← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय अड़सठवाँ: सांबा का विवाह
10.68श्रीशुक उबाच दुर्योधनसुतां राजन्लक्ष्मणां समितिंजय: ।
स्वयंवरस्थामहरत्साम्बो जाम्बवतीसुत: ॥
१॥
श्री-शुक: उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; दुर्योधन-सुताम्-दुर्योधन की पुत्री; राजन्ू--हे राजा ( परीक्षित ); लक्ष्मणाम्ू-- लक्ष्मणा को; समितिम्-जय:--युद्ध में विजयी; स्वयं-बर--स्वयंवर समारोह में ; स्थाम्--स्थित; अहरत्--चुरा लिया; साम्ब:--साम्ब ने; जाम्बबती-सुत: --जाम्बवती का पुत्र |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, जाम्बवती के पुत्र साम्ब ने जो सदैव युद्ध में विजयी होता था, दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा उसके स्वयंवर समारोह से अपहरण कर लिया।
कौरवा: कुपिता ऊचुर्दुर्विनीतोयमर्भकः ।
कदर्थीकृत्य नः कन्यामकामामहरद्ठलातू ॥
२॥
कौरवा:--कुरुओं ने; कुपिता:--क्रुद्ध; ऊचु:--कहा; दुर्विनीत:--बुरे आचरण वाला; अयम्--यह; अर्भक:--बालक;कदर्थी-कृत्य--अपमानित करके; न:--हमको; कन्याम्--कुमारी लड़की को; अकामाम्--अनचाहे; अहरत्--ले गया;बलातू--बलपूर्वक
क्रुद्ध कौरवों ने कहा : इस बुरे आचरण वाले बालक ने हमारी अविवाहिता कन्या कोउसकी इच्छा के विरुद्ध बलपूर्वक हर कर हमारा अपमान किया है।
बध्नीतेम॑ दुर्विनीतं कि करिष्यन्ति वृष्णय: ।
येउस्मत्प्रसादोषचितां दत्तां नो भुझ्जते महीम् ॥
३॥
बध्नीत--बन्दी बना लो; इमम्--इस; दुर्विनीतम्--बुरे आचरण वाले को; किम्ू--क्या; करिष्यन्ति--कर लेंगे; वृष्णय:--वृष्णिजन; ये--जो; अस्मत्--हमारी; प्रसाद--कृपा से; उपचिताम्--अर्जित; दत्ताम्--प्रदत्त; न:--हमारा; भुझ्जते-- भोग रहेहैं; महीम्-पृथ्वी को
बुरे आचरण वाले इस साम्ब को बन्दी बना लो।
आखिर वृष्णिजन हमारा क्या कर लेंगे? वेहमारी ही कृपा से हमारे द्वारा प्रदत्त पृथ्वी पर शासन कर रहे हैं।
निगृहीतं सुतं श्रुत्वा यद्येष्यन्तीह वृष्णय: ।
भग्नदर्पा: शमं यान्ति प्राणा इव सुसंयता: ॥
४॥
निगृहीतम्--बन्दी बनाया; सुतम्--अपने पुत्र को; श्रुत्वा--सुन कर; यदि--यदि; एष्यन्ति-- आयेंगे; इह--यहाँ; वृष्णय: --वृष्णिजन; भग्न--चूर चूर; दर्पा:--जिनका घमंड; शमम्--शान्ति; यान्ति--प्राप्त करेंगे; प्राणा:--इन्द्रियाँ; इब--सहश; सु--उचित रीति से; संयता: --वशीभूत |
यदि वृष्णि लोग यह सुनकर कि उनका पुत्र पकड़ा गया है यहाँ आते हैं, तो हम उनके घमंडको तोड़ डालेंगे।
इस प्रकार से वे उसी तरह दमित हो जायेंगे जिस तरह कठोर नियंत्रण केअन्तर्गत शारीरिक इन्द्रियाँ दमित हो जाती हैं।
इति कर्ण: शलो भूरिर्यज्ञकेतु: सुयोधन: ।
साम्बमारेभिरे योद्धुं कुरुवृद्धानुमोदिता: ॥
५॥
इति--यह कह कर; कर्ण: शलः भूरिः--कर्ण, शल तथा भूरि ( सौमदत्ति ); यज्ञकेतु: सुयोधन:--यज्ञकेतु ( भूरिश्रवा ) तथादुर्योधन; साम्बम्--साम्ब के विरुद्ध; आरेभिरे--रवाना हो गये; योद्धुमू-युद्ध करने के लिए; कुरु-वृद्ध--कुरुओं के गुरुजन( भीष्म ) द्वारा; अनुमोदिता: --स्वीकृति दिये जाने पर।
यह कह कर तथा कुरुवंश के वयोवृद्ध सदस्य द्वारा अपनी योजना की स्वीकृति लेने परकर्ण, शल, भूरि, यज्ञकेतु तथा सुयोधन साम्ब पर आक्रमण करने के लिए कूच कर गए।
इृष्ठानुधावतः साम्बो धार्तराष्ट्रान्महारथ: ।
प्रगृह्य रुचिरं चापं तस्थौ सिंह इबैकलः ॥
६॥
इष्ठा--देख कर; अनुधावत:--अपनी ओर दौड़ते हुए; साम्ब:--साम्ब; धार्तराष्ट्रानू-- धृतराष्ट्र के अनुयायियों को; महारथ:--महान् रथ-योद्धा; प्रगृह्य--पकड़ कर; रुचिरम्--सुन्दर; चापमू-- अपना धनुष; तस्थौ--खड़ा रहा; सिंहः--सिंह; इब--सहश;एकलः:--अकेला।
दुर्योधन तथा उसके साथियों को अपनी ओर दौड़ते देखकर, महारथी साम्ब ने अपना सुन्दरधनुष धारण कर लिया और वह सिंह की तरह अकेला खड़ा हो गया।
त॑ ते जिधृक्षव: क्रुद्धास्तिष्ठ तिष्ठति भाषिण: ।
आसाद्य धन्विनो बाणै: कर्णाग्रण्य: समाकिरन् ॥
७॥
तम्--उसको; ते--वे; जिघृक्षव:ः--पकड़ने के लिए हृढ़-संकल्प; क्रुद्धा:--क्रुद्ध; तिष्ठ तिष्ठ इति--जरा ठहरो, ठहरो;भाषिण:--कहते हुए; आसाद्य--सामने आकर; धन्विन:ः--धनुर्धर; बाणै:ः--अपने बाणों से; कर्ण-अग्रण्य:--कर्ण इत्यादि ने;समाकिरन्--उस पर वर्षा की ।
पकड़ने के लिए कृतसंकल्प, क्रुद्ध कर्ण इत्यादि धनुर्धरों ने जोर-जोर से साम्ब से कहा,'ठहरो और युद्ध करो, ठहरो और युद्ध करो।
' वे उसके पास आये और उस पर बाणों की वर्षाकरने लगे।
