← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची

अध्याय बारह: सम्राट परीक्षित का जन्म

1.12शौनक उवाचअश्वत्थाम्नोपसूष्टिन ब्रह्मशीष्णोरुतेजसा ।

उत्तराया हतो गर्भ ईशेनाजीवित: पुनः: ॥

१॥

शौनक: उवाच--शौनक मुनि ने कहा; अश्वत्थाम्न--अश्रत्थामा ( द्रोणपुत्र ) के; उपसृष्टन --छोड़े जाने से; ब्रह्म-शीर्ष्णा--अजेयअस्त्र, ब्रह्मास्त्र; उर-तेजसा--उच्च ताप से; उत्तराया: --उत्तरा ( परीक्षित की माता ) का; हतः--नष्ट; गर्भ:--गर्भ; ईशेन--परमेश्वर द्वारा; आजीवित:--जीवित कर दिया गया; पुनः--फिर से |

शौनक मुनि ने कहा : महाराज परीक्षित की माता उत्तरा का गर्भ अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गयेअत्यन्त भयंकर तथा अजेय ब्रह्मास्त्र द्वारा विनष्ठ कर दिया गया, लेकिन परमेश्वर ने महाराजपरीक्षित को बचा लिया।

"

तस्य जन्म महाबुद्धे: कर्माणि च महात्मन: ।

निधनं च यथैवासीत्स प्रेत्य गतवान्‌ यथा ॥

२॥

तस्य--उसका ( महाराज परीक्षित का ); जन्म--जन्म; महा-बुद्धे:--अत्यन्त बुद्धिमान का; कर्माणि--कार्यकलाप; च--भी;महा-आत्मन:--महान्‌; निधनमू--मृत्यु; च--तथा; यथा--जिस प्रकार; एव--निस्सन्देह; आसीत्--हुआ; सः--वह; प्रेत्य--मृत्यु के पश्चात्‌ गन्तव्य; गतवानू--प्राप्त किया; यथा--जिस तरह।

अत्यन्त बुद्धिमान तथा महान्‌ भक्त महाराज परीक्षित उस गर्भ से कैसे उत्पन्न हुए? उनकीमृत्यु किस तरह हुईं ? और मृत्यु के बाद उन्होंने कौन सी गति प्राप्त की ?"

तदिदं श्रोतुमिच्छामो गदितुं यदि मन्यसे ।

ब्रूहि नः श्रद्धानानां यस्य ज्ञानमदाच्छुक: ॥

३॥

तत्‌--सारा; इदम्‌--यह; श्रोतुमू--सुनने को; इच्छाम:--सभी इच्छा कर रहे हैं; गदितुम्--वर्णन करने को; यदि--यदि;मन्यसे--आप सोचते हों; ब्रूहि--कृपा करके कहें; न:--हमसे; श्रद्दधानानाम्‌-- श्रद्धालुओं को; यस्य--जिसका; ज्ञानम्--दिव्य ज्ञान; अदातू-- प्रदान किया; शुक:-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने

हम सभी अत्यन्त आदरपूर्वक उनके ( महाराज परीक्षित के ) विषय में सुनना चाहते हैं, जिन्हेंशुकदेव गोस्वामी ने दिव्य ज्ञान प्रदान किया।

कृपया हमें इस विषय में बताएँ।

"

सूत उवाचअपीपलड्डर्मराज: पितृवद्‌ रञ्नयन्‌ प्रजा: ।

निःस्पृहः सर्वकामेभ्य: कृष्णपादानुसेवया ॥

४॥

सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; अपीपलतू--शासित सम्पन्नता; धर्म-राज:--राजा युथिष्ठिर ने; पितृ-बत्‌--अपने पिताके समान; रञ्जयन्‌-- प्रसन्न करते हुए; प्रजा: --जन्म ग्रहण करने वालों को; निःस्पृहः --बिना किसी व्यक्तिगत आकांक्षा के;सर्व--समस्त; कामेभ्य:--इन्द्रियतृप्ति से; कृष्ण-पाद-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणकमल की; अनुसेवया--निरन्तर सेवा करतेरहने से |

श्री सूत गोस्वामी ने कहा: सप्राट युधिष्टिर ने अपने राज्य-काल में सबों के ऊपरउदारतापूर्वक शासन चलाया।

वे उनके पिता तुल्य ही थे।

उन्हें कोई व्यक्तिगत आकांक्षा न थीऔर भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणकमलों की निरन्तर सेवा करते रहने के कारण, वे सभी प्रकारकी इन्द्रियतृष्ति से विरक्त थे।

"

