दशे—दिव्योन्माद-आरम्भ वर्णन । ‘शरीर' एथा प्रभुर, ‘मन’ गेला वृन्दावन ॥

१२३॥

चौदहवें अध्याय में महाप्रभु के दिव्योन्माद के प्रारम्भ का वर्णन है, जिसमें उनका शरीर तो जगन्नाथ पुरी में रहता, किन्तु उनका मन वृन्दावन में होता था।

तार मध्ये प्रभुर सिंह-द्वारे पतन । अस्थि-सन्धि-त्याग, अनुभावेर उद्गम ॥

१२४॥

इसी अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा जगन्नाथ मन्दिर के सिंहद्वार के सामने गिरने, उनकी हड्डियों के जोड़ों के अलग होने तथा महाप्रभु में विविध दिव्य लक्षणों के उदय होने का भी वर्णन है।

चटक-पर्वत देखि' प्रभुर धावन ।तार मध्ये प्रभुर किछु प्रलाप-वर्णन ॥

१२५ ॥

इसी में श्री चैतन्य महाप्रभु का चटक पर्वत की ओर भागने तथा पागल की तरह बातें करने का भी वर्णन हुआ है।

पञ्चदश-परिच्छेदे—उद्यान-विलासे ।।वृन्दावन-भ्रमे ग्राहाँ करिला प्रवेशे ॥

१२६॥

पन्द्रहवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा समुद्र के किनारे के एक उद्यान में प्रवेश करने का तथा उसे वृन्दावन मान लेने का वर्णन हुआ है।

तार मध्ये प्रभुर पञ्चेन्द्रिय-आकर्षण ।तार मध्ये करिला रासे कृष्ण-अन्वेषण ॥

१२७॥

इसी अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु की पाँचों इन्द्रियों का कृष्ण के प्रति आकर्षण का तथा रास नृत्य में उनके द्वारा कृष्ण की खोज का वर्णन हुआ है।

षोड़शे–कालिदासे प्रभु कृपा करिला ।।वैष्णवोच्छिष्ट खाइबार फल देखाइला ॥

१२८॥

सोलहवें अध्याय में बताया गया है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने किस तरह से कालिदास पर अपनी कृपा प्रदर्शित की और इस प्रकार वैष्णवों का उच्छिष्ट खाने के फल का प्रदर्शन किया।

शिवानन्देर बालके श्लोक कराइला ।सिंह-द्वारे द्वारी प्रभुरे कृष्ण देखाइला ॥

१२९॥

इस अध्याय में इसका भी वर्णन है कि शिवानन्द के पुत्र ने किस तरह एक श्लोक रचा और किस तरह सिंहद्वार के रक्षक ने श्री चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण का दर्शन कराया।

महा-प्रसादेर ताहाँ महिमा वर्णिला ।। कृष्णाधरामृतेर फले-श्लोक आस्वादिला ॥

१३०॥

इसी अध्याय में महाप्रसाद की महिमा का वर्णन है और उनके द्वारा कृष्ण के अधरामृत के प्रभाव का वर्णन करने वाले एक श्लोक का आस्वादन किया गया है।

सप्तदशे—गाभी-मध्ये प्रभुर पतन । कूर्माकार-अनुभावेर ताहाङिउद्गम ॥

१३१॥

सत्रहवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु का गायों के बीच गिरने तथा भावावेश उदय होने पर उनके द्वारा कछुए का रूप धारण करने का उल्लेख हुआ है।

कृष्णेर शब्द-गुणे प्रभुर मन आकर्षिला ।। का स्त्रयङ्ग ते श्लोकेर अर्थ आवेशे करिला ॥

१३२॥

इसी अध्याय में कृष्ण की ध्वनि के गुणों द्वारा श्री चैतन्य महाप्रभु के मन के आकृष्ट होने का तथा भावावेश में उनके द्वारा कास्त्र्यङ्ग ते श्लोक का अर्थ करने का भी वर्णन हुआ है।

भाव-शाबल्ये पुनः कैला प्रलपन ।कर्णामृत-श्लोकेर अर्थ कैला विवरण ॥

१३३॥

सत्रहवें अध्याय में विविध भावों के संमिश्रण से श्री चैतन्य महाप्रभु का पुनः प्रलाप करना तथा कृष्णकर्णामृत के एक श्लोक की विस्तृत व्याख्या किये जाने का भी वर्णन हुआ है।

अष्टादश परिच्छेदे समुद्रे पतन ।कृष्ण-गोपी-जल-केलि ताहाँ दरशन ॥

१३४॥

अठारहवें अध्याय में महाप्रभु के समुद्र में गिरने का तथा आवेश में स्वप्न में कृष्ण तथा गोपियों के मध्य जल क्रीड़ा के देखे जाने का वर्णन हुआ है।

