← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय छियालीसवाँ: उद्धव ने वृन्दावन का दौरा किया
10.46श्रीशुक उबाचवृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णस्य दयितः सखा ।
शिष्यो बृहस्पते: साक्षादुद्धवो बुद्धिसत्तम: ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; वृष्णीनाम्--वृष्णियों में से; प्रवर: -- श्रेष्ठ; मन्त्री--सलाहकार; कृष्णस्य--कृष्णका; दयितः--प्रिय; सखा--मित्र; शिष्य:--शिष्य; बृहस्पते: --देवताओं के गुरु बृहस्पति का; साक्षात्-प्रत्यक्ष; उद्धव:--उद्धव; बुद्धि--बुद्धि वाला; सतू-तम:--सर्वोच्च गुण वाला
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अत्यन्त बुद्धिमान उद्धव वृष्णि वंश के सर्वश्रेष्ठ सलाहकार,भगवान् कृष्ण के प्रिय मित्र तथा बृहस्पति के प्रत्यक्ष शिष्य थे।
तमाह भगवान्प्रेष्ठ भक्तमेकान्तिनं क्वचित् ।
गृहीत्वा पाणिना पाएिं प्रपन्नार्तिहरो हरि: ॥
२॥
तम्--उससे; आह--बोले; भगवान्-- भगवान प्रेष्ठमू-- अपने अत्यन्त प्रिय; भक्तम्-- भक्त; एकान्तिनम्-- अनन्य; क्वचित्--एक अवसर पर; गृहीत्वा--पकड़कर; पाणिना--हाथ से; पाणिम्--( उद्धव का ) हाथ को; प्रपन्न--शरणागत; आर्ति--दुखी;हरः--हरने वाले; हरि:ः--हरि ने
भगवान् हरि ने जो अपने शरणागतों के सारे कष्टों को हरने वाले हैं, एक बार अपने भक्तएवं प्रियतम मित्र उद्धव का हाथ अपने हाथ में लेकर उससे इस प्रकार कहा।
गच्छोद्धव ब्र॒जं सौम्य पित्रो्नों प्रीतिमावह ।
गोपीनां मद्वियोगाधि मत्सन्देशै्विमोचय ॥
३॥
गच्छ--जाओ; उद्धव--हे उद्धव; ब्रजम्--त्रज को; सौम्य--हे भद्र; पित्रो:--माता-पिता तक; नौ--हमारे; प्रीतिम्--तुष्टि;आवह--ले जाओ; गोपीनाम्--गोपियों का; मत्--मुझसे; वियोग--वियोगजनित; आधिम्--मानसिक क्लेश का; मत्--मुझसे लाये गये; सन्देशैः--सन्देशों से; विमोचय--उन््हें छुटकारा दिलाओ।
भगवान् कृष्ण ने कहा हे भद्र उद्धव, तुम तब्रज जाओ और हमारे माता-पिता को आनन्दप्रदान करो।
यही नहीं, मेरा सन्देश देकर उन गोपियों को भी क्लेश-मुक्त करो जो मेरे वियोग केकारण कष्ट पा रही हैं।
ता मन्मनस्का मत्प्राणा मतर्थ त्यक्तदैहिका: ॥
मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः ।
ये त्यक्तलोकधर्माश्च मदर्थ तान्बिभर्म्यहम् ॥
४॥
ताः--वे ( गोपियाँ ); मत्--मुझमें लीन; मनस्का:--उनके मन; मत्--मुझमें टिके; प्राणा:--उनके प्राण; मत्-अर्थे--मेंरे लिए;त्यक्त--छोड़कर; दैहिकाः--शारीरिक स्तर पर सारी वस्तुएँ; माम्ू--मुझको; एव--एकमात्र; दयितम्--अपने प्रिय; प्रेष्ठमू --सर्वाधिक प्रिय; आत्मानम्--आत्मा; मनसा गता:--समझ गईं; ये--जो ( गोपियाँ या अन्य ); त्यक्त--त्यागकर; लोक--यहजगत; धर्मा:--धार्मिकता; च--तथा; मत्-अर्थे--मेंरे लिए; तानू--उनको; बिभर्मि--- भरण-पोषण करता हूँ; अहम्--मैं |
उन गोपियों के मन सदैव मुझमें लीन रहते हैं और उनके प्राण सदैव मुझी में अनुरक्त रहते हैं।
उन्होंने मेरे लिए ही अपने शरीर से सम्बन्धित सारी वस्तुओं को त्याग दिया है, यहाँ तक इसजीवन के सामान्य सुख के साथ साथ अगले जीवन में सुख-प्राप्ति के लिए जो धार्मिक कृत्यआवश्यक हैं, उन तक का परित्याग कर दिया है।
मैं उनका एकमात्र परम प्रियतम हूँ, यहाँ तककि उनकी आत्मा हूँ।
अतः मैं सभी परिस्थितियों में उनका भरण-पोषण करने का दायित्व अपनेऊपर लेता हूँ।
मयि ताः प्रेयसां प्रेष्ठे दूरस्थे गोकुलस्त्रिय: ।
स्मरन्त्योड़ विमुहान्ति विरहौत्कण्ठ्यविहला: ॥
५॥
मयि--मुझमें; ताः--वे; प्रेयसाम्--समस्त प्रिय वस्तुओं में से; प्रेष्ठे--सर्वाधिक प्रिय; दूर-स्थे--दूर होने से; गोकुल-स्त्रिय:--गोकुल की स्त्रियाँ; स्मरन्त्य:--स्मरण करती हुई; अड्ग--हे प्रिय ( उद्धव ); विमुहान्ति--स्तम्भित हो जाती हैं; विरह--वियोगकी; औत्कण्ठ्य--चिन्ता से; विहला:--विहल |
हे उद्धव, गोकुल की उन स्त्रियों के लिए मैं सर्वाधिक स्नेहयोग्य प्रेम-पात्र हूँ।
इस तरह जबवे दूर-स्थित मुझको स्मरण करती हैं, तो वे वियोग की उद्विग्नता से विहल हो उठती हैं।
