← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय चवालीसवाँ: कंस का वध

10.44श्रीशुक उबाचएवं चर्चितसड्डल्पो भगवान्मधुसूदन: ।

आससादाथ चणूरं मुप्टितकं रोहिणीसुतः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; चर्चित--स्थिर करते हुए; सद्जूल्प:--अपना संकल्प;भगवानू-- भगवान्‌; मधुसूदन:--कृष्ण ने; आससाद--मुठभेड़ की; अथ--तत्पश्चात्‌; चाणूरम्‌--चाणूर से; मुष्टिकम्‌--मुष्टिकसे; रोहिणी-सुतः--रोहिणी के पुत्र, बलराम ने

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह सम्बोधित किये जाने पर कृष्ण ने इस चुनौती कोस्वीकार करने का मन बना लिया।

उन्होंने चाणूर को और भगवान्‌ बलराम ने मुपष्टिक को अपनाप्रतिद्वन्द्वी चुना।

हस्ताभ्यां हस्तयोरब॑द्ध्वा पदृभ्यामेव च पादयो: ।

विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्या वजिगीषया ॥

२॥

हस्ताभ्याम्‌-हाथों से; हस्तयो:--हाथों द्वारा; बद्ध्वा--पकड़कर; पद्भ्यामू--पाँवों से; एव च-- भी; पादयो: -- अपने पैरों से;विचकर्षतु:--वे घसीटने लगे ( कृष्ण चाणूर को तथा बलराम मुष्टिक को ); अन्योन्यम्‌--एक-दूसरे को; प्रसह्या--बलपूर्वक;विजिगीषया--विजय की इच्छा से |

एक-दूसरे के हाथों को पकड़ कर और एक-दूसरे के पाँवों को फँसा कर ये प्रतिद्वन्द्दीविजय की अभिलाषा से बलपूर्वक संघर्ष करने लगे।

अरली द्वे अरलिभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी ।

शिरः शीष्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतु: ॥

३॥

अरली--मुट्टियों के विरुद्ध; द्वे--दो; अरलिभ्याम्‌--उनकी मुट्टियों से; जानुभ्यामू--उनके घुटनों से; च एब-- भी; जानुनी--विपक्षी के घुटनों के विरुद्ध; शिर:--सिर; शीर्ष्णा--सिर से; उरसा--छाती से; उरः--छाती; तौ--वे जोड़ियाँ; अन्योन्यम्‌--एक-दूसरे पर; अभिजष्नतु:--प्रहार करने लगीं वे एक-दूसरे से मुट्ठियों से मुट्टियाँ, घुटनों से घुटनें, सिर से सिर तथा छाती से छाती भिड़ाकर प्रहार करने लगे।

परिभ्रामणविक्षेपपरिरम्भावपातनै: ।

उत्सर्पणापसर्पणै ्षान्योन्यं प्रत्यरुन्धताम्‌ ॥

४॥

परिभ्रामण--एक-दूसरे के चारों ओर घूमते हुए; विक्षेप-- धक्का देते; परिरम्भ--कुचलते; अवपातनैः--तथा नीचे गिराते हुए;उत्सर्पण--छोड़कर फिर दौड़ना; अपसर्पणै:--पीछे जाकर; च--तथा; अन्योन्यम्‌--एक-दूसरे को; प्रत्यरून्धताम्‌--प्रतिरोध याबचाव करने लगे।

प्रत्येक कुश्ती लड़ने वाला अपने विपक्षी को खींचकर चक्कर लगवाता, धक्के देकर उसे नीचेगिरा देता ( पटक देता ) और उसके आगे तथा पीछे दौड़ता।

उत्थापनैरुन्नयनैश्चालनै: स्थापनैरपि ।

परस्परं जिगीषन्तावपचक्रतुरात्मन: ॥

५॥

उत्थापनैः--ऊपर उठा लेने से; उन्नयनैः:--कंधे पर उठाने से; चालनैः--आगे धकेलने से; स्थापनै:--एक स्थान पर अटका देनेसे; अपि-- भी; परस्परम्‌--एक-दूसरे को; जिगीषन्तौ--विजय चाहते हुए; अपचक्रतु:--हानि पहुँचाया; आत्मन:--अपने आपतक को।

एक-दूसरे को बलपूर्वक उठाकर, ले जाकर, धकेलकर तथा पकड़कर, कुश्ती लड़ने वालेविजय की महती आकांक्षा से अपने शरीरों को भी चोट पहुँचा बैठते।

तद्दबलाबलवद्युद्धं समेता: सर्वयोषित:ः ।

ऊचुः परस्परं राजन्सानुकम्पा वरूथशः ॥

६॥

तत्‌--वह; बल-अबल--बली तथा निर्बल; वत्‌--के बीच; युद्धम्‌ू-- लड़ाई; समेता: --एकत्र; सर्व--सभी; योषित:--स्त्रियोंने; ऊचु:--कहा; परस्परम्‌--एक-दूसरे से; राजन्‌--हे राजन्‌ ( परीक्षित ); स-अनुकम्पा: --दया का अनुभव करती;वरूथश:--झुंड की झुंड।

हे राजन, वहाँ पर उपस्थित सारी स्त्रियों ने बलवान्‌ तथा निर्बल के बीच होने वाली इसअनुचित लड़ाई पर विचार करते हुए दया के कारण अत्यधिक चिन्ता का अनुभव किया।

वेअखाड़े के चारों ओर झुंड की झुंड एकत्र हो गईं और परस्पर इस तरह बातें करने लगीं।

महानयं बताधर्म एषां राजसभासदाम्‌ ।

ये बलाबलवच्युद्धं राज्ञोडन्विच्छन्ति पश्यत: ॥

७॥

महान्‌--महान; अयम्‌--यह; बत--हाय; अधर्म:--अधर्म का कार्य; एषाम्‌--इनके लिए; राज-सभा--राजा की सभा में;सदाम्‌--उपस्थित लोग; ये--जो; बल-अबल-वत्‌--बली तथा निर्बल के बीच; युद्धम्‌--युद्ध; राज्ञ:--जबकि राजा;अन्विच्छन्ति--वे भी चाहते हैं; पश्यत:--देख रहा है।

स्त्रियों ने कहा हाय! इस राजसभा के सदस्य यह कितना बड़ा अधर्म कर रहे हैं! जिसतरह राजा बलवान तथा निर्बल के मध्य इस युद्ध को देख रहा है, वे भी उसी तरह इसे देखनाचाहते हैं।

क्व वज़सारसर्वाड्रौ मल्‍लौ शैलेन्द्रसन्निभौ ।

क्व चातिसुकुमाराड्ठो किशोरौ नाप्तयौवनौ ॥

८॥

क्व--कहाँ तो; वज़--वज़ के; सार--बल से; सर्व--सभी; अड्लौ--अंग वाले; मलल्‍लौ--कुश्ती लड़ने वाले दोनों; शैल--पर्वत; इन्द्र--प्रधान की तरह; सन्निभौ--जिनके स्वरूप; क्व--कहाँ; च--तथा; अति--अ त्यन्त; सु-कुमार--कोमल; अड्रौ --अंग वाले; किशोरौ--दोनों किशोर; न आप्त--अभी भी प्राप्त नहीं किया; यौवनौ--युवावस्था |

कहाँ ये वज्ज जैसे पुष्ट अंगों वाले तथा शक्तिशाली पर्वतों जैसे शरीर वाले दोनों पेशेवरपहलवान और कहाँ ये सुकुमार अंगों वाले किशोर अल्प-वयस्क बालक ?

