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अध्याय उनतालीस: अक्रूर का हस्तिनापुर में मिशन

10.49श्रीशुक उबाचस गत्वा हास्तिनपुरं पौरवेन्द्रयशोड्डितम्‌ ।

ददर्शतत्राम्बिकेयं सभीष्मं विदुरं पृथाम्‌ ॥

१॥

सहपुत्रं च बाह्लीक॑ भारद्वाजं सगौतमम्‌ ।

कर्न सुयोधनं द्रौणिं पाण्डवान्सुहददोपरान्‌ ॥

२॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह ( अक्रूर ); गत्वा--जाकर; हास्तिन-पुरम्‌--हस्तिनापुर में; पौरव-इन्द्र--पुरुवंश के शासकों का; यशः--यश से; अड्भितम्‌--अलंकृत; ददर्श--देखा; तत्र--वहाँ; आम्बिकेयम्‌--अम्बिका कापुत्र ( धृतराष्ट्र )) स--सहित; भीष्मम्‌-- भीष्म; विदुरम्‌-विदुर को; पृथाम्‌-पृथा ( पाण्डु की विधवा, कुन्ती ); सह-पुत्रम्‌ू--अपने पुत्र सहित ( सोमदत्त ); च--तथा; बाहीकम्‌--महाराज बाह्लीक; भारद्वाजमू--द्रोण; स--तथा; गौतमम्‌ू--कृप;कर्णम्‌-कर्ण; सुयोधनम्‌--दुर्योधन; द्रौणिम्‌--द्रोण का पुत्र ( अश्वत्थामा ); पाण्डवान्‌ू--पाए-डु के पुत्रों को; सुहृदः --मित्र;अपरान्‌ू--अन्य।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अक्रूर पौरव शासकों की ख्याति से प्रसिद्ध नगरी हस्तिनापुरगये।

वहाँ वे धृतराष्ट्र, भीष्म, विदुर तथा कुन्ती के साथ साथ बाह्लीक तथा उसके पुत्र सोमदत्त सेमिले।

उन्होंने द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, अश्वत्थामा, पाण्डकगण तथा अन्य घनिष्टमित्रों से भी भेंट की।

यथावदुपसड्म्य बन्धुभिर्गान्दिनीसुत: ।

सम्पृष्ठस्तेः सुहद्वार्ता स्वयं चापृच्छद॒व्ययम्‌ ॥

३॥

यथा-वत्‌-- भलीभाँति; उपसड्म्ध--मिलकर; बन्धुभि:--अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों से; गान्दिनी-सुत:--गान्दिनी-पुत्र,अक्रूर; सम्पृष्ट:--पूछा; तैः--उनसे; सुहृत्‌--उनके प्रियजनों को; वार्तामू--समाचार के लिए; स्वयम्‌--स्वयं; च--साथ ही;अपृच्छत्‌--पूछा; अव्ययम्‌--उनकी कुशलता के बारे में |

जब गान्दिनी-पुत्र अक्रूर अपने समस्त सम्बन्धियों तथा मित्रों से भलीभाँति मिल चुके तो उनलोगों ने अपने परिवार वालों के समाचार पूछे और प्रत्युत्तर में अक्रूर ने उनकी कुशलता पूछी।

उवास कतिचिन्मासात्राज्ञो वृत्तविवित्सया ।

दुष्प्रजस्यथाल्पसारस्य खलच्छन्दानुवर्तिन: ॥

४॥

उबास--रहे; कतिचित्‌--कुछ; मासान्‌--महीने; राज्ञ:--राजा ( धृतराष्ट्र ) का; वृत्त--कार्यकलाप; विवित्सया--जानने कीइच्छा से; दुष्प्रजस्य--जिसके पुत्र दुष्ट थे; अल्प--निर्बल; सारस्य--जिसका संकल्प; खल--दुष्ट पुरुषों ( यथा कर्ण ) की;छन्‍्द--इच्छाएँ; अनुवर्तिन:--अनुगमन करने वाला |

वे हस्तिनापुर में दुर्बल-इच्छा शक्ति वाले राजा के आचरण की छानबीन करने के लिए कईमास रहे जिसके पुत्र बुरे थे और जो अपने दुष्ट सलाहकारों की इच्छानुसार कार्य करता रहता था।

