← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय अस्सी: ब्राह्मण सुदामा द्वारका में भगवान कृष्ण से मिलने आते हैं

10.80श्रीराजोबाचभगवन्यानि चान्यानि मुकुन्दस्य महात्मन: ।

वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य श्रोतुमिच्छामि हे प्रभो ॥

१॥

श्री-राजा उवाच--राजा ( परीक्षित ) ने कहा; भगवन्‌--हे प्रभु ( शुकदेव गोस्वामी ); यानि--जो; च--तथा; अन्यानि-- अन्यलोगों के; मुकुन्दस्य-- भगवान्‌ कृष्ण का; महा-आत्मन:--परमात्मा; वीर्याणि--वीरतापूर्ण कार्य; अनन्त--असंख्य; वीर्यस्य--बहादुरी के; श्रोतुमू--सुनने के लिए; इच्छामि--इच्छा करता हूँ; हे प्रभो--हे स्वामी |

राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु, हे स्वामी, मैं उन असीम शौर्य वाले भगवान्‌ मुकुन्द द्वारासम्पन्न अन्य शौर्यपूर्ण कार्यो के विषय में सुनना चाहता हूँ।

को नु श्रुत्वासकृद्ढह्मन्ुत्तम:ःशलोकसत्कथा: ।

विरमेत विशेषज्ञो विषण्ण: काममार्गणै: ॥

२॥

कः--कौन; नु--निस्सन्देह; श्रुत्वा--सुनकर; असकृत्‌--बारम्बार; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; उत्तम:-शलोक-- भगवान्‌ कृष्ण की;सत्‌--दिव्य; कथा:--कथाएँ; विर्मेत-- अपने को अलग रख सकता है; विशेष--( जीवन ) का सार; ज्ञ:--जानने वाला;विषण्ण:--खिन्न; काम-- भौतिक इच्छा की; मार्गणैः:--खोज के साथ।

हे ब्राह्मण, जो जीवन के सार को जानता है और इन्द्रिय-तृप्ति के लिए प्रयास करने से ऊबचुका हो, वह भगवान्‌ उत्तमएलोक की दिव्य कथाओं को बारम्बार सुनने के बाद भला उनकापरित्याग कैसे कर सकता है ?

सा वाग्यया तस्य गुणान्गृणीतेकरौ च तत्कर्मकरौ मनश्न ।

स्मरेद्वसन्तं स्थिरजड़मेषुश्रुणोति तत्पुण्यकथा: स कर्ण: ॥

३॥

सा--वही ( है ); वाक्‌ू--बोलने की शक्ति, वाणी; यया--जिससे; तस्य--उसके; गुणान्‌ू--गुणों को; गृणीते--वर्णन करतीहै; करौ--दो हाथ; च--तथा; तत्‌--उसके; कर्म--कार्य; करौ--करते हुए; मन:--मन; च--तथा; स्मरेत्‌--स्मरण करता है;वसन्तम्‌--निवास करते हुए; स्थिर--जड़; जड्डमेषु--चेतन के भीतर; श्रूणोति--सुनता है; तत्‌--उसके; पुण्य--पवित्र करनेवाली; कथाः--कथाएँ; स:--वही ( है ); कर्ण:--कान।

असली वाणी वही है, जो भगवान्‌ के गुणों का वर्णन करती है, असली हाथ वे हैं, जोउनके लिए कार्य करते हैं, असली मन वह है, जो प्रत्येक जड़-चेतन के भीतर निवास करने वालेउन भगवान्‌ का सदैव स्मरण करता है और असली कान वे हैं, जो निरन्तर उनकी पुण्य कथाओंका श्रवण करते हैं।

शिरस्तु तस्योभयलिड्रमान-मेत्तदेव यत्पश्यति तद््धि चक्षु: ।

अज्जनि विष्णोरथ तज्जनानांपादोदक॑ यानि भजन्ति नित्यम्‌ ॥

४॥

शिरः--सिर; तु--तथा; तस्य--उसका; उभय--दोनों; लिड्रमू--अभिव्यक्ति के लिए; आनमेत्‌--नमन करता है; तत्‌--वही;एव--एकमात्र; यत्‌--जो; पश्यति--देखती है; तत्‌--वह; हि--निस्सन्देह; चक्षु:--आँख; अड्भानि--अंग; विष्णो:-- भगवान्‌विष्णु का; अथ--अथवा; तत्‌-- उसके; जनानाम्‌-- भक्तों के ; पाद-उदकम्‌--चरणों के धोने से प्राप्त जल को; यानि--जो;भजन्ति--सम्मान करते हैं; नित्यमू--नियमित रूप से |

वास्तविक सिर वही है, जो जड़-चेतन के बीच भगवान्‌ की अभिव्यक्तियों को नमन करताहै।

असली आँखें वे हैं, जो एकमात्र भगवान्‌ का दर्शन करती हैं और असली अंग वे हैं, जोभगवान्‌ या उनके भक्तों के चरणों को पखारने से प्राप्त जल का नियमित रूप से आदर करतेहैं।

सूत उबाचविष्णुरातेन सम्पृष्टो भगवान्बादरायणि: ।

वासुदेवे भगवति निमग्नहदयोउब्रवीत्‌ू ॥

५॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; विष्णु-रातेन--विष्णुरात ( महाराज परीक्षित ) द्वारा; सम्पृष्ट:-- भलीभाँति पूछे गये;भगवान्‌--शक्तिमान ऋषि; बादरायणि: --शुकदेव; वासुदेवे --वासुदेव में; भगवति-- भगवान्‌; निमग्न--पूर्णतया मग्न;हृदयः--हृदय वाले; अब्रवीत्‌--बोले |

सूत गोस्वामी ने कहा : विष्णुरात द्वारा इस तरह प्रश्न किये जाने पर शक्तिसम्पन्न ऋषिबादरायणि ने, जिनका हृदय भगवान्‌ वासुदेव के ध्यान में पूर्णतया लीन रहता था, यह उत्तरदिया।