ताहाङिदेखिला कृष्णेर वन्य-भोजन ।। जालिया उठाइल, प्रभु आइला स्व-भवन ॥

१३५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस स्वप्न में कृष्ण को जंगल में वन्य-भोजन का आनन्द लेते देखा। जब श्री चैतन्य महाप्रभु समुद्र में तैरने लगे, तब एक मछुआरे ने उन्हें पकड़ा और उसके बाद महाप्रभु अपने घर लौट आये। यह सब अठारहवें अध्याय में वर्णित हुआ है।

ऊनविंशे—भित्त्ये प्रभुर मुख-सङ्घर्षण ।कृष्णेर विरह-स्फूर्ति-प्रलाप-वर्णन ॥

१३६॥

उन्नीसवें अध्याय में इसका वर्णन है कि किस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु दीवालों से अपना मुँह रगड़ते तथा कृष्ण के विरह के फलस्वरूप उन्मत्त की तरह बातें करते थे।

वसन्त-रजनीते पुष्पोद्याने विहरण । कृष्णेर सौरभ्य-श्लोकेर अर्थ-विवरण ॥

१३७॥

इसी अध्याय में वसन्त की रात में एक बगीचे में कृष्ण के विचरण करने का भी वर्णन है। इस में कृष्ण के शरीर की सुगन्ध से सम्बन्धित एक श्लोक के अर्थ का भी पूरा-पूरा वर्णन हुआ है।

विंश-परिच्छेदे—निज-'शिक्षाष्टक' पड़िया । तार अर्थ आस्वादिला प्रेमाविष्ट हञा ॥

१३८॥

बीसवें अध्याय में श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने ही शिक्षाष्टक को सुनाया और प्रेमावेश में उसके अर्थों का आस्वादन किया।

भक्ते शिखाइते येइ शिक्षाष्टक कहिला ।सेइ श्लोकाष्टकेर अर्थ पुनः आस्वादिला ॥

१३९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन आठों श्लोकों की रचना भक्तों को शिक्षा देने के लिए की थी, किन्तु उन्होंने स्वयं भी उनके अर्थ का आस्वादन किया।

मुख्य-मुख्य-लीलार अर्थ करिलॅ कथन ।‘' हैते स्मरे ग्रन्थ-विवरण ॥

१४०॥

इस तरह मैंने मुख्य लीलाओं तथा उनके अर्थ का वर्णन किया है, क्योंकि ऐसी पुनरावृत्ति से ग्रन्थ के विवरणों को स्मरण में रखा जा सकता है । एक एक परिच्छेदेर कथा—अनेक-प्रकार । मुख्य-मुख्य कहिलँ, कथा ना ग्राय विस्तार ॥

१४१॥

प्रत्येक अध्याय में अनेक प्रकार की कथाएँ हैं, किन्तु मैंने केवलउन्हीं को दोहराया है, जो मुख्य हैं, क्योंकि उन सबों का पुनः वर्णन नहीं किया जा सकता था।

श्री-राधा-सह 'श्री-मदन-मोहन' ।। श्री-राधा-सह 'श्री-गोविन्द'-चरण ॥

१४२॥

श्री-राधा-सह श्रील 'श्री-गोपीनाथ' । एइ तिन ठाकुर हय 'गौड़ियार नाथ' ॥

१४३॥

वृन्दावन में श्रीमती राधारानी के साथ मदनमोहन, श्रीमती राधारानी के साथ गोविन्द तथा श्रीमती राधारानी के साथ गोपीनाथ के अर्चाविग्रह गौड़ीय वैष्णवों के प्राण हैं।

श्री-कृष्ण-चैतन्य, श्री-युत नित्यानन्द ।। श्री-अद्वैत-आचार्य, श्री-गौर-भक्त-वृन्द ॥

१४४॥

श्री-स्वरूप, श्री-रूप, श्री-सनातन । श्री-गुरु श्री-रघुनाथ, श्री-जीव-चरण ॥

१४५॥

निज-शिरे धरि' एई सबार चरण ।। ग्राहा हैते हय सब वाञ्छित-पूरण ॥

१४६॥

मैं श्री चैतन्य महाप्रभु, श्री नित्यानन्द प्रभु, श्री अद्वैत आचार्य तथा उनके भक्त, एवं श्री स्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्री रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, अपने गुरु श्री रघुनाथ दास गोस्वामी तथा श्रील जीव गोस्वामी-इन सारे पुरुषों के चरणकमलों को अपने सिर पर धारण करता हूँ, जिससे मेरी इच्छाएँ पूरी हो सकें।