धारयन्त्यतिकृच्छेण प्राय: प्राणान््कथञ्ञन ।
प्रत्यागमनसन्देशैर्बल्लव्यो मे मदात्मिका: ॥
६॥
धारयन्ति-- धारण करती हैं; अति-कृच्छेण --बड़ी कठिनाई से; प्राय:--मुश्किल से; प्राणानू--अपने प्राणों को; कथज्लन--किसी तरह; प्रति-आगमन--वापसी के; सन्देशैः--वादों से; बल्लव्य:--गोपियाँ; मे--मेरी; मत्-आत्मिका: --मेंरे प्रतिअनुरक्त
चूँकि मैंने उनसे वापस आने का वादा किया है इसीलिए मुझमें पूर्णतः अनुरक्त मेरी गोपियाँकिसी तरह से अपने प्राणों को बनाये रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं।
श्रीशुक उबाचइत्युक्त उद्धवो राजन्सन्देशं भर्तुराहतः ।
आदाय रथमारुह्य प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥
७॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त:--कहे गये; उद्धव:--उद्धव; राजन्ू--हे राजा( परीक्षित ); सन्देशम्--सन्देश; भर्तु:--अपने स्वामी का; आहत:--आदरपूर्वक; आदाय--लेकर; रथम्-- अपने रथ पर;आरुह्म--सवार होकर; प्रययौ--चले गये; नन्द-गोकुलम्ू--नन्द महाराज के ग्राम गोकुल को |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, इस तरह कहे जाने पर उद्धव ने आदरपूर्वक अपनेस्वामी के सन्देश को स्वीकार किया।
वे अपने रथ पर सवार होकर नन्द-गोकुल के लिए चलपड़े।
प्राप्तो नन्दत्रजं श्रीमान्निम्लोचति विभावसौ ।
छन्नयानः प्रविशतां पशूनां खुरेणुभि: ॥
८॥
प्राप्त: --पहुँचकर; नन्द-ब्रजम्--नन्द महाराज की चरागाहों में; श्रीमान्-- भाग्यशाली ( उद्धव ); निम्लोचति--जब अस्त हो रहाथा; विभावसौ--सूर्य; छन्न--अदृश्य; यान:--जिसका जाना; प्रविशताम्--प्रवेश करने वाले; पशूनाम्--पशुओं के; खुर--खुर; रेणुभि:-- धूल से
भाग्यशाली उद्धव नन््द महाराज के चरागाहों में उस समय पहुँचे जब सूर्य अस्त होने वालाथा और चूँकि लौटती हुई गौवें तथा अन्य पशु अपने खुरों से धूल उड़ा रहे थे अतः: उनका रथअनदेखे ही निकल गया।
वासितार्थेभियुध्यद्धिर्नादितं शुश्मिभि्वृषे: ।
धावन्तीभिश्च वासत्राभिरुधोभारै: स्ववत्सकान् ॥
९॥
इतस्ततो विलल्डृद्धिर्गोवत्सै्मण्डितं सितैः ।
गोदोहशब्दाभिरवं वेणूनां निःस्वनेन च ॥
१०॥
गायन्तीभिश्च कर्माणि शुभानि बलकृष्णयो: ।
स्वलड्डू ताभिगोंपीभिगोंपै श्र सुविराजितम् ॥
११॥
अम्न्यर्कातिथिगोविप्रपितृदेवार्चनान्वितै: ।
धूपदीपैश्न माल्यैश्व गोपावासैर्मनोरमम् ॥
१२॥
सर्वतः पुष्पितवनं द्विजालिकुलनादितम् ।
हंसकारण्डवाकीणें: पदाषण्डै श्र मण्डितम् ॥
१३॥
वासित--ऋतुमती ( गौवें ); अर्थ--के हेतु; अभियुध्यद्धधि:--एक-दूसरे से लड़ रहे; नादितम्--नाँदते हुए; शुश्मिभि:--कामुक;वृषैः--साँड़ों से; धावन्तीभि:--दौड़ते हुए; च--तथा; वास्त्राभि:--गौवों समेत; उध:--अपने थनों के; भारैः-- भार से; स्व--अपने ही; वत्सकान्ू--बछड़ों के पीछे; इत: तत:--इधर-उधर; विलड्डद्धिः--कूदती; गो-वत्सै:--बछड़ों द्वारा; मण्डितम्--अलंकृत; सितैः-- श्रेत; गो-दोह--गौवों के दुहने के; शब्द--शब्द से; अभिरवम्--गुझ्जायमान; वेणूनाम्--वंशियों की;निःस्वनेन--उच्च ध्वनि से; च--तथा; गायन्तीभि:--गाती हुईं; च--तथा; कर्माणि--कर्मो के विषय में; शुभानि--शुभ; बल-कृष्णयो:--बलराम तथा कृष्ण के; सु--सुन्दर; अलड्डू ताभि:ः--अलंकृत; गोपीभि:--गोपियों समेत; गोपै:--गोपजन; च--तथा; सु-विराजितम्--सुशोभित; अग्नि--यज्ञ की अग्नि; अर्क --सूर्य; अतिथि--मेहमान; गो--गाय; विप्र-- ब्राह्मण; पितृ--पूर्वज; देव--तथा देवतागण की; अर्चन--पूजा से; अन्वितैः:-- पूरित; धूप--अगुरु; दीपैः--दीपकों से; च--तथा; माल्यै:--'फूलों की मालाओं से; च-- भी; गोप-आवासै:--ग्वालों के घरों के कारण; मनः-रमम्--अत्यन्त आकर्षक; सर्वतः--चारोंओर; पुष्पित--फूले हुए; बनमू--वन; द्विज--पक्षियों; अलि--तथा भौंरों के; कुल--झुंड से; नादितम्-- प्रतिध्वनित; हंस--हंस; कारण्डव--विशेष प्रकार की बत्तखों से युक्त; आकीणणें: --झुंडों से भरा; पद्मय-षण्डै:ः--कमल के कुंजों से; च--तथा;मण्डितमू--सुशोभित