सोपविद्धः कुरु श्रेष्ठ कुरुभिर्यदुनन्दनः ।
नामृष्यत्तदचिन्त्यार्भ: सिंह क्षुद्रमृगैरिव ॥
८ ॥
सः--वह; अपविद्ध:--अन्यायपूर्वक आक्रमण किया गया; कुरु-श्रेष्ट--हे कुरु- श्रेष्ठ ( परीक्षित महाराज ); कुरुभि:ः--कुरुओंद्वारा; यदु-नन्दन:--यदुकुल के प्रिय पुत्र ने; न अमृष्यत्--सहन नहीं किया; तत्--उसे; अचिन्त्य-- भगवान् कृष्ण का;अर्भ:--बालक; सिंह:--सिंह; क्षुद्र--नगण्य; मृगैः--पशुओं द्वारा; इब--सहृश |
हे कुरु-श्रेष्ठ, चूँकि कृष्ण के पुत्र साम्ब को कुरुगण अनैतिक रीति से तंग कर रहे थे अतःयदुकुल का वह प्रिय पुत्र उनके आक्रमण को सहन नहीं कर सका जिस तरह एक सिंह श्षुद्रपशुओं के आक्रमण को सहन नहीं कर पाता।
विस्फूर्ज्य रुचिरं चाप॑ सर्वान्विव्याध सायकै: ।
कर्णादीन्षड्रथान्वीरस्तावद्धिर्युगपत्पूृथक् ॥
९॥
चतुर्मिश्चतुरो वाहानेकेकेन च सारथीन् ।
रथिनश्व महेष्वासांस्तस्य तत्ते भ्यपूजयन् ॥
१०॥
विस्फूर्ण्य--टंकार करके; रुचिरमू-- आकर्षक; चापम्--अपने धनुष को; सर्वान्ू--सबों को; विव्याध--बेध डाला;सायकै:--बाणों से; कर्ण-आदीन्--कर्ण तथा अन्यों को; घट्--छः; रथान्ू--रथों को; वीर: --वीर, साम्ब ने; तावद्धिः--उतने ही; युगपत्ू--एकसाथ; पृथक्--अलग अलग; चतुर्भि: --चार ( बाणों ) से; चतुरः--चार; वाहान्--घोड़ों को ( प्रत्येकरथ के ); एक-एकेन--एक-एक से; च--तथा; सारथीन्--सारथियों को; रथिन:--रथ की बागडोर सँभालने वाले योद्धाओंको; च--तथा; महा-इषु-आसान्--बड़े बड़े धनुर्धरों को; तस्य--उसका; तत्--वह; ते--उन्होंने; अभ्यपूजयन्ू--आदरकिया।
अपने अद्भुत धनुष को टंकार करके वीर साम्ब ने बाणों से कर्ण आदि छहों योद्धाओं परप्रहार किया।
उसने छहों रथों को उतने ही बाणों से, चारों घोड़ों की टोली को चार बाणों से औरप्रत्येक सारथी को एक एक बाण से बेध डाला।
इसी तरह उसने रथों की बागडोर सँभालने वाले( रथी ) महान् धनुर्धरों पर भी प्रहार किया।
शत्रु योद्धाओं ने साम्ब को उसके इस पराक्रम प्रदर्शनके लिए बधाई दी।
तं तुते विरथं चक्रुश्वत्वारश्नतुरो हयान् ।
एकस्तु सारथि जघ्ने चिच्छेदण्य: शरासनम् ॥
११॥
तम्--उसको; तु--लेकिन; ते--उन्होंने; विरथम्--रथविहीन; चक्कुः--किया गया; चत्वार: --चार; चतुरः --उनमें से चार;हयानू--घोड़ों को; एक:--एक ने; तु--तथा; सारधिम्--सारथी को; जघ्मे--मारा; चिछेद--चीर डाला; अन्य: --दूसरा; शर-असनमू--उसके धनुष को।
किन्तु उन्होंने उसे रथ से नीचे उतरने पर विवश कर दिया और उसके बाद उनमें से चार नेउसके चारों घोड़ों को मार दिया, एक ने उसके सारथी को मार डाला और दूसरे ने उसके धनुषको तोड़ डाला।
त॑ बद्ध्वा विरथीकृत्य कृच्छेण कुरवो युधि ।
कुमारं स्वस्थ कन्यां च स्वपुरं जयिनोविशन् ॥
१२॥
तमू--उसको; बद्ध्वा--बाँधकर; विरथी-कृत्य--उसको रथ से विहीन करके; कृच्छेण --कठिनाई से; कुरव:--कुरुओं ने;युधि--युद्ध में; कुमारमू--कुमार या बालक को; स्वस्य--अपनी; कन्याम्--पुत्री; च--तथा; स्व-पुरम्--अपने नगर;जयिन:ः--विजयी; अविशनू--प्रवेश किया |
युद्ध के दौरान साम्ब को रथविहीन करके कुरु-योद्धाओं ने बड़ी मुश्किल से उसे बाँधलिया और तब वे उस कुमार तथा अपनी राजकुमारी को लेकर विजयी भाव से अपने नगर मेंप्रविष्ट हुए।
तच्छ॒त्वा नारदोक्तेन राजन्सज्जातमन्यवः ।
कुरूय्प्रत्युद्यमं चक्रुरुग्रसेनप्रचोदिता: ॥
१३॥
तत्--यह; श्रुत्वा--सुनकर; नारद--नारदमुनि के; उक्तेन--कथनों से; राजन्ू--हे राजा ( परीक्षित ); सज्ञात--जागा हुआ;मन्यव:ः--जिसका क्रोध; कुरून्ू--कुरुओं के; प्रति--प्रति; उद्यमम्--युद्ध की तैयारियाँ; चक्रु:--कीं; उग्रसेन--उग्रसेन द्वारा;प्रचोदिता:--प्रेरित
हे राजन, जब यादवों ने श्री नारद से यह समाचार सुना तो वे क्रुद्ध हो उठे।
राजा उग्रसेनद्वारा प्रेरित किये जाने पर उन्होंने कुरूओं के विरुद्ध युद्ध की तैयारी कर ली।
सान्त्वयित्वा तु तान्रामः सन्नद्धान्वृष्णिपुड्रवान् ।
नैच्छत्कुरूणां वृष्णीनां कलिं कलिमलापह: ॥
१४॥
जगाम हास्तिनपुरं रथेनादित्यवर्चसा ।
ब्राह्मण: कुलवृद्धैश्च वृतश्चन्द्र इव ग्रह: ॥
१५॥
सान्त्वयित्वा--शान्त करके; तु--लेकिन; तान्ू--उनको; राम:--बलराम; सन्नद्धानू--कवच पहने; वृष्णि-पुड्रवान्--वृष्णिवंशीवबीरों को; न ऐच्छत्--नहीं चाहा; कुरूणाम् वृष्णीनाम्ू--कुरुओं तथा वृष्णियों के मध्य; कलिमू--कलह, झगड़ा; कलि--कलह के युग का; मल--कल्मष; अपहः --हटाने वाले; जगाम--गया; हास्तिन-पुरम्--हस्तिनापुर; रथेन--अपने रथ से;आदित्य--सूर्य ( सहश ); वर्चसा--तेज वाले; ब्राह्मणैः:--ब्राह्मणों के साथ; कुल--परिवार के; वृद्धैः--गुरुजनों के साथ;च--तथा; वृतः--घिरे हुए; चन्द्र: --चन्द्रमा; इब--सहश; ग्रहैः--सात ग्रहों से ।