सबार चरण-कृपा–‘गुरु उपाध्यायी' । मोर वाणी-शिष्या, तारे बहुत नाचाइ ॥

१४७॥

मेरे अनुभवहीन शब्द अपने आपसे नाचना नहीं जानते। गुरु की कृपा ने यथासम्भव उन्हें नचाया और अब नाच चुकने के बाद उन्होंने विश्राम ले लिया है।

शिष्यार श्रम देखि' गुरु नाचान राखिला ।।‘कृपा' ना नाचाय, 'वाणी' वसिया रहिला ॥

१४८॥

शिष्यों की थकान देखकर गुरु ने उन्हें नचाना बन्द कर दिया है और चूँकि वह कृपा अब उन्हें आगे नहीं नचा सकती, इसलिए मेरे शब्द मौन होकर बैठ रहे हैं।

अनिपुणा वाणी आपने नाचिते ना जाने ।ग्रत नाचाइला, नाचि' करिला विश्रामे ॥

१४९॥

उनके चरणकमलों की कृपा ही मेरा गुरु है और मेरे शब्द मेरे शिष्यों के रूप में हैं, जिन्हें मैंने अनेक प्रकार से नचाया है।

सब श्रोता-गणेर करि चरण वन्दन । याँ-सबार चरण-कृपा-शुभेर कारण ॥

१५० ॥

अब मैं अपने समस्त पाठकों के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, क्योंकि उन सबों के चरणकमलों की कृपा से सर्व सौभाग्य का उदय होता है।

चैतन्य-चरितामृत झेई जन शुने ।ताँर चरण धुजा करों मुञि पाने ॥

१५१॥

यदि कोई व्यक्ति श्री चैतन्य-चरितामृत में वर्णित श्री चैतन्य महाप्रभुकी लीलाओं को सुनता है, तो मैं उसके चरणकमल धोकर उस जल का पान करता हूँ।

श्रोतार पद-रेणु करों मस्तक-भूषण ।तोमरा ए-अमृत पिले सफल हैल श्रम ॥

१५२॥

मैं अपने श्रोताओं के चरणकमलों की धूल से अपने सिर को अलंकृत करता हूँ। चूँकि आप सब इस अमृत का पान कर चुके हैं, इसलिए मेरा परिश्रम सफल है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे झार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१५३ ॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

चरितममृतमेतच्छील-चैतन्य-विष्णोःशुभ-दमशुभ-नाशि श्रद्धयास्वादयेद् यः ।। तदमल-पद-पद्ये भृङ्गतामेत्य सोऽयंरसयति रसमुच्चैः प्रेम-माध्वीक-पूरम् ॥

१५४॥

‘श्री चैतन्य चरितामृत' पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलापों से भरा है। यह समस्त सौभाग्य को लाने वाला है और सारी अशुभ वस्तुओं को विनष्ट करने वाला है। यदि कोई व्यक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक चैतन्य चरितामृत के अमृत का आस्वादन करता है, तो मैं उसके चरणकमलों से दिव्य प्रेम रूप मधु का आस्वादन करने वाला भौंरा बन जाता हूँ।

श्रीमन्मदन-गोपाल-गोविन्ददेव तुष्टये ।।चैतन्यार्पितमस्त्वेतच्चैतन्य-चरितामृतम् ॥

१५५ ॥

चूँकि अब यह चैतन्य-चरितामृत ग्रन्थ पूर्ण है, जो अत्यन्त ऐश्वर्यवान मदनमोहन जी तथा गोविन्द जी के अर्चाविग्रहों की तुष्टि के हेतु लिखा गया है, इसे मैं श्रीकृष्ण चैतन्य के चरणकमलों पर अर्पित करता हूँ।

परिमल-वासित-भुवनं ।स्व-रसोन्मादित-रसज्ञ-रोलम्बम् । गिरिधर-चरणाम्भोजे ।कः खलु रसिकः समीहते हातुम् ॥

१५६॥

स्वरूपसिद्ध ( रसज्ञ) भक्तगण उन भौरों के तुल्य हैं, जो कृष्ण के चरणकमलों पर अपने ही रस से उन्मत्त हो चुके हैं। उन चरणकमलों की सुगन्ध सारे जगत् को सुरभित कर रही है। भला ऐसा कौन स्वरूपसिद्ध ( रसिक ) है, जो उनको छोड़ना चाहेगा? शाके सिन्ध्वग्नि-वाणेन्दौ ज्यैष्ठे वृन्दावनान्तरे ।सूर्याहेऽसित-पञ्चम्यां ग्रन्थोऽयं पूर्णतां गतः ॥

१५७॥

शक सम्वत् १५३७ के ज्येष्ठ मास (सन् १६१५ ईस्वी के मई-जून) में रविवार के दिन कृष्णपक्ष की पंचमी को यह चैतन्य-चरितामृत वृन्दावन में पूरा हुआ।

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