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अध्याय इकहत्तर: भगवान इंद्रप्रस्थ की यात्रा करते हैं
10.71श्रीशुक उवाचइत्युदीरितमाकर्ण्य देवऋषेरुद्धवोब्रवीत् ।
सभ्यानां मतमाज्ञाय कृष्णस्य च महामति: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उदीरितम्--कहा गया; आकर्णर्य--सुन कर; देव-ऋषे: --देवर्षि नारद द्वारा; उद्धव: --उद्धव; अब्रवीत्ू--बोले; सभ्यानाम्ू--राजसभा के सदस्यों के; मतम्--मतको; आज्ञाय--जान कर;कृष्णस्य--कृष्ण के; च--तथा; महा-मतिः--अतीव बुद्धिमान ।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह देवर्षि नारद के कथनों को सुनकर और सभाजनों तथा कृष्ण दोनों के मतों को जानकर महामति उद्धव इस प्रकार बोले।
श्रीउद्धव उवाचयदुक्तमृषिना देव साचिव्यं यक्ष्यतस्त्वया ।
कार्य पैतृष्वस्त्रेयस्य रक्षा च शरणैषिणाम् ॥
२॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; यत्--जो; उक्तम्--कहा गया था; ऋषिना--ऋषि ( नारद ) द्वारा; देव-हे प्रभु;साचिव्यम्--सहायता; यक्ष्यत:ः--यज्ञ करने के इच्छुक ( युधिष्टिर ); त्वया--तुम्हारे द्वारा; कार्यमू--की जानी चाहिए; पैतृ-घ्वस्त्रेयय्य--पिता की बहन का पुत्र का; रक्षा--रक्षा; च-- भी; शरण--शरण; एषिणाम्-इच्छुकों का |
श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, जैसी ऋषि ने सलाह दी है, आपको चाहिए कि आप राजसूययज्ञ सम्पन्न करने की योजना में अपने फुफेरे भाई युथिष्ठिर की सहायता करें।
आपको उनराजाओं की भी रक्षा करनी चाहिए, जो आपकी शरण के लिए याचना कर रहे हैं।
यस््टव्यम्राजसूयेन दिक्क्रजयिना विभो ।
अतो जरासुतजय उभयार्थो मतो मम ॥
३॥
यष्टव्यमू--यज्ञ सम्पन्न; राजसूयेन--राजसूय अनुष्ठान समेत; दिकू--दिशाओं के ; चक्र--पूरा गोला; जयिना--जीतने वाले केद्वारा; विभो--हे सर्वशक्तिमान; अत:--अतएव; जरा-सुत--जरा के पुत्र पर; जयः--विजय; उभय--दोनों; अर्थ: --उद्देश्यसहित; मतः--मत; मम--मेरा |
हे सर्वशक्तिमान विभु, जिसने दिग्विजय कर ली हो, वही राजसूय यज्ञ कर सकता है।
इसतरह मेरे विचार से जरासन्ध पर विजय पाने से दोनों उद्देश्य पूरे हो सकेंगे।
अस्माकं च महानर्थों होतेनेव भविष्यति ।
यशश्च तव गोविन्द राज्ञो बद्धान्विमुज्ञतः ॥
४॥
अस्माकम्--हमारे लिए; च--तथा; महान्ू--महान्; अर्थ:--लाभ; हि--निस्सन्देह; एतेन--इससे; एव--ही; भविष्यति--होगा; यश: --यश; च--तथा; तव--तुम्हारा; गोविन्द--हे गोविन्द; राज्ञ:--राजाओं को; बद्धान्--बन्दी बनाये गये;विमुज्जत:ः--मुक्त कर देगा।
इस निर्णय से हमें बहुत बड़ा लाभ होगा और आप राजाओं को बचा सकेंगे।
इस तरह, हेगोविन्द, आपका यश बढ़ेगा।
स वै दुर्विषहो राजा नागायुतसमो बले ।
बलिनामपि चान्येषां भीम॑ समबल॑ विना ॥
५॥
सः--वह, जरासन्ध; वै--निस्सन्देह; दुर्विषह:ः --दुर्जय; राजा--राजा; नाग--हाथी; अयुत--दस हजार; सम:ः--समान; बले--बल में; बलिनाम्ू--बलशालियों में; अपि--निस्सन्देह; च--तथा; अन्येषाम्-- अन्य; भीमम्-- भीम को; सम-बलम्--बल मेंसमान; विना--के अलावादुर्जेय
जरासन्ध दस हजार हाथियों जितना बलवान् है।
निस्सन्देह अन्य बलशाली योद्धा उसेपराजित नहीं कर सकते।
केवल भीम ही बल में उसके समान है।
द्वैरथे स तु जेतव्यो मा शताक्षौहिणीयुतः ।
ब्राह्मण्यो भ्यर्थितो विप्रैर्न प्रत्याख्याति कर्हिचित् ॥
६॥
द्वै-रथे--केवल दो रथों से लड़े जाने वाले युद्ध में; सः--वह; तु--लेकिन; जेतव्य:--हराया जा सकता है; मा--नहीं; शत--एक सौ; अक्षौहिणी--अक्षौहिणी सेना से; युतः--युक्त; ब्राह्मण्य: --ब्राह्मण संस्कृति के प्रति श्रद्धालु; अभ्यर्थित: --सत्कारकिया गया; विप्रै:--ब्राह्मणों द्वारा; न प्रत्याख्याति--मना नहीं करता; कर्हिचितू--कभी भी |
उसे एकाकी रथों की प्रतियोगिता में हराया जा सकेगा किन्तु अपनी एक सौ अक्षौहिणीसेना के साथ होने पर वह नहीं हराया जा सकता।
और, जरासन्ध ब्राह्मण संस्कृति के प्रति इतनाअनुरक्त है कि वह ब्राह्मणों की याचनाओं को कभी मना नहीं करता।
ब्रह्मवेषधरो गत्वा तं भिक्षेत वृकोदर: ।
हनिष्यति न सन्देहो द्वेरथे तव सन्निधौ ॥
७॥
ब्रह्म--ब्राह्मण का; वेष--वेश; धर:--धारण करके; गत्वा--जाकर; तम्--उससे, जरासन्ध से; भिक्षेत--माँगे; वृक-उदर: --भीम; हनिष्यति--मारेगा; न--नहीं; सन्देह: --सन्देह; द्वै-रथे--रथ से रथ के युद्ध में; तब--तुम्हारी; सन्निधौ--उपस्थिति में |
भीम ब्राह्मण का वेश बनाकर उसके पास जाये और दान माँगे।
इस तरह उसे जरासन्ध केसाथ द्वन्द्द युद्ध की प्राप्ति होगी और आपकी उपस्थिति में भीम अवश्य ही उसको मार डालेगा।
निमित्तं परमीशस्य विश्वसर्गनिरोधयो: ।
हिरण्यगर्भ: शर्वश्च कालस्यारूपिणस्तव ॥
८॥
निमित्तम्ू--कारण; परम्ू--केवल; ईशस्य-- भगवान् को; विश्व--ब्रह्माण्ड के; सर्ग--सृजन; निरोधयो: --तथा संहार में;हिरण्यगर्भ: --ब्रह्मा; शर्व:--शिवजी; च--तथा; कालस्य--काल का; अरूपिण:--निराकार; तव--तुम्हारा |
ब्रह्माण्ड के सृजन तथा संहार में ब्रह्म तथा शिव भी आपके उपकरण की तरह कार्य करते हैं, जिन्हें अन्ततः आप काल के अपने अदृश्य रूप में सम्पन्न करते हैं।
गायन्ति ते विशदकर्म गृहेषु देव्योराज्ञां स्वशत्रुवधमात्मविमोक्षणं च ।
गोप्यश्च कुझ्जरपतेर्जनकात्मजाया:पित्रोश्च लब्धशरणा मुनयो वयं च ॥
९॥
गायन्ति- गाते हैं; ते--तुम्हारा; विशद--निर्मल; कर्म--कर्म; गृहेषु-- अपने अपने घरों में; देव्य;--देवताओं की पत्नियाँ;राज्ञामू-राजाओं की; स्व--अपने; शत्रु--शत्रु; वधम्--वध; आत्म--स्वयंके ; विमोक्षणम्--उद्धार; च--तथा; गोप्य: --ब्रजबालाएँ; च--तथा; कुझर--हाथियों के; पतेः--स्वामी के; जनक--राजा जनक की; आत्म-जाया: --पुत्री ( सीतादेवी,रामचन्द्र की पत्नी ) के; पित्रो;--तुम्हारे माता-पिता के; च--तथा; लब्ध--प्राप्त हुए; शरणा:--शरण; मुनयः --मुनिगण;वयम्--हम; च--भी
बन्दी राजाओं की दैवी पत्नियाँ आपके नेक कार्यों का--कि आप किस तरह उनके पतियोंके शत्रुओं को मार कर उनका उद्धार करेंगे--गायन करती हैं।
गोपियाँ भी आपका यशोगानकरती हैं कि आपने किस तरह गजेन्द्र के शत्रु को, जनक की पुत्री सीता के शत्रु को तथा अपनेमाता-पिता के शत्रु को मारा।
इसी तरह जिन मुनियों ने आपकी शरण ले रखी है, वे हमारी हीतरह आपका यशोगान करते हैं।
जरासन्धवध: कृष्ण भूर्यर्थायोपकल्पते ।
प्रायः पाकविपाकेन तव चाभिमतः क्रतु: ॥
१०॥
जरासन्ध-वध: --जरासन्ध का वध; कृष्ण--हे कृष्ण; भूरि--बहुत अधिक; अर्थाय--महत्त्व; उपकल्पते--उत्पन्न करेगा;प्राय:--निश्चय ही; पाक--संचित कर्म का; विपाकेन--कर्मफल के रूप में; तब--तुम्हारा; च--तथा; अभिमत: --इच्छित;क्रतु:--यज्ञ
हे कृष्ण, जरासन्ध का वध निश्चित ही उसके विगत पापों का ही फल है।
इससे प्रभूत लाभहोगा।
निस्सन्देह इससे आपका मनवांछित यज्ञ सम्भव हो सकेगा।
श्रीशुक उवाचइत्युद्धववचो राजन्सर्वतोभद्रमच्युतम् ।
देवर्षिय॑दुवृद्धाश्र॒ कृष्णश्व प्रत्यपूजयन् ॥
११॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार कहे जाने पर; उद्धव-वच:--उद्द्वव के शब्द; राजन्ू--हे राजन्( परीक्षित ); सर्वतः--सभी प्रकार से; भद्रमू--शुभ; अच्युतम्-- अच्युत; देव-ऋषि:--देवताओं के ऋषि, नारद; यदु-वृद्धा: --वरिष्ठ यदुगण; च--तथा; कृष्ण: --कृष्ण; च--और भी; प्रत्यपूजयन्--बदले में प्रशंसा की |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्, देवर्षि नारद, वरिष्ठ यादवजन तथा कृष्ण--सबों नेउद्धव के प्रस्ताव का स्वागत किया, क्योंकि जो सर्वथा शुभ तथा अच्युत था।
अथादिशत्प्रयाणाय भगवान्देवकीसुतः ।
भृत्यान्दारुकजैत्रादीननुज्ञाप्य गुरून्विभु: ॥
१२॥
अथ--तब; आदिशत्--आज्ञा दी; प्रयाणाय--विदा होने के लिए; भगवान्-- भगवान्; देवकी-सुतः--देवकी-पुत्र ने;भृत्यानू--सेवकों को; दारुक-जैत्र-आदीनू--दारुक, जैत्र इत्यादि; अनुज्ञाप्प--अनुमति लेकर; गुरून्ू--अपने गुरुजनों से;विभु:--सर्वशक्तिमान |
देवकी-पुत्र सर्वशक्तिमान भगवान् ने अपने वरिष्ठ से विदा होने की अनुमति माँगी।
तत्पश्चात्उन्होंने दारुक, जैत्र इत्यादि सेवकों को प्रस्थान की तैयारी करने का आदेश दिया।
निर्गमय्यावरो धान्स्वान्ससुतान्सपरिच्छदान् ।
सड्डूर्षणमनुज्ञाप्य यदुराजं च शत्रुहन् ।
सूतोपनीतं स्वरथमारुहद्गरुडध्वजम् ॥
१३॥
निर्गमय्य--भेज कर; अवरोधान्--पत्नियों को; स्वान्ू-- अपनी; स--सहित; सुतान्--पुत्रों; स--सहित; परिच्छदानू--उनकासामान; स्डूर्षणम्--बलराम से; अनुज्ञाप्प--विदा होकर; यदु-राजम्--यदुओं के राजा ( उग्रसेन ) से; च--तथा; शत्रु-हन्--हेशत्रुओं के हन्ता ( परीक्षित ); सूत--सारथी द्वारा; उपनीतम्ू--लाया गया; स्व--अपने; रथम्--रथ में; आरुहत्--चढ़ गये;गरुड--गरुड़; ध्वजमू--ध्वजा है, जिसकी
हे शत्रुहन्ता, अपनी पत्ियों, पुत्रों तथा सामान को भेजे जाने की व्यवस्था कर देने के बादऔर संकर्षण तथा राजा उग्रसेन से विदा लेने के बाद भगवान् कृष्ण अपने रथ पर चढ़ गये,जिसे उनका सारथी ले आया था।
इस पर गरुड़-चिन्हित पताका फहरा रही थी।
ततो रथद्विपभटसादिनायकै:'करालया परिवृत आत्मसेनया ।
मृदड्डभेर्यानकशद्वुगोमुखैःप्रघोषघोषितककु भो निरक्रमत् ॥
१४॥
ततः--तब; रथ--रथों; द्विप--हाथियों; भट--पैदल सेना; सादि--तथा घुड़सवार; नायकै:--नायकों समेत; करालया--भयानक; परिवृत:--घिरे; आत्म--निजी; सेनया--सेना से; मृदड्ग--मृदंग; भेरी-- भेरी वाद्य; आनक-दुंदुभी; शट्गडु--शंख ;गो-मुखैः--तथा गोमुख श्रृंगों द्वारा; प्रधोष--शब्द करते हुए; घोषित--ध्वनि-तरंगों से पूरित; ककु भ: --सारी दिशाएँ;निरक्रमत्-विदा हुए।
ज्योंही मृदंग, भेरी, दुदुंभी, शंख तथा गोमुख की ध्वनि-तरंगों से सारी दिशाएँ गूँजने लगीं,त्योंही भगवान् कृष्ण अपनी यात्रा के लिए चल पड़े।
उनके साथ में रथों, हाथियों, पैदलों तथाघुड़सवारों के सेनादलों के मुख्य अधिकारी थे और चारों ओर से वे अपने भयानक निजी रक्षकोंद्वारा घिरे थे।
नृवाजिकाञ्ननशिबिकाभिर च्युतंसहात्मजाः पतिमनु सुत्रता ययु: ।
वराम्बराभरणविलेपनस्त्रज:सुसंवृता नृभिरसिचर्मपाणिभि: ॥
१५॥
नू--मनुष्य; वाजि--शक्तिशाली वाहकों से; काजञ्लन--सुनहली; शिविकाभि: --पालकियों से; अच्युतम्--कृष्ण; सह-आत्मजा:--अपनी सन््तानों समेत; पतिम्--पति को; अनु--पीछे करती हुई; सु-ब्रताः--उनकी साध्वी पत्नियाँ; ययु: --गईं;वर--उत्तम; अम्बर--वस्त्र; आभरण--गहने; विलेपन--सुगंधित तेल तथा लेप; स्त्रज:--मालाएँ; सु--अच्छी तरह; संवृता:--घिरी हुई; नृभिः--सैनिकों द्वारा; असि--तलवार; चर्म--तथा ढाल; पाणिभि:--जिनके हाथों में |
भगवान् अच्युत की सती-साध्वी पत्तियाँ अपनी सन््तानों सहित सोने की पालकियों मेंभगवान् के पीछे पीछे चलीं, जिन्हें शक्तिशाली पुरुष उठाये ले जा रहे थे।
रानियाँ सुन्दर वस्त्रों,आभूषणों, सुगन्धित तेलों तथा फूल की मालाओं से सजी थीं और चारों ओर से सैनिकों द्वाराघिरी थीं, जो अपने हाथों में तलवार-ढाल लिये थे।
नरोष्ट्रगोमहिषखरा श्वतर्यन:-करेणुभि: परिजनवारयोषितः ।
स्वलड्डू ता: कटकुटिकम्बलाम्बराद्यू-उपस्करा ययुरधियुज्य सर्वतः ॥
१६॥
नर--पुरुष वाहक; उ्ट--ऊँट; गो--बैल; महिष-- भैंसा; खर--गदहा; अश्वतरी --खच्चर; अन: --बैलगाड़ी; करेणुभि: --हथिनियों द्वारा; परिजन--घर के; वार--तथा जन साधारण के उपयोग वाली; योषित: --स्त्रियाँ; सु-अलड्डू ता:--खूब सजी;कट--घास की बनी; कुटि--झोपड़ियाँ; कम्बल--कम्बल; अम्बर--वस्त्र; आदि--इत्यादि; उपस्करा:--साज-सामान;ययु:--गये; अधियुज्य--लाद कर; सर्वतः--सभी ओर सेउनके चारों ओर खूब सजी-धजी स्त्रियाँ--जो कि राजघराने की सेविकाएँ तथा राज-दरबारियों की पत्नियाँ थीं--चल रही थीं।
वे पालकियों तथा ऊँटों, बैलों, भेंसों, गधों, खच्चरों,बैलगाड़ियों तथा हाथियों पर सवार थीं।
उनके वाहन घास के तम्बुओं, कम्बलों, वस्त्रों तथायात्रा की अन्य सामग्रियों से खचाखच भरे थे।
बल॑ बृहद्ध्वजपटछत्रचामरै-वरायुधाभरणकिरीटवर्मभि: ।
दिवांशुभिस्तुमुलरवं बभौ रवे-्॑थार्णव: क्षुभिततिमिड्निलोरमिंभि: ॥
१७॥
बलम्ू--सेना; बृहत्--विशाल; ध्वज--डंडों सहित; पट--झंडों; छत्र--छातों; चामरैः--तथा चामर पंखों से; वर--उत्तम;आयुध--हथियार; आभरण--गहने; किरीट--मुकुट; वर्मभि: --तथा कवच से; दिवा--दिन में; अंशुभि: --सूर्य-किरणों से;तुमुल--बेहद; रवम्-- ध्वनि; बभौ--तेजी से चमक रहे थे; रवेः--सूर्य के; यथा--जिस तरह; अर्णव: --समुद्र; क्षुभित--क्षुब्ध; तिमिड्रिल--तिमिंगिल मछली; ऊर्मिभि:--लहरों से |
भगवान् की सेना राजसी छाते, चामर-पंखों तथा लहराती पताकाओं के विशाल ध्वज-दंडोंसे युक्त थी।
दिन के समय सूर्य की किरणें सैनिकों के उत्तम हथियारों, गहनों, किरीट तथाकवचों से परावर्तित होकर चमक रही थीं।
इस तरह जयजयकार तथा कोलाहल करती कृष्णकी सेना ऐसी लग रही थी मानों क्षुब्ध लहरों तथा तिमिंगल मछलियों से आलोड़ित समुद्र हो।
अथो मुनिर्यदुपतिना सभाजितःप्रणम्य तं हदि विदधद्विहायसा ।
निशम्य तद्व्यवसितमाहताईणो मुकुन्दसन्दरशननिर्वृतेन्द्रिय: ॥
१८ ॥
अथ उ-- और तब; मुनिः--ऋषि ( नारद ); यदु-पतिना--यदुओं के स्वामी कृष्ण द्वारा; सभाजित:--सम्मानित; प्रणम्य--झुककर; तम्--उनको; हृदि--हृदय में; विदधत्--रखते हुए; विहायसा--आकाश से होकर; निशम्य--सुनकर; तत्--उनका;व्यवसितम्--हढ़संकल्प; आहत--स्वीकार की गयी; अर्हण:--पूजा; मुकुन्द-- भगवान् कृष्ण की; सन्दरशन--भेंट से;निर्वृत--शान्त; इन्द्रियः--इन्द्रियों वाला।
यदुओं के प्रमुख श्रीकृष्ण द्वारा सम्मानित होकर नारदमुनि ने भगवान् को नमस्कार किया।
भगवान् कृष्ण से मिल कर नारद की सारी इन्द्रियाँ तुष्ट हो चुकी थीं।
इस तरह भगवान् के निर्णयको सुन कर तथा उनकी पूजा स्वीकार करके, उन्हें अपने हृदय में हढ़ता से धारण करके, नारदआकाश से होकर चले गये।
राजदूतमुवाचेदं भगवान्प्रीणयन्गिरा ।
मा भैष्ट दूत भद्वं वो घातयिष्यामि मागधम् ॥
१९॥
राज--राजाओं के; दूतम्--दूत से; उबाच--कहा; इदम्--यह; भगवान्-- भगवान् ने; प्रीणयन्--उसे प्रसन्न करते हुए; गिरा --वाणी से; मा भैष्ट--मत डरो; दूत--हे दूत; भद्रमू--कल्याण हो; वः--तुम्हारा; घाटयिष्यामि--वध की व्यवस्था करूँगा;मागधम्--मगध के राजा ( जरासन्ध ) के |
राजाओं द्वारा भेजे गये दूत को भगवान् ने मीठे शब्दों में सम्बोधित किया, 'हे दूत, मैंतुम्हीिरे सौभाग्य की कामना करता हूँ।
मैं मगध के राजा के वध की व्यवस्था करूँगा।
डरनामत।
इत्युक्त: प्रस्थितो दूतो यथावदवदत्रूपान् ।
तेडपि सन्दर्शन शौरेः प्रत्यैक्षन्यन्मुमुक्षवः ॥
२०॥
इति--इस प्रकार; उक्त:--कहे जाने पर; प्रस्थित:--चला गया; दूतः--दूत; यथा-वत्--सही-सही; अवदत्--कहा; नृपान्--राजाओं से; ते--वे; अपि--तथा; सन्दर्शनम्-- श्रोता; शौरे:-- भगवान् कृष्ण के; प्रत्यैक्षन्--प्रतीक्षा करने लगे; यत्--क्योंकि;मुमुक्षव:ः--मुक्ति के लिए उत्सुक होने से |
इस प्रकार कहे जाने पर दूत चला गया और जाकर राजाओं से भगवान् का सन्देश सहीसही सुना दिया।
तब स्वतंत्र होने के लिए उत्सुक वे सभी भगवान् कृष्ण से भेंट करने के लिएआशान्वित होकर प्रतीक्षा करने लगे।
आनर्तसौवीरमरूंस्तीर्त्वा विनशनं हरि: ।
गिरीन्नदीरतीयाय पुरग्रामत्रजाकरान् ॥
२१॥
आनर्त-सौवीर-मरून्--आनर्त ( द्वारका राज्य ), सौवीर ( पूर्वी गुजरात ) तथा ( राजस्थान का ) मरुस्थल; तीर्त्वा--पार करके;विनशनम्--विनशन, कुरुक्षेत्र जनपद; हरि:--भगवान् कृष्ण; गिरीन्ू--पर्वतों; नदी: --तथा नदियों को; अतीयाय--पारकरके; पुर--नगर; ग्राम--गाँव; ब्रज--चरागाह; आकरान्ू--तथा खानों को |
आनर्त, सौवीर, मरुदेश तथा विनशन प्रदेशों से होकर यात्रा करते हुए भगवान् हरि नेनदियाँ पार कीं और वे पर्वतों, नगरों, ग्रामों, चरागाहों तथा खानों से होकर गुजरे।
ततो हृषद्ठतीं तीर्त्वा मुकुन्दोथ सरस्वतीम् ।
पञ्ञालानथ मत्सयां श्व शक्रप्रस्थमथागमत् ॥
२२॥
ततः--तब; हृषद्वतीम्--दृषद्गवती नदी को; तीर्त्वा--पार करके; मुकुन्दः--कृष्ण; अथ--तब; सरस्वतीम्--सरस्वती नदी को;पञ्ञालान्ू-पश्ञाल प्रदेश; अथ--तब; मत्स्यानू--मत्स्य प्रदेश को; च--भी; शक्र-प्रस्थम्--इन्द्रप्रस्थ में; अथ-- और;आगमत्--आये।
इहषदूती और सरस्वती नदियों को पार करने के पश्चात् वे पंचाल तथा मत्स्य प्रदेशों में सेगुजरते हुए अन्त में इन्द्रप्रस्थ पहुँचे।
तमुपागतमाकर्णय प्रीतो दुर्दर्शन नूनाम् ।
अजातशत्रुर्निरगात्सोपध्याय: सुहद्बृत: ॥
२३॥
तम्--उसको; उपागतम्--आया हुआ; आकर्ण्य --सुन कर; प्रीत:--प्रसन्न; दुर्दर्शनम्--विरले ही दिखने वाले; नृणाम्--मनुष्योंद्वारा; अजात-शत्रु:--जिसका शत्रु न हो, युधिष्ठटिर; निरगात्ू--बाहर आया; स--सहित; उपध्याय:--पुरोहितों; सुहत् --सम्बन्धियों से; वृत:--घिरा |
राजा युधिष्ठिर यह सुनकर अतीव प्रसन्न हुए कि दुर्लभ दर्शन देने वाले भगवान् आ चुके हैं।
भगवान् कृष्ण से मिलने के लिए राजा अपने पुरोहितों तथा प्रिय संगियों समेत बाहर आ गये।
गीतवादित्रघोषेण ब्रह्मघोषेण भूयसा ।
अभ्ययात्स हृषीकेशूंं प्राणा: प्राणमिवाहत: ॥
२४॥
गीत--गीत; वादित्र--तथा वाद्य-संगीत को; घोषेण--शब्द से; ब्रह्म--वेदों की; घोषेण-- ध्वनि से; भूयसा-- प्रचुर;अभ्ययात्--आगे गया; सः--वह; हषीकेशम्-- भगवान् कृष्ण को; प्राणा:--इन्द्रियों के; प्राणम्--प्राण या चेतना को; इब--सहश; आहतः--पूज्य |
वैदिक स्तुतियों की उच्च ध्वनि के साथ साथ गीत तथा संगीत-वाद्य गूंजने लगे और राजाबड़े ही आदर के साथ भगवान् हषीकेश से मिलने के लिए आगे बढ़े, जिस तरह इन्द्रियाँ प्राणोंसे मिलने आगे बढ़ती हैं।
इृष्ठा विक्लिन्नहदयः कृष्णं स्नेहेन पाण्डव: ।
चिराष्टृष्टे प्रियतमं सस्वजेथ पुनः पुनः ॥
२५॥
इृष्टा--देखकर; विक्लिन्न--द्रवित; हृदयः--उनका हृदय; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; स्नेहेन--स्नेह से; पाण्डव:ः--पाण्डु-पुत्र; चिरातू-दीर्घकाल से; दृष्टमू--देखे हुये; प्रिय-तमम्--अपने अत्यन्त प्रिय मित्र को; सस्वजे--आलिंगन किया; अथ--तत्पश्चात्; पुनः पुनः--फिर फिर |
जब राजा युथिष्ठिर ने अपने परमप्रिय मित्र भगवान् कृष्ण को इतने दीर्घ वियोग के बाददेखा, तो उनका हृदय स्नेह से द्रवित हो उठा और उन्होंने भगवान् का बारम्बार आलिंगन किया।
दोर्भ्या परिष्वज्य रमामलालयंमुकुन्दगात्र नृपतिहताशुभ: ।
लेभे परां निर्वृतिमश्रुलोचनोइृष्यत्तनुर्विस्मृतलोकविश्रम: ॥
२६॥
दोर्भ्याम्ू--अपनी भुजाओं से; परिष्वज्य--आलिंगन करके; रमा--लक्ष्मी के; अमल--निर्मल; अलयमू्--घर को; मुकुन्द--भगवान् कृष्ण के; गात्रमू--शरीर को; नृ-पति:--राजा; हत--विनष्ट; अशुभ:--अशुभ; लेभे--प्राप्त किया; पराम्--सर्वोच्च;निर्वृतिमू--हर्ष; अश्रु-- आँसू; लोचन:--जिसकी आँखों में; हृष्पत्-- प्रसन्न हुआ; तनु:ः--शरीर; विस्मृत-- भूल कर; लोक--संसारी जगत के; विभ्रम:--मायावी कार्यकलाप।
भगवान् कृष्ण का नित्य स्वरूप लक्ष्मीजी का सनातन निवास है।
ज्योंही युधिष्ठिर ने उनकाआलिंगन किया, वे समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो गये।
उन्हें तुरन्त दिव्य आनन्द की अनुभूतिहुई और वे सुख-सागर में निमग्न हो गये।
उनकी आँखों में आँसू आ गये और भावादिष्ट होने सेउनका शरीर थरथराने लगा।
वे पूरी तरह से भूल गये कि वे इस भौतिक जगत में रह रहे हैं।
त॑ मातुलेयं परिरभ्य निर्वृतोभीम: स्मयन्प्रेमजलाकुलेन्द्रिय: ।
यमौ किरीटी च सुहृत्तमं मुदाप्रवृद्धबाष्पा: परिरिभिरेडच्युतम् ॥
२७॥
तम्--उसको; मातुलेयम्--मामा के पुत्र को; परिरभ्य--आलिंगन करके; निर्वृत:--हर्ष से पूरित; भीम: -- भीमसेन; स्मयन्--हँसते हुए; प्रेम--प्रेमवश; जल--जल ( आँसू ) से; आकुल--पूरित; इन्द्रियः--आँखें; यमौ--जुड़वाँ ( नकुल तथा सहदेव );किरीती--अर्जुन; च--तथा; सुहृत्-तमम्--उनके सबसे प्रिय मित्र; मुदा--हर्षपूर्वक; प्रवृद्ध--अत्यधिक; बाष्पा: --आँसू;परिरेभिरि--आलिंगन किया; अच्युतम्--अच्युत भगवान् को |
तब आँखों में आँसू भरे भीम ने अपने ममेरे भाई कृष्ण का आलिंगन किया और फिर हर्ष सेहँसने लगे।
अर्जुन तथा जुड़वाँ भाई--नकुल तथा सहदेव ने भी अपने सर्वाधिक प्रिय मित्रअच्युत भगवान् का हर्षपूर्वकत आलिंगन किया और जोर-जोर से रोने लगे।
अर्जुनेन परिष्वक्तो यमाभ्यामभिवादित: ।
ब्राह्मणे भ्यो नमस्कृत्य वृद्धेभ्यश्व यथाईतः ।
मानिनो मानयामास कुरुसझ्रयकैकयान् ॥
२८॥
अर्जुनेन--अर्जुन द्वारा; परिष्वक्त:--आलिंगित; यमाभ्याम्--जुड़वों द्वारा; अभिवादित:ः --नमस्कार किया गया; ब्राह्मणेभ्य: --ब्राह्मणों को; नमस्कृत्य--नमस्कार करके; वृद्धेभ्य:--वरिष्ठजनों को; च--तथा; यथा-अर्हतः--शिष्टाचार के अनुसार;मानिन:--माननीय व्यक्ति; मानयाम् आस--सम्मान किया; कुरु-सूझ़्य-कैकयान्--कुरुओं
सृज्ञयों तथा कैकयों कोजब अर्जुन उनका पुनः आलिंगन कर चुके और नकुल तथा सहदेव उन्हें नमस्कार कर चुके,तो श्रीकृष्ण ने ब्राह्मणों तथा उपस्थित बड़े-बूढ़ों को नमस्कार किया।
इस तरह उन्होंने कुरु,सृजञ्ञय तथा कैकय वंशों के माननीय सदस्यों का सत्कार किया।
सूतमागधगन्धर्वा वन्दिनश्लोपमन्त्रिण: ।
मृदड्रशड्डपटह वीणापणवगोमुखै: ।
ब्राह्मणाश्चारविन्दाक्षं तुष्ठवुर्ननृतुर्जगु; ॥
२९॥
सूत--सूत; मागध--मागध; गन्धर्वा:--देवता जो गाने के लिए प्रसिद्ध हैं; वन्दिन:--वन्दीजन; च--तथा; उपमन्त्रिण:--विदूषक; मृदड्र--मृदंग; शट्भु--शंख; पटह--दुंदु भी; वीणा--वीणा; पणब--छोटे ढोल; गोमुखै:--तथा गोमुख श्रृंगी से;ब्राह्मणा:--ब्राह्मण; च--तथा; अरविन्द-अक्षम्--कमल-नेत्र भगवान्; तुष्ठवु:--स्तुतियों से यशोगान किया; ननृतु:--नाचा;जगुः--गाया
सूतों, मागधों, गन्धर्वो, वन्दीजनों, विदूषकों तथा ब्राह्मणों में से कुछ ने स्तुति करके, कुछ नेनाच-गाकर कमल-नेत्र भगवान् का यशोगान किया।
मृदंग, शंख, दुंदुभी, वीणा, पणव तथागोमुख गूंजने लगे।
एवं सुहृद्धिः पर्यस्त: पुण्यशलोकशिखामणि: ।
संस्तूयमानो भगवान्विवेशालड्डू तं पुरम् ॥
३०॥
एवम्---इस प्रकार; सु-हर्द्धिः--अपने शुभचिन्तक सम्बन्धियों द्वारा; पर्यस्त:--घिरे हुए; पुण्य-शलोक--पवित्र ख्याति केव्यक्तियों के; शिखा-मणि:--शिरोमणि; संस्तूयमान:--यशोगान किये जा रहे; भगवान्ू-- भगवान्; विवेश--प्रविष्ट हुए;अलड्डू तम्--अलंकृत; पुरम्--नगर में |
इस तरह अपने शुभचिन्तक सम्बन्धियों से घिर कर तथा चारों ओर से प्रशंसित होकरविख्यातों के शिरोमणि भगवान् कृष्ण सजे सजाये नगर में प्रविष्ट हुए ।
संसिक्तवर्त्म करिणां मदगन्धतोयैश् चित्रध्वजै: कनकतोरणपूर्णकुम्भे: ।
मृष्टात्मभिर्नवदुकूलविभूषणस्त्रगू -गन्ध्नृभिर्युवतिभिश्चव विराजमानम् ॥
३१॥
उद्दीप्तदीपबलिभि: प्रतिसद्या जाल-निर्यातधूपरुचिरं विलसत्पताकम् ।
मूर्थन्यहेमकलशै रजतोरु श्रूड्ठै-जुष्टे ददर्श भवनै: कुरुराजधाम ॥
३२॥
संसिक्त--जल से छिड़काव की गई; वर्त्म--सड़कें; करिणाम्--हाथियों के; मद--मस्तक से निकलने वाले तरल के; गन्ध--सुगन्धित; तोयैः--जल से; चित्र--रंग-बिरंगे; ध्वजैः-- ध्वजाओं से; कनक--सुनहरे; तोरण-द्वारों से; पूर्ण-कुम्भैः--तथापूर्ण जलपात्रों से; मृष्ट--सजे हुए; आत्मभि:--शरीरों से; नब--नवीन; दुकूल--उत्तम वस्त्रों से; विभूषण--गहने; सत्रकू--फूलकी मालाएँ; गन्धैः--तथा सुगन्धित चन्दन-लेप से; नृभि:--मनुष्यों से; युवतिभि:ः--तरुणियों से; च-- भी; विराजमानम्--'जगमगाते; उद्दीप्त--जलाये गये; दीप--दीपकों से; बलिभि:ः--तथा भेंटों से; प्रति--प्रत्येक; सद्य--घर; जाल--खिड़कियों केझरोखों से; निर्यात--बाहर निकल कर; धूप--अगुरु का धुआँ; रुचिर्मू--आकर्षक; विलसत्--हिलते-डुलते; पताकम्--झंडियों से; मूर्थन्य--छतों पर; हेम--सोने के; कलशै:ः--कलशों ( गुम्बदों ) से; रजत--चाँदी के; उरू--विशाल; श्रृद्ठ:--मंचोंसे; जुष्टम्-- अलंकृत; ददर्श--देखा; भवनै:ः--घरों से; कुरू-राज--कुरुओं के राजा के; धाम--राज्य |
इन्द्रप्रस्थ की सड़कें हाथियों के मस्तक से निकले द्रव से सुगंधित किये गये जल से छिड़कीगई थीं।
रंगबिरंगी झंडिया, सुनहरे द्वार तथा पूर्ण जलघटों से नगर की भव्यता बढ़ गई थी।
पुरुषतथा तरुणियाँ उत्तम नए उस्त्रों से सुन्दर ढंग से सजी थीं, फूलों की मालाओं तथा गहनों सेअलंकृत थीं तथा सुगन्धित चन्दन-लेप से लेपित थीं।
हर घर में जगमगाते दीपक दिख रहे थेऔर सादर भेंटे दी जा रही थीं।
जालीदार खिड़कियों के छिद्रों से अगुरु का धुँआ निकल रहाथा, जिससे नगर की सुन्दरता और भी बढ़ रही थी।
झंडियाँ हिल रही थीं और छतों को चाँदी केचौड़े आधारों पर रखे सुनहरे कलशों से सजाया गया था।
इस प्रकार भगवान् कृष्ण ने कुरुराजके राजसी नगर को देखा।
प्राप्त निशम्य नरलोचनपानपात्र-मौत्सुक्यविश्लथितकेशदुकूलबन्धा: ।
सद्यो विसृज्य गृहकर्म पतींश्व तल्पेद्रष्ट ययुर्युवतय: सम नरेन््द्रमार्गें ॥
३३॥
प्राप्तम्--आया हुआ; निशम्य--सुन कर; नर--मनुष्यों के; लोचन--आँखों के; पान--पीने के; पात्रमू--वस्तु या आगार;औत्सुक्य--उत्सुकतावश; विश्लधित--ढीले हुए; केश--बाल; दुकूल--वस्त्रों के; बन्धा:--तथा गाँठें; सद्यः--तुरन्त;विसृज्य--त्याग कर; गृह--गृहस्थी के; कर्म--कार्य; पतीन्--अपने पतियों को; च--तथा; तल्पे--पलंग में; द्रष्टमू--देखने केलिए; ययु: -- गयी; युवतय:--युवतियाँ; स्म--निस्सन्देह; नर-इन्द्र--राजा के; मार्ग---पथ पर।
जब नगर की युवतियों ने सुना कि मनुष्यों के नेत्रों के लिए आनन्द के आगार भगवान्कृष्ण आए हैं, तो उन्हें देखने के लिए वे जल्दी जल्दी राजमार्ग तक पहुंच गईं।
उन्होंने अपने घरके कार्यों (टहल ) को त्याग दिया, यहाँ तक कि अपने पतियों को भी पलंग में ही छोड़ आईं।
उत्सुकतावश उनके बालों की गाँठें तथा वस्त्र ढीले पड़ गये।
तस्मिन्सुसड्डु ल इभाश्वरथद्विपद्धि:कृष्णम्सभार्यमुपलभ्य गृहाधिरूढा: ।
नार्यो विकीर्य कुसुमैर्ममसोपगुह्यसुस्वागतं विदधुरुत्स्मयवीक्षितेन ॥
३४॥
तस्मिनू--उस ( मार्ग ) पर; सु--अत्यधिक; सह्ढु ले--भीड़युक्त; इभ--हाथियों; अश्व--घोड़ों; रथ--रथों ; द्वि-पद्धिः--तथापैदल सिपाहियों से युक्त; कृष्णम्--कृष्ण को; स-भार्यम्--अपनी पत्नियों सहित; उपलभ्य--देखकर; गृह--घरों के;अधिरूढा:--छतों पर चढ़ीं; नार्य:--स्त्रियाँ; विकीर्य--बिखेर कर; कुसुमैः--फूलों से; मनसा--मनों में; उपगुह्ा-- आलिंगनकरके; सु-स्वागतम्--हार्दिक स्वागत; विदधु:--उसे दिया; उत्स्मय--हँसती हुई; वीक्षितेन--चितवनों से ॥
राजमार्ग पर हाथियों, घोड़ों, रथों तथा पैदल सैनिकों की खूब भीड़ थी, इसलिए स्त्रियाँअपने घरों की छतों पर चढ़ गईं, जहाँ से उन्होंने कृष्ण तथा उनकी रानियों को देखा।
नगर कीस्त्रियों ने भगवान् पर फूल बरसाये, मन ही मन उनका आलिंगन किया और हँसीयुक्त चितवनों सेअपना हार्दिक स्वागत व्यक्त किया।
ऊचुः स्त्रियः पथ्ि निरीक्ष्य मुकुन्दपत्नी-स्तारा यथोडुपसहा: किमकार्यमूभि: ।
यच्चक्षुषां पुरुषमौलिरूदारहास-लीलावलोककलयोत्सवमातनोति ॥
३५॥
ऊचु:--कहा; स्त्रियः--स्त्रियों ने; पथि--मार्ग पर; निरीक्ष्य--देखकर; मुकुन्द-- भगवान् कृष्ण की; पत्नी:--पत्नियों को;ताराः--तारे; यथा--जिस तरह; उडु-प--चन्द्रमा; सहा:--साथ साथ; किम्--क्या; अकारि--किया गया था; अमूभि:--उनके द्वारा; यतू-- क्योंकि; चक्षुषामू--उनकी आँखों के लिए; पुरुष--पुरुषों के; मौलि:--चोटी; उदार--विस्तृत; हास--हँसीसे; लीला--क्रीड़ायुक्त; अवलोक--चितवनोंका; कलया--लघु अंश से; उत्सवम्ू--उत्सव; आतनोति--प्रदान करता है।
मार्ग पर मुकुन्द की पत्तियों को चन्द्रमा के साथ तारों की तरह गुजरते देखकर स्त्रियाँचिल्ला उठीं, 'इन स्त्रियों ने कौन-सा कर्म किया है, जिससे उत्तमोत्तम व्यक्ति अपनी उदारमुसकान तथा क्रीड़ायुक्त दीर्घ चितवनों से उनके नेत्रों को सुख प्रदान कर रहे हैं?
'तत्र तत्रोपसड्रम्य पौरा मड्रलपाणय: ।
चक्र: सपर्या कृष्णाय श्रेणीमुख्या हतैनस: ॥
३६॥
तत्र तत्र--विविध स्थानों में; उपसड्रम्ध--पहुँच कर; पौरा:--नगरवासी; मड्गल--शुभ भेंटें; पाणय: --अपने हाथों में; चक्र: --सम्पन्न किया; सपर्यामू--पूजा; कृष्णाय--कृष्ण के लिए; श्रेणी--व्यवसायियों के; मुख्या: --प्रमुख नेता; हत--विनष्ट;एनस:-पाप।
विभिन्न स्थानों पर नगरवासी अपने हाथों में कृष्ण के लिए शुभ भेंटें लेकर आये और प्रमुखनिष्पाप व्यापारी भगवान् की पूजा करने के लिए आगे बढ़े।
अन्तःपुरजनेः प्रीत्या मुकुन्दः फुल्ललोचनै: ।
ससम्भ्रमैरभ्युपेत: प्राविशद्राजमन्दिरम्ू ॥
३७॥
अन्तः-पुर--रनिवास के; जनै:--लोगों के द्वारा; प्रीत्या--प्रेमपूर्वक; मुकुन्दः-- भगवान् कृष्ण; फुल्ल--प्रफुल्ल; लोचनै: --आँखों से; स-सम्भ्रमैः --जोश में; अभ्युपेत:--स्वागत करने आईं; प्राविशत्--प्रवेश किया; राज--राजसी; मन्दिरम्--महलमें
प्रफुल्ल नेत्रों से अन्तःपुर के सदस्य भगवान् मुकुन्द का प्रेमपूर्वक स्वागत करने जोश सेआगे बढ़े और इस तरह भगवान् राजमहल में प्रविष्ट हुए।
पृथा विलोक्य क्षात्रेयं कृष्णं त्रिभुवनेश्वरम् ।
प्रीतात्मोत्थाय पर्यड्डात्सस्नुषा परिषस्वजे ॥
३८॥
पृथा--रानी कुन्ती; विलोक्य--देख कर; भ्रात्रेयमू--अपने भाई के पुत्र; कृष्णम्--कृष्ण को; त्रि-भुवन--तीनों लोकों के;ईश्वरम्--स्वामी; प्रीत--प्रेमपूर्ण; आत्मा--हृदय; उत्थाय--उठ कर; पर्यड्डात्--अपने पलंग से; स-स्नुषा--अपनी पुत्रवधू( द्रौपदी ) सहित; परिषस्वजे--आलिंगन किया।
जब महारानी कुन्ती ने अपने भतीजे कृष्ण को, जो तीनों लोकों के स्वामी हैं, देखा तोउनका हृदय प्रेम से भर गया।
वे अपनी पुत्रवधू सहित अपने पलंग से उठीं और उन्होंने भगवान्का आलिंगन किया।
गोविन्दं गृहमानीय देवदेवेशमाहत: ।
पूजायां नाविदत्कृत्यं प्रमोदोपहतो नृप: ॥
३९॥
गोविन्दमू-- भगवान् कृष्ण को; गृहम्-- अपने घर में; आनीय--लाकर; देव--सारे देवताओं के; देव-ईशम्--परमे श्रर तथानियन्ता; आहत:--पूज्य; पूजायाम्-पूजा में; न अविदत्--नहीं जान पाये; कृत्यमू--विस्तृत क्रिया; प्रमोद--उनके अधिक हर्षसे; उपहत:--अभिभूत; नृप:--राजादेवताओं के परमेश्वर
भगवान् गोविन्द को राजा युधिष्ठिर अपने निजी निवासस्थान में लेआये।
राजा हर्ष से इतने विभोर हो गये कि उन्हें पूजा का सारा अनुष्ठान विस्मृत हो गया।
पितृस्वसुर्गुरुस्त्रीणां कृष्ण श्रक्रे उभिवादनम् ।
स्वयं च कृष्णया राजन्भगिन्या चाभिवन्दितः ॥
४०॥
पितृ--उनके पिता की; स्वसु:--बहन ( कुन्ती ) के; गुरु--गुरुजनों के; स्त्रीणाम्--तथा पत्नियों के; कृष्ण:-- भगवान् कृष्णने; चक्रे--सम्पन्न किया; अभिवादनम्--नमस्कार; स्वयम्--स्वयं; च--तथा; कृष्णया--कृष्णा ( द्रौपदी ) द्वारा; राजन्ू--हेराजा ( परीक्षित ); भगिन्या--अपनी बहन ( सुभद्रा ) द्वारा; च-- भी; अभिवन्दित:--नमस्कार किये गये।
हे राजन, भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी बुआ तथा उनके गुरुजनों की पत्नियों को नमस्कारकिया।
तब द्रौपदी तथा भगवान् की बहन ने उन्हें नमस्कार किया।
श्रश्रुवा सझ्ञोदिता कृष्णा कृष्णपत्नीश्व सर्वशः ।
आनर्च रुक्मिणीं सत्यां भद्रां जाम्बवर्ती तथा ॥
४१॥
कालिन्दीं मित्रविन्दां च शैब्यां नाग्नजितीं सतीम् ।
अन्याश्चाभ्यागता यास्तु वासःस्त्रड्मण्डनादिभि: ॥
४२॥
श्रश्वा--अपनी सास ( कुन्ती ) द्वारा; सझ्लोदिता-- प्रोत्साहित; कृष्णा--द्रौपदी; कृष्ण-पत्नी:--कृष्ण की पत्लियाँ; च--तथा;सर्वश:--सारे लोग; आनर्च--पूजा की; रुक्मिणीम्ू--रुक्मिणी की; सत्याम्--सत्यभामा की; भद्राम् जाम्बवतीम्ू--भद्गा तथाजाम्बवती की; तथा-- भी; कालिन्दीम् मित्रविन्दाम् च--कालिन्दी तथा मित्रविन्दा की; शैब्यामू--राजा शिबि की वंशजा;नाग्नजितीमू--नाग्नजिती की; सतीम्--सती; अन्या: -- अन्य; च-- भी; अभ्यागता:--वहाँ पर आये हुए; याः--जो; तु--तथा;वास: --वस्त्र समेत; स्रकु-- फूल की माला; मण्डन--आभूषण; आदिभि: --इत्यादि से |
अपनी सास से अभिप्रेरित होकर द्रौपदी ने भगवान् कृष्ण की पत्लियों-रुक्मिणी, सत्यभामा,भद्रा, जाम्बवती, कालिन्दी, शिबरि की वंशजा मित्रविन्दा, सती नाग्नजजिती को तथा वहाँ परउपस्थित भगवान् की अन्य रानियों को नमस्कार किया।
द्रौपदी ने वस्त्र, फूल-मालाएँ तथारत्लाभूषण जैसे उपहारों से उन सबों का सत्कार किया।
सुखं निवासयामास धर्मराजो जनार्दनम् ।
ससैन्य॑ सानुगामत्यं सभार्य च नवं नवम् ॥
४३॥
सुखम्--सुखपूर्वक; निवासयाम् आस--ठहराया; धर्म-राज:--धर्म के राजा युधिष्ठिर ने; जनार्दनम्-- भगवान् कृष्ण को; स-सैन्यम्ू--सेना समेत; स-अनुग--सेवकों समेत; अमत्यम्--तथा मंत्रीगण; स-भार्यम्--अपनी पत्नियों सहित; च--तथा; नवम्नवम्--एक से एक नवीन।
राजा युधिष्ठिर ने कृष्ण के विश्राम का प्रबन्ध किया और इसका ध्यान रखा कि जितने सारेलोग उनके साथ आये हैं--यथा उनकी रानियाँ, सैनिक, मंत्री तथा सचिव--वे सुखपूर्वक ठहरजाँय।
उन्होंने ऐसी व्यवस्था की कि जब तक वे पाण्डवों के अतिथि रूप में रहें, प्रतिदिन उनकानया नया स्वागत हो।
तर्पयित्वा खाण्डवेन वह्निं फाल्गुनसंयुत: ।
मोचयित्वा मयं येन राज्ञे दिव्या सभा कृता ॥
४४॥
उवास कतिचिन्मासान्नाज्ञ: प्रियचिकीर्षया ।
विहरत्रथमारुहा फाल्गुनेन भटै्वृतः ॥
४५॥
तर्पयित्वा--तुष्ट करके; खाण्डवेन--खाण्डब बन सहित; वहिम्--अग्निदेव को; फाल्गुन--अर्जुन द्वारा; संयुत:--साथ में;मोचयित्वा--छुड़ाकर; मयम्--मय दानव को; येन--जिसके द्वारा; राज्ञे--राजा ( युधिष्ठिर ) के लिए; दिव्या--दैवी; सभा--सभाभवन; कृता--बनाया गया; उबास--वे रहते रहे; कतिचित्--कई; मासान्--महीने; राज्ञ:--राजा को; प्रिय--खुशी;चिकीर्षया--देने की इच्छा से; विहरन्ू--विहार करते; रथम्--रथ में; आरुह्म--चढ़ कर; फाल्गुनेन--अर्जुन सहित; भटै: --रक्षकों द्वारा; वृत:--घिरे।
राजा युधिष्ठिर को तुष्ठट करने की इच्छा से भगवान् कई मास इन्द्रप्रस्थ में रहते रहे।
अपनेआवास-काल के समय उन्होंने तथा अर्जुन ने अग्निदेव को खाण्डव बन भेंट करके तुष्ट किया।
उन्होंने मय दानव को बचाया जिसने बाद में राजा युधिष्ठिर के लिए दैवी सभाभवन बनाया।
अर्जुन के साथ सैनिकों से घिर कर भगवान् ने अपने रथ पर सवारी करने के अवसर का भीलाभ उठाया।