श्रीशुक उबाचकृष्णस्यासीत्सखा कश्रिद्गाह्मणो ब्रह्मवित्तम: ।

विरक्त इन्द्रियार्थेषु प्रशान्तात्मा जितेन्द्रिय: ॥

६॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; कृष्णस्य--कृष्ण का; आसीत्‌-- था; सखा--मित्र ( सुदामा नामक ); कश्चित्‌--कोई; ब्राह्मण: --ब्राह्मण; ब्रह्म--वेदों का; वित्‌ू-तम:--अत्यन्त विद्वान; विरक्त:--उदासीन; इन्द्रिय-अर्थेषु --इन्द्रिय-भोग कीवस्तुओं से; प्रशान्त--शान्त; आत्मा--मन वाला; जित--जीती हुईं; इन्द्रियः:--जिसकी इन्द्रियाँ ।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ कृष्ण का एक ब्राह्मण मित्र ( सुदामा नामक ) था, जोवैदिक ज्ञान में प्रकाण्ड पंडित था और समस्त इन्द्रिय-भोग से उदासीन था।

इससे भी बढ़कर,उसका मन शान्त था और उसकी इन्द्रियाँ संयमित थीं।

यहच्छयोपपन्नेन वर्तमानो गृहाश्रमी ।

तस्य भार्या कुचैलस्य क्षुत्क्षामा च तथाविधा ॥

७॥

यहच्छया--स्वेच्छा से; उपपन्नेन--जो कुछ मिलता था, उससे; वर्तमान:--उस समय; गृह-आश्रमी--गृहस्थ जीवन में; तस्थ--उसकी; भार्या--पत्ली; कु-चैलस्थ--मैले-कुचैले वस्त्र पहने; क्षुत्‌ू-- भूख से; क्षामा--दुर्बल; च--तथा; तथा-विधा--उसीतरह

गृहस्थ के भाँति रहते हुए जो कुछ उसे अपने आप मिल जाता वह उसी से भरण-पोषणकरता था।

मैले-कुचैले वस्त्रधारी उस ब्राह्मण की पत्नी उसके साथ कष्ट भोग रही थी और भूखके कारण दुबली हो गई थी।

पतिक्रता पतिं प्राह म्लायता वदनेन सा ।

दरिद्रं सीदमाना वै वेपमानाभिगम्य च ॥

८॥

पति-ब्रता--अपने पति के प्रति आज्ञाकारिणी; पतिम्‌--अपने पति से; प्राह--कहा; म्लायता--मुरझाये हुए; वदनेन--मुख से;सा--उसने; दरिद्रमू--गरीब; सीदमाना--पीड़ित; वै--निस्सन्देह; वेपमाना--काँपते हुए; अभिगम्य--पास आकर; च--तथा।

एक बार उस गरीब ब्राह्मण की सती-साध्वी पत्नी उसके पास आई।

उसका मुख त्रास केकारण सूखा था।

भय से काँपते हुए वह इस प्रकार बोली।

ननु ब्रह्मम्भगवत: सखा साक्षाच्छिय: पति: ।

ब्रह्मण्यश्व शरण्यश्व भगवान्सात्वतर्षभः ॥

९॥

ननु--निस्सन्देह; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; भगवत:--आपका; सखा--मित्र; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; भ्रिय:--लक्ष्मी का; पति: --पति;ब्रह्मण्य:--ब्राह्मणों के प्रति सदय; च--तथा; शरण्य:--शरण देने के लिए इच्छुक; च--तथा; भगवान्‌-- भगवान्‌; सात्वत--यादवों में; ऋषभः:-- श्रेष्ठ |

सुदामा की पत्नी ने कहा : हे ब्राह्मण, क्या यह सत्य नहीं है कि लक्ष्मीजी के पति आपकेनिजी मित्र हैं? यादवों में सर्वश्रेष्ठ वे भगवान्‌ कृष्ण ब्राह्मणों पर दयालु हैं और उन्हें अपनी शरणदेने के लिए अतीव इच्छुक हैं।

तमुपैहि महाभाग साधूनां च परायणम्‌ ।

दास्यति द्रविणं भूरि सीदते ते कुटुम्बिने ॥

१०॥

तम्‌--उसके; उपैहि--पास जाओ; महा-भग--हे भाग्यवान्‌; साधूनामू--साधुओं के; च--तथा; पर-अयणम्‌--चरम शरण;दास्यति--देगा; द्रविणम्‌--सम्पत्ति; भूरि--प्रचुर; सीदते--कष्ट पा रहे; ते--तुम्हें; कुटुम्बिने--परिवार का पालन-पोषण कररहे।

हे भाग्यवानू, आप समस्त सन्‍्तों के असली शरण, उनके पास जाइये।

वे निश्चय ही आपजैसे कष्ट भोगने वाले गृहस्थ को प्रचुर सम्पदा प्रदान करेंगे।

आस्तेथुना द्वारवत्यां भोजवृष्ण्यन्धके श्वरः ।

स्मरतः पादकमलमात्मानमपि यच्छति ।

कि न्वर्थकामान्भजतो नात्यभीष्टान्जगद्गुरु: ॥

११॥

आस्ते--उपस्थित हैं; अधुना--इस समय; द्वारवत्याम्‌-द्वारका में; भोज-वृष्णि-अन्धक--भोजों, वृष्णियों तथा अन्धकों के;ईश्वर:--स्वामी; स्मरत:--स्मरण करने वाले को; पाद-कमलम्‌--उनके चरणकमलों को; आत्मनाम्‌--स्वयं को; अपि--यहाँतक कि; यच्छति--देता है; किम्‌ नु--तो फिर क्या कहा जाय; अर्थ--आर्थिक सफलता; कामान्‌--तथा इन्द्रिय-तृप्ति को;भजत:--उनकी पूजा करने वाले को; न--नहीं; अति--अत्यधिक; अभीष्टान्‌--इच्छित; जगत्‌--सारे ब्रह्माण्ड के; गुरु:--गुरु

इस समय भगवान्‌ कृष्ण भोजों, वृष्णियों तथा अन्धकों के शासक हैं और द्वारका में रह रहेहैं।

चूँकि वे ऐसे भी व्यक्ति को, जो उनके चरणकमलों का केवल स्मरण करता हो अपनेआपको दे देने वाले हैं, तो फिर इसमें क्‍या संशय है कि ब्रह्माण्ड के गुरु स्वरूप वे अपनेनिष्ठावान्‌ आराधक को वैभव तथा भौतिक भोग प्रदान करेंगे, जो कोई विशेष अभीष्ट वस्तुएँनहीं हैं ?

