← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची
अध्याय ग्यारह: बद्ध और मुक्त जीवित संस्थाओं के लक्षण
श्रीभगवानुवाचबद्धो मुक्त इति व्याख्या गुणतो मे न वस्तुतः ।गुणस्य मायामूलत्वान्न मे मोक्षो न बन्धनम् ॥
१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; बद्धः--बन्धन में; मुक्त:--मुक्त हुआ; इति--इस प्रकार; व्याख्या--जीव की विवेचना;गुणतः--प्रकृति के गुणों के अनुसार; मे--जो मेरी शक्ति है; न--नहीं; वस्तुत:--वास्तव में; गुणस्य--प्रकृति के गुणों का;माया--मेरी मोहक शक्ति; मूलत्वात्--कारण होने से; न--नहीं; मे--मेरा; मोक्ष: --मुक्ति; न--न तो; बन्धनम्--बन्धन ।
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, मेरे अधीन प्रकृति के गुणों के प्रभाव से जीव कभी बद्ध कहाजाता है, तो कभी मुक्त। किन्तु वस्तुतः आत्मा न तो कभी बद्ध होता है, न मुक्त और चूँकि मैंप्रकृति के गुणों की कारणस्वरूप माया का परम स्वामी हूँ, इसलिए मुझे भी मुक्त या बद्ध नहींमाना जाना चाहिए।
शोकमोहौ सुखं दु:खं देहापत्तिश्चव मायया ।स्वप्नो यथात्मन: ख्याति: संसृतिर्न तु वास््तवी ॥
२॥
शोक--शोक; मोहौ--तथा मोह; सुखम्--सुख; दुःखम्--दुख; देह-आपत्ति: -- भौतिक शरीर धारण करना; च--भी;मायया--माया के प्रभाव से; स्वन:ः--स्वप्न; यथा--जिस तरह; आत्मन:--बुद्धि के ; ख्याति:--मात्र एक विचार; संसृति:--संसार; न--नहीं है; तु--निस्सन्देह; वास्तवी--असली, सत्य
जिस तरह स्वप्न मनुष्य की बुद्धि की सृष्टि है किन्तु वास्तविक नहीं होता, उसी तरह भौतिकशोक, मोह, सुख, दुख तथा माया के वशीभूत होकर भौतिक शरीर ग्रहण करना--ये सभी मेरीमोहिनी शक्ति ( माया ) की सृष्टियाँ हैं। दूसरे शब्दों में, भौतिक जगत में कोई असलियत नहीं है।
विद्याविद्ये मम तनू विद्धयुद्धव शरीरिणाम् ।मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते ॥
३॥
विद्या--ज्ञान; अविद्ये--तथा अज्ञान; मम--मेरा; तनू--प्रकट शक्तियाँ; विद्द्धि--जानो; उद्धव--हे उद्धव; शरीरिणाम्--देहधारी जीवों का; मोक्ष--मो क्ष; बन्ध--बन्धन; करी--उत्पन्न करने वाला; आद्ये--आदि, नित्य; मायया--शक्ति द्वारा; मे--मेरा; विनिर्मिते--उत्पन्न किया गया |
हे उद्धव, ज्ञान ( विद्या ) तथा अज्ञान ( अविद्या ) दोनों ही माया की उपज होने के कारण मेरीशक्ति के विस्तार हैं। ये दोनों अनादि हैं और देहधारी जीवों को शाश्वत मोक्ष तथा बन्धन प्रदानकरने वाले हैं।
एकस्यैव ममांशस्य जीवस्यैव महामते ।बन्धोस्याविद्ययानादिर्विद्यया च तथेतर: ॥
४॥
एकस्य--एक के; एव--निश्चय ही; मम--मेरे; अंशस्य--अंश के; जीवस्य--जीव के; एव--निश्चय ही; महा-मते--हे परमबुद्धिमान; बन्ध: --बन्धन; अस्य--उसका; अविद्यया--अज्ञान से; अनादि:--आदि-रहित; विद्यया--ज्ञान से; च--तथा;तथा--उसी तरह; इतर:--बन्धन का उल्टा, मोक्ष।
हे परम बुद्धिमान उद्धव, जीव मेरा भिन्नांश है, किन्तु अज्ञान के कारण वह अनादि काल सेभौतिक बन्धन भोगता रहा है। फिर भी ज्ञान द्वारा वह मुक्त हो सकता है।
अथ बद्धस्य मुक्तस्य वैलक्षण्यं वदामि ते ।विरुद्धधर्मिणोस्तात स्थितयोरेकधर्मिणि ॥
५॥
अथ--इस प्रकार; बद्धस्य--बद्धजीव के; मुक्तस्य--मुक्त भगवान् के; वैलक्षण्यम्--विभिन्न लक्षण; वदामि--अब मैं कहूँगा;ते--तुमसे; विरुद्ध--विपरीत; धर्मिणो: --जिसके दो स्वभाव; तात--हे उद्धव; स्थितयो: --स्थित दो के ; एक-धर्मिणि--एकशरीर में अपने भिन्न भिन्न लक्षण प्रकट करता है।
इस तरह हे उद्धव, एक ही शरीर में हम दो विरोधी लक्षण--यथा महान् सुख तथा दुख पातेहैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि नित्य मुक्त भगवान् तथा बद्ध आत्मा दोनों ही शरीर के भीतर हैं।अब मैं तुमसे उनके विभिन्न लक्षण कहूँगा।
सुपर्णावेती सहशौ सखायौयहच्छयैतौ कृतनीडौ च वृक्षे ।एकस्तयो: खादति पिप्पलान्न-मन्यो निरन्नोडपि बलेन भूयान् ॥
६॥
सुपर्णौं--दो पक्षी; एतौ--ये; सहशौ--एक समान; सखायौ--मित्र; यहच्छया--संयोगवश; एतौ--ये दोनों; कृत--बनाये हुए;नीडौ--घोंसला; च--तथा; वृक्षे--वृक्ष पर; एक:--एक; तयो:--दोनों में से; खादति--खा रहा है; पिप्पल--वृक्ष के;अन्नम्ू--फलों को; अन्य:ः--दूसरा; निरन्न:--न खाते हुए; अपि--यद्यपि; बलेन--शक्ति से; भूयानू- श्रेष्ठ है
संयोगवश दो पक्षियों ने एक ही वृक्ष पर एक साथ घोंसला बनाया है। दोनों पक्षी मित्र हैंऔर एक जैसे स्वभाव के हैं। किन्तु उनमें से एक तो वृक्ष के फलों को खा रहा है, जबकि दूसरा,जो कि इन फलों को नहीं खा रहा है, अपनी शक्ति के कारण श्रेष्ठ पद पर है।
आत्मानमन्यं च स वेद विद्वा-नपिप्पलादो न तु पिप्पलाद: ।योउविद्यया युक्स तु नित्यबद्धोविद्यामयो यः स तु नित्यमुक्त: ॥
७॥
आत्मानम्--स्वयं; अन्यमू--दूसरा; च-- भी; सः--वह; वेद--जानता है; विद्वान्--सर्वज्ञ होने से; अपिप्पल-अदः--वृक्ष केफलों को नहीं खाने वाला; न--नहीं; तु--लेकिन; पिप्पल-अदः --वृक्ष के फलों को खाने वाला; य:--जो; अविद्यया--अज्ञान से; युकू--परिपूर्ण; सः--वह; तु--निस्सन्देह; नित्य--शा श्वत रूप से; बद्ध:--बद्ध; विद्या मय: --पूर्ण ज्ञान से पूरित;यः--जो; सः--वह; तु--निस्सन्देह; नित्य--नित्य; मुक्त:--मुक्त