तेज ओजो बल वीर्य प्रश्रयादींश्व सदगुणान्‌ ।

प्रजानुरागं पार्थेषु न सहद्धिश्चिकीऋषितम्‌ ॥

५॥

कृतं च धार्तराष्ट्रेयंद्गरदानाद्यपेशलम्‌ ।

आचख्यौ सर्वमेवास्मै पृथा विदुर एव च ॥

६॥

तेज:--प्रभाव; ओज:--चातुरी; बलम्‌--बल; वीर्यम्‌--बहादुरी; प्रश्रय--दीनता, विनय; आदीनू--इत्यादि; च--तथा; सत्‌ --उत्तम; गुणान्‌ू--गुणों को; प्रजा--नागरिकों का; अनुरागम्‌-महान्‌ स्नेह; पार्थेषु--पृथा के पुत्रों के लिए; न सहद्धिः--सहन नकर सकने वालों के; चिकीर्षितम्‌--मनो भाव; कृतम्‌--किया जा चुका; च-- भी; धार्तराष्ट्र: -- धृतराष्ट्र के पुत्रों द्वारा; यत्‌--जो;गर--विष का; दान--दान; आदि--इत्यादि; अपेशलम्‌-- अशो भनीय; आचख्यौ--बताया; सर्वम्‌--हर बात; एव--निस्सन्देह;अस्मै--उसको ( अक्रूर को ); पृथा--कुन्ती; विदुरः--विदुर; एव च--दोनों ने।

अक्रूर से कुन्ती तथा विदुर ने धृतराष्ट्र के पुत्रों की दुर्भावनाओं का विस्तार से वर्णन किया।

वे कुन्ती के पुत्रों के महान्‌ गुणों-यथा उनके शक्तिशाली प्रभाव, सैन्य-कौशल, शारीरिकबल, बहादुरी तथा विनयशीलता--या उनके प्रति नागरिकों के अगाध स्नेह को सहन नहीं करसकते थे।

कुन्ती तथा विदुर ने अक्रूर को यह भी बतलाया कि धुृतराष्ट्र के पुत्रों ने किस तरहपाण्डवों को विष देने तथा ऐसे ही अन्य षड्यंत्रों को रचने का प्रयास किया था।

पृथा तु भ्रातरं प्राप्तमक्रूरमुपसूृत्य तम्‌ ।

'उवाच जन्मनिलयं स्मरन्त्यश्रुकलेक्षणा ॥

७॥

पृथा--कुन्ती; तु--तथा; भ्रातरम्‌--अपने भाई ( वृष्णि का पौत्र, कुन्ती तथा बसुदेव की दसवीं पीढ़ी का पूर्बज ); प्राप्तम्‌--पाकर; अक्रूरम्‌--अक्रूर को; उपसृत्य--पास जाकर; तम्‌--उससे; उबवाच--बोलीं; जन्म--अपने जन्म; निलयम्‌--घर( मथुरा ); स्मरन्ती--स्मरण करती हुई; अश्रु--आँसुओं के; कला--अवशेषों से; ईक्षणा--जिसकी आँखें

अपने भाई अक्ूर के आने का लाभ उठाकर कुन्तीदेवी उनके पास चुपके से पहुँचीं।

अपनीजन्मभूमि ( मायका ) का स्मरण करते हुए वे अपनी आँखों में आँसू भरकर बोलीं।

अपि स्मरन्ति नः सौम्य पितरौ भ्रातरश्न मे ।

भगिन्यौ भ्रातृपुत्राश्च जामय: सख्य एव च ॥

८॥

अपि--क्या; स्मरन्ति--स्मरण करते हैं; न:--हमको; सौम्य--हे भद्र; पितरौ--माता-पिता; भ्रातर:-- भाई; च--तथा; मे--मेरी; भगिन्यौ--बहनें; भ्रातृ-पुत्राः-- भाइयों के बेटे; च--तथा; जामय:ः--परिवार की स्त्रियाँ; सख्य:--सखियाँ; एवं च--भी।