स एवं भार्यया विप्रो बहुशः प्रार्थितो मुहुः ।

अयं हि परमो लाभ उत्तम:शलोकदर्शनम्‌ ॥

१२॥

इति सदञ्धिन्त्य मनसा गमनाय मतिं दधे ।

अप्यस्त्युपायनं किज्जिद्गूहे कल्याणि दीयताम्‌ ॥

१३॥

सः--वह; एवम्‌--इस प्रकार; भार्यया--अपनी पतली द्वारा; विप्र:--ब्राह्मण; बहुश: -- अनेक प्रकार से; प्रार्थित: --प्रार्थनाकिया गया; मुहुः--पुनः पुनः; अयम्‌ू--यह; हि--निस्सन्देह; परम:--परम; लाभ: --लाभ; उत्तम:-शलोक-- भगवान्‌ कृष्णका; दर्शनम्‌--दर्शन; इति--इस प्रकार; सद्धिन्त्य--सोच कर; मनसा--अपने मन में; गमनाय--जाने के लिए; मतिम्‌ दधे--निर्णय किया; अपि-- क्या; अस्ति-- है; उपायनम्‌--उपहार; किश्चित्‌-- कुछ; गृहे--घर में; कल्याणि--मेरी अच्छी स्त्री;दीयताम्‌--मुझे दो

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब उसकी पल्ी ने उससे नाना प्रकार से अनुरोधकिया, तो ब्राह्मण ने अपने मन में सोचा, ' भगवान्‌ कृष्ण के दर्शन करना निस्सन्देह जीवन कीसबसे बड़ी उपलब्धि है।

अतएव उसने जाने का निश्चय कर लिया, किन्तु उसने पहले अपनीपली से यों कहा, 'हे कल्याणी, यदि घर में ऐसी कोई वस्तु हो, जिसे मैं भेंट रूप में ले जासकूँ, तो मुझे दो।

याचित्वा चतुरो मुष्टीन्विप्रान्युधुकतण्डुलान्‌ ।

चैलखण्डेन तान्बद्ध्वा भरत्रें प्रादादुपायनम्‌ ॥

१४॥

याचित्वा--माँग कर; चतुरः--चार; मुष्टीन्‌--मुट्टियाँ भर के; विप्रानू--( पड़ोसी ) ब्राह्मणों से; पृुथुक-तण्डुलानू--चिउड़ा,चावल; चैल--वस्त्र के; खण्डेन--टुकड़े से; तान्‌--उन्हें; बद्ध्वा--बाँध कर; भर्त्रे-- अपने पति को; प्रादात्‌--दे दिया;उपायनम्‌--उपहार

सुदामा की पत्नी अपने पड़ोसी ब्राह्मणों से चार मुट्ठी चावल ( चिउड़ा ) माँग लाई, उन्हें फटेवस्त्र के एक टुकड़े में बाँधा और भगवान्‌ कृष्ण के लिए उपहार रूप में उसे अपने पति को देदिया।

स तानादाय विप्राछय: प्रययौ द्वारकां किल ।

कृष्णसन्दर्शनं मह्मं कथं स्थादिति चिन्तयन्‌ ॥

१५॥

सः--वह; तान्‌--उन्हें; आदाय--लेकर; विप्र-अछय: --ब्राह्मण- श्रेष्ठ; प्रययौ--चला गया; द्वारकाम्‌--द्वारका; किल--निस्सन्देह; कृष्ण-सन्दर्शनमू-- भगवान्‌ कृष्ण के दर्शन; मह्मम्‌-मुझे; कथम्‌--कैसे; स्थातू--हो सकेगा; इति--इस प्रकार;चिन्तयन्‌ू--सोचते हुए

वह साधु ब्राह्मण चिउड़ा लेकर द्वारका के लिए रवाना हो गया और लगातार विस्मित होतारहा, 'मैं किस तरह कृष्ण के दर्शन कर सकूँगा ?

'त्रीणि गुल्मान्यतीयाय तिस्त्र: कक्षाश्र सद्दिज: ।

विप्रोगम्यान्धकवृष्णीनां गृहेष्वच्युतधर्मिणाम्‌ ॥

१६॥

गहं दव्यष्टसहस्त्राणां महिषीणां हरेद्विज: ।

विवेशैकतमं श्रीमद्गह्मानन्दं गतो यथा ॥

१७॥

त्रीणि--तीन; गुल्मानि--रक्षकों की टोलियाँ; अतीयाय--पार करके; तिस्त्रः--तीन; कक्षा:--दरवाजे, ड्योढ़ियाँ; च--तथा;स-द्विज:--ब्राह्मण सहित; विप्र: --विद्वान ब्राह्मण; अगम्य--दुर्गम; अन्धक-वृष्णीनाम्‌--अन्धकों तथा वृष्णियों के; गृहेषु--घरों के बीच; अच्युत-- भगवान्‌ कृष्ण; धर्मिणाम्‌ू--आज्ञाकारियों के; गृहम्‌-घर; द्वि--दो; अष्ट--आठ गुना; सहस्त्राणाम्‌--हजार; महिषीणाम्‌--रानियों के; हरेः--कृष्ण के; द्विज:--ब्राह्मण ने; विवेश--प्रवेश किया; एकतमम्‌--उनमें से एक; श्री-मत्‌--ऐश्वर्यवान; ब्रह्म-आनन्दम्‌--निर्विशेष मुक्ति का आनन्द; गतः--प्राप्त; यथा--मानो |