जो पक्षी वृक्ष के फल नहीं खा रहा वह भगवान् है, जो अपनी सर्वज्ञता के कारण अपने पदको तथा उस बद्धजीव के पद को, जो कि फल खा रहे पक्षी द्वारा दर्शाया गया है, समझते हैं।किन्तु दूसरी ओर, वह जीव न तो स्वयं को समझता है, न ही भगवान् को। वह अज्ञान सेआच्छादित है, अतः नित्य बद्ध कहलाता है, जबकि पूर्ण ज्ञान से युक्त होने के कारण भगवान्नित्य मुक्त हैं।
देहस्थोपि न देहस्थो विद्वान्स्वप्नाद्यथोत्थित: ।अदेहस्थोपि देहस्थः कुमति: स्वणहग्यथा ॥
८॥
देह--भौतिक शरीर में; स्थ:--स्थित; अपि--यद्यपि; न--नहीं; देह--शरीर में; स्थ:--स्थित; विद्वान्--बुद्धिमान व्यक्ति;स्वणात्--स्वप्न से; यथा--जिस तरह; उत्थित:--जाग कर; अदेह--शरीर में नहीं; स्थ:--स्थित; अपि--यद्यपि; देह--शरीरमें; स्थ:--स्थित; कु-मति:--मूर्ख व्यक्ति; स्वज--स्वण; हक्--देख रहा; यथा--जिस तरह
जो व्यक्ति स्वरूपसिद्ध है, वह भौतिक शरीर में रहते हुए भी अपने को शरीर से परे देखताहै, जिस तरह मनुष्य स्वप्न से जाग कर स्वज-शरीर से अपनी पहचान त्याग देता है। किन्तु मूर्खव्यक्ति यद्यपि वह अपने भौतिक शरीर से पहचान नहीं रखता किन्तु इसके परे होता है, अपनेभौतिक शरीर में उसी प्रकार स्थित सोचता है, जिस तरह स्वप्न देखने वाला व्यक्ति अपने कोकाल्पनिक शरीर में स्थित देखता है।
इन्द्रियैरिन्द्रियार्थषु गुणैरपि गुणेषु च ।गृह्ममाणेष्वहं कुर्यात्र विद्वान्यस्त्वविक्रिय: ॥
९॥
इन्द्रिये: --इन्द्रियों द्वारा; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; अर्थषु--पदार्थों में; गुणैः--गुणों से उत्पन्न हुए; अपि--भी; गुणेषु--उन्हीं गुणों सेउत्पन्न में से; च-- भी; गृह्ममाणेषु-- ग्रहण किये जाकर; अहम्--मिथ्या अभिमान; कुर्यात्--उत्पन्न करना चाहिए; न--नहीं;विद्वान्-प्रबुद्ध;। यः--जो; तु--निस्सन्देह; अविक्रिय:-- भौतिक इच्छा से अप्रभावित |
भौतिक इच्छाओं के कल्मष से मुक्त प्रबुद्ध व्यक्ति अपने आपको शारीरिक कार्यो का कर्तानहीं मानता, प्रत्युत वह जानता है कि ऐसे कार्यों में प्रकृति के गुणों से उत्पन्न इन्द्रियाँ ही उन्हींगुणों से उत्पन्न इन्द्रिय-विषयों से सम्पर्क करती हैं।
देवाधीने शरीरेउस्मिन्गुणभाव्येन कर्मणा ।वर्तमानोबुधस्तत्र कर्तास्मीति निबध्यते ॥
१०॥
दैव--मनुष्य के पूर्व सकाम कर्मों के; अधीने--अधीन; शरीरे-- भौतिक शरीर में; अस्मिन्ू--इस; गुण--गुणों से; भाव्येन--उत्पन्न; कर्मणा--सकाम कर्मों द्वारा; वर्तमान:--स्थित होकर; अबुध:--मूर्ख; तत्र--शारीरिक कार्यो में; कर्ता--करने वाला;अस्मि--हूँ; इति--इस प्रकार; निबध्यते--बँध जाता है।
अपने पूर्व सकाम कर्मों द्वारा उत्पन्न शरीर के भीतर स्थित, अज्ञानी व्यक्ति सोचता है कि मैंही कर्म का कर्ता हूँ। इसलिए ऐसा मूर्ख व्यक्ति मिथ्या अहंकार से मोहग्रस्त होकर, उन सकामकर्मों से बँध जाता है, जो वस्तुतः प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं।
एवं विरक्त: शयन आसनाटनमज्जने ।दर्शनस्पर्शनप्राणभोजन श्रवणादिषु ।न तथा बध्यते दिद्वान्तत्र तत्रादयन्गुणान् ॥
११॥
एवम्--इस प्रकार; विरक्त:--भौतिक भोग से विलग हुआ; शयने--लेटने या सोने में; आसन--बैठने में; अटन--चलते हुए;मज्ने--अथवा स्नान में; दर्शन--देखने में; स्पर्शन--स्पर्श करने; घ्राण--सूँघने; भोजन--खाने; श्रवण--सुनने; आदिषु--इत्यादि में; न--नहीं; तथा--इस प्रकार; बध्यते--बाँधा जाता है; विद्वानू--बुद्ध्धिमान व्यक्ति; तत्र तत्र--जहाँ भी जाता है;आदयन्--अनुभव कराते; गुणान्--प्रकृति के गुणों से उत्पन्न, इन्द्रियाँ ॥
प्रबुद्ध व्यक्ति विरक्त रहकर शरीर को लेटने, बैठने, चलने, नहाने, देखने, छूने, सूँघने,खाने, सुनने इत्यादि में लगाता है, लेकिन वह कभी भी ऐसे कार्यों में फँसता नहीं। निस््सन्देह,वह समस्त शारीरिक कार्यों का साक्षी बनकर अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों में लगाता है औरवह मूर्ख व्यक्ति की भाँति उसमें फँसता नहीं।
प्रकृतिस्थोप्यसंसक्तो यथा खं सवितानिल: ।वैशारद्येक्षयासड्रशितया छिन्नसंशय: ।प्रतिबुद्ध इव स्वप्नान्नानात्वाद्विनिवर्तते ॥
१३॥
प्रकृति-- भौतिक जगत में; स्थ:--स्थित; अपि--यद्यपि; असंसक्त:--इन्द्रियतृप्ति से पूर्णतया विरक्त; यथा--जिस तरह;खम्--आकाश; सविता--सूर्य; अनिल: --वायु; वैशारद्या--अत्यन्त कुशल द्वारा; ईक्षया--दृष्टि; असड़--विरक्ति द्वारा;शितया--तेज किया हुआ; छिन्न--खण्ड खण्ड; संशय: --सन्देह; प्रतिबुद्ध:--जाग्रत; इब--सहश; स्वप्नातू--स्वण से;नानात्वातू--संसार के विविधत्व के द्वन्द् से; विनिवर्तते--मुख मोड़ता है या परित्याग कर देता है।
