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अध्याय अठहत्तर: दन्तवक्र, विदुरथ और रोमहर्षण की हत्या

10.78श्रीशुक उबाचशिशुपालस्य शाल्वस्य पौण्ड्रकस्यापि दुर्मति: ।

'परलोकगतानां च कुर्वन्पारोक्ष्य्सौहदम्‌ ॥

१॥

एकः पदातिः सड्क्रुद्धो गदापाणि: प्रकम्पयन्‌ ।

पद्भ्यामिमां महाराज महासत्त्वो व्यहश्यत ॥

२॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; शिशुपालस्य--शिशुपाल का; शाल्वस्थ--शाल्व का; पौण्ड्रकस्य--पौण्ड्रकका; अपि-- भी; दुर्मतिः --बुरे हृदय वाला ( दन्तवक्र ); पर-लोक--अन्य लोक को; गतानां--गये हुओं का; च--तथा;कुर्वन्‌ू--करते हुए; पारोक्ष्य--दिवंगतों के लिए; सौहदम्‌--मैत्री कर्म; एक:--अकेला; पदाति:--पैदल; सडक्रुद्ध:--क्रुद्ध;गदा--गदा; पाणि: -- अपने हाथ में; प्रकम्पयन्‌--हिलाते हुए; पद्भ्याम्‌-- अपने पैरों से; इमम्‌--इस ( पृथ्वी ) को; महा-राज--हे महान्‌ राजा ( परीक्षित ); महा--महान्‌; सत्त्व: --शारीरिक शक्ति वाला; व्यहश्यत--देखा गया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अन्य लोकों को गये हुए शिशुपाल, शाल्व तथा पौण्ड्रक केप्रति मैत्री-भाव होने से दुष्ट दनन्‍्तवक्र बहुत ही क्रुद्ध होकर युद्धभूमि में प्रकट हुआ।

हे राजन,एकदम अकेला, पैदल एवं हाथ में गदा लिए उस बलशाली योद्धा ने अपने पदचाप से पृथ्वी कोहिला दिया।

तं तथायान्तमालोक्य गदामादाय सत्वरः ।

अवलप्लुत्य रथात्कृष्ण: सिन्धुं वेलेव प्रत्यधात्‌ ॥

३॥

तम्‌--उसको; तथा--इस तरह; आयान्तम्‌--पास आते हुए; आलोक्य--देखकर; गदाम्‌-- अपनी गदा; आदाय--लेकर;सत्वर:--तेजी से; अवप्लुत्य--नीचे कूद कर; रथात्‌--अपने रथ से; कृष्ण: --भगवान्‌ कृष्ण; सिन्धुम्‌--समुद्र को; वेला--किनारा; इब--सहश; प्रत्यधात्‌--रोका

दन्तवक्र को पास आते देखकर भगवान्‌ कृष्ण ने तुरन्त अपनी गदा उठा ली।

वे अपने रथ सेनीचे कूद पड़े और आगे बढ़ रहे अपने प्रतिद्वन्द्नी को रोका, जिस तरह तट समुद्र को रोके रहताहै।

गदामुद्यम्य कारूषो मुकुन्दं प्राह दुर्मदः ।

दिया दिछ्या भवानद्य मम दृष्टिप्थं गत: ॥

४॥

गदाम्‌--अपनी गदा को; उद्यम्य--घुमाकर; कारूष:--करूष का राजा ( दन्तवक़ ); मुकुन्दम्‌--कृष्ण से; प्राह--बोला;दुर्मद:--मिथ्या गर्व से उन्मत्त; दिष्टया--सौभाग्य से; दिष्ठया --सौभाग्य से; भवान्‌ू--आप; अद्य--आज; मम--मेरी; दृष्टि--दृष्टिके; पथम्‌--पथ पर; गत:ः--आये हुए।

अपनी गदा उठाते हुए करूष के दुर्मद राजा ने भगवान्‌ मुकुन्द से कहा, 'अहो भाग्य! अहोभाग्य! कि तुम आज मेरे समक्ष आये हो।

त्वं मातुलेयो नः कृष्ण मित्रश्लुड्मां जिघांससि ।

अतत्त्वां गदया मन्द हनिष्ये वज्जकल्पया ॥

५॥

त्वमू--तुम; मातुलेय:--मामा का लड़का; न:ः--हमारे; कृष्ण --हे कृष्ण; मित्र--मेरे मित्रों के साथ; ध्रुद्ू--हिंसा करने वाले;माम्‌--मुझको; जिघांससि--मारना चाहते हो; अत:--इसलिए; त्वामू--तुमको; गदया--अपनी गदा से; मन्द-े मूर्ख;हनिष्ये--मैं मार डालूँगा; वज़-कल्पया--वज़ सरीखी |

'हे कृष्ण तुम मेरे ममेरे भाई हो, किन्तु तुमने मेरे मित्रों के साथ हिंसा की है और अब मुझेभी मार डालना चाहते हो।