विद्वान ब्राह्मण ने कुछ स्थानीय ब्राह्मणों के साथ मिलकर तीन सुरक्षा चौकियाँ पार कर लींऔर तब वह तीन ड्योढ़ियों से होकर भगवान्‌ कृष्ण के आज्ञाकारी भक्तों, अन्धकों तथा वृष्णियोंके घरों के पास से गुजरा, जहाँ सामान्यतया कोई भी नहीं जा सकता था।

तत्पश्चात्‌ वह भगवान्‌ हरि की सोलह हजार रानियों के ऐश्वर्यशाली महलों में से एक में घुसा और ऐसा करते समय उसेऐसा अनुभव हुआ, मानो वह ब्रह्मानन्द प्राप्त कर रहा हो।

तं॑ विलोक्याच्युतो दूरात्प्रियापर्यड्रमास्थित: ।

सहसोत्थाय चाभ्येत्य दोर्भ्या पर्यग्रहीन्मुदा ॥

१८॥

तम्‌--उसको; विलोक्य--देखकर; अच्युत:--भगवान्‌ कृष्ण ने; दूरातू-दूर से ही; प्रिया--अपनी प्रियतमा के; पर्यड्डम्‌--बिस्तर पर; आस्थित:-- आसीन; सहसा--तुरन्त; उत्थाय--उठ कर; च--तथा; अभ्येत्य--आगे बढ़कर; दोर्भ्याम्‌--अपनीभुजाओं में ; पर्यग्रहीत्‌ू--आलिंगन किया; मुदा--आनन्दपूर्वक |

उस समय भगवान्‌ अच्युत अपनी प्रियतमा के पलंग पर विराजमान थे।

उस ब्राह्मण को कुछदूरी पर देखकर भगवान्‌ तुरन्त उठ खड़े हुए और मिलने के लिए आगे गये और बड़े ही हर्ष सेउसका आलिंगन किया।

सख्यु: प्रियस्य विप्रषेरड्रसझतिनिर्वृतः ।

प्रीतो व्यमुझ्नदब्बिन्दृन्नेत्रा भ्यां पुष्करेक्षण: ॥

१९॥

सख्यु:--अपने मित्र के; प्रियस्थ--प्रिय; विप्र-ऋषे: --ब्राह्मण; अड़्र--शरीर का; सड्ड--संगति से; अति--अत्यधिक;निर्वृत:--आनन्दमय; प्रीत:--स्नेहिल; व्यमुझ्ञत्‌ू-मुक्त किया; अपू--जल की; बिन्दून्‌--बूँदें; नेत्राभ्यामू--अपनी आँखों से;पुष्कर-ईक्षण:--कमल-नेत्र भगवान्‌

कमलनयन भगवान्‌ को अपने प्रिय मित्र विद्वान ब्राह्मण के शरीर का स्पर्श करने पर गहनआनन्द की अनुभूति हुई और उनकी आँखों से प्रेम के आँसू झरने लगे।

अथोपवेश्य पर्यड्ले स्वयम्सख्यु: समहणम्‌ ।

उपहत्यावनिज्यास्य पादौ पादावनेजनी: ॥

२०॥

\अग्रहीच्छिरसा राजन्भगवॉाललोकपावन: ।

व्यलिम्पद्दिव्यगन्धेन चन्दनागुरुकुड्डमै: ॥

२१॥

धूपै: सुरभिभिर्मित्रं प्रदीपावलिभिर्मुदा ।

अर्चित्वावेद्य ताम्बूलं गां च स्वागतमब्रवीत्‌ ॥

२२॥

अथ--तब; उपवेश्य--बैठाकर; पर्यड्ले--पलंग पर; स्वयम्‌--स्वयं; सख्यु:--अपने मित्र के लिए; समरहणम्‌--पूजा कीसामग्री; उपहत्य--लाकर; अवनिज्य-- धोकर; अस्य--उसके; पादौ--दोनों पाँव; पाद-अवनेजनी: --उसके पाँवों को धोनेवाला जल; अग्रहीत्‌-- धारण किया; शिरसा--सिर पर; राजनू--हे राजा ( परीक्षित्‌ ); भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; लोक--सारेलोकों के; पावन:--पवित्र करने वाले; व्यलिम्पत्‌ू--लेप किया; दिव्य--दैवी; गन्धेन--गन्ध से; चन्दन--चन्दन-लेप से;अगुरु--अगुरु; कुड्डू मै:--तथा सिन्दूर से; धूपैः-- धूप से; सुरभिभि: --सुगन्धित; मित्रम्‌--अपने मित्र को; प्रदीप--दीपकोंकी; अवलिभि:--पंक्तियों से; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; अर्चित्वा--पूजा करके; आवेद्य--नाश्ता कराकर; ताम्बूलम्‌ू--पान;गाम्‌ू--गाय; च--तथा; सु-आगतम्‌--स्वागत; अब्रवीत्‌--बोले |

भगवान्‌ कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को बिस्तर पर बैठाया।

फिर समस्त जगत को पतवित्रकरने वाले भगवान्‌ ने स्वयं नाना प्रकार से उसका आदर किया और हे राजन, उसके पाँव धोयेतथा उसी जल को अपने सिर के ऊपर छिड़का।

उन्होंने उसके शरीर पर दिव्य सुगन्धित चन्दन,अगुरु तथा कुंकुम का लेप किया और सुगन्धित धूप तथा दीपों की पंक्तियों से खुशी-खुशीउसकी पूजा की।

