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अध्याय बीस: वृन्दावन में वर्षा ऋतु और शरद ऋतु

10.20श्रीशुक उबाचतयोस्तदद्भुतं कर्म दावाग्ने्मो क्षमात्मन: ।

गोपाःस्त्रीभ्य: समाचख्यु: प्रलम्बबधमेव च ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तयो:--उन दोनों ( कृष्ण तथा बलराम ) का; तत्‌--वह; अद्भुतम्‌-- अद्भुत;कर्म-कार्य; दाव-अग्ने:--दावाग्नि से; मोक्षम्‌-- उद्धार; आत्मन: -- अपना; गोपा:--ग्वालबाल ; स्त्री भ्य:--स्त्रियों से;समाचख्यु:--विस्तार से बतलाया; प्रलम्ब-वधम्‌--प्रलम्बासुर का मारा जाना; एब--निस्सन्देह; च--भी

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तब ग्वालबालों ने वृन्दावन की स्त्रियों से दावाग्नि से बचाएजाने और प्रलम्बासुर का बध किये जाने के कृष्ण तथा बलराम के अद्भुत कार्यों का विस्तार सेवर्णन किया।

गोपवृद्धाश्व गोप्यश्च तदुपाकर्ण्य विस्मिता: ।

मेनिरे देवप्रवरौ कृष्णरामौ ब्रजं गतोौ ॥

२॥

गोप-वृद्धाः--बूढ़े ग्वाले; च--तथा; गोप्य:--गोपियाँ; च-- भी; तत्‌--से; उपाकर्ण्य--सुनकर; विस्मिता:--आश्चर्यचकित;मेनिरि--विचार किया; देव-प्रवरौ--दो प्रतिष्ठित देवता; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम दोनों भाई; ब्रजम्‌--वृन्दावन में;गतौ-चोमे

यह वर्णन सुनकर बड़े-बूढ़े गोप तथा स्त्रियाँ आश्चर्यचकित हो गये और वे इस निष्कर्ष परपहुँचे कि कृष्ण तथा बलराम अवश्य ही महान्‌ देवता हैं, जो वृन्दावन में प्रकट हुए हैं।

ततः प्रावर्तत प्रावृट्सर्वसत्त्वसमुद्धवा ।

विद्योतमानपरिधिर्विस्फूर्जनितनभस्तला ॥

३॥

ततः--तत्पश्चात्‌; प्रावर्तत--शुरू हुई; प्रावृट्‌ू--वर्षा ऋतु; सर्व-सत्त्व--सारे जीवों की; समुद्धवा--उत्पत्ति की स्त्रोत;विद्योतमान--बिजली से चमकता; परिधि: --क्षितिज; विस्फूर्जित--( गरज से ) विश्षुब्ध; नभ:-तला--आकाश।

इसके बाद वर्षा ऋतु का शुभारम्भ हुआ जो समस्त जीवों को जीवनदान देती है।

आकाशगर्जना से गूँजने लगा और क्षितिज पर बिजली चमकने लगी।

सान्द्रनीलाम्बुदैव्योम सविद्युत्स्तनयित्नुभि: ।

अस्पष्टज्योतिराच्छन्नं ब्रहोव॒ सगुणं बभौ ॥

४॥

सान्द्र-घने; नील--नीले; अम्बुदैः --बादलों से; व्योम-- आकाश; स-विद्युत्‌--बिजली सहित; स्तनबिलुभि:--तथा गरज केसाथ; अस्पष्ट-- धूमिल; ज्योति:-- प्रकाश; आच्छन्नम्‌--ढका हुआ; ब्रह्म--आत्मा; इब--मानो; स-गुणम्‌-- भौतिक गुणों सेयुक्त; बभौ--प्रकट हो गया हो |

तत्पश्चात्‌ बिजली तथा गरज से युक्त घने नीले बादलों से आकाश आच्छादित हो गया।

इसतरह आकाश तथा उसकी प्राकृतिक ज्योति उसी तरह ढक गये जिस तरह आत्मा प्रकृति के तीनगुणों से आच्छादित हो जाता है।

अष्टौ मासात्रिपीतं यद्धूम्याश्नोदमयं वसु ।

स्वगोभिमेंक्तुमारेभे पर्जन्य: काल आगते ॥

५॥

अष्टौ--आठ; मासान्‌--महीनों के दौरान; निपीतम्‌--पिया हुआ; यत्‌--जो; भूम्या:--पृथ्वी का; च--तथा; उद-मयम्‌--जलसे युक्त; बसु--सम्पत्ति; स्व-गोभि: --अपनी ही किरणों से; मोक्तुम्‌ू--मुक्त करने के लिए; आरेभे--प्रारम्भ कर दिया;पर्जन्य: --सूर्य ने; काले--उचित समय; आगते--आ जाने पर।

सूर्य ने अपनी किरणों से आठ मास तक पृथ्वी की जल रूपी सम्पत्ति का शोषण किया था।

अब उपयुक्त समय आ गया था और सूर्य अपने उस संचित संपत्ति को मुक्त करने लगा।

तडिद्वन्तो महामेघाश्वण्ड श्वसन वेपिता: ।

प्रीणनं जीवन हास्य मुमुचु: करुणा इब ॥

६॥

तडित्‌-वन्तः--बिजली का प्रदर्शन करते; महा-मेघा:--बड़े बड़े बादल; चण्ड--उग्र; श्वसन--वायु द्वारा; वेपिता: --हिलायेगये; प्रीणनम्‌--तृप्ति; जीवनम्‌--उनका जीवन ( जल ); हि--निस्सन्देह; अस्य--इस जगत का; मुमुचु:--मुक्त किया;'करुणा:--दयालु व्यक्ति; इब--सहृश |

बिजली चमकाते बड़े बड़े बादल प्रचण्ड वायु के द्वारा हिलाये-डुलाये जाकर दूर ले जाये गये थे।

ये बादल दयालु पुरुषों की तरह इस संसार की खुशी के लिए अपना जीवन दान कर रहेथे।

तपःकृशा देवमीढा आसीद्वर्षीयसी मही ।

यथेव काम्यतपसस्तनु: सम्प्राप्प तत्फलम्‌ ॥

७॥

तपः-कृशा-ग्रीष्म के ताप से दुर्बल; देव-मीढा--जलदेव द्वारा कृपापूर्वक छिड़की; आसीत्‌--हो गयी; वर्षीयसी --पूर्णतयापोषित; मही--पृथ्वी; यथा एब--जिस तरह; काम्य--इन्द्रिय तृप्ति पर आधारित; तपस:--तपस्वी का; तनुः--शरीर;सम्प्राप्प--प्राप्त करके; तत्‌--उस तपस्या का; फलम्‌--फल