ऋतुमती गौवों के लिए परस्पर लड़ रहे साँड़ों की ध्वनि से, अपने बछड़ों का पीछा कर रहीअपने थनों के भार से रँभाती गौवों से, दुहने की तथा इधर-उधर कूद-फाँद कर रहे श्वेत बछड़ोंकी आवाज से, वंशी बजाने की ऊँची गूँज से, उन गोपों तथा गोपिनों द्वारा, जो गाँव को अपनीअद्भुत रीति से अलंकृत वेशभूषा से सुशोभित कर रहे थे, कृष्ण तथा बलराम के शुभ कार्यो केगुणगान से गोकुलग्राम सभी दिशाओं में गुंजायमान था।
गोकुल में ग्वालों के घर यज्ञ-अग्नि,सूर्य, अचानक आए अतिथियों, गौबों, ब्राह्मणों, पितरों तथा देवताओं की पूजा के लिए प्रचुरसामग्रियों से युक्त होने से अतीव आकर्षक प्रतीत हो रहे थे।
सभी दिशाओं में पुष्पित वन फैलेथे, जो पक्षियों तथा मधुमक्खियों के झुण्डों से गुँजायमान हो रहे थे और हंस, कारण्डव तथाकमल-कुंजों से भरे-पूरे सरोवरों से सुशोभित थे।
'तमागतं समागम्य कृष्णस्यानुचरं प्रियम् ।
नन्दः प्रीतः परिष्वज्य वासुदेवधियार्चयत् ॥
१४॥
तम्--उसके ( उद्धव के ) पास तक; आगतम्-- आया हुआ; समागम्य--पहुँचकर; कृष्णस्य--कृष्ण का; अनुचरम्-- अनुयायी;प्रियम्--प्रिय; नन्दः--नन्द महाराज; प्रीत:--सुखी; परिष्वज्य--आलिंगन करके; वासुदेव-धिया--वासुदेव के बारे में ध्यानकरते हुए; आर्चयत्--पूजा की |
ज्योंही उद्धव नन््द महाराज के घर पहुँचे, नन्द उनसे मिलने के लिए आगे आ गये।
गोपों केराजा ने अत्यन्त सुखपूर्वक उनका आलिंगन किया और वासुदेव की ही तरह उनकी पूजा की।
भोजितं परमान्नेन संविष्ट कशिपौ सुखम् ।
गतश्रमं पर्यपृच्छत्पादसंवाहनादिभि: ॥
१५॥
भोजितम्--खिलाया; परम-अन्नेन--उत्तम कोटि के भोजन से; संविष्टमू--बैठाया; कशिपौ--सुन्दर सेज पर; सुखम्--सुखपूर्वक; गत--दूर किया; श्रमम्-- थकान; पर्यपृच्छत्--पूछा; पाद--पाँव की; संवाहन--मालिश; आदिभि:--इत्यादि केद्वारा
जब उद्धव उत्तम भोजन कर चुके और उन्हें सुखपूर्वक बिस्तर पर बिठा दिया गया तथापाँवों की मालिश तथा अन्य साधनों से उनकी थकान दूर कर दी गई तो नन्द ने उनसे इस प्रकारपूछा।
कच्चिदड़ महाभाग सखा न: शूरनन्दनः ।
आस्ते कुशल्यपत्यादैर्युक्तो मुक्त: सुहृद्व़्तः ॥
१६॥
कच्चित्ू--क्या; अड्ड-- प्रिय; महा-भग--हे अत्यन्त भाग्यशाली; सखा--मित्र; न:--हमारा; शूर-नन्दन:--शूर का पुत्र( वसुदेव ); आस्ते--रहता है; कुशली--कुशलपूर्वक; अपत्य-आइ्यै: --अपने बच्चों आदि समेत; युक्त:--मिल कर; मुक्त:--मुक्त; सुहत्--अपने मित्रों से; ब्रतः--अनुरक्त |
ननन््द महाराज ने कहा : हे परम भाग्यशाली, अब शूर का पुत्र मुक्त हो चुकने और अपनेबच्चों तथा अन्य सम्बन्धियों से पुन: मिल जाने के बाद कुशल से है न?
दिष्टय्या कंसो हतः पाप: सानुगः स्वेन पाप्मना ।
साधूनां धर्मशीलानां यदूनां द्वेष्टि य:ः सदा ॥
१७॥
दिछ्टया--सौभाग्य से; कंस:--कंस; हत:ः--मारा जा चुका है; पाप:--पापी; स--सहित; अनुग: --अपने अनुयायियों( भाइयों ); स्वेन--अपने से; पाप्मना--पापमयता; साधूनाम्-- सन्त; धर्म-शीलानाम्-- धर्मात्मा; यदूनाम्ू--यदुओं से; द्वेष्टि--द्वेष करता है; यः--जो; सदा--सदैव |
सौभाग्यवश, अपने ही पापों के कारण पापात्मा कंस अपने समस्त भाइयों सहित मारा जाचुका है।
वह सदैव सन्त तथा धर्मात्मा यदुओं से घृणा करता था।
अपि स्मरति नः कृष्णो मातरं सुहृदः सखीन् ।
गोपान्त्रजं चात्मनाथं गावो वृन्दावनं गिरिम्ू ॥
१८॥
अपि--शायद; स्मरति-- स्मरण करता है; नः--हमको; कृष्ण: --कृष्ण; मातरम्--अपनी माता को; सुहृदः --उसकेशुभचिन्तक; सखीनू--तथा सारे मित्र; गोपान्ू--ग्वालों को; ब्रजम्ू--त्रज के गाँव; च--तथा; आत्म--स्वयं; नाथम्--स्वामी;गाव:--गौवें; वृन्दावनम्--वृन्दावन के जंगल को; गिरिम्--गोवर्धन पर्वत को
क्या कृष्ण हमारी याद करता है? क्या वह अपनी माता तथा अपने मित्रों एवं शुभचिन्तकोंकी याद करता है? क्या वह ग्वालों तथा उनके गाँव ब्रज को, जिसका वह स्वामी है, स्मरणकरता है? क्या वह गौवों, वृन्दावन के जंगल तथा गोवर्धन पर्वत की याद करता है?