इसलिए रे मूर्ख ! मैं तुम्हें अपनी वज्ञ सरीखी गदा से मार डालूँगा।

तहानिण्यमुपैम्यज्ञ मित्राणां मित्रवत्सल: ।

बन्धुरूपमरिं हत्वा व्याधि देहचरं यथा ॥

६॥

तहिं--तब; आनृण्यम्‌ू--ऋण से उऋण; उपैमि--हो सकूँगा; अज्ञ-रे मूर्ख; मित्राणाम्‌--मित्रों के; मित्र-वत्सलः --अपने मित्रोंका प्रिय; बन्धु--पारिवारिक सदस्य के; रूपमू--रूप में; अरिम्‌--शत्रु को; हत्वा--मार कर; व्याधिम्‌--रोग; देह-चरम्‌--शरीर में; यथा--जिस तरह

'हे बुद्धिहीन! अपने मित्रों का कृतज्ञ मैं तुम्हें मार कर तब उनके ऋण से उऋण हो जाऊँगा।

सम्बन्धी के रूप में तुम मेरे शरीर के भीतर रोग की तरह प्रच्छन्न शत्रु हो।

' सकता है।

एवं रूश्षेस्तुदन्वाक्यै: कृष्ण तोत्रैरिव द्विपम्‌ ।

गदयाताडोयन्मूर्शि सिंहवद्व्यनदच्च सः ॥

७॥

एवम्‌--इस प्रकार; रूक्षेः--कर्कश, कटु; तुदन्‌--कष्ट देने वाले; वाक्यैः --शब्दों से; कृष्णम्‌--कृष्ण को; तोत्रैः --अंकुशोंसे; इब--सहश; द्विपम्‌--हाथी को; गदया--अपनी गदा से; अताडयत्‌--उन पर प्रहार किया; मूर्थ्नि--सिर पर; सिंह-वत्‌--शेर की तरह; व्यनदत्‌-गर्जना की; च--तथा; सः--उसने |

इस तरह कटु वचनों से कृष्ण को उत्पीड़ित करने का प्रयास करते हुए, जिस तरह किसीहाथी को तेज अंकुश चुभाया जा रहा हो, दन्तवक्र ने अपनी गदा से भगवान्‌ के सिर पर आघातकिया और शेर की तरह गर्जना की।

गदयाभिहतोप्याजौ न चचाल यदूद्वह: ।

कृष्णोपि तमहन्गुर्व्या कौमोदक्या स्तनान्तरे ॥

८॥

गदया--गदा से; अभिहतः -- प्रताड़ित; अपि--यद्यपि; आजौ--युद्ध क्षेत्र में; न चचाल--हिला-डुला नहीं; यदु-उद्दह: --यदुओंके उद्धारक; कृष्ण:--कृष्ण ने; अपि-- भी; तमू--उसको ( दन्‍्तवक़ को ); अहन्‌--मारा; गुर्व्या--भारी; कौमोदक्या--अपनीकौमोदकी गदा से; स्तन-अन्तरे--छाती के बीच।

यद्यपि दन्‍्तवक्र की गदा से उन पर आघात हुआ, किन्तु यदुओं के उद्धारक कृष्ण युद्धस्थलमें अपने स्थान से रंच-भर भी नहीं हिले।

प्रत्युत अपनी भारी कौमोदकी गदा से उन्होंने दन्तवक्रकी छाती के बीचों-बीच प्रहार किया।

गदानिर्भिन्नहदय उद्धमन्रुधिरं मुखात्‌ ।

प्रसार्य केशबाह्नड्स्रीन्धरण्यां न्‍्यपतद्व्यसु: ॥

९॥

गदा-गदा से; निर्भिन्न--खण्ड-खण्ड हुआ; हृदयः--हृदय; उद्धमन्‌--वमन करते हुए; रुधिरम्‌--रक्त; मुखात्‌--मुख से;प्रसार्य--बाहर फेंक कर; केश--बाल; बाहु-- भुजाएँ; अड्घ्रीन्‌--तथा पाँव; धरण्याम्‌-- धरती पर; न्यपतत्‌--गिर पड़ा;व्यसु;:--निर्जीव ।

गदा के प्रहार से दन्‍्तवक् का हृदय छितरा गया, जिससे वह रुधिर वमन करने लगा औरनिर्जीव होकर भूमि पर गिर गया, उसके बाल बिखर गये तथा उसकी भुजाएँ और पाँव छितरागये।

ततः सूक्ष्मतरं ज्योति: कृष्णमाविशदद्धुतम्‌ ।

पश्यतां सर्वभूतानां यथा चैद्यवधे नृप ॥

१०॥

ततः--तब; सूक्ष्म-तरम्‌--अत्यन्त सूक्ष्म; ज्योतिः-- प्रकाश; कृष्णम्‌--कृष्ण में; आविशत्‌--प्रविष्ट हुआ; अद्भुतम्‌--विचित्र;'पश्यतामू--देखते-देखते; सर्व--सभी; भूतानाम्‌--जीवों के; यथा--जिस तरह; चैद्य-वधे--जब शिशुपाल मारा गया था;नृप--हे राजा ( परीक्षित )