अन्त में पान देने के बाद उसे दान में गाय दी और मधुर शब्दों से उसका स्वागतकिया।

कुचैलं मलिन क्षाम॑ द्विजं धमनिसन्ततम्‌ ।

देवी पर्यचरत्साक्षाच्यामरव्यजनेन वै ॥

२३॥

कु-फटे-पुराने, बुरे; चैलम्‌्--वस्त्र वाले; मलिनम्‌-मैले; क्षामम्‌--दुबले; द्विजमू--ब्राह्मण को; धमनि-सन्ततमू--जिसकीनसें दिख रही हों; देवी--धन की देवी, लक्ष्मी; पर्यचरत्‌--सेवा की; साक्षात्‌--सशरीर; चामर--चमरी गाय की पूछ से बने;व्यजनेन--पंखे से; वै--निस्सन्देह।

साक्षात्‌ लक्ष्मी देवी ने अपनी चामर से पंखा झल कर, उस गरीब ब्राह्मण की सेवा की,जिसके वस्त्र फटे हुए और मैले थे और जो इतना दुर्बल था कि उसके सारे शरीर की नसें दिखरही थीं।

अन्तःपुरजनो दृष्टा कृष्णेनामलकीर्तिना ।

विस्मितो भूदतिप्रीत्या अवधूतं सभाजितम्‌ ॥

२४॥

अन्तः-पुर--राजमहल के; जन: --लोग; हृष्टा--देखकर; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; अमल--निर्मल, स्वच्छ; कीर्तिना--कीर्तिवाले; विस्मित:--चकित; अभूत्‌--हो गये; अति--अत्यधिक; प्रीत्या--स्नेहपूर्वक; अवधूतम्‌-- अस्त-व्यस्त ब्राह्मण को;सभाजितमू--सम्मानित किया हुआ।

राजमहल के निवासी निर्मल कीर्ति वाले भगवान्‌ कृष्ण को इस फटे-पुराने और मैले वस्त्रपहने ब्राह्मण का इतने प्रेम से सम्मान करते देख कर चकित हो गए।

किमनेन कृतं पुण्यमवधूतेन भिक्षुणा ।

श्रिया हीनेन लोकेस्मिन्ग्हितिेनाधभेन च ॥

२५॥

योअसौ त्रिलोकगुरुणा श्रीनिवासेन सम्भूतः ।

पर्यड्डस्थां थ्रियं हित्वा परिष्वक्तोग्रजो यथा ॥

२६॥

किमू--क्या; अनेन--उसके द्वारा; कृतम्‌-किया गया; पुण्यम्‌--पुण्य-कार्य; अवधूतेन--अस्वच्छ; भिक्षुणा--भिक्षुक यासंन्यासी द्वारा; श्रिया-- धन से; हीनेन--हीन, रहित; लोके--संसार में; अस्मिन्‌ू--इस; गर्हितिन--निन्दनीय; अधमेन--नीच;च--तथा; यः--जो; असौ--वही; त्रि--तीन; लोक--लोकों के; गुरुणा-- गुरु द्वारा; श्री--लक्ष्मी के; निवासेन--घर से;सम्भूतः --सत्कारित; पर्यद््ू--सेजपर; स्थाम्‌--आसीन; श्रीयम्‌--लक्ष्मी को; हित्वा--त्याग कर; परिष्वक्त:--आलिंगन किया;अग्र-ज:--बड़ा भाई; यथा--मानो |

राजमहल के निवासियों ने कहा : इस अस्त-व्यस्त निर्धन ब्राह्मण ने कौन-सा पुण्य-कर्मकिया है? लोग उसे नीच तथा निन्दनीय मानते हैं फिर भी तीनों लोकों के गुरु और श्रीदेवी केधाम आदरपूर्वक उसकी सेवा कर रहे हैं।

लक्ष्मी को अपने पलंग पर बैठा हुआ छोड़ कर भगवान्‌ने इस ब्राह्मण का आलिंगन किया है, मानो वह उनका बड़ा भाई हो।

कथयां चक्रतुर्गाथा: पूर्वा गुरुकुले सतो: ।

आत्मनोरललिता राजन्करौ गृह्य परस्परम्‌ ॥

२७॥

'कथयाम्‌ चक्रतु:--परस्पर विचार-विमर्श किया; गाथा: --कथाएँ पूर्वा:--पुरानी; गुरु-कुले--अपने गुरु की पाठशाला में;सतो:--निवास कर रहे; आत्मनो:--अपनी अपनी; ललिता: --मनोहर; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित ); करौ--हाथों को; गृह्य--पकड़ कर; परस्परम्‌--एक-दूसरे के |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर कृष्ण तथा सुदामाअत्यन्त हर्ष के साथ बातें करते रहे कि किस तरह कभी वे दोनों अपने गुरु की पाठशाला मेंसाथ-साथ रहे थे।

श्रीभगवानुवाचअपि ब्रहान्गुरुकुलाद्धवता लब्धदक्षिणात्‌ ।

समावृत्तेन धर्मज्ञ भा्योढा सहशी न वा ॥

२८॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; अपि--क्या; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; गुरु-कुलातू-गुरु की पाठशाला से; भवता--आपकेद्वारा; लब्ध--प्राप्त कर लेने पर; दक्षिणात्‌--दक्षिणा से; समावृत्तेन--लौट आया; धर्म--धर्म के; ज्ञ--हे जानने वाले;भार्या--पत्नी; ऊढा--विवाहिता; सहशी--अनुरूप; न--नहीं; वा--अथवा |

भगवान्‌ ने कहा : हे ब्राह्मण, आप धर्म को भलीभाँति जानने वाले हैं।

क्या गुरु-दक्षिणादेने के बाद तथा पाठशाला से घर लौटने के बाद आपने अपने अनुरूप पत्नी से विवाह किया यानहीं ?