यद्यपि आकाश हर वस्तु की विश्राम-स्थली है, किन्तु वह न तो किसी वस्तु से मिलता है, नउसमें उलझता है। इसी प्रकार सूर्य उन नाना जलाशयों के जल में लिप्त नहीं होता, जिनमें से वहप्रतिबिम्बित होता है। इसी तरह सर्वत्र बहने वाली प्रबल वायु उन असंख्य सुगंधियों तथावातावरणों से प्रभावित नहीं होती, जिनमें से होकर वह गुजरती है। ठीक इसी तरह स्वरूपसिद्धआत्मा भौतिक शरीर तथा अपने आसपास के भौतिक जगत से पूर्णतया विरक्त रहता है। वह उसमनुष्य की तरह है, जो स्वप्न से जगा है। स्वरूपसिद्ध आत्मा विरक्ति द्वारा प्रख/ की गई कुशलइृष्टि से आत्मा के पूर्ण ज्ञान से समस्त संशयों को छिन्न-भिन्न कर देता है और अपनी चेतना कोभौतिक विविधता के विस्तार से पूर्णतया विलग कर लेता है।
यस्य स्युर्वीतसड्डूल्पा: प्राणेन्द्रियमनोधियाम् ।वृत्तय: स विनिर्मुक्तो देहस्थोपि हि तदगुणैः ॥
१४॥
यस्य--जिसके; स्यु:--हैं; वीत--रहित; सड्डूल्पा:-- भौतिक इच्छा से; प्राण--प्राण; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; मन: --मन; धियाम्--बुद्धि के; वृत्तय:--कार्य; सः--ऐसा व्यक्ति; बिनिर्मुक्त:--पूर्णतया मुक्त; देह--शरीर में; स्थ:--स्थित; अपि--होते हुए भी;हि--निश्चय ही; तत्--शरीर के; गुणैः--गुणों से
वह व्यक्ति स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों से पूर्णतया मुक्त माना जाता है, जब उसके प्राण,इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि के सारे कर्म किसी भौतिक इच्छा के बिना सम्पन्न किये जाते हैं। ऐसाव्यक्ति शरीर में स्थित रहकर भी बद्ध नहीं होता।
अस्यात्मा हिंस्यते हिंस््रै्येन किल्लिद्यदच्छया ।अर्च्यते वा क्वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुध: ॥
१५॥
यस्य--जिसका; आत्मा--शरीर; हिंस्यते-- आक्रमण किया जाता है; हिंस्त्रै:--पापी व्यक्तियों या उग्र पशुओं द्वारा; येन--जिससे; किश्चित्ू--कुछ कुछ; यदहृच्छया--किसी न किसी तरह; अर्च्यते--रूपान्तरित या प्रभावित होता है; वा--अथवा;क्वचित्--कहीं; तत्र--वहाँ; न--नहीं; व्यतिक्रियते--परिवर्तित अथवा प्रभावित होता है; बुध:--बुद्द्धिमान व्यक्ति
कभी कभी अकारण ही मनुष्य के शरीर पर क्रूर व्यक्तियों या उग्र पशुओं द्वारा आक्रमणकिया जाता है। अन्य अवसरों तथा अन्य स्थानों पर उसी व्यक्ति का दैवयोग से अत्यन्त सम्मानया पूजन होता है। जो व्यक्ति आक्रमण किये जाने पर क्रुद्ध नहीं होता, न ही पूजा किये जाने परप्रमुदित होता है, वही वास्तव में बुद्धिमान है।
न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा ।बदतो गुणदोषाभ्यां वर्जित: समहड्मुनि: ॥
१६॥
न स्तुवीत--प्रशंसा नहीं करता; न निन्देत--आलोचना नहीं करता; कुर्बतः--काम करने वाले; साधु--उत्तम; असाधु--दुष्ट;बा--अथवा; वदत:--बोलने वाले; गुण-दोषाभ्याम्--अच्छे तथा बुरे गुणों से; वर्जित:--मुक्त हुए; सम-हक्--समानदर्शी ;मुनि:--सन्त-साधु |
सन्त पुरुष समान दृष्टि से देखता है, अतएवं भौतिक दृष्टि से अच्छे या बुरे कर्म से प्रभावितनहीं होता। यद्यपि वह अन्यों को अच्छा तथा बुरा कार्य करते और उचित तथा अनुचित बोलतेदेखता है, किन्तु वह किसी की प्रशंसा या आलोचना नहीं करता।
न कुर्यान्न वदेत्किञ्ञिन्न ध्यायेत्साध्वसाधु वा ।आत्मारामोनया वृत्त्या विचरेजजडवन्मुनि: ॥
१७॥
न कुर्यातू-- नहीं करे; न वदेत्ू--नहीं बोले; किश्ञित्ू--कुछ भी; न ध्यायेत्ू--चिन्तन नहीं करे; साधु असाधु वा--अच्छी अथवाबुरी वस्तुएँ; आत्म-आराम:--आत्म-साक्षात्कार में आनन्द प्राप्त करने वाला; अनया--इस; वृत्त्या--जीवन-शैली द्वारा;विचरेत्--उसे भ्रमण करना चाहिए; जड-वत्--जड़ व्यक्ति की तरह; मुनि:--साधु-पुरुष |
मुक्त साधु-पुरुष को अपने शरीर-पालन के लिए भौतिक अच्छाई या बुराई की दिशा हेतु नतो कर्म करना चाहिए, न बोलना या सोच-विचार करना चाहिए। प्रत्युत उसे सभी भौतिकपरिस्थितियों में विरक्त रहना चाहिए और आत्म-साक्षात्कार में आनन्द लेते हुए उसे इस मुक्तजीवन-शैली में संलग्न होकर विचरण करना चाहिए और बाहरी लोगों को मन्दबुद्ध्धि-व्यक्तिजैसा लगना चाहिए।
शब्दब्रह्मणि निष्णातो न निष्णायात्परे यदि ।श्रमस्तस्य श्रमफलो ह्ाथेनुमिव रक्षत: ॥
१८॥
शब्द-ब्रह्मणि --वैदिक साहित्य में; निष्णात:--पूर्ण अध्ययन से निपुण; न निष्णायात्--मन को लीन नहीं करता; परे--परम में;यदि--यदि; श्रम:--परिश्रम; तस्य--उसका; श्रम--महत्प्रयास का; फल:--फल; हि--निश्चय ही; अधेनुम्--दूध न देने वालीगाय; इब--सहश; रक्षतः--रखवाले का।
यदि कोई गहन अध्ययन करके वैदिक साहित्य के पठन-पाठन में निपुण बन जाता है,किन्तु भगवान् में मन को स्थिर करने का प्रयास नहीं करता, तो उसका श्रम बैसा ही होता है,जिस तरह दूध न देने वाली गाय की रखवाली करने में अत्यधिक श्रम करने वाले व्यक्ति का।दूसरे शब्दों में, वैदिक ज्ञान के श्रमपूर्ण अध्ययन का फल कोरा श्रम ही निकलता है। उसके कोईअन्य सार्थक फल प्राप्त नहीं होगा।
गां दुग्धदोहामसतीं च भार्यादेहं पराधीनमसत्प्रजां च ।वित्त त्वतीर्थीकृतमड़ वाचंहीनां मया रक्षति दुःखदु:ःखी ॥