हे राजनू, तब ( उस असुर के शरीर से ) एक अत्यन्त सूक्ष्म एवं अद्भुत प्रकाश की चिनगारीसबों के देखते-देखते ( निकली और ) कृष्ण में प्रवेश कर गई, ठीक उसी तरह जब शिशुपालमारा गया था।

विदूरथस्तु तद्भ्राता भ्रातशोकपरिप्लुत: ।

आगच्छदसिचर्माभ्यामुच्छुसंस्तज्जिघांसया ॥

११॥

विदूरथ:--विदूरथ; तु--लेकिन; तत्‌--उसका, दन्तवक्र का; भ्राता-- भाई; भ्रातृ-- भाई के; शोक--शोक में; परिप्लुत:--मग्न; आगच्छत्‌-- आया; असि--तलवार; चर्माभ्यामू--तथा ढाल समेत; उच्छुसन्‌--तेजी से साँस लेता, हाँफता; तत्‌ू--उसको( कृष्ण को ); जिघांसया--मारने की इच्छा से |

लेकिन तभी दन्तवक्र का भाई विदूरथ अपने भाई की मृत्यु के शोक में डूबा हाँफता हुआआया और वह अपने हाथ में तलवार तथा ढाल लिए हुए था।

वह भगवान्‌ को मार डालनाचाहता था।

तस्य चापततः कृष्णश्रक्रेण क्षुरनेमिना ।

शिरो जहार राजेन्द्र सकिरीटं सकुण्डलम्‌ ॥

१२॥

तस्य--उसके; च--तथा; आपततः-- आक्रमण कर रहे; कृष्ण: --कृष्ण ने; चक्रेण--अपने सुदर्शन चक्र से; क्षुर--छूरे कीतरह; नेमिना--धार वाले; शिर:--सिर; जहार--काट लिया; राज-इन्द्र--हे राजाओं में श्रेष्ठ; स--सहित; किरीटमू--मुकुट;स--सहित; कुण्डलम्‌-कुण्डल।

हे राजेन्द्र, ज्योंही विदूरथ ने कृष्ण पर आक्रमण किया, उन्होंने अपने छुरे जैसी धार वालेसुदर्शन चक्र से उसके सिर को मुकुट तथा कुंडलों समेत काट डाला।

एवं सौभं च शाल्वं च दन्तवक्रं सहानुजम्‌ ।

हत्वा दुर्विषहानन्यैरीडित: सुरमानवैः ॥

१३॥

मुनिभि: सिद्धगन्धर्वर्वद्याधरमहोरगै: ।

अप्सरोभि: पितृगणैर्यक्षे: किन्नरचारणै: ॥

१४॥

उपगीयमानविजय: कुसुमैरभिवर्षितः ।

वृतश्च वृष्णिप्रवरर्विवेशालड्ू तां पुरीम्‌ ॥

१५॥

एवम्‌--इस प्रकार; सौभम्‌--सौभ-यान को; च--तथा; शाल्वम्‌--शाल्व को; च--तथा; दन्तवक्रम्‌ू--दन्तवक़ को; सह--सहित; अनुजम्‌--उसके छोटे भाई विदूरथ को; हत्वा--मार कर; दुर्विषहानू--दुर्लध्य; अन्यै:--अन्यों द्वारा; ईडित:--प्रशंसित;सुर--देवताओं; मानवै:--तथा मनुष्यों द्वारा; मुनिभि:--तथा मुनियों द्वारा; सिद्ध--सिद्धों; गन्धर्वैं:--तथा गन्धर्वों द्वारा;विद्याधर--विद्याधर लोक के निवासियों द्वारा; महा-उरगैः--तथा दैवी सर्पों द्वारा; अप्सरोभि: --स्वर्ग की नर्तकियों द्वारा; पितृ-गणैः--पिततों द्वारा; यक्षैः--यक्षों द्वारा; किन्नर-चारणै: --किन्नरों तथा चारणों द्वारा; उपगीयमान--स्तुति किये गये; विजय:--विजय; कुसुमैः--फूलों से; अभिवर्षित:--वर्षा किये गये; वृतः--घिरा हुआ; च--तथा; वृष्णि-प्रवरैः:--अग्रणी वृष्णियों द्वारा;विवेश--प्रवेश किया; अलड्डढू तामू--सजी हुईं; पुरीम्‌ू--अपनी राजधानी द्वारका में |

शाल्व तथा उसके सौभ-यान के साथ साथ दन्तवक्र तथा उसके छोटे भाई को, जो सबकिसी अन्य प्रतिद्वन्दी के समक्ष अजेय थे, इस तरह विनष्ट करने के बाद देवताओं, मनुष्यों,ऋषियों, सिद्धों, गन्धर्वों, विद्याधरों, महोरगों के अतिरिक्त अप्सराओं, पितरों, यक्षों, किन्नरों तथाचारणों ने भगवान्‌ की प्रशंसा की।