अप्यायास्यति गोविन्द: स्वजनान्सकृदीक्षितुम् ।
तर्हिं द्रक्ष्याम तद्बक्त्रं सुनसं सुस्मितेक्षणम् ॥
१९॥
अपि--क्या; आयास्यति--वापस आयेगा; गोविन्द: --कृष्ण; स्व-जनान्-- अपने सम्बन्धियों को; सकृत्ू--एक बार;ईक्षितुम्ू--देखने के लिए; तहिं--तब; द्रक्ष्याम--हम देख सकते हैं; तत्--उसका; वक्त्रमू--मुख; सु-नसम्--सुन्दर नाक सेयुक्त; सु--सुन्दर; स्मित--हँसी; ईक्षणम्--तथा नेत्र |
क्या गोविन्द अपने परिवार को देखने एक बार भी वापस आयेगा? यदि वह कभी आयेगातो हम उसके सुन्दर नेत्र, नाक तथा मुसकाते सुन्दर मुख को देख सकेंगे।
दावाननेर्वातवर्षाच्च वृषसर्पाच्च रक्षिता: ।
दुरत्यये भ्यो मृत्युभ्य: कृष्णेन सुमहात्मना ॥
२०॥
दाव-अग्ने:--जंगल की आग से; वात--तेज हवा से; वर्षातू-तथा वर्षा से; च-- भी; वृष--बैल से; सर्पात्ू--सर्प से; च--तथा; रक्षिता:--रक्षा किये गये की; दुरत्ययेभ्य:--दुल॑ध्य; मृत्युभ्य:--मानवीय संकटों से; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; सु-महा-आत्मना--बहुत बड़े महात्मा
उस महान-आत्मा कृष्ण द्वारा हम जंगल की आग, तेज हवा तथा वर्षा, साँड़ तथा सर्प रूपीअसुरों जैसे दुर्लघ्य घातक संकटों से बचा लिये गये थे।
स्मरतां कृष्णवीर्याणि लीलापाडूनिरीक्षितम् ।
हसितं भाषितं चाड़ सर्वा न: शिथधिला: क्रिया: ॥
२१॥
स्मरताम्--स्मरण करने वाले; कृष्ण-वीर्याणि--कृष्ण के पराक्रमपूर्ण कार्यो को; लीला--क्रीड़ापूर्ण; अपाड्र--चितवन से;निरीक्षितम्--उनका देखना; हसितम्--हँसना; भाषितम्--बोलना; च--तथा; अड्ग-हे प्रिय ( उद्धव ); सर्वा:--सभी; नः--हमारे लिए; शिथिला:--शिथिल; क्रिया:-- भौतिक कार्यकलाप
जब हम कृष्ण द्वारा सम्पन्न किये गये अद्भुत कार्यो, उसकी चपल चितवन, उसकी हँसीतथा उसकी वाणी का स्मरण करते हैं, तो हे उद्धव, हम अपने सारे भौतिक कार्यों को भूल जातेहैं।
सरिच्छैलवनोद्देशान्मुकुन्दपदभूषितान् ।
आक्रीडानीक्ष्यमाणानां मनो याति तदात्मताम् ॥
२२॥
सरित्--नदियाँ; शैल--पर्वत; बन--जंगल के; उद्देशान्ू--तथा विभिन्न भाग; मुकुन्द--कृष्ण के; पद--पाँवों से; भूषितानू--सुशोभित; आक्रीडान्ू--उनके खेल के स्थान; ईक्ष्यमाणानाम्ू-- देखने वालों के लिए; मनः--मन; याति--प्राप्त करता है; ततू-आत्मताम्--उनमें पूर्ण तल्लीनता |
जब हम उन स्थानों को--यथा नदियों, पर्वतों तथा जंगलों को--देखते हैं, जिन्हें उसनेअपने पैरों से सुशोभित किया और जहाँ उसने क्रीड़ाएँ तथा लीलाएँ कीं तो हमारे मन उसमेंपूर्णतया लीन हो जाते हैं।
मन्ये कृष्णं च राम च प्राप्ताविह सुरोत्तमौ ।
सुराणां महदर्थाय गर्गस्थ वचन यथा ॥
२३॥
मन्ये--मैं सोचता हूँ; कृष्णम्--कृष्ण को; च--तथा; रामम्--राम को; च--तथा; प्राप्तौ--प्राप्त कर लिया; इह--इस लोकमें; सुर--देवताओं के; उत्तमौ--दो सर्वश्रेष्ठ; सुराणामू--देवताओं के; महत्--महान्; अर्थाय--हेतु; गर्गस्थ--गर्ग मुनि का;वचनम्--कथन; यथा--जैसा |
मेरे विचार से कृष्ण तथा बलराम अवश्य ही दो श्रेष्ठ देवता हैं, जो इस लोक में देवताओं का कोई महान् उद्देश्य पूरा करने आये हैं।
गर्ग ऋषि ने ऐसी ही भविष्यवाणी की थी।
कंसं नागायुतप्राणं मल्लौ गजपतिं यथा ।
अवधिष्टां लीलयैव पशूनिव मृगाधिप: ॥
२४॥
कंसम्--कंस को; नाग--हाथियों की; अयुत--दस हजार; प्राणम्--प्राण-शक्ति वाले; मल्लौ--दो पहलवान ( चाणूर तथामुष्टिक ); गज-पतिम्ू--हाथियों के राजा ( कुबलयापीड ) को; यथा--जिस तरह; अवधिष्टाम्--दोनों ने मार डाला; लीलया--खेल-खेल में; एब--केवल; पशून्--पशुओं को; इब--सहृश; मृग-अधिप:--पशुओं का राजा सिंह |
अन्ततः कृष्ण तथा बलराम ने दस हजार हाथियों जितने बलशाली कंस को और साथ हीसाथ चाणूर और मुप्टिक पहलवानों एवं कुबलयापीड हाथी को मार डाला।
उन्होंने इन सबों कोउसी तरह खेल-खेल में आसानी से मार डाला जिस तरह सिंह छोटे पशुओं का सफाया कर देताहै।
तालत्रयं महासारं धनुर्यपष्टिमिवेभराट् ।
बभज्जैकेन हस्तेन सप्ताहमदधादिगरिम् ॥
२५॥
ताल-बत्रयम्--तीन ताड़ों जितना लम्बा; महा-सारम्--अत्यन्त ठोस; धनु:--धनुष; यष्टिमू--डंडा; इब--सहृश; इभ-राट्--शाही हाथी; बभञ्ञ--तोड़ दिया; एकेन--एक; हस्तेन--हाथ से; सप्त-अहम्--सात दिनों तक; अदधात्--पकड़े रहे;गिरिम्ू--पर्वत को |
