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अध्याय चार: राजा कंस के अत्याचार
10.4श्रीशुक उबाचबहिरन्तःपुरद्वारः सर्वाः पूर्ववदावृता: ।
ततो बालध्वनिं श्रुत्वा गृहपाला: समुत्थिता: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; बहिः-अन्तः-पुर-द्वारः--घर के भीतरी तथा बाहरी दरवाजे; सर्वा:--सारे;पूर्व-बत्--पहले की तरह; आवृता:--बन्द; ततः--तत्पश्चात्; बाल-ध्वनिम्--नवजात शिशु का रोदन; श्रुत्वा--सुनकर; गृह-पाला:--घर के सारे वासी विशेषतया द्वारपाल; समुत्थिता:--जग गए
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा परीक्षित, घर के भीतरी तथा बाहरी दरवाजे पूर्ववत्बन्द हो गए।
तत्पश्चात् घर के रहने वालों ने, विशेष रूप से द्वारपालों ने, नवजात शिशु काक्रन्दन सुना और अपने बिस्तरों से उठ खड़े हुए।
ते तु तूर्णमुपत्रज्य देवक्या गर्भजन्म तत् ।
आचख्युर्भोजराजाय यदुद्विग्न: प्रतीक्षते ॥
२॥
ते--वे सारे द्वारपाल; तु--निस्सन्देह; तूर्णम्--शीघ्र; उपब्रज्य--राजा के समक्ष जाकर; देवक्या:--देवकी का; गर्भ-जन्म-गर्भसे बाहर आना; तत्--उस ( शिशु ); आचख्यु:--प्रस्तुत किया; भोज-राजाय--भोजराज कंस को; यत्--जिससे; उद्विग्न:--अत्यधिक चिन्तित; प्रतीक्षते--प्रतीक्षा कर रहा था ( शिशु जन्म की )
तत्पश्चात् सारे द्वारपाल जल्दी से भोजवंश के शासक राजा कंस के पास गये और उसेदेवकी से शिशु के जन्म लेने का समाचार बतलाया।
अत्यन्त उत्सुकता से इस समाचार कीप्रतीक्षा कर रहे कंस ने तुरन्त ही कार्यवाही की।
स तल्पात्तूर्णमुत्थाय कालोयमिति विहलः ।
सूतीगृहमगात्तूर्ण प्रस्खलन्मुक्तमूर्धज: ॥
३॥
सः--वह ( कंस ); तल्पात्--बिस्तर से; तूर्णम्--शीघ्र ही; उत्थाय--उठकर; काल: अयम्--यह रही मेरी मृत्यु, परम काल;इति--इस प्रकार; विहलः --उद्विग्न; सूती-गृहम्--सौर को; अगात्--गया; तूर्णम्--देरी लगाए बिना; प्रस्खलन्--बिखेरे हुए;मुक्त--खुले; मूर्ध-ज:--सिर के बाल।
कंस तुरन्त ही बिस्तर से यह सोचते हुए उठ खड़ा हुआ, '‘यह रहा काल, जिसने मेरा वधकरने के लिए जन्म लिया है।
इस तरह उद्विग्न एवं अपने सिर के बाल बिखराए कंस तुरन्त हीउस स्थान पर पहुँचा जहाँ शिशु ने जन्म लिया था।
तमाह भ्रातरं देवी कृपणा करुणं सती ।
स्नुषेयं तब कल्याण स्त्रियं मा हन्तुमहसि ॥
४॥
तम्ू--कंस से; आह--कहा; भ्रातरम्--अपने भाई; देवी--माता देवकी ने; कृपणा--असहाय; करुणम्--कातर; सती --सती; स्नुषा इयम् तब--यह शिशु तुम्हारी भावी पुत्र-वधू बनेगी; कल्याण--हे शुभ; स्त्रियम्--स्त्री को; मा--नहीं; हन्तुमू--वधकरना; अर्हसि--तुम्हें शोभा देता है।
असहाय तथा कातर भाव से देवकी ने कंस से विनती की : मेरे भाई, तुम्हारा कल्याण हो।
तुम इस बालिका को मत मारो।
यह तुम्हारी पुत्र-वधू बनेगी।
तुम्हें शोभा नहीं देता कि एककन्या का वध करो।
बहवो हिंसिता भ्रात: शिशवः पावकोपमा: ।
त्वया दैवनिसूष्टेन पुत्रिकेका प्रदीयताम् ॥
५॥
बहव:--अनेक; हिंसिता:--ईर्ष्यावश मारे गए; भ्रात:--हे भाई; शिशव:--अनेक शिशु; पावक-उपमा:--तेज और सौन्दर्य मेंअग्नि के समान; त्वया--तुम्हारे द्वारा; दैव-निसृष्टेन--भविष्यवाणी से; पुत्रिका--कन्या; एका--एक; प्रदीयताम्--तुम मुझेउपहार स्वरूप दे दो।
हे भ्राता, तुम दैववश मेरे अनेक सुन्दर तथा अग्नि जैसे तेजस्वी शिशुओं को पहले ही मारचुके हो।
किन्तु कृपा करके इस कन्या को छोड़ दो।
इसे उपहार स्वरूप मुझे दे दो।
नन्वहं ते ह्वरजा दीना हतसुता प्रभो ।
दातुमरहसि मन्दाया अड्लेमां चरमां प्रजाम्ू ॥
६॥
ननु--किन्तु; अहम्-मैं; ते--तुम्हारी; हि--निश्चय ही; अवरजा--छोटी बहन; दीना--दीन; हत-सुता--सन्तान से विहीन कीगई; प्रभो--हे प्रभु; दातुम् अहंसि--तुम देने में समर्थ हो; मन्दाया:--इस अभागिन को; अड्भ--मेरे भाई; इमाम्--इस;चरमाम्-- अन्तिम; प्रजामू--बालक को
हे प्रभु, हे मेरे भाई, मैं अपने सारे बालकों से विरहित होकर अत्यन्त दीन हूँ, फिर भी मैंतुम्हारी छोटी बहन हूँ अतएव यह तुम्हारे अनुरूप ही होगा कि तुम इस अन्तिम शिशु को मुझे भेंटमें दे दो।
श्रीशुक उबाचउपगुद्यात्मजामेवं रुद॒त्या दीनदीनवत् ।
याचितस्तां विनिर्भत्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः ॥
७॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; उपगुह्ा--आलिंगन करके; आत्मजाम्--अपनी पुत्री को; एवम्--इस प्रकार;रुदत्या--रूदन करती देवकी द्वारा; दीन-दीन-वत्--एक गरीब स्त्री की भाँति अत्यन्त दीनतापूर्वक; याचित:--माँगे जाने पर;तामू--उसे ( देवकी को ); विनिर्भ्स्य--भर्त्सना करके; हस्तातू--हाथ से; आचिच्छिदे--बलपूर्वक छीन लिया; खलः--उसदुष्ट कंस ने |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : अपनी पुत्री को दीनतापूर्वक सीने से लगाये हुए तथाबिलखते हुए देवकी ने कंस से अपनी सनन््तान के प्राणों की भीख माँगी, किन्तु वह इतना निर्दयीथा कि उसने देवकी को फटकारते हुए उसके हाथों से उस बालिका को बलपूर्वक झपट लिया।
तां गृहीत्वा चरणयोर्जातमात्रां स्वसु: सुताम् ।
अपोथयच्छिलापूट्टे स्वार्थोन्मूलितसौहद: ॥
८ ॥
ताम्ू--शिशु को; गृहीत्वा--बलपूर्वक लेकर; चरणयो:--दोनों पाँवों से; जात-मात्रामू--नवजात शिशु को; स्वसु:--अपनीबहन की; सुताम्--कन्या को; अपोधयत्--पछाड़ दिया; शिला-पृष्ठे--पत्थर के ऊपर; स्व-अर्थ-उन्मूलित--विकट स्वार्थ केवशीभूत होकर जड़ से उखाड़ फेंका; सौहद:--सारे मित्र या पारिवारिक सम्बन्ध |
अपने विकट स्वार्थ के कारण अपनी बहन से सारे सम्बन्ध तोड़ते हुए घुटनों के बल बैठेकंस ने नवजात शिशु के पाँवों को पकड़ा और उसे पत्थर पर पटकना चाहा।
सा तद्धस्तात्समुत्पत्य सद्यो देव्यम्बरं गता ।
अदृश्यतानुजा विष्णो: सायुधाष्टमहाभुजा ॥
९॥
सा--वह कन्या; ततू-हस्तातू--कंस के हाथ से; सम्-उत्पत्य--छूटकर; सद्य:--तुरन्त; देवी--देवी के रूप में; अम्बरम्--आकाश में; गता--चली गईं; अहृश्यत--देखी गई; अनुजा--छोटी बहन; विष्णो:-- भगवान् की; स-आयुधा--हथियारोंसहित; अष्ट--आठ; महा-भुजा--बड़ी-बड़ी भुजाओं वाली
वह कन्या, योगमाया देवी जो भगवान् विष्णु की छोटी बहन थी, कंस के हाथ से छूट करऊपर की ओर चली गई और आकाश में हथियारों से युक्त आठ भुजाओं वाली देवी--देवीदुर्गा--के रूप में प्रकट हुई।
दिव्यस्त्रगम्बरालेपरत्ताभरणभूषिता ।
धनुःशूलेषुचर्मासिशट्डुचक्रगदाधरा ॥
१०॥
सिद्धचारणगन्धर्वैरप्सर:किन्नरोरगै: ।
उपाहतोरुबलिभि:ः स्तूयमानेदमब्रवीत् ॥
११॥
दिव्य-सत्रकू-अम्बर-आलेप--तब उसने चन्दन लेप, फूल-माला तथा सुन्दर वस्त्रों से आभूषित देवी का रूप धारण कर लिया;रतल-आभरण-भूषिता--बहुमूल्य रत्नों वाले आभूषणों से सज्जित; धनुः-शूल-इषु-चर्म-असि--धनुष, त्रिशूल, तीर, ढाल तथातलवार से युक्त; शटद्डु-चक्र-गदा-धरा--तथा शंख, चक्र और गदा धारण किए हुए; सिद्ध-चारण-गन्धर्व:--सिद्ध, चारण तथागन्धर्वों के द्वारा; अप्सर:-किन्नर-उरगै:--अप्सराओं, किन्नरों तथा उरगों द्वारा; उपाहत-उरु-बलिभि: --सभी उसके लिए भेंटेंलेकर आए; स्तूयमाना--प्रशंसित होकर; इृदम्--ये शब्द; अब्नवीत्--उसने कहे |
देवी दुर्गा फूल की मालाओं से सुशोभित थीं, वे चन्दन का लेप किए थीं और सुन्दर वस्त्रपहने तथा बहुमूल्य रत्नों से जटित आभूषणों से युक्त थीं।
वे अपने हाथों में धनुष, त्रिशूल, बाण,ढाल, तलवार, शंख, चक्र तथा गदा धारण किए हुए थीं।
अप्सराएँ, किन्नर, उरग, सिद्ध, चारणतथा गन्धर्व तरह-तरह की भेंट अर्पित करते हुए उनकी प्रशंसा और पूजा कर रहे थे।
ऐसी देवीदुर्गा इस प्रकार बोलीं ।
कि मया हतया मन्द जातः खलु तवान्तकृत् ।
यत्र क््व वा पूर्वशत्रुर्मा हिंसी: कृपणान्वृथा ॥
१२॥
किम्--क्या लाभ; मया--मुझे; हतया--मारने में; मन्द--ओरे मूर्ख; जात:--पहले ही जन्म ले चुका है; खलु--निस्सन्देह; तवअन्त-कृत्--जो तुम्हारा वध करेगा; यत्र कब वा--अन्यत्र कहीं; पूर्व-शत्रु:--तुम्हारा पहले का शत्रु; मा--मत; हिंसी:--मारो;कृपणान्--अन्य बेचारे बालक; वृथा--व्यर्थ ही ओ
रे मूर्ख कंस, मुझे मारने से तुझे क्या मिलेगा? तेरा जन्मजात शत्रु तथा वध करने वालापूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अन्यत्र कहीं जन्म ले चुका है।
अतः तू व्यर्थ ही अन्य बालकों का वधमत कर।
इति प्रभाष्य तं देवी माया भगवती भुवि ।
बहुनामनिकेतेषु बहुनामा बभूव ह ॥
१३॥
इति--इस तरह; प्रभाष्य--कहकर; तम्--कंस से; देवी--देवी दुर्गा; माया--योगमाया; भगवती-- भगवान् जैसी शक्ति सेसम्पन्न; भुवि--पृथ्वी पर; बहु-नाम--अनेक नामों वाले; निकेतेषु--विभिन्न स्थानों में; बहु-नामा--अनेक नामों वाली;बभूव--हुईं; ह--निस्सन्देह।
कंस से इस तरह कहकर देवी दुर्गा अर्थात् योगमाया वाराणसी इत्यादि जैसे विभिन्न स्थानोंमें प्रकट हुईं और अन्नपूर्णा, दुर्गा, काली तथा भद्रा जैसे विभिन्न नामों से विख्यात हुईं।
तयाभिहितमाकर्ण्य कंस: परमविस्मितः ।
देवकीं वसुदेवं च विमुच्य प्रश्रितोउब्रवीत् ॥
१४॥
तया--दुर्गा देवी द्वारा; अभिहितम्--कहे गए शब्दों को; आकर्णर्य--सुनकर; कंस: -- कंस; परम-विस्मित:-- अत्यधिकआश्चर्यचकित था; देवकीम्--देवकी को; वसुदेवम् च--तथा वसुदेव को; विमुच्य--तुरन्त विमुक्त करके; प्रश्रित:--अत्यन्तदीनतापूर्बक; अब्नवीत्--इस प्रकार बोला |
देवीदुर्गा के शब्दों को सुनकर कंस अत्यन्त विस्मित हुआ।
तब वह अपनी बहन देवकी तथाबहनोई वसुदेव के निकट गया, उन्हें बेड़ियों से विमुक्त कर दिया तथा अति विनीत भाव में इसप्रकार बोला।
अहो भगिन्यहो भाम मया वां बत पाप्मना ।
पुरुषाद इवापत्यं बहवो हिंसिता: सुता: ॥
१५॥
अहो--ओह; भगिनि--मेरी बहन; अहो--ओह; भाम--मेरे बहनोई; मया--मेरे द्वारा; वामू--तुम दोनों को; बत--निस्सन्देह;पाप्मना--पापपूर्ण कार्यों से; पुरुष-अदः --मानव-भक्षी, राक्षस; इब--सहश; अपत्यमू--शिशु को; बहवः--अनेक;हिंसिता:--मारे गए; सुता:--पुत्रगण |
हाय मेरी बहन! हाय मेरे बहनोई ! मैं सचमुच उस मानव-भक्षी ( राक्षस ) के तुल्य पापी हूँ जोअपने ही शिशु को मारकर खा जाता है क्योंकि मैंने तुमसे उत्पन्न अनेक पुत्रों को मार डाला है।
स त्वहं त्यक्तकारुण्यस्त्यक्तज्ञातिसुहत्खल: ।
कान््लोकान्वै गमिष्यामि ब्रह्मदेव मृत: श्वसन् ॥
१६॥
सः--वह व्यक्ति ( कंस ); तु--निस्सन्देह; अहम्--मैं; त्यक्त-कारुण्य:--सारी दया से विहीन; त्यक्त-ज्ञाति-सुहृत्--जिसनेअपने सम्बन्धियों तथा मित्रों का भी परित्याग कर रखा है; खलः--क्रूर; कान् लोकानू--कौन से लोकों में; वै--निस्सन्देह;गमिष्यामि--जाऊँगा; ब्रह्म-हा इब--ब्राह्मण का वध करने वाले के समान; मृत: श्रसन्ू--मरने के बाद या जीते ही जीते |
मैंने दयाविहीन तथा क्रूर होने के कारण अपने सारे सम्बन्धियों तथा मित्रों का परित्याग करदिया है।
अतः मैं नहीं जानता कि ब्राह्मण का वध करने वाले व्यक्ति के समान मृत्यु के बाद याइस जीवित अवस्था में मैं किस लोक को जाऊँगा ?
दैवमप्यनृतं वक्ति न मर्त्या एव केवलम् ।
यद्विश्रम्भादहं पाप: स्वसुर्निहतवाउिछशून् ॥
१७॥
दैवम्--विधाता; अपि-- भी; अनृतम्--झूठ; वक्ति--कहते हैं; न--नहीं; मर्त्या:--मनुष्यगण; एव--निश्चय ही; केवलम्--केवल; यत्-विश्रम्भात्ू--उस भविष्यवाणी में विश्वास करने के कारण; अहमू्--मैंने; पाप: --अत्यन्त पापी; स्वसु;:--अपनीबहन के; निहतवान्--मार डाले; शिशून्--अनेक बालकों को
हाय! कभी-कभी न केवल मनुष्य झूठ बोलते हैं अपितु विधाता भी झूठ बोलता है।
और मैंइतना पापी हूँ कि मैंने विधाता की भविष्यवाणी को मानते हुए अपनी ही बहन के इतने बच्चोंका वध कर दिया।
मा शोचतं महाभागावात्मजान्स्वकृतं भुजः ।
जान्तवो न सदैकत्र दैवाधीनास्तदासते ॥
१८॥
मा शोचतम्--( इसके पहले जो हो गया उसके लिए ) अब दुखी न हों; महा-भागौ--हे आत्मज्ञानी तथा भाग्यशालिनी;आत्मजान्--अपने पुत्रों के लिए; स्व-कृतम्--अपने कर्मों के ही कारण; भुज:--भोग कर रहे हैं; जान्तवः--सारे जीव-जन्तु;न--नहीं; सदा--सदैव; एकत्र--एक स्थान में; दैव-अधीना:--जो भाग्य के वश में है; तदा--अतएव; आसते--जीवित रहतेहैं।
हे महान् आत्माओ, तुम दोनों के पुत्रों को अपने ही दुर्भाग्य का फल भोगना पड़ा है।
अतःतुम उनके लिए शोक मत करो।
सारे जीव परमेश्वर के नियंत्रण में होते हैं और वे सदैव एकसाथनहीं रह सकते।
सान्त्वना देना चाह रहा था।
भुवि भौमानि भूतानि यथा यान्त्यपयान्ति च ।
नायमात्मा तथेतेषु विपर्येति यथेव भू: ॥
१९॥
भुवि--पृथ्वी पर; भौमानि--पृथ्वी से बने सारे भौतिक पदार्थ यथा घड़े आदि; भूतानि--उत्पन्न; यथा--जिस तरह; यान्ति--प्रकट होते हैं; अपयान्ति--विलीन होते हैं ( खंडित होकर मिट्टी में मिल जाते हैं ); च--तथा; न--नहीं; अयम् आत्मा--आत्माया आध्यात्मिक स्वरूप; तथा--उसी तरह; एतेषु--इन सब ( भौतिक तत्त्वों से बने पदार्थों ) में से; विपर्येति--बदल जाता है याटूट जाता है; यथा--जिस तरह; एव--निश्चय ही; भू:--पृथ्वी
इस संसार में हम देखते हैं कि बर्तन, खिलौने तथा पृथ्वी के अन्य पदार्थ प्रकट होते हैं,टूटते हैं और फिर पृथ्वी में मिलकर विलुप्त हो जाते हैं।
ठीक इसी तरह बद्धजीवों के शरीर विनष्ट होते रहते हैं, किन्तु पृथ्वी की ही तरह ये जीव अपरिवर्तित रहते हैं और कभी विनष्ट नहींहोते ( न हन्यते हन्यमाने शरीरे )।
यथानेवंविदो भेदो यत आत्मविपर्ययः ।
देहयोगवियोगौ च संसृतिर्न निवर्तते ॥
२०॥
यथा--जिस तरह; अनू-एवम्-विदः --ऐसे व्यक्ति का जिसे ( आत्म-तत्त्व तथा आत्मा के स्थायित्व का ) शरीर के परिवर्तनों केबावजूद कोई ज्ञान नहीं होता; भेदः--शरीर तथा आत्मा का अन्तर; यत:--जिससे; आत्म-विपर्यय: --यह मूर्खतापूर्ण ज्ञान किवह शरीर है; देह-योग-वियोगौ च--तथा विभिन्न शरीरों में सम्बन्ध तथा वियोगों को उत्पन्न करता है; संसृतिः--बद्ध जीवन कीनिरन्तरता; न--नहीं; निवर्तते--रूकती है।
जो व्यक्ति शरीर तथा आत्मा की स्वाभाविक स्थिति को नहीं समझता वह देहात्मबुद्धि केप्रति अत्यधिक अनुरक्त रहता है।
फलस्वरूप शरीर तथा उसके प्रतिफलों के प्रति अनुरक्ति केकारण वह अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्र के साथ संयोग तथा वियोग का अनुभव करता है।
जब तक ऐसा बना रहता है तब तक वह भौतिक जीवन बिताता है ( अन्यथा मुक्त है )।
तस्माद्धद्रे स्वतनयान्मया व्यापादितानपि ।
मानुशोच यतः सर्व: स्वकृतं विन्दतेडबशः ॥
२१॥
तस्मातू--अतः; भद्वे--मेरी बहन ( तुम्हारा कल्याण हो ); स्व-तनयान्--अपने पुत्रों के लिए; मया--मेरे द्वारा; व्यापादितान् --दुर्भाग्यवश मारे गए; अपि--यद्यपि; मा अनुशोच--दुखी मत होओ; यत:--कक््योंकि; सर्व:--हर एक व्यक्ति; स्व-कृतम्--अपने कर्मो के ही सकाम फलों को; विन्दते-- भोगता है; अवश:--विधना के वशीभूत होकर
मेरी बहन देवकी, तुम्हारा कल्याण हो।
हर व्यक्ति प्रारब्ध के अधीन अपने ही कर्मों के फलभोगता है।
अतएव, दुर्भाग्यवश मेरे द्वारा मारे गए अपने पुत्रों के लिए शोक मत करो।
यावद्धतो स्मि हन्तास्मीत्यात्मानं मन्यतेउस्वहक् ।
तावत्तदभिमान्यज्ञो बाध्यबाधकतामियात् ॥
२२॥
यावत्--जब तक; हतः अस्मि--( दूसरों द्वारा ) मारा जा रहा हूँ; हन्ता अस्मि--( अन्यों का ) मारने वाला हूँ; इति--इस प्रकार;आत्मानम्--अपने को; मन्यते--मानता है; अ-स्व-हक्--जो अपने आप को नहीं देखता है ( देहात्मबुद्धि के अँधेरे के कारण );तावत्--तब तक; ततू-अभिमानी--अपने को मारा गया या मारने वाला मानते हुए; अज्ञ:--मूर्ख व्यक्ति; बाध्य-बाधकताम्--कुछ उत्तरदायित्व लेने के लिए बाध्य सांसारिक व्यवहार; इयात्--रहता है।
देहात्मबुद्धि होने पर आत्म-साक्षात्कार के अभाव में मनुष्य यह सोचकर अआँधेरे में रहता हैकि ‘मुझे मारा जा रहा है' अथवा ‘'मैंने अपने शत्रुओं को मार डाला है।
जब तक मूर्ख व्यक्तिइस प्रकार अपने को मारने वाला या मारा गया सोचता है तब तक वह भौतिक बन्धनों में रहता हैऔर उसे सुख-दुख भोगना पड़ता है।
क्षमध्वं मम दौरात्म्यं साधवो दीनवत्सला: ।
इत्युक्त्वा श्रुमुख: पादौ श्याल: स्वस्त्रोरथाग्रहीत् ॥
२३॥
क्षमध्वम्--कृपया क्षमा कर दें; मम--मेरे; दौरात्म्यम्--क्रूर कर्मों को; साधव:--तुम दोनों साधु व्यक्ति; दीन-वत्सला: --गरीबोंपर अत्यन्त कृपालु; इति उक्त्वा--ऐसा कहकर; अश्रु-मुखः--आँसुओं से भरा मुख; पादौ--पाँवों को; श्याल:--उसका सालाकंस; स्वस्त्र:ः--अपनी बहन तथा बहनोई के; अथ--इस प्रकार; अग्रहीतू--पकड़ लिया।
कंस ने याचना की, ‘हे मेरी बहन तथा मेरे बहनोई, मुझ जैसे क्षुद्र-हृदय व्यक्ति पर कृपालुहोयें क्योंकि तुम दोनों ही साधु सदृश व्यक्ति हो।
मेरी क्रूरताओं को क्षमा कर दें।
' यह कहकरखेद के साथ आँखों में अश्रु भरकर कंस वसुदेव तथा देवकी के चरणों पर गिर पड़ा।
मोचयामास निगडाद्विश्रब्ध: कन्यकागिरा ।
देवकीं वसुदेव॑ च दर्शयन्नात्मसौहदम् ॥
२४॥
मोचयाम् आस--कंस ने उन्हें मुक्त कर दिया; निगडात्--लोहे की जंजीरों से; विश्रब्ध:--पूर्ण विश्वास के साथ; कन्यका-गिरा--देवी दुर्गा की वाणी में; देवकीम्--अपनी बहन देवकी के प्रति; बसुदेवम् च--तथा वसुदेव को; दर्शयन्-- प्रदर्शितकरते हुए; आत्म-सौहदम्--आत्मीयता |
देवी दुर्गा की वाणी में पूरी तरह विश्वास करते हुए कंस ने देवकी तथा वसुदेव को तुरन्त हीलोहे की श्रृंखलाओं से मुक्त करते हुए पारिवारिक स्नेह का प्रदर्शन किया।
भ्रातु: समनुतप्तस्य क्षान्तरोषा च देवकी ।
व्यसूजद्ठसुदेवश्च प्रहस्य तमुवाच ह ॥
२५॥
भ्रातु:--अपने भाई कंस के प्रति; समनुतप्तस्थ--खेद व्यक्त करने के कारण; क्षान्त-रोषा--क्रोध शान्त हुआ; च--भी;देवकी--कृष्ण की माता, देवकी ने; व्यसृजत्--छोड़ दिया; वसुदेवः च--तथा वसुदेव ने भी; प्रहस्थ--हँसकर; तम्--कंस से;उबाच--कहा; ह--विगत में |
जब देवकी ने देखा कि उसका भाई पूर्वनिर्धारित घटनाओं की व्याख्या करते हुए वास्तव में पश्चात्ताप व्यक्त कर रहा है, तो उनका सारा क्रोध जाता रहा।
इसी प्रकार, वसुदेव भी क्रोध मुक्तहो गए उन्होंने हँसकर कंस से कहा।
एवमेतन्महाभाग यथा वदसि देहिनाम् ।
अज्ञानप्रभवाहंधी: स्वपरेति भिदा यतः ॥
२६॥
एवम्--हाँ, यह ठीक है; एतत्--तुमने जो कहा है; महा-भाग--हे महापुरुष; यथा--जिस तरह; वदसि--तुम बोल रहे हो;देहिनामू--जीवों के विषय में; अज्ञान-प्रभवा--अज्ञानवश; अहमू-धी:--यह मेरा स्वार्थ ( मिथ्या अहंकार ) है; स्व-परा इति--यह दूसरे का स्वार्थ है; भिदा-- भेद; यतः--ऐसी देहात्मबुद्धि के कारण
हे महापुरुष कंस, केवल अज्ञान के प्रभाव के ही कारण मनुष्य भौतिक देह तथा अभिमानस्वीकार करता है।
आपने इस दर्शन के विषय में जो कुछ कहा वह सही है।
आत्म-ज्ञान से रहितदेहात्म-बुद्धि वाले व्यक्ति 'यह मेरा है, ' ‘ये पराया है' के रूप में भेदभाव बरतते हैं।
शोकहर्षभयद्वेषलोभमोहमदान्विता: ।
मिथो घ्नन्तं न पश्यन्ति भावैर्भावं पृथग्हशः ॥
२७॥
शोक-शोक; हर्ष--प्रसन्नता; भय--डर; द्वेष--ईर्ष्या; लोभ--लालच; मोह--मोह; मद--पागलपन, उन्मत्तता; अन्विता:--सेयुक्त; मिथ:--परस्पर; घ्तन्तम्-मारने में व्यस्त; न पश्यन्ति--नहीं देखते; भावै:-- भेदभाव के कारण; भावम्-- भगवान् केप्रति अपनी स्थिति को; पृथक्-दृशः --ऐसे व्यक्ति जो हर वस्तु को भगवान् के नियंत्रण से पृथक् मानते हैं।
भेदभाव की दृष्टि रखने वाले व्यक्ति शोक, हर्ष, भय, द्वेष, लोभ, मोह तथा मद जैसे भौतिकगुणों से समन्वित होते हैं।
वे उस आसन्न ( उपादान ) कारण से प्रभावित होते हैं जिसकानिराकरण करने में वे लगे रहते हैं क्योंकि उन्हें दूरस्थ परम कारण ( निमित्त कारण ) अर्थात्भगवान् का कोई ज्ञान नहीं होता।
श्रीशुक उबाच कंस एवं प्रसन्ना भ्यां विशुद्धं प्रतिभाषित: ।
देवकीवसुदेवा भ्यामनुज्ञातो उविशद्गृहम् ॥
२८ ॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; कंस:--राजा कंस ने; एवम्--इस प्रकार; प्रसन्नाभ्याम्--अत्यन्त प्रसन्न;विशुद्धम्-विशुद्ध; प्रतिभाषित: --उत्तर दिए जाने पर; देवकी-बसुदेवाभ्याम्--देवकी तथा वसुदेव द्वारा; अनुज्ञात:--अनुमतिसे; अविशत्-- प्रवेश किया; गृहम्--अपने महल में ।
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : शान्तमना देवकी तथा वसुदेव द्वारा शुद्धभाव से इस तरहसम्बोधित किए जाने पर कंस अत्यंत हर्षित हुआ और उनकी अनुमति लेकर वह अपने घर चलागया।
तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां कंस आहूय मन्त्रिण: ।
तेभ्य आचष्ट तत्सर्व यदुक्तं योगनिद्रया ॥
२९॥
तस्याम्--उस; रात््यामू-रात को; व्यतीतायाम्--बिताकर; कंस: --कंस ने; आहूय--बुलाकर; मन्त्रिण:--सरे मंत्रियों को;तेभ्य:--उन्हें; आचष्ट--सूचित किया; तत्--वह; सर्वम्--सब; यत् उक्तम्--जो कहा गया था ( कि कंस का वध करने वालाअन्यत्र कहीं है ); योग-निद्रया--योगमाया
देवी दुर्गा द्वारारात बीत जाने पर कंस ने अपने सारे मंत्रियों को बुलाकर वह सब उन्हें बतलाया जोयोगमाया ने कहा था ( जिसने यह रहस्य बताया था कि कंस को मारने वाला कहीं अन्यत्र उत्पन्नहो चुका है )।
आकर्ण्य भर्तुर्गदितं तमूचुर्देवशत्रवः ।
देवान्प्रति कृतामर्षा दैतेया नातिकोविदा: ॥
३०॥
आकर्णर्य--सुनकर; भर्तु:--अपने स्वामी के; गदितम्--कथन को; तम् ऊचु:--उससे कहा; देव-शत्रवः--देवताओं के शत्रु,सारे असुर; देवान्--देवताओं के; प्रति--प्रति; कृत-अमर्षा: --ईर्ष्यालु; दैतेया:-- असुरगण; न--नहीं; अति-कोविदा: --अत्यन्त कार्यकुशल।
अपने स्वामी की बात सुनकर, देवताओं के शत्रु तथा अपने कामकाज में अकुशल, ईर्ष्यालुअसुरों ने कंस को यह सलाह दी।
एवं चेत्तह् भोजेन्द्र पुरग्रामत्रजादिषु ।
अनिर्दशान्निर्दशां श्र हनिष्यामोउद्य वै शिशून् ॥
३१॥
एवम्--इस तरह; चेत्--यदि ऐसा है; तहिं--तो; भोज-इन्द्र--हे भोजराज; पुर-ग्राम-ब्रज-आदिषु--सारे नगरों, गाँवों तथाचरागाहों में; अनिर्दशान्ू--दस दिन से कम आयु वाले; निर्दशान् च--तथा जो दस दिन पूरा कर चुके हैं; हनिष्याम: --हम मारडालेंगे; अद्य--आज से; वै--निस्सन्देह; शिशून्ू--बच्चों को
है भोजराज, यदि ऐसी बात है, तो हम आज से उन सारे बालकों को जो पिछले दस याउससे कुछ अधिक दिनों में सारे गाँवों, नगरों तथा चरागाहों में उत्पन्न हुए हैं, मार डालेंगे।
किमुद्यमै: करिष्यन्ति देवा: समरभीरव: ।
नित्यमुद्विग्नमनसो ज्याघोषैर्धनुषस्तव ॥
३२॥
किमू--क्या; उद्यमैः--अपने प्रयासों से; करिष्यन्ति--करेंगे; देवा: --सारे देवता; समर-भीरव:ः--लड़ने से भयभीत; नित्यम्ू--सदैव; उद्विग्न-मनसः--व्याकुल चित्त वाले; ज्या-धघोषै:--डोरी की ध्वनि से; धनुष:--धनुष की; तव--तुम्हारीसारे देवता आपकी धनुष की डोरी ( प्रत्यंचा ) की आवाज से सदैव भयभीत रहते हैं।
वेसदैव चिन्तित रहते हैं और लड़ने से डरते हैं।
अतः वे अपने प्रयत्नों से आपको किस प्रकार हानिपहुँचा सकते हैं ?
अस्यतस्ते शरक्रातैहन्यमाना: समन्ततः ।
जिजीविषव उत्सृज्य पलायनपरा ययु: ॥
३३॥
अस्यतः--आपके द्वारा छोड़े गए तीरों से छेदे जाने से; ते--आपके; शर-व्रातैः--बाणों के समूह से; हन्यमाना:--मारे गए;समन्ततः--चारों ओर; जिजीविषव: --जीने की कामना करते हुए; उत्सृज्य--युद्धभूमि छोड़कर; पलायन-परा: --बचकर भागनेकी इच्छा वाले; ययु:-- भाग गए
आपके द्वारा चारों दिशाओं में छोड़े गए बाणों के समूहों से छिदकर कुछ सुरगण जो घायलहो चुके थे, किन्तु जिन्हें जीवित रहने की उत्कण्ठा थी युद्धभूमि छोड़कर अपनी जान लेकर भागनिकले।
केचित्प्रा्लयो दीना न्यस्तशस्त्रा दिवौकस: ।
मुक्तकच्छशिखा: केचिद्धीता: सम इति वादिन: ॥
३४॥
केचित्--उनमें से कुछ; प्राज्ललय:ः--आपको प्रसन्न करने के लिए अपने हाथ जोड़े हुए; दीना:--अत्यन्त निरीह; न्यस्त-शस्त्रा:--सारे हथियारों से विहीन; दिवौकस: --देवतागण; मुक्त-कच्छ-शिखा:--अपने वस्त्र तथा बाल खोले और बिखेरे हुए;केचित्--कुछ; भीता:--हम अत्यन्त भयभीत हैं; स्म--हुए थे; इति वादिन:--उन्होंने इस तरह कहा |
हार जाने पर तथा सारे हथियारों से विहीन होकर कुछ देवताओं ने लड़ना छोड़ दिया औरहाथ जोड़कर आपकी प्रशंसा करने लगे और उनमें से कुछ अपने वस्त्र तथा केश खोले हुएआपके समक्ष कहने लगे, ‘'हे प्रभु, हम आपसे अत्यधिक भयभीत हैं।
'न त्वं विस्मृतशस्स्नास्त्रान्विरथान्भयसंवृतान् ।
हंस्यन्यासक्तविमुखान्भग्नचापानयुध्यत: ॥
३५॥
न--नहीं; त्वमू--आप; विस्मृत-शस्त्र-अस्त्रानू--जो अपने हथियार चलाना भूल चुके हैं; विरधान्ू--रथविहीन; भय-संवृतानू--भय से भौंचक्के; हंसि--मारते हो; अन्य-आसक्त-विमुखान्--जो लड़ने में अनुरक्त न रहकर कुछ अन्य कार्य में लगे रहते हैं;भग्न-चापान्--टूटे धनुषों वाले; अयुध्यत:--अतः युद्ध न करते हुए।
जब देवतागण रथविहीन हो जाते हैं, जब वे अपने हथियारों का प्रयोग करना भूल जाते हैं,जब वे भयभीत रहते हैं या लड़ने के अलावा किसी दूसरे काम में लगे रहते हैं या जब अपनेधनुषों के टूट जाने के कारण युद्ध करने की शक्ति खो चुके होते हैं, तो आप उनका वध नहींकरते।
कि क्षेमश्रैर्विबुधेरसंयुगविकत्थनैः ।
रहोजुषा कि हरिणा शम्भुना वा वनौकसा ।
किमिन्द्रेणाल्पवीर्येण ब्रह्मणा वा तपस्यता ॥
३६॥
किमू--किस बात का भय; क्षेम--ऐसे स्थान में जहाँ लड़ने की क्षमता का अभाव है; शूरैः--देवताओं द्वारा; विबुधैः --ऐसेशक्तिशाली पुरुषों द्वारा; असंयुग-विकत्थनैः --वृथा डींग मारने से, लड़ने से दूर रहने; रहः-जुषा--हृदय के कोने में रहने वाला;किम् हरिणा-- भगवान् विष्णु से क्या डरना; शम्भुना--शिव से; वा--अथवा; वन-ओकसा--बनवासी; किम् इन्द्रेण--इन्द्र सेक्या भय; अल्प-वीर्येण--वह तनिक भी शक्तिशाली नहीं है ( कि आपसे लड़ सके ); ब्रह्मणा-- और ब्रह्मा से डरने की तो कोईबात ही नहीं; वा--अथवा; तपस्यता--जो सदैव ध्यान में मग्न रहता हो।
देवतागण युद्धभूमि से दूर रहकर व्यर्थ ही डींग मारते हैं।
वे वहीं अपने पराक्रम का प्रदर्शनकर सकते हैं जहाँ युद्ध नहीं होता।
अतएवं ऐसे देवताओं से हमें किसी प्रकार का भय नहीं है।
जहाँ तक भगवान् विष्णु की बात है, वे तो केवल योगियों के हृदय में एकान्तवास करते हैं औरभगवान् शिव, वे तो जंगल चले गये हैं।
ब्रह्मा सदैव तपस्या तथा ध्यान में ही लीन रहते हैं।
इन्द्रइत्यादि अन्य सारे देवता पराक्रमविहीन हैं।
अतः आपको कोई भय नहीं है।
तथापि देवा: सापत्चान्नोपेक्ष्या इति मन्महे ।
ततस्तन्मूलखनने नियुद्छ्तवास्माननुत्रतान् ॥
३७॥
तथा अपि--फिर भी; देवा:--देवतागण; सापत्यात्--शत्रुता के कारण; न उपेक्ष्या:--उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए; इतिमन्महे--यह हमारा मत है; ततः--इसलिए; तत्-मूल-खनने--उन्हें समूल नष्ट करने के लिए; नियुड्छ्व--नियुक्त कीजिए;अस्मान्--हमें; अनुब्रतान्-- आपका अनुगमन करने के लिए तत्पर।
फिर भी हमारा मत है कि उनकी शत्रुता के कारण देवताओं के साथ लापरवाही नहीं कीजानी चाहिए।
अतएवं उनको समूल नष्ट करने के लिए आप हमें उनके साथ युद्ध में लगाइएक्योंकि हम आपका अनुगमन करने के लिए तैयार हैं।
यथामयोडड़्े समुपेक्षितो नृभि-न॑ शक्यते रूढपदश्चिकित्सितुम् ।
यथेन्द्रियग्राम उपेक्षितस्तथारिपुर्महान्बद्धबलो न चाल्यते ॥
३८॥
यथा--जिस तरह; आमय:--रोग; अड्ले--शरीर में; समुपेक्षित: --उपेक्षा किए जाने से; नृभि:--मनुष्यों द्वारा; न--नहीं;शक्यते--समर्थ होता है; रूढ-पदः --गम्भीर होने पर; चिकित्सितुमू--उपचार के योग्य; यथा--जिस तरह; इन्द्रिय-ग्राम: --इन्द्रियाँ; उपेक्षित:--प्रारम्भ में वश में न रखने से; तथा--उसी तरह; रिपु: महान्--बड़ा शत्रु; बद्ध-बलः--बलवान हुआ तो;न--नहीं; चाल्यते--वश में किया जा सकता है।
जिस तरह शुरू में रोग की उपेक्षा करने से वह गम्भीर तथा दुःसाध्य हो जाता है या जिसतरह प्रारम्भ में नियंत्रित न करने से, बाद में इन्द्रियाँ वश में नहीं रहतीं उसी तरह यदि आरम्भ मेंशत्रु की उपेक्षा की जाती है, तो बाद में वह दर्जेय हो जाता है।
मूलं हि विष्णुर्देवानां यत्र धर्म: सनातन: ।
तस्य च ब्रह्मगोविप्रास्तपो यज्ञा: सदक्षिणा: ॥
३९॥
मूलम्ू--आधार; हि--निस्सन्देह; विष्णु:--भगवान् विष्णु हैं; देवानामू--देवताओं के; यत्र--जहाँ; धर्म:--धर्म; सनातन:--शाश्वत, परम्परागत; तस्य--उस ( आधार ) का; च--भी; ब्रह्म--ब्रह्म सभ्यता; गो--गो-रक्षा; विप्रा:--ब्राह्मणणण; तपः--तपस्या; यज्ञा:--यज्ञ; स-दक्षिणा: --समुचित पारिश्रमिक ( दक्षिणा ) समेत |
समस्त देवताओं के आधार भगवान् विष्णु हैं जिनका वास वहीं होता है जहाँ धर्म,परम्परागत संस्कृति, वेद, गौवें, ब्राह्मण, तपस्या तथा दक्षिणायुत यज्ञ होते हैं।
तस्मात्सर्वात्मना राजन्ब्राह्मणान्ब्रह्मवादिन: ।
तपस्विनो यज्ञशीलान्गाश्च हन्मो हविर्दुघा: ॥
४०॥
तस्मातू--इसलिए; सर्व-आत्मना--हर तरह से; राजन्--हे राजन्; ब्राह्मणान्--ब्राह्मणों को; ब्रह्म-वादिन:--विष्णु-केन्द्रितब्रह्मी संस्कृति को बनाए रखने वालों; तपस्विन:--तपस्वी जनों; यज्ञ-शीलान्ू--यज्ञ में लगे रहने वालों को; गा: च--गौवों तथागौवों की रक्षा करने वालों को; हन्म:ः--हम वध करेंगे; हविः-दुघा:--जिनके दूध से यज्ञ में डालने के लिए घी मिलता है
हे राजनू, हम आपके सच्चे अनुयायी हैं, अतः वैदिक ब्राह्मणों, यज्ञ तथा तपस्या में लगेव्यक्तियों तथा उन गायों का, जो अपने दूध से यज्ञ के लिए घी प्रदान करती हैं, वध कर डालेंगे।
विप्रा गावश्च वेदाश्व तप: सत्यं दम: शम: ।
श्रद्धा दया तितिक्षा च क्रतवश्च हरेस्तनू: ॥
४१॥
विप्रा:--ब्राह्मण; गाव: च--तथा गाएँ; वेदा: च--तथा वैदिक ज्ञान; तपः--तपस्या; सत्यम्ू--सत्यता; दमः--इन्द्रिय संयम;शमः--मन का संयम; श्रद्धा-- श्रद्धा; दया--दया; तितिक्षा--सहिष्णुता; च-- भी; क़तवः च--तथा यज्ञ भी; हरे: तनू: --भगवान् विष्णु के शरीर के विभिन्न अंग हैं।
ब्राह्मण, गौवें, वैदिक ज्ञान, तपस्या, सत्य, मन तथा इन्द्रियों का संयम, श्रद्धा, दया,सहिष्णुता तथा यज्ञ--ये भगवान् विष्णु के शरीर के विविध अंग हैं और दैवी सभ्यता के ये हीसाज-सामान हैं।
स हि सर्वसुराध्यक्षो हासुरद्विड्गुहाशय: ।
तन्मूला देवता: सर्वाः सेश्वरा: सचतुर्मुखा: ।
अयं बै तद्ठधोपायो यहषीणां विहिंसनम् ॥
४२॥
सः--वह ( विष्णु ); हि--निस्सन्देह; सर्व-सुर-अध्यक्ष: --सारे देवताओं का अगुवा; हि--निस्सन्देह; असुर-द्विटू-- असुरों काशत्रु; गुहा-शय:--हर एक के हृदय के भीतर का परमात्मा; तत्-मूला:--उसके चरणकमलों में शरण लेकर; देवता: --सारे देवता जीवित हैं; सर्वाः--वे सभी; स-ईश्वराः--शिव समेत; स-चतु:-मुखा:--तथा चार मुखों वाले ब्रह्मा भी; अयम्--यह है;बै--निस्सन्देह; तत्-बध-उपाय:--उसके ( विष्णु के ) मारने का एकमात्र उपाय; यत्--जो; ऋषीणाम्--ऋषियों -मुनियों अथवावैष्णवों का; विहिंसनम्--सभी प्रकार के दण्ड द्वारा दमन।
प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में वास करने वाले परमात्मा स्वरूप भगवान् विष्णु असुरों के परमशत्रु हैं और इसीलिए वे असुरद्दिट् कहलाते हैं।
वे सारे देवताओं के अगुआ हैं क्योंकि भगवान्शिव तथा भगवान् ब्रह्मा समेत सारे देवता उन्हीं के संरक्षण में रह रहे हैं।
बड़े-बड़े ऋषि, साधुतथा वैष्णव भी उन्हीं पर आश्रित रहते हैं।
अतः वैष्णवों का उत्पीड़न करना ही विष्णु को मारनेका एकमात्र उपाय है।
श्रीशुक उबाचएवं दुर्मन्त्रभि: कंस: सह सम्मनत्रय दुर्मति: ।
ब्रह्महिंसां हित॑ मेने कालपाशाबृतोसुरः ॥
४३॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; दुर्मन्त्रभि:--अपने बुरे मंत्रियों के; कंसः--राजा कंस;सह--साथ; सम्मन्त्य--विस्तार से विचार-विमर्श करके; दुर्मतिः--बुद्धिहीन; ब्रह्म-हिंसाम्--ब्राह्मणों के उत्पीड़न को; हितम्--सर्वोत्कृष्ट उपाय के रूप में; मेने--मान लिया; काल-पाश-आवृत:--यमराज के विधि-विधानों से बँधा हुआ; असुरः --असुरहोने के कारण
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस प्रकार अपने बुरे मंत्रियों की सलाह पर विचार करकेयमराज के नियमों से बँधा हुआ होने तथा असुर होने से बुद्धिहीन उस कंस ने सौभाग्य प्राप्तकरने के उद्देश्य से साधु-पुरुषों तथा ब्राह्मणों को सताने का निश्चय किया।
सन्दिश्य साधुलोकस्य कदने कदनप्रियान् ।
कामरूपधरान्दिक्षु दानवान्गृहमाविशत् ॥
४४॥
सन्दिश्य--अनुमति देकर; साधु-लोकस्य--साथधु पुरुषों के; कदने--सताने में; कदन-प्रियान्ू--अन्यों को सताने में प्रिय असुरोंको; काम-रूप-धरान्-- अपनी इच्छानुसार कोई भी रूप धारण करने में समर्थ; दिक्षु--सारी दिशाओं में; दानवान्-- असुरों को;गृहम् आविशत्--कंस अपने महल में चला गया |
कंस के अनुयायी ये राक्षसगण अन्यों को, विशेष रूप से वैष्णवों को सताने में दक्ष थे औरइच्छानुसार कोई भी रूप धर सकते थे।
इन असुरों को सभी दिशाओं में जाकर साधु पुरुषों कोसताने की अनुमति देकर कंस अपने महल के भीतर चला गया।
ते वै रज:प्रकृतयस्तमसा मूढचेतस: ।
सतां विद्वेषमाचेरुरारादागतमृत्यवः ॥
४५॥
ते--वे असुर मंत्रीगण; बै--निस्सन्देह; रज:-प्रकृतयः --रजोगुणी प्रकृति के कारण; तमसा--तमोगुण से परिपूर्ण; मूढ-चेतस:--मूर्ख व्यक्ति; सताम्--साधु पुरुषों को; विद्वेषम्--सताना, उत्पीड़न; आचेरु:--सम्पन्न किया; आरातू् आगत-मृत्य-वबः-मृत्यु पहले से ही जो उनके निकट थी।
रजो तथा तमोगुण से पूरित तथा अपने हित या अहित को न जानते हुए उन असुरों ने,जिनकी मृत्यु उनके सिर पर नाच रही थी, साधु पुरुषों को सताना प्रारम्भ कर दिया।
आयु: श्रियं यशो धर्म लोकानाशिष एव च ।
हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रम: ॥
४६॥
आयुः--उम्र; अ्रियम्--सौन्दर्य; यश: --यश; धर्मम्--धर्म; लोकान्--स्वर्गलोक को जाना; आशिष: --आशीर्वाद; एब--निस्सन्देह; च-- भी; हन्ति--विनष्ट करता है; श्रेयांसि--वर; सर्वाणि--सारे; पुंसः--किसी व्यक्ति के; महत्-अतिक्रम:--महापुरुषों के विरुद्ध जाना।
हे राजनू, जब कोई व्यक्ति महापुरुषों को सताता है, तो उसकी दीर्घायु, सौन्दर्य, यश, धर्म,आशीर्वाद तथा उच्चलोकों को जाने के सारे वर विनष्ट हो जाते हैं।