धर्मव्यतिक्रमो हास्य समाजस्य श्वुवं भवेत्‌ ।

यत्राधर्म: समुन्तिष्ठेन्न स्थेयं तत्र कहिंचित्‌ ॥

९॥

धर्म--धर्म का; व्यतिक्रम:--उल्लंघन; हि--निस्सन्देह; अस्य--इस; समाजस्य--समाज का; ध्रुवम्‌--निश्चित रूप से; भवेत्‌--होगा; यत्र--जिसमें; अधर्म:--अधर्म ; समुत्तिष्ठेत्‌--पूरी तरह उदित हुआ है; न स्थेयम्‌--नहीं रहना चाहिए; तत्र--वहाँ;कह्िंचितू-- क्षण-भर भी |

इस सभा में धर्म का निश्चय ही अति-क्रमण हो चुका है।

जहाँ अधर्म पल रहा हो उस स्थानमें एक पल भी नहीं रुकना चाहिए।

न सभां प्रविशेत्प्राज्ञ: सभ्यदोषाननुस्मरन्‌ ।

अब्लुवन्विब्लुवन्नज्ञो नर: किल्बिषमश्नुते ॥

१०॥

न--नहीं; सभामू--सभा में; प्रविशेत्‌--प्रवेश करे; प्राज्ञ:ः --चतुर व्यक्ति; सभ्य--सभा के सदस्यों की; दोषान्‌--पापपूर्णत्रुटियों को; अनुस्मरन्‌ू-मन में लाते हुए; अब्लुवन्‌--न बोलते हुए; विब्रुवन्‌--गलत बोलते हुए; अज्ञ:--अज्ञानी ( या बननेवाला ); नरः--मनुष्य; किल्बिषम्‌--पाप; अश्नुते--करता है ।

बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि यदि वह जान ले कि किसी सभा के सभासद अनुचितकार्य कर रहे हैं, तो वह उस सभा में प्रवेश न करे।

और यदि ऐसी सभा में प्रवेश कर लेने पर वहसत्यभाषण करने से चूक जाता है, या मिथ्या भाषण करता है या अज्ञानता की दुहाई देता है, तो वह निश्चित ही पाप का भागी बनता है।

बल्गतः शत्रुमभितः कृष्णस्थ वदनाम्बुजम्‌ ।

वीक्ष्यतां श्रमवार्युप्तं पद्यकोशमिवाम्बुभि: ॥

११॥

बल्गत:--कूदते हुए; शत्रुम्‌ू--अपने शत्रु को; अभित:--चारों ओर; कृष्णस्य--कृष्ण का; वदन--मुख; अम्बुजम्‌--'कमलवत्‌; वीक्ष्यताम्‌--जरा देखो तो; श्रम--थकान के; वारि--जल से; उप्तम्‌--आच्छादित; पद्य--कमल के फूल के;कोशम्‌--दलपुंज; इव--सहृश; अम्बुभि:--जल की बूँदों से |

अपने शत्रु के चारों ओर उछलते-कूदते कृष्ण के कमलमुख को तो जरा देखो! भीषणलड़ाई लड़ने से आये हुए पसीने की बूँदों से ढका यह मुख ओस से आच्छादित कमल जैसा लगरहा है।

कि न पश्यत रामस्य मुखमाताप्रलोचनम्‌ ।

मुष्टिकं प्रति सामर्ष हाससंरम्भशोभितम्‌ ॥

१२॥

किमू--क्‍्यों; न पश्यत--नहीं देखती; रामस्थ--बलराम के; मुखम्‌--मुख को; आताग्र--ताँबे जैसी; लोचनम्‌--आँखों वाले;मुष्टिकम्‌--मुष्टिक के; प्रति--प्रति; स-अमर्षम्‌--क्रो ध से युक्त; हास--अपनी हँसी; संरम्भ--तथा अपनी तल्लीनता से;शोभितम्‌--शोभा पा रहे।

क्या तुम भगवान्‌ बलराम के मुख को नहीं देख रही हो जो मुष्टिक के प्रति उनके क्रोध केकारण ताँबे जैसी लाल लाल आँखों से युक्त है और जिसकी शोभा उनकी हँसी तथा युद्ध मेंउनकी तललीनता के कारण बढ़ी हुई है?

पुण्या बत ब्रजभुवो यदयं नूलिड्र-गूढः पुराणपुरुषो वनचित्रमाल्य: ।

गा: पालयन्सहबल: क्वणयंश्र वेणुंविक्रीदयाञ्जति गिरित्ररमार्चिताडूप्रि: ॥

१३॥

पुण्या:--पवित्र; बत--निस्सन्देह; ब्रज-भुवः--व्रज-भूमि के विविध भाग; यत्‌--जिसमें; अयम्‌--यह; नू--मनुष्य के;लिड्ग--गुणों से; गूढः--छिपा; पुराण-पुरुष:--आदि-भगवान्‌; वन-- फूलों तथा वनस्पतियों से बनी; चित्र--अद्भुत प्रकारकी; माल्य:--मालाएँ; गा: --गौवें; पालयन्‌--चराते हुए; सह--साथ में; बल:--बलराम; क्वणयन्‌--बजाते; च--तथा;वेणुमू-- अपनी वंशी; विक्रीडया--विविध लीलाओं से; अज्ञति--इधर-उधर घूमता है; गिरित्र--शिवजी; रमा--लक्ष्मीजी द्वारा;अर्चित--पूजित; अड्धूप्रि:--चरण।

ब्रज के भूमि-खण्ड कितने पवित्र हैं जहाँ आदि-भगवान्‌ मनुष्य के वेश में विचरण करते हुए अनेक लीलाएँ करते हैं।

जो नाना प्रकार की वनमालाओं से अद्भुत ढंग से विभूषित हैं एवंजिनके चरण शिवजी तथा देवी रमा द्वारा पूजित हैं, वे बलराम के साथ गौवें चराते हुए अपनीवंशी बजाते हैं।