किन्तु भगवान् बलराम ने वृष्णि-वीरों के क्रोध को शान्त किया जिन्होंने पहले से अपनेकवच धारण कर लिये थे।
कलह के युग को शुद्ध करने वाले ( बलराम ) कुरुओं तथा वृष्णियों के बीच कलह नहीं चाहते थे।
अतः वे ब्राह्मणों तथा परिवार के गुरुजनों ( बड़े-बूढ़ों ) के साथअपने रथ पर हस्तिनापुर गये।
उनका रथ सूर्य की तरह तेजोमय था।
जब वे जा रहे थे तो ऐसेलग रहे थे मानो प्रधान ग्रहों द्वारा घिरा चन्द्रमा हो।
गत्वा गजाह्ययं रामो बाह्योपवनमास्थित: ।
उद्धवं प्रेषयामास धृतराष्ट्रं बुभुत्सया ॥
१६॥
गत्वा--जाकर; गजाह्यम्ू--हस्तिनापुर; राम:-- बलराम; बाह्य --बाहर; उपवनम्--बगीचे में; आस्थित:--ठहर गये;उद्धवम्--उद्धव को; प्रेषयाम् आस--भेजा; धृतराष्ट्रमू-- धृतराष्ट्र के विषय में; बुभुत्सया--जानने की इच्छा से |
हस्तिनापुर पहुँचकर बलराम नगर के बाहर एक बगीचे में रह गए और उद्धव को धुृतराष्ट्र केइरादों का पता लगाने के लिए आगे भेज दिया।
सोभिवन्द्याम्बिकापुत्रं भीष्म द्रोणं च बाहिकम् ।
दुर्योधनं च विधिवद्राममागतं अब्नवीत् ॥
१७॥
सः--वह, उद्धव; अभिवन्द्य--वन्दना करके ; अम्बिका-पुत्रमू--अम्बिका-पुत्र, धृतराष्ट्र को; भीष्मम् द्रोणम् च-- भीष्म तथाद्रोण को; बाहिकम् दुर्योधनम् च--तथा बाहिक और दुर्योधन को; विधि-वत्--शास्त्रों के आदेशानुसार; राममू--बलराम को;आगतम्--आया हुआ; अब्नवीत्--उसने कहा
अम्बिका-पुत्र ( धृतराष्ट्र ) तथा भीष्म, द्रोण, बाहिक तथा दुर्योधन को समुचित आदर देकरउद्धव ने उन्हें बतलाया कि भगवान् बलराम आ गये हैं।
तेअतिप्रीतास्तमाकर्ण्य प्राप्तं राम सुहृत्तमम् ।
तमर्चयित्वाभिययु: सर्वे मड्डलपाणय: ॥
१८ ॥
ते--वे; अति--अत्यन्त; प्रीता:--प्रसन्न; तम्ू--उससे; आकर्ण्य--सुनकर; प्राप्तम्--आया हुआ; रामम्--बलराम को; सुहत्-तमम्--अपने प्रियतम मित्र; तम्--उसको, उद्धव को; अर्चयित्वा--पूज कर; अभिययु:--गये; सर्वे--वे सभी; मकल--शुभभेंटें; पाणय:--अपने हाथों में |
यह सुनकर कि उनके प्रियतम मित्र बलराम आ चुके हैं, वे अत्यधिक प्रसन्न हुए औरसर्वप्रथम उन्होंने उद्धव का आदर किया।
तत्पश्चात् वे अपने हाथों में शुभ भेंटें लेकर भगवान् सेमिलने गये।
त॑ सड्भम्य यथान्यायं गामर्ध्य च॒ न््यवेदयन् ।
तेषां ये तत्प्रभावज्ञा: प्रणेमु: शिरसा बलम् ॥
१९॥
तम्--उसके; सड्गडम्य--पास जाकर; यथा--जिस तरह; न्यायम्ू--उचित; गाम्--गौवें; अर्ध्यम्--अर्घध्यजल; च--तथा;न्यवेदयन्-- भेंट किया; तेषाम्--उनमें से; ये--जो; तत्--उसकी; प्रभाव--शक्ति; ज्ञा:--जानने वाले; प्रणेमु:--प्रणाम किया;शिरसा--अपने सिरों से; बलम्ू--बलराम को |
वे भगवान् बलराम के पास गये और गौबों तथा अर्ध्य की भेंटों से, यथोचित विधि से उनकीपूजा की।
कुरुओं में से उन लोगों ने जो उनकी असली शक्ति से परिचित थे भूमि को सिर से छूकर उन्हें प्रणाम किया।
बन्धून्कुशलिन: श्रुत्वा पृष्ठा शिवमनामयम् ।
'परस्परमथो रामो बभाषेविक्लवं बच: ॥
२०॥
बन्धूनू--उनके सम्बन्धियों को; कुशलिन:ः --कुशलपूर्वक; श्रुत्वा--सुनकर; पृष्ठा --पूछ कर; शिवम्--उनकी कुशल-मंगल;अनामयम्--तथा स्वास्थ्य; परस्परम्--एक-दूसरे में; अथ उ--तत्पश्चात; राम: --बलराम; बभाषे--बोला; अविक्लवमू--सीधे;बच: -शब्द।
जब दोनों पक्षों ने सुन लिया कि उनके सम्बन्धीगण कुशल-मंगल से हैं और दोनों ने एक-दूसरे से कुशल-मंगल तथा स्वास्थ्य के विषय में पूछताछ कर ली तो बलराम ने कुरुओं से सीधेतौर पर इस प्रकार से कहा।
उग्रसेन: क्षितेशेशो यद्व आज्ञापयत्प्रभु: ।
तदव्यग्रधिय: श्रुत्वा कुरुध्वमविलम्बितम् ॥
२१॥
उग्रसेन:--राजा उग्रसेन ने; क्षित--पृथ्वी के; ईश--शासकों का; ईश:--शासक; यत्--जो; वः--तुमसे; आज्ञापयत्--यहमाँग की है; प्रभु:--हमारे स्वामी; तत्ू--वह; अव्यग्र-धिय:--एकाग्र होकर; श्रुत्वा--सुनकर; कुरु ध्वम्--तुम लोगों को करनाचाहिए; अविलम्बितम्--बिना देर लगाये।
बलरामजी ने कहा : राजा उग्रसेन हमारे स्वामी तथा राजाओं के भी शासक हैं।
तुम लोगएकाग्र चित्त से उसे सुन लो जो उन्होंने तुम लोगों को करने के लिए कहा है और तब उसे तुरन्तकरो।
यद्यूयं बहवस्त्वेक॑ जित्वाधमेंण धार्मिकम् ।