जब ये सब उनका यशोगान कर रहे थे और उन पर फूलबरसा रहे थे, तो भगवान्‌ गण्य-मान्य वृष्णियों के साथ साथ उत्सवपूर्वक सजाई हुई अपनीराजधानी में प्रविष्ट हुए।

एवं योगेश्वर: कृष्णो भगवान्जगदी श्वरः ।

ईयते पशुद्ृष्टीनां निर्जितो जयतीति सः ॥

१६॥

एवम्‌--इस तरह; योग--योग के; ईश्वर: --स्वामी; कृष्ण: --कृष्ण; भगवान्‌-- भगवान्‌; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; ईश्वर: --स्वामी;ईयते--प्रतीत होते हैं; पशु--पशुओं की तरह; दृष्टीनामू--दृष्टिवानों को; निर्जित:--पराजित; जयति--विजयी होते हैं; इति--मानो; सः--वह।

इस तरह समस्त योगशक्ति के स्वामी तथा ब्रह्माण्ड के स्वामी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ कृष्णसदैव विजयी होते हैं।

एकमात्र पाशविक दृष्टि वाले ही यह सोचते हैं कि कभी कभी उनकी हारहोती है।

श्रुत्वा युद्धोद्यमं राम: कुरूणां सह पाण्डवै: ।

तीर्थाभिषेकव्याजेन मध्यस्थ: प्रययौ किल ॥

१७॥

श्रुत्वा--सुनकर; युद्ध--युद्ध के लिए; उद्यमम्‌--तैयारियाँ; राम:--बलराम ने; कुरूणाम्‌--कुरुओं के; सह--साथ;पाण्डवैः--पाण्डवों की; तीर्थ--तीर्थस्थानों में; अभिषेक--स्नान के ; व्याजेन--बहाने; मध्य-स्थ:--तटस्थ, बीच-बचाव करनेवाले; प्रययौ--कूच किया; किल--निस्सन्देह |

तब बलराम ने सुना कि कुरुगण पाण्डवों के साथ युद्ध की तैयारी कर रहे हैं।

तटस्थ होनेके कारण वे तीर्थस्थानों में स्नान के लिए जाने का बहाना करके वहाँ से कूच कर गये।

स्नात्वा प्रभासे सन्तर्प्य देवर्षिपितृमानवान्‌ ।

सरस्वतीं प्रतिस्त्रोतं ययौ ब्राह्मणसंवृतः ॥

१८॥

स्नात्वा--स्तान करके; प्रभासे--प्रभास में; सन्तर्प्यच--तथा सम्मान देकर; देव--देवताओं; ऋषि--ऋषियों; पितृ--पूर्वजों;मानवानू--तथा मनुष्यों को; सरस्वतीम्‌--सरस्वती नदी को; प्रति-स्त्रोतम्‌--समुद्र की ओर बहने वाली; ययौ--गये; ब्राह्मण-संवृतः--ब्राह्मणों से घिरे हुए |

प्रभास में स्नान करके तथा देवताओं, ऋषियों, पितरों एवं वरेषु मानवों का सम्मान करने केबाद वे ब्राह्मणों को साथ लेकर सरस्वती के उस भाग में गये, जो पश्चिम में समुद्र की ओर बहतीहै।

पृथूदक॑ बिन्दुसरस्त्रितकूपं सुदर्शनम्‌ ।

विशाल ब्रह्मतीर्थ च चक्र प्राचीं सरस्वतीम्‌ ॥

१९॥

यमुनामनु यान्येव गड़्ामनु च भारत ।

जगाम नैमिषं यत्र ऋषय: सत्रमासते ॥

२०॥

पृथु--चौड़ा; उदकम्‌--जल, पाट; बिन्दु-सर:--बिन्दु सरोवर; त्रित-कूपम्‌ सुदर्शनम्‌--त्रितकूप तथा सुदर्शन नामक तीर्थस्थल;विशालम्‌ ब्रह्म-तीर्थभ्‌ च--विशाल तथा ब्रह्मतीर्थ; चक्रम्‌--चक्रतीर्थ; प्राचीम्‌-पूर्व की ओर बहती; सरस्वतीम्‌--सरस्वतीनदी; यमुनाम्‌--यमुना नदी के; अनु--किनारे-किनारे; यानि--जो; एब--सभी; गड्ढडामू--गंगा नदी के; अनु--किनारे-किनारे;च--भी; भारत--हे भरतवंशी ( परीक्षित महाराज ); जगाम--देखने गये; नैमिषम्‌--नैमिषारण्य; यत्र--जहाँ; ऋषय: --बड़े -बड़े मुनि; सत्रमू--विशाल यज्ञ; आसते--सम्पन्न कर रहे थे

भगवान्‌ बलराम ने चौड़े बिन्दु-सरस सरोवर, त्रितकूप, सुदर्शन, विशाल, ब्रह्मतीर्थ,अक्रतीर्थ तथा पूर्ववाहिनी सरस्वती को देखा।

हे भारत, वे यमुना तथा गंगा नदियों के तटबर्तीसारे तीर्थस्थानों में गये और तब वे नैमिषारण्य आये, जहाँ ऋषिगण बृहद्‌ यज्ञ ( सत्र ) सम्पन्न कररहे थे।