महारानी कुन्ती ने कहा : हे भद्र पुरुष, क्‍या मेरे माता-पिता, भाई, बहनें, भतीजे, परिवारकी स्त्रियाँ तथा बचपन की सखियाँ अब भी हमें याद करती हैं?भ् रात्रेयो भगवान्कृष्ण: शरण्यो भक्तवत्सलः ।

पैतृष्वस्त्रेयान्स्मरति रामश्चाम्बुरुहे क्षण: ॥

९॥

भ्रात्रे:-- भाई का पुत्र, भतीजा; भगवान्‌-- भगवान्‌; कृष्ण: --कृष्ण; शरण्य: --शरण देने वाला; भक्त--अपने भक्तों को;वत्सल:--दयालु; पैतृ-स्वस्त्रेयान्‌-- अपने पिता की बहन के लड़कों को; स्मरति--स्मरण करता है; राम:--बलराम; च--तथा;अम्बुरुह--कमल की पंखड़ियों जैसे; ईक्षण: --आँखें |

क्या मेरा भतीजा कृष्ण, जो भगवान्‌ है और अपने भक्तों की कृपालु शरण रूप है, अब भीअपनी बुआ के पुत्रों को स्मरण करता है? क्या कमल जैसी आँखों वाला राम भी उन्हें स्मरण करता है?सपतनमध्ये शोचन्तीं वृकानां हरिणीमिव ।

सान्त्वयिष्यति मां वाक्य: पितृहीनांश्च बालकान्‌ ॥

१०॥

सपल--शत्रुओं के; मध्ये--मध्य में; शोचन्तीमू--शोच करती; वृकानाम्‌-- भेड़ियों के; हरिणीम्‌--हिरनी; इब--सहृश;सान्त्वयिष्यति--क्या वह सान्त्वना दिलायेगा; मामू--मुझको; वाक्यैः --अपने शब्दों से; पितृ--उनके पिता; हीनानू--वंचित;च--तथा; बालकान्‌--बालकों को |

इस समय जब मैं अपने शत्रुओं के बीच में उसी तरह कष्ट भोग रही हूँ जिस तरह एक हिरनीभेड़ियों के बीच में पाती है, तो कया कृष्ण मुझे तथा पितृविहीन मेरे पुत्रों को अपनी वाणी सेसान्त्वना देने आयेंगे ?

कृष्ण कृष्ण महायोगिन्विश्वात्मन्विश्वभावन ।

प्रपन्नां पाहि गोविन्द शिशुभिश्चावसीदतीम्‌ ॥

११॥

कृष्ण कृष्ण--हे कृष्ण, हे कृष्ण; महा-योगिन्‌ू--महान्‌ आध्यात्मिक शक्ति के स्वामी; विश्व-आत्मनू--हे ब्रह्माण्ड के परमात्मा;विश्व-भावन--हे ब्रह्माण्ड के रक्षक; प्रपन्नामू--शरणागत स्त्री की; पाहि--रक्षा करो; गोविन्द--हे गोविन्द; शिशुभि: --मेंरेबच्चों समेत; च--तथा; अवसीदतीम्‌--दुख में डूब रही ।

हे कृष्ण, हे कृष्ण! हे महान्‌ योगी! हे परमात्मा तथा ब्रह्माण्ड के रक्षक! हे गोविन्द! मेरी रक्षाकीजिये।

मैं आपकी शरण में हूँ।

मैं तथा मेरे पुत्र दुख से अभिभूत हैं।

नान्यत्तव पदाम्भोजात्पश्यामि शरणं नृणाम्‌ ।

बिभ्यतां मृत्युसंसारादीस्वरस्यापवर्गिकात्‌ ॥

१२॥

न--नहीं; अन्यत्‌-- अन्य; तव--तुम्हारे; पद-अम्भोजात्‌--चरणकमल की अपेक्षा; पश्यामि--देख रही हूँ; शरणम्‌--शरण;नृणाम्‌-मनुष्यों के लिए; बिभ्यताम्‌--डरे हुए; मृत्यु--मृत्यु का; संसारातू--तथा पुनर्जन्म से; ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ का;आपवर्गिकात्‌-मोक्ष देने वाले

जो लोग मृत्यु तथा पुनर्जन्म से भयभीत हैं, उनके लिए मैं आपके मोक्षदाता चरणकमलों केअतिरिक्त अन्य कोई शरण नहीं देखती, क्योंकि आप परमेश्वर हैं।

नमः कृष्णाय शुद्धाय ब्रह्मणे परमात्मने ।

योगेश्वराय योगाय त्वामहं शरणं गता ॥

१३॥

नमः--नमस्कार; कृष्णाय--कृष्ण को; शुद्धाय--शुद्ध; ब्रह्मणे--ब्रह्म, परम सत्य; परम-आत्मने--परमात्मा; योग--शुद्ध-भक्ति के; ईश्वराय--नियन्ता को; योगाय--समस्त ज्ञान के उद्गम को; त्वामू--तुमको; अहम्‌--मैं; शरणम्‌--शरण के लिए;गता--पास आई हूँ।

मैं परम शुद्ध, परम सत्य, परमात्मा, शुद्ध-भक्ति के स्वामी तथा समस्त ज्ञान के उद्गम कोनमस्कार करती हूँ।

मैं आपकी शरण में आई हूँ।

श्रीशुक उबाचइत्यनुस्मृत्य स्वजनं कृष्णं च जगदी श्वरम्‌ ।

प्रारुदहु:खिता राजन्भवतां प्रपितामही ॥

१४॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इन शब्दों के साथ; अनुस्मृत्य--स्मरण करके; स्व-जनम्‌-- अपने सगे-सम्बन्धियों को; कृष्णम्‌--कृष्ण को; च--तथा; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; ईश्वरम्‌-- भगवान्‌ को; प्रारुदत्‌--जोर से रोने लगीं;दुःखिता--दुखी; राजन्‌--हे राजन्‌ ( परीक्षित ); भवताम्‌--आपकी; प्रपितामही --परदादी

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, इस तरह अपने परिवार वालों का तथा ब्रह्माण्ड केस्वामी कृष्ण का स्मरण करके आपकी परदादी कुन्तीदेवी शोक में रोने लगीं।

समदुःखसुखो क्रूरो विदुरश्च महायशा: ।

सान्त्वयामासतु: कुन्तीं तत्पुत्रोत्पत्तिहेतुभि: ॥

१५॥

सम--समान; दुःख--दुख में; सुख: --तथा सुख में; अक्रूर:ः--अक्रूर; विदुर: --विदुर; च--तथा; महा-यशा: --अत्यन्तविख्यात; सान्त्वयाम्‌ आसतु:--दोनों ने सान्त्वना दी; कुन्तीम्‌-- श्रीमती कुन्तीदेवी को; तत्‌--उसके; पुत्र--पुत्रों के; उत्पत्ति--जन्मों के; हेतुभि:--कारणों के विषय में व्याख्या समेत |

महारानी कुन्ती के सुख-दुख में हिस्सा बँटाने वाले अक्रूर तथा सुविख्यात विदुर दोनों ने हीकुन्ती को उनके पुत्रों के जन्म की असाधारण घटना की याद दिलाते हुए सान्त्वना दी।

यास्यन्नाजानमभ्येत्य विषमं पुत्रलालसम्‌ ।

अवदत्सुहृदां मध्ये बन्धुभि: सौहदोदितम्‌ ॥

१६॥

यास्यन्‌ू--जब वह जाने ही वाला था; राजानम्‌-राजा ( धृतराष्ट्र ) के; अभ्येत्य--पास जाकर; विषमम्‌--ईर्ष्यालु; पुत्र--पुत्रों केप्रति; लालसम्‌--लाड़-प्यार से; अवदत्‌--बोला; सुहृदाम्‌--सम्बन्धियों के; मध्ये--बीच में; बन्धुभि: --शुभचिन्तक सम्बन्धियों(कृष्ण तथा बलराम ) द्वारा; सौहद-मैत्री में; उदितम्‌ू--जो कहा जा चुका है।

राजा धृतराष्ट्र के अपने पुत्रों के प्रति अत्यधिक स्नेह ने उसे पाण्डवों के प्रति अन्यायपूर्णव्यवहार करने के लिए बाध्य किया था।

प्रस्थान करने के पूर्व अक्रूर राजा के पास गये जो उससमय अपने मित्रों तथा समर्थकों के बीच बैठा था।

अक्रूर ने उसे वह सन्देश दिया जो उनकेसम्बन्धी कृष्ण तथा बलराम ने मैत्रीवश भेजा था।

अक़रूर उबाचभो भो वैचित्रवीर्य त्वं कुरूणां कीर्तिवर्धन ।

भ्रातर्युपरते पाण्डावधुनासनमास्थित: ॥

१७॥

अक्रूरः उबाच--अक्रूर ने कहा; भोः भो:--हे प्रिय, हे प्रिय; वैचित्रवीर्य--विचित्रवीर्य के पुत्र; त्वम्‌ू--तुम; कुरूणाम्‌--कुरुओंकी; कीर्ति--यश; वर्धन--हे बढ़ाने वाले; भ्रातरि--अपने भाई के; उपरते--दिवंगत हो जाने के बाद; पाण्डौ--महाराज पाण्डुके; अधुना--अब; आसनमू्‌--सिंहासन पर; आस्थित:-- आसीन |

अक्रूर ने कहा : हे प्रिय विचित्रवीर्य के पुत्र, हे कुरूुओं की कीर्ति को बढ़ाने वाले, आपनेअपने भाई पाण्डु के दिवंगत होने के बाद राज-सिंहासन ग्रहण किया है।

धर्मेण पालयचुर्वी प्रजा: शीलेन रक्जयन्‌ ।

वर्तमान: समः स्वेषु श्रेयः कीर्तिमवाप्स्यसि ॥

१८॥

धर्मेण-- धर्मपूर्वक; पालयन्‌--रक्षा करते हुए; उर्बीम्‌--पृथ्वी को; प्रजा:--नागरिकजन; शीलेन--सच्चरित्रता से; रक्नयन्‌ --प्रसन्न करते हुए; वर्तमान: --रहते हुए; सम:--समभाव; स्वेषु-- अपने सम्बन्धियों के प्रति; श्रेय:--सफलता; कीर्तिम्‌ू--कीर्ति;अवाप्स्यसि--प्राप्त करोगे |

धर्मपूर्वक पृथ्वी की रक्षा करते हुए, अपनी सच्चरित्रता से अपनी प्रजा को प्रसन्न रखते हुएतथा अपने सारे सम्बन्धियों के साथ एकसमान व्यवहार करते हुए आप अवश्य ही सफलता तथाकीर्ति प्राप्त करेंगे।

अन्यथा त्वाचरँल्लोके गर्हितो यास्यसे तम:ः ।

तस्मात्समत्वे वर्तस्व पाण्डवेष्वात्मजेषु च ॥

१९॥

अन्यथा--नहीं तो; तु--फिर भी; आचरनू्‌--कर्म करते हुए; लोके--इस जगत में; गर्हित: --निन्‍्दनीय; यास्यसे --प्राप्त करोगे;तम:--अंधकार; तस्मात्‌--इसलिए; समत्वे--समभाव में; वर्तस्व--स्थित रहो; पाण्डवेषु--पाण्डवों के प्रति; आत्म-जेषु--अपने पुत्रों के प्रति; च--तथा

किन्तु यदि आप अन्यथा आचरण करेंगे तो लोग इसी लोक में आपकी निन्दा करेंगे औरअगले जन्म में आपको नारकीय अंधकार में प्रवेश करना होगा।

अतः आप पाण्डु के पुत्रों तथाअपने पुत्रों के प्रति एक-सा बर्ताव करें।

नेह चात्यन्तसंवास: कस्यचित्केनचित्सह ।

राजन्स्वेनापि देहेन किमु जायात्मजादिभि: ॥

२०॥

न--नहीं; इह--इस जगत में; च--तथा; अत्यन्त--शा श्रवत; संवास: --संगति ( एक साथ निवास ); कस्यचित्‌--किसी का;केनचित्‌ सह--किसी के साथ; राजनू--हे राजन; स्वेन--अपने; अपि-- भी; देहेन--शरीर से; किम्‌ उ--तो फिर कया कहा जासकता है; जाया-- पत्नी; आत्म-ज--सन्तान; आदिभि:ः--इत्यादि से

हे राजनू, इस जगत में किसी का किसी अन्य से कोई स्थायी सम्बन्ध नहीं है।

हम अपने हीशरीर के साथ जब सदा के लिए नहीं रह सकते तो फिर हमारी पत्नी, सन्‍्तान तथा अन्यों के लिएक्‍या कहा जा सकता है ?

एकः प्रसूयते जन्तुरेक एवं प्रलीयते ।

एकोबनुभुड़े सुकृतमेक एवं च दुष्कृतम्‌ ॥

२१॥

एकः--अकेला; प्रसूयते--जन्म लेता है; जन्तु:--जीव; एक:--अकेला; एव-- भी; प्रलीयते--विनष्ट हो जाता है; एक: --अकेला; अनुभुड़े -- भोग करता है; सुकृतम्‌--अपने अच्छे कर्म-फलों को; एक:--अकेला; एव च--तथा निश्चय ही;दुष्कृतम्‌-बुरे कर्म-फलों को |

हर प्राणी अकेला उत्पन्न होता है और अकेला मरता है।

अकेला ही वह अपने अच्छे और बुरेकर्मों के फलों का भी अनुभव करता है।

अधर्मोपचितं वित्त हरन्त्यन्येडइल्पमेधस: ।

सम्भोजनीयापदेशैर्जलानीव जलौकसः ॥

२२॥

अधर्म--अधर्म से; उपचितम्‌ू--जोड़ी गईं; वित्तम्‌--सम्पत्ति; हरन्ति--चुरा लेते हैं; अन्ये-- अन्य लोग; अल्प-मेधस: --अल्पज्ञकी; सम्भोजनीय--मदद चाहने वाला; अपदेशैः --झूठी उपाधियों से; जलानि--जल; इब--सह्ृश; जल-ओकसः:--जल केनिवासियों का

प्रिय आश्नितों के वेश में अनजाने लोग मूर्ख व्यक्ति द्वारा पाप से अर्जित सम्पत्ति को उसीतरह चुरा लेते हैं जिस तरह मछली की सनन्‍्तानें उस जल को पी जाती हैं, जो उनका पालन करनेवाला है।

पुष्णाति यानधर्मेण स्वबुद्धया तमपण्डितम्‌ ।

तेकृतार्थ प्रहिण्वन्ति प्राणा राय: सुतादय: ॥

२३॥

पुष्णाति--पोषण करता है; यान्‌ू--जो वस्तुएँ; अधर्मेण--पाप-कर्म से; स्व-बुद्धयघा--उन्हें अपनी सोचकर; तम्‌ू--उसको;अपण्डितमू--अशिक्षित; ते--वे; अकृत-अर्थम्‌--मनोरथ का निष्फल होना; प्रहिण्वन्ति--छोड़ देते हैं; प्राणा: -- प्राण; राय: --सम्पत्ति; सुत-आदय:--सन्तान इत्यादि |

मूर्ख व्यक्ति अपने जीवन, सम्पत्ति तथा सन्‍्तान एवं अन्य सम्बन्धियों का भरण-पोषण करनेके लिए पाप-कर्म में प्रवृत्त होता है क्योंकि वह सोचता है 'ये वस्तुएँ मेरी हैं।

किन्तु अन्त में येही वस्तुएँ उसे कुंठित अवस्था में छोड़ जाती हैं।

स्वयं किल्बिषमादाय तैस्त्यक्तो नार्थकोविद: ।

असिद्धार्थो विशत्यन्धं स्वधर्मविमुखस्तम: ॥

२४॥

स्वयम्‌--अपने लिए; किल्बिषम्‌--पापपूर्ण कर्म-फल; आदाय--लेकर; तैः --उनके द्वारा; त्यक्त:--छोड़ा हुआ; न--नहीं;अर्थ--अपने जीवन के लिए; कोविद:--ठीक से जानते हुए; असिद्ध--अपूर्ण; अर्थ: --लक्ष्य; विशति-- प्रवेश करता है;अन्धम्‌--गहन, घोर; स्व--निजी; धर्म--धर्म से; विमुख: --उदासीन; तम:--अंधकार ( नर्क का )

अपने तथाकथित आश्रितों से परित्यक्त होकर, जीवन के वास्तविक लक्ष्य से अनजान,अपने असली कर्तव्य से उदासीन तथा अपने उद्देश्यों को पूरा करने में असफल होकर, बह मूर्खव्यक्ति अपने पाप-कर्मों को अपने साथ लेकर नर्क के अंधकार में प्रवेश करता है।

तस्माललोकमिमं राजन्स्वप्नमायामनोरथम्‌ ।

वीक्ष्यायम्यात्मनात्मानं समः शान्तो भव प्रभो ॥

२५॥

तस्मात्‌ू--इसलिए; लोकम्‌--संसार को; इमम्‌--इस; राजनू--हे राजन; स्वप्न--स्वण; माया--जादूगरी; मन:-रथम्‌ू--या मनकी कल्पना के रूप में; वीक्ष्य--देखकर; आयम्य--वश में करके; आत्मना--बुद्धि से; आत्मानम्‌--मन को; सम:--समभाव;शान्तः--शान्त; भव--बनो; प्रभो--हे स्वामी |

अतः हे राजनू, इस संसार को स्वप्नवत, जादूगर का मायाजाल या मन की उड़ान समझकर, बुद्धि से अपने मन को वश में कीजिये और हे स्वामी! आप समभाव तथा शान्त बनिये।

धृतराष्ट्र उबाचयथा वदति कल्याणीं वाचं दानपते भवान्‌ ।

तथानया न तृप्यामि मर्त्य: प्राप्पय यथामृतम्‌ ॥

२६॥

धृतराष्ट्र: उवाच-- धृतराष्ट्र ने कहा; यथा--जिस तरह; वदति--बोलते हैं; कल्याणीम्‌--शुभ, मंगल; वाचम्‌--शब्द; दान--दानके; पते--हे स्वामी; भवान्‌ू--आप; तथा--उसी तरह; अनया--इससे; न तृप्यामि--मैं तृप्त नहीं हूँ; मर्त्य:--मरणशील;प्राप्प--प्राप्त करके; यथा--मानो; अमृतम्‌-- अमृत |

धृतराष्ट्र ने कहा : हे दानपति, मैं आपके शुभ-वचनों को सुनते हुए कभी भी तृप्त नहीं होसकता।

निस्सन्देह, मैं उस मर्त्य प्राणी की तरह हूँ जिसे देवताओं का अमृत प्राप्त हो चुका है।

तथापि सूनृता सौम्य हृदि न स्थीयते चले ।

पुत्रानुरागविषमे विद्युत्सौदामनी यथा ॥

२७॥

तथा अपि--फिर भी; सूनृता--मोहक शब्द; सौम्य--हे भद्र; हदि--मेरे हृदय में; न स्थीयते--स्थिर नहीं रहते; चले--जोचलायमान है; पुत्र--मेरे पुत्रों के लिए; अनुराग--स्नेह से; विषमे--पक्षपातपूर्ण ; विद्युतू--बिजली; सौदामनी--बादल में;यथा--जिस तरह।

फिर भी, हे भद्र अक्रूर, क्योंकि मेरा अस्थिर हृदय अपने पुत्रों के स्नेह से पक्षपातयुक्त हैइसलिए आपके ये मोहक शब्द हृदय में स्थिर नहीं टिक पाते, जिस तरह बिजली बादल में स्थिरनहीं रह सकती।

ईश्वरस्य विधि को नु विधुनोत्यन्यथा पुमान्‌ ।

भूमेर्भारावताराय योवतीर्णो यदो: कुले ॥

२८॥

ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ के; विधिम्‌--कानून को; कः-- क्या; नु--तनिक भी; विधुनोति--हटा सकता है; अन्यथा--नहीं तो;पुमानू-- पुरुष; भूमेः: --पृथ्वी का; भार--बोझ; अवताराय--कम करने के लिए; यः--जो; अवतीर्ण:--अवतरित हुआ है;यदोः--यदु के; कुले--परिवार में

भला उन भगवान्‌ के आदेशों का उल्लंघन कौन कर सकता है, जो पृथ्वी का भार कमकरने के लिए अब यदुवंश में अवतार ले चुके हैं?

यो दुर्विमर्शपथया निजमाययेदंसृष्ठा गुणान्विभजते तदनुप्रविष्ट: ।

तस्मै नमो दुरवबो धविहारतन्त्र-संसारचक्रगतये परमेश्वराय ॥

२९॥

यः--जो; दुर्विमर्श--अचिन्त्य; पथया--जिसका मार्ग; निज--अपनी; मायया--सृजनात्मक शक्ति से; इृदम्‌--इस ब्रह्माण्डको; सृष्टा--सूजित करके ; गुणानू--इसके गुणों को; विभजते--बाँट देता है; तत्‌--उसी के भीतर; अनुप्रविष्ट:--प्रवेश करतेहुए; तस्मै--उसको; नमः--नमस्कार; दुरवबोध--- अथाह; विहार--लीला; तन्त्र--तात्पर्य; संसार--जन्म तथा मृत्यु का;चक्र--चक्कर; गतये--तथा मोक्ष; परम-ईश्रराय-- परम नियन्ता के प्रति।

मैं उन भगवान्‌ को नमस्कार करता हूँ जो अपनी भौतिक शक्ति की अचिन्त्य क्रियाशीलतासे इस ब्रह्माण्ड का सृजन करते हैं और फिर सृष्टि के भीतर प्रविष्ट होकर प्रकृति के विभिन्न गुणोंको वितरित कर देते हैं।

जिनकी लीलाओं का अर्थ अगाध है, उन्हीं से यह जन्म-मृत्यु काबन्धनकारी चक्र तथा उससे मोक्ष पाने की विधि उत्पन्न हुए हैं।

तात्पर्य : इतना सब कुछ कहने पर भी धृतराष्ट्र सामान्य व्यक्ति न होकर भगवान्‌ कृष्ण का संगीथा।

निश्चय ही भगवान्‌ के प्रति ऐसी विद्वत्तापूर्ण स्तुति कोई सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता था।

श्रीशुक उबाचइत्यभिप्रेत्य नृपतेरभिप्रायं स यादव: ।

सुहद्धि: समनुज्ञातः पुनर्यदुपुरीमगात्‌ ॥

३०॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; अभिप्रेत्य--निश्चित करके; नृपतेः--राजा की; अभिप्रायम्‌--मनोवृत्ति; सः--वह; यादव: --राजा यदु का वंशज, अक्रूर; सुहर्द्धिः--अपने शुभचिन्तकों द्वारा; समनुज्ञात:--विदा होने कीअनुमति दिया हुआ; पुनः --फिर; यदु-पुरीम्‌--यदुवंश की नगरी में; अगात्‌ू--गया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा, इस तरह राजा के अभिप्राय को समझकर यदुवंशी अक्रूर नेअपने शुभचिन्तक सम्बन्धियों तथा मित्रों से अनुमति ली और यादवों की राजधानी लौट आये।

शशंस रामकृष्णाभ्यां धृतराष्ट्रविचेष्टितम्‌ ।

पाण्दवान्प्रति कौरव्य यदर्थ प्रेषित: स्वयम्‌ ॥

३१॥

शशंस--सूचित किया; राम-कृष्णाभ्याम्‌ू--बलराम तथा कृष्ण को; धृतराष्ट्र-विचेष्टितम्‌-- धृतराष्ट्र के आचरण; पाण्डवान्‌प्रति--पाण्डु के पुत्रों के प्रति; कौरव्य--हे कुरुवंशी ( परीक्षित ); यत्‌--जिस; अर्थम्‌--प्रयोजन के लिए; प्रेषित:-- भेजा गया;स्वयम्‌--स्वयं।

अक्रूर ने बलराम तथा कृष्ण को यह सूचित किया कि धृतराष्ट्र का पाण्डवों के प्रति कैसाबर्ताव है।

इस तरह हे कुरुवंशी, उन्होंने उस अभिप्राय की पूर्ति कर दी जिसके लिए वे भेजे गयेथे।

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