अबध्नीताथ तन्मृष्ये बन्धूनामैक्यकाम्यया ॥
२२॥
यतू्--जो; यूयम्--तुम सभी; बहव: -- अनेक; तु--लेकिन; एकम्--एक व्यक्ति को; जित्वा--जीत कर; अधर्मेण-- धर्म केविरुद्ध; धार्मिकम्-- धर्म का पालन करने वाले को; अबध्नीत--तुमने बाँध लिया है; अथ--ऐसा होते हुए भी; तत्--वह;मृष्ये--मैं सहन कर रहा हूँ; बन्धूनाम्--सम्बन्धियों के बीच; ऐक्य--एकता के लिए; काम्यया--इच्छा से |
राजा उग्रसेन ने कहा है : यद्यपि तुम में से कई ने अधर्म का सहारा लेकर धर्म केसिद्धान्तों पर चलने वाले अकेले प्रतिद्वन्द्ी को पराजित किया है फिर भी मैं पारिवारिक सदस्योंमें एकता बनाये रखने के लिए यह सब सहन कर रहा हूँ।
वीर्यशौर्यबलोन्नद्धमात्मशक्तिसमं वच: ।
कुरवो बलदेवस्य निशम्योचु: प्रकोषिता: ॥
२३॥
वीर्य--शक्ति; शौर्य--साहस; बल--तथा बल से; उन्नद्धम्--पूरित; आत्म--अपनी; शक्ति--शक्ति; समम्--उपयुक्त; बच: --शब्द; कुरवः--कौरवजन; बलदेवस्य--बलदेव के; निशम्य--सुनकर; ऊचु:--बोले; प्रकोपिता:
-क्रुद्ध बलराम के पराक्रम, साहस तथा बल से पूरित एवं उनकी शक्ति के समरुप इन शब्दों कोसुनकर कौरवगण क्रुद्ध हो उठे और इस प्रकार बोले।
अहो महतच्चित्रमिदं कालगत्या दुरत्यया ।
आरुरुक्षत्युपानद्वै शिरो मुकुटसेवितम् ॥
२४॥
अहो--ओह; महत्--अतीव; चित्रमू--आश्चर्य; इदम्--यह; काल--समय की; गत्या--गति से; दुरत्यया--दुर्निवार, दुर्लघ्य;आरुरक्षति--चोटी पर चढ़ना चाहता है; उपानत्--जूता; बै--निस्सन्देह; शिर:--सिर; मुकुट--मुकुट से युक्त; सेवितमू--सुशोभित
कुरुनायकों ने कहा : ओह, यह कितनी विचित्र बात है! काल की गति निस्सन्देह दुर्लघ्यहै--अब ( पैरों की ) एक जूती उस सिर पर चढ़ना चाहती है, जिसमें राजमुकुट सुशोभित है।
एते यौनेन सम्बद्धा: सहशय्यासनाशना: ।
वृष्णयस्तुल्यतां नीता अस्मद्तत्तनृपासना: ॥
२५॥
एते--ये; यौनेन--वैवाहिक सम्बन्ध द्वारा; सम्बद्धा:--जुड़े हुए; सह--साथ साथ; शय्या--बिस्तर; आसन--आसन;अशना:--तथा भोजन; वृष्णय:--वृष्णिगण; तुल्यताम्--समानता पर; नीता:--लाये गये; अस्मत्--हमारे द्वारा; दत्त--दियाहुआ; नृप-आसना: --राज-सिंहासन |
चूँकि ये वृष्णिजन हमसे वैवाहिक सम्बन्धों से बँधे हैं इसलिए हमने इन्हें अपनी शय्या,आसन तथा भोजन में बराबरी का पद दे रखा है।
असल में तो हमीं ने इन्हें राज-सिंहासन प्रदानकिया है।
चामरव्यजने शह्डुमातपत्र च पाण्डुरम् ।
किरीटमासन शब्यां भुझ्जतेस्मदुपेक्षया ॥
२६॥
चामर--चमरी की पूँछ के बाल के; व्यजने--दो पंखे; शट्डम्--शंख; आतपत्रम्--छाता; च--तथा; पाण्डुरम्-- श्वेत;किरीटमू--मुकुट; आसनमू--आसन; शब्याम्--राजशय्या का; भुझ्जते-- भोग करते हैं; अस्मत्--हमारी; उपेक्षया--उपेक्षा से |
चूँकि हमने परवाह नहीं की इसलिए वे चमरी के पंखे तथा शंख, श्रेत छाता, सिंहासन तथाराजशय्या का भोग कर सके।
अलं यदूनां नरदेवलाउ्छनै-दातु: प्रतीप: फणिनामिवामृतम् ।
येअस्मत्प्रसादोपचिता हि यादवाआज्ञापयन्त्यद्य गतत्रपा बत ॥
२७॥
अलमू--बस; यदूनाम्--यदुओं के लिए; नर-देव--राजाओं के; लाउ्छनै:--प्रतीकों से; दातु:ः--देने वाले के लिए; प्रतीपैः--विपरीत; फणिनाम्--साँपों के लिए; इब--सहृश; अमृतम्-- अमृत; ये--जो; अस्मत्--हमारी; प्रसाद--कृपा से; उपचिता:--समृद्ध बने हुए; हि--निस्सन्देह; यादवा:ः --यदुगण; आज्ञापयन्ति-- आदेश दे रहे हैं; अद्य-- अब; गत-त्रपा:--लाज खोकर;बत--निस्सन्देह |
अब यदुओं को इससे आगे इन राजसी प्रतीकों का उपयोग न करने दिया जाय क्योंकि अबये प्रदान करने वालों के लिए कष्टप्रद बन रहे हैं जिस तरह विषैले साँपों को पिलाया गया दूध।
ये यादवगण हमारी कृपा से समृद्ध बनकर अब सारी लाज शर्म खो चुके हैं और हमें आदेश देनेका दुस्साहस कर रहे हैं।
कथमिन्द्रोडपि कुरुभिर्भीष्मद्रोणार्जुनादिभि: ।
अदत्तमवरुन्धीत सिंहग्रस्तमिवोरण: ॥
२८॥
कथम्-कैसे; इन्द्रः--इनद्र; अपि-- भी; कुरुभि: --कुरुओं के द्वारा; भीष्य-द्रोण-अर्जुन-आदिभि:-- भीष्म, द्रोण, अर्जुनइत्यादि के द्वारा; अदत्तमू--न दिया हुआ; अवरुन्धीत--हड़प कर लेंगे; सिंह--सिंह द्वारा; ग्रस्तम्--पकड़ी गयी; इब--सहृश;उरण:ः--भेड़, मेमना |
भला इन्द्र भी किसी वस्तु को हड़पने का दुस्साहस कैसे कर सकता है, जिसे भीष्म, द्रोण,अर्जुन या अन्य कुरुजनों ने उसे नहीं दिया है? यह तो वैसा ही है जैसे मेमना सिंह के वध कीमाँग करे।
श्रीबादरायणिरुवाचजन्मबन्धुश्रीयोत्रद्धमदास्ते भरतर्षभ ।