गोप्यस्तप: किमचरन्यदमुष्य रूप॑लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्‌ ।

हमग्भि: पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप-मेकान्तधाम यशसः श्रीय ऐश्वरस्य ॥

१४॥

गोप्य:--गोपियों ने; तप:--तपस्या; किमू--कौन-सी; अचरन्‌--सम्पन्न की; यत्‌--जिससे; अमुष्य--ऐसे ( कृष्ण ) के;रूपम्‌--स्वरूप को; लावण्य-सारम्‌--सुन्दरता के सार; असम-ऊर्ध्वम्‌ू--जिसकी समता न की जा सके या जिसको पछाड़ा नजा सके; अनन्य-सिद्धम--किसी अन्य आभूषण से पूरा न होने वाला ( आत्म-सिद्ध ); दग्भिः--आँखों से; पिबन्ति--पीती हैं;अनुसव-अभिनवमू--निरन्तर नवीन; दुरापमू--प्राप्त करना कठिन; एकान्त-धाम--एकमात्र धाम; यशसः--यश का; थ्रिय:--सौन्दर्य का; ऐश्वरस्थ--ऐश्वर्य का।

आखिर गोपियों ने कौन-सी तपस्याएँ की होंगी? वे निरन्तर अपनी आँखों से कृष्ण के उसरूप का अमृत-पान करती हैं, जो लावण्य का सार है और जिसकी न तो बराबरी हो सकती है नही जिससे बढ़कर और कुछ है।

वही लावण्य सौन्दर्य, यश तथा ऐश्वर्य का एकमात्र धाम है।

यहस्वयंसिद्ध, नित्य नवीन तथा अत्यन्त दुर्लभ है।

या दोहनेवहनने मथनोपलेप-प्रेड्डेड्डनार्भरुदितोक्षणमार्जनादौ ।

गायन्ति चैनमनुरक्तधियो श्रुकण्ठ्योधन्या ब्रजस्त्रिय उरुक्रमचित्तयाना: ॥

१५॥

या:--जो ( गोपियाँ ); दोहने--दुहते समय; अवहनने--कूटते; मथन--मथते हुए; उपलेप--लेप करते; प्रेड्ड--झूलों पर;इब्लुन--झूलते; अर्भ-रुदित--रोते शिशुओं ( की देखभाल करते ); उक्षण--छिड़कते; मार्जन--धोते हुए; आदौ--इत्यादि;गायन्ति--गाती हैं; च--तथा; एनम्‌--उससे; अनुरक्त-- अत्यधिक अनुरक्त; धियः--मन; अश्रु--अश्रु सहित; कण्ठ्य:--गले;धन्या:-- भाग्यशाली; ब्रज-स्त्रियः:--व्रज की स्त्रियाँ; उरुक़म--कृष्ण की; चित्त--चेतना से; याना:--इच्छित की प्राप्ति

ब्रज की स्त्रियाँ परम भाग्यशाली हैं क्योंकि कृष्ण के प्रति पूर्णतया अनुरक्त चित्तों से तथाअश्रुओं से सदैव अवरुद्ध कण्ठों से वे गौवें दुहते, अनाज कूटते, मक्खन मथते, ईंधन के लिएगोबर एकत्र करते, झूलों पर झूलते, अपने रोते बालकों की देखरेख करते, फर्श पर जलछिड़कते, अपने घरों को बुहारते इत्यादि के समय निरन्तर उनके गुणों का गान करती हैं।

अपनीउच्च कृष्ण-चेतना के कारण वे समस्त वाँछित वस्तुएँ स्वतः प्राप्त कर लेती हैं।

प्रातर्त्रजादूत्रजत आविशतश्च सायंगोभि: सम॑ क्वणयतोउस्य निशम्य वेणुम्‌ ।

निर्गम्य तूर्णमबला: पथ भूरिपुण्याः'पश्यन्ति सस्मितमुखं सदयावलोकम्‌ ॥

१६॥

प्रात:--प्रातःकाल; ब्रजात्‌--ब्रज से; ब्रजत:--जाने वाले का; आविशत: -- प्रवेश करते; च--तथा; सायम्‌--संध्या-समय;गोभि: समम्‌--गौवों के साथ; क्वणयतः--बजाते हुए; अस्थ--इसकी; निशम्य--सुनकर; वेणुम्‌--बाँसुरी को; निर्गम्य--बाहर निकलकर; तूर्णम्‌ू--तेजी से; अबला:--स्त्रियाँ; पथि--मार्ग पर; भूरि--अत्यन्त; पुण्या:--पवित्र; पश्यन्ति--देखती हैं;स--सहित; स्मित--हँसते हुए; मुखम्‌ू--मुख को; स-दय--दयामय; अवलोकम्‌--चितवनों से |

प्रातःकाल कृष्ण को अपनी गौवों के साथ ब्रज से बाहर जाते या संध्या-समय उनके साथलौटते हुए और अपनी बाँसुरी को बजाते हुए जब गोपियाँ सुनती हैं, तो उन्हें देखने के लिए वेअपने अपने घरों से तुरन्त बाहर निकल आती हैं।

मार्ग पर चलते समय, उन पर दयापूर्ण दृष्टिडालते हुए उनके हँसी से पूर्ण मुख को देखने में सक्षम होने के लिए, उन सबों ने अवश्य हीअनेक पुण्य-कर्म किये होंगे।

एवं प्रभाषमाणासु स्त्रीषु योगेश्वरो हरि: ।

शत्रु हन्तुं मनश्चक्रे भगवान्भरतर्षभ ॥

१७॥

एवम्‌--इस प्रकार; प्रभाषमाणासु--बोलती हुई; स्त्रीषु--स्त्रियों के; योग-ई श्वरः-- समस्त योग-शक्ति के स्वामी; हरि:ः--कृष्णने; शत्रुम्‌--अपने शत्रु को; हन्तुमू--मारने के लिए; मनः चक्रे--अपना मन बनाया; भगवानू-- भगवान्‌; भरत-ऋषभ-हेभरत-श्रेष्ठ

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा हे भरत-श्रेष्ठ, जब स्त्रियाँ इस तरह बोल रही थीं तोसमस्त योग-शक्ति के स्वामी भगवान्‌ कृष्ण ने अपने शत्रु को मार डालने का निश्चय कर लिया।

