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अध्याय दस: यमला-अर्जुन वृक्षों का उद्धार

10.10रीराजोबाच कथ्यतां भगवज्नेतत्तयो: शापस्य कारणम्‌ ।

चक्तद्विग्ितं कर्मयेन वा देवर्षेस्तम: ॥

१॥

श्री-राजा उबाच--राजा ने आगे पूछा; कथ्यताम्‌ू--कृपया कहें; भगवन्‌--हे परम शक्तिमान; एतत्‌--यह; तयो: --उन दोनों के;शापस्य--शाप का; कारणम्‌--कारण; यत्‌--जो; तत्‌--वह; विगर्हितम्‌--निन्‍्दनीय; कर्म--कर्म; येन--जिससे; वा--अथवा; देवर्षे: तम:--नारदमुनि इतने क्रुद्ध हो उठे ।

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा: हे महान्‌ एवं शक्तिशाली सन्त, नारदमुनि द्वारा नलकूवर तथा मणिग्रीव को शाप दिये जाने का क्‍या कारण था? उन्होंने ऐसा कौन-सानिन्दनीय कार्य किया कि देवर्षि नारद तक उन पर क्रुद्ध हो उठे ? कृपया मुझे कह सुनायें।

श्रीशुक उबाचरुद्रस्यानुचरौ भूत्वा सुहप्तौ धनदात्मजौ ।

कैलासोपवतने रम्ये मन्दाकिन्यां मदोत्कटौ ॥

२॥

वारुणीं मदिरां पीत्वा मदाघूर्णितलोचनौ ।

स्त्रीजनेरनुगायद्धिश्वेरतु: पुष्पिते बने ॥

३॥

श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया; रुद्रस्थ--शिवजी के; अनुचरौ--दो भक्त या पार्षद; भूत्वा--बन कर;सु-हप्तौ--अपने पद तथा अपने सुन्दर रूप-रंग से गर्वित होकर; धनद-आत्मजौ--देवों के कोषाध्यक्ष कुबेर के दोनों पुत्र;कैलास-उपवने--शिवजी के निवास कैलाश पर्वत से लगे एक छोटे बाग में; रम्ये--सुन्दर स्थान में; मन्दाकिन्याम्‌--मन्दाकिनीनदी के तट पर; मद-उत्कटौ--अत्यधिक गर्वित तथा उन्मत्त; वारुणीम्‌--वारुणी को; मदिराम्‌--नशीले द्रव को; पीत्वा--पीपी कर; मद-आधूर्णित-लोचनौ--नशे से आँखें घुमाते हुए; स्त्री-जनैः--स्त्रियों के साथ; अनुगायद्धधि:--उनके द्वारा गाये गयेगीतों से गुञ्जरित; चेरतु:--घूम रहे थे; पुष्पिते बने--सुन्दर फूल के बाग में ॥

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, चूँकि कुवेर के दोनों पुत्रों को भगवान्‌शिवजी के पार्षद होने का गौरव प्राप्त था, फलत: वे अत्यधिक गर्वित हो उठे थे।

उन्हें मन्दाकिनीनदी के तट पर कैलाश पर्वत से सटे हुए बाग में विचरण करने की अनुमति प्राप्त थी।

इसकालाभ उठाकर वे दोनों वारुणी नाम की मदिरा पिया करते थे।

वे अपने साथ गायन करती स्त्रियोंको लेकर उस फूलों के बाग में घूमा करते थे।

उनकी आँखें नशे से सदैव घूमती रहती थीं।

अन्तः प्रविश्य गड्जायामम्भोजवनराजिनि ।

चिक्रीडतुर्युवतिभिर्गजाविव करेणुभि: ॥

४॥

अन्तः--भीतर; प्रविश्य--घुस कर; गड्जायाम्‌--गंगा अर्थात्‌ मन्दाकिनी में; अम्भोज--कमलों का; वन-राजिनि--जहाँ घनाजंगल था; चिक्रीडतु:--दोनों क्रीड़ा किया करते थे; युवतिभि:--युवतियों के साथ में; गजौ--दो हाथी; इब--सहृश;करेणुभि:--हथिनियों के साथ।

कमल के फूलों के उद्यानों से आवृत मन्दाकिनी गंगा के जल के भीतर कुवेर के ये दोनोंपुत्र युवतियों के साथ उसी तरह क्रीड़ा करते थे जिस तरह पानी के भीतर दो हाथी हथिनियों केसाथ क्रीड़ा करते हैं।

यहच्छया च देवर्षिभ्भगवांस्तत्र कौरव ।

अपष्यन्नारदो देवौ क्षीबाणौ समबुध्यत ॥

५॥

यहच्छया--संयोगवश, सारे ब्रह्माण्ड का भ्रमण करते हुए; च--तथा; देव-ऋषि: --देवताओं में परम सनन्‍्त-पुरुष; भगवानू--अत्यन्त शक्तिशाली; तत्र--वहाँ ( जहाँ कुबेर के पुत्र क्रीड़ा कर रहे थे ); कौरव--हे महराज परीक्षित; अपश्यत्‌--देखा;नारदः--परम सन्त ने; देवौ--देवताओं के दोनों बालकों को; क्षीबाणौ--नशे से उन्मत्त आँखों वाले; समबुध्यत--समझ गये।

हे महाराज परीक्षित, उन दोनों बालकों के सौभाग्य से एक बार देवर्षि नारद संयोगवश वहाँप्रकट हो गये।

उन्हें नशे में उन्मत्त तथा आँखें घुमाते हुए देख कर नारद उनकी दशा समझ गये।

तं इृष्टा ब्रीडिता देव्यो विवस्त्रा: शापश्डिता: ।

वासांसि पर्यधु: शीघ्र विवस्त्री नेव गुह्मकौ ॥

६॥

तमू--नारदमुनि को; हृष्ठा--देखकर; ब्रीडिता:--लज्जित; देव्य:--देव कुमारियाँ; विवस्थ्रा:--नंगी; शाप-शद्भिताः--शापितहोने से भयभीत; वासांसि--वस्त्र; पर्यधु:-- अपना शरीर ढक लिया; शीघ्रम्‌--तुरन्त; विवस्त्रौ--वे भी नंगे थे; न--नहीं; एब--निस्सन्देह; गुह्मकौ--कुवेर के दोनों पुत्रनारद को देखकर नग्न देव-कुमारियाँ अत्यन्त लज्जित हुईं।