१९॥
गाम्--गाय को; दुग्ध--जिसका दूध; दोहाम्--पहले दुहा जा चुका हो; असतीम्--कुलटा, व्यभिचारिणी; च--भी;भार्यामू--पत्नी को; देहम्ू--शरीर को; पर--अन्यों के; अधीनम्-- आश्रित; असत्--व्यर्थ; प्रजामू--बच्चों को; च--भी;वित्तम्--सम्पत्ति को; तु--लेकिन; अतीर्थी-कृतम्--योग्य पात्र को न दिया जाकर; अड़--हे उद्धव; वाचम्ू--वैदिक ज्ञान;हीनाम्ू--रहित; मया--मेरे ज्ञान का; रक्षति--रखवाली करता है; दुःख-दुःखी--एक कष्ट के बाद दूसरा कष्ट सहन करनेवाला।
हे उद्धव, वह व्यक्ति निश्चय ही अत्यन्त दुखी होता है, जो दूध न देने वाली गाय, कुलटापत्नी, पूर्णतया पराश्चित शरीर, निकम्में बच्चों या सही कार्य में न लगाई जाने वाली धन-सम्पदाकी देखरेख करता है। इसी तरह, जो व्यक्ति मेरी महिमा से रहित वैदिक ज्ञान का अध्ययन करताहै, वह भी सर्वाधिक दुखियारा है।
यस्यां न मे पावनमड़ कर्मस्थित्युद्धवप्राणनिरोधमस्य ।लीलावतारेप्सितजन्म वा स्याद्वश्ध्यां गिरं तां बिभूयान्न धीर: ॥
२०॥
यस्याम्--जिस ( साहित्य ) में; न--नहीं; मे--मेरा; पावनम्--पवित्रकारी; अड्र--हे उद्धव; कर्म--कर्म; स्थिति--पालन;उद्धव--सृष्टि; प्राण-निरोधम्--तथा संहार; अस्थ-- भौतिक जगत का; लीला-अवतार--लीला-अवतारों में से; ईप्सित--अभीष्ट; जन्म--प्राकट्य ; वा--अथवा; स्यात्--है; वन्ध्यामू--बंजर; गिरम्ू--वाणी; ताम्ू--यह; बिभूयात्--समर्थन करे;न--नहीं; धीर: --बुद्धिमान पुरुष।
हे उद्धव, बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह कभी भी ऐसा ग्रंथ न पढ़े, जिनमें सम्पूर्णब्रह्माण्ड को पवित्र करने वाले मेरे कार्यकलापों का वर्णन न हो। निस्सन्देह मैं सम्पूर्ण जगत कासृजन, पालन तथा संहार करता हूँ। मेरे समस्त लीलावतारों में से कृष्ण तथा बलराम सर्वाधिकप्रिय हैं। ऐसा कोई भी तथाकथित ज्ञान, जो मेरे इन कार्यकलापों को महत्व नहीं देता, वह निराबंजर है और वास्तविक बुद्धिमानों द्वारा स्वीकार्य नहीं है।
एवं जिज्ञासयापोह्य नानात्वभ्रममात्मनि ।उपारमेत विरजं मनो मय्यर्पष्य सर्वगे ॥
२१॥
एवम्--इस तरह ( जैसाकि मैंने अभी कहा ); जिज्ञासया--वैश्लेषिक अध्ययन द्वारा; अपोह्म--त्याग कर; नानात्व--विविधताके; भ्रमम्-घूमने की त्रुटि; आत्मनि--अपने में; उपारमेत-- भौतिक जीवन समाप्त कर देना चाहिए; विरजम्--शुद्ध; मन:--मन; मयि-- मुझमें; अर्प्प--स्थिर करके; सर्व-गे--सर्वव्यापी मेंश़
समस्त ज्ञान के निष्कर्ष रूप में मनुष्य को चाहिए कि वह भौतिक विविधता की मिथ्याधारणा को त्याग दे, जिसे वह आत्मा पर थोपता है और इस तरह अपने भौतिक अस्तित्व कोसमाप्त कर दे। चूँकि मैं सर्वव्यापी हूँ, इसलिए मुझ पर मन को स्थिर करना चाहिए।
यद्यनीशो धारयितुं मनो ब्रह्मणि निश्चलम् ।मयि सर्वाणि कर्माणि निरपेक्ष: समाचर ॥
२२॥
यदि--यदि; अनीश: --असमर्थ; धारयितुम्--स्थिर करने के लिए; मन:--मन; ब्रह्मणि-- आध्यात्मिक पद पर; निश्चलम्--इन्द्रियतृष्ति से मुक्त; मयि--मुझमें; सर्वाणि--समस्त; कर्माणि--कर्म; निरपेक्ष:--फल भोगने का प्रयास किये बिना;समाचर--सम्पन्न करो
हे उद्धव, यदि तुम अपने मन को समस्त भौतिक उहापोहों से मुक्त नहीं कर सकते और इसेआध्यात्मिक पद पर पूर्णतया लीन नहीं कर सकते, तो अपने सारे कार्यों को, उनका फल भोगनेका प्रयास किये बिना, मुझे अर्पित भेंट के रूप में सम्पन्न करो।
श्रद्धालुर्मत्क था: श्रृण्वन्सुभद्रा लोकपावनी: ।गायन्ननुस्मरन्कर्म जन्म चाभिनयन्मुहु: ॥
२३॥
मदर्थे धर्मकामार्थानाचरन्मदपा श्रयः ।लभते निश्चलां भक्ति मय्युद्धव सनातने ॥
२४॥
श्रद्धालु:--श्रद्धावान व्यक्ति; मत्-कथा:--मेरी कथाएँ; श्रृण्वन्--सुनते हुए; सु-भद्रा:--सर्वमंगलमय; लोक--सारे जगत को;'पावनी:--पवित्र बनाते हुए; गायन्ू--गाना; अनुस्मरन्--निरन्तर स्मरण करना; कर्म--मेरे कार्य; जन्म--मेरा जन्म; च-- भी;अभिनयन्--नाटक करके; मुहुः--पुनः पुनः; मत्-अर्थ--मेरे आनन्द के लिए; धर्म--धार्मिक कार्य; काम--इन्द्रिय-कर्म ;अर्थानू--तथा व्यापारिक कार्य; आचरन्--सम्पन्न करते हुए; मत्--मुझमें; अपाश्रय:--आश्रय बनाकर; लभते--प्राप्त करताहै; निश्चलामू--अटल; भक्तिमू-- भक्ति; मयि--मुझमें; उद्धव--हे उद्धव; सनातने--मेरे सनातन रूप |हे उद्धव, मेरी लीलाओं तथा गुणों की कथाएँ सर्वमंगलमय हैं और समस्त ब्रह्माण्ड कोपवित्र करने वाली हैं।
जो श्रद्धालु व्यक्ति ऐसी दिव्य लीलाओं को निरन्तर सुनता है, उनकागुणगान करता है तथा उनका स्मरण करता है और मेरे प्राकट्य से लेकर सारी लीलाओं का अभिनय करता है, तथा मेरी तुष्टि के लिए अपने धार्मिक, ऐन्द्रिय तथा वृत्तिपरक कार्यों को मुझेअर्पित करता है, वह निश्चय ही मेरी अविचल भक्ति प्राप्त करता है।
सत्सड्ुलब्धया भक्त्या मयि मां स उपासिता ।सबै मे दर्शितं सद्धिरज्ञसा विन्दते पदम् ॥
२५॥