जिस आसानी से कोई तेजस्वी हाथी किसी छड़ी को तोड़ देता है उसी तरह से कृष्ण ने तीनताल जितने लम्बे एवं सुदृढ़ धनुष को तोड़ डाला।
वे सात दिनों तक पर्वत को केवल एक हाथसे ऊपर उठाये रहे।
प्रलम्बो धेनुकोरिष्टस्तृणावर्तो बकादय: ।
दैत्या: सुरासुरजितो हता येनेह लीलया ॥
२६॥
प्रलम्ब: धेनुकः अरिष्ट:--प्रलम्ब, धेनुक तथा अरिष्ट; तृणावर्त:--तृणावर्त; बक-आदय:--बक इत्यादि; दैत्या:--असुर; सुर-असुर--देवता तथा असुर दोनों; जितः--जीता; हता:--मारा; येन--जिसके द्वारा; हह--यहाँ ( वृन्दावन में ); लीलया--आसानी से।
इसी वृन्दावन में कृष्ण तथा बलराम ने बड़ी ही आसानी से प्रलम्ब, धेनुक, अरिष्ट, तृणावर्ततथा बक जैसे उन असुरों का वध किया जो स्वयं देवताओं तथा अन्य असुरों को पराजित करचुके थे।
श्रीशुक उबाचइति संस्मृत्य संस्मृत्य नन्दः कृष्णानुरक्तधी: ।
अत्युत्कण्ठोभवत्तृष्णीं प्रेमप्रसरविह्लल: ॥
२७॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; संस्मृत्य संस्मृत्य--बार बार उत्कट भाव से स्मरण करके;नन्दः--नन्द महाराज; कृष्ण--कृष्ण के प्रति; अनुरक्त--पूर्णतया समर्पित; धी: --मन; अति--अत्यन्त; उत्कण्ठ: --उत्सुक;अभवत्--हो गये; तूष्णीम्--मौन; प्रेम--अपने शुद्ध-प्रेम के; प्रसर--वेग से; विहलः--अभिभूत |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह बारम्बार कृष्ण को उत्कटता से स्मरण करते हुए,भगवान् में पूर्णतया अनुरक्त मन वाले नन््द महाराज को अत्यधिक उद्धिग्नता का अनुभव हुआऔर वे अपने प्रेम के वेग से अभिभूत होकर मौन हो गये।
यशोदा वर्ण्यमानानि पुत्रस्य चरितानि च ।
श्रुण्वन्त्यश्रूण्यवास्त्राक्षीत्स्नेहस्नुतपयोधरा ॥
२८ ॥
यशोदा--माता यशोदा; वर्ण्यमानानि--वर्णन किये जाते हुए; पुत्रस्य--अपने पुत्र के; चरितानि--कार्यकलापों को; च--तथा;श्रृण्वन्ती--ज्योंही सुना; अश्रूणि--आँसू; अवास्त्राक्षीत्-ढारने लगीं; स्नेह--स्नेह के कारण; स्नुत--गीले; पयोधरा--उनकेस्तन
ज्योंही माता यशोदा ने अपने पुत्र के कार्यकलापों का वर्णन सुना त्योंही उनके आँखों सेआँसू बहने लगे और प्रेम के कारण उनके स्तनों से दूध बहने लगा।
तयोरित्थं भगवति कृष्णे नन्दयशोदयो: ।
वीक्ष्यानुरागं परमं नन्दमाहोद्धवो मुदा ॥
२९॥
तयो:--उन दोनों का; इत्थम्--इस प्रकार से; भगवति-- भगवान् के लिए; कृष्णे--कृष्ण; नन्द-यशोदयो: --नन््द तथा यशोदाका; वीक्ष्य--स्पष्ट देखकर; अनुरागम्--प्रेममय आकर्षण; परमम्--परम; नन्दम्--नन्द से; आह--बोले; उद्धव:--उद्धव;मुदा--हर्षपूर्वक ।
तब भगवान् कृष्ण के प्रति नन््द तथा यशोदा के परम अनुराग को स्पष्ट देखकर उद्धव नेहर्षपूर्वक नन््द से कहा।
श्रीउद्धव उबाचयुवां एलाघ्यतमौ नूनं देहिनामिह मानद ।
नारायणेखिलगुरौ यत्कृता मतिरीहशी ॥
३०॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; युवाम्-तुम दोनों; श्लाध्यतमौ--सर्वाधिक प्रशंसनीय; नूनम्--निश्चय ही; देहिनाम्--देहधारी जीवों का; इह--इस संसार में; मन-द--हे सम्माननीय; नारायणे-- भगवान् नारायण के लिए; अखिल-गुरौ--सबों केगुरु; यतू--क्योंकि; कृता--उत्पन्न; मतिः--मानसिकता; ईहशी--इस प्रकार की |
श्री उद्धव ने कहा : हे माननीय नन्द, सम्पूर्ण जगत में निश्चय ही आप तथा माता यशोदासर्वाधिक प्रशंसनीय हैं क्योंकि आपने समस्त जीवों के गुरु भगवान् नारायण के प्रति ऐसा प्रेम-भाव उत्पन्न कर रखा है।
एतौ हि विश्वस्थ च बीजयोनी रामो मुकुन्दः पुरुष: प्रधानम् ।
अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्यज्ञानस्य चेशात इमौ पुराणौ ॥
३१॥
एतौ--ये दोनों; हि--निस्सन्देह; विश्वस्य--ब्रह्माण्ड के; च--तथा; बीज--बीज; योनी--तथा गर्भ; राम:-- बलराम;मुकुन्दः--कृष्ण; पुरुष:--सृजन करने वाले भगवान्; प्रधानम्ू--उनकी सृजन शक्ति; अन्बीय-- प्रवेश करके; भूतेषु-- सारेजीवों के भीतर; विलक्षणस्य-- भ्रमित या अनुभव करते; ज्ञानस्य--ज्ञान का; च--तथा; ईशाते--नियंत्रण करते हैं; इमौ--दोनों; पुराणौ-- प्राचीन, आदि।
मुकुन्द तथा बलराम--ये दोनों विभु ब्रह्माण्ड के बीज तथा योनि, स्त्रष्टा तथा उनकी सृजनशक्ति हैं।
ये जीवों के हृदयों में प्रवेश करके उनकी बद्ध जागरूकता को नियंत्रित करते हैं।
येआदि परम पुरुष हैं।
यस्मिनजनः प्राणवियोगकालेक्षनं समावेश्य मनोविशुद्धम् ।
नित्य कर्माशयमाशु यातिपरां गतिं ब्रह्ममयोउर्कवर्ण: ॥
३२॥
'तस्मिन्भवन्तावखिलात्महेतौनारायणे कारणमर्त्यमूर्तों ।
भावं विधत्तां नितरां महात्मन् कि वावशिष्ट युवयो: सुकृत्यम् ॥
३३॥
यस्मिनू--जिसमें; जन: --कोई व्यक्ति; प्राण--अपने प्राण से; वियोग--विरह के; काले--समय पर; क्षणम्--क्षण-भर केलिए; समावेश्य--लीन करके; मन:--अपना मन; अविशुद्धम्-- अशुद्ध; निईत्य--समूल नष्ट करके; कर्म--कर्मो के फलोंका; आशयमू--सारे चिह्ृ; आशु--तुरन््त; याति--जाता है; परामू-- परम; गतिम्--गन्तव्य को; ब्रह्म -मयः--शुद्ध आध्यात्मिकस्वरूप में; अर्क--सूर्य की तरह; वर्ण: --रंग; तस्मिन्ू--उसमें; भवन्तौ-- आप दोनों; अखिल--समस्त; आत्म--परमात्मा;हेतौ--तथा कारण; नारायणे-- भगवान् नारायण में; कारण--हर वस्तु का कारण; मर्त्य--मनुष्य के ; मूर्तों--रूप में; भावम्--शुद्ध-प्रेम; विधत्तामू--दिया है; नितराम्--अत्यधिक; महा-आत्मन्--पूर्ण को; किम् वा--तो कया; अवशिष्टम्-शेष;युवयो:--तुम दोनों के लिए; सु-कृत्यमू--आवश्यक शुभ कर्म |
कोई भी व्यक्ति, चाहे वह अशुद्ध अवस्था में ही क्यों न हो, यदि मृत्यु के समय क्षण-भर केलिए भी अपने मन को उन ( भगवान् ) में लीन कर देता है, तो उसके सारे पापमय कर्मो के फलभस्म हो जाते हैं जिससे उनका नाम-निशान भी नहीं रह जाता और वह सूर्य के समान तेजस्वीशुद्ध आध्यात्मिक स्वरूप में परम दिव्य गन्तव्य को प्राप्त करता है।
आप दोनों ने उन मनुष्य-रूपभगवान् नारायण की अद्वितीय प्रेमाभक्ति की है, जो सबों के परमात्मा हैं और सारे प्राणियों केकारण-स्वरूप हैं और जो सबों के मूल कारण हैं।
भला अब भी आपको कौन-से शुभ कर्मकरने की आवश्यकता है ?
आममिष्यत्यदीर्घेण कालेन ब्रजमच्युतः ।
प्रियं विधास्यते पित्रोर्भगवान्सात्वतां पति: ॥
३४॥
आगमिष्यति--वापस आयेगा; अदीर्घेण--अल्प; कालेन--समय में; ब्रजम्--ब्रज में; अच्युत:--अच्युत कृष्ण; प्रियम्--तुष्टि;विधास्यते--देगा; पित्रो:--अपने माता-पिता को; भगवान्-- भगवान्; सात्वताम्-- भक्तों का; पति: --स्वामी तथा रक्षक |
भक्तों के स्वामी अच्युत कृष्ण शीघ्र ही अपने माता-पिता को तुष्टि प्रदान करने के लिए ब्रजलौटेंगे।
हत्वा कंसं रड्रमध्ये प्रतीपं सर्वसात्वताम् ।
यदाह व: समागत्य कृष्ण: सत्यं करोति ततू ॥
३५॥
हत्वा--मारकर; कंसम्--कंस को; रड्--रंगभूमि के ; मध्ये--बीच में; प्रतीपम्--शत्रु; सर्व-सात्वताम्--समस्त यदुओं का;यत्--जो; आह--कहा; वः--तुमसे; समागत्य--वापस आकर; कृष्ण: --कृष्ण ने; सत्यम्--सत्य; करोति--करेगा; तत्--वही।
रंगभूमि में समस्त यदुओं के शत्रु कंस का वध कर चुकने के बाद अब कृष्ण वापस आकर आपको दिये गये वचन को अवश्य ही पूरा करेंगे।
मा खिलद्यतं महाभागौ द्रक्ष्यथः कृष्णमन्तिके ।
अन्तईदि स भूतानामास्ते ज्योतिरिवैधसि ॥
३६॥
मा खिद्यतम्--आप शोक न करें; महा-भागौ--हे दोनों भाग्यशाली जन; द्रक्ष्यथ:--देखेंगे; कृष्णम्--कृष्ण को; अन्तिके--निकट भविष्य में; अन्तः-- भीतर; हृदि--हृदयों में; सः--वह; भूतानाम्--सारे जीवों के; आस्ते--उपस्थित है; ज्योति:--अग्नि;इब--सहश; एधसि--काठ के भीतर।
हे भाग्यशालीजनो, आप शोक मत करें।
आप शीघ्र ही कृष्ण को देख सकेंगे।
वे समस्तजीवों के हृदयों में उसी तरह विद्यमान हैं जिस तरह काष्ट में अग्नि सुप्त रहती है।
न हास्यास्ति प्रियः कश्रिन्नाप्रियो वास्त्यमानिनः ।
नोत्तमो नाधमो वापि समानस्यथासमोपि वा ॥
३७॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अस्य--उसके लिए; अस्ति--है; प्रिय: --प्रिय; कश्चित्--कोई; न--नहीं; अप्रिय:--अप्रिय; वा--अथवा; अस्ति-- है; अमानिन:--सम्मान पाने की इच्छा से रहित; न--नहीं; उत्तम:--श्रेष्ठ; न--नहीं; अधम:--निम्न; वा--अथवा; अपि--भी; समानस्य--अन्यों का आदर करने वाले के लिए; आसम:--नितान्त सामान्य; अपि-- भी; वा--अथवा
उनके लिए कोई न तो विशेष प्रिय है, न अप्रिय; न तो श्रेष्ठ है न निम्न है; फिर भी वे किसीसे अन्यमनस्क नहीं हैं।
वे सम्मान पाने की सारी इच्छा से रहित हैं फिर भी वे सबों का सम्मानकरते हैं।
न माता न पिता तस्य न भार्या न सुतादय: ।
नात्मीयो न परश्रापि न देहो जन्म एवच ॥
३८॥
न--नहीं है; माता--माता; न--न तो; पिता--पिता; तस्य--उनका; न--नहीं; भार्या--पत्ती; न--न तो; सुत-आदयः:--पुत्रइत्यादि; न--न कोई; आत्मीय:-- अपने से सम्बद्ध; न--न तो; पर: --बाहरी, पराया; च अपि-- भी; न--नहीं; देह:--शरीर;जन्म--जन्म; एव--या तो; च--तथा।
न तो उनके माता है, न पिता, न पत्नी, न पुत्र या अन्य कोई सम्बन्धी।
उनसे किसी कासम्बन्ध नहीं है फिर भी उनका कोई पराया नहीं है।
न तो उनका भौतिक शरीर है, न कोई जन्म।
न चास्य कर्म वा लोके सदसन्मिश्रयोनिषु ।
क्रीडार्थ सोपि साधूनां परित्राणाय कल्पते ॥
३९॥
न--नहीं है; च--तथा; अस्य--इसका; कर्म--कर्म; वा--अथवा; लोके --इस जगत में; सत्--शुद्ध; असत्--अशुद्ध;मिश्र--या मिश्रित; योनिषु--योनियों में; क्रीडा--खिलवाड़ के; अर्थम्--लिए; सः--वह; अपि-- भी; साधूनाम्-- अपनेसाधु-भक्तों की; परित्राणाय--रक्षा करने के लिए; कल्पते--प्रकट होता है।
उन्हें इस जगत में ऐसा कोई कर्म करना शेष नहीं जो उन्हें शुद्ध, अशुद्ध या मिश्रित योनियोंमें जन्म लेने के लिए बाध्य कर सके।
फिर भी अपनी लीलाओं का आनन्द लेने और अपनेसाधु-भक्तों का उद्धार करने के लिए वे स्वयं प्रकट होते हैं।
सत्त्वं रजस्तम इति भजते निर्गुणो गुणान् ।
क्रीडन्नतीतोपि गुणै: सृजत्यवन्हन्त्यज: ॥
४०॥
सत्त्वम्--सतो गुण; रज:--रजो गुण; तमः--तथा तमो गुण; इति--इस प्रकार कहे जाने वाले; भजते--स्वीकार करता है;निर्गुण:--भौतिक गुणों से परे; गुणानू--गुणों को; क्रीडन्--क्रीड़ा करते हुए; अतीत:--परे; अपि--यद्यपि; गुणै: --गुणों केद्वारा; सृजति--सूजन करता है; अवति--पालन-पोषण करता है; हन्ति--तथा संहार करता है; अजः--अजन्मा भगवान्
यद्यपि दिव्य भगवान् भौतिक प्रकृति के तीन गुणों--सतो, रजो तथा तमो गुणों--से परे हैंफिर भी क्रिड़ा के रूप में वे इनकी संगति स्वीकार करते हैं।
इस तरह अजन्मा भगवान् इनभौतिक गुणों का उपयोग सृजन, पालन तथा संहार के लिए करते हैं।
यथा भ्रमरिकाहष्टया भ्राम्यतीव महीयते ।
चित्ते कर्तरि तत्रात्मा कर्तेवाहंधिया स्मृत: ॥
४१॥
यथा--जिस तरह; भ्रमरिका--घुमरी के कारण; दृष्या--किसी की दृष्टि में; भ्राम्यति--घूमते हुए; इब--मानो; मही --पृथ्वी;ईयते--प्रकट होता है; चित्ते--मन में; कर्तरि--कर्ता होने से; तत्र--वहाँ; आत्मा--आत्मा; कर्ता--कर्ता; इब-- सहृश; अहमू-धिया--मिथ्या अहंकार से; स्मृत:--सोचा जाता है |
जिस तरह चक्री में घूमने वाला व्यक्ति धरती को घूमता देखता है उसी तरह जो व्यक्ति मिथ्याअहंकार के वशीभूत होता है, वह अपने को कर्ता मानता है, जबकि वास्तव में उसका मन कार्यकरता होता है।
युवयोरेव नैवायमात्मजो भगवान्हरिः ।
सर्वेषामात्मजो ह्यात्मा पिता माता स ईश्वर: ॥
४२॥
युवयो:--तुम दोनों का; एब--अकेले; न--नहीं; एब--निस्सन्देह; अयम्ू--यह; आत्म-ज: --पुत्र; भगवान्-- भगवान्;हरिः--कृष्ण; सर्वेषाम्--सबों का; आत्म-जः--पुत्र; हि--निस्सन्देह; आत्मा--आत्मा; पिता--पिता; माता--माता; सः--वह; ईश्वरः--नियन्ता |
निश्चय ही भगवान् हरि एकमात्र आपके पुत्र नहीं हैं, प्रत्युत भगवान् होने के कारण वे हरएक के पुत्र, आत्मा, पिता तथा माता हैं।
हृष्ड श्रुत॑ भूतभवद्धविष्यत्स्थास्नुश्नरिष्णुर्महदल्पकं च ।
विनाच्युताद्वस्तु तरां न वाच्यंसएबव सर्व परमात्मभूत: ॥
४३॥
इृष्टमू--देखा हुआ; श्रुतम्--सुना हुआ; भूत-- भूतकाल; भवत्--वर्तमान्; भविष्यत् -- भविष्य; स्थास्नु:-- अचल ; चरिष्णु:--चल; महत्--विशाल; अल्पकमू-- क्षुद्र; च--तथा; विना--के बिना; अच्युतात्--अच्युत कृष्ण से; वस्तु--वस्तु; तरामू--तनिक भी; न--नहीं है; वाच्यम्--नाम लेने के योग्य; सः--वह; एव--अकेले; सर्वम्--हर वस्तु; परम-आत्म--परमात्मा रूपमें; भूतः--प्रकट
भगवान् अच्युत से किसी भी वस्तु का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है--चाहे वह भूत से या वर्तमानसे अथवा भविष्य से सम्बन्धित हो, वह देखी हो या सुनी हो, चर हो या अचर हो, विशाल हो या क्षुद्र।
दरअसल वे ही सर्वस्व हैं क्योंकि वे परमात्मा हैं।
एवं निशा सा ब्रुवतोर्व्यतीतानन्दस्य कृष्णानुचरस्य राजन ।