उन्होंने शापित होने से भयभीतहोकर अपने शरीर को अपने-अपने वस्त्रों से ढक लिया।

किन्तु कुवेर के दोनों पुत्रों ने ऐसा नहींकिया।

उलटे, नारद की परवाह न करते हुए वे नंगे ही रहे।

तौ दृष्ठा मदिरामत्तौ श्रीमदान्धौ सुरात्मजौ ।

तयोरनुग्रहार्थाय शापं दास्यन्निदं जगौ ॥

७॥

तौ--देवताओं के दोनों बालकों को; दृष्टा--देखकर; मदिरा-मत्तौ--शराब पीने के कारण नशे में मस्त उन्मत्त; श्री-मद-अन्धौ--झूठी प्रतिष्ठा तथा ऐश्वर्य के कारण अन्धे हुए; सुर-आत्मजौ--देवताओं के दोनों पुत्र; तयो:--उनके ; अनुग्रह-अर्थाय--विशेष कृपा करने के प्रयोजन से; शापम्‌-- श्राप; दास्यनू--देने की इच्छा से; इदम्‌--यह; जगौ--उच्चारित किया |

देवताओं के दोनों पुत्रों को नंगा तथा ऐश्वर्य और झूठी प्रतिष्ठा गर्व के नशे में उन्मत्त देखकरदेवर्षि नारद ने उन पर विशेष कृपा करने हेतु उन्हें विशेष शाप देना चाहा।

अतः वे इस प्रकारबोले।

श्रीनारद उवाचन हान्यो जुषतो जोष्यान्बुद्धिभ्रंशो रजोगुण: ।

श्रीमदादाभिजात्यादिदत्र स्त्री दयूममासव: ॥

८॥

श्री-नारद: उवाच--नारदमुनि ने कहा; न--नहीं है; हि--निस्सन्देह; अन्य:--दूसरा भोग; जुषतः-- भोगने वाले का; जोष्यानू--भौतिक जगत की आकर्षक वस्तुएँ ( खाने, सोने, मैथुन करने इत्यादि की विभिन्न किस्में ); बुद्धि-भ्रंशः--बुद्धि को आकर्षितकरने वाले ऐसे भोग; रज:-गुण:--रजोगुण द्वारा नियंत्रित; श्री-मदात्‌--सम्पत्ति की अपेक्षा; आभिजात्य-आदि:--चार भौतिकनियमों में से ( सुन्दर स्वरूप, राजसी परिवार में जन्म, विद्वत्ता तथा धन-धान्य ); यत्र--जहाँ; स्त्री--स्त्रियाँ; द्यूतमू--जुआखेलना; आसवः--शराब |

नारदमुनि ने कहा : भौतिक भोग के समस्त आकर्षणों में से एक धन के प्रति आकर्षणसुन्दर शारीरिक रूप, उच्च कुल में जन्म तथा विद्वत्ता इन सब में से धन का आकर्षण, बुद्धि कोअधिक भ्रमित करने वाला है।

यदि कोई अशिक्षित व्यक्ति धन से गर्वित हो जाता है, तो वहअपना सारा धन शराब, स्त्रियों तथा जुआ खेलने के आनन्द में लगा देता है।

हन्यन्ते पशवो यत्र निर्दयेरजितात्मभि: ।

मन्यमानैरिमं देहमजरामृत्यु नश्वरम्‌ ॥

९॥

हन्यन्ते--कई प्रकार से मारे जाते हैं ( विशेषतया कसाईखानों में )।

पशवः--पशु, जानवर ( चार पैर वाले ); यत्र--जहाँ;निर्दयै:--रजोगुण वाले निर्दय व्यक्तियों द्वारा; अजित-आत्मभि:--अपनी इन्द्रियों को वश में न कर पाने वालों द्वारा;मन्यमानैः--सोचते हैं; इमम्‌--इस; देहम्‌--शरीर को; अजर--जो न तो कभी बूढ़ा होगा, न रोगी होगा; अमृत्यु--कभी मृत्युनहीं होगी; नश्वरम्‌--नाशवान शरीर को

अपनी इन्द्रियों को वश में करने में असमर्थ धूर्त लोगजिन्हें अपने धन पर मिथ्या गर्व रहताहै या जो राजसी परिवार में जन्म लिये रहते हैं इतने निष्ठर होते हैं कि वे अपने नश्वर शरीरों कोबनाये रखने के लिए, उन्हें अजर-अमर सोचते हुए, बेचारे पशुओं का निर्दयतापूर्वक वध करतेहैं।

कभी कभी वे केवल अपनी मौज-मस्ती के लिए पशुओं को मार डालते हैं।

देवसंज्ञितमप्यन्ते कृमिविड्भस्मसंज्ञितम्‌ ।

भूतश्रुक्तत्कृते स्वार्थ कि वेद निरयो यतः ॥

१०॥

देव-संज्ञितमू--शरीर जो अब अत्यन्त महान्‌ पुरुष यथा राष्ट्रपति, मंत्री या देवता कहलाता है; अपि--इतना महान्‌ होते हुए भी;अन्ते--मृत्यु के बाद; कृमि--कीड़ा बन जाता है; विटू--या मल में परिणत हो जाता है; भस्म-संज्ञितम्‌ू--या राख में बदलजाता है; भूत-धुक्‌-शास्त्रों के आदेशों को न मानने वाला तथा अन्य जीवों से ईर्ष्या करने वाला व्यक्ति; तत्‌ू-कृते--इस तरहकर्म करते हुए; स्व-अर्थम्‌--स्वार्थ; किम्‌--क्या है; वेद--जो जानता है; निरयः यत:--क्योंकि ऐसे पापकर्मों से नारकीय दशाभोगनी होगी।

जीवित रहते हुए मनुष्य अपने को बड़ा आदमी, मंत्री, राष्ट्रपति या देवता सोचते हुए अपनेशरीर पर गर्व कर सकता है किन्तु वह चाहे जो भी हो, मृत्यु के बाद उसका शरीर कीट, मल याराख में परिणत हो जाता है।

यदि कोई व्यक्ति अपने शरीर की क्षणिक इच्छाओं की तुष्टि के लिएनिरीह पशुओं का वध करता है, तो वह यह नहीं जानता कि उसे अगले जीवन में कष्ट भोगनाहोगा क्‍योंकि ऐसे पापी को नरक जाना पड़ेगा और अपने कर्मफल भोगने पड़ेंगे।

देहः किमन्नदातु: स्वं निषेक्तुर्मातुरेव च ।

मातु: पितुर्वा बलिनः क्रेतुरग्ने: शुनोडषपि वा ॥

११॥

देह:--यह शरीर; किम्‌ अन्न-दातु:--क्या यह मेरे स्वामी का है, जो मुझे इसके पालन के लिए धन देता है; स्वमू--या यह स्वयंमेरा है; निषेक्तु:--( या यह ) वीर्य स्खलित करने वाले का है; मातु: एव--या ( इसे ) गर्भ में धारण करने वाली माता का है;च--तथा; मातुः पितुः वा--यह माता के पिता अर्थात्‌ नाना का है क्योंकि कभी कभी नाना अपने नाती को गोद ले लेता है;बलिन:ः--या उसका है, जो बलपूर्वक इस शरीर को छीन लेता है; क्रेतु:--या इस शरीर को बँधुए मजदूर की तरह खरीद लेताहै; अग्ने:--या अग्नि में ( जला देता है ); शुन:--या कुत्तों तथा गीधों का है, जो उसे खा जाते हैं; अपि-- भी; वा--अथवा।