सत्--भगवद्भक्तों की; सड़--संगति से; लब्धया-प्राप्त की हुई; भक्त्या--भक्ति द्वारा; मयि--मुझमें; माम्--मेरा; सः--वह; उपासिता--उपासक; सः--वही व्यक्ति; वै--निस्सन्देह; मे--मेरा; दर्शितम्ू--बताये गये; सद्द्धिः--मेरे शुद्ध भक्तों द्वारा;अज्ञसा--आसानी से; विन्दते--प्राप्त करता है; पदम्--मेरे चरणकमल अथवा मेरा नित्य धाम |
जिसने मेरे भक्तों की संगति से शुद्ध भक्ति प्राप्त कर ली है, वह निरन्तर मेरी पूजा में लगारहता है। इस तरह वह आसानी से मेरे धाम को जाता है, जिसे मेरे शुद्ध भक्तगणों द्वारा प्रकटकिया जाता है।
श्रीउद्धव उवाचसाधुस्तवोत्तमश्लोक मतः कीहग्विध: प्रभो ।भक्तिस्त्वय्युपयुज्येत कीहशी सद्धिराहता ॥
२६॥
एतन्मे पुरुषाध्यक्ष लोकाध्यक्ष जगत्प्रभो ।प्रणतायानुरक्ताय प्रपन्नाय च कथ्यताम् ॥
२७॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; साधु:--सन्त-पुरुष; तब--तुम्हारा; उत्तम-शलोक-हे प्रभु; मत:ः--विचार; कीहक्-विध:--वह किस तरह का होगा; प्रभो--हे भगवान्; भक्ति:--भक्ति; त्वयि--तुममें; उपयुज्येत--सम्पन्न करने योग्य है;'कीहशी--किसी तरह की है; सद्धिः--आपके शुद्ध भक्तों, यथा नारद द्वारा; आहता--समादरित; एतत्--यह; मे-- मुझसे;पुरुष-अध्यक्ष--हे विश्व-नियन्ताओं के शासक; लोक-अध्यक्ष--हे वैकुण्ठ के स्वामी; जगत्-प्रभो--हे ब्रह्माण्ड के ईश्वर;प्रणताय--आपके शरणागतों के; अनुरक्ताय--अनुरक्त; प्रपन्नाय--जिनके आपके अलावा कोई अन्य आश्रय नहीं है; च-- भी;कथ्यताम्ू-कहें
श्री उद्धव ने कहा : हे प्रभु, हे भगवान्, आप किस तरह के व्यक्ति को सच्चा भक्त मानते हैंऔर आपके भक्तों द्वारा किस तरह की भक्ति समर्थित है, जो आपको अर्पित की जा सके ? हेब्रह्मण्ड के नियन््ताओं के शासक, हे वैकुण्ठ-पति तथा ब्रह्माण्ड के सर्वशक्तिमान ईश्वर, मैंआपका भक्त हूँ और चूँकि मैं आपसे प्रेम करता हूँ, इसलिए आपको छोड़ कर मेरा अन्य कोईआश्रय नहीं है। अतएव कृपा करके आप इसे मुझे समझायें।
त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुष: प्रकृते: पर: ।अवतीरनोंडसि भगवस्स्वेच्छोपात्तपृथग्वपु: ॥
२८॥
त्वमू-तुम; ब्रह्म परमम्--परब्रह्म; व्योम--आकाश की तरह ( हर वस्तु से पृथक् ); पुरुष:-- भगवान्; प्रकृते:--भौतिक प्रकृतिके; पर:--दिव्य; अवतीर्ण:--अवतार लिया; असि--हो; भगवन्--प्रभु; स्व-- अपने ( भक्तों ); इच्छा--इच्छा के अनुसार;उपात्त--स्वीकार किया; पृथक्--भिन्न; वपु:--शरीर |
हे प्रभु, परब्रह्म-रूप में आप प्रकृति से परे हैं और आकाश की तरह किसी तरह से बद्ध नहींहैं। तो भी, अपने भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर आप अनेक प्रकार के रूपों में प्रकट होते हैंऔर अपने भक्तों की इच्छानुसार अवतरित होते हैं।
श्रीभगवानुवाचकृपालुरकृतद्रोहस्तितिश्षु: सर्वदेहिनाम् ।सत्यसारोनवद्यात्मा सम: सर्वोपकारकः ॥
२९॥
कामैरहतधीर्दान्तो मृदु: शुचिरकिश्नः ।अनीहो मितभुक्शान्तः स्थिरो मच्छशणो मुनि: ॥
३०॥
अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाझ्जितषड्गुण: ।अमानी मानदः कल्यो मैत्र: कारुणिक: कवि: ॥
३१॥
आज्ञायैवं गुणान्दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान् ।धर्मान्सन्त्यज्य यः सर्वान्मां भजेत स तु सत्तम: ॥
३२॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; कृपालु:--अन्यों के कष्ट को सहन न कर सकने वाले; अकृत-द्रोह:--अन्यों को हानि नपहुँचाने वाले; तितिक्षु:--क्षमा करने वाले; सर्व-देहिनामू--सारे जीवों को; सत्य-सारः--सत्य पर जीवित रहने वाले तथा सत्यसे ही हृढ़ता प्राप्त करने वाले; अनवद्य-आत्मा--ईर्ष्या-द्वेष से मुक्त आत्मा; सम:--सुख-दुख में समान चेतना वाला; सर्व-उपकारकः--अन््यों के कल्याण के लिए प्रयलशील; कामै:-- भौतिक इच्छाओं द्वारा; अहत--अविचल; धी:ः--बुद्धि वाले;दान्तः--बाह्य इन्द्रियों को वश में करने वाले; मृदु:ः--कठोर मनोवृत्ति से रहित; शुचिः--अच्छे व्यवहार वाला; अकिद्ञन:--किसी भी सम्पत्ति से विहीन; अनीह:--सांसारिक कार्यकलापों से मुक्त; मित-भुक्ू --संयम से खानेवाला; शान्त:--मन को वशमें रखने वाला; स्थिर:--अपने नियत कार्य में हढ़ रहने वाला; मत्-शरण: --मुझे ही एकमात्र शरण स्वीकार करने वाला;मुनि:--विचारवान; अप्रमत्त:--सतर्क ; गभीर-आत्मा--दिखाऊ न होने के कारण अपरिवर्तित; धृति-मान्--विपत्ति के समयभी दुर्बल या दुखी न होने वाला; जित--विजय प्राप्त; घट्ू-गुण:--छ:ः गुण, भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा तथा मृत्यु;अमानी-- प्रतिष्ठा की इच्छा से रहित; मान-दः--अन्यों का आदर करने वाला; कल्य: --अन्यों की कृष्णभावना को जगाने मेंपटु; मैत्र:--दूसरों को धोखा न देने वाला, अतः असली मित्र; कारुणिक:--निजी महत्त्वाकांक्षा से नहीं, अपितु करुणा केवशीभूत होकर कर्म करने वाला; कवि: --पूर्ण विद्वान; आज्ञाय--जानते हुए; एवम्--इस प्रकार; गुणान्--अच्छे गुणों;दोषान्ू--बुरे गुणों को; मया--मेरे द्वारा; आदिष्टान्ू--शिक्षा दिए गये; अपि-- भी; स्वकान्-- अपने ही; धर्मानू-- धार्मिक सिद्धान्तों को; सन्त्यज्य--त्याग कर; यः--जो; सर्वानू--समस्त; माम््--मुझको; भजेत--पूजता है; सः--वह; तु--निस्सन््देह;सत्-तमः--सन्त-पुरुषों में श्रेष्ठ
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, सन््त-पुरुष दयालु होता है और वह कभी दूसरों को हानि नहींपहुँचाता। दूसरों के आक्रामक होने पर भी वह सहिष्णु होता है और सारे जीवों को क्षमा करनेवाला होता है। उसकी शक्ति तथा जीवन की सार्थकता सत्य से मिलती है। वह समस्त ईर्ष्या-द्वेषसे मुक्त होता है और भौतिक सुख-दुख में उसका मन समभाव रहता है। इस तरह वह अन्य लोगोंके कल्याण हेतु कार्य करने में अपना सारा समय लगाता है। उसकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं सेमोहग्रस्त नहीं होती और उसकी इन्द्रियाँ अपने वश में रहती हैं। उसका व्यवहार सदैव मधुर, मृदुतथा आदर्श होता है। वह स्वामित्व (संग्रह ) भाव से मुक्त रहता है। वह कभी भी सामान्यसांसारिक कार्यकलापों के लिए प्रयास नहीं करता और भोजन में संयम बरतता है। इसलिए वहसदैव शान्त तथा स्थिर रहता है। सन््त-पुरुष विचारवान होता है और मुझे ही अपना एकमात्रआश्रय मानता है। ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्य-पालन में अत्यन्त सतर्क रहता है, उसमें कभी भीऊपरी विकार नहीं आ पाते, क्योंकि दुखद परिस्थितियों में भी वह स्थिर तथा नेक बना रहता है।उसने भूख, प्यास, शोक, मोह, जरा तथा मृत्यु इन छह भौतिक गुणों पर विजय पा ली होती है।वह अपनी प्रतिष्ठा की इच्छा से मुक्त होता है और अन्यों को आदर प्रदान करता है। वह अन्यों कीकृष्ण-चेतना को जाग्रत करने में कुशल होता है, अतएव कभी किसी को ठगता नहीं प्रत्युतवह सबों का शुभैषी मित्र होता है और अत्यन्त दयालु होता है। ऐसे सनन््त-पुरुष को दिद्ठानों मेंसर्वश्रेष्ठ समझना चाहिए। वह भलीभाँति समझता है कि विविध शास्त्रों में मैंने, जो धार्मिककर्तव्य नियत किये हैं, उनमें अनुकूल गुण रहते हैं जो उनके करने वालों को शुद्ध करते हैं औरवह जानता है कि इन कर्तव्यों की उपेक्षा से जीवन में त्रुटि आती है। फिर भी, सन्त-पुरुष मेरेचरणकमलों की शरण ग्रहण करके सामान्य धार्मिक कार्यो को त्याग कर एकमात्र मेरी पूजाकरता है। इस तरह वह जीवों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
ज्ञात्वाज्ञात्वाथ येवैमां यावान्यश्वास्मि याहश: ।भजन्त्यनन्यभावेन ते मे भक्ततमा मता: ॥
३३॥
ज्ञात्वा--जान कर; अज्ञात्वा--न जान कर; अथ--इस प्रकार; ये--जो; बै--निश्चय ही; मामू--मुझको ; यावान्ू--जब तक;यः--जो; च-- भी; अस्मि--हूँ; याहश: -- जैसा मैं हूँ; भजन्ति-- पूजा करते हैं; अनन्य-भावेन-- अनन्य भक्ति से; ते--वे; मे--मेरे द्वारा; भक्त-तमा:--सर्व श्रेष्ठ भक्तमण; मता: --माने जाते हैं|
भले ही मेरे भक्त यह जानें या न जानें कि मैं क्या हूँ, मैं कौन हूँ और मैं किस तरह विद्यमानहूँ, किन्तु यदि वे अनन्य प्रेम से मेरी पूजा करते हैं, तो मैं उन्हें भक्तों में सर्व श्रेष्ठ मानता हूँ।
मल्लिड्डमद्धक्तजनदर्शनस्पर्शनार्चनम् ।परिचर्या स्तुतिः प्रह्मगुणकर्मानुकीर्तनम् ॥
३४॥
मत्कथाश्रवणे श्रद्धा मदनुध्यानमुद्धव ।सर्वलाभोपहरणं दास्येनात्मनिवेदनम् ॥
३५॥
मज्न्मकर्मक थनं मम पर्वानुमोदनम् ।गीतताण्डववादित्रगोष्ठीभिमद्गृ्होत्सव: ॥
३६॥
यात्रा बलिविधानं च सर्ववार्षिकपर्वसु ।वैदिकी तान्त्रिकी दीक्षा मदीयब्रतधारणम् ॥
३७॥
ममार्चास्थापने श्रद्धा स्वत: संहत्य चोद्यम: ।उद्यानोपवनाक्रीडपुरमन्दिरकर्मणि ॥
३८ ॥
सम्मार्जनोपलेपाभ्यां सेकमण्डलवर्तनै: ।गृहशुश्रूषणं मह्यं दासवद्यदमायया ॥
३९॥
अमानित्वमदम्भित्वं कृतस्यापरिकीर्तनम् ।अपि दीपावलोकं मे नोपयुउज्यान्निवेदितम् ॥
४०॥
यद्यदिष्ठटतमं लोके यच्चातिप्रियमात्मन: ।तत्तन्निवेदयेन्मह्मं तदानन्त्याय कल्पते ॥
४१॥
मतू-लिड्ड--अर्चाविग्रह के रूप में इस जगत में मेरा प्राकट्य; मत्-भक्त जन--मेरे भक्त; दर्शन--देखना; स्पर्शन--स्पर्श;अर्चनम्--तथा पूजा; परिचर्या--सेवा-कार्य; स्तुतिः--महिमा की प्रार्थनाएँ; प्रह-- नमस्कार; गुण--मेरे गुण; कर्म--तथाकर्म; अनुकीर्तनम्--निरन्तर महिमा-गायन; मत्-कथा--मेरे विषय में कथाएँ; श्रवणे--सुनने में; श्रद्धा--प्रेम के कारण श्रद्धा;मतू-अनुध्यानम्--सदैव मेरा ध्यान करते हुए; उद्धव--हे उद्धव; सर्व-लाभ--सभी उपार्जित वस्तुएँ; उपहरणम्-- भेंट;दास्येन--अपने को मेरा दास मानते हुए; आत्म-निवेदनम्--आत्म-समर्पण; मत्-जन्म-कर्म-कथनम्--मेरे जन्म तथा कर्मों कीप्रशंसा करना; मम--मेरा; पर्व--जन्माष्टमी जैसे उत्सवों में; अनुमोदनम्--परम हर्ष मनाते हुए; गीत--गीतों; ताण्डब--नृत्य;वादित्र--संगीत के वाद्यों; गोष्ठीभि:--तथा भक्तों के मध्य विचार-विमर्श; मत्-गृह--मेरे मन्दिर में; उत्सवः--उत्सव, पर्व;यात्रा--उत्सव मनाना; बलि-विधानम्-- आहुति डालना; च--भी; सर्व--समस्त; वार्षिक --साल में एक बार, प्रत्येक वर्ष;पर्वसु--उत्सवों में; वैदिकी--वेदों में उल्लिखित; तान्त्रिकी--पश्ञरात्र जैसे ग्रंथों में वर्णित; दीक्षा--दीक्षा; मदीय--मेरा; ब्रत--उपवास; धारणम्--रखते हुए; मम--मेरे; अर्चा--अर्चाविग्रह का; स्थापने--स्थापना में; श्रद्धा-- श्रद्धा रखते हुए; स्वतः--अपने से; संहत्य--अन्यों के साथ; च--भी; उद्यम: --प्रयास; उद्यान--फूल के बगीचों के; उपवन--छोटा बगीचा; आक्रीड--लीलाओं के स्थान; पुर--भक्ति के शहर; मन्दिर--तथा मन्दिर; कर्मणि--निर्माण में; सम्मार्जन--ठीक से झाड़ना-बुहारना;उपलेपाभ्याम्--लीप-पोत कर; सेक--सुगन्धित जल छिड़क कर; मण्डल-वर्तनै:--मण्डल बनाकर; गृह--मन्दिर का, जो किमेरा घर है; शुश्रूषणम्-- सेवा; महाम्--मेरे लिए; दास-वत्--दास की तरह; यत्--जो; अमायया--द्वैत-रहित; अमानित्वम्--झूठी प्रतिष्ठा के बिना; अदम्भित्वम्ू--गर्व से रहित होकर; कृतस्य--भक्ति-कर्म; अपरिकीर्तनम्--विज्ञापन न करना; अपि--भी; दीप--दीपकों के; अवलोकम्-- प्रकाश; मे--मेरा; न--नहीं; उपयुड्ज्यात्ू--लगाना चाहिए; निवेदितम्--अन्यों को पहलेही भेंट की जा चुकी वस्तुएँ; यत् यत्--जो जो; इष्ट-तमम्--अभीष्ट; लोके--संसार में; यत् च--तथा जो भी; अति-प्रियम्--अत्यन्त प्रिय; आत्मन:--अपना; तत् तत्ू--वह वह; निवेदयेत्-- भेंट करे; मह्मम्--मुझको; तत्--वह भेंट; आनन्त्याय--अमरता के लिए; कल्पते--योग्य बनाती है।
हे उद्धव, निम्नलिखित भक्ति-कार्यो में लगने पर मनुष्य मिथ्या अभिमान तथा प्रतिष्ठा कापरित्याग कर सकता है। वह मेरे अर्चाविग्रह को के रूप में मुझे तथा मेरे शुद्ध भक्तों को देखकर, छू कर, पूजा करके, सेवा करके, स्तुति करके तथा नमस्कार करके अपने को शुद्ध बनासकता है। उसे मेरे दिव्य गुणों एवं कर्मो की भी प्रशंसा करनी चाहिए, मेरे यश की कथाओं कोप्रेम तथा श्रद्धा के साथ सुनना चाहिए तथा निरन्तर मेरा ध्यान करना चाहिए। उसे चाहिए कि जोभी उसके पास हो, वह मुझे अर्पित कर दे और अपने को मेरा नित्य दास मान कर मुझ पर हीपूरी तरह समर्पित हो जाये। उसे मेरे जन्म तथा कार्यों की सदैव चर्चा चलानी चाहिए औरजन्माष्टमी जैसे उत्सवों में, जो मेरी लीलाओं की महिमा को बतलाते हैं, सम्मिलित होकर जीवनका आनन्द लेना चाहिए। उसे मेरे मन्दिर में गा कर, नाच कर, बाजे बजाकर तथा अन्य वैष्णवोंसे मेरी बातें करके उत्सवों तथा त्योहारों में भी भाग लेना चाहिए। उसे वार्षिक त्योहारों में होनेवाले उत्सवों में, यात्राओं में तथा भेंटें चढ़ाने में नियमित रूप से भाग लेना चाहिए। उसे एकादशीजैसे धार्मिक ब्रत भी रखने चाहिए और वेदों, पंचरात्र तथा अन्य ऐसे ही ग्रंथों में उल्लिखितविधियों से दीक्षा लेनी चाहिए। उसे श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक मेरे अर्चाविग्रह की स्थापना काअनुमोदन करना चाहिए और अकेले अथवा अन्यों के सहयोग से कृष्णभावनाभावित मन्दिरोंतथा नगरों के साथ ही साथ फूल तथा फल के बगीचों एवं मेरी लीला मनाये जाने वाले विशेषक्षेत्रों के निर्माण में हाथ बँटाना चाहिए। उसे बिना किसी द्वैत के अपने को मेरा विनीत दासमानना चाहिए और इस तरह मेरे आवास, अर्थात् मन्दिर को साफ करने में सहयोग देना चाहिए।सर्वप्रथम उसमें झाड़ू-बुहारा करना चाहिए और तब उसे जल तथा गोबर से स्वच्छ बनानाचाहिए। मन्दिर को सूखने देने के बाद सुगन्धित जल का छिड़काव करना चाहिए और मण्डलोंसे सजाना चाहिए। उसे मेरे दास की तरह कार्य करना चाहिए। उसे कभी भी अपने भक्ति-कार्योंका ढिंढ़ोरा नहीं पीटना चाहिए। इस तरह उसकी सेवा मिथ्या अभिमान का कारण नहीं होगी।उसे मुझे अर्पित किए गए दीपकों का प्रयोग अन्य कार्यो के लिए अर्थात् मात्र उजाला करने कीआवश्यकता से नहीं करना चाहिए। इसी तरह मुझे ऐसी कोई वस्तु भेंट न की जाय, जो अन्योंपर चढ़ाई जा चुकी हो या अन्यों द्वारा काम में लाई जा चुकी हो। इस संसार में जिसे जो भी वस्तु सब से अधिक चाहिए और जो भी वस्तु उसे सर्वाधिक प्रिय हो उसे, वही वस्तु मुझे अर्पित करनीचाहिए। ऐसी भेंट चढ़ाने से वह नित्य जीवन का पात्र बन जाता है।
सूर्योउग्नि्ब्राह्मणा गावो वैष्णव: खं मरुजजलम् ।भूरात्मा सर्वभूतानि भद्र पूजापदानि मे ॥
४२॥
सूर्य:--सूर्य; अग्नि:--अग्नि; ब्राह्मणा:--तथा ब्राह्मणगण; गाव: --गौवें; वैष्णव: -- भगवद्भक्त; खम्--आकाश; मरुत्--वायु; जलम्ू--जल; भू:--पृथ्वी; आत्मा--व्यष्टि आत्मा; सर्व-भूतानि--सारे जीव; भद्ग--हे साधु उद्धव; पूजा--पूजा के;पदानि--स्थान; मे--मेरी |
हे साधु-पुरुष उद्धव, यह जान लो कि तुम मेरी पूजा सूर्य, अग्नि, ब्राह्मणों, गौवों, वैष्णवों,आकाश, वायु, जल, पृथ्वी, आत्मा में तथा सारे जीवों में कर सकते हो।
सूर्य तु विद्यया त्रय्या हविषाग्नौ यजेत माम् ।आतिदथ्येन तु विप्राछये गोष्वड्र यवसादिना ॥
४३॥
वैष्णवे बन्धुसत्कृत्या हृदि खे ध्याननिष्ठया ।वायौ मुख्यधिया तोये द्र॒व्यैस्तोयपुरःसरैः ॥
४४॥
स्थण्डिले मन्त्रहदयैभोंगिरात्मानमात्मनि ।क्षेत्रज्ं सर्वभूतेषु समत्वेन यजेत माम् ॥
४५॥
सूर्य --सूर्य में; तु--निस्सन्देह; विद्य॒या त्रय्या-- प्रशंसा, पूजा तथा नमस्कार की चुनी हुई वैदिक स्तुतियों द्वारा; हवविषा--घी कीआहुतियों से; अग्नौ-- अग्नि में; यजेत--पूजा करे; माम्--मुझको; आतिथ्येन--अतिथि के रूप में स्वागत करके; तु--निस्सन्देह; विप्र--ब्राह्मणों के; अछये--सर्व श्रेष्ठ, अग्रणी; गोषु--गौवों में; अड्र--हे उद्धव; यवस-आदिना--उनके पालन केलिए घास आदि देना; वैष्णवे-- वैष्णव में; बन्धु--प्रेमपूर्ण मैत्री के साथ; सत्-कृत्या--सत्कार करने से; हृदि--हृदय में; खे--आन्तरिक आकाश में; ध्यान--ध्यान में; निष्ठया--स्थिर होने से; वायौ--वायु में; मुख्य--प्रमुख; धिया--बुद्धि से मानते हुए;तोये--जल में; द्रव्यैः-- भौतिक तत्त्वों द्वारा; तोब-पुर:ः-सरैः--जल इत्यादि से; स्थण्डिले--पृथ्वी पर; मन्त्र-हदयै:--मंत्रों केप्रयोग से; भोगैः--भोग्य वस्तुएँ प्रदान करने से; आत्मानम्--जीवात्मा; आत्मनि--शरीर के भीतर; क्षेत्र-ज्ञम--परमात्मा; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों के भीतर; समत्वेन--सर्वत्र समभाव से देखते हुए; यजेत--पूजा करना चाहिए; माम्--मुझको
हे उद्धव, मनुष्य को चाहिए कि चुने हुए वैदिक मंत्रोच्चार तथा पूजा और नमस्कार द्वारा सूर्यमें मेरी पूजा करे। वह अग्नि में घी की आहुति डाल कर मेरी पूजा कर सकता है। वह अनामंत्रितअतिथियों के रूप में ब्राह्मणों का आदरपूर्वक स्वागत करके उनमें मेरी पूजा कर सकता है। मेरीपूजा गायों में उन्हें घास तथा उपयुक्त अन्न एवं उनके स्वास्थ्य एवं आनन्द के लिए उपयुक्त सामग्रीप्रदान करके की जा सकती है। वैष्णवों में मेरी पूजा उन्हें प्रेमपूर्ण मैत्री प्रदान करके तथा सबप्रकार से उनका आदर करके की जा सकती है। स्थिरभाव से ध्यान के माध्यम से हृदय में मेरीपूजा होती है और वायु में मेरी पूजा इस ज्ञान के द्वारा की जा सकती है कि तत्त्वों में प्राण हीप्रमुख है। जल में मेरी पूजा जल के साथ फूल तथा तुलसी-दल जैसे अन्य तत्त्वों को चढ़ाकरकी जा सकती है। पृथ्वी में गुह्य बीज मंत्रों के समुचित प्रयोग से मेरी पूजा हो सकती है। भोजनतथा अन्य भोज्य वस्तुएँ प्रदान करके व्यष्टि जीव में मेरी पूजा की जा सकती है। सारे जीवों मेंपरमात्मा का दर्शन करके तथा इस तरह समहदृष्टि रखते हुए मेरी पूजा की जा सकती है।
शिष्ण्येष्वित्येषु मद्रूपं शब्डुचक्रगदाम्बुजै: ।युक्त चतुर्भुजं शान्तं ध्यायन्न्चेत्समाहित: ॥
४६॥
धिष्ण्येषु--पूर्व वर्णित पूजा-स्थलों में; इति--इस प्रकार ( पूर्व वर्णित विधियों से ); एषु--उनमें; मत्-रूपम्--मेरा दिव्य रूप;शट्बभु--शंख; चक्र --सुदर्शन चक्र; गदा--गदा; अम्बुजैः --तथा कमल-फूल से; युक्तम्--सज्जित; चतु:-भुजम्--चार भुजाओंसहित; शान्तम्-शान्त; ध्यायन्-ध्यान करते हुए; अर्चेत्--पूजा करे; समाहित: --मनोयोग से |
इस तरह पूर्व वर्णित पूजा-स्थलों में तथा मेरे द्वारा वर्णित विधियों से मनुष्य को मेरे शान्त,दिव्य तथा चतुर्भुज रूप का, जो शंख, सुदर्शन चक्र, गदा तथा कमल से युक्त है, ध्यान करनाचाहिए। इस तरह उसे मनोयोगपूर्वक मेरी पूजा करनी चाहिए।
इष्टापूर्तेन मामेव॑ यो यजेत समाहितः ।लभते मयि सद्धक्ति मत्स्मृति: साधुसेवया ॥
४७॥
इष्टा--अपने लाभ के लिए यज्ञ करके; पूर्तन--तथा अन्यों के लाभ के लिए शुभ कार्य करना तथा कुएँ खुदवाना; माम्--मुझको; एवम्--इस प्रकार; यः--जो; यजेत--पूजा करता है; समाहितः--मुझमें मन स्थिर करके; लभते--प्राप्तकरता है;मयि--मुझमें; सत्-भक्तिम्--हढ़ भक्ति; मत्ू-स्मृतिः--मेरा स्वरूपसिद्ध ज्ञान; साधु --उत्तम गुणों से युक्त; सेवया--सेवा द्वारा |
मेरी तुष्टि के लिए जिसने यज्ञ तथा शुभ कार्य किये हैं और इस तरह से एकाग्र ध्यान से मेरीपूजा करता है, वह मेरी अटल भक्ति प्राप्त करता है। ऐसा पूजक उत्तम कोटि की अपनी सेवाके कारण मेरा स्वरूपसिद्ध ज्ञान प्राप्त करता है।
प्रायेण भक्तियोगेन सत्सड़ेन विनोद्धव ।नोपायो विद्यते सम्यक्प्रायणं हि सतामहम् ॥
४८॥
प्रायेण--प्राय:; भक्ति-योगेन--मेरी भक्ति से; सत्-सड्रेन--मेरे भक्तों की संगति से सम्भव होने वाली; विना--रहित; उद्धव--हे उद्धव; न--नहीं; उपाय: --कोई उपाय; विद्यते--है; सम्यक्--जो वास्तव में कारगर हो; प्रायणम्--जीवन का असली मार्गया वास्तविक आश्रय; हि--क्योंकि; सताम्--मुक्तात्माओं का; अहम्--मैं |
हे उद्धव, सन्त स्वभाव के मुक्त पुरुषों के लिए मैं ही अनन्तिम आश्रय तथा जीवन-शैली हूँ,अतएव यदि कोई व्यक्ति मेरे भक्तों की संगति से सम्भव मेरी प्रेमाभक्ति में प्रवृत्त नहीं होता, तोसभी व्यावहारिक उद्देश्यों के दृष्टिकोण से प्रायः भौतिक जगत से बचने का कोई उपाय उसकेपास नहीं रह जाता।
अशैतत्परमं गुह्वां श्रण्वतो यदुनन्दन ।सुगोप्यमपि वक्ष्यामि त्वं मे भृत्य: सुहत्सखा ॥
४९॥
अथ--इस प्रकार; एतत्--यह; परमम्--परम; गुहाम्--गुप्त; श्रण्वत:ः--सुनने वाले तुमको; यदु-नन्दन--हे यदुकुल के प्रिय;सु-गोप्यम्--अत्यन्त गुह्म; अपि-- भी; वक्ष्यामि--मैं कहूँगा; त्वम्--तुम