तमागतमभिप्रेत्य मुनयो दीर्घसत्रिण: ।

अभिनन्द्य यथान्यायं प्रणम्योत्थाय चार्चयन्‌ ॥

२१॥

तम्‌--उसको; आगतम्‌--आया हुआ; अभिप्रेत्य--पहचान कर; मुनयः--मुनियों ने; दीर्घ--लम्बे समय तक; सत्रिण:--यज्ञसम्पन्न कर रहे; अभिनन्द्य--सत्कार करके; यथा--जिस तरह; न्यायम्‌--उचित, सही; प्रणम्य--नमस्कार करके; उत्थाय--उठकर; च--तथा; आर्चयन्‌--पूजा की।

भगवान्‌ के आगमन पर उन्हें पहचान लेने पर दीर्घकाल से यज्ञ कर रहे मुनियों ने खड़ेहोकर, नमस्कार करके तथा उनकी पूजा करके समुचित ढंग से उनका सत्कार किया।

सोचिंतः सपरीवार: कृतासनपरिग्रहः ।

रोमहर्षणमासीनं महर्षे: शिष्यमैक्षत ॥

२२॥

सः--वह; अर्चितः --पूजित; स--सहित; परीवार:-- अपनी टोली; कृत--कर चुकने पर; आसन---आसन की; परिग्रह: --स्वीकृति; रोमहर्षणम्‌--रोमहर्षण सूत को; आसीनम्‌--बैठा हुआ; महा-ऋषे:--ऋषियों में सबसे बड़े व्यासदेव के ; शिष्यम्‌--शिष्य को; ऐश्षत--देखा |

अपनी टोली समेत इस प्रकार पूजित होकर भगवान्‌ ने सम्मान-आसन ग्रहण किया।

तबउन्होंने देखा कि व्यासदेव का शिष्य रोमहर्षण बैठा ही रहा था।

अप्रत्युत्थायिनं सूतमकृतप्रह्मणाझ्ञलिम्‌ ।

अध्यासीनं च तान्विप्रां श्वुकोपोद्दी क्षय माधव: ॥

२३॥

अप्रत्युत्थायिनम्‌--खड़ा न होने वाले; सूतम्‌--सूत पुत्र ( क्षत्रिय पिता तथा ब्राह्मण माता के संकर विवाह से उत्पन्न ) को;अकृत--जिसने नहीं किया; प्रह्हण--नमस्कार; अद्जलिमू--हाथ जोड़ना; अध्यासीनम्‌--ऊँचे स्थान पर आसीन; च--तथा;तान्‌ू--उन; विप्रानू--विद्वान ब्राह्मणों की अपेक्षा; चुकोप--क्रुद्ध हुआ; उद्दीक्ष्य--देखकर; माधव: --बलराम ।

श्री बलराम यह देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हुए कि सूत जाति का यह सदस्य किस तरह उठकरखड़े होने, नमस्कार करने या हाथ जोड़ने में विफल रहा है और किस तरह समस्त विद्वानब्राह्मणों से ऊपर बैठा हुआ है।

यस्मादसाविमान्विप्रानध्यास्ते प्रतिलोमज: ।

धर्मपालांस्तथैवास्मान्वधमर्हति दुर्मति: ॥

२४॥

यस्मात्‌ू--चूँकि; असौ--वह; इमानू--इन; विप्रान्‌ू--ब्राह्मणों की अपेक्षा; अध्यास्ते--ऊँचे स्थान पर बैठा है; प्रतिलोम-ज: --अनुचित संकर विवाह से उत्पन्न; धर्म--धर्म के सिद्धान्तों का; पालानू--रक्षक; तथा एब--भी; अस्मान्‌--मुझसे; वधम्‌-- मृत्यु;अ्ति--पात्र है; दुर्मतिः--मूर्ख

बलराम ने कहा : चूँकि अनुचित रीति से संकर विवाह से उत्पन्न यह मूर्ख इन सारेब्राह्मणों से ऊपर बैठा है और मुझ धर्म-रक्षक से भी ऊपर, इसलिए यह मृत्यु का पात्र है।

ऋषेर्भगवतो भूत्वा शिष्योधीत्य बहूनि च ।

सेतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वश: ॥

२५॥

अदान्तस्याविनीतस्य वृथा पण्डितमानिन: ।

न गुणाय भवन्ति सम नटस्थेवाजितात्मन: ॥

२६॥

ऋषे: --ऋषि ( व्यासदेव ) का; भगवतः--ई श्वर के अवतार; भूत्वा--बन कर; शिष्य:--शिष्य; अधीत्य--अध्ययन करके;बहूनि--अनेक; च--तथा; स--सहित; इतिहास--पौराणिक इतिहास; पुराणानि--तथा पुराण; धर्म-शास्त्राणि--मनुष्य केधार्मिक कर्तव्यों को बताने वाले शास्त्र; सर्वशः --पूर्णरूपेण; अदान्तस्थ--उसके लिए जो आत्मसंयमी नहीं है; अविनीतस्य--अविनीत; वृथा--व्यर्थ ही; पण्डित--विद्वान; मानिन:--अपने को सोचते हुए; न गुणाय--सदगुणों वाला नहीं; भवन्ति स्म--वेहो गये हैं; नटस्थ--मंच पर नाटक करने वालों का; इब--सहृश; अजित--न जीता हुआ; आत्मन:--जिसका मन।