प्रायो गृहेषु ते चित्तमकामविहितं तथा ।

नैवातिप्रीयसे विद्वन्धनेषु विदितं हि मे ॥

२९॥

प्राय:--अधिकांशत:; गृहेषु--घरेलू कार्यो में; ते--तुम्हारा; चित्तमू--मन; अकाम-विहितम्‌--भौतिक इच्छाओं से अप्रभावित;तथा--भी; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अति--अत्यधिक; प्रीयसे--रुचि लेते हो; विद्वनू--हे विद्वान; धनेषु--भौतिक सम्पत्तिकी खोज में; विदितम्‌--यह ज्ञात है; हि--निस्सन्देह; मे--मेंरे द्वारा |

यद्यपि आप गृहकार्यों में प्रायः व्यस्त रहते हैं, किन्तु आपका मन भौतिक इच्छाओं सेप्रभावित नहीं होता।

न ही, हे विद्वान, आप भौतिक सम्पत्ति के पीछे पड़ने में अधिक रुचि लेतेहैं।

में यह भलीभाँति जानता हूँ।

केचित्कुर्वन्ति कर्माणि कामैरहतचेतस: ।

त्यजन्तः प्रकृतीर्देवीर्यथाहं लोकसड्ग्रहम्‌ ॥

३०॥

केचित्‌--कुछ लोग; कुर्वन्ति--करते हैं; कर्माणि--सांसारिक कर्तव्य; कामैः--इच्छाओं से; अहत--अविचल; चेतस:--मनवाला; त्ययन्तः--त्यागते हुए; प्रकृती:--लालसाएँ; दैवी:-- भगवान्‌ की भौतिक शक्ति द्वारा उत्पन्न; यथा--जिस तरह; अहम्‌--मैं; लोक-सड़्ग्रहमू--सामान्य जनों को शिक्षा देने के लिए।

कुछ लोग भगवान्‌ की मायाशक्ति से उत्पन्न समस्त भौतिक लिप्साओं का परित्याग करकेसांसारिक इच्छाओं से मन को अविचल रखते हुए सांसारिक कर्म सम्पन्न करते हैं।

जिस तरह मैंसामान्य जनों को शिक्षा देने के लिए कर्म करता हूँ, वे उसी तरह कर्म करते हैं।

कच्चिदगुरुकुले वासं ब्रह्मन्स्मरसि नौ यतः ।

द्विजो विज्ञाय विज्ञेयं तमस: पारमश्नुते ॥

३१॥

कच्चित्‌-क्या; गुरु-कुले--गुरु की पाठशाला में; वासमू--आवास; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; स्मरसि--स्मरण करते हो; नौ--हमदोनों के; यत:ः--जिस ( गुरु ) से; द्विज:--दो बार जन्मा पुरुष; विज्ञाय--जान कर; विज्ञेयम्‌--जानने के योग्य; तमसः--अज्ञानका; पारमू--पार करके ; अश्नुते--अनुभव करता है।

हे ब्राह्मण, क्या आपको स्मरण है कि हम किस तरह अपने गुरु की पाठशाला में एकसाथरहते थे? जब कोई द्विज विद्यार्थी अपने गुरु से सीखने योग्य सबकुछ सीख चुकता है, तो वहआध्यात्मिक जीवन का आनन्द उठा सकता है, जो समस्त अज्ञान से परे है।

सबै सत्कर्मणां साक्षादिद्‌वजातेरिह सम्भव: ।

आद्योडड यत्रा श्रमिणां यथाहं ज्ञानदो गुरु: ॥

३२॥

सः--वह; बै--निस्सन्देह; सत्‌ू--पवित्र, शुद्ध किया; कर्मणाम्‌ू--कर्मो का; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; द्वि-जाते:--दो बार जन्म लेनेवाले के; इह--इस भौतिक जगत में; सम्भव: --जन्म; आद्य:--प्रथम; अड्ग--हे प्रिय मित्र; यत्र--जिससे होकर;आश्रमिणामू--सभी आश्रमों के सदस्यों के लिए; यथा--जिस तरह; अहम्‌--मैं; ज्ञान--दैवी ज्ञान को; दः--देने वाला;गुरु:ः-गुरु

हे मित्र, व्यक्ति को भौतिक जन्म देने वाला ही उसका प्रथम गुरु होता है और जो उसे द्विजके रूप में ब्राह्मण की दीक्षा देता है तथा धर्म-कृत्यों में लगाता है, वह निस्सन्देह उसका अधिकप्रत्यक्ष गुरु होता है।

किन्तु जो सभी आध्यात्मिक आश्रमों के सदस्यों को दिव्य ज्ञान प्रदान करताहै, वह उसका परम गुरु होता है।

निस्सन्देह वह मुझ जैसा होता है।

नन्वर्थकोविदा ब्रह्मान्वर्णा भ्रमवतामिह ।

ये मया गुरुणा वाचा तरनन्‍्त्यज्ञो भवार्णवम्‌ ॥

३३॥

ननु--निश्चय ही; अर्थ--उनके असली कल्याण हेतु; कोविदा:--विशेषज्ञ; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; वर्णाश्रम-वतामू--वर्णा भ्रमप्रणाली में लगे हुओं में से; हह--इस संसार में; ये--जो; मया--मेरे द्वारा; गुरुणा--गुरु के रूप में; वाचा--वाणी से;तरन्ति--पार कर लेते हैं; अज्ञ:--सरलता से; भव-- भौतिक जीवन रूपी; अर्णवम्‌--समुद्र को

हे ब्राह्मण, यह निश्चित है कि वर्णाश्रम प्रणाली के सारे अनुयायियों में से, जो लोग गुरु रूपमें मेरे द्वारा कहे गये शब्दों से लाभ उठाते हैं और भवसागर को सरलता से पार कर लेते हैं, वे हीअपने असली कल्याण को सबसे अच्छी तरह समझ पाते हैं।

नाहमिज्याप्रजाति भ्यां तपसोपशमेन वा ।

तुष्येयं सर्वभूतात्मा गुरुशु श्रूषया यथा ॥

३४॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं; इज्या--अनुष्ठानिक पूजा द्वारा; प्रजातिभ्याम्‌-ब्राह्मण दीक्षा के उच्चतर जन्म से; तपसा--तपस्या द्वारा;उपशमेन--आत्मसंयम द्वारा; वा--अथवा; तुष्येयम्‌--तुष्ट किया जा सकता हूँ; सर्व--सभी; भूत--जीवों का; आत्मा--आत्मा;गुरु--अपने गुरु की; शुश्रूषया-- श्रद्धापूर्ण सेवा द्वारा; यथा--जिस तरह