सम्पद: क्रतवों लोका महिषी भ्रातरों मही ।

जम्बूद्वीपाधिपत्यं च यशश्च त्रिदिवं गतम्‌ ॥

५॥

सम्पदः--ऐश्वर्य; क्रववः--यज्ञ; लोका:-- भावी गन्तव्य; महिषी--रानियाँ; भ्रातर:-- भाई; मही-- पृथ्वी; जम्बू-द्वीप-- वहमंडल या ग्रह जिसमें हम रह रहे हैं; आधिपत्यम्‌--सार्वभौम अधिपत्य; च-- भी; यश:--ख्याति; च--तथा; त्रि-दिवम्‌--स्वर्गलोक तक; गतमू--व्याप्त ।

महाराज युथ्चिष्ठिर की सांसारिक उपलब्धियों, सद्गति प्राप्त करने के लिए किये जानेवालेयज्ञों, उनकी महारानी, उनके पराक्रमी भाइयों, उनके विस्तृत भूभाग, पृथ्वी ग्रह पर उनकासार्वभौम अधिपत्य तथा उनकी ख्याति आदि के समाचार स्वर्ग-लोक तक पहुँच गये।

"

कि ते कामा: सुरस्पा्हा मुकुन्दमनसो द्विजा: ।

अधिजहुर्मुदं राज्ञ: क्षुधितस्य यथेतरे ॥

६॥

किम्--किसलिए; ते--वे सब; कामा:--इन्द्रिय भोग के विषय; सुर--स्वर्ग के निवासियों की; स्पार्हा:--आकाक्षाएँ; मुकुन्द-मनसः--पहले से ईश्वर भावना-भावित का; द्विजा:--हे ब्राह्मणो; अधिजहु:--सन्तुष्ट कर सके; मुदम्‌--प्रसन्नता; राज्ञ:--राजाका; क्षुधितस्थ-- भूखे का; यथा--जिस तरह; इतरे--अन्य वस्तुओं में |

हे ब्राह्मणो, राजा का ऐश्वर्य इतना मोहक था कि स्वर्ग के निवासी भी उसकी आकांक्षाकरने लगे थे।

लेकिन चूँकि वे भगवान्‌ की सेवा में तल्‍लीन रहते थे, अतएव उन्हें भगवान्‌ कीसेवा के अतिरिक्त कुछ भी तुष्ट नहीं कर सकता था।

"

मातुर्गर्भगतो वीर: स तदा भृगुनन्दन ।

ददर्श पुरुषं कश्जिहृह्ममानोख्रतेजसा ॥

७॥

मातुः--माता के; गर्भ--गर्भ में; गत:--स्थित होकर; बीर:--महान्‌ योद्धा; सः--शिशु परीक्षित; तदा--उस समय; भृगु-नन्दन-हे भृगुपुत्र; ददर्श--देख सका; पुरुषम्‌--परमेश्वर को; कश्ञित्--मानो कोई दूसरा; दह्ममान: --जलते हुए; अस्त्र--ब्रह्मासत्र के; तेजसा--ताप से ।

हे भृगुपुत्र (शौनक ), जब महान्‌ योद्धा बालक परीक्षित अपनी माता उत्तरा के गर्भ में थेऔर ( अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गये ) ब्रह्मासत्र के ज्वलंत ताप से पीड़ित थे, तो उन्होंने परमेश्वर कोअपनी ओर आते देखा।

"

अड्'ुष्ठमात्रममलं स्फुरत्पुरटमौलिनम्‌ ।

अपीव्यदर्शन श्यामं तडिद्वाससमच्युतम्‌ ॥

८॥

अड्डष्ठ--अँगूठे की माप का; मात्रमू--केवल; अमलम्‌--दिव्य; स्फुरत्--देदीप्यमान; पुरट--सोना; मौलिनम्‌--मुकुट;अपीव्य--अत्यन्त सुन्दर; दर्शनम्‌-देखने के लिए; श्यामम्‌-श्याम रंग; तडित्--बिजली; वाससम्‌-- वस्त्र; अच्युतम्‌--अच्युत( भगवान्‌ ) को

वे ( भगवान्‌ ) केवल अँगूठा भर ऊँचे थे, किन्तु वे थे पूर्णतः दिव्य।

उनका शरीर अत्यन्तसुन्दर, श्याम वर्ण का तथा अच्युत था और उनका वस्त्र बिजली के समान चमचमाता पीतवर्णका तथा उनका मुकुट देदीप्यमान सोने का था।

बालक ने उन्हें इस रूप में देखा।

"

श्रीमद्दीर्घचतुर्बाहुं तप्तकाञ्ननकुण्डलम्‌ ।

क्षतजाक्षं गदापाणिमात्मन: सर्वतोदिशम्‌ ।

परिभ्रमन्तमुल्काभां भ्रामयन्तं गदां मुहु: ॥

९॥

श्रीमत्‌--समृद्ध; दीर्घ--लम्बे; चतु:-बाहुमू--चार भुजाओं वाले; तप्त-काञ्नन--पिघला सोना; कुण्डलम्‌--कान कीबालियाँ; क्षतज-अक्षम्‌--रक्त की लालिमा से युक्त आँखें; गदा-पाणिमू--गदा से युक्त हाथ; आत्मन:--अपना; सर्वत:--सभी;दिशम्‌--चारों ओर; परिभ्रमन्तम्‌-घूमते हुए; उल्काभामू--गिरते हुए तारे ( उल्का ) की भाँति; भ्रामयन्तम्‌-घुमाते हुए;गदाम्‌-गदा को; मुहुः--निरन्तर |