यद्यपि वह दिव्य मुनि व्यास का शिष्य है और उसने उनसे अनेक शास्त्रों को भलीभाँतिसीखा है, जिसमें धार्मिक कर्तव्यों की संहिताएँ, इतिहास तथा पुराण सम्मिलित हैं, किन्तु इससारे अध्ययन से उसमें सद्गुण उत्पन्न नहीं हुए हैं।

प्रत्युत उसका शास्त्र अध्ययन किसी नट केद्वारा अपना अंश अध्ययन करने की तरह है, क्योंकि वह न तो आत्मसंयमी है, न विनीत है।

वहव्यर्थ ही विद्वान होने का स्वाँग रचता है, यद्यपि वह अपने मन को जीत सकने में विफल रहा है।

एतदर्थो हि लोकेस्मिन्नवतारो मया कृत: ।

वध्या मे धर्मध्वजिनस्ते हि पातकिनोइधिका: ॥

२७॥

एतत्‌--इसी; अर्थ:--प्रयोजन के लिए; हि--निस्सन्देह; लोके--संसार में; अस्मिन्‌ू--इस; अवतार:--अवतार; मया--मेरेद्वारा; कृतः--किया गया; वध्या:--मारे जाने के लिए; मे--मेरे द्वारा; धर्म-ध्वजिन:--धधार्मिक बनने का स्वाँग रचने वाले; ते--वे; हि--निस्सन्देह; पातकिन:--पापी; अधिका:--सर्वाधिक |

इस संसार में मेरे अवतार का उद्देश्य ही यह है कि ऐसे दिखावटी लोगों का वध किया जाय,जो धार्मिक बनने का स्वाँग रचते हैं।

निस्सन्देह, वे सबसे बड़े पापी धूर्त हैं।

एतावदुक्त्वा भगवान्निवृत्तोउसद्बधादपि ।

भावित्वात्तं कुशाग्रेण करस्थेनाहनत्प्रभु: ॥

२८॥

एतावत्‌--इतना; उक्त्वा--कह कर; भगवान्‌-- भगवान्‌; निवृत्त:--रुक गये; असत्‌--अशुभ; वधात्‌--मारने से; अपि--यद्यपि; भावित्वातू--यद्यपि हटाया नहीं जा सकता था; तम्‌--उसको, रोमहर्षण को; कुश--कुश तृण की; अग्रेण--नोक से;कर--हाथ में; स्थेन--पकड़ा हुआ; अहनत्‌--मार डाला; प्रभु:--भगवान्‌ ने।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यद्यपि भगवान्‌ बलराम ने अपवित्र लोगों को मारना बन्दकर दिया था, किन्तु रोमहर्षण की मृत्यु तो होनी ही थी।

इसलिए ऐसा कहकर भगवान्‌ ने कुशघास का एक तिनका उठाकर और उसकी नोक से छूकर उसे मार डाला।

हाहेतिवादिन: सर्वे मुनयः खिन्नमानसा: ।

ऊचुः सड्डूर्षणं देवमधर्मस्ते कृत: प्रभो ॥

२९॥

हा-हा--हाय, हाय; इति--इस प्रकार; वादिन:--कहते हुए; सर्वे--सभी; मुनयः--मुनिगण; खिन्न--विचलित; मानसा: --मनवाले; ऊचु:--बोले; सड्डर्षणम्‌--बलराम को; देवम्‌-- भगवान्‌; अधर्म:--अधार्मिक कृत्य; ते--तुम्हारे द्वारा; कृतः:--कियागया; प्रभो-हे प्रभु |

सारे मुनि अत्यन्त कातरता से 'हाय हाय' कह कर चिल्ला पड़े।

उन्होंने भगवान्‌ संकर्षण से कहा, 'हे प्रभु, आपने यह एक अधार्मिक कृत्य किया है।

'अस्य ब्रह्मासनं दत्तमस्माभिर्यदुनन्दन ।

आयुशभ्चात्माक्लमं तावद्यावत्सत्र॑ं समाप्यते ॥

३०॥

अस्य--इसका; ब्रह्म-आसनम्‌--गुरु का आसन; दत्तमू-दिया हुआ; अस्माभि: --हमारे द्वारा; यदु-नन्दन--हे यदुओं के प्रिय;आयु:--दीर्घ जीवन; च--तथा; आत्म--शरीर से; अक्लमम्‌--कष्ट से मुक्ति; तावत्‌ू--तब तक के लिए; यावत्‌--जब तक;सत्रम्‌ू--यज्ञ; समाप्यते--समाप्त हो जाता है।

'हे यदुओं के प्रिय, हमने उसे आध्यात्मिक गुरु का आसन प्रदान किया था और उसे दीर्घआयु के लिए एवं जब तक यह सत्र चलता है तब तक भौतिक पीड़ा से मुक्ति के लिए वचनदिया था।

अजानतैवाचरितस्त्वया ब्रह्मवधो यथा ।

योगेश्वरस्य भवतो नाम्नायोडईपि नियामक: ॥

३१॥

यद्येतद्वह्म हत्याया: पावनं॑ लोकपावन ।

चरिष्यति भवॉल्लोकसड्ग्रहोनन्‍्यचोदितः ॥

३२॥

अजानता--न जानते हुए; एव--केवल; आचरित:--किया गया; त्वया--तुम्हारे द्वारा; ब्रहा--ब्राह्मण का; वध:--वध;यथा--वास्तव में; योग--योगशक्ति के; ई श्वरस्थ-- भगवान्‌ का; भवतः --आप; न--नहीं; आम्नाय: --शास्त्रों का आदेश;अपि--भी; नियामकः--नियंत्रित करने वाला; यदि--यदि; एतत्‌--इसके लिए; ब्रह्म--ब्राह्मण की; हत्याया:--हत्या;पावनम्‌--शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त; लोक--संसार का; पावन--हे पवित्रकर्ता; चरिष्यति--सम्पन्न करता है; भवान्‌ू-- आप;लोक-सड्ग्रह:--आम लोगों की भलाई; अनन्य--अन्य किसी के द्वारा नहीं; चोदित: --प्रेरित ।

'आपने अनजाने में एक ब्राह्मण का वध कर दिया है।

हे योगेश्वर, शास्त्रों के आदेश भीआपको आज्ञा नहीं दे सकते।

किन्तु यदि आप स्वेच्छा से ब्राह्मण के इस वध के लिए संस्तुतशुद्धि कर लेंगे, तो हे सारे जगत के शुद्धिकर्ता, सामान्य लोग आपके उदाहरण से अत्यधिकलाभान्वित होंगे।

'श्रीभगवानुवाच चरिष्ये वधनिर्वेशं लोकानुग्रहकाम्यया ।

नियम: प्रथमे कल्पे यावान्स तु विधीयताम्‌ ॥

३३॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; चरिष्ये--मैं करूँगा; वध--हत्या करने के लिए; निर्वेशम्‌-प्रायश्चित्त; लोक--सामान्यलोगों के लिए; अनुग्रह--दया; काम्यया--दिखाने की इच्छा से; नियम:--आदेश; प्रथमे--प्रथम श्रेणी का; कल्पे--अनुष्ठान;यावान्‌--जितना; सः--वह; तु--निस्सन्देह; विधीयताम्‌--आप विधान करें, निर्धारित करें|

भगवान्‌ ने कहा : मैं इस हत्या के लिए अवश्य ही प्रायश्चित करूँगा क्योंकि मैं सामान्यलोगों के प्रति दया दिखाना चाहता हूँ।

इसलिए कृपा करके मुझे जो कुछ अनुष्ठान सर्वप्रथमकरना हो, उसका निर्धारण करें।

दीर्घमायुर्ब॑तैतस्य सत्त्वमिन्द्रियमेव च ।

आशासितं यत्तदूते साधये योगमायया ॥

३४॥

दीर्घमू--लम्बी; आयु:--उप्र; बत--ओह; एतस्थ--इसके लिए; सत्त्वम्‌-शक्ति; इन्द्रियम्‌ू--इन्द्रिय शक्ति; एव च--तथा;आशासितमू--वचन दिया हुआ; यत्‌--जो; तत्‌--वह; ब्रूते--कहिये; साधये--मैं करवा दूँगा; योग-मायया-- अपनीयोगशक्ति से |

हे मुनियो, कुछ कहिये तो।

आपने उसे जो भी दीर्घायु, शक्ति तथा इन्द्रिय शक्ति के लिएवचन दिये हैं, उन्हें मैं पूरा करवा दूँगा।

ऋषय ऊचु:अस्त्रस्य तव वीर्यस्य मृत्योरस्माकमेव च ।

यथा भवेद्बचः सत्यं तथा राम विधीयताम्‌ ॥

३५॥

ऋषय: ऊचु:--ऋषियों ने कहा; अस्त्रस्य--( कुश ) हथियार का; तब--तुम्हारे; वीर्यस्य--शक्ति का; मृत्यो:--मृत्यु का;अस्माकम्‌--हमारा; एव च-- भी; यथा--जिससे; भवेत्‌--बना रह सके; वच:--वचन; सत्यम्‌--सच; तथा--इस प्रकार;राम--हे राम; विधीयताम्‌--व्यवस्था कर दें।

ऋषियों ने कहा : हे राम, आप ऐसा करें कि आपकी तथा आपके कुश अस्त्र की शक्ति एवंसाथ ही हमारा वचन तथा रोमहर्षण की मृत्यु--ये सभी बने रहें।

श्रीभगवानुवाचआत्मा बै पुत्र उत्पन्न इति वेदानुशासनम्‌ ।

तस्मादस्य भवेद्बक्ता आयुरिन्द्रियसत्त्ववान्‌ ॥

३६॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; आत्मा--आत्मा; बै--निस्सन्देह; पुत्र:--पुत्र; उत्पन्न:--उत्पन्न; इति--इस प्रकार; वेद-अनुशासनमू--वेदों का आदेश; तस्मात्‌ू--इसलिए; अस्य--इसका ( पुत्र ); भवेत्‌--होगा; वक्ता--व्याख्यान देने वाला,वाचक; आयु: --दीर्घायु; इन्द्रिय--प्रबल इन्द्रियाँ; सत्तत--तथा शारीरिक बल; वानू्‌--से युक्त |

भगवान्‌ ने कहा : वेद हमें उपदेश देते हैं कि मनुष्य की आत्मा ही पुत्र रूप में पुनः जन्म लेतीहै।

इस तरह रोमहर्षण का पुत्र पुराणों का वक्ता बने और वह दीर्घायु, प्रबल इन्द्रियों तथा बल सेयुक्त हो।

कि वः कामो मुनिश्रेष्ठा ब्रूताहं करवाण्यथ ।

अजानतत्त्वपचितिं यथा मे चिन्त्यतां बुधा: ॥

३७॥

किम्‌--क्या; वः--तुम्हारी; काम:--इच्छा; मुनि--मुनियों में; श्रेष्ठा:--हे श्रेष्ठ; बूत--कहें; अहम्‌ू--मैं; करवाणि-- करूँगा;अथ--और तब; अजानतः --कौन नहीं जानता; तु--निस्सन्देह; अपचितिम्‌--प्रायश्चित्त; यथा--उचित रीति से; मे--मेरे लिए;चिन्त्यताम्‌--सोचें; बुधा:--हे बुद्धिमान जनो |

हे मुनिश्रेष्ठी, आप मुझे अपनी इच्छा बतला दें।

मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा।

और हे बुद्धिमानआत्माओ, मेरे लिए समुचित प्रायश्चित्त का भलीभाँति निर्धारण कर दें, क्योंकि मैं यह नहींजानता कि वह क्‍या हो सकता है।

ऋषय ऊचु:इल्वलस्य सुतो घोरो बल्वलो नाम दानव: ।

स दूषयति नः सत्रमेत्य पर्वणि पर्वणि ॥

३८॥

ऋषय: ऊचु:--ऋषियों ने कहा; इल्बलस्थ--इल्वल का; सुतः--पुत्र; घोर: -- भयावह; बल्वल: नाम--बल्वल नामक;दानवः--असुर; सः--वह; दूषयति--दूषित कर देता है; नः--हमारा; सत्रम्‌ू--यज्ञ; एत्य--आकर; पर्वणि पर्वणि--हरप्रतिपदा को |

ऋषियों ने कहा : एक भयावना असुर, जिसका नाम बल्वल है और जो इल्वल का पुत्र है,हर प्रतिपदा को अर्थात्‌ शुक्लपक्ष के पहले दिन यहाँ आता है और हमारे यज्ञ को दूषित कर देताहै।

त॑ं पापं जहि दाशाह तन्नः शुश्रूषणं परम्‌ ।

'पूयशोणितविन्‍न्मूत्रसुरामांसाभिवर्षिणम्‌ ॥

३९॥

तम्‌--उस; पापम्‌--पापी व्यक्ति को; जहि--मार डालिये; दाशाई--हे दशा के वंशज; तत्‌--वह; नः--हमारी; शुश्रूषणम्‌ --सेवा; परम्‌--सर्व श्रेष्ठ; पूष--पीब; शोणित--रक्त; वित्‌ू--मल; मूत्र--मूत्र; सुरा--शराब; मांस--तथा मांस; अभिवर्षिणम्‌--नीचे गिराता है।

हे दशाई-वंशज, कृपा करके उस पापी असुर का वध कर दें, जो हमारे ऊपर पीब, रक्त,मल, मूत्र, शराब तथा मांस डाल जाता है।

आप हमारे लिए यही सबसे उत्तम सेवा कर सकते हैं।

ततश्च भारतं वर्ष परीत्य सुसमाहितः ।

चरित्वा द्वादशमासांस्तीर्थस्नायी विशुध्यसि ॥

४०॥

ततः--तब; च--तथा; भारतम्‌ वर्षम्‌-- भारतवर्ष की; परीत्य--परिक्रमा करके; सु-समाहित: --गम्भीर मुद्रा में; चरित्वा--तपस्या करके; द्वादश--बारह; मासान्‌--महीनों; तीर्थ--ती र्थस्थल; स्नायी--स्नान करके; विशुध्यसि--शुद्ध हो सकोगे।

तत्पश्चात्‌ आप बारह महीनों तक गम्भीर ध्यान के भाव में भारतवर्ष की परिक्रमा करें औरतपस्या करते हुए विविध पवित्र तीर्थस्थानों में स्नान करें।

इस तरह आप विशुद्ध हो सकेंगे।

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