← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय तैंतीसवाँ: रास नृत्य

10.33श्रीशुक उबाच इत्थं भगवतो गोप्य: श्रुत्वा वाच: सुपेशला: ।

जहुर्विरहजंतापं तदड्रोपचिताशिष: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्‌--इस प्रकार; भगवत:--भगवान्‌ के; गोप्य: --गोपियाँ; श्रुत्वा--सुनकर; वाच:--शब्द; सु-पेशला:--अत्यन्त मनोहारी; जहु: --त्याग दिया; विरह-जम्‌--विछोह भावों से उत्पन्न; तापम्‌--क्लेश; तत्‌--उसके; अड्गभ--अंगों के ( स्पर्श ) से; उपचित--पूर्ण हो गयी; आशिष:--इच्छाएँ |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब गोपियों ने भगवान्‌ को अत्यन्त मनोहारी इन शब्दों में कहते सुना तो वे उनके विछोह से उत्पन्न अपना दुख भूल गईं।

उनके दिव्य अंगों का स्पर्श पाकर उन्हेंलगा कि उनकी सारी इच्छाएँ पूर्ण हो गईं।

तत्रारभत गोविन्दो रासक्रीडामनुव्रतैः ।

स्त्रीरत्लैरन्वितः प्रीतैरन्योन्याबद्धबाहुभि: ॥

२॥

तत्र--वहाँ; आरभत--प्रारम्भ किया; गोविन्दः-- भगवान्‌ कृष्ण ने; रास-क्रीडाम्‌--रास नृत्य की लीला; अनुक्रतैः-- श्रद्धायुक्त( गोपियों ); स्त्री --स्त्रियों के; रत्नैः--रत्नों के साथ; अन्वित:--जुड़ी हुई; प्रीते:--सन्तुष्ट; अन्योन्य--एक दूसरे से; आबद्ध--बाँध कर; बाहुभि:--अपनी बाँहों से |

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ गोविन्द ने वहीं यमुना के तट पर उन स्त्री-रल श्रद्धालु गोपियों के संग मेंरासनृत्य लीला प्रारंभ की जिन्होंने प्रसन्नता के मारे अपनी बाँहों को एक दूसरे के साथश्रृंखलाबद्ध कर दिया।

रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपीमण्डलमण्डितः ।

योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोटटयो: ॥

प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्वनिकर्टं स्त्रिय: ।

यं मन्येरन्नभस्तावद्विमानशतसड्जू लम्‌ ।

दिवौकसां सदाराणामौत्सुक्यापहतात्मनाम्‌ ॥

३॥

रास--रासनृत्य का; उत्सव: --उत्सव; सम्प्रवृत्त:--प्रारम्भ हुआ; गोपी-मण्डल--गोपियों के घेरे से; मण्डित: --सज्जित; योग--योगशक्ति के; ईश्वरण --परम नियन्ता; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; तासाम्‌ू--उनके; मध्ये--बीच में; द्वयो: द्वयो:--प्रत्येक जोड़े केबीच; प्रविष्टेन--उपस्थित; गृहीटानाम्‌ू--पकड़े हुए; कण्ठे--गर्दन से; स्व-निकटम्‌--अपने पास; स्त्रिय:--स्त्रियाँ; यम्‌ू--जिसको; मन्येरन्‌ू--माना; नभः--आकाश में; तावत्‌--उसी समय; विमान--वायुयानों की; शत--सैकड़ों; सड्डु लम्‌--भीड़लग गई; दिव--स्वर्गलोकों के; ओकसाम्‌--निवासियों के; स--सहित; दाराणाम्‌--अपनी अपनी पत्नियों के; औत्सुक्य--उत्सुकतापूर्वक; अपहृत--ले जाये गये; आत्मनाम्‌--उनके मन

तब उल्लासपूर्ण रासनृत्य प्रारम्भ हुआ जिसमें गोपियाँ एक गोलाकार घेरे में सध गईं।

भगवान्‌ कृष्ण ने अपना विस्तार किया और गोपियों के प्रत्येक जोड़े के बीच-बीच प्रविष्ट होगये।

ज्योंही योगेश्वर ने अपनी भुजाओं को उनके गलों के चारों ओर रखा तो प्रत्येक युवती नेसोचा कि वे केवल उसके ही पास खड़े हैं।

इस रासनृत्य को देखने के लिए देवता तथा उनकीपत्नियाँ उत्सुकता से गद्गद हुये जा रहे थे।

शीघ्र ही आकाश में उनके सैकड़ों विमानों की भीड़लग गई।

ततो दुन्दुभयो नेदुर्निपेतु: पुष्पवृष्टय: ।

जगुर्गन्धर्वपतयः सस्न्रीकास्तद्यशो उमलम्‌ ॥

४॥

ततः--तब; दुन्दुभयः--दुन्दुभियाँ; नेदुः--बजने लगीं; निपेतु:--नीचे गिरी; पुष्प--फूल की; वृष्टय:--वर्षा; जगु:ः--गाया;गन्धर्व-पतय:--मुख्य गन्धर्वों ने; स-स्त्रीका:--अपनी पत्नियों समेत; तत्‌--उस भगवान्‌ कृष्ण की; यश:ः--महिमा; अमलमू--निष्कलंक, निर्मल।

तब आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं और फूलों की वर्षा होने लगी।

मुख्य गन्धर्वों ने अपनीपत्नियों के साथ भगवान्‌ कृष्ण के निर्मल यश का गायन किया।

वलयानां नूपुराणां किड्लिणीनां च योषिताम्‌ ।

सप्रियाणामभूच्छब्दस्तुमुलो रासमण्डले ॥

५॥

वलयानामू्‌--कंगनों के; नूपुराणाम्‌ू--पायलों के; किल्लिणीनाम्‌--करधनियों के घुंघरूओं से; च--तथा; योषिताम्‌--स्त्रियों के;स-प्रियाणाम्‌ू--अपने प्रियतम के साथ; अभूत्‌--हुई; शब्द: --ध्वनि; तुमुलः --जोर की; रास-मण्डले--रासनृत्य के घेरे में |

जब गोपियाँ रासनृत्य के मण्डल में अपने प्रियतम कृष्ण के साथ नृत्य करने लगीं तो उनकेकंगनों, पायलों तथा करधनी के घुंघरुओं से तुमुल ध्वनि उठती थी।

तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान्देवकीसुतः ।

मध्ये मणीनां हैमानां महामरकतो यथा ॥

६॥

तत्र--वहाँ; अतिशुशुभे-- अत्यन्त शोभायमान लगे; ताभि:--उनके साथ; भगवान्‌-- भगवान्‌; देवकी-सुतः--देवकीपुत्र,कृष्ण; मध्ये--बीच में; मणीनाम्‌--आभूषणों के; हैमानाम्‌--सोने के; महा--महान; मरकत:ः--मरकत; यथा--जिस तरह ।

नृत्य करती गोपियों के बीच भगवान्‌ कृष्ण अत्यन्त शोभायमान प्रतीत हो रहे थे जिस तरहसोने के आभूषणों के बीच मरकत मणि शोभा पाता है।

पादन्यासैर्भुजविधुतिभिः सस्मितैर्थूविलासै-भ॑ज्यन्मध्यैश्वलकुचपटै: कुण्डलैर्गण्डलोलै: ।

स्विद्यन्मुख्यः कवररसनाग्रन्थयः कृष्णवध्वोगायन्त्यस्तं तडित इब ता मेघचक्रे विरिजु: ॥

७॥

पाद--पाँवों के; न्‍्यासैः--पड़ने से; भुज--हाथों के; विधुतिभि: --इशारों से; स-स्मितैः--हँसते हुए; भ्रू-- भौंहों की;विलासै:--क्रौड़ापूर्ण गतियों से; भज्यन्‌--झुकते लचकते हुए; मध्यै:ः--बीच से; चल--चलायमान; कुच--स्तनों को ढकनेवाले; पटै:--वस्त्रों से; कुण्डलैः--कान की बालियों से; गण्ड--गालों पर; लोलैः--हिलते डुलते; स्विद्यू--पसीना आताहुआ; मुख्य:--मुखोंवाली; कवर-- जूड़ा; रसना--तथा करधनी; आग्रन्थय:--मजबूती से बँधी; कृष्ण-वध्व: -- भगवान्‌ कृष्णकी बधुएँ; गायन्त्य:--गाती हुईं; तम्‌ू--उसके विषय में; तडित:--बिजली; इब--सहश; ता:ः--वे; मेघ-चक्रे --बादलों कीश्रेणी में; विरिजु:--चमकने लगीं ॥

जब गोपियों ने कृष्ण की प्रशंसा में गीत गाया, तो उनके पाँवों ने नृत्य किया, उनके हाथों नेइशारे किये और उनकी भौंहें हँसी से युक्त होकर मटकने लगीं।

जिनकी वेणियाँ तथा कमर कीपेटियाँ मजबूत बँधी हुई थीं, जिनकी कमरें लचकती हुई थी, जिनके मुखों पर पसीने की बूँदेझलकती थीं, जिनके स्तनों को ढके हुए वस्त्र इधर उधर हिलते थे तथा जिनके कानों की बालियाँ गालों पर हिल-डुल रही थीं, कृष्ण की ऐसी तरुणी प्रियाएँ बादल के समूह में बिजलीकी कौंध की तरह चमक रही थीं।

उच्चैर्जगुर्नृत्यमाना रक्तकण्ठ्यो रतिप्रिया: ।

कृष्णाभिमर्शमुदिता यद्‌्गीतेनेदमावृतम्‌ ॥

८ ॥

उच्चै:--जोर जोर से; जगुः--गाया; नृत्यमाना:--नाच करते हुए; रक्त--रंगीन; कण्ठद्य:--उनके गले; रति--प्रणय ( माधुर्यआनन्द ); प्रिया:--समर्पित; कृष्ण-अभिमर्श--कृष्ण के स्पर्श से; मुदिता:--हर्षित; यत्‌ू--जिनके; गीतेन--गाने से; इृदम्‌--यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड; आवृतम्‌-याप्त है।

विविध रंगों से रँंगे कंठों वाली, माधुर्यप्रेम का आनन्द लूटने की इच्छुक गोपियों ने जोर जोरसे गाना गाया और नृत्य किया।

वे कृष्ण का स्पर्श पाकर अति-आनन्दित थीं और उन्होंने जोगीत गाये उनसे सारा ब्रह्माण्ड भर गया।

काचित्समं मुकुन्देन स्वरजातीरमिश्रिता: ।

उच्निन्ये पूजिता तेन प्रीयता साधु साध्विति ।

तदेव श्रुवमुन्निन्ये तस्यै मान च बह्ददात्‌ ॥

९॥

काचित्‌--कोई कोई; समम्‌--साथ; मुकुन्देन--कृष्ण के; स्वर-जाती:--शुद्ध संगीतमय स्वर; अमिश्रिता:--कृष्ण द्वारानिकाली गई ध्वनि से न मिला हुआ; उच्िन्ये--अलापा, छेड़ा; पूजिता--सम्मानित; तेन--उसके द्वारा; प्रीयता--प्रसन्न; साधुसाधु इति--' बहुत अच्छा, बहुत अच्छा कहते हुए; तत्‌ एब--वही ( राग ); ध्रुवम्‌--श्लुपद सहित; उन्निन्ये--अलापा ( अन्यगोपी ने ); तस्यै--उसको; मानमू--विशेष आदर; च--तथा; बहु--अधिक; अदातू-- प्रदान किया

एक गोपी ने भगवान्‌ मुकुन्द के गाने के साथ साथ शुद्ध मधुर राग गाया जो कृष्ण के स्वरसे भी उच्च सुर ऊँचे स्वर में था।

इससे कृष्ण प्रसन्न हुए और 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा'कहकर उसकी प्रशंसा की।

तत्पश्चात्‌ एक दूसरी गोपी ने वही राग अलापा किन्तु वह श्रुपद केविशेष छंद में था।

कृष्ण ने उसकी भी प्रशंसा की।

काचिद्रासपरिश्रान्ता पार्श्रृस्थस्य गदाभूतः ।

जग्राह बाहुना स्कन्धं एलथद्ठलयमल्लिका ॥

१०॥

काचित्‌--कोई गोपी; रास--रासनृत्य से; परिश्रान्ता-- थकी हुई; पार्श्व--बगल में; स्थस्य--खड़े हुए; गदा-भूतः --गदाधारीभगवान्‌ कृष्ण के; जग्राह--पकड़ लिया; बाहुना--अपनी बाँह से; स्कन्धम्‌--कन्धे को; एलथत्‌--ढीला करते हुए; वलय--अपने कंगन; मल्लिका--तथा ( बालों में गुँथे ) फूल |

जब एक गोपी रासनृत्य से थक गई तो वह अपनी बगल में खड़े गदाधर कृष्ण की ओर मुड़ीऔर उसने अपनी बाँह से उनके कन्धे को पकड़ लिया।

नाचने से उसके कँगन तथा बालों में लगे'फूल ढीले पड़ गये थे।

तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पलसौरभम्‌ ।

चन्दनालिप्तमाप्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह ॥

११॥

तत्र--वहाँ; एका--एक ( गोपी ); अंस--अपने कन्धे पर; गतमू--रखी हुईं; बाहुमू--बाँह को; कृष्णस्य--कृष्ण की;उत्पल--नीले कमल सहश; सौरभम्‌--जिसकी सुगन्ध; चन्दन--चन्दन लेप से; आलिप्तम्‌--लेप की हुई; आघ्राय--महकतीहुई; हृष्ट--खड़े हुए; रोमा--शरीर के रोएँ; चुचुम्ब ह--उसने चूम लिया

कृष्ण ने अपनी बाँह एक गोपी के कन्धे पर रख दी जिसमें से प्राकृतिक नीले कमल कीसुगन्ध के साथ उसमें लेपित चन्दन की मिली हुईं सुगन्‍्ध आ रही थी।

ज्योंही गोपी ने उस सुगन्धका आस्वादन किया त्योंही हर्ष से उसे रोमांच हो उठा और उसने उनकी बाँह को चूम लिया।

कस्य॒श्िन्नाट्यविशक्षिप्त कुण्डलत्विषमण्डितम्‌ ।

गण्डं गण्डे सन्दधत्या: प्रादात्ताम्बूलचर्वितम्‌ ॥

१२॥

कस्याश्चित्‌ू--किसी एक गोपी; नाट्य--नाचने से; विक्षिप्त--हिलता हुआ; कुण्डल--कान की बालियाँ; त्विष--चमक से;मण्डितमू--सुशोभित; गण्डम्‌--अपने कपोल; गण्डे--कृष्ण के गाल के निकट; सन्दधत्या: --रखती हुई; प्रादात्‌--सावधानीपूर्वक दे दिया; ताम्बूल--पान; चर्वितमू--चबाया हुआ |

एक गोपी ने कृष्ण के गाल पर अपना गाल रख दिया जो उसके कुंडलों से सुशोभित थाऔर उसके नाचते समय चमचमा रहा था।

तब कृष्ण ने बड़ी ही सावधानी से उसे अपना चबायापान दे दिया।

नृत्यती गायती काचित्कूजन्रूपुरमेखला ।

पार्श्रस्थाच्युतहस्ताब्जं श्रान्ताधात्स्तनयो: शिवम्‌ ॥

१३॥

नृत्यती--नाचती; गायती--गाती; काचित्‌--कोई गोपी; कूजन्‌--झनकार करते; नूपुर--घुंघरू की; मेखला--तथा अपनी'करधनी; पार्श्व-स्थ--उसके पास में ही खड़े; अच्युत-- भगवान्‌ कृष्ण का; हस्त-अब्जम्‌ू--करकमल; श्रान्ता--थककर;अधात्‌--रख लिया; स्तनयो:--अपने स्तनों पर; शिवम्‌--सुखद |

एक अन्य नाचती तथा गाती हुई गोपी, जिसके पाँवों के नूपुए और कमर की करधनी केघुंघरू बज रहे थे, थक गई अतः उसने अपने पास ही खड़े भगवान्‌ अच्युत के सुखद करकमलको अपने स्तनों के ऊपर रख लिया।

गोप्यो लब्ध्वाच्युतं कान्तं भ्रिय एकान्तवललभम्‌ ।

गृहीतकण्ठ्यस्तद्दो भ्या गायन्त्यस्तम्विजहिरे ॥

१४॥

गोप्य:--गोपियाँ; लब्ध्वा--पाकर; अच्युतम्‌--अच्युत भगवान्‌ को; कान्तम्‌ू--अपने प्रेमी के रूप में; भ्रिय:--लक्ष्मी के;एकान्त--एकमात्र; बल्‍लभमू-प्रेमी को; गृहीत--पकड़े हुए; कण्ठ्य:--उनके गलों को; तत्‌--उसका; दोर्भ्याम्‌-- भुजाओंसे; गायन्त्य:--गाती हुईं; तम--उसको; विजहिरे-- आनन्द लूटा |

लक्ष्मी जी के विशिष्टप्रिय भगवान्‌ अच्युत को अपने घनिष्ठ प्रेमी के रूप में पाकर गोपियों नेअथाह आनन्द लूटा।

वे उनको अपनी भुजाओं में लपेटे थे और ये उनके यश का गान कर रहीथीं।

कर्णोत्पलालकविटड्डूकपोलघर्म -वक्त्रश्रियो वलयनूपुरघोषवाद्यै: ।

गोप्य: सम॑ भगवता ननृतुः स्वकेश-सत्रस्तसत्रजो भ्रमरगायकरासगोष्ठद्याम्‌ ॥

१५॥

कर्ण--उनके कानों में; उत्पल--कमल के फूल से; अलक--उनकी लटों से; वितड्ड--अलंकृत; कपोल--उनके गाल; घर्म--पसीने से; वक्‍त्र--उनके मुखों के; भ्रिय:--सौन्दर्य; वलय--कंगन; नूपुर--तथा घुंघरू के; घोष--शब्द का; वाद्यै:--बाजे से;गोप्य:--गोपियों ने; समम्‌--साथ; भगवता-- भगवान्‌ के; ननृतु:--नाचा; स्व--अपने लिए; केश--बाल से; स्त्रस्त--बिखरी;सत्रज:--मालाएँ; भ्रमर-- भौरे; गायक--गानेवाले; रास--रास नृत्य की; गोष्ठय्याम्‌-गोष्टी में |

कानों के पीछे लगे कमल के फूल, गालों को अलंकृत कर रही बालों की लटें तथा पसीनेकी बूँदें गोपियों के मुखों की शोभा बढ़ा रही थीं।

उनके बाजुबंदों तथा घुंघरओं की रुनझुन सेजोर की संगीतात्मक ध्वनि उत्पन्न हो रही थी और उनके जूड़े बिखरे हुए थे।

इस तरह गोपियाँभगवान्‌ के साथ रासनृत्य के स्थल पर नाचने लगीं और उनका साथ देते हुए भौंरों के झुंडगुनगुनाने लगे।

एवं परिष्वड्रकराभिमर्श-स्निग्धेक्षणोद्ामविलासहासै: ।

रेमे रमेशो ब्रजसुन्दरीभि-्ंथार्भकः स्वप्रतिबिम्बविभ्रम: ॥

१६॥

एवम्‌--इस तरह; परिष्वड्र--- आलिंगन करते हुए; कर--अपने हाथ से; अभिमर्श--स्पर्श करते हुए; स्निग्ध--स्नेहिल;ईक्षण--चितवनों से; उद्याम--तिरछी, चौड़ी; विलास--चंचल; हासैः--हँसी से युक्त; रेमे-- आनन्द लूटा; रमा--लक्ष्मी जी के;ईशः--स्वामी ने; ब्रज-सुन्दरीभि:--ग्वालजाति की तरुणियों के साथ; यथा--जिस तरह; अर्भक:--एक बालक; स्व--अपनी; प्रतिबिम्ब--परछाई से; विभ्रम:--खेलवाड़

इस प्रकार आदि भगवान्‌ नारायण, लक्ष्मीपति भगवान्‌ कृष्ण ने ब्रज की युवतियों काआलिंगन करके, उन्हें दुलार करके तथा अपनी तिरछी चंचल हँसी से उन्हें प्रेमपूर्वक निहारकरके उनके साथ में आनन्द लूटा।

यह वैसा ही था जैसे कि कोई बालक अपनी परछाईं के साथखेल रहा हो।

तदड़सड्डप्रमुदाकुलेन्द्रिया:केशान्दुकूलं कुचपट्टिकां वा ।

ना: प्रतिव्योदुमलं ब्रजस्त्रियोविस्त्रस्तमालाभरणा: कुरूद्बद ॥

१७॥

तत्‌--उनके साथ; अड्ग-सड्ग--शारीरिक स्पर्श से; प्रमुदा--हर्ष से; आकुल--व्याकुल; इन्द्रिया:--जिनकी इन्द्रियाँ; केशान्‌--उनके बाल; दुकूलम्‌--वस्त्र; कुच-पट्टिकाम्‌--स्तनों को ढकने वाले वस्त्र, चोलियाँ; वा--अथवा; न--नहीं; अज्ञ:--आसानीसे; प्रतिव्योढुमू--सुसज्जित रखने के लिए; अलमू--समर्थ; ब्रज-स्त्रिय:--व्रज की स्त्रियाँ; विस्त्रस्त--बिखरी हुई; माला--फूलोंकी मालाएँ; आभरणा:--तथा गहने; कुरु-उद्दद--हे कुरुवंश के परम विख्यात सदस्य |

उनका शारीरिक संसर्ग पा लेने से गोपियों की इन्द्रियाँ हर्ष से अभिभूत हो गईं जिसकेकारण वे अपने बाल, अपने वस्त्र तथा स्तनों के आवरणों को अस्तव्यस्त होने से रोक न सकीं।

हे कुरुवंश के वीर, उनकी मालाएँ तथा उनके गहने बिखर गये।

कृष्णविक्रीडितं वीक्ष्य मुमुहु: खेचरस्त्रिय: ।

कामार्दिता: शशाड्डश्च सगणो विस्मितोभवत्‌ ॥

१८॥

कृष्ण-विक्रीडितम्‌ू--कृष्ण की क्रीड़ा; वीक्ष्य--देखकर; मुमुहुः--मोहित हो गईं; खे-चर--आकाश में यात्रा करतीं; स्त्रिय:--स्त्रियाँ ( देवियाँ )।

काम--काम वासना से; अर्दिता:--चलायमान; शशाड्रः--चन्धमा; च-- भी; स-गण: --अपने अनुचर तारोंसहित; विस्मित:--चकित; अभवत्‌--हुआ।

देवताओं की पत्लियाँ अपने विमानों से कृष्ण की क्रीड़ाएँ देखकर सम्मोहित हो गईं औरकामवासना से विचलित हो उठीं।

वस्तुतः चन्द्रमा तक भी अपने पार्षद तारों समेत चकित होउठा।

कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः ।

रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोईपि लीलया ॥

१९॥

कृत्वा--करके, बनाकर; तावन्तम्‌--उतने गुना बढ़ाकर; आत्मानम्‌ू--अपने को; यावती:--जितनी; गोप-योषित: --गोपस्त्रियाँ; रेमे--विलास किया; सः--उस; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; ताभि:--उनके साथ; आत्म-आराम:--आत्म-तुष्ट; अपि--यद्यपि; लीलया--लीला के रूप में |

वहाँ पर जितनी गोपिकाएँ थीं उतने ही रूपों में विस्तार करके, भगवान्‌ ने खेल खेल मेंउनकी संगति का आनन्द लूटा यद्यपि वे आत्माराम हैं।

तासां रतिविहारेण श्रान्तानां वबदनानि सः ।

प्रामृजत्करूण: प्रेम्णा शन्तमेनाड़ पाणिना ॥

२०॥

तासाम्‌--उन गोपियों के; रति--माधुर्य प्रेम के; विहारेण-- भोग विलास के द्वारा; श्रान्तानामू-- थकी हुईं; वदनानि--मुख;सः--उसने; प्रामुजत्‌--पोंछा; करुण:--दयालु; प्रेम्णा--प्रेमपूर्वक; शन्तमेन-- अत्यन्त सुखद; अड्र--हे प्रिय ( राजापरीक्षित ); पाणिना-- अपने हाथ से

यह देखकर कि गोपियाँ माधुर्य विहार करने से थक गई थीं, हे राजन ( परिक्षित ), दयालुश्रीकृष्ण ने बड़े ही प्रेम से उनके मुखों को अपने सुखद हाथों से पोंछा।

गोप्यः स्फुरत्पुरटकुण्डलकुन्तलत्विड्‌-गण्डश्या सुधितहासनिरीक्षणेन ।

मान दधत्य ऋषभस्य जगुः कृतानिपुण्यानि तत्कररुहस्पर्शप्रमोदा: ॥

२१॥

गोप्य:--गोपियाँ; स्फुरत्‌ू--चमकते हुए; पुरट--सुनहले; कुण्डल--अपने कान की बालियों का; कुन्तल--तथा अपने( घुँघराले ) केशों के; त्विट--तेज का; गण्ड--कपोलों के; थ्रिया--सौन्दर्य से; सुधित--अमृतमय बनाया गया; हास--हँसी;निरीक्षणेन--अपनी चितवन से; मानम्‌ू--आदर; दधत्य: --देते हुए; ऋषभस्य-- अपने नायक के; जगु:--गाया; कृतानि--कार्यकलापों को; पुण्यानि--शुभ; तत्‌--उसके; कर-रुह--हाथ के नाखूनों के; स्पर्श--स्पर्श से; प्रमोदा:---अत्यधिकप्रमुदित।

अपने गालों के सौंदर्य, घुँधराले बालों के तेज एवं सुनहरे कुंडलों की चमक से मधुरितहँसीयुक्त चितवनों से गोपियों ने अपने नायक को सम्मान दियाकिया।

उनके नखों के स्पर्श सेपुलकित होकर वे उनकी शुभ दिव्य लीलाओं का गान करने लगीं।

ताभिरय्युतः श्रममपोहितुमड्रसड़-घृष्टर्रज: स कुचकुड्डू मरज्जिताया: ।

गन्धर्वपालिभिरनुद्गुत आविशद्धा:श्रान्तो गजीभिरिभराडिव भिन्नसेतु: ॥

२२॥

ताभि:ः--उनके द्वारा; युत:ः--युक्त; श्रमम्‌--थकावट; अपोहितुम्‌ू--दूर करने के लिए; अड्भ-सड़--उनकी माधुर्य संगति से;घृष्ट--कुचली गयी; स्त्रज:--माला; सः--वह; कुच--उनके स्तनों के; कुट्डू म-सिंदूर से; रञ्जिताया: --पुता हुआ; गन्धर्व-'प--जो गंधर्वों की तरह लग रहा था; अलिभि:--भौंरा से; अनुद्गुतः:--तेजी से पीछा किया जाता हुआ; आविशत्‌-प्रवेशकिया; वा:--जल; श्रान्त:--थका; गजीभि: --हथिनियों के साथ; इभ-राटू--शाही हाथी; इब--सहृश; भिन्न--छिन्न-भिन्नकरके; सेतुः--धान के खेत की मेड़ें ॥

भगवान्‌ श्रीकृष्ण की माला गोपियों के साथ माधुर्य विहार करते समय कुचल गई थी औरउनके स्तनों के कुंकुम से सिंदूरी रंग की हो गई थी।

गोपियों की थकान मिटाने के लिए कृष्णयमुना के जल में घुस गये, जिनका पीछा तेजी से भौरें कर रहे थे, जो श्रेष्ठतम गन्धर्वों की तरहगा रहे थे।

कृष्ण ऐसे लग रहे थे मानो कोई राजसी हाथी अपनी संगिनियों के साथ जल में सुस्ताने के लिए प्रविष्ट हो रहा हो।

निस्सन्देह भगवान्‌ ने सारी लोक तथा वेद की मर्यादा का उसीतरह अतिक्रमण कर दिया जिस तरह एक शक्तिशाली हाथी धान के खेतों की रौंद ड़ालता है।

सोम्भस्यलं युवतिभि: परिषिच्यमानःप्रेम्णेक्षित: प्रहसतीभिरितस्ततोड्र ।

वैमानिकै: कुसुमवर्षिभिरीद्यमानोरेमे स्वयं स्वरतिरत्र गजेन्द्रलील: ॥

२३॥

सः--वह; अम्भसि--जल में; अलम्‌--अत्यधिक; युवतिभि:--युवतियों के साथ; परिषिच्यमान:--जल उलीच करके;प्रेमणा--प्रेमपूर्वक; ईक्षित:ः --देखे जाकर; प्रहसतीभि:--हँसने वालियों के द्वारा; इतः तत:--इधर उधर; अड्--हे राजन;वैमानिकै:--विमानों से यात्रा कर रही; कुसुम--फूल; वर्षिभि: --बरसाती हुई; ईंड्यमान: --पूजित होकर; रेमे--विहार किया;स्वयम्‌--खुद; स्व-रति:ः--आत्मतुष्ट होकर; अत्र--यहाँ; गज-इन्द्र--हाथियों का राजा; लील:--लीला।

हे राजनू, जल में कृष्ण ने अपने ऊपर चारों ओर से हँसती एवं अपनी ओर प्रेमपूर्ण निहारतीगोपियों के द्वारा जल उलीचा जाते देखा।

जब देवतागण अपने विमानों से उनपर फूल वर्षाकरके उनकी पूजा कर रहे थे तो आत्मतुष्ट भगवान्‌ हाथियों के राजा की तरह क्रीड़ा करने काआनन्द लेने लगे।

ततश्न कृष्णोपवने जलस्थल-प्रसूनगन्धानिलजुष्टदिक्तटे ।

चचार भृड़प्रमदागणावृतोयथा मदच्युद्द्िवरद: करेणुभि: ॥

२४॥

ततः--तब; च--तथा; कृष्णा--यमुना नदी के; उपबने--छोटे जंगल में; जल--जल; स्थल--तथा भूमि के; प्रसून--फूलोंकी; गन्ध--सुगन्धि से; अनिल--वायु से; जुष्ट--साथ हो लिये; दिक्‌ू-तटे--दिशाओं के छोर; चचार--गुजरा; भूड़-- भौंरों;प्रमदा--तथा स्त्रियों के; गण--समूह से; आवृत:ः--घिरा; यथा--जिस प्रकार; मद-च्युत्‌--उत्तेजना से अपने मस्तक से रसचुवाता; द्विरद: --हाथी; करेणुभि: --हथिनियों के साथ

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ ने यमुना के किनारे स्थित एक छोटे से उपवन में भ्रमण किया।

यह उपवनस्थल तथा जल में उगने वाले फूलों की सुगन्ध लेकर बहने वाली मन्द वायु से भरपूर था।

भौंरोंतथा सुन्दर स्त्रियों के साथ भ्रमण कर रहे भगवान्‌ कृष्ण ऐसे लग रहे थे मानों कोई मदमत्त हाथीअपनी हथिनियों के साथ जा रहा हो।

एवं शशाझ्डलांशुविराजिता निशाःस सत्यकामोनुरताबलागण: ॥

सिषेव आत्मन्यवरुद्धसौरतःसर्वा: शरत्काव्यकथारसा श्रया: ॥

२५॥

एवम्‌--इस प्रकार; शशाड्रू--चन्द्रमा की; अंशु--किरणों से; विराजिता:--चमकाई गई; निशा:--रात्रियाँ; सः--वह; सत्य-'काम:ः--जिसकी इच्छाएँ सदैव पूरी होती हैं; अनुरत--उनमें निरन्तर अनुरक्त; अबला-गण:--अनेक सखियों; सिषेवे--लाभउठाया; आत्मनि--अपने में; अवरुद्ध--सुरक्षित; सौरत:--मैथुन या काम भाव; सर्वा:--सभी ( रातें ); शरत्‌--शरदऋतु की;काव्य--काव्यमय; कथा--कहानियों का; रस--दिव्य रसों का; आश्रया:--आधार |

यद्यपि गोपियाँ सत्यकाम कृष्ण के प्रति दृढ़तापूर्वक अनुरक्त थीं किन्तु भीतर से भगवान्‌किसी संसारी काम-भावना से प्रभावित नहीं थे।

फिर भी उन्होंने अपनी लीलाएँ सम्पन्न करने केलिए चाँदनी से खिली हुई उन समस्त शरतकालीन रातों का लाभ उठाया जो दिव्य विषयों केकाव्यमय वर्णन के लिए प्रेरणा देती हैं।

श्रीपरीक्षिदुवाचसंस्थापनाय धर्मस्य प्रशमायेतरस्य च ।

अवतीर्णो हि भगवानंशेन जगदी श्वर: ॥

२६॥

स कथं धर्मसेतूनां वक्ता कर्ताभिरक्षिता ।

प्रतीपमाचरद्गह्मन्परदाराभिमर्शनम्‌ ॥

२७॥

श्री-परीक्षित्‌ उबाच-- श्री परीक्षित महाराज ने कहा; संस्थापनाय--स्थापना करने के लिए; धर्मस्य-- धर्म की; प्रशमाय--दमनकरने के लिए; इतरस्य--विरोधियों का; च--तथा; अवतीर्ण: --( इस धरा पर ) अवतरित हुए; हि--निस्सन्देह; भगवानू--भगवान्‌; अंशेन--अपने स्वांश ( श्री बलराम ) सहित; जगत्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के; ईश्वर: --स्वामी; सः--वह; कथम्‌--किसतरह; धर्म-सेतूनामू--आचार संहिता के; वक्ता--आदि व्याख्याता; कर्ता--करने वाले; अभिरक्षिता--रक्षक; प्रतीपम्‌--विरुद्ध; आचरत्‌--आचरण किया; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण, शुकदेव गोस्वामी; पर--अन्यों की; दार--पत्लियों का; अभिमर्शनम्‌--स्पर्श

परीक्षित महाराज ने कहा, 'हे ब्राह्मण, ब्रह्माण्ड के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ अपनेस्वांश सहित इस धरा में अधर्म का नाश करने तथा धर्म की पुनर्स्थापना करने हेतु अवतरित हुएहैं।

दरअसल वे आदि वक्ता तथा नैतिक नियमों के पालनकर्ता एवं संरक्षक हैं।

तो भला वे अन्यपुरुषों की स्त्रियों का स्पर्श करके उन नियमों का अतिक्रमण कैसे कर सकते थे ?

आप्तकामो यदुपति:ः कृतवान्बै जुगुप्सितम्‌ ।

किमभिप्राय एतन्न: शंशयं छिन्धि सुत्रत ॥

२८ ॥

आप्त-काम:--आत्पतुष्ट, पूर्णकाम; यदु-पति:--यदुकुल के स्वामी ने; कृतवान्‌--सम्पन्न किया है; बै--निश्चय ही;जुगुप्सितम्‌--निन्दनीय; किम्‌-अभिप्राय:--किस उद्देश्य से; एतत्‌--यह; नः--हमारा; शंशयम्‌--सन्देह; छिन्धि--काटदीजिये; सु-ब्रत-हे ब्रतधारी |

हे श्रद्धावान ब्रतधारी, कृपा करके हमें यह बतलाकर हमारा संशय दूर कीजिये किपूर्णकाम यदुपति के मन में वह कौन सा अभिप्राय था जिससे उन्होंने इतने निन्दनीय ढंग सेआचरण किया ?

श्रीशुक उवाचधर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्‌ ।

तेजीयसां न दोषाय वह्लेः सर्वभुजो यथा ॥

२९॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; धर्म-व्यतिक्रम:--धार्मिक या नैतिक सिद्धान्तों का उल्लंघन; दृष्ट:--देखाहुआ; ईश्वराणाम्‌--शक्तिशाली नियंत्रकों का; च-- भी; साहसम्‌--साहस; तेजीयसाम्‌-- आध्यात्मिक रूप से शक्तिमान; न--नहीं; दोषाय--किसी प्रकार की त्रुटि ( होने देता ); बह्नेः--अग्नि का; सर्व--सभी; भुज:--निगलते हुए; यथा-अस्‌

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : शक्तिशाली नियन्ताओं के पद पर किसी ऊपरी साहसपूर्णउल्लंघन से जो हम उनमें देख पायें, कोई आँच नहीं आती क्योंकि वे उस अग्नि के समान होतेहैं, जो हर वस्तु को निगल जाती है और अदूषित बनी रहती है।

नैतत्समाचरेज्ञातु मनसापि ह्ानी श्वर: ।

विनश्यत्याचरन्मौढ्याद्यथारुद्रोडब्धिजं विषम्‌ ॥

३०॥

न--नहीं; एतत्‌--यह; समाचरेत्‌--करना चाहिए; जातु--कभी; मनसा--मन से; अपि-- भी; हि--निश्चय ही; अनी श्वर:ः --जोनियन्ता नहीं है; विनश्यति--विनष्ट हो जाता है; आचरन्‌--आचरण करने पर; मौढ्यात्‌--मूर्खतावश; यथा--जिस तरह;अरुद्र:--जो रुद्र नहीं है; अब्धिजम्‌--समुद्र से उत्पन्न; विषम्‌--विष को |

जो महान्‌ संयमकारी नहीं है, उसे शासन करने वाले महान्‌ पुरुषों के आचरण की मन से भीकभी नकल नहीं करनी चाहिए।

यदि कोई सामान्य व्यक्ति मूर्खतावश ऐसे आचरण की नकलकरता है, तो वह उसी तरह विनष्ट हो जायेगा जिस तरह कि विष के सागर को पीने का प्रयासकरने वाला व्यक्ति।

यदि वह रुद्र नहीं है, नष्ट हो जायेगा।

ईश्वराणां बच: सत्यं तथेवाचरितं क्वचित्‌ ।

तेषां यत्स्ववचोयुक्तं बुद्धिमांस्तत्समाचरेत्‌ ॥

३१॥

ईश्वरानामू-- भगवान्‌ द्वारा शक्ति प्रदत्त दासों के; बच:--शब्द; सत्यम्‌--सत्य; तथा एब-- भी; आचरितम्‌--वे जो कुछ करतेहैं; क्वचित्‌--कभी कभी; तेषाम्‌--उनके ; यत्‌--जो; स्व-वच: --अपने ही शब्दों से; युक्तम्‌-- अनुरूप; बुद्धि-मान्‌--बुद्धिमान; तत्‌--वह; समाचरेत्‌--सम्पन्न करे।

भगवान्‌ द्वारा शक्तिप्रदत्त दासों के वचन सदैव सत्य होते हैं और जब वे इन वचनों केअनुरूप कर्म करते हैं, तो वे आदर्श होते हैं।

इसलिए जो बुद्धिमान है उस को चाहिए कि इनकेआदेशों को पूरा करे।

कुशलाचरितेनैषामिह स्वार्थो न विद्यते ।

विपर्ययेण वानर्थों निरहड्डारिणां प्रभो ॥

३२॥

कुशल--पवित्र; आचरितेन--कार्य द्वारा; एघामू--उनके लिए; इह--इस जगत में; स्व-अर्थ:--निजी लाभ; न विद्यते--नहींहोता; विपर्ययेण --विपरीत द्वारा; बा--अथवा; अनर्थ:--अवांछित फल; निरहड्लारिणाम्‌--मिथ्या गर्व से मुक्त लोगों का;प्रभो-हे प्रभु

हे प्रभु, जब मिथ्या अहंकार से रहित ये महान्‌ व्यक्ति इस जगत में पवित्र भाव से कर्म करतेहैं, तो उसमें उनका कोई स्वार्थ-भाव नहीं होता और जब वे ऊपरी तौर से पवित्रता के नियमों केविरुद्ध लगने वाले कर्म ( अनर्थ ) करते हैं, तो भी उन्हें पापों का फल नहीं भोगना पड़ता।

किमुताखिलसत्त्वानां तिर्यड्मरत्यदिवौकसाम्‌ ।

ईशितुश्चेशितव्यानां कुशलाकुशलान्वय: ॥

३३॥

किम्‌ उत--तो फिर क्या कहा जाय; अखिल--समस्त; सत्त्वानामू--सृजित प्राणियों का; तिर्यक्‌--पशुओं ; मर्त्य--मनुष्यों;दिव-ओकसाम्‌--तथा स्वर्ग के निवासियों का; ईंशुतु:--नियन्ता के लिए; च--तथा; ईशितव्यानाम्‌ू--नियंत्रितों का; कुशल--शुभ; अकुशल--तथा अशुभ; अन्वयः--कारणरूप सम्बन्ध |

तो फिर समस्त सूृजित प्राणियों पशुओं, मनुष्यों तथा देवताओं-के स्वामी भला उस शुभतथा अशुभ से किसी प्रकार का सम्बन्ध कैसे रख सकते हैं जिससे उनके अधीनस्थ प्राणीप्रभावित होते हों ?

यत्पादपड्भजजपरागनिषेवतृप्तायोगप्रभावविधुताखिलकर्मबन्धा: ।

स्वैरं चरन्ति मुनयोपि न नहामाना-स्तस्येच्छयात्तवपुष: कुत एवं बन्ध: ॥

३४॥

यत्‌--जिसके; पाद-पद्णलज--चरणकमलों की; पराग--धूलि के; निषेब--सेवन करने से; तृप्ता:--तृप्त; योग-प्रभाव--योगशक्ति से; विधुत--धुला हुआक्‍; अखिल--समस्त; कर्म--सकाम कर्म का; बन्धा:--बन्धन; स्वैरम्‌--मुक्त भाव से; चरन्ति--कर्म करते हैं; मुन॒वः--मुनिगण; अपि-- भी; न--कभी नहीं; नहामाना:--बद्ध होकर; तस्थ-- उसकी; इच्छया--इच्छा से;आत्त--स्वीकार किया; वपुष:--दिव्य शरीर; कुतः--कहाँ; एव--निस्सन्देह; बन्ध:--बन्धन |

जो भगवदभक्त भगवान्‌ के चरणकमलों की धूलि का सेवन करते हुए पूर्णतया तुष्ट हैं उन्हेंभौतिक कर्म कभी नहीं बाँध पाते।

न ही भौतिक कर्म उन बुद्धिमान मुनियों को बाँध पाते हैंजिन्होंने योगशक्ति के द्वारा अपने को समस्त कर्मफलों के बन्धन से मुक्त कर लिया है।

तो फिरस्वयं भगवान्‌ के बन्धन का प्रश्न कहाँ उठता है, जो स्वेच्छा से दिव्य रूप धारण करने वाले हैं ?

गोपीनां तत्पतीनां च सर्वेषामेव देहिनाम्‌ ।

योउन्तश्वरति सोध्यक्ष: क्रीडनेनेह देहभाक्‌ू ॥

३५॥

गोपीनाम्‌-गोपियों के; तत्‌-पतीनाम्‌ू--उनके पतियों के; च--तथा; सर्वेषाम्‌--समस्त; एव--निस्सन्देह; देहिनाम्‌--देहधारीजीवों के; यः--जो; अन्त:-- भीतर; चरति--रहता है; सः--वह; अध्यक्ष:--साक्षी; क्रीडनेन-- क्रीड़ा के लिए; इह--इससंसार में; देह--अपना रूप; भाक्‌ू-- धारण करते हुए।

जो गोपियों तथा उनके पतियों और वस्तुतः समस्त देह-धारी जीवों के भीतर साक्षी के रूपमें रहता है, वही दिव्य लीलाओं का आनन्द लेने के लिए इस जगत में विविध रूप धारण करताहै।

अनुग्रहाय भक्तानां मानुषं देहमास्थित: ।

भजते ताहशीः क्रीड या: श्रुत्वा तत्परो भवेत्‌ ॥

३६॥

अनुग्रहाय--दया दिखाने के लिए; भक्तानाम्‌--अपने भक्तों पर; मानुषम्‌--मनुष्य जैसा; देहम्‌--शरीर; आस्थित:-- धारणकरते हुए; भजते--स्वीकार करता है; ताहशी:--वैसी; क्रिडा:--लीलाएँ; या:--जिनके बारे में; श्रुत्वा--सुनकर; तत्‌-परः --उनके प्रति परायण; भवेत्‌--हो जाता है

जब भगवान्‌ अपने भक्तों पर कृपा प्रदर्शित करने के लिए मनुष्य जैसा शरीर धारण करते हैं,तो वे ऐसी क्रीड़ाएँ करते हैं जिनके विषय में सुनने वाले आकृष्ट होकर भगवत्परायण हो जाँय।

नासूयन्खलु कृष्णाय मोहितास्तस्य मायया ।

मन्यमानाः स्वपार्श्रस्थान्स्वान्स्वान्दारान्त्रजौकसः ॥

३७॥

न असूयनू--ईर्ष्षालु नहीं थे; खलु--यहाँ तक कि; कृष्णाय--कृष्ण से; मोहिता: --मोहित; तस्य--उसकी; मायया--मायाद्वारा; मन्यमानाः--सोचते हुए; स्व-पार्श्व--अपने निकट; स्थान्‌--खड़ी हुई; स्वान्‌ स्वानू--अपनी अपनी; दारान्‌ू--पत्ियाँ;ब्रज-ओकसः--ब्रज के गोपजन

कृष्ण की मायाशक्ति से मोहित सारे ग्वालों ने सोचा कि उनकी पत्नियाँ घरों में उनके निकटही रहती रही थीं।

इस तरह उनमें कृष्ण के प्रति कोई ईर्ष्या भाव नहीं उत्पन्न हुआ।

ब्रह्मारात्र उपावृत्ते वासुदेवानुमोदिता: ।

अनिच्छन्त्यो ययुर्गोप्य: स्वगृहान्भगवत्प्रिया: ॥

३८॥

ब्रह्म-रात्रे--ब्रह्मा की रात; उपावृत्ते --पूर्ण होने पर; वासुदेव-- भगवान्‌ कृष्ण द्वारा; अनुमोदिता:--अनुमोदन किये जाने पर;अनिच्छन्त्य:--न चाहती हुई; ययु:--चली गईं; गोप्य:--गोपियाँ; स्व-गृहान्‌-- अपने घरों को; भगवत्‌-- भगवान्‌ की;प्रिया:--प्रियतमाएँ |

जब ब्रह्मा की पूरी एक रात बीत गई तो कृष्ण ने गोपियों को अपने अपने घरों को लौटजाने की सलाह दी।

यद्यपि वे ऐसा करना नहीं चाह रही थीं तो भी भगवान्‌ की इन प्रेयसियों नेउनके आदेश का पालन किया।

विक्रीडितं ब्रजवधूभिरिदं च विष्णो:श्रद्धान्वितोनुश्रुणुयादथ वर्णयेद्य: ।

भक्ति परां भगवति प्रतिलभ्य काम॑हद्रोगमाश्रपहिनोत्यचिरेण धीर: ॥

३९॥

विक्रीडितमू--क्री ड़ा करना; ब्रज-वधूभि: --वृन्दावन की युवतियों के साथ; इदम्‌--यह; च--तथा; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णुद्वारा; श्रद्धा-अन्वित:-- श्रद्धापूर्वक; अनुश्रुणुयात्‌--सुनता है; अथ-- अथवा; वर्णयेत्‌--वर्णन करता है; यः--जो; भक्तिम्‌--भक्ति; परामू--दिव्य; भगवति-- भगवान्‌ में; प्रतिलभ्य--प्राप्त करके; काममू-- भौतिक कामवासना को; हत्‌--हृदय में;रोगमू--रोग को; अशु--तुरन्त; अपहिनोति-- भगा देताहै; अचिरिण--शीघ्र ही; धीर:--गम्भीर |

जो कोई वृन्दावन की युवा-गोपिकाओं के साथ भगवान्‌ की क्रीड़ाओं को श्रद्धापूर्वकसुनता है या उनका वर्णन करता है, वह भगवान्‌ की शुद्ध भक्ति प्राप्त करेगा।

इस तरह वह शीघ्रही धीर बन जाएगा और हृदय रोग रूपी कामवासना को जीत लेगा।

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