आश्षाव्य राम॑ दुर्वाच्यमसभ्या: पुरमाविशन् ॥
२९॥
श्री-बादरायनि: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; जन्म--जन्म; बन्धु--तथा सम्बन्ध का; श्रीया--ऐश्वर्य से; उन्नद्ध--महान्बनाया गया; मदा:--नशा; ते--वे; भरत-ऋषभ--हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ; आश्राव्य--सुनवाकर; रामम्--बलराम को;दुर्वाच्यमू--कटु वचन; असभ्या: --गँवार व्यक्ति; पुरमू--नगर में; आविशनू-प्रविष्ट हुए
श्रीबादरायण ने कहा, हे भारतों में श्रेष्ठ, अपने उच्च जन्म तथा सम्बन्धों के ऐश्वर्य से फूलकर कुप्पा हुए घमंडी कुरु जब ये कटु वचन बलराम से कह चुके तो वे अपने नगर को वापसचले गये।
इष्ठा कुरूनां दौःशील्यं श्रुत्वावाच्यानि चाच्युत: ।
अवोचत्कोपसंरब्धो दुष्प्रेक्ष्य: प्रहसन्मुहु: ॥
३०॥
इृष्ठा--देखकर; कुरूणाम्ू--कुरूओं का; दौःशील्यम्--दुश्वरित्र; श्रुव्वा--सुनकर; अवाच्यानि--न कहने योग्य शब्द; च--तथा; अच्युत:--अच्युत बलराम ने; अवोचत्--कहा; कोप--क्रोध से; संरब्ध:--क्रुद्ध; दुष्प्रेक्ष्ः--देखना कठिन; प्रहसन्--हँसते हुए; मुहुः--बारम्बार।
कुरुओं के दुराचरण को देखकर तथा उनके भद्दे शब्दों को सुनकर अच्युत भगवान् बलरामक्रोध से उबल पड़े।
उनका मुखमण्डल देखने में भयावना था और बारम्बार हँसते हुए वे इसप्रकार बोले।
नूनं नानामदोन्नद्धा: शान्ति नेच्छन्त्यसाधव: ।
तेषां हि प्रशमो दण्ड: पशूनां लगुडो यथा ॥
३१॥
नूनमू--निश्चय ही; नाना--विविध; मद--कामवासनाओं से; उन्नद्धा:--फूलकर कुप्पा हुए; शान्तिमू--शान्ति; न इच्छन्ति--इच्छा नहीं करते; असाधव: --बदमाश; तेषाम्--उनके; हि--निस्सन्देह; प्रशम:ः--समझाना-बुझाना; दण्ड:--शारीरिक दण्ड;पशूनामू--पशुओं के लिए; लगुडः--लाठी; यथा--जिस तरह |
भगवान् बलराम ने कहा : 'स्पष्ट है कि इन बदमाशों की विविध वासनाओं ने इन्हें इतनादम्भी बना दिया है कि वे शान्ति चाहते ही नहीं।
तो फिर इन्हें शारीरिक दण्ड द्वारा समझाना-बुझाना होगा जिस तरह लाठी से पशुओं को सीधा किया जाता है।
अहो यदून्सुसंरब्धान्कृष्णं च कुपितं शनैः ।
सान्त्वयित्वाहमेतेषां शममिच्छन्निहागत: ॥
३२॥
त इमे मन्दमतय: कलहाभिरता: खला: ।
त॑ मामवज्ञाय मुहुर्दुर्भाषान्मानिनोब्रुवन् ॥
३३॥
अहो--ओह; यदून्ू--यदुओं को; सु-संरब्धान्ू--क्रोध से उबल रहे; कृष्णम्--कृष्ण को; च-- भी; कुपितम्-क्रुद्ध; शनैः --धीरे धीरे; सान्त्वयित्वा--शान्त करके; अहम्--मैं; एतेषाम्--इन ( कौरवों ) के लिए; शमम्--शान्ति; इच्छन्--चाहते हुए;इह--यहाँ; आगत:--आया; ते इमे--वे ही ( कुरूुजन ); मन्द-मतयः--दुर्बुब्धि; कलह--झगड़ने के लिए; अभिरता:--इच्छुक,लिप्त; खला:--दुष्ट; तम्ू--उसको; माम्--मुझको; अवज्ञाय--अनादर करके; मुहुः--बारम्बार; दुर्भाषानू--कटु वचन;मानिन:--गर्वित होकर; अब्रुवन्--उन्होंने कहे हैं ।
'ओह! मैं धीरे धीरे ही क्रुद्ध यदुजनों तथा कृष्ण को भी, जिन्हें क्रोध आ गया था शान्त करसका था।
मैं इन कौरवों के लिए शान्ति की कामना करते हुए यहाँ आया।
किन्तु ये इतने मूर्ख,स्वभाव से कलह-प्रिय तथा दुष्ट हैं कि इन्होंने बारम्बार मेरा अनादर किया है।
दम्भ के कारणइन्होंने मुझसे कटु वचन कहने का दुस्साहस किया है।
नोग्रसेन: किल विभुर्भोजवृष्णयन्धके श्वर: ।
शक्रादयो लोकपाला यस्यादेशानुवर्तिन: ॥
३४॥
न--नहीं; उग्रसेन: --राजा उग्रसेन; किल--निस्सन्देह; विभु;:--आदेश देने के योग्य; भोज-वृष्णि-अन्धक--भोजों, वृष्णियोंतथा अन्धकों के; ईश्वर: --स्वामी; शक्र-आदय:--इन्द्र तथा अन्य देवता; लोक--लोकों के; पाला:--शासक; यस्य--जिसकी; आदेश--आज्ञा के; अनुवर्तिन:--अनुयायी |
'क्या भोजों, वृष्णियों तथा अन्धकों के स्वामी राजा उग्रसेन आदेश देने योग्य नहीं हैंजबकि इन्द्र तथा अन्य लोकपालक उनके आदेशों का पालन करते हैं ?
सुधर्माक्रम्यते येन पारिजातोमराड्प्रिप: ।
आनीय भुज्यते सोडइसौ न किलाध्यासनाईण: ॥
३५॥
सुधर्मा--सफ्वर्ग का राज सभाभवन, सुधर्मा; आक्रम्यते--अधिकार में रखता है; येन--जिसके ( कृष्ण ) द्वारा; पारिजात:--पारिजात नामक; अमर--अमर देवताओं का; अद्धध्रिप:--वृक्ष; आनीय--लाकर; भुज्यते-- भोगा जाता है; सः असौ--वहीपुरुष; न--नहीं; किल--निस्सन्देह; अध्यासन--उच्च आसन; अर्हण: --योग्य |
'वही कृष्ण जो सुधर्मा सभाभवन के अधिकारी हैं और जिन्होंने अपने आनन्द के लिएअमर देवताओं से पारिजात वृक्ष ले लिया--क्या वही कृष्ण राजसिंहासन पर बैठने योग्य नहींहैं?
यस्य पादयुगं साक्षाच्छीरुपास्ते खिले श्वरी ।
स नाईति किल श्रीशो नरदेवपरिच्छदान् ॥
३६॥
यस्य--जिसके; पाद-युगम्--दो पैर; साक्षात्--स्वयं; श्री:--लक्ष्मीजी; उपास्ते--पूजा करती हैं; अखिल--समस्त ब्रह्माण्डकी; ईश्वरी--स्वामिनी; सः--वह; न अर्हति--योग्य नहीं हैं; किल--निस्सन्देह; श्री-ईशः--लक्ष्मी के पति; नर-देव--मानवराजा की; परिच्छदान्ू--साज-सामग्री
समस्त ब्रह्माण्ड की स्वामिनी साक्षात् लक्ष्मीजी उनके पैरों की पूजा करती हैं।
और उन्हींलक्ष्मी के पति क्या मर्त्य राजा की साजसामग्री के पात्र नहीं हैं ?
यस्याड्प्रिपड्डजरजोखिललोकपालै-मौल्युत्तमै्थृतमुपासिततीर्थतीर्थम् ।
ब्रह्मा भवोहमपि यस्य कला: कलाया:श्रीक्षोद्देदेम चिरमस्य नृपासनं क्व ॥
३७॥
यस्य--जिसके; अड्प्रि--पैरों की; पड्डुज--कमल सहृश; रज:-- धूल; अखिल--समस्त; लोक--लोकों के; पालैः--शासकोंद्वारा; मौलि--मुकुट; उत्तमैः--उत्तम, श्रेष्ठ; धृतम्ू-- धारण किया हुआ; उपासित--पूज्य; तीर्थ--तीर्थस्थानों का; तीर्थम्--तीर्थ,पवित्रता का उद्गम; ब्रह्मा-लोर्दू ब्रह्म; भव:--ब्रह्मा; अहम्--; अपि--; यस्य--; कला: ---; कलाया:--; श्री:--; च--;उद्देदम--; चिरमू--; अस्य-- ; नृप-आसनम्--; क्व--यस्य--जिसके; अड्घ्र--पैरों की; पड्टूज--कमल सहश; रज:--धूल; अखिल--समस्त; लोक--लोकों के; पालै--शासकोंद्वारा; मौलि--मुकुट; उत्तमै--उत्तम, श्रेष्ठ; धृतमू-- धारण किया हुआ; उपासित--पूज्य; तीर्थ--तीर्थस्थानों का; तीर्थम्--तीर्थ,पवित्रता का उद्गम; ब्रह्मा--ब्रह्मा; भव: --शिव; अहम्--मैं; अपि-- भी; यस्य--जिसके; कला: -- अंश; कलाया--अंश के;श्री:--लक्ष्मी; च-- भी; उद्देम-- धारण करते हैं; चिरम्--निरन्तर; अस्य--उसका; नृप-आसनमू्--राजसिंहासन; क्व--कहाँ।
'कृष्ण के चरण-कमलों की धूल, जो सभी तीर्थस्थानों के लिए पवित्रता की उद्गम है बड़ेबड़े देवताओं द्वारा पूजी जाती है।
समस्त लोकों के प्रधान देवता उनकी सेवा में लगे रहते हैं औरअपने मुकुटों पर कृष्ण के चरणकमलों की धूल धारण करके अपने को परम भाग्यशाली मानतेहैं।
ब्रह्मा तथा शिवजी जैसे बड़े बड़े देवता, यहाँ तक कि लक्ष्मीजी और मैं भी उनके दिव्यव्यक्तित्व के अंश हैं और हम भी उस धूल को बड़ी सावधानी से अपने सिरों पर धारण करते हैं।
क्या इतने पर भी कृष्ण राजप्रतीकों का उपयोग करने या राजसिंहासन पर बैठने के योग्य नहींहैं?
भुज्जञते कुरुभिर्दत्तं भूखण्डं वृष्णय: किल ।
उपानहः किल बय॑ स्वयं तु कुरवः शिर: ॥
३८॥
भुझ्ते-- भोग करते हैं; कुरूभि:--कुरुओं द्वारा; दत्तमू--दिया हुआ; भू-- भूमि; खण्डम्--सीमित भाग; वृष्णय:--वृष्णिगण;किल--निस्सन्देह; उपानह:--जूते; किल--निस्सन्देह; वयम्--हम; स्वयम्--स्वयं; तु--लेकिन; कुरव:--कुरुगण; शिर:--सिर
हम वृष्णिगण केवल उस छोटे से भूभाग का भोग करते हैं जिस किसी की कुरुगण हमेंअनुमति देते हैं? और हम निस्सन्देह जूते हैं जबकि कुरुगण सिर हैं?
अहो ऐश्वर्यमत्तानां मत्तानामिव मानिनाम् ।
असम्बद्धा गिऋओ रुक्षा: कः सहेतानुशासीता ॥
३९॥
अहो--ओह; ऐश्वर्य--अपनी शासनशक्ति से; मत्तानामू--उन्मत्तों के; मत्तानामू--शारीरिक रूप से उन्मत्तों के; इब--मानो;मानिनामू--अभिमानी; असम्बद्धा:--बेतुके तथा बिना सिर-पैर के; गिर:--शब्द; रुक्षा:--कर्कश; कः--कौन; सहेत--सहसकता है; अनुशासीता--आदेश देने वाला।
'जरा देखो तो इन अभिमानी कुरुओं को जो सामान्य शराबियों की तरह अपने तथाकथितअधिकार से उन्मत्त हैं! ऐसा कौन वास्तविक शासक, जो आदेश देने के अधिकार से युक्त है,उनके मूर्खतापूर्ण एवं बेतुके शब्दों को सह सकेगा ?
अद्य निष्कौरवां पृथ्वीं करिष्यामीत्यमर्षित: ।
गृहीत्वा हलमुत्तस्थौ दहन्निव जगत्त्रयम् ॥
४०॥
अद्य--आज; निष्कौरवां--कौरवों से विहीन; पृथ्वीम्--पृथ्वी; करिष्यामि-- करूँगा; इति--इस प्रकार कह कर; अमर्षित:--क्ुद्ध; गृहीत्वा--लेकर; हलमू--अपना हल; उत्तस्थौ--उठ खड़े हुए; दहन्--जलाते हुए; इब--मानो; जगत्--लोकों को;अयम्--तीनों |
क्रुद्ध बलराम ने घोषणा की, 'आज मैं पृथ्वी को कौरवों से विहीन कर दूँगा।
' यह कहकरउन्होंने अपना हलायुध ले लिया और उठ खड़े हुए मानो तीनों लोकों को स्वाहा करने जा रहे हों।
लाडुलाग्रेण नगरमुद्विदार्य गजाह्ययम् ।
विचकर्ष स गड्जायां प्रहरिष्यन्नमर्थित: ॥
४१॥
लाड्ूल--हल की; अग्रेण--नोक से; नगरम्--नगर को; उद्ठिदार्य--फाड़कर; गजाह्ययम्--हस्तिनापुर को; विचकर्ष --खींचा;सः--उसने; गड्जयाम्--गंगा में; प्रहरिष्यन्ू--फेंकने ही वाले; अमर्षित:-क्रुद्ध |
भगवान् ने क्रुद्ध होकर अपने हल की नोक से हस्तिनापुर को उखाड़ा और सम्पूर्ण नगर कोगंगा नदी में फेंकने की मंशा से उसे घसीटने लगे।
जलयानमिवाधूर्ण गड़ायां नगरं पतत् ।
आकृष्यमाणमालोक्य कौरवा: जातसम्भ्रमा: ॥
४२॥
तमेव शरणं जग्मु: सकुटुम्बा जिजीविषव: ।
सलक्ष्मणं पुरस्कृत्य साम्बं प्रा्ललय: प्रभुम् ॥
४३॥
जल-यानमू--नाव, घतन्नाई; इब--मानो; आधूर्णम्--इधर-उधर डगमगाती; गड्जयाम्--गंगा में; नगरम्--नगर को; पतत्--गिरते हुए; आकृष्यमाणम्--खींचे जाकर; आलोक्य--देखकर; कौरवा:--सारे कौरव; जात--होकर; सम्भ्रमा:--उत्तेजित एवंमोहित; तमू--उसकी, बलराम की; एबव--निस्सन्देह; शरणम्--शरण के लिए; जम्मु;--गये; स--सहित; कुटुम्बः--उनकेपरिवार; जिजीविषव: -- जीवित रहने की इच्छा करते हुए; स--सहित; लक्ष्मणम्--लक्ष्मणा को; पुरः-कृत्य--आगे करके;साम्बम्--साम्ब को; प्रा्ललय:--आदरपूर्वक हाथ जोड़ कर; प्रभुमू-प्रभु को घसीटे जा रहे
अपने नगर को समुद्र में घन्नाई की तरह डगमगाते तथा गंगा में गिरने ही वालादेखकर, सारे कौरव भयभीत हो उठे।
वे अपने प्राण बचाने के लिए अपने साथ अपने परिवारोंको लेकर भगवान् की शरण लेने गये।
साम्ब तथा लक्ष्मणा को आगे करके उन्होंने विनयपूर्वकअपने हाथ जोड़ लिये।
राम रामाखिलाधार प्रभाव न विदाम ते ।
मूढानां नः कुबुद्धीनां क्षन्तुमहस्यतिक्रमम् ॥
४४॥
राम राम--हे राम, हे राम; अखिल--हर वस्तु के; आधार--आधार; प्रभावम्--शक्ति; न विदाम--हम नहीं जानते हैं; ते--तुम्हारा; मूढानाम्-मूर्ख बने पुरुषों के; न:--हमको; कु--बुरा; बुद्धीनाम्--बुद्धि वालों के; क्षन्तुम् अहंसि--कृपया क्षमा करदें; अतिक्रममू--अपराध को |
कौरवों ने कहा : हे राम, हे सर्वाधार राम, हम आपकी शक्ति के बारे में कुछ भी नहींजानते।
कृपया हमारा अपराध क्षमा कर दें क्योंकि हम अज्ञानी हैं तथा बहकावे में आ गये थे।
स्थित्युत्पत्त्यप्ययानां त्वमेको हेतुर्निराश्रयः ।
लोकान्क्रीडनकानीश क्रीडतस्ते वदन्ति हि ॥
४५॥
स्थिति--पालन; उत्पत्ति--सृजन; अप्ययानाम्--तथा संहार के; त्वम्ू--तुमको; एक:--एकमात्र; हेतु:--कारण; निराश्रय:ः --किसी अन्य आधार के बिना; लोकान्--लोकों को; क्रीडनकान्--गेंदों को; ईश--हे प्रभु; क्रीडतः--खेल रहे; ते--तुम्हारे;वदन्ति--वे कहते हैं; हि--निस्सन्देह।
आप अकेले जगत का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं और आपका कोई पूर्व हेतु( कारण ) नहीं है।
दरअसल, हे प्रभु, विद्वानों का कहना है कि जब आप अपनी लीलाएँ करतेहैं, तो सारे संसार आपके खिलौने जैसे होते हैं।
त्वमेव मूर्ध्नीदमनन्त लीलयाभूमण्डलं बिभर्षि सहस्त्रमूर्धन् ।
अन्ते च यः स्वात्मनिरुद्धविश्वःशेषेउद्वितीयः परिशिष्यमाण: ॥
४६॥
त्वमू--तुम; एबव--ही; मूर्ध्नि--सिर पर; इृदम्--यह; अनन्त--हे असीम; लीलया--लीला के रूप में, आसानी से; भू--पृथ्वीके; मण्डलम्--गोले को; बिभर्षि--वहन करते हो; सहस्त्र-मूर्धन्ू--हे हजार सिरों वाले; अन्ते--अन्त में; च--तथा; यः--जो;स्व--अपना; आत्म--शरीर के भीतर; निरुद्ध--लीन करके; विश्व:--ब्रह्माण्ड; शेषे-- लेट जाते हो; अद्वितीय: --अद्वितीय;'परिशिष्यमाण:--शेष |
हे हजार सिरों वाले अनन्त, आप अपनी लीला के रूप में इस भूमण्डल को अपने एक सिरपर धारण करते हैं।
संहार के समय आप सारे ब्रह्माण्ड को अपने शरीर के भीतर लीन कर लेते हैंऔर अकेले बचकर विश्राम करने के लिए लेट जाते हैं।
कोपस्तेडखिलशिक्षार्थ न द्वेषान्न च मत्सरात् ।
बिभ्रतो भगवन्सत्त्वं स्थितिपालनतत्पर: ॥
४७॥
कोप:--क्रोध; ते--तुम्हारा; अखिल--हर एक को; शिक्षा--शिक्षा; अर्थम्--के लिए; न--नहीं; द्वेषात्ू--घृणा से; न च--नतो; मत्सरातू--ईर्ष्या से; बिभ्रत:-- धारण करने वाले; भगवन्-- भगवान्; सत्त्वमू--सतोगुण; स्थिति--स्थिति; पालन--तथारक्षण; तत्ू-पर:--आशय के रूप में
आपका क्रोध हर एक को शिक्षा देने के निमित्त है, यह घृणा या द्वेष की अभिव्यक्ति नहींहैं।
हे परमेश्वर, आप शुद्ध सतोगुण को धारण करते हैं और इस जगत को बनाये रखने तथाइसकी रक्षा करने के लिए ही क्रुद्ध होते हैं।
नमस्ते सर्वभूतात्मन्सर्वशक्तिधराव्यय ।
विश्वकर्मन्नमस्तेस्तु त्वां वयं शरणं गता: ॥
४८ ॥
नमः--नमस्ते; ते--तुमको; सर्व--सभी; भूत--जीवों के; आत्मन्--हे आत्मा; सर्व--समस्त; शक्ति--शक्तियों के; धर--हेधारण करने वाले; अव्यय--हे अव्यय; विश्व--ब्रह्माण्ड के; कर्मन्--हे बनाने वाले; नमः--नमस्कार; ते--तुमको; अस्तु--हो;त्वाम्ू--तुमको; वयम्--हम; शरणम्--शरण लेने; गता:--आये हैं|
है समस्त जीवों के आत्मा, हे समस्त शक्तियों को धारण करने वाले, हे ब्रह्माण्ड के अव्ययस्त्रष्टा, हम आपको नमस्कार करते हैं और नमस्कार करते हुए आपकी शरण ग्रहण करते हैं।
श्रीशुक उबाचएवं प्रपन्नेः संविग्नैर्वेपमानायनेर्बल: ।
प्रसादितः सुप्रसन्नो मा भष्टेत्यभयं ददौ ॥
४९॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; प्रपन्नैः--शरणागतों द्वारा; संविग्नै:--अत्यन्त दुखी;वेषमान--हिलते हुए; अयनैः--घरों वाले; बल:--बलराम; प्रसादित:--शान्त हुए; सु--अत्यन्त; प्रसन्न:--शान्त तथा मृदुल;मा भैष्ट--मत डरो; इति--इस प्रकार कहकर; अभयम्-- भय से छुटकारा; ददौ--दे दिया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जिन कौरवों का नगर डगमगा रहा था और जो अत्यन्त कष्ट मेंहोने से उनकी शरण में आ रहे थे, ऐसे कौरवों द्वारा स्तुति किये जाने पर बलराम शान्त हो गयेऔर उनके प्रति कृपालु हो गये।
उन्होंने कहा 'डरो मत।
' फिर उनके भय को हर लिया।
दुर्योधन: पारिबरईई कुद्धरान्षष्टिहायनान् ।
ददौ च द्वादशशतान्ययुतानि तुरड्रमान् ॥
५० ॥
रथानां षट्सहस्त्राणि रौक्माणां सूर्यवर्चसाम् ।
दासीनां निष्ककण्ठीनां सहस्त्रं दुहितृबत्सल: ॥
५१॥
दुर्योधन:--दुर्योधन ने; पारिबहम्--दहेज के रूप में; कुझरान्--हा थी; षष्टि--साठ; हायनान्ू--वर्ष आयु के; ददौ--दिया;च--तथा; द्वादइश--बारह; शतानि--सौ; अयुतानि--दस हजार; तुरड्रमान्--धघोड़े; रथानामू--रथों के; षट्ू-सहस्त्राणि --छःहजार; रौक्माणाम्--सोने के; सूर्य--सूर्य ( जैसे ); वर्चसाम्--तेजवान्; दासीनाम्--दासियों के ; निष्क--रत्नजटित हार;कण्ट्थीनाम्--जिनके गलों में; सहस्त्रमू--एक हजार; दुहितृ-- अपनी पुत्री के लिए; वत्सलः--पितृ-स्नेह से युक्त |
अपनी पुत्री के प्रति अत्यन्त वत्सल दुर्योधन ने उसे दहेज में १,२०० साठ वर्षीय हाथी,१,२०,००० घोड़े, ६,००० सूर्य जैसे चमकते सुनहरे रथ तथा १,००० दासियाँ दीं जो गलों मेंरत्नजटित हार पहने थीं।
प्रतिगृह्य तु तत्सर्व भगवान्सात्वतर्षभः ।
ससुतः ससस््नुष: प्रायात्सुहद्धिरभिनन्दित: ॥
५२॥
प्रतिगृह्य --स्वीकार करके ; तु--तथा; तत्--उसको ; सर्वम्--समस्त; भगवान्-- भगवान्; सात्वत--यादवों के; ऋषभ: --प्रधान; स--सहित; सुतः--पुत्र; स--सहित; स्नुष:--पतोहू, पुत्रवधू; प्रायात्--प्रस्थान किया; सु-हर्द्धिः--शुभचिन्तकों( कौरवों ) द्वारा; अभिनन्दित:--विदा किया गया।
यादवों के प्रमुख भगवान् ने इन सारे उपहारों को स्वीकार किया और तब अपने पुत्र तथाअपनी पुत्रवधू सहित वहाँ से प्रस्थान किया और उनके शुभचिन्तकों ने उन्हें विदाई दी।
ततः प्रविष्ट: स्वपुरं हलायुधःसमेत्य बन्धूननुरक्तचेतस: ।
शशंस सर्व यदुपुड़वानांमध्ये सभायां कुरुषु स्वचेष्टितम् ॥
५३ ॥
ततः--तब; प्रविष्ट: --प्रवेश करके; स्व--अपने; पुरम्--नगर में; हल-आयुध:--हल ही जिनका हथियार है, बलराम;समेत्य--मिलकर; बन्धूनू-- अपने सम्बन्धियों को; अनुरक्त--उनसे अनुरक्त; चेतस:--हृदयों वाले; शशंस--बतलाया; सर्वम्--हर बात; यदु-पुड्रवानाम्ू--यदुओं के नायकों के; मध्ये--बीच में; सभायाम्--सभा के; कुरुषु--कुरुओं में; स्व--अपना;चेष्टितम्-कार्य |
तब भगवान् हलायुध अपने नगर ( द्वारका ) में प्रविष्ट हुए और अपने सम्बन्धियों से मिलेजिनके हृदय उनसे अनुराग में बँधे थे।
सभाभवन में उन्होंने कुरुओं के साथ हुई प्रत्येक घटनायदुओं से कह सुनाई।
अद्यापि च पुरं होतत्सूचयद्रामविक्रमम् ।
समुन्नतं दक्षिणतो गड़ायामनुदहश्यते ॥
५४॥
अद्य--आज; अपि-- भी; च--तथा; पुरमू--नगर; हि--निस्सन्देह; एतत्--यह; सूचयत्--सूचना देता है; राम--बलराम के;विक्रमम्--पराक्रम को; समुन्नतम्--उठा हुआ; दक्षिणत:--दक्षिण की ओर; गड्ञयाम्--गंगा में; अनुदृश्यते--दिखाई देता है।
आज भी हस्तिनापुर नगर गंगा के तट पर दक्षिणी दिशा में उठा हुआ दिखता है।
इस तरहयह भगवान् बलराम के पराक्रम का सूचक है।