गोप्यः समुत्थाय निरूप्य दीपान्वास्तून्समभ्यर्च्य दौधीन्यमन्थुन् ॥
४४॥
एवम्--इस तरह से; निशा--रात; सा--वह; ब्रुवतो:--दोनों के बातचीत करते; व्यतीता--बीत गई; नन्दस्य--नन्द महाराजका; कृष्ण-अनुचरस्य--तथा कृष्ण का दास ( उद्धव ); राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); गोप्य:--गोपियाँ; समुत्थाय--नींद से उठकर; निरूप्य--जलाकर; दीपान्--दीपकों को; वास्तूनू--घरेलू अर्चाविग्रहों को; समभ्यर्च्य--पूजा करके; दधीनि--दही;अमन्थन्--मथने लगीं।
हे राजन् जब कृष्ण के दूत उद्धव नन्द महाराज से बातें करे जा रहे थे तो रात बीत गई।
गोकुल की स्त्रियाँ तब नींद से जग गई और उन्होंने दीपक जलाकर अपने अपने घरों केअर्चाविग्रहों की पूजा की।
इसके बाद वे दही मथने लगीं।
ता दीपदीप्तैर्मणिभिर्विरेजूरज्जूविकर्षद्धुजकड्डणस्त्रज: ।
अलन्नितम्बस्तनहारकुण्डल-त्विषत्कपोलारुणकुड्ड मानना: ॥
४५॥
ताः--वे स्त्रियाँ; दीप--दीपकों द्वारा; दीप्तै:--दीपित; मणिभि:--मणियों से; विरेजु:--चमक रही थीं; रज्जू:--रस्सियाँ;विकर्षत्--खींचते हुए; भुज--अपनी भुजाओं में; कड्डण--चूड़ियों की; सत्रज:--पंक्तियाँ; चलन्--हिलाती; नितम्ब--कटि केनीचे का भाग; स्तन--वश्षस्थल; हार--तथा गले की दुलरी; कुण्डल--कान की बालियों के कारण; त्विषत्ू--चमचमाते;कपोल-गाल; अरुण--लाल; कुड्डढु म-कुंकुम चूर्ण से; आनना:--उनके मुखमंडल।
जब ब्रज की स्त्रियाँ कंगन पहने हुए हाथों से मथानी की रस्सियाँ खींच रही थीं तो वे दीपकके प्रकाश से प्रतिबिम्बित मणियों की चमक से दीपित हो रही थीं।
उनके नितम्ब, स्तन तथा गलेके हार हिल-डुल रहे थे और लाल कुंकुम से पुते उनके मुखमण्डल, गालों पर पड़ी कान कीबालियों की चमक से चमचमा रहे थे।
उद्गायतीनामरविन्दलोचनंब्रजाडुनानां दिवमस्पृशद्ध्वनि: ।
दश्नश्व निर्मन्थनशब्दमिश्रितोनिरस्यते येन दिशाममड्रलम् ॥
४६॥
उदगायतीनाम्--जोर से गाती हुईं; अरविन्द--कमलों की तरह; लोचनम्--नेत्र; ब्रज-अड्डनानाम्-ब्रज की स्त्रियों के; दिवम्--आकाश; अस्पृशत्--स्पर्श किया; ध्वनि:--ध्वनि, गूँज; दध्न:--दही का; च--तथा; निर्मनथन--मथने का; शब्द--शब्द से;मिश्रित:--मिश्रित; निरस्यते--दूर हो जाती है; येन--जिससे; दिशाम्ू--सभी दिशाओं का; अमड्गलम्--अमंगल
जब ब्रज की स्त्रियाँ कमल-नेत्र कृष्ण की महिमा का गायन जोर-जोर से करने लगीं तोउनके गीत उनके मथने की ध्वनि से मिल कर आकाश तक उठ गये और उन्होंने सारी दिशाओंके अमंगल को दूर कर दिया।
भगवत्युदिते सूर्य नन्दद्वारि त्रजौकस: ।
इृष्ठा रथं शातकौम्भं कस्यायमिति चात्रुवन् ॥
४७॥
भगवति--देव; उदिते--उदय होने पर; सूर्य --सूर्य के; नन्द-द्वारि--नन्द महाराज के दरवाजे; ब्रज-ओकसः:--व्रज के निवासी;इृष्ठा--देखकर; रथम्--रथ को; शातकौम्भम्--स्वर्ण से बने; कस्य--किसका; अयम्--यह; इति--इस प्रकार; च--तथा;अब्लुवन्ू--वे बोले |
जब सूर्यदेव उदित हो चुके तो ब्रजवासियों ने नन्द महाराज के दरवाजे के सामने एकसुनहरा रथ देखा।
( अतः ) उन्होंने पूछा, 'यह किसका रथ है ?
'अक्रूर आगतः कि वा यः कंसस्यार्थसाधक: ।
येन नीतो मधुपुरीं कृष्ण: कमललोचन: ॥
४८॥
अक्ूरः--अक्रूर; आगत:--आया है; किम् वा--शायद; यः--जो; कंसस्य--कंस के; अर्थ--कार्य के लिए; साधक:--सम्पन्नकरने वाला; येन--जिससे; नीत:--लाया गया; मधु-पुरीम्--मथुरा नगरी में; कृष्ण:--कृष्ण; कमल--कमल सहश;लोचन:--आँखों वाले |
शायद अक्रूर लौट आया है--वही जिसने कमल-नेत्र कृष्ण को मथुरा ले जाकर कंस कीइच्छा पूरी की थी।
कि साधयिष्यत्यस्माभिर्भतु: प्रीतस्य निष्कृतिम् ।
ततः स्त्रीणां वदन्तीनामुद्धवोगात्कृताहिकः ॥
४९॥
किमू्--क्या; साधयिष्यति--सम्पन्न करेगा; अस्माभि:--हमसे; भर्तु:--स्वामी का; प्रीतस्थ--तुष्ट रहने वाले का; निष्कृतिम्ू--पिण्डदान; ततः--तत्पश्चात्; स्रीणाम्ू--स्त्रियाँ; वदन््तीनामू--बोलती हुईं; उद्धवः--उद्धव; अगात्--वहाँ आया; कृत--करके;अहिकः--प्रातःकालीन धार्मिक कृत्य |
जब स्त्रियाँ इस तरह बोल ही रही थीं कि, 'क्या वह अपनी सेवाओं से प्रसन्न हुए अपनेस्वामी के पिण्डदान के लिए हमारे मांस को अर्पित करने जा रहा है ?' तभी प्रातःकालीन कृत्योंसे निवृत्त हुए उद्धव दिखलाई पड़े।