सभया: स्त्रीगिर: श्रुत्वा पुत्रस्नेशशुचातुरो ।

पितरावन्वतप्येतां पुत्रयोरबुधौ बलम्‌ ॥

१८॥

स-भया: -- भयभीत; स्त्री--स्त्रियों के; गिर:ः--शब्द; श्रुत्वा--सुनकर; पुत्र--अपने पुत्रों के; स्नेह--स्नेह से; शुच्च--शोक से;आतुरौ--विह्ल; पितरौ--उनके माता-पिता ( देवकी तथा वसुदेव ); अन्वतप्येताम्‌--सन्‍्ताप का अनुभव करते; पुत्रयो: --अपनेदोनों पुत्रों के; अबुधौ--न जानते हुए; बलम्‌--बल को |

दोनों भगवानों पर स्नेह होने के कारण उनके माता-पिता ( देवकी तथा वसुदेव ) ने जबस्त्रियों के भयपूर्ण वचन सुने तो वे शोक से विह्ल हो उठे।

वे अपने पुत्रों के बल को न जाननेके कारण सनन्‍्तप्त हो गए।

तैस्तैर्नियुद्धविधिभिर्विविधेरच्युतेतरी ।

युयुधाते यथान्योन्यं तथेव बलमुष्टिकौ ॥

१९॥

तैः तैः--इन सबों से; नियुद्ध--कुश्ती लड़ने की; विधिभि: --विधियों से; विविधै: --नाना प्रकार की; अच्युत-इतरौ--अच्युततथा उसके प्रतिद्वन्द्दी ने; युयुधाते--युद्ध किया; यथा--जिस तरह; अन्योन्यम्‌--एक-दूसरे से; तथा एब--उसी तरह; बल-मुष्टिकौ--बलराम तथा मुष्टिक

भगवान्‌ बलराम तथा मुष्टिक ने मल्लयुद्ध की अनेक शैलियों का कुशलतापूर्वक प्रदर्शनकरते हुए एक-दूसरे से उसी तरह युद्ध किया जिस तरह कृष्ण तथा उनके प्रतिपक्षी ने किया।

भगवदगात्रनिष्पातैर्वज़नीष्पेषनिष्ठरै: ।

चाणूरो भज्यमानाज़ो मुहुग्लानिमवाप ह ॥

२०॥

भगवत्‌-- भगवान्‌ का; गात्र--अंगों द्वारा; निष्पातै:--वारों से; वज्ञ--वज् के; निष्पेष-- धमाके की तरह; निष्ठरै:--कठोर;चाणूर:--चाणूर; भज्यमान-- भंग किया गया; अड्ढड:--सारा शरीर; मुहुः--अधिकाधिक; ग्लानिमू-- पीड़ा तथा थकान; अवापह--अनुभव किया।

भगवान्‌ के अंगों से होने वाले कठोर बार चाणूर पर वज्रपात सहश लग रहे थे जिससे उसकेशरीर का अंग-प्रत्यंग चूर हो रहे थे और उसे अधिकाधिक पीड़ा तथा थकान उत्पन्न हो रही थी।

स एयेनवेग उत्पत्य मुष्टीकृत्य करावुभौ ।

भगवन्तं वासुदेवं क्रुद्धो वक्षस्यताधत ॥

२१॥

सः--वह, चाणूर; श्येन--बाज की; वेग:--चाल से; उत्पत्य--उसपर टूटते हुए; मुष्टी -- मुट्ठी, मुक्का।

कृत्य--बाँधकर; करौ--हाथ; उभौ--दोनों; भगवन्तमू-- भगवान्‌; वासुदेवम्‌--कृष्ण की; क्रुद्ध: --क्रोधित; वक्षसि--वक्षस्थल पर; अबाधत-प्रहारकिया।

क्रुद्ध चाणूर ने बाज की गति से भगवान्‌ वासुदेव पर आक्रमण किया और उनकी छाती परअपनी दोनों मुट्टियों ( घूँसों ) से प्रहार किया।

नाचलत्तत्प्रहरेण मालाहत इब द्विपः ॥

बाह्वोर्नियूह्य चाणूरं बहुशो भ्रामयन्हरि: ॥

२२॥

भूपृष्ठ पोथयामास तरसा क्षीण जीवितम्‌ ।

विस्त्रस्ताकल्पकेशस्त्रगिन्द्रध्वज इवापतत्‌ ॥

२३॥

न अचलतू--( कृष्ण ) टस से मस नहीं हुए; तत्‌ू-प्रहारेण--उसके प्रहार से; माला--मालाओं से; आहत--मारा गया; इब--सहश; द्विप:--हाथी; बाह्मोः--दो भुजाओं द्वारा; निगृह्--पकड़कर; चाणूरम्‌--चाणूर को; बहुश:--अनेक बार; भ्रामयन्‌--घुमाकर; हरि: -- भगवान्‌ कृष्ण ने; भू--पृथ्वी के; पृष्ठे--ऊपर; पोथयाम्‌ आस--फेंक दिया; तरसा--बलपूर्वक; क्षीण--रहित; जीवितम्‌ू--अपना जीवन; विस्रस्त--बिखरे; आकल्प--वस्त्र; केश--बाल; सत्रकु--तथा फूल की माला; इन्द्र-ध्वज:--ऊँचा लट्ठा; इब--मानो; अपतत्‌--वह गिर पड़ा |

जिस तरह फूल की माला से मारने से हाथी कुछ भी नहीं होता उसी तरह असुर के बलशालीवारों से विचलित न होते हुए भगवान्‌ कृष्ण ने चाणूर की भुजाओं को पकड़कर कई बार चारों ओर घुमाया और उसे बड़े वेग से पृथ्वी पर पटक दिया।

उसके वस्त्र, केश तथा माला बिखर गयेऔर वह पहलवान पृथ्वी पर गिरकर मर गया मानो कोई विशाल उत्सव-स्तम्भ गिर पड़ा हो।

तथेव मुष्टिकः पूर्व स्वमुष्ठयाभिहतेन वे ।

बलभद्रेण बलिना तलेनाभिहतो भूशम्‌ ॥

२४॥

प्रवेषित: स रुधिरमुद्ठमन्मुखतोउर्दित: ।

व्यसु: पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाड्प्रिप: ॥

२५॥

तथा--भी; एव--इसी तरह; मुष्टिक: --मुष्टिक; पूर्वम्‌--इसके पहले; स्व-मुष्ठया--अपने ही घूँसे से; अभिहतेन-- प्रहार कियागया; बै--निस्सन्देह; बलभद्रेण--बलराम द्वारा; बलिना--बलशाली; तलेन--हथेली से; अभिहत: -- प्रहार किया गया;भूशम्‌-तेजी से; प्रवेषित:--काँपते हुए; सः--वह, मुष्टिक; रुधिरम्‌ू--रक्त; उद्दयमनू--वमन करता; मुखतः--मुँह से;अर्दितः--व्यथित; व्यसु:--प्राणरहित; पपात--गिर पड़ा; उर्बी-- भूमि की; उपस्थे--गोद में; वात--वायु द्वारा; आहत: --गिराया गया; इब--सहश; अद्धप्रिप: --वृक्ष |

इसी प्रकार मुष्टिक पर भगवान्‌ बलभद्व ने अपने मुक्के से प्रहार किया और उसका वध करदिया।

बलशाली भगवान्‌ बलभद्र के हाथ का करारा थप्पड़ खाकर वह असुर भारी पीड़ा सेकाँपने लगा और रक्त वमन करने लगा।

तत्पश्चात्‌ निष्प्राण होकर जमीन पर उसी तरह गिर पड़ाजिस तरह हवा के झोंके से कोई वृक्ष धराशायी होता है।

ततः कूटमनुप्राप्तं राम: प्रहरतां वर: ।

अवधील्लीलया राजन्सावज्ञं वाममुष्टिना ॥

२६॥

ततः--तब; कूटम्‌ू--कूट नामक असुर मल्ल; अनुप्राप्तम्‌-वहाँ पर प्रकट हुआ; राम:--बलराम ने; प्रहरताम्‌--योद्धाओं में;वरः-श्रेष्ठ; अवधीत्‌--मार डाला; लीलया--खेल खेल में; राजन्‌--हे राजा, परीक्षित; स-अवज्ञम्‌--उपेक्षित होकर; वाम--बायीं; मुप्टिना--मुट्ठी से |

इसके बाद कूट नामक पहलवान से योद्धाओं में श्रेष्ठ बलराम का सामना हुआ जिसे हेराजन्‌, उन्होंने अपनी बाईं मुट्ठी से खेल खेल में यों ही मार डाला।

तहोंव हि शल: कृष्णप्रपदाहतशीर्षक: ।

द्विधा विदीर्णस्तोशलक उभावपि निपेततु: ॥

२७॥

तहिं एव--और तब; हि--निस्सन्देह; शलः--शल नामक मल्ल; कृष्ण--कृष्ण के; प्रपद--अँगूठे से; आहत--चोट खाकर;शीर्षक: --उसका सिर; द्विधा--दो टूक; विदीर्न:--फटा हुआ; तोशलक--तोशल; उभौ अपि--दोनों ही; निपेततु:--गिर पड़े |

तत्पश्चात्‌ कृष्ण ने अपने पाँव के अँगूठों से शल पहलवान के सिर पर प्रहार करके उसे दो'फाड़ कर दिया।

भगवान्‌ ने तोशल के साथ भी इसी तरह किया और वे दोनों मलल्‍ल धराशायी होगये।

चाणूरे मुष्टिके कूटे शले तोशलके हते ।

शेषाः प्रदुद्गुवुर्मलला: सर्वे प्राणपरीप्सव: ॥

२८ ॥

चाणूरे मुष्टिके कूटे--चाणूर, मुष्टिक तथा कूट के; शले तोशलके--शल तथा तोशल के; हते--मारे जाने पर; शेषा: --बचेहुए; प्रदुद्रुबुः--भाग गये; मल्‍ला:--पहलवान; सर्वे--सभी ; प्राण--अपने प्राण; परीप्सव:--बचाने की आशा से |

चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल तथा तोशल के मारे जाने के बाद बचे हुए पहलवान अपनी जानबचाकर भाग लिये।

गोपान्वयस्यानाकृष्य तैः संसृज्य विजह॒तु: ।

वाद्यमानेषु तूर्येषु वल्गन्तौ रूतनूपुरी ॥

२९॥

गोपानू--ग्वालबाल; वयस्यान्‌ू--उनके वयस्क मित्रगण; आकृष्य--एकत्र करके; तैः--उनके साथ; संसृज्य--मिलकर;विजहतु:--खेला-कूदा; वाद्यमानेषु--बजाते हुए; तूर्येषु--तुरहियों में; वल्गन्तौ--दोनों नाचते हुए; रुत--प्रतिध्वनित करते हुए;नूपुरौ--अपने घुंघरू।

तब कृष्ण तथा बलराम ने अपने समवयस्क ग्वालबाल सखाओं को अपने पास बुलाया औरउनके साथ दोनों भगवानों ने खूब नाच किया और खेला।

उनके घुंघरू वाद्य-यंत्रों की भान्तिध्वनि करने लगे।

जना: प्रजहृषु: सर्वे कर्मणा रामकृष्णयो: ।

ऋते कंसं विप्रमुख्या: साधव: साधु साध्विति ॥

३०॥

जना:--लोगों ने; प्रजहषु;:--खुशी मनाई; सर्वे--सभी; कर्मणा--इस कार्य से; राम-कृष्णयो:--बलराम तथा कृष्ण के;ऋते--सिवाय, अतिरिक्त; कंसम्‌--कंस के; विप्र--ब्राह्मणों के; मुख्या:--सर्व श्रेष्ठ; साधव: --सन्तपुरुष; साधु साधु इति--बहुत अच्छा! बहुत अच्छा! ( कहकर चिल्ला पड़े )।

कंस के अतिरिक्त सभी व्यक्तियों ने कृष्ण तथा बलराम द्वारा सम्पन्न इस अद्भुत कृत्य परहर्ष प्रकट किया।

पूज्य ब्राह्मणों तथा महान्‌ सन्तपुरुषों ने 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा, ' कहा।

हतेषु मल्लवर्येषु विद्वुतेषु च भोजराद्‌ ।

न्यवारयत्स्वतूर्याणि वाक्य चेदमुवाच ह ॥

३१॥

हतेषु--मारे गये; मल्ल-वर्येषु-- श्रेष्ठ पहलवान; विद्गुतेषु -- भगे हुए; च--तथा; भोज-राट्‌ू-- भोजराज, कंस ने; न्यवारयत्‌--रोका; स्व--अपना; तूर्याणि--तुरहियाँ; वाक्यम्‌--शब्द; च--तथा; इृदम्‌ू--यह; उबाच ह--कहा |

जब भोजराज ने देखा कि उसके सर्वश्रेष्ठ पहलवान या तो मारे जा चुके हैं अथवा भाग गयेहैं, तो उसने वाद्य-यंत्रों को बजाना रूकवा दिया जो मूलतः उसके मनोविनोद के लिए बजाये जारहे थे और इस प्रकार के शब्द कहे।

निःसारयत दुर्वृत्तौ वसुदेवात्मजौ पुरात्‌ ।

धनं हरत गोपानां नन्दं बध्नीत दुर्मतिमू ॥

३२॥

निःसारयत--निकाल दो; दुर्वृत्तौ--दुर्व्यवहार करने वाले; बसुदेव-आत्मजौ--वसुदेव के दोनों पुत्रों को; पुरातू--नगरी से;धनम्‌-- धन; हरत--छीन लो; गोपानाम्‌-ग्वालों का; नन्दम्‌--नन्द महाराज को; बध्नीत--बाँध दो; दुर्मतिम्‌--मूर्ख , दुष्ट |