भगवान्‌ चार भुजाओं से युक्त थे, उनके कुण्डल सोने के थे तथा आँखें क्रोध से रक्त जैसीलाल थीं।

जब वे चारों ओर घूमने लगे, तो उनकी गदा उनके चारों ओर गिरते तारे ( उल्का ) कीभाँति निरन्तर चक्कर लगाने लगी।

"

अखतेज: स्वगदया नीहारमिव गोपति: ।

विधमन्तं सन्निकर्षे पर्यक्षत क इत्यसौ ॥

१०॥

अस्त्र-तेज:--ब्रह्मासत्र का प्रकाश; स्व-गदया--अपनी गदा से; नीहारम्‌--ओस के बिन्दु; इब--समान; गोपति:--सूर्य;विधमन्तम्‌--विनष्ट करने की क्रिया; सन्निकर्षे --निकट; पर्यक्षत--देखते हुए; क:--कौन; इति असौ--यह शरीर।

भगवान्‌ उस ब्रह्मास्त्र के तेज को विनष्ट करने में इस प्रकार संलग्न थे, जिस तरह सूर्य ओसकी बूँदों को उड़ा देता है।

वे बालक को दिखाई पड़े, तो वह सोचने लगा कि वे कौन थे ?"

विधूय तदमेयात्मा भगवान्धर्मगुब्‌ विभु: ।

मिषतो दशमासस्य तत्रैवान्तर्दधे हरि: ॥

११॥

विधूय--पूरी तरह विनष्ट करके; तत्‌--वह; अमेयात्मा--सर्वव्यापी परमात्मा; भगवान्‌-- भगवान्‌; धर्म-गुप्--सदाचार केरक्षक; विभु:--परम; मिषत:--निरी क्षण करते हुए; दशमासस्य--जो समस्त दिशाओं के द्वारा वस्त्रावृत हैं, उनका; तत्र एबव--तत्क्षण; अन्तः--अदृश्य; दधे--हो गये; हरि:-- भगवान्‌ |

इस प्रकार बालक के देखते-देखते, प्रत्येक जीव के परमात्मा तथा धर्म के पालक पूर्णपुरूषोत्तम भगवान्‌, जो सारी दिशाओं में व्याप्त हैं और काल तथा देश की सीमाओं से परे हैं,तुरन्त अन्तर्धान हो गये।

"

ततः सर्वगुणोदर्के सानुकूलग्रहोदये ।

जज्ञे वंशधर: पाण्डोर्भूय: पाण्डुरिवौजसा ॥

१२॥

ततः--तत्पश्चात्‌; सर्व--सभी; गुण--शुभ लक्षण; उदर्क --क्रमशः विकसित होने पर; स-अनुकूल--सभी अनुकूल;ग्रहोदये--नक्षत्रों का समूह; जज्ञे--जन्म लिया; वंश-धर:--उत्तराधिकारी; पाण्डो:--पाण्डु के; भूय:--होते हुए; पाण्डुःइब--पाण्डु के समान; ओजसा--पराक्रम से |

तत्पश्चात्‌, जब क्रमशः सारी राशि तथा नक्षत्रों से शुभ लक्षण प्रकट हो आये, तब पाण्डु केउत्तराधिकारी ने जन्म लिया, जो पराक्रम में उन्हीं के समान होगा।

"

तस्य प्रीतमना राजा विप्रैधौम्यकृपादिभि: ।

जातक॑ कारयामास वाचयित्वा च मज्गलम्‌ ॥

१३॥

तस्य--उसका; प्रीत-मना:--सन्तुष्ट; राजा--राजा युधिष्टिर; विप्रै:--विद्वान ब्राह्मणों द्वारा; धौम्य--धौम्य; कृप--कृप;आदिभि:--इत्यादि; जातकम्‌--शिशु-जन्म के तुरन्त बाद सम्पन्न होनेवाला संस्कार; कारयाम्‌ आस--सम्पन्न किया;वाचयित्वा--बाँच कर; च--भी; मड्रलम्‌-शुभमहाराज परीक्षित के जन्म से अत्यन्त सन्तुष्ट हुए राजा युथ्रिष्ठिर ने जात-संस्कार करवाया।

धौम्य, कृप इत्यादि विद्वान ब्राह्मणों ने शुभ स्तोत्रों का पाठ किया।

"

हिरण्यं गां महीं ग्रामान्‌ हस्त्यश्वान्नपतिर्वरान्‌ ।

प्रादात्स्वन्नं च विप्रेभ्य: प्रजातीर्थे स तीर्थवित्‌ ॥

१४॥

हिरण्यम्‌--सोना; गाम्--गौवें; महीम्‌-- भूमि; ग्रामान्-- गाँव; हस्ति--हाथी; अश्वान्‌--घोड़े; नृपतिः--राजा ने; वरानू--पुरस्कार; प्रादात्--दान में दिया; सु-अन्नम्‌--उत्तम अन्न; च--तथा; विप्रेभ्य:--ब्राह्मणों को; प्रजा-तीर्थे--पुत्र के जन्म-दिवसपर दान देते समय; सः--वह; तीर्थ-वित्‌--जो जानता है कि कब, कैसे और किसे दान दिया जाय ।

पुत्र के जन्म लेने पर राजा ने ब्राह्मणों को सोना, भूमि, ग्राम, हाथी, घोड़े तथा उत्तम अन्नदान में दिया, क्योंकि वे जानते थे कि कैसे, कहाँ और कब दान देना चाहिए।

"

तमूचुब्राह्मणास्तुष्टा राजान॑ प्रश्नयान्वितम्‌ ।

एष हास्मिन्‌ प्रजातन्तौ पुरूणां पौरवर्षभ ॥

१५॥

तम्‌--उसको; ऊचु:--सम्बोधित किया; ब्राह्मणा:--विद्वान ब्राह्मणों ने; तुष्टाः--अत्यधिक सम्तुष्ट; राजानमू--राजा को; प्रश्रय-अन्वितम्‌--अत्यधिक कृतज्ञता ज्ञापित करके; एष:--यह; हि--निश्चय ही; अस्मिन्‌--की श्रृंखला में; प्रजा-तन्तौ--परम्परा में;पुरूणाम्‌--पुरुओं की; पौरव-ऋषभ--पुरुओं में प्रमुख

राजा के दान से अत्यधिक समन्तुष्ट विद्वान ब्राह्मणों ने राजा को पुरुओं में प्रधान कहकरसम्बोधित किया और बताया कि उनका पुत्र निश्चय ही पुरुओं की परम्परा में है।

"

दैवेनाप्रतिघातेन शुक्ले संस्थामुपेयुषि ।

रातो वोशनुग्रहार्थाय विष्णुना प्रभविष्णुना ॥

१६॥

दैवेन--अतिदैवी शक्ति द्वारा; अप्रतिघातेन--दुर्निवार; शुक्ले--शुद्ध; संस्थामू--विनाश को; उपेयुषि--विवश किये जाने पर;रातः--फिर रक्षित; व:--तुम्हारे लिए; अनुग्रह-अर्थाय--अनुग्रह करने के लिए; विष्णुना--सर्वव्यापी भगवान्‌ द्वारा;प्रभविष्णुना--सर्वशक्तिमान द्वारा।

ब्राह्मणों ने कहा : यह निष्कलंक पुत्र, आप पर अनुग्रह करने के लिए सर्वशक्तिमान तथासर्वव्यापी भगवान्‌ विष्णु द्वारा बचाया गया है।

उसे तब बचाया गया, जब वह दुर्निवार अतिदैवीअन्त्र द्वारा नष्ट होने ही वाला था।

"

तस्मान्नाम्ना विष्णुरात इति लोके भविष्यति ।

न सन्देहो महाभाग महाभागवतो महान्‌ ॥

१७॥

तस्मात्--इसलिए; नाम्ना--नामवाले; विष्णु-रात:--भगवान्‌ विष्णु द्वारा रक्षित; इति--इस प्रकार; लोके --समस्त लोकों में;भविष्यति-- विख्यात होगा; न--नहीं; सन्देह:--सन्देह; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; महा-भागवत:--प्रथम कोटि काभगवद्भक्त; महान्‌--समस्त उत्तम गुणों से समन्वित।

इस कारण यह बालक संसार में विष्णुरात ( भगवान्‌ द्वारा रक्षित ) नाम से विख्यात होगा।

हेमहा भाग्यशाली, इसमें कोई सन्देह नहीं है कि यह बालक महाभागवत ( उत्तम कोटि का भक्त )होगा और समस्त गुणों से सम्पन्न होगा।

"

श्रीराजोवाचअप्येष वंश्यान्‌ राजर्षीन्‌ पुण्यश्लोकान्‌ महात्मन: ।

अनुवर्तिता स्विद्यशसा साधुवादेन सत्तमा: ॥

१८॥

श्री-राजा--सर्वमंगलकारी राजा ( महाराज युधिष्ठिर ) ने; उबाच--कहा; अपि--क्या; एष: --इस; वंश्यान्‌--परिवार में; राज-ऋषीन्‌--साधु राजाओं का; पुण्य-श्लोकान्‌--नाम से ही पवित्र; महा-आत्मन:--सभी महान्‌ पुरुष; अनुवर्तिता--अनुयायी;स्वितू--ऐसा होगा; यशसा--उपलब्धियों से; साधु-वादेन--महिमान्वित होने से; सत्‌-तमाः--हे महान्‌ आत्माओ!।

उत्तम राजा ( युधिष्ठटिर ) ने पूछा: हे महात्माओं, क्या यह बालक इस महान्‌ राजवंश में प्रकटहुए अन्य राजाओं की ही तरह राजर्षि, पवित्र नामवाला, उतना ही विख्यात तथा अपनीउपलब्धियों से महिमामंडित होगा ?"

ब्राह्मणा ऊचु:पार्थ प्रजाविता साक्षादिक्ष्वाकुरिव मानव: ।

ब्रह्मण्य: सत्यसन्धश्व रामो दाशरथिर्यथा ॥

१९॥

ब्राह्मणा:--उत्तम ब्राह्मणों ने; ऊचु:--कहा; पार्थ--हे पृथा ( कुन्ती ) पुत्र; प्रजा--जन्म धारण करनेवाले; अविता--पालक;साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; इक््वाकु: इब--राजा इक्ष्वाकु की तरह; मानव:--मनुपुत्र; ब्रह्मण्य:--ब्राह्मणों का अनुयायी तथा आदर'करनेवाला; सत्य-सन्ध: --वचन का पक्का; च--भी; राम:-- भगवान्‌ राम; दाशरथि:--महाराज दशरथ के पुत्र; यथा--जिसतरह।

दिद्वान ब्राह्मणों ने कहा : हे पृथापुत्र, यह बालक मनु-पुत्र, राजा इक्ष्वाकु की ही तरह समस्तजीवों का पालन करनेवाला होगा।

और जहाँ तक ब्राह्मणीय सिद्धान्तों के पालन की बात है,विशेष रूप से अपने वचन का पालन करने में, यह महाराज दशरथ के पुत्र भगवान्‌ राम जैसा( दृढ़ प्रतिज्ञ ) होगा।

"

एष दाता शरण्यश्र यथा ह्यौशीनर: शिबि: ।

यशो वितनिता स्वानां दौष्यन्तिरिव यज्वनाम्‌ ॥

२०॥

एषः--यह बालक; दाता--दानी; शरण्य:--शरणागतों का रक्षक; च--तथा; यथा--जिस तरह; हि--निश्चय ही;औशीनरः--उशीनर नामक देश का; शिवबि:--शिबि; यश: --यश; वितनिता--फैलानेवाला; स्वानामू--स्वजनों का; दौष्यन्तिःइब--दुष्यन्त के पुत्र भरत की तरह; यज्वनाम्--अनेक यज्ञ सम्पन्न करनेवालों का।

यह बालक सुप्रसिद्ध उशीनर नरेश, शिवि, की भाँति उदार दानवीर तथा शरणागतों कारक्षक होगा।

यह अपने कुल के नाम तथा यश को उसी तरह फैला देगा, जिस तरह महाराजदुष्यन्त के पुत्र भरत ने किया था।

"

धन्विनामग्रणीरेष तुल्यश्चार्जुनयो््दयो: ।

हुताश इव दुर्धर्ष: समुद्र इव दुस्तर: ॥

२१॥

धन्विनाम्‌-महान्‌ धनुर्धरों में; अग्रणी:--सर्व श्रेष्ठ; एच:--यह बालक; तुल्य:--समान रूप से उत्तम; च--तथा; अर्जुनयो: --अर्जुनों का; द्यो:--दो; हुताश:--अग्नि; इब--सहश ; दुर्धर्ष:--दुर्निवार, बेरोक; समुद्र:--समुद्र; इब--सहश; दुस्तर:--दुर्लध्य, पार न करने योग्य।

महान्‌ धनुर्धरों में यह बालक अर्जुन के समान होगा।

यह अग्निदेव के समान दुर्निवार तथासमुद्र की भाँति दुर्लघ्य होगा।

"

मृगेन्द्र इव विक्रान्तो निषेव्यो हिमवानिव ।

तितिश्षुर्वसुधेवासौ सहिष्णु: पितराविव ॥

२२॥

मृगेन्द्रः--सिंह; इब--सहश; विक्रान्त:--शक्तिशाली; निषेव्य:--शरण ग्रहण करने योग्य; हिमवान्‌--हिमालय पर्वत; इब--सहश; तितिश्षु:-- क्षमावान; वसुधा इब--पृथ्वी के समान; असौ--यह बालक; सहिष्णु: --सहिष्णु; पितरौ--माता-पिता;इब--सहश।

यह बालक सिंह के समान बलशाली तथा हिमालय की भाँति आश्रय प्रदान करने वाला होगा।

यह पृथ्वी के समान क्षमावान तथा अपने माता-पिता के समान सहिष्णु होगा।

"

पितामहसम: साम्ये प्रसादे गिरिशोपम: ।

आश्रय: सर्वभूतानां यथा देवो रमाश्रय: ॥

२३॥

पितामह--पितामह या ब्रह्मा; सम:--तुल्य; साम्ये--समता में; प्रसादे--दान या कृपालुता में; गिरिश--शिवजी; उपमः --उपमा, तुलना; आश्रय:--आ श्रय, विश्राम-स्थल; सर्व--सभी; भूतानाम्--जीवों का; यथा--जिस तरह; देव:--परमे श्वर; रमा-आश्रयः--भगवान्‌ |

यह बालक मन की समता में अपने पितामह युधिष्ठिर या फिर ब्रह्मा के समान होगा।

दानशीलता में यह कैलाशपति शिव के समान होगा।

यह देवी लक्ष्मी के भी आश्रय, भगवान्‌नारायण के समान सबों को आश्रय देनेवाला होगा।

"

रन्तिदेव इवोदारों ययातिरिव धार्मिक: ॥

२४॥

सर्व-सत्‌-गुण-माहात्म्ये--समस्त दैवी गुणों से महिमान्वित; एघ:--यह बालक; कृष्णम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण की तरह; अनुव्रत: --उनके पदचिह्वों पर चलनेवाला; रन्तिदेव: --रन्तिदेव; इब--सहश; उदार: -- उदार; ययाति:--ययाति; इव--सहश; धार्मिक: --धर्म के मामले में |

यह बालक भगवान्‌ श्रीकृष्ण के चरणचिन्हों का पालन करते हुए, उन्हीं के समान होगा।

उदारता में यह राजा रन्तिदेव के समान तथा धर्म में यह महाराज ययाति की भाँति होगा।

"

धृत्या बलिसम: कृष्णे प्रह्द इव सद्ग्रह: ।

आहर्तैषो श्रमेधानां वृद्धानां पर्यपासक: ॥

२५ ॥

धृत्या--थैर्य से; बलि-सम:--बलि महाराज के समान; कृष्णे-- भगवान्‌ कृष्ण के प्रति; प्रह्द-- प्रह्दाद महाराज; इब--सहृश;सत्‌-ग्रहः--भक्त; आहर्ता--सम्पन्न करनेवाला; एष:--यह बालक; अश्वमेधानाम्‌--अश्वमेध यज्ञों का; वृद्धानामू-वृद्ध तथाअनुभवी व्यक्तियों का; पर्युपासक:--अनुयायी

यह बालक धैर्य में बलि महाराज के समान होगा और प्रह्नाद महाराज के समान कृष्ण काअनन्य भक्त, यह अनेक अश्रमेध यज्ञों को सम्पन्न करनेवाला तथा वृद्ध एवं अनुभवी व्यक्तियोंका अनुयायी होगा।

"

राजर्षणां जनयिता शास्ता चोत्पथगामिनाम्‌ ।

निग्रहीता कलेरेष भुवो धर्मस्य कारणात्‌ ॥

२६॥

राज-ऋषीणाम्‌--ऋषि तुल्य राजाओं का; जनयिता--उत्पन्न करनेवाला; शास्ता--दण्ड देनेवाला; च--तथा; उत्पथ-गामिनाम्‌--मर्यादा उल्लंघन करनेवालों का; निग्रहीता--दमनकर्ता; कले: --उपद्रव करनेवालों का; एष:--यह; भुव: --संसारको; धर्मस्य-- धर्म के; कारणात्--कारण से

यह बालक ऋषि तुल्य राजाओं का पिता होगा।

विश्व-शान्ति तथा धर्म के निमित्त यहमर्यादा तोड़नेवालों तथा उपद्रवकारियों को दण्ड देनेवाला होगा।

"

तक्षकादात्मनो मृत्यु द्विजपुत्रोपसर्जितातू ।

प्रपत्स्यत उपश्रुत्य मुक्तसक्र: पदं हरे: ॥

२७॥

तक्षकात्--तक्षक नागराज द्वारा; आत्मन:--अपनी; मृत्युम्‌--मृत्यु को; द्विज-पुत्र--ब्राह्मण पुत्र द्वारा; उपसर्जितातू-- भेजा गया;प्रपत्स्यते--शरण ग्रहण करने पर; उपश्रुत्य--सुनकर; मुक्त-सड्भ:--समस्त आसक्ति से मुक्त; पदम्‌--पद; हरे:--भगवान्‌ का।

वह ब्राह्मण पुत्र के द्वारा भेजे गये तक्षक नाग के डसने से अपनी मृत्यु होने की बात सुनकरसमस्त भौतिक आसक्ति से अपने आपको मुक्त करके, भगवान्‌ को आत्म-समर्पण करके उन्हींकी शरण ग्रहण करेगा।

"

जिज्ञासितात्मयाथार्थ्यों मुनेर्व्याससुतादसौ ।

हित्वेदं नृप गज़जायां यास्यत्यद्धाकुतोभयम्‌ ॥

२८॥

जिज्ञासित--जिज्ञासा करते हुए; आत्म-याथार्थ्य: --आत्मा का सही ज्ञान; मुने:--विद्वान, दार्शनिक; व्यास-सुतात्‌-व्यास केपुत्र से; असौ--वह; हित्वा--त्यागकर; इृदम्‌--इस भौतिक आसक्ति को; नृप--हे राजा; गड्भायामू--गंगा के तट पर;यास्यति--जाएगा; अद्धघा--सीधे; अकुतः-भयम्‌--निर्भय जीवन ।

व्यासेदव के महान्‌ दार्शनिक पुत्र से समुचित आत्म-ज्ञान के विषय में जिज्ञासा करने पर वहसारी भौतिक आसक्ति का परित्याग करेगा और निर्भय जीवन प्राप्त करेगा।

"

इति राज्ञ उपादिश्य विप्रा जातककोविदा: ।

लब्धापचितय: सर्वे प्रतिजग्मु: स्वकान्‌ गृहान्‌ ॥

२९॥

इति--इस प्रकार; राज्ञे--राजा को; उपादिश्य--उपदेश देकर; विप्रा:--वेदों में पारगंत व्यक्ति; जातक-कोविदा:--फलितज्योतिष में तथा जन्मोत्सव सम्पन्न कराने में पटु व्यक्ति; लब्ध-अपचितय:--जिन्‍्हें पारिश्रमिक के रूप में प्रचुर राशि प्राप्त होचुकी थी; सर्वे--वे सब; प्रतिजग्मु;--वापस चले गये; स्वकान्‌ू--अपने-अपने; गृहान्‌ू-घरों को |

.इस प्रकार जो लोग ज्योतिष ज्ञान में तथा जन्मोत्सव सम्पन्न कराने में पटु थे, उन्होंने इसबालक के भविष्य के विषय में राजा युधिष्ठटिर को उपदेश दिया।

फिर प्रचुर दक्षिणा प्राप्त करके, वे अपने घरों को लौट गये।

"

स एष लोके विख्यात: परीक्षिदिति यत्प्रभु: ।

पूर्व दृष्टमनुध्यायन्‌ परीक्षेत नरेष्विह ॥

३०॥

सः--वह; एष:--इस; लोके--संसार में; विख्यात:--प्रसिद्ध; परीक्षित्‌--परीक्षा लेने वाला; इति--इस प्रकार; यत्‌--जो;प्रभु:--हे राजा; पूर्वम्--पहले; दृष्टम्--देखा जा चुका; अनुध्यायन्‌--निरन्तर विचारा जाकर; परीक्षेत--परीक्षा लेगा; नरेषु--प्रत्येक व्यक्ति की; इह--यहाँ ।

इस तरह यह पुत्र संसार में परीक्षित ( परीक्षक ) नाम से विख्यात होगा, क्योंकि यह उनव्यक्ति की खोज करने के लिए सारे मनुष्यों का परीक्षण करेगा, जिन्हें इसने अपने जन्म के पूर्वदेखा है।

इस तरह यह निरन्तर उनका ( भगवान्‌ का ) चिन्तन करता रहेगा।

"

स राजपुत्रो ववृधे आशु शुक्ल इवोडुप: ।

आपूर्यमाण: पितृभि: काष्ठाभिरिव सोडन्वहम्‌ ॥

३१॥

सः--वह; राज-पुत्र:--राजकुमार; ववृधे--बड़ा हो गया; आशु--जल्दी ही; शुक्ले--शुक्लपक्ष; इब--सहश; उडुप: --चन्द्रमा; आपूर्यमाण: --विलासपूर्ण; पितृभिः--पिता जैसे संरक्षकों द्वारा; काष्ठाभि:--पूर्ण विकास; इब--सहश; सः--वह;अन्वहम्‌-दिन-प्रतिदिन

जिस तरह शुक्लपक्ष में चन्द्रमा दिन-प्रतेदिन बढ़ता जाता है, उसी तरह यह राजकुमार( परीक्षित ) शीघ्र ही अपने संरक्षक पितामहों की देख-रेख तथा सुख-सुविधाओं के बीच तेजीसे विकास करने लगा।

"

यक्ष्यमाणो श्रमेधेन ज्ञातिद्रोहजिहासया ।

राजा लब्धधनो दध्यौ नान्यत्र करदण्डयो: ॥

३२॥

यक्ष्यमाण: --सम्पन्न करने की इच्छा करते हुए; अश्वमेधेन--अश्वमेध उत्सव द्वारा; ज्ञाति-द्रोह--स्वजनों से युद्ध; जिहासया--मुक्त होने के लिए; राजा--राजा युधिष्ठटिर; लब्ध-धन:--कुछ धन प्राप्त करने के लिए; दध्यौ--विचार किया; न अन्यत्र--अन्यथा नहीं; कर-दण्डयो: --लगान तथा जुर्माना ।

इसी समय राजा युध्रिष्टिर स्वजनों से युद्ध करने के कारण किए गए पापों से मुक्ति पाने केलिए अश्रवमेध यज्ञ करने पर विचार कर रहे थे।

लेकिन उन्हें कुछ धन प्राप्त करने की चिन्तासवार थी, क्योंकि लगान तथा जुर्माने से एकत्र कोष के अतिरिक्त और कोई धन-संग्रह न था।

"

तदभिप्रेतमालक्ष्य भ्रातरोच्युतचोदिता: ।

धनं प्रहीणमाजहुरुदीच्यां दिशि भूरिश: ॥

३३॥

तत्‌--उसका; अभिप्रेतम्‌--मन की इच्छा, अभिप्राय; आलक्ष्य--देखकर; भ्रातर:--अपने भाई; अच्युत--अच्युत, ( भगवान्‌श्रीकृष्ण ); चोदिता:--प्रेरणा पाकर; धनम्‌--धन; प्रहीणम्‌--एकत्र करके; आजह्ु: --ले आया; उदीच्याम्‌--उत्तरी; दिशि--दिशा; भूरिश:--प्रचुर ।

राजा की हार्दिक इच्छाओं को जानकर, उसके भाइयों ने अच्युत भगवान्‌ कृष्ण कीप्रेरणानुसार, उत्तर दिशा से ( राजा मरुत्त द्वारा छोड़ा गया ) प्रचुर धन एकत्र किया।

"

तेन सम्भृतसम्भारो धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: ।

वाजिमेथेस्त्रिभिर्भीतो यज्नै: समयजद्धरिमू ॥

३४॥

तेन--उस धन से; सम्भृत--एकत्रित; सम्भार:--सामग्री, घटक; धर्म-पुत्र:--पवित्र राजा; युधिष्टिर:--युधिष्टिर; वाजिमेथे:--अश्वमेध यज्ञ द्वारा; त्रिभि:--तीन बार; भीतः --कुरुक्षेत्र युद्ध से अत्यधिक भयभीत; यज्ञैः--यज्ञों के द्वारा; समयजत्‌--ठीक सेपूजा की; हरिमू-- भगवान्‌ की

उस धन से राजा तीन अश्वमेध यज्ञों के लिए सामग्री उपलब्ध कर सके।

कुरुक्षेत्र के युद्ध केबाद अत्यन्त भयभीत पुण्यात्मा राजा युधिष्टिर ने इस प्रकार भगवान्‌ हरि को प्रसन्न किया।

"

आहूतो भगवान्‌ राज्ञा याजयित्वा द्विजर्नृपम्‌ ।

उवास कतिचिन्मासान्‌ सुहृदां प्रियकाम्यया ॥

३५॥

आहूत:--बुलाये जाने पर; भगवान्‌--भगवान्‌ श्रीकृष्ण; राज्ञा--राजा द्वारा; याजयित्वा--सम्पन्न कराकर; द्विजैः--विद्वानब्राह्मणों द्वारा; नृपमू--राजा की ओर से; उबास--निवास किया; कतिचित्‌-- थोड़े; मासान्--महीने; सुहृदाम्‌--सम्बन्धियों केलिए; प्रिय-काम्यया--प्रसन्नता के लिए

महाराज युधिष्ट्रिर द्वारा यज्ञ में आमंत्रित होकर, भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने इस बात का ध्यान रखाकि ये सारे यज्ञ योग्य (द्विज) ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न कराये जाएँ।

तत्पश्चात्‌ सम्बन्धियों की प्रसन्नता के लिए, भगवान्‌ वहाँ कुछेक मास रहते रहे।

"

ततो राज्ञाभ्यनुज्ञात: कृष्णया सह बन्धुभि: ।

ययौ द्वारवतीं ब्रह्मन्‌ सार्जुनो यदुभिर्वृत: ॥

३६॥

ततः--तत्पश्चात्‌; राज्ञा--राजा द्वारा; अभ्यनुज्ञात: --अनुमति दिये जाने पर; कृष्णया--द्रौपदी से भी; सह--सहित; बन्धुभि:--अन्य सम्बन्धियों के साथ; ययौ--गये; द्वारवतीम्‌--द्वारका धाम; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मणों; स-अर्जुन:--अर्जुन के सहित; यदुभि:--यदुवंश के सदस्यों से; वृतः--घिरे हुए।

हे शौनक, तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ ने राजा युधिष्टिर, द्रौपदी तथा अन्य सम्बन्धियों से विदा लेकर,अर्जुन तथा यदुवंश के अन्य सदस्यों के साथ, द्वारका नगरी के लिए प्रस्थान किया।

"

TO TOP

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 1 की सूची