जीवित रहते हुए यह शरीर उसके अन्नदाता का होता है, या स्वयं का, अथवा पिता, माता यानाना का? क्या यह बलपूर्वक ले जाने वाले का, इसे खरीदने वाले स्वामी का या उन पुत्रों काहोता है, जो इसे अग्नि में जला देते हैं? और यदि शरीर जलाया नहीं जाता तो कया यह उन कुत्तोंका होता है, जो इसे खाते हैं? आखिर इतने सारे दावेदारों में असली दावेदार कौन है ? इसकापता लगाने के बजाय, पापकर्मो द्वारा इस शरीर का पालन करना अच्छा नहीं है।

एवं साधारण देहमव्यक्तप्रभवाप्ययम्‌ ।

को दिद्वानात्मसात्कृत्वा हन्ति जन्तूनृतेइसतः ॥

१२॥

एवम्‌--इस प्रकार; साधारणम्‌--सामान्य सम्पत्ति; देहम्‌ू--शरीर को; अव्यक्त--अ व्यक्त प्रकृति से; प्रभव--इस प्रकार सेव्यक्त; अप्ययमू--पुनः अव्यक्त में लीन होकर ( ‘क्योंकि, तू मिट्टी है और तुम्हें मिट्टी में ही वापस मिल जाना है' ); कः--कौनहै; विद्वान्‌ू--ज्ञानी; आत्मसात्‌ कृत्वा--अपना कहते हुए; हन्ति--मारता है; जन्तून्‌ू--बेचारे पशुओं को; ऋते--सिवाय;असतः --धूर्त तथा मूढ़ जिन्हें कोई ज्ञान नहीं है।

यह शरीर आखिर अव्यक्त प्रकृति द्वारा उत्पन्न किया जाता है और नष्ट होकर पुनः प्राकृतिकतत्त्वों में विलीन हो जाता है।

अतएव यह सबों का सर्वसामान्य गुण है।

ऐसी परिस्थितियों में जोधूर्त होगा वही इस सम्पत्ति को अपनी होने का दावा करेगा और उसे बनाये रखते हुए अपनीइच्छाओं की तुष्टि के लिए पशुओं की हत्या जैसे पापकर्म करता रहता है।

केवल मूढ़ ही ऐसेपापकर्म कर सकता है।

असतः श्रीमदान्धस्य दारिद्र॒यं परमझनम्‌ ।

आत्मौपम्येन भूतानि दरिद्र: परमीक्षते ॥

१३॥

असतः--ऐसे मूर्ख धूर्त व्यक्ति का; श्री-मद-अन्धस्य-- धन तथा ऐश्वर्य के कारण अन्धा हुआ; दारिदर्‌यम्‌--गरीबी; परम्‌अजद्जनम्‌--आँखों का सर्वोत्तम अंजन है, जिससे वस्तुएँ यथारूप में देखी जा सकती हैं; आत्म-औपम्येन--अपने से तुलनाकरके; भूतानि--जीवों को; दरिद्र:--गरीब व्यक्ति; परम्‌ू--पूर्णतया; ईक्षते--देख सकता है।

नास्तिक मूर्ख तथा धूर्त धन के मद के कारण वस्तुओं को यथारूप में नहीं देख पाते।

अतएव उन्हें दरिद्र बनाना ही सर्वोत्तम काजल है, जिसे वे आँखों में लगा कर वस्तुओं को उनकेवास्तविक रूप में देख सकते हैं।

और कुछ नहीं तो, जो दरिद्र है, वह इसका तो अनुभव कर हीसकता है कि दरिद्रता कितनी दुखद होती है।

अतएव वह कभी नहीं चाहेगा कि अन्य लोगउसकी तरह दुखमय स्थिति में रहें।

यथा कण्टकविद्धाड़ो जन्तोर्नेच्छति तां व्यथाम्‌ ।

जीवसाम्यं गतो लिड्रैन तथाविद्धकण्टकः ॥

१४॥

यथा--जिस प्रकार; कण्टक-विद्ध-अड्डभः--वह पुरुष जिसका शरीर काँटों से बिंध चुका हो; जन्तोः --ऐसे पशु को; न--नहीं;इच्छति--चाहता है; तामू--उस; व्यथाम्‌--पीड़ा को; जीव-साम्यम्‌ गत:--जब वह समझ लेता है कि हर एक की दशा एकसीहै; लिड्ैः--विशेष प्रकार का शरीर धारण करने से; न--नहीं; तथा--उसी तरह; अविद्ध-कण्टक:--जो व्यक्ति काँटों से नहींबिंधा।

जिसके शरीर में काँटे चुभ चुके हैं वह दूसरों के चेहरों को ही देखकर उनकी पीड़ा समझसकता है कि उन्हें काँटे चुभ रहे हैं।

वह यह अनुभव करते हुए कि यह पीड़ा सबों के लिएएकसमान है, यह नहीं चाहता कि अन्य लोग इस तरह से कष्ट भोगें।

किन्तु जिसे कभी काँटे गड़ेही नहीं वह इस पीड़ा को नहीं समझ सकता।

दरिद्रो निरहंस्तम्भो मुक्त: सर्वमदैरिह्ठ ।

कृच्छूं यदच्छयाप्नोति तर्द्धि तस्य परं तपः ॥

१५॥

दरिद्र:--गरीब; निर-अहम्‌-स्तम्भ: --सारी झूठी प्रतिष्ठा से स्वयमेव छूट जाता है; मुक्त:--मुक्त; सर्व--सभी; मदैः--मिशथ्याअहंकार से; इह--इस संसार में; कृच्छुम्‌ू--मुश्किल से; यहच्छया आप्नोति-- भाग्यवश जो उसे प्राप्त होता है; तत्‌ू--वह; हि--निस्सन्देह; तस्थ--उसकी; परम्‌--पूर्ण; तप:ः--तपस्या

दरिद्र व्यक्ति को स्वतः तपस्या करनी पड़ती है क्योंकि उसके पास अपना कहने के नाम परकोई सम्पत्ति नहीं होती।

इस तरह उसकी मिथ्या प्रतिष्ठा समाप्त हो जाती है।

वह सदैव भोजन,आश्रय तथा वस्त्र की आवश्यकता अनुभव करता रहता है, अतः दैव-कृपा से जो भी उसे मिलजाता है उसी से उसे सन्तुष्ट रहना पड़ता है।

अनिवार्यतः इस तरह की तपस्या करते रहना उसकेलिए अच्छा है क्योंकि इससे उसकी शुद्धि हो जाती है और वह मिथ्या अहंकार से मुक्त हो जाताहै।

नित्य क्षुत्क्षामदेहस्य दरिद्रस्यान्नकाड्क्षिण: ।

इन्द्रियाण्यनुशुष्यन्ति हिंसापि विनिवर्तते ॥

१६॥

नित्यमू--सदैव; क्षुत्‌ू- भूख से; क्षाम--निर्बल; देहस्य--शरीर का; दरिद्रस्थ--गरीब व्यक्ति के; अन्न-काड्क्षिण:--सदैवपर्याप्त भोजन की इच्छा रखने वाला; इन्द्रियाणि--इन्द्रियों को, जिनकी उपमा सर्पों से दी जाती है; अनुशुष्यन्ति-- धीरे धीरे क्षीणसे क्षीणतर होती जाती हैं; हिंसा अपि--अन्यों से ईर्ष्या करने की प्रवृत्ति भी; विनिवर्तत--कम हो जाती है।

दरिद्र व्यक्ति सदैव भूखा रहने और पर्याप्त भोजन की चाह करने के कारण धीरे धीरे क्षीणहोता जाता है।

अतिरिक्त बल न रहने से उसकी इन्द्रियाँ स्वतः शान्त पड़ जाती हैं।

इसलिए दरिद्रमनुष्य हानिप्रद ईर्ष्यापूर्ण कार्य करने में अशक्त होता है।

दूसरे शब्दों में, ऐसे व्यक्ति को उनतपस्याओं का फल स्वतः प्राप्त हो जाता है, जिसे सन्‍्त-पुरुष स्वेच्छा से करते हैं।

दरिद्रस्थैव युज्यन्ते साधव: समदर्शिन: ।

सद्धिः क्षिणोति तं तर्ष तत आराद्विशुद्धयति ॥

१७॥

दरिद्रस्थ--दरिद्र व्यक्ति का; एव--निस्सन्देह; युज्यन्ते--सरलता से संगति कर सकते हैं; साधव:--साधु पुरुष; सम-दर्शिन: --यद्यपि साधु पुरुष दरिद्र तथा धनी दोनों पर समान दृष्टि रखने वाले हैं किन्तु दरिद्र व्यक्ति उनकी संगति का लाभ उठा सकते हैं;सद्धिः--ऐसे साधु पुरुषों की संगति से; क्षिणोति--कम करता है; तमू-- भौतिक कष्ट के मूल कारण; तर्षम्‌-- भौतिक मोक्षकी अभिलाषा को; ततः--तत्पश्चात्‌; आरात्‌ू--शीघ्र ही; विशुद्धयति--उसका भौतिक कल्मष धुल जाता है।

सनन्‍्त-पुरुष दरिद्रों के साथ बिना रोकटोक के घुलमिल सकते हैं किन्तु धनी व्यक्तियों केसाथ नहीं।

दरिद्र व्यक्ति ऐसे साधु पुरुषों की संगति से तुरन्त ही भौतिक इच्छाओं से विमुख होजाता है और उसके मन का सारा मैल धुल जाता है।

साधूनां समचित्तानां मुकुन्दचरणैषिणाम्‌ ।

जपेक्ष्य: कि धनस्तम्भेरसद्धिरसदाश्रयै: ॥

१८ ॥

साधूनाम्‌ू--साधु-पुरुषों का; सम-चित्तानामू--उनका जो सबों को समान रूप में देखते हैं; मुकुन्द-चरण-एषिणाम्‌--जिनकाएकमात्र कार्य है भगवान्‌ मुकुन्द की सेवा करना और जो उसी सेवा की आंकाक्षा करते हैं; उपेक्ष्यै: --संगति की उपेक्षा करके;किमू--क्या; धन-स्तम्भेः-- धनी तथा गर्वित; असद्धिः--अवांछित व्यक्तियों की संगति से; असत्‌-आश्रयै:ः --असतों अर्थात्‌अभक्तों की शरण लेकर।

सन्त-पुरुष ( साधुजन ) चौबीसों घण्टे कृष्ण का चिन्तन करते रहते हैं।

उनकी और कोईरूचि नहीं रहती।

तो फिर लोग ऐसे आध्यात्मिक पुरुषों की संगति की उपेक्षा करके क्‍यों उनभौतिकतावादियों की संगति करने का प्रयास करते हैं तथा उन अभक्तों की शरण लेते हैं जिनमेंसे अधिकांश अभिमानी तथा धनी हैं?

तदहं मत्तयोमाध्व्या वारुण्या श्रीमदान्धयो: ।

तमोमदं हरिष्यामि स्त्रैणयोरजितात्मनो: ॥

१९॥

तत्‌--अतएव; अहम्‌--मैं; मत्तयो: --इन दोनों उन्मत्त पुरुषों के; माध्व्या--शराब पीने के कारण; वारुण्या--वारुणी नामक;श्री-मद-अन्धयो: --जो दैवी सम्पदा से अन्धे हो चुके हैं; तमः-मदम्‌--तमोगुण के कारण इस मिथ्या प्रतिष्ठा को; हरिष्यामि--छीन लूँगा; स्त्रैणयो:--स्त्रियों पर अनुरक्त होने के कारण; अजित-आत्मनो:--इन्द्रियों को वश में न कर पाने के कारण ।

इसलिए ये दोनों व्यक्ति वारुणी या माध्वी नामक शराब पीकर तथा अपनी इन्द्रियों को वशमें न रख सकने के कारण स्वर्ग के ऐश्वर्य-गर्व से अन्धे और स्त्रियों के प्रति अनुरक्त हो चुके हैं।

मैं उनको इस झूठी प्रतिष्ठा से विहीन कर दूँगा।

यदिमौ लोकपालस्य पुत्रौ भूत्वा तमःप्लुतौ ।

न विवाससमात्मानं विजानीतः सुदुर्मदी ॥

२०॥

अतोहत:ः स्थावरतां स्यातां नैवं यथा पुनः ।

स्मृति: स्यान्मत्प्रसादेन तत्रापि मदनुग्रहातू ॥

२१॥

वासुदेवस्य सान्निध्यं लब्ध्वा दिव्यशरच्छते ।

वृत्ते स्वर्लोकतां भूयो लब्धभक्ती भविष्यत: ॥

२२॥

यत्‌--चूँकि; इमौ--ये दोनों तरुण देवता; लोक-पालस्य--महान्‌ देवता कुवेर के; पुत्रौ--पुत्र; भूत्वा--होकर; तमः-प्लुतौ--तमोगुण में बुरी तरह से मग्न; न--नहीं; विवाससम्‌--बिना किसी वस्त्र के, पूरी तरह नंगे; आत्मानम्‌--अपने शरीरों को;विजानीतः--जानते हुए कि नंगे हैं; सु-दुर्मदौ--मिथ्या अहंकार के कारण अत्यन्त पतित; अतः--इसलिए; अतः --पात्र हैं;स्थावरताम्‌--वृक्ष जैसी गतिहीनता; स्थाताम्‌--हो जायें; न--नहीं; एवम्‌--इस तरह; यथा--जिस तरह; पुनः--फिर; स्मृति:--याद; स्यात्‌--बनी रहे; मत्‌-प्रसादेन--मेरी कृपा से; तत्र अपि--इसके अतिरिक्त; मत्‌-अनुग्रहात्‌-मेंरे विशेष अनुग्रह से;वासुदेवस्थ-- भगवान्‌ का; सान्निध्यम्‌ू--संगति, साक्षात्कार; लब्ध्वा--प्राप्त कर; दिव्य-शरत्‌-शते वृत्ते--देवताओं के एक सौवर्ष बीतने के बाद; स्वलोकताम्‌--स्वर्गलोक में रहने की इच्छा; भूयः--पुन:; लब्ध-भक्ती --अपनी भक्ति को पुन: प्राप्तकरके; भविष्यत:--हो जोयेंगे।

ये दोनों युवक, नलकूवर तथा मणिग्रीव, भाग्यवश महान्‌ देवता कुवेर के पुत्र हैं किन्तुमिथ्या प्रतिष्ठा तथा शराब पीने से उत्पन्न उन्मत्तता के कारण ये इतने पतित हो चुके हैं कि नंगेहोकर भी यह नहीं समझ पा रहे कि वे नंगे हैं।

अतः वृक्षों की तरह रहने वाले ( वृक्ष नंगे होते हैंकिन्तु चेतन नहीं होते ) इन दोनों युवकों को वृक्षों का शरीर मिलना चाहिए।

यही इनके लिएसमुचित दण्ड होगा।

फिर भी वृक्ष बनने से लेकर अपने उद्धार के समय तक इन्हें मेरी कृपा सेअपने विगत पापकर्मों की याद बनी रहेगी।

यही नहीं, मेरी विशेष कृपा से, देवताओं के सौ वर्षबीतने के बाद ये भगवान्‌ वासुदेव का दर्शन कर सकेंगे और भक्तों के रूप में अपना असलीस्वरूप प्राप्त कर सकेंगे।

श्रीशुक उबाचएवमुक्त्वा स देवर्षि्गतो नारायणा श्रमम्‌ ।

नलकूवरमणिग्रीवावासतुर्यमलार्जुनी ॥

२३॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌ उक्त्वा--ऐसा कह कर; स:--वह; देवर्षि:--परम सन्‍्त-पुरुष नारद;गतः--वहाँ से चला गया; नारायण-आश्रमम्‌-- अपने आश्रम, जिसे नारायण-आश्रम कहते हैं; नलकूबर--नलकूवर;मणिग्रीवौ--तथा मणिग्रीव; आसतु:--वहाँ रह रहे; यमल-अर्जुनौ--जुड़वाँ अर्जुन वृक्ष बनने के लिए।

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस तरह कह कर देवर्षि नारद अपने आश्रम, नारायण-आश्रम को लौट गये और नलकूवर तथा मणिग्रीव जुड़वाँ अर्जुन वृक्ष ( यमलार्जुन ) बन गये।

ऋषेर्भागवतमुख्यस्य सत्यं कर्तु बचो हरिः ।

जगाम शनकैस्तत्र यत्रास्तां यमलार्जुनौ ॥

२४॥

ऋषे:--ऋषि नारद का; भागवत-मुख्यस्य-- भक्तों में प्रमुख; सत्यम्‌--सत्य, सही; कर्तुमू--सिद्ध करने के लिए; वच:--शब्द;हरिः-- भगवान्‌ कृष्ण; जगाम--गये; शनकै: -- धीरे-धीरे; तत्र--वहाँ; यत्र--जहाँ; आस्ताम्‌ू-- थे; यमल-अर्जुनौ--दोनों अर्जुनवृक्ष

सर्वोच्च भक्त नारद के वचनों को सत्य बनाने के लिए भगवान्‌ श्रीकृष्ण धीरे धीरे उस स्थानपर गये जहाँ दोनों अर्जुन वृक्ष खड़े थे।

देवर्षिमें प्रियतमो यदिमौ धनदात्मजौ ।

तत्तथा साधयिष्यामि यद्‌गीतं तन्महात्मना ॥

२५॥

देवर्षि:--परम सन्त देवर्षि नारद; मे--मेरा; प्रिय-तम:--सर्वाधिक प्रिय भक्त; यत्‌--यद्यपि; इमौ--ये दोनों ( नलकूबर तथामणिग्रीव ); धनद-आत्मजौ-- धनी पिता की सन्‍्तान तथा अभक्त; तत्‌--देवर्षि के वचन; तथा--जिस प्रकार; साधयिष्यामि--सम्पन्न करूँगा ( वे चाहते थे कि मैं यमलार्जुन के समक्ष आऊँ तो मैं ऐसा ही करूँगा ); यत्‌ गीतम्‌ू--जैसा कहा जा चुका है;तत्‌--वैसा; महात्मना--नारदमुनि द्वारा

यद्यपि ये दोनों युवक अत्यन्त धनी कुवेर के पुत्र हैं और उनसे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं हैपरन्तु देवर्षि नारद मेरा अत्यन्त प्रिय तथा वत्सल भक्त है और क्योंकि उसने चाहा था कि मैं इनकेसमक्ष आऊँ अतएव इनकी मुक्ति के लिए मुझे ऐसा करना चाहिए।

इत्यन्तरेणार्जुनयो: कृष्णस्तु यमयोर्ययौ ।

आत्मनिर्वेशमात्रेण तिर्यग्गतमुलूखलम्‌ ॥

२६॥

इति--ऐसा निश्चय करके; अन्तरेण--बीच में; अर्जुनयो:--दोनों अर्जुन वृक्षों के; कृष्ण: तु--भगवान्‌ कृष्ण; यमयो: ययौ--दोनों वृक्षों के बीच प्रविष्ट हुए; आत्म-निर्वेश-मात्रेण --घुसते ही; तिर्यक्‌--तिरछी; गतम्‌--हो गईं; उलूखलम्‌--ओखली

इस तरह कह कर कृष्ण तुरन्त ही दो अर्जुन वृक्षों के बीच प्रविष्ट हुए जिससे वह बड़ीओखली जिससे वे बाँधे गये थे तिरछी हो गई और उनके बीच फँस गई।

बालेन निष्कर्षयतान्वगुलूखलं तद्‌दामोदरेण तरसोत्कलिताडूप्रिबन्धौ ।

निष्पेततु: परमविक्रमितातिवेप-स्कन्धप्रवालविटपौ कृतचण्डशब्दौ ॥

२७॥

बालेन--बालक कृष्ण द्वारा; निष्कर्षबता--घसीटते हुए; अन्बक्‌--पीछा करती; उलूखलम्‌--ओखली; तत्‌--वह; दाम-उदरेण--पेट से बँधे कृष्ण द्वारा; तरसा--बलपूर्वक; उत्कलित--उखड़ आईं; अड्प्रि-बन्धौ--दोनों वृक्षों की जड़ें; निष्पेततु:--गिर पड़े; परम-विक्रमित--परम शक्ति द्वारा; अति-वेप--बुरी तरह हिलते-डुलते हुए; स्कन्ध--तना; प्रवाल--पत्तियों के गुच्छे;विटपौ--दोनों वृक्ष; कृत--करते हुए; चण्ड-शब्दौ-- भयानक शब्द |

अपने पेट से बँधी ओखली को बलपूर्वक अपने पीछे घसीटते हुए बालक कृष्ण ने दोनोंवृक्षों को उखाड़ दिया।

परम पुरुष की महान्‌ शक्ति से दोनों वृक्ष अपने तनों, पत्तों तथा टहनियोंसमेत बुरी तरह से हिले और तड़तड़ाते हुए भूमि पर गिर पड़े।

तत्र अ्िया परमया ककुभः स्फुरन्तौसिद्धावुपेत्य कुजयोरिव जातवेदा: ।

कृष्णं प्रणम्य शिरसाखिललोकनाथंबद्धाज्लली विरजसाविदमूचतु: सम ॥

२८॥

तत्र--वहाँ, जहाँ अर्जुन वृक्ष गिरे थे; अ्रिया--सजायी गयी; परमया--अत्यधिक; ककुभ:--सारी दिशाएँ; स्फुरन्तौ--तेज सेप्रकाशित; सिद्धौ--दो सिद्ध पुरुष; उपेत्य--निकल कर; कुजयो:--दोनों वृक्षों के बीच से; इब--सद्ृश; जात-वेदा:--साक्षात्‌अग्नि; कृष्णम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; प्रणम्य--प्रणाम करके; शिरसा--सिर के बल; अखिल-लोक-नाथम्‌--परम पुरुष को,जो सबों के स्वामी हैं; बद्ध-अद्जली--हाथ जोड़े हुए; विरजसौ--तमोगुण धुल जाने पर; इृदम्‌--यह; ऊचतु: स्म--कहा।

तत्पश्चात्‌ जिस स्थान पर दोनों अर्जुन वृक्ष गिरे थे वहीं पर दोनों वृक्षों से दो महान्‌ सिद्धपुरुष, जो साक्षात्‌ अग्नि जैसे लग रहे थे, बाहर निकल आये।

उनके सौन्दर्य का तेज चारों ओरप्रकाशित हो रहा था।

उन्होंने नतमस्तक होकर कृष्ण को नमस्कार किया और हाथ जोड़ करनिम्नलिखित शब्द कहे।

कृष्ण कृष्ण महायोगिंस्त्वमाद्य: पुरुष: पर: ।

व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्व॑ं रूपं ते ब्राह्मणा विदुः ॥

२९॥

कृष्ण कृष्ण--हे कृष्ण, हे कृष्ण; महा-योगिन्‌--हे योगेश्वर; त्वमू--तुम; आद्य:--मूल कारण; पुरुष:--परम पुरुष; पर:--इससृष्टि से परे; व्यक्त-अव्यक्तम्‌ू--यह विराट जगत जो कार्य-कारण अथवा स्थूल-सूक्ष्म रूपों से बना है; इदम्‌--यह; विश्वम्‌--सारा जगत; रूपम्‌--रूप; ते--तुम्हारा; ब्राह्मणा:--विद्वान ब्राह्मण; विदुः:--जानते हैं|

हे कृष्ण, हे कृष्ण, आपकी योगशक्ति अचिन्त्य है।

आप सर्वोच्च आदि-पुरुष हैं, आपसमस्त कारणों के कारण हैं, आप पास रह कर भी दूर हैं और इस भौतिक सृष्टि से परे हैं।

विद्वानब्राह्मण जानते हैं ( सर्व खल्विदं ब्रह्य--इस वैदिक कथन के आधार पर ) कि आप सर्वेसर्वा हैंऔर यह विराट विश्व अपने स्थूल तथा सूक्ष्म रूपों में आपका ही स्वरूप है।

त्वमेकः सर्वभूतानां देहास्वात्मेन्द्रिये श्वरः ।

त्वमेव कालो भगवान्विष्णुरव्यय ईश्वर: ॥

३०॥

त्वं महान्प्रकृति: सूक्ष्मा रज:सत्त्वतमोमयी ।

त्वमेव पुरुषोध्यक्ष: सर्वक्षेत्रविकारवित्‌ ॥

३१॥

त्वमू--आप; एक:--एक; सर्व-भूतानाम्‌--सारे जीवों के; देह--शरीर के; असु--प्राण के; आत्म--आत्मा के; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; ईश्वरः --परमात्मा, नियंत्रक; त्वम्‌--आप; एव--निस्सन्देह; काल:--काल; भगवानू्‌--भगवान्‌ विष्णु: --सर्वव्यापी; अव्यय:--अन श्वर; ई श्वरः --नियन्ता; त्वमू--आप; महान्‌--सबसे बड़े; प्रकृतिः-- भौतिक जगत; सूक्ष्मा--सूक्ष्म;रजः-सत्त्व-तम:-मयी--प्रकृति के तीन गुणों ( रजो, सतो तथा तमो ( गुणों ) से युक्त; त्वम्‌ एब--आप सचमुच हैं; पुरुष: --परम पुरुष; अध्यक्ष:--स्वामी; सर्व-क्षेत्र--सारे जीवों के; विकार-वित्‌--चंचल मन को जानने वाले |

आप हर वस्तु के नियन्ता भगवान्‌ हैं।

आप ही हर जीव का शरीर, प्राण, अहंकार तथाइन्द्रियाँ हैं।

आप परम पुरुष, अक्षय नियन्ता विष्णु हैं।

आप काल, तात्कालिक कारण और तीनगुणों--सतो, रजो तथा तमो गुणों--वाली भौतिक प्रकृति हैं।

आप इस भौतिक जगत के आदिकारण हैं।

आप परमात्मा हैं।

अतएव आप हर एक जीव के हृदय की बात को जानने वाले हैं।

गृह्ममाणैस्त्वमग्राह्मो विकारै: प्राकृतैर्गुणैः ।

को न्विहाईति विज्ञातुं प्राक्सिद्धं गुणसंवृतः ॥

३२॥

गृह्ममाणैः--हृश्य होने के कारण प्रकृति से बने शरीर को स्वीकार करने से; त्वम्‌--आप; अग्राह्म:--प्रकृति से निर्मित शरीर मेंही सीमित न रह कर; विकारैः--मन द्वारा विचलित; प्राकृतैः गुणैः--प्रकृति के गुणों द्वारा ( सत्त्व गुण, रजोगुण तथा तमोगुण ); कः--कौन है; नु--उसके बाद; इह--इस जगत में; अर्हति--योग्य होता है; विज्ञातुम--जानने के लिए; प्राक्‌सिद्धम्‌--सृष्टि के पूर्व उपस्थित; गुण-संवृत:--भौतिक गुणों से आच्छन्न होने के कारण।

हे प्रभु, आप सृष्टि के पूर्व से विद्यमान हैं।

अतः इस जगत में भौतिक गुणों वाले शरीर मेंबन्दी रहने वाला ऐसा कौन है, जो आपको समझ सके ?आपको सादर नमस्कार करते हैं।

तस्मै तुभ्यं भगवते वासुदेवाय वेधसे ।

आत्मद्योतगुणैश्छन्नमहिम्ने ब्रह्यणे नमः ॥

३३॥

तस्मै--उसको; तुभ्यमू--आपको; भगवते-- भगवान्‌ को; वासुदेवाय--संकर्षण, प्रद्युम्म तथा अनिरुद्ध के उद्गम वासुदेव को;वेधसे-- सृष्टि के उद्गम को; आत्म-होत-गुणैः छन्न-महिम्ने--आपको, जिसका यश अपनी ही शक्ति से आच्छादित है;ब्रह्मणे--परब्रह्म को; नम: --हमारा नमस्कार।

अपनी ही शक्ति से आच्छादित महिमा वाले हे प्रभु, आप भगवान्‌ हैं।

आप सृष्टि के उद्गम, संकर्षण, हैं और चतुर्व्यूह के उद्गम, वासुदेव, हैं।

आप सर्वस्व होने से परब्रह्म हैं अतएव हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।

यस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरेष्वशरीरिण: ।

तैस्तैरतुल्यातिशयैवीर्य॑र्देहिष्वसड्रतैः ॥

३४॥

स भवान्सर्वलोकस्य भवाय विभवाय च ।

अवतीर्णोइशभागेन साम्प्रतं पतिराशिषाम्‌ ॥

३५॥

यस्य--जिसका; अवतारा:--विभिन्न अवतार यथा मत्स्य, कूर्म, वराह; ज्ञायन्ते--कल्पित किये जाते हैं; शरीरेषु--भिन्न भिन्नप्रकार से दृश्य विभिन्न शरीरों में; अशरीरिण:--सामान्य शरीर नहीं अपितु दिव्य हैं; तैः तैः--उन्हीं उन्हीं कर्मों द्वारा; अतुल्य--अतुलनीय; अति-शयै:--असीम; वीर्य: --बल द्वारा; देहिषु--शरीरधारियों द्वारा; असड्डतैः --विभिन्न अवतारों में जो कार्य करपाना असम्भव है; सः--वही परमेश्वर; भवान्‌ू-- आप; सर्व-लोकस्य--हर एक की; भवाय--उन्नति के लिए; विभवाय--मुक्तिके लिए; च--तथा; अवतीर्ण:--अवतरित हुए हैं; अंश-भागेन--अंश समेत पूर्ण शक्ति में; साम्प्रतम्‌ू--इस क्षण; पतिःआशिषाम्‌--आप समस्त शुभ के स्वामी भगवान्‌ हैं।

आप मत्स्य, कूर्म, वराह जैसे शरीरों में प्रकट होकर ऐसे प्राणियों द्वारा सम्पन्न न हो सकनेवाले कार्यकलाप--असामान्य, अतुलनीय, असीम शक्ति वाले दिव्य कार्य--प्रदर्शित करते हैं।

अतएव आपके ये शरीर भौतिक तत्त्वों से नहीं बने होते अपितु आपके अवतार होते हैं।

आप वहीभगवान्‌ हैं, जो अब अपनी पूर्ण शक्ति के साथ इस जगत के सारे जीवों के लाभ के लिए प्रकटहुए हैं।

नमः परमकल्याण नमः परममड़ुल ।

वासुदेवाय शान्ताय यदूनां पतये नमः: ॥

३६॥

नमः--हम नमस्कार करते हैं परम-कल्याण---आप परम कल्याण हैं $ नम:ः--हमारा आपको नमस्कार; परम-मड़ल---आप जोभी करते हैं वह उत्तम है; वासुदेवाय--वासुदेव को; शान्ताय--अत्यन्त शान्त को; यदूनामू--यदुवंश के; पतये--नियन्ता को;नम:ः--हमारा नमस्कार है हे परम कल्याण, हम आपको सादर नमस्कार करते हैं क्योंकि आप परम शुभ हैं।

हे यदुबंशके प्रसिद्ध वंशज तथा नियन्ता, हे वसुदेव-पुत्र, हे परम शान्त, हम आपके चरणकमलों में सादरनमस्कार करते हैं।

अनुजानीहि नौ भूमंस्तवानुचरकिड्डरौ ।

दर्शन नौ भगवत ऋषेरासीदनुग्रहात्‌ ॥

३७॥

अनुजानीहि--आप अनुमति दें; नौ--हमें; भूमन्‌--हे विराट रूप; तब अनुचर-किड्जूरौ --हम आपके विश्वस्त भक्त नारदमुनि केदास हैं; दर्शनम्‌--साक्षात्‌ देखने के लिए; नौ--हमारा; भगवतः--आपका; ऋषे:--नारद ऋषि का; आसीत्‌-- था ( शाप केरूप में ); अनुग्रहात्‌-कृपा से |

हे परम रूप, हम सदैव आपके दासों के, विशेष रूप से नारदमुनि के दास हैं।

अब आप हमेंअपने घर जाने की अनुमति दें।

यह तो नारदमुनि की कृपा है कि हम आपका साक्षात्‌ दर्शन करसके।

वाणी गुणानुकथने श्रवणौ कथायांहस्तौ च कर्मसु मनस्तव पादयोर्न: ।

स्मृत्यां शिरस्तव निवासजगत्प्रणामेदृष्टि: सतां दर्शनेउस्तु भवत्तनूनाम्‌ ॥

३८ ॥

वाणी--शब्द, बोलने की शक्ति; गुण-अनुकथने--सदैव आपकी लीलाओं के विषय में बातें करने में व्यस्त; श्रवणौ--कान;कथायाम्‌--आपकी तथा आपकी लीलाओं के विषय में बातें करने में; हस्तौ--हाथ, पैर तथा अन्य इन्द्रियाँ; च-- भी; कर्मसु--आपका आदेश पालन करने में लगाकर; मन:--मन; तब--आपका; पादयो: --चरणकमलों का; नः--हमारी; स्मृत्याम्‌--ध्यान में लगी स्मृति में; शिर:ः--सिर; तब--आपका; निवास-जगत्‌-प्रणामे-- चूँकि आप सर्वव्यापी हैं और सर्वस्व हैं तथा हमारेश़ सिरों को नत होना चाहिए, भोग के लिए नहीं; दृष्टि:--देखने की शक्ति; सताम्‌--वैष्णवों के ; दर्शने--दर्शन करने में; अस्तु--इसी तरह लगे रहें; भवत्‌-तनूनाम्‌ू--जो आपसे अभिन्न हैं|

अब से हमारे सभी शब्द आपकी लीलाओं का वर्णन करें, हमारे कान आपकी महिमा काश्रवण करें, हमारे हाथ, पाँव तथा अन्य इन्द्रियाँ आपको प्रसन्न करने के कार्यो में लगें तथा हमारेमन सदैव आपके चरणकमलों का चिन्तन करें।

हमारे सिर इस संसार की हर वस्तु को नमस्कारकरें क्योंकि सारी वस्तुएँ आपके ही विभिन्न रूप हैं और हमारी आँखें आपसे अभिन्न वैष्णवों केरूपों का दर्शन करें।

श्रीशुक उबाचइत्थं सड्डी्तितस्ताभ्यां भगवान्गोकुले श्वरः ।

दाम्ना चोलूखले बद्धः प्रहसन्नाह गुह्मकौ ॥

३९॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्‌--इस प्रकार, जैसाकि पहले कहा जा चुका है; सड्डी्तित:--महिमा कागायन किये जाने तथा प्रशंसित होने पर; ताभ्यामू--दोनों देवताओं द्वारा; भगवान्‌-- भगवान्‌; गोकुल-ई श्रर:-- गोकुल के स्वामी( क्योंकि वे सर्व-लोक-महे श्वर हैं ); दाम्ना--रस्सी से; च-- भी; उलूखले-- ओखली में; बद्ध:--बँधे हुए; प्रहसन्‌--हँसते हुए;आह--कहा; गुह्मकौ --दोनों देवताओं से

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस तरह दोनों देवताओं ने भगवान्‌ की स्तुति की।

यद्यपि भगवान्‌ कृष्ण सबों के स्वामी हैं और गोकुलेश्वर थे किन्तु वे गोपियों की रस्सियों द्वारा लकड़ीकी ओखली से बाँध दिये गये थे इसलिए उन्होंने हँसते हुए कुवेर के पुत्रों से ये शब्द कहे।

श्रीभगवानुवाचज्ञातं मम पुरैवेतदषिणा करुणात्मना ।

यच्छीमदान्धयोर्वाग्भिर्विभ्रंशोनुग्रह: कृत: ॥

४०॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- श्री भगवान्‌ ने कहा; ज्ञातम्‌--ज्ञात है; मम--मुझको; पुरा-- भूतकाल में; एव--निस्सन्देह; एतत्‌--यहघटना; ऋषिणा--नारद ऋषि से; करुणा-आत्मना--तुम पर अत्यधिक कृपालु होने के कारण; यत्‌--जो; श्री-मद-अन्धयो:--जो भौतिक ऐश्वर्य के पीछे उन्मत्त हो चुके थे फलतः अंधे बन गये थे; वाग्भि:--वाणी से या शाप से; विभ्रेंश: --स्वर्गलोक सेगिर कर यहाँ पर अर्जुन वृक्ष बनने के लिए; अनुग्रह: कृत:--तुम पर उन्होंने बहुत अनुग्रह किया है।

भगवान्‌ ने कहा : परम सन्त नारदमुनि अत्यन्त कृपालु हैं।

उन्होंने अपने शाप से तुम दोनों परबहुत बड़ा अनुग्रह किया है क्योंकि तुम दोनों भौतिक ऐश्वर्य के पीछे उन्मत्त होकर अन्धे बनचुके थे।

यद्यपि तुम दोनों स्वर्गलोक से गिर कर वृक्ष बने थे किन्तु उन्होंने तुम दोनों पर सर्वाधिककृपा की।

मैं प्रारम्भ से ही इन घटनाओं को जानता था।

साधूनां समचित्तानां सुतरां मत्कृतात्मनाम्‌ ।

दर्शनान्नो भवेद्वन्ध: पुंसोक्ष्णो: सवितुर्यथा ॥

४१॥

साधूनाम्‌ू--सारे भक्तों का; सम-चित्तानाम्‌--जो हर एक के प्रति समभाव रखते हैं; सुतराम्‌--पूर्णतया; मत्‌-कृत-आत्मनाम्‌--उन व्यक्तियों का जो पूर्ण शरणागत हैं या मेरी सेवा करने के लिए कृतसंकल्प हैं; दर्शनात्‌ू--मात्र दर्शन करने से; नो भवेत्‌बन्धः--सारे भौतिक बन्धन से मुक्ति; पुंसः--व्यक्ति का; अक्ष्णो:--आँखों का; सवितु: यथा--मानो सूर्य के समक्ष हो।

जब कोई व्यक्ति सूर्य के समक्ष होता है, तो उसकी आँखों में अँधेरा नहीं रह जाता।

इसी तरहजब कोई व्यक्ति ऐसे साधु या भक्त के समश्ष होता है, जो पूर्णतया हढ़ तथा भगवान्‌ केशरणागत होता है, तो उसका भव-बन्धन छूट जाता है।

तदगच्छतं मत्परमौ नलकूवर सादनम्‌ ।

सजञ्जातो मयि भावो वामीप्सित: परमोभव: ॥

४२॥

तत्‌ गच्छतम्‌--अब तुम दोनों जा सकते हो; मत्‌-परमौ--मुझे अपने जीवन का परम लक्ष्य मान कर; नलकूवर--हे नलकूबरतथा मणिग्रीव; सादनम्‌-- अपने घर; सञ्जात:--सम्पृक्त; मयि--मुझमें; भाव:--भक्ति; वाम्‌--तुम्हारे द्वारा; ईप्सित:--अभिलषित; परम: --सर्वोच्च, सारी इन्द्रियों से सदैव संलग्न; अभव:ः--जिससे जगत में आना न हो।

हे नलकूवर तथा मणिग्रीव, अब तुम दोनों अपने घर वापस जा सकते हो।

चूँकि तुम मेरीभक्ति में सदैव लीन रहना चाहते हो अतः मेरे प्रति प्रेम उत्पन्न करने की तुम दोनों की इच्छा पूरीहोगी और अब तुम उस पद से कभी भी नीचे नहीं गिरोगे।

श्रीशुक उबाचइत्युक्तौ तौ परिक्रम्य प्रणम्य च पुनः पुनः ।

बद्धोलूखलमामन्त्र्य जम्मतुर्दिशमुत्तराम्‌ ॥

४३॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति उक्तौ--इस तरह भगवान्‌ द्वारा आदेश दिये जाने पर; तौ--नलकूवर तथामणिग्रीव; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; प्रणम्य--नमस्कार करके; च--भी; पुनः पुनः--फिर फिर, बारम्बार; बद्ध-उलूखलम्‌आमन्त्य-- ओखली से बँधे भगवान्‌ से अनुमति लेकर; जग्मतु:--विदा हो गये; दिशम्‌ उत्तरामू-- अपने अपने गन्तव्यों को

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार कहे जाने पर, उन दोनों देवताओं ने लकड़ी कीओखली से बँधे भगवान्‌ की परिक्रमा की और उनको नमस्कार किया।

भगवान्‌ कृष्ण सेअनुमति लेने के बाद वे अपने अपने धामों को वापस चले गये।

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