सभी जीवों का आत्मा स्वरूप मैं अनुष्ठानिक पूजा, ब्राह्मण-दीक्षा, तपस्या अथवाआत्मानुशासन द्वारा उतना तुष्ट नहीं होता, जितना कि मनुष्य की अपने गुरु के प्रति की गईश्रद्धापूर्ण सेवा द्वारा तुष्ट होता हूँ।

अपि नः स्मर्यते ब्रह्मन्वृत्त निवसतां गुरौ ।

गुरुदारैश्नोदितानामिन्धनानयने क्वचित्‌ ॥

३५॥

प्रविष्टानां महारण्यमपत्तों सुमहद््‌द््‌वज ।

वातवर्षमभूत्तीत्र॑ निष्ठरा: स्‍्तनयित्ववः ॥

३६॥

अपि--क्या; नः--हमारा; स्मर्यते--स्मरण है; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; वृत्तमू--हमने जो कुछ किया; निवसतामू--एकसाथ रहतेहुए; गुरौ--अपने गुरु के साथ; गुरु--गुरु की; दारैः--पती के द्वारा; चोदितानाम्‌-- भेजे गये; इन्धन--ईंधन; अनयने--लानेके लिए; कक्‍्वचित्‌--एक बार; प्रविष्टानाम्‌ू--प्रवेश कर चुके; महा-अरण्यम्‌--विशाल जंगल में; अप-ऋतौ--बिना ऋतु के,असामयिक; सु-महत्‌--अत्यन्त विशाल; द्विज--हे द्विजन्मा; वात--तेज हवा; वर्षम्‌--तथा वर्षा; अभूत्‌--होने लगी; तीव्रमू--भयानक; निष्ठुराः--कर्कश; स्तनयित्वव:--गर्जना |

हे ब्राह्मण, क्या आपको स्मरण है कि जब हम अपने गुरु के साथ रह रहे थे, तो हमारे साथक्‍या घटना घटी थी? एक बार हमारे गुरु की पत्नी ने हमें जलाऊ लकड़ी लाने के लिए भेजाऔर हे द्विज, जब हम एक विशाल जंगल में प्रविष्ट हुए, तो तीव्र हवा और वर्षा के साथ साथकर्कश गर्जन से युक्त असामयिक तूफान आ गया था।

सूर्यश्चास्तं गतस्तावत्तमसा चावृता दिश: ।

निम्नं कूलं जलमयं न प्राज्ञायत किज्ञनन ॥

३७॥

सूर्य:--सूर्य; च--तथा; अस्तम्‌ गत:--डूब चुका था; तावत्‌--तत्पश्चात्‌; तमसा--अँधेरे से; च--और; आवृता:--ढकी हुई;दिशः--सारी दिशाएँ; निम्ममू--निचली; कूलम्‌--ऊँची भूमि; जल-मयम्‌--जलमग्न; न प्राज्ञायत--पहचाना नहीं जा सकताथा; किज्ञन--कुछ भी |

तब सूर्यास्त होते ही जंगल प्रत्येक दिशा में अंधकार से ढक गया और बाढ़ आ जाने से हमऊँची तथा नीची भूमि में अन्तर नहीं कर पा रहे थे।

वबयं भूृशम्तत्र महानिलाम्बुभिर्‌निहन्यमाना महुरम्बुसम्प्लवे ।

दिशोविदन्तोथ परस्पर बनेगृहीतहस्ता: परिबश्मिमातुरा: ॥

३८॥

वयम्‌--हम; भृशम्‌--पूर्णतया; तत्र--वहाँ; महा--महान्‌; अनिल--तेज हवा; अम्बुभि:--तथा जल से; निहन्यमाना:--घिरेहुए; मुहुः--लगातार; अम्बु-सम्प्लवे--बाढ़ में; दिश:--दिशाएँ; अविदन्त:--पहचान में न आ सकना; अथ--तब ; परस्परम्‌--एक-दूसरे को; बने--जंगल में; गृहीत-- पकड़े हुए; हस्ता:--हाथ; परिबशध्रिम--हम घूमते रहे; आतुरा:--दुखी |

जोरदार हवा और अनवरत वर्षा की चपेट में आकर हम बाढ़ के जल में अपना रास्ता भटकगये।

हमने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया और अत्यन्त संकट में पड़ कर, हम जंगल मेंनिरुद्देश्य घूमते रहे।

एतद्ठिदित्वा उदिते रवौ सान्दीपनिर्गुरु: ।

अन्वेषमाणो न: शिष्यानाचार्योपश्यदातुरान्‌ ॥

३९॥

एतत्‌--यह; विदित्वा--जान कर; उदिते--उदय होने पर; रवौ--सूर्य के; सान्दीपनि:--सान्दीपनि; गुरु: --हमारे गुरु;अन्वेषमाण:--ढूँढ़ते हुए; नः--हम; शिष्यान्‌ू--शिष्यों को; आचार्य:--हमारे शिक्षक ने; अपश्यत्‌--देखा; आतुरान्‌--आतुर,कष्ट पा रहे।

हमारे गुरु सान्दीपनि हमारी विषम स्थिति को समझ कर सूर्योदय होने पर हम शिष्यों कीखोज करने के लिए निकल पड़े और हमें विपत्ति में फँसा पाया।