कंस ने कहा : वसुदेव के दोनों दुष्ट पुत्रों को नगरी से बाहर निकाल दो।

ग्वालों कीसम्पत्ति छीन लो और उस मूर्ख नन्‍द को बन्दी बना लो।

वसुदेवस्तु दुर्मेधा हन्यतामा श्रसत्तम: ।

उग्रसेन: पिता चापि सानुगः परपक्षग: ॥

३३॥

बसुदेव:--वसुदेव; तु-- भी; दुर्मेधा--दुर्बुर्द्ि; हन्यताम्‌--मार डाला जाय; आशु--तुरन्‍्त; असतू-तम:--अशुद्ध में निकृष्ट;उग्रसेन:--उग्रसेन; पिता--मेरा पिता; च अपि-- भी; स--सहित; अनुग:--अपने अनुचरों; पर--शत्रु का; पक्ष-ग:--पक्ष लेनेबाला

उस अत्यन्त दुष्ट मूर्ख वसुदेव को मार डालो! और मेरे पिता उग्रसेन को भी उसकेअनुयायियों सहित मार डालो क्योंकि उन सब ने हमारे शत्रुओं का पश्ष लिया है।

एवं विकत्थमाने वै कंसे प्रकुपितोव्यय: ।

लघिम्नोत्पत्य तरसा मझ्ञमुत्तुड्रमारुहत्‌ ॥

३४॥

एवम्‌--इस प्रकार; विकत्थमाने--बढ़-बढ़कर बातें कर रहे; वै--निस्सन्देह; कंसे-- कंस पर; प्रकुपित:--अत्यन्त क्रुद्ध हुए;अव्यय:--अच्युत भगवान्‌ ने; लघिम्ना--आसानी से; उत्पत्य--उछलकर; तरसा--तेजी से; मञ्लम्‌ू--राजमंच पर; उत्तुड्रम्‌--ऊँचे; आरुहत्‌--चढ़ गये जब कंस इस तरह दम्भ से गरज रहा था, तो अच्युत भगवान्‌ कृष्ण अत्यन्त क्रुद्ध होकरतेजी के साथ सरलता से उछलकर ऊँचे राजमंच पर जा पहुँचे।

तमाविशन्तमालोक्य मृत्युमात्मन आसनात्‌ ।

मनस्वी सहसोत्थाय जगूृहे सोडसिचर्मणी ॥

३५॥

तम्‌--उसे, कृष्ण को; आविशन्तम्‌--( निजी बैठक में ) प्रवेश करते हुए; आलोक्य--देखकर; मृत्युम्‌--मृत्यु को; आत्मन:--अपनी; आसनात्‌--अपने आसन से; मनस्वी--प्रखर बुद्धिवाला; सहसा--तुरन्‍्त; उत्थाय--उठकर; जगृहे--ले ली; सः--उसने;असि--अपनी तलवार; चर्मणी--तथा अपनी ढाल।

भगवान्‌ कृष्ण को साक्षात्‌ मृत्यु के समान आते देखकर प्रखर बुद्धिवाला कंस तुरन्त अपनेआसन से उठ खड़ा हुआ और उसने अपनी तलवार तथा ढाल उठा ली।

त॑ं खड़्गपाणिं विचरन्तमाशुएयेनं यथा दक्षिणसव्यमम्बरे ।

समग्रहीदुर्विषहो ग्रतेजायथोरगं ताक्ष्यसुतः प्रसहा ॥

३६॥

तम्‌--उसे, कंस को; खड़्ग--तलवार; पाणिम्‌--हाथ में लिए; विचरन्तम्‌--इधर-उधर घूमते; आशु--तेजी से; श्येनमम्‌--बाजको; यथा--जिस तरह; दक्षिण-सव्यम्‌-दाएँ तथा बाएँ; अम्बरे-- आकाश में; समग्रहीत्‌ू--पकड़ ले; दुर्विषह--दुस्सह; उग्र--तथा भयानक; तेजा:--जिनकी शक्ति; यथा--जिस तरह; उरगमू--साँप को; तार्श््य-सुतः--तार्श््य का पुत्र, गरुड़; प्रसहा--बलपूर्वक

हाथ में तलवार लिए कंस तेजी से एक ओर से दूसरी ओर भाग रहा था जिस तरह आकाश में बाज हो।

किन्तु दुस्सह भयानक शक्ति वाले भगवान्‌ कृष्ण ने उस असुर को बलपूर्वक उसीतरह पकड़ लिया जिस तरह तार्क््य-पुत्र ( गरुड़ ) किसी साँप को पकड़ लेता है।

प्रगृह्य केशेषु चलत्किरीतंनिपात्य रड्ढोपरि तुड़मझात्‌ ।

तस्योपरिष्टात्स्वयमब्जनाभ:पपात विश्वाश्रय आत्मतन्त्र: ॥

३७॥

प्रगृह्दा--पकड़कर; केशेषु--बालों से; चलत्‌--ठोकर मार कर; किरीटम्‌--मुकुट को; निपात्य--फेंककर; रड्ढड-उपरि--अखाड़े के ऊपर; तुड्ढड-- ऊँचे; मञ्ञात्‌ू--मंच से; तस्य--उसके; उपरिष्टात्‌--ऊपर से; स्वयम्‌--स्वयं; अब्ज-नाभ:--कमल-नाभ भगवान्‌ ने; पपात--फेंक दिया; विश्व--ब्रह्माण्ड-भर के; आश्रय: --आधार; आत्म-तन्त्र:--स्वतंत्र |

कंस के बालों को पकड़कर तथा उसके मुकुट को ठोकर मारते हुए कमल-नाभ भगवान्‌ नेउसे ऊँचे मंच से अखाड़े के फर्श पर फेंक दिया।

तत्पश्चात्‌ समस्त ब्रह्माण्ड के आश्रय, स्वतंत्रभगवान्‌ उस राजा के ऊपर कूद पड़े।

त॑ सम्परेतं विचकर्ष भूमौहरिर्यथेभं जगतो विपश्यतः ।

हा हेति शब्दः सुमहांस्तदाभू-दुदीरितः सर्वजनैनरिन्द्र ॥

३८ ॥

तम्‌--उसको; सम्परेतम्‌--मृत; विचकर्ष--घसीटा; भूमौ--पृथ्वी पर; हरिः--सिंह; यथा--जिस तरह; इभम्‌--हाथी को;जगतः--सारे लोगों के; विपश्यतः --देखते देखते; हा हा इति--' हाय हाय ' इस प्रकार; शब्द:--ध्वनि; सु-महान्‌ू--विशाल;तदा--तब; अभूत्‌--उठी; उदीरित:--बोला गया; सर्व-जनैः--सभी लोगों के द्वारा; नर-इन्द्र--हे मनुष्यों के शासक ( राजापरीक्षित ) ॥

जिस तरह सिंह मृत हाथी को घसीटता है उसी तरह भगवान्‌ ने वहाँ पर उपस्थित सारे लोगोंके समक्ष जमीन पर कंस के मृत शरीर को घसीटा।

हे राजन्‌, अखाड़े के सारे लोग तुमुल स्वर में'हाय हाय ' चिल्ला उठे।

स नित्यदोद्विग्नधिया तमी श्वरंपिबन्नदन्वा विचरन्स्वपन्ध्रसन्‌ ।

ददर्श चक्रायुधमग्रतो यत-स्तदेव रूप दुरवापमाप ॥

३९॥

सः--उसने, कंस ने; नित्यदा--निरन्तर; उद्विग्न--चिन्तित; धिया--मन से; तमू--उस; ईश्वरम्‌ू--ई श्वर को; पिबन्‌--पानी पीते;अदनू-- भोजन करते; वा--अथवा; विचरनू-- घूमते हुए; स्वपन्‌--सोते हुए; श्रसन्‌--साँस लेते; दरदर्श--देखा; चक्र--चक्र ;आयुधम्‌-- अपने हाथ में; अग्रत:--अपने समक्ष; यत:--क्योंकि; तत्‌ू--वह; एब--वही; रूपमू--साकार रूप को;दुरवापम्‌-दुर्लभ; आप--प्राप्त किया

कंस इस विचार से सदैव विचलित रहता था कि भगवान्‌ द्वारा उसका वध होने वाला है।

अतः वह खाते, पीते, चलते, सोते, यहाँ तक कि साँस लेते समय भी भगवान्‌ को अपने समक्षहाथ में चक्र धारण किये देखा करता था।

इस तरह कंस ने भगवान्‌ जैसा रूप ( सारूप्य ) प्राप्तकरने का दुर्लभ वर प्राप्त किया।

तस्यानुजा भ्रातरोषष्टौ कड्डन्यग्रोधकादय: ।

अभ्यधावज्नतिक्रुद्धा भ्रातुर्निवेशकारिण: ॥

४०॥

तस्य--उसके, कंस के; अनुजा:--छोटे; भ्रातर:-- भाई; अष्टौ--आठ; कड्जू-न्यग्रोधक-आदय:--कंक, न्यग्रोधक इत्यादि;अभ्यधावन्‌--आक्रमण करने दौड़े; अति-क्रुद्धाः:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; भ्रातु:--अपने भाई के प्रति; निर्वेश--उऋण;कारिण:--होने के लिए

तत्पश्चात्‌ कंक, न्यग्रोधक इत्यादि कंस के आठ भाइयों ने क्रोध में आकर अपने भाई काबदला लेने के लिए उन दोनों भगवानों पर आक्रमण कर दिया।

तथातिरभसांस्तांस्तु संयत्तात्रोहिणीसुतः ।

अहन्परिधमुद्यम्य पशूनिव मृगाधिप: ॥

४१॥

तथा--इस तरह से; अति-रभसान्‌--तेजी से दौड़ते; तान्‌ू--उन्हें; तु--तथा; संयत्तान्‌-- प्रहार करने के लिए उद्यत; रोहिणी-सुतः--रोहिणी-पुत्र बलराम ने; अहन्‌--मार गिराया; परिघम्‌-- अपनी गदा; उद्यम्य-- भाँज कर; पशून्‌ू-- पशुओं को; इब--सहश; मृग-अधिप:--पशुओं का राजा, सिंह।

ज्योंही आक्रमण करने के लिए तैयार होकर वे सभी उन दोनों भगवानों की ओर तेजी सेदौड़े तो रोहिणी-पुत्र ने अपनी गदा से उन सबों को उसी तरह मार डाला जिस तरह सिंह अन्यपशुओं को आसानी से मार डालता है।

नेदुर्दुन्दुभयो व्योम्नि ब्रहोशाद्या विभूतय: ।

पुष्पै: किरन्तस्तं प्रीता: शशंसुर्ननृतुः स्त्रियः ॥

४२॥

नेदु:--बज उठीं; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ; व्योग्नि--आकाश में; ब्रह्म-ईश-आद्या: --ब्रह्मा, शिव इत्यादि देवतागण; विभूतय:--अपने अंश; पुष्पैः --फूलों के द्वारा; किरन्तः--बिखेरते हुए; तम्‌--उस पर; प्रीता:--प्रसन्न; शशंसु:--उनकी प्रशंसा में गानागाया; ननृतुः--नाची ; स्त्रियः--उनकी पत्लियाँ

जिस समय ब्रह्मा, शिव तथा भगवान्‌ के अंश-रूप अन्य देवताओं ने हर्षित होकर उन पर'फूलों की वर्षा की उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं।

वे सभी उनका यश-गान करनेलगे और उनकी पत्लियाँ नाचने लगीं।

तेषां स्त्रियो महाराज सुहन्मरणदु:खिता: ।

तत्राभीयुर्विनिध्नन्त्यः शीर्षाण्यश्रुविलोचना: ॥

४३॥

तेषाम्‌--उनकी ( कंस तथा उसके भाइयों की ); स्त्रियः--पत्नियाँ; महाराज--हे राजन्‌ ( परीक्षित ); सुहृत्‌--शुभचिन्तकों( पत्नियों ) के; मरण-- मृत्यु के कारण; दुःखिता:--दुखित; तत्र--उस स्थान पर; अभीयु: --पहुँचे; विनिध्नन्त्य:--पीटते हुए;शीर्षाणि--- अपने सिर; अश्रु--आँसू से युक्त; विलोचना:--उनकी आँखें

हे राजनू, कंस तथा उसके भाइयों की पत्नियाँ अपने अपने शुभचिन्तक पतियों की मृत्यु सेशोकाकुल होकर अपने सिर पीटती हुई तथा आँखों में आँसू भरे वहाँ पर आईं।

शयानान्वीरशयायां पतीनालिड्ग्य शोचतीः ।

बिलेपु: सुस्वरं नार्यो विसृजन्त्यो मुहु:ः शुच्च: ॥

४४॥

शयानान्‌--लेटे हुए; वीर--वीर की; शयायाम्‌--शय्या पर ( भूमि पर ); पतीन्‌-- अपने अपने पतियों को; आलिड्ग्य--चूमकर; शोचती:--शोक का अनुभव करतीं; विलेपु:--विलाप करने लगीं; सु-स्वरम्‌--जोर-जोर से; नार्य:--स्त्रियाँ;विसूजन्त्य:--गिराती हुई; मुहुः--बारम्बार; शुचः--आँसू।

वीरों की मृत्यु शय्या पर लेटे अपने पतियों का आलिंगन करते हुए शोकमग्न स्त्रियाँ आँखोंसे निरन्तर अश्रु गिराती हुईं जोर-जोर से विलाप करने लगीं।

हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ ककणानाथवत्सल ।

त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रजा: ॥

४५॥

ह--हाय; नाथ--हे स्वामी; प्रिय--हे प्यारे; धर्म-ज्ञ--धर्म के ज्ञाता; करूण--हे दयावान्‌; अनाथ--बिना रक्षकों वाले के;वत्सल--हे दयालु; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; हतेन--मारे जाकर; निहता:--मारी जाती हैं; वयम्‌--हम; ते--तुम्हारे; स--सहित;गृह--घर; प्रजा:--तथा सन्‍्तानों |

स्त्रियाँ विलाप करने लगीं : हाय! हे नाथ, हे प्रिय, हे धर्मज्ञ, हे आश्रयहीनों के दयालुरक्षक, तुम्हारा वध हो जाने से हम भी तुम्हारे घर तथा सन्‍्तानों समेत मारी जा चुकी हैं।

त्वया विरहिता पत्या पुरीयं पुरुषर्षभ ।

न शोभते वयमिव निवृत्तोत्सवमड्रला ॥

४६॥

त्वया--तुमसे; विरहिता--बिछुड़कर; पत्या--स्वामी से; पुरी--नगरी; इयम्‌--यह; पुरुष--पुरुषों में; ऋषभ-- श्रेष्ठ वीर; नशोभते--शोभा नहीं देता; वयम्‌--हमको; इब--जिस तरह; निवृत्त--समाप्त; उत्सव--उत्सव; मड़ला--तथा सौभाग्य

हे पुरुषों में श्रेष्ठ वीर, यह नगरी अपने स्वामी तुमसे बिछुड़कर अपना सौन्दर्य उसी प्रकार खोचुकी है, जिस तरह हम खो चुकी हैं और इसके भीतर के सारे हर्षोल्लास तथा सौभाग्य का अन्तहो चुका है।

अनागसां त्वं भूतानां कृतवान्द्रोहमुल्बणम्‌ ।

तेनेमां भो दशां नीतो भूतश्रुक्को लभेत शम्‌ ॥

४७॥

अनागसाम्‌--निष्पाप, निरपराध; त्वमू--तुमने; भूतानाम्‌--प्राणियों के प्रति; कृतवान्‌ू--किया था; द्रोहम्‌--हिंसा; उल्बणम्‌--घोर; तेन--उसी से; इमामू--इस; भो--हे प्रिय; दशाम्‌ू--दशा को; नीतः--लाये गये; भूत--जीवों के प्रति; ध्ुक्‌--क्षतिपहुँचाते हुए; कः--कौन; लभेत--प्राप्त कर सकता है; शम्‌--सुख |

हे प्रिय, तुम्हारी यह दशा इसीलिए हुई है क्योंकि तुमने निर्दोष प्राणियों के प्रति घोर हिंसाकी है।

भला दूसरों को क्षति पहुँचाने वाला कैसे सुख पा सकता है ?

सर्वेषामिह भूतानामेष हि प्रभवाप्यय: ।

गोप्ता च तदवध्यायी न क्वचित्सुखमेधते ॥

४८॥

सर्वेषाम्‌--समस्त; इह--इस जगत में; भूतानाम्‌ू--जीवों का; एष:--यह ( कृष्ण ); हि--निश्चय ही; प्रभव--उद्‌गम;अप्ययः--तथा तिरोधान; गोप्ता--पालक; च--तथा; तत्‌--उसका; अवध्यायी--उपेक्षा करने वाला; न क्वचित्‌--कभी नहीं;सुखम्‌--सुखपूर्वक; एधते--फूलता-फलता है।

भगवान्‌ कृष्ण इस जगत में सारे जीवों को प्रकट करते हैं और उनका संहार करने वाले हैं।

साथ ही वे उनके पालनकर्ता भी हैं।

जो उनका अनादर करता है, वह कभी भी सुखपूर्वक फल-'फूल नहीं सकता।

श्रीशुक उबाचराजयोषित आश्वा स्य भगवॉाललोकभावन: ।

यामाहुलौंकिकीं संस्थां हतानां समकारयत्‌ ॥

४९॥

श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; राज--राजा ( तथा उसके भाइयों ) की; योषित:--पत्लियों को; आश्वास्य--आश्वासन देकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; लोक--समस्त लोकों के; भावन:--पोषणकर्ता; यामू--जो; आहु: --वे ( वेदादि )आदेश देते हैं; लौकिकीम्‌ संस्थाम्‌--लोकरीति, दाह-संस्कार; हतानाम्‌ू--मृतकों के लिए; समकारयत्‌--किये जाने कीव्यवस्था की

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : रानियों को सान्त्वना देने के बाद समस्त जगतों के पालनकर्ताभगवान्‌ कृष्ण ने नियत दाह-संस्कार सम्पन्न किये जाने की व्यवस्था की।

मातरं पितरं चैव मोचयित्वाथ बन्धनात्‌ ।

कृष्णरामौ बवन्दाते शिरसा स्पृश्य पादयो: ॥

५०॥

मातरम्‌ू--अपनी माता को; पितरम्‌--पिता को; च--तथा; एव-- भी; मोचयित्वा--छुड़ाकर; अथ--तब; बन्धनात्‌ू--हथकड़ी,बेड़ी से; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम ने; ववन्दाते--नमस्कार किया; शिरसा--सिर से; स्पृश्य--छूकर; पादयो: --उनकेपैर

तत्पश्चात्‌ कृष्ण तथा बलराम ने अपने माता-पिता को बन्धन से छुड़ाया और अपने सिर सेउनके पैरों को छूकर उन्हें नमस्कार किया।

देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय जगदी श्वरौ ।

कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शद्धितो ॥

५१॥

देवकी--देवकी; वसुदेव:--वसुदेव; च--तथा; विज्ञाय--पहचान कर; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; ईश्वरा--दो ई श्वरों के रूप में;कृत--किया गया; संवन्दनौ--हाथ जोड़कर की गई वन्दना; पुत्रौ--अपने दोनों पुत्रों को; सस्वजाते न--आलिंगन नहीं किया;शद्धितौ--शंकालु।

अब कृष्ण तथा बलराम को ब्रह्माण्ड के विभुओं के रूप में जानकर देवकी तथा वसुदेवकेवल हाथ जोड़े खड़े रहे।

शंकित होने के कारण उन्होंने अपने पुत्रों का आलिंगन नहीं किया।

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