ग्रीष्म के ताप से पृथ्वी कृषकाय हो चुकी थी किन्तु वर्षा के देवता द्वारा तर किये जाने परपुनः पूरी तरह हरीभरी हो गईं।

इस तरह पृथ्वी उस व्यक्ति के समान थी जिसका शरीर भौतिककामना से की गई तपस्या के कारण कृषकाय हो जाता है किन्तु तपस्या का फल प्राप्त हो जानेपर वह पुनः पूरी तरह हष्ट पुष्ट हो उठता है।

निशामुखेषु खद्योतास्तमसा भान्ति न ग्रहा: ।

यथा पापेन पाषण्डा न हि वेदा: कलौ युगे ॥

८॥

निशा-मुखेषु--सांध्यकालीन धुंधलके के समय; खद्योता:--जुगनू; तमसा--अंधकार के कारण; भान्ति--चमकते हैं; न--नहीं; ग्रहाः--नक्षत्रगण; यथा--जिस तरह; पापेन--पापकर्मों के कारण; पाषण्डा:--नास्तिक सिद्धान्त; न--नहीं; हि--निश्चयही; वेदा:--वेद; कलौ युगे-इन्‌ थे अगे ओफ्‌ कलि

वर्षा ऋतु के साँझ के धुंधलेपन में, अंधकार के कारण जुगनू तो चमक रहे थे किन्तुनक्षत्रगण प्रकाश नहीं बिखेर पा रहे थे, जिस प्रकार कि कलियुग में पापकृत्यों की प्रधानता सेनास्तिक सिद्धान्त वेदों के असली ज्ञान को आच्छादित कर देते हैं।

श्र॒त्वा पर्जन्यनिनदं मण्डुका: ससूजुर्गिर: ।

तृष्णीं शयानाः प्राग्यद्वद्राह्मणा नियमात्यये ॥

९॥

श्रुत्वा--सुनकर; पर्जन्य--वर्षा के बादलों की; निनदम्‌--प्रतिध्वनि; मण्डुका: --मेंढकों ने; ससृजु:--निकाली; गिर: --अपनीध्वनि; तृष्णीमू--मौन भाव से; शयाना:--लेटे हुए; प्राकू--पहले; यद्वत्‌ू--जिस तरह; ब्राह्मणा:--ब्राह्मण छात्र; नियम-अत्यये--प्रातःकालीन कृत्यों को समाप्त करके

वे मेंढक जो अभी तक मौन पड़े हुए थे, वर्षा ऋतु के बादलों की गर्जना सुनकर अचानकटर्रने लगे मानो शान्त भाव से प्रातःकालीन कृत्य करनेवाले ब्राह्मण विद्यार्थी अपने गुरु द्वाराबुलाए जाने पर अपना पाठ सुनाने लगे हों।

आसन्ुत्पथगामिन्य: क्षुद्रनद्यो इनुशुष्यती: ।

पुंसो यथास्वतन्त्रस्य देहद्रविण सम्पदः ॥

१०॥

आसनू--हो गये; उत्पथ-गामिन्य:--अपने अपने मार्गों से विपथ; क्षुद्र--नगण्य; नद्यः--नदियाँ; अनुशुष्यती: --सूखकर के;पुंसः--मनुष्य का; यथा--जिस तरह; अस्वतन्त्रस्थ--जो स्वतंत्र नहीं है उसका ( अपनी इन्द्रियों के वशीभूत ); देह--शरीर;द्रविण--शारीरिक सम्पत्ति; सम्पदः--तथा सम्पत्ति।

वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही सूखी हुई क्षुद्र नदियाँ बढ़ने लगीं और अपने असली मार्गोंको छोड़कर इधर उधर बहने लगीं मानो इन्द्रियों के वशीभूत किसी मनुष्य के शरीर, सम्पत्ति तथाधन हों।

हरिता हरिभिः शष्पैरिन्धगोपैश्व लोहिता ।

उच्छिलीन्ध्रकृतच्छाया नृणां श्रीरिव भूरभूत्‌ ॥

११॥

हरिताः--हरिताभ; हरिभि:--हरी; शष्पैः -- नई उगी घास से; इन्द्रगोपैः --इन्द्रगोप कीटों ( बीरबहूटी ) से; च--तथा; लोहिता--लालाभ; उच्छिलीन्ध्र--कुकुर मुत्तों द्वारा; कृत--की गई; छाया--छाया; नृणाम्‌-- मनुष्यों के; श्री:--ऐश्वर्य; इब--सदृश;भू:--पृथ्वी; अभूत्‌--हो गई

नई उगी घास से पृथ्वी पन्ने ( मरकत ) की तरह हरी हो रही थी, इन्द्रगोप कीटों ने उसमें लालरंग मिला दिया और श्वेत रंग के कुकुरमुत्तों ने और भी रंगत ला दी।

इस प्रकार पृथ्वी उस व्यक्तिजैसी लगने लगी जो सहसा धनी बन जाता है।

क्षेत्राणि शष्यसम्पद्धधिः कर्षकाणां मुदं ददुः ।

मानिनामनुतापं वै दैवाधीनमजानताम्‌ ॥

१२॥

क्षेत्राणि --खेत; शष्य-सम्पद्धिः--अपनी अनाज की सम्पत्ति से; कर्षकाणाम्‌-कृषकों को; मुदम्‌--हर्ष; ददुः--प्रदान किया;मानिनाम्‌--मिथ्या गर्व करनेवालों को; अनुतापमू--जलन, पश्चात्ताप; बै--निस्सन्देह; दैव-अधीनम्‌-- भाग्य के अधीन;अजानताम्‌--न जाननेवालों को |

अपनी अन्नरूपी सम्पदा से सारे खेत किसानों को प्रफुल्लित कर रहे थे।

किन्तु वही खेत उनलोगों के हृदयों में पश्चात्ताप उत्पन्न कर रहे थे, जो इतने घमण्डी थे कि खेती के कार्य में नहीं लगना चाहते थे और यह नहीं समझ पाते थे कि किस तरह हर वस्तु भगवान्‌ के अधीन है।

जलस्थलौकस: सर्वे नववारिनिषेवया ।

अबिभ्न्रुचिरं रूपं यथा हरिनिषेवया ॥

१३॥

जल--जल के; स्थल--तथा स्थल के; ओकस:--निवासी; सर्वे--सभी; नव--नवीन; वारि-- जल का; निषेवया--सेवनकरने से; अबिभ्रन्‌--ग्रहण किया; रुचिरम्‌ू--आकर्षक; रूपमू--रूप; यथा--जिस तरह; हरि-निषेवया-- भगवान्‌ की भक्तिकरने से |

चूँकि जल तथा स्थल के समस्त प्राणियों ने नवीन वर्षाजल का लाभ उठाया इसलिए उनकेरूप आकर्षक एवं सुहावने हो गये जिस तरह कोई भक्त भगवान्‌ की सेवा में लगने पर सुन्दरलगने लगता है।

सरिद्धिः सड़तः सिन्धुश्लुक्षो भ श्वसनोर्मिमान्‌ ।

अपक्वयोगिनश्ित्तं कामाक्त गुणयुग्यथा ॥

१४॥

सरिद्धिः--नदियों समेत; सड्भतः--मिलने से; सिन्धु:--सागर; चुक्षोभ--क्षुब्ध हो उठा; श्रसन--वायु से उड़कर; ऊर्मि-मान्‌--लहरों से युक्त; अपक्ब--अप्रौढ़; योगिन: --योगी का; चित्तम्‌ू--मन; काम-अक्तम्‌ू--कामवासना से रंजित; गुण-युक्‌ --इन्द्रियतृप्ति के विषयों से सम्बन्ध रखने से; यथा--जिस तरह।

जहाँ जहाँ नदियाँ आकर समुद्र से मिलीं, वहाँ समुद्र विक्षुब्ध हो उठा और हवा से इसकीलहरें इधर उधर उठने लगीं, जिस तरह कि किसी अपरिपक्व योगी का मन कामवासना से रंजितहोने तथा इन्द्रियतृप्ति के विषयों के प्रति अनुरक्त होने से डगमगाने लगता है।

गिरयो वर्षधाराभि्न्यमाना न विव्यथु: ।

अभिभूयमाना व्यसनैर्यथाधोक्षजचेतस: ॥

१५॥

गिरयः--पर्वत; वर्ष-धाराभि:-- जल धारण किये हुए बादलों द्वारा; हन्यमाना:--चोट खाकर; न विव्यथु:--हिले नहीं;अभिभूयमाना:-- प्रहार किये जाने पर; व्यसनैः--संकटों से; यथा--जिस तरह; अधोक्षज-चेतस:-- भगवान्‌ में लीन मन वाले

जिस प्रकार भगवान्‌ में लीन मन वाले भक्तगण सभी प्रकार के संकटों से प्रहार किये जानेपर भी शान्त बने रहते हैं उसी प्रकार वर्षा ऋतु में जलवाही बादलों द्वारा बारम्बार प्रहार कियेजाने पर भी पर्वत तनिक भी विचलित नहीं हुए।

मार्गा बभूवु: सन्दिग्धास्तृणैश्छन्ना हासंस्कृता: ।

नाभ्यस्यमाना: श्रुतयो द्विजै:ः कालेन चाहता: ॥

१६॥

मार्गा:--रास्ते; बभूवु:--हो गये; सन्दिग्धा: --अस्पष्ट; तृणैः--घास से; छन्ना:--ढके हुए; हि--निस्सन्देह; असंस्कृता:--अस्वच्छ; न अभ्यस्यमाना:--न पढ़े जाने से; श्रुत॒वः--शास्त्र; द्विजैः--ब्राह्मणों द्वारा; कालेन--समय के प्रभाव से; च--तथा;आहता:- भ्रष्ट |

वर्षा ऋतु में रास्तों को साफ न करने से वे घास-फूस और कूड़े-करकट से ढक गये औरउन्हें पहचान पाना कठिन हो गया।

ये रास्ते उन धार्मिक शाम्त्रों ( श्रुतियों ) के तुल्य थे, जोब्राह्मणों द्वारा अध्ययन न किये जाने से भ्रष्ट हो गये हों और कालक्रम से आच्छादित हो चुके हों।

लोकबबन्धुषु मेघेषु विद्युतश्षलसौहदा: ।

स्थैर्य न चक्कर: कामिन्यः पुरुषेषु गुणिष्विव ॥

१७॥

लोक--सारे जगत के; बन्धुषु--मित्र; मेघेषु--बादलों में; विद्युतः:--बिजली; चल-सौहदा: --जिनकी मित्रता चलायमान है;स्थैर्यम्‌--स्थिरता; न चक्क:--नहीं बनाये रखते; कामिन्य:--कामुक स्त्रियाँ; पुरुषेषु--पुरुषों में; गुणिषु--गुणवान; इब--जिसतरह ।

यद्यपि बादल सारे जीवों के शुभेषी मित्र होते हैं लेकिन दुर्बलमना चंचल बिजली बादलों केएक समूह से दूसरे समूह में इस तरह गति करने लगी मानो गुणवान पुरुषों के प्रति भीविश्वासघात करनेवाली कामुक स्त्रियाँ हों।

धनुर्वियति माहेन्द्रं निर्गुणं च गुणिन्यभात्‌ ।

व्यक्ते गुणव्यतिकरेगुणवान्पुरुषो यथा ॥

१८॥

धनु:--धनुष ( इन्द्रधनुष )) वियति--आकाश में; माहा-इन्द्रमू--इन्द्र का; निर्गुणम्‌--गुणहीन ( प्रत्यंचारहित ); च--यद्यपि;गुणिनि--आकाश में, जिसमें ध्वनि जैसा निश्चित गुण पाया जाता है; अभात्‌--प्रकट हुआ; व्यक्ते--व्यक्त जगत के भीतर;गुण-व्यतिकरे-- भौतिक गुणों की पारस्परिक क्रियाओं वाले; अगुण-वान्‌-- भौतिक गुणों से सम्बन्ध न रखनेवाले; पुरुष: --परम पुरुष; यथा--जिस तरह।

जब उस आकाश में इन्द्रधनुष प्रकट हुआ जिसमें गर्जना करने का गुण था, तो वह सामान्यधनुषों से भिन्न था क्योंकि वह प्रत्यज्ञा पर टिका हुआ नहीं था।

इसी प्रकार जब भगवान्‌ इसजगत में, जो कि भौतिक गुणों की पारस्परिक क्रिया स्वरूप है, प्रकट होते हैं, तो वे सामान्यपुरुषों से भिन्न होते हैं क्योंकि वे समस्त भौतिक गुणों से मुक्त तथा समस्त भौतिक दशाओं सेस्वतंत्र होते हैं।

न रराजोडुपएछन्नः स्वज्योत्स्नाराजितैर्घन: ।

अहंमत्या भासितया स्वभासा पुरुषो यथा ॥

१९॥

न रराज--चमका नहीं; उडुप:--चन्द्रमा; छन्नः--ढका हुआ; स्व-ज्योत्स्ना--अपनी चाँदनी से; राजितैः -- प्रकाशित; घनै: --बादलों से; अहमू-मत्या--मिथ्या अहंकार से; भासितया--प्रकाशित; स्व-भासा--अपनी ही द्युति से; पुरुष:--जीव; यथा--जिस तरह |

वर्षा ऋतु में बादलों से ढके रहने के कारण चन्द्रमा के प्रकट होने में व्यवधान पड़ता थाऔर यही बादल चन्द्रमा की किरणों से प्रकाशित होते थे।

इसी प्रकार इस भौतिक जगत मेंमिथ्या अहंकार के आवरण से जीव प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हो पाता जबकि वह स्वयं शुद्ध आत्मा कीचेतना से प्रकाशित होता है।

मेघागमोत्सवा हृष्टा: प्रत्यनन्दज्छिखण्डिन: ।

गृहेषु तप्तनिर्विणणा यथाच्युतजनागमे ॥

२०॥

मेघ--बादलों का; आगम--आगमन होने से; उत्सवा:--उत्सव मनानेवाले; हृष्टा: --प्रसन्न हुए; प्रत्यनन्दन्‌--अभिनन्दन हेतुचिल्ला पड़े; शिखण्डिन:--मोरगण; गृहेषु--अपने घरों में; तप्त--दुखित; निर्विण्णा:--और तब सुखी बनते हैं; यथा--जिसतरह; अच्युत--अच्युत भगवान्‌ के; जन--भक्तों के; आगमे--आगमन पर।

जब मोरों ने बादलों को आते देखा तो वे उल्लासित हो गये और हर्षयुक्त अभिनन्दन में टेरनेलगे जिस तरह गृहस्थ जीवन में दुखित लोग अच्युत भगवान्‌ के शुद्ध भक्तों के आगमन परहर्षित हो जाते हैं।

पीत्वाप: पादपा: पद्धिरासन्नानात्ममूर्तय: ।

प्रावक्षामास्तपसा श्रान्ता यथा कामानुसेवया ॥

२१॥

पीत्वा--पीकर; आप:--जल; पाद-पा:--वृक्ष; पद्धिः--अपने पाँवों से; आसन्‌ू-- धारण कर लिया; नाना--विविध; आत्म-मूर्तव:ः --शारीरिक स्वरूप; प्राक्‌ --पहले; क्षामा:-- क्षीण; तपसा--तपस्या से; श्रान्ता:--थके हुए; यथा--जिस तरह; काम-अनुसेवया--प्राप्त वांछित फलों को भोगकर के ।

जो वृक्ष दुबले हो गए थे तथा सूख गये थे उनके शरीर के विभिन्न अंग अपनी जड़ों ( पाँवों )से वर्षा का नया जल पाकर लहलहा उठे |

इसी तरह तपस्या के कारण जिसका शरीर पतला औरदुर्बल हो जाता है, वह पुनः उस तपस्या के माध्यम से प्राप्त भौतिक वस्तुओं का भोग करकेस्वस्थ शरीरवाला दिखने लगता है।

सरःस्वशान्तरो धःसु न्यूषुरड्रापि सारसा: ।

गृहेष्वशान्तकृत्येषु ग्राम्या इव दुराशया: ॥

२२॥

सरःसु--सरोवरों में; अशान्त--बेचैन; रोधःसु--तटों पर; न्यूषु:--रहे आते हैं; अड़--हे राजा; अपि--निस्सन्देह; सारसा:--सारस पक्षी; गृहेषु-- अपने अपने घरों में; अशान्त--बेचैन; कृत्येषु--कार्यों में; ग्राम्या:-- भौतिकतावादी व्यक्ति; इब--निस्सन्देह; दुराशया: --दूषित विचारवाले

वर्षाकाल में सरोवरों के तटों के विश्लुब्ध होने पर भी सारस पक्षी तटों पर रहते रहे जिस तरहदूषित मनवाले भौतिकतावादी व्यक्ति अनेक उत्पातों के बावजूद घरों पर ही रहते जाते हैं।

जलौधघेर्निरभिद्यन्त सेतवो वर्षती श्वरे ।

पाषण्डिनामसद्दादैर्वेदमार्गा: कलौ यथा ॥

२३॥

जल-ओघै:--बाढ़ के पानी से; निरभिद्यन्त--टूटे हुए; सेतव:ः--बाँध; वर्षति--जब वृष्टि होती है; ईश्वेर--इन्द्र; पाषण्डिनाम्‌--नास्तिकों के; असत्‌-वादैः--झूठे सिद्धान्तों से; वेद-मार्गा:--वेदों के पथ; कलौ--कलियुग में; यथा--जिस तरह।

जब इन्द्र ने अपनी वर्षा छोड़ भेजी तो बाढ़ के पानी से खेतों में सिंचाई के बाँध उसी तरहटूट गये जिस तरह कलियुग में नास्तिकों के सिद्धान्तों से वैदिक आदेशों की सीमाएँ टूट जातीहैं।

व्यमुझ्न्वायुभिरनुन्ना भूतेभ्यश्चामृतं घना: ।

यथाशिषो विश्पतयः काले काले द्विजेरिता: ॥

२४॥

व्यमुझन्‌--मुक्त किया; वायुभि:--वायु के द्वारा; नुन्ना:--प्रेरित; भूतेभ्य: --सारे जीवों के लिए; च--तथा; अमृतम्‌--अमृततुल्य जल; घना:--बादल; यथा--जिस तरह; आशिष:--दातव्य आशीर्वाद; विटू-पतय:--राजा; काले काले--समय समयपर; द्विज--ब्राह्मणों द्वारा; ईरिता:-एन्चोउर

गेद्‌वायु द्वारा प्रेरित बादलों ने सारे जीवों के लाभ हेतु अपना अमृत तुल्य जल उसी तरह विमुक्तकिया जिस तरह राजागण अपने ब्राह्मण पुरोहितों के आदेशानुसार अपनी प्रजा में दान बाँटते हैं।

एवं बन तद्टर्षिष्टं पक्वखर्जुरजम्बुमत्‌ ।

गोगोपालैववतो रन्तुं सबल: प्राविशद्धरि: ॥

२५॥

एवम्‌--इस प्रकार; वनम्‌--जंगल में; तत्‌--उस; वर्षिष्ठम्‌--अतीव शोभायमान; पक्व--पके; खर्जुर--खजूर; जम्बु--तथाजामुन; मत्‌--से युक्त; गो--गौवों; गोपालैः --तथा ग्वालबालों द्वारा; वृत:ः--घिरे हुए; रन्तुमू--खेलने के उद्देश्य से; स-बलः--बलराम सहित; प्राविशत्‌-- प्रवेश किया; हरि:--कृष्ण ने |

जब वृन्दावन का जंगल पके खजूरों तथा जामुन के फलों से लद॒कर इस प्रकार शोभायमानथा, तो भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी गौवों तथा ग्वालबालों से घिरकर एवं श्रीबलराम के साथ उसवन में आनन्द मनाने के लिए प्रविष्ट हुए।

धेनवो मन्दगामिन्य ऊधोभारेण भूयसा ।

ययुर्भगवताहूता द्वुतं प्रीत्या स्नुतस्तना: ॥

२६॥

धेनव:--गौवें; मन्द-गामिन्य: --मन्द गति से चलनेवाली; ऊध: --अपने थनों के; भारेण -- भार से; भूयसा-- अत्यधिक;ययु:--गईं; भगवता-- भगवा न्‌ द्वारा; आहूता:--बुलाई जाने पर; द्रुतम्‌ू--शीघ्र; प्रीत्या--स्नेहवश; स्नुत--नम; स्तना:--स्तन,या चूचुक |

गौवों को अपने दूध से भरे थनों के भार के कारण मन्द गति से चलना पड़ा किन्तु ज्योंहीभगवान्‌ ने उन्हें बुलाया वे तुरन्त दौड़ पड़ीं और उनके प्रति स्नेह के कारण उनके स्तन गीले होगये।

वनौकस: प्रमुदिता वनराजीर्मधुच्युत: ।

जलधारा गिरे्नादादासन्ना दहशे गुहा: ॥

२७॥

वन-ओकसः --वनवासी कन्याएँ; प्रमुदिता:--हर्षित; वन-राजी:--जंगल के वृक्ष; मधु-च्युत:--मीठा रस टपकाते हुए; जल-धारा:--झरने; गिरे:--पर्वतों पर; नादातू--उनकी प्रतिध्वनि से; आसन्ना:--निकट ही; दहशे--देखा; गुहा:--गुफाएँ |

भगवान्‌ ने हर्षित वनवासी कन्याओं, मधुर रस टपकाते वृक्षों तथा पर्वतीय झरनों को देखाजिनकी प्रतिध्वनि से सूचित हो रहा था कि पास ही गुफाएँ हैं।

क्वचिद्वनस्पतिक्रोडे गुहायां चाभिवर्षति ।

निर्विश्य भगवात्रेमे कन्दमूलफलाशन: ॥

२८॥

क्वचित्‌--कभी कभी; वनस्पति--वृक्ष के; क्रोडे--कोटर में; गुहायाम्‌-- गुफा में; च--अथवा; अभिवर्षति--वर्षा होने पर;निर्विश्य--प्रवेश करके; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; रेमे--रमण किया; कन्द-मूल--कन्दमूल, जड़ें; फल--तथा फल; अशन:--खाकर।

जब वर्षा होती तो भगवान्‌ कभी किसी गुफा में, तो कभी वृक्ष के कोटर में घुस जाते जहाँवे खेलते तथा कन्दमूल और फल खाते।

दध्योदनं समानीतं शिलायां सलिलान्तिके ।

सम्भोजनीयैर्बु भुजे गोपै: सड्डूर्षणान्वित: ॥

२९॥

दध्ि-ओदनम्‌--दही के साथ मिला भात; समानीतम्‌-- भेजा हुआ; शीलायाम्‌--पत्थर की चट्टान पर; सलिल-अन्तिके--जलके निकट; सम्भोजनीयैः --अपने साथ भोजन करनेवाले; बुभुजे-- भोजन किया; गोपै:--ग्वालबालों के साथ; सड्डूर्षण-अन्वित:--बलराम समेत ।

भगवान्‌ कृष्ण श्रीबलराम तथा ग्वालबालों के साथ बैठकर घर से भेजे गये दही-भात कोभगवान्‌ संकर्षण और ग्वालबालों के साथ खाते जो सदैव उनके साथ ही भोजन किया करतेथे।

वे पानी के निकट के किसी विशाल शिला पर बैठकर भोजन करते।

शाद्वलोपरि संविश्य चर्वतो मीलितेक्षणान्‌ ।

तृप्तान्वृषान्वत्सतरान्गा श्व स्वोधोभरश्रमा: ॥

३०॥

प्रावृट्श्रियं च तां वीक्ष्य सर्वकालसुखावहाम्‌ ।

भगवान्पूजयां चक्रे आत्मशक्त्युपबृंहिताम्‌ ॥

३१॥

शाइ्वल--घास के मैदान के; उपरि--ऊपर; संविश्य--बैठकर; चर्वतः--चरती हुई; मीलित--बन्द; ईक्षणान्‌-- आँखों को;तृप्तानू--संतुष्ट; वृषान्‌ू--साँड़ों को; वत्सतरान्‌ू--बछड़ों को; गाः--गौवों को; च--और; स्व--अपने अपने; ऊध: --थनों के;भर--भार से; श्रमा:--थकी; प्रावृट्‌--वर्षा ऋतु का; थ्रियम्‌--ऐश्वर्य; च--तथा; ताम्‌--उसको; वीक्ष्य--देखकर; सर्व-काल--सदैव; सुख-- आनन्द; आवहामू--देते हुए; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; पूजयाम्‌ चक्रे --सम्मान किया; आत्म-शक्ति--अपनी अन्तरंगा शक्ति से; उपबृंहिताम्‌--विस्तार किया।

भगवान्‌ कृष्ण ने हरी घास पर बैठे और आँखें बन्द किये चरते हुए संतुष्ट साँड़ों, बछड़ों तथागौवों पर नजर डाली और देखा कि गौवें अपने दूध से भरे भारी थनों के भार से थक गई हैं।

इस तरह परम आनन्द के शाश्वत स्त्रोत वृन्दावन की वर्षा ऋतु के सौन्दर्य और ऐश्वर्य का निरीक्षणकरते हुए भगवान्‌ ने उस ऋतु को नमस्कार किया जो उन्हीं की अन्तरंगा शक्ति का विस्तार थी।

एवं निवसतोस्तस्मित्रामकेशवयोत्रजे ।

शरत्समभवद्व्यभ्रा स्वच्छाम्ब्वपरुषानिला ॥

३२॥

एवम्‌--इस प्रकार; निवसतो:--दोनों के रहते हुए; तस्मिन्‌ू--उस; राम-केशवयो: --राम तथा केशव के; ब्रजे--वृन्दावन में;शरत्‌--शरद ऋतु; समभवत्‌--पूरी तरह प्रकट हो आई; व्यभ्रा--बादलों से मुक्त आकाश; स्वच्छ-अम्बु--स्वच्छ जल वाले;अपरुष-अनिला--तथा मन्द वायु।

इस तरह जब भगवान्‌ राम तथा भगवान्‌ केशव वृन्दावन में रह रहे थे तो शरद ऋतु आ गईजिसमें आकाश बादलों से रहित, जल स्वच्छ तथा वायु मन्द हो जाती है।

शरदा नीरजोत्पत्त्या नीराणि प्रकृतिं ययु: ।

भ्रष्टानामिव चेतांसि पुनर्योगनिषेवया ॥

३३॥

शरदा--शरद ऋतु के प्रभाव से; नीरज--कमल के फूल; उत्पत्त्या--फिर से उत्पन्न करनेवाला; नीराणि--जल समूह;प्रकृतिमू-- अपनी प्राकृतिक अवस्था में ( स्वच्छ ); ययु:--हो गये; भ्रष्टानामू--पतितों के; इब--सद्ृश; चेतांसि--मन; पुनः --एक बार फिर; योग--भक्ति के; निषेवया-- अभ्यास से।

कमलपुष्पों को पुनः उत्पन्न करनेवाली शरद ऋतु ने विविध जलाशयों को पूर्ववत्‌ स्वच्छ( निर्मल ) बना दिया जिस तरह कि भक्तियोग पतित योगियों के मनों को पुनः इस ओर लौटनेपर शुद्ध बनाता है।

व्योम्नोउब्ध्चं भूतशाबल्यं भुवः पड्डमपां मलम्‌ ।

शरजहाराश्रमिणां कृष्णे भक्तियथाशुभम्‌ ॥

३४॥

व्योम्न:--आकाश में; अपू- भ्रमू-- बादल; भूत-- पशुओं की; शाबल्यम्‌--बहुलता; भुव: --पृथ्वी के; पड्डमू--कीचड़;अपाम्‌--जल का; मलमू्‌--मैल; शरत्‌--शरद ऋतु ने; जहार--हटा दिया; आश्रमिणाम्‌--मानव समाजके चारों आश्रमों केसदस्यों का; कृष्णे--कृष्ण में; भक्ति: -- भक्ति; यथा--जिस तरह; अशुभम्‌--सारे अशुभ को

शरद ऋतु ने आकाश से बादलों को हटा दिया, पशुओं को भीड़भाड़ भरी जगहों सेनिकाल लिया, पृथ्वी के कीचड़ को साफ कर दिया तथा जल के गँदलेपन को दूर कर दियाजिस तरह कि भगवान्‌ कृष्ण की प्रेमाभक्ति चारों आश्रमों के सदस्यों को उनकी अपनी अपनीव्याधियों से मुक्त कर देती है।

सर्वस्वं जलदा हित्वा विरेजु: शुभ्रवर्चस: ।

यथा त्यक्तैषणा: शान्ता मुनयो मुक्तकिल्बिषा: ॥

३५॥

सर्व-स्वम्‌--पास की हर वस्तु; जल-दाः--बादल; हित्वा--त्यागकर; विरेजु:--चमकने लगे; शुभ्र--शुद्ध; वर्चसः--अपनातेज; यथा--जिस प्रकार; त्यक्त-एषणा:--समस्त इच्छाओं का परित्याग करनेवाले; शान्ता:--शान्त; मुनयः--मुनिगण; मुक्त-किल्बिषा:--बुरी लालसाओं से मुक्त

बादल अपना सर्वस्व त्यागकर शुद्ध तेज से उसी तरह चमकने लगे जिस तरह शान्त मुनिगणअपनी समस्त भौतिक इच्छाएँ त्यागने पर पापपूर्ण लालसाओं से मुक्त हो जाते हैं।

गिरयो मुमुचुस्तोयं क्वचित्न मुमुचु: शिवम्‌ ।

यथा ज्ञानामृतं काले ज्ञानिनो ददते न वा ॥

३६॥

गिरयः--पर्वतों ने; मुमुचु:--मुक्त किया; तोयम्‌--अपना जल; क्वचित्‌--कभी कभी; न मुमुचु:--नहीं मुक्त किया; शिवम्‌--शुद्ध; यथा--जिस तरह; ज्ञान--दिव्य ज्ञान रूपी; अमृतम्‌--अमृत; काले--उपयुक्त समय पर; ज्ञानिन:--ज्ञानी लोग; ददते--प्रदान करते हैं; न वा--अथवा नहीं।

इस ऋतु में पर्वत कभी तो अपना शुद्ध जल मुक्त करते थे और कभी नहीं करते थे जिसतरह कि दिव्य विज्ञान में पटु लोग कभी तो दिव्य ज्ञान रूपी अमृत प्रदान करते हैं और कभीकभी नहीं करते।

नैवाविदन्क्षीयमाणं जलं गाधजलेचरा: ।

यथायुरन्वहं क्षय्यं नरा मूढा: कुटुम्बिन: ॥

३७॥

न--नहीं; एब--निस्सन्देह; अविदन्‌--जान पाये; क्षीयमाणम्‌--कम होते हुए; जलम्‌--जल को; गाध-जले--छिछले जल में;चरा:--गति करनेवाले; यथा--जिस तरह; आयु:--उनकी आयु; अनु-अहम्‌--प्रतिदिन; क्षय्यम्‌ू--घटती हुई; नराः:--लोग;मूढा:--मूर्ख; कुटुम्बिन:--परिवार के सदस्यों के साथ रहते हुए।

अत्यन्त छिछले जल में तैरनेवाली मछलियाँ यह नहीं जान पाई कि जल घट रहा है, जिसतरह कि परिवार के मूर्ख लोग यह नहीं देख पाते कि हर दिन के बीतने पर उनकी बाकी आयुकिस तरह क्षीण होती जा रही है।

गाधवारिचरास्तापमविन्दज्छरदर्कजम्‌ ।

यथा दरिद्र: कृपण: कुट॒म्ब्यविजितेन्द्रिय: ॥

३८॥

गाध-वारि-चरा:--छिछले जल में घूमनेवाली; तापम्‌--कष्ट; अविन्दन्‌--अनुभव किया; शरत्‌-अर्क-जम्‌--शरद ऋतु के सूर्यके कारण; यथा--जिस तरह; दरिद्र:--निर्धन व्यक्ति; कृपण:--कंजूस; कुटुम्बी--पारिवारिक जीवन में मग्न; अविजित-इन्द्रियः--इन्द्रियों पर संयम न करनेवाला |

जिस प्रकार कंजूस तथा निर्धन कुटुम्बी अपनी इन्द्रियों को वश में न रखने के कारण कष्टपाता है उसी तरह छिछले जल में तैरनेवाली मछलियों को शरदकालीन सूर्य का ताप सहनापड़ता है।

शनै: शनैर्जहु: पड्ढं स्थलान्यामं च वीरुध: ।

यथाहंममतां धीरा: शरीरादिष्वनात्मसु ॥

३९॥

शनैः: शनैः--धीरे धीरे; जहु:--त्याग दिया; पड्डमू--अपना कीचड़; स्थलानि--स्थल के स्थानों ने; आमम्‌--कच्ची अवस्था में;च--तथा; वीरुध:--पौधे; यथा--जिस तरह; अहम्‌-ममताम्‌--अहंभाव तथा ममता को; धीरा:--धीर मुनि; शरीर-आदिषु--भौतिक शरीर तथा अन्य बाह्य वस्तुओं पर केन्द्रित; अनात्मसु--आत्मा से सर्वथा पृथक्‌ |

धीरे धीरे स्थल के विभिन्न भागों ने अपनी कीचड़-युक्त अवस्था त्याग दी और पौधे अपनीकच्ची अवस्था से आगे बढ़ गये।

यह उसी तरह हुआ जिस तरह कि धीर मुनि अपना अहंभावतथा ममता त्याग देते हैं।

ये वास्तविक आत्मा--अर्थात्‌ भौतिक शरीर तथा इसके उत्पादों सेसर्वथा भिन्न वस्तुओं-पर आधूृत होते हैं।

निश्चलाम्बुरभूत्तृष्णीं समुद्र: शरदागमे ।

आत्मन्युपरते सम्यड्मुनिर्व्युपरतागम: ॥

४०॥

निश्चल--जड़; अम्बु:--जल; अभूत्‌--हो गया; तृष्नीम्‌--शान्त; समुद्र: --समुद्र; शरत्‌--शरद ऋतु के; आगमे-- आगमन से;आत्मनि--जब आत्मा; उपरते-- भौतिक कार्यों से विरक्त; सम्यक्‌--पूरी तरह; मुनिः--मुनि; व्युपरत--त्यागकर; आगम:--वैदिक मंत्रों का पाठ

शरद ऋतु के आते ही समुद्र तथा सरोवर शान्त हो गये, उनका जल उस मुनि की तरह शान्तहो गया जो सारे भौतिक कार्यो से विरत हो गया हो और जिसने वैदिक मंत्रों का पाठ बन्द करदिया हो।

केदारेभ्यस्त्वपोगृहन्कर्षका दृढसेतुभि: ।

यथा प्राणैः स्त्रवज्ज्ञानं तन्निरोधेन योगिन: ॥

४१॥

केदारेभ्य:--जलभरे धान के खेतों से; तु--तथा; अप:--जल; अगृहन्‌--ले लिया; कर्षका:--कृषकों ने; हढ--मजबूत;सेतुभि:--बाँधों से; यथा--जिस तरह; प्राणैः--इन्द्रियों से; सत्रवत्‌--बहती हुई; ज्ञानमू--चेतना को; तत्‌ू--उन इन्द्रियों के;निरोधेन--संयम से; योगिन:--योगीगण |

जिस तरह योग का अभ्यास करनेवाले अपनी चेतना को क्षुब्ध इन्द्रियों द्वारा बाहर निकलनेसे रोकने के लिए अपनी इन्द्रियों को कठोर नियंत्रण में रखते हैं उसी तरह किसानों ने अपने धानके खेतों से जल को बहकर बाहर न जाने देने के लिए मजबूत मेंड़ें उठा दीं।

शरदर्काशुजांस्तापान्भूतानामुडुपोहरत्‌ ।

देहाभिमानजं बोधो मुकुन्दो त्रजयोषिताम्‌ ॥

४२॥

शरत्‌-अर्क--शरदकालीन सूर्य की; अंशु--किरणों से; जान्‌--उत्पन्न; तापानू--कष्ट; भूतानाम्‌ू--सारे जीवों का; उड्डुप:--चन्द्रमा ने; अहरत्‌--हर लिया है; देह--शरीर के साथ; अभिमान-जम्‌--मिथ्या पहचान पर आधारित; बोध:--ज्ञान; मुकुन्दः--भगवान्‌ कृष्ण ने; ब्रज-योषिताम्‌ू--वृन्दावन की स्त्रियों के |

शरदकालीन चन्द्रमा ने सूर्य की किरणों से उत्पन्न कष्ट से सभी जीवों को छुटकारा दिलादिया जिस प्रकार कि मनुष्य का ज्ञान उसे अपने भौतिक शरीर से अपनी पहचान करने से उत्पन्नहोनेवाले दुख से छुटकारा दिला देता है और जिस तरह भगवान्‌ मुकुन्द वृन्दावन की स्त्रियों कोउनके वियोग से उत्पन्न कष्ट से छुटकारा दिला देते हैं।

खमशोभत निर्मेघं शरद्विमलतारकम्‌ ।

सत्त्वयुक्ते यथा चित्तं शब्दब्रह्मार्थदर्शनम्‌ ॥

४३ ॥

खम्‌--आकाश; अशोभत--चमकने लगा; निर्मेघम्‌--बादलों से रहित; शरत्‌--शरद ऋतु में; विमल--स्वच्छ; तारकम्‌--तथातारों से युक्त; सत्तव-युक्तम्‌--सात्विक अच्छाई से प्रदत्त; यथा--जिस तरह; चित्तम्‌--चित्त को; शब्द-ब्रह्य--वैदिक शास्त्र का;अर्थ--तात्पर्य; दर्शनम्‌-प्रत्यक्ष अनुभव किया जानेवाला |

बादलों से रहित तथा साफ दिखते तारों से भरा हुआ शरदकालीन आकाश उसी तरहचमकने लगा, जिस प्रकार वैदिक शास्त्रों के तात्पर्य का प्रत्यक्ष अनुभव करनेवाले कीआध्यात्मिक चेतना करती है।

अखण्डमण्डलो व्योम्नि रराजोडुगणै: शशी ।

यथा यदुपतिः कृष्णो वृष्णिचक्रावृतो भुवि ॥

४४॥

अखण्ड--अटूट; मण्डल:--गोला; व्योम्नि--आकाश में; रराज--चमकने लगा; उडु-गणै:--तारों के साथ; शशी--चन्द्रमा;यथा--जिस तरह; यदु-पति:--यदुवंश के स्वामी; कृष्ण: --कृष्ण; वृष्णि-चक्र --वृष्णियों के घेरे से; आवृत:--घिरे; भुवि--पृथ्वी पर

पूर्ण चन्द्रमा तारों से घिकर आकाश में उसी तरह चमकने लगा, जिस तरह यदुवंश केस्वामी श्रीकृष्ण समस्त वृष्णियों से घिरकर पृथ्वी पर सुशोभित हो उठे।

आए्लिष्य समशीतोष्णं प्रसूनवनमारुतम्‌ ।

जनास्तापं जहुर्गोप्यो न कृष्णहतचेतस: ॥

४५॥

आएलिष्य--आलिंगन करके; सम--समान; शीत-उष्णम्‌--सर्द तथा गर्म के बीच; प्रसून-वन-- पुष्पजन की; मारुतम्‌ू--वायु;जनाः--आम जनता; तापम्‌--कष्ट; जहु:--छोड़ सके; गोप्य: --गोपियाँ; न--नहीं; कृष्ण--कृष्ण द्वारा; हृत--चुराये गये;चेतस:--हृदय वाली ।

गोपियों के हृदय कृष्ण द्वारा हर लिये गये थे अतः उनके अतिरिक्त सारे लोग पुष्पों से लदेवन से आनेवाली वायु का आलिंगन करके अपने अपने कष्ट भूल गये।

यह वायु न तो गर्म थी,न सर्द।

गावो मृगा: खगा नार्य: पुष्पिण्य: शरदाभवन्‌ ।

अन्वीयमाना: स्ववृषै: फलैरीशक्रिया इव ॥

४६॥

गाव:ः--गौवें; मृगा: --मृगियाँ; खगा: --चिड़ियाँ; नार्य:--स्त्रियाँ; पुष्पिण्य:-- अपने अपने रजोकाल में; शरदा--शरद केकारण; अभवनू--हो गईं; अन्बीयमाना:--पीछा की गईं; स्व-वृषैः--अपने अपने संगियों द्वारा; फलैः--उत्तम परिणामों से;ईश-क्रिया:--भगवान्‌ की सेवा में सम्पन्न कार्य; इब--सहश

शरद ऋतु के प्रभाव से सारी गौवें, मृगियाँ, स्त्रियाँ तथा चिड़ियाँ ऋतुमती हो गईं और मैथुनसुख की खोज में उनके अपने-अपने जोड़े उनका पीछा करने लगे जिस प्रकार भगवान्‌ की सेवामें किये गये कार्य स्वतः सभी प्रकार के लाभप्रद फल देते हैं।

उदहृष्यन्वारिजानि सूर्योत्थाने कुमुद्धिना ।

राज्ञा तु निर्भया लोका यथा दस्यून्विना नृप ॥

४७॥

उदहृष्यन्‌--प्रचुर मात्रा में फूल उठे; वारि-जानि--कमल ; सूर्य--सूर्य; उत्थाने--उग आने पर; कुमुत्‌--कुमुदिनी, जो रात में'फूलती है; विना--के अतिरिक्त; राज्ञा--राजा की उपस्थिति में; तु--निस्सन्देह; निर्भया:--निडर; लोका:-- जनता; यथा--जिस तरह; दस्यून्‌ू--चोरों के; विना--अतिरिक्त; नृप--हे राजा

हे राजा परीक्षित, जब शरदकालीन सूर्य उदित हुआ तो रात में फूलनेवाली कुमुदिनी केअतिरिक्त सारे कमल के फूल प्रसन्नतापूर्वक खिल गये जिस तरह कि सशक्त शासक कीउपस्थिति में चोरों के अतिरिक्त सारे लोग निर्भय रहते हैं।

पुरग्रामेष्वाग्रयणैरिन्द्रियैश्न महोत्सव: ।

बभौ भू: पक्‍्वशष्याद्या कलाभ्यां नितरां हरे: ॥

४८॥

पुर--नगरों; ग्रामेषु--तथा ग्रामों में; आग्रयणैः--नवान्न ग्रहण करने के लिए वैदिक यज्ञ सम्पन्न करके; इन्द्रियः --अन्य( सांसारिक ) समारोहों द्वारा; च--तथा; महा-उत्सवै:--बड़े बड़े उत्सवों द्वारा; बभौ--सुशोभित हो उठी; भू:--पृथ्वी; पक्‍्व--पका; शष्य--अन्न से; आढ्या--समृद्ध; कला-- भगवान्‌ की अंश रूप; आभ्याम्‌--उन दोनों ( कृष्ण तथा बलराम ) के साथ;नितराम्‌--अत्यधिक; हरे: -- भगवान्‌ का

सभी नगरों तथा ग्रामों में लोगों ने नई फसल के नवातन्न का स्वागत और आस्वादन करने केलिए वैदिक अग्नि-यज्ञ करके तथा स्थानीय प्रथा एवं परम्परा का अनुसरण करते हुए अन्य ऐसेही समारोहों सहित बड़े-बड़े उत्सव मनाए।

इस तरह नवान्न से समृद्ध एवं कृष्ण तथा बलराम कीउपस्थिति के कारण विशेषतया सुन्दर दिखने वाली पृथ्वी भगवान्‌ के अंश रूप में सुशोभित होड्ठी।

वणिड्‌्मुनिनृपस्नाता निर्गम्यार्थान्प्रपेदिरे ।

वर्षरुद्धा यथा सिद्धा: स्वपिण्डान्काल आगते ॥

४९॥

वणिक्‌ --व्यापारीगण; मुनि--विरक्त साधुगण; नृप--राजा; स्नाता:--तथा ब्राह्मण विद्यार्थी; निर्गम्य--बाहर जाकर;अर्थान्‌ू--अपनी इच्छित वस्तुएँ; प्रपेदिरि--प्राप्त किया; वर्ष--वर्षा द्वारा; रुद्धा:--अवरुद्ध; यथा--जिस तरह; सिद्धा:--सिद्धपुरुष; स्व-पिण्डान्‌--इच्छित स्वरूपों को; काले--समय के; आगते--आने पर |

व्यापारी, मुनिजन, राजा तथा ब्रह्मचारी विद्यार्थी, जो वर्षा के कारण जहाँ तहाँ अटके पड़े थेअब बाहर जाने और अपने अभीष्ट पदार्थ प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र थे जिस तरह इसी जीवन मेंसिद्धि प्राप्त व्यक्ति उपयुक्त समय आने पर भौतिक शरीर त्यागकर अपने अपने स्वरूप प्राप्तकरते हैं।

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