अहो हे पुत्रका यूयमस्मदर्थतिदुःखिता: ।

आत्मा वै प्राणिनाम्प्रेष्ठस्तमनाहत्य मत्परा: ॥

४०॥

अहो--ओह; हे पुत्रक:--मेरे बच्चो; यूयम्‌--तुम दोनों ने; अस्मत्‌--हमारे; अर्थ--लिए; अति--अत्यन्त; दुःखिता:--कष्टउठाया; आत्मा--शरीर; वै--निस्सन्देह; प्राणिनाम्‌ू--सारे जीवों के लिए; प्रेष्ठ: --अत्यन्त प्रिय; तमू--उसकी; अनाहत्य--परवाह न करके; मत्‌--मेरे प्रति; पराः--समर्पित |

सान्दीपनि ने कहा : मेरे बच्चो, तुमने मेरे लिए इतना कष्ट सहा है, हर जीव को अपनाशरीर अत्यन्त प्रिय है, किन्तु तुम मेरे प्रति इतने समर्पित हो कि तुमने अपनी सुविधा की बिल्कुलपरवाह नहीं की।

एतदेव हि सच्छिष्यै: कर्तव्यं गुरुनिष्कृतम्‌ ।

यद्वै विशुद्धभावेन सर्वार्थात्मार्पणं गुरौ ॥

४१॥

एतत्‌--यह; एव--अकेला; हि--निश्चय ही; सत्‌-- असली; शिष्यै:--शिष्यों द्वारा; कर्तव्यम्‌ू--करणीय; गुरु--गुरु से;निष्कृतम्‌ू--उऋण होना; यत्‌--जो; बै--निस्सन्देह; विशुद्ध--नितान्त शुद्ध; भावेन--विचार से; सर्व--समस्त; अर्थ--सम्पत्ति; आत्मा--तथा शरीर का; अर्पणम्‌--समर्पण; गुरौ--गुरु को |

दरअसल सारे सच्चे शिष्यों का यही कर्तव्य है कि वे विशुद्ध हृदय से अपने धन तथा अपनेप्राणों तक को अर्पित करके अपने गुरु के ऋण से उऋण हों।

तुष्टोहं भो द्विजश्रेष्ठा: सत्या: सन्‍्तु मनोरथा: ।

छन्‍्दांस्ययातयामानि भवन्त्विह परत्र च ॥

४२॥

तुष्ट:--संतुष्ट: अहम्‌-मैं; भो--हे प्रिय; द्विज--ब्राह्मणों में; श्रेष्ठा: -- श्रेष्ठ; सत्या:--पूर्ण; सन्तु--हों; मनः-रथा: --तुम्हारीइच्छाएँ; छन्दांसि--वैदिक मंत्र; अयात-यामानि--कभी वृद्ध न हों; भवन्तु--हों; इह--इस जगत में; परत्र-- अगले जगत में;च-तथा।

हे बालको, तुम उत्तम श्रेणी के ब्राह्मण हो और मैं तुमसे संतुष्ट हूँ।

तुम्हारी सारी इच्छाएँ पूरीहों और तुमने जो वैदिक मंत्र सीखे हैं, वे इस जगत में या अगले जगत में तुम्हारे लिए कभीअपना अर्थ न खोयें।

इत्थंविधान्यनेकानि वसतां गुरुवेश्मनि ।

गुरोरनुग्रहेणैव पुमान्पूर्ण: प्रशान्तये ॥

४३॥

इत्थम्‌-विधानि--इस तरह की; अनेकानि--अनेक बातें; वसताम्‌--रहते समय हमें; गुरु--गुरु के; वेश्मनि--धर में; गुरो:--गुरु की; अनुग्रहेण--कृपा से; एब--केवल; पुमान्‌--पुरुष; पूर्ण:--पूर्ण ; प्रशान्तये-- पूर्ण शान्ति प्राप्त करने के लिए |

भगवान्‌ कृष्ण ने आगे कहा : अपने गुरु के घर में रहते समय हमें इस तरह केअनेकानेक अनुभव हुए।

कोई भी व्यक्ति अपने गुरु की कृपा मात्र से जीवन के प्रयोजन को पूराकर सकता है और शाश्वत शान्ति पा सकता है।

श्रीत्राह्मण उवाचकिमस्माभिरनिर्वृत्तं देवदेव जगदगुरो ।

भवता सत्यकामेन येषां वासो गुरोरभूत्‌ू ॥

४४॥

श्री-ब्राह्मणप: उबाच--ब्राह्मण ने कहा; किम्‌--क्या; अस्माभि: --हमरे द्वारा; अनिर्वृत्तम्‌ू--नहीं प्राप्त किया गया; देव-देव--हेदेवों के ईश्वर; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; गुरो--हे गुरु; भवता--आपसे; सत्य--पूर्ण; कामेन--इच्छाओं से; येषाम्‌--जिनके;वास:ः--निवास; गुरोः--गुरु के घर पर; अभूत्‌-- था

ब्राह्मण ने कहा : हे देवों के देव, हे जगदगुरु, चूँकि मैं पूर्णकाम अपने गुरु के घर परआपके साथ रह सका, अतः मुझे अब प्राप्त करने के लिए बचा ही क्‍या है ?

यस्य च्छन्दोमयं ब्रह्म देह आवपनं विभो ।

श्रेयसां तस्य गुरुषु वासोउत्यन्तविडम्बनम्‌ ॥

४५॥

यस्य--जिसका; छन्दः--वेदों; मयम्‌--से युक्त; ब्रहा--परम सत्य; देहे--शरीर के भीतर; आवपनम्‌--बोया गया खेत;विभो--हे सर्वशक्तिमान; श्रेयसाम्‌--शुभ लक्ष्यों का; तस्थ--उसका; गुरुषु--गुरुओं के साथ; वास:--निवासस्थान;अत्यन्त--अत्यधिक; विडम्बनम्‌--विडम्बना |

हे विभु, आपका शरीर वेदों के रूप में ब्रह्ममय है और इस तरह जीवन के समस्त शुभलक्ष्यों का स्रोत है।

आपने गुरु की पाठशाला में जो निवास किया, वह तो आपकी लीलाओं मेंसे एक है, जिसमें आप मनुष्य की भूमिका का निर्वाह करते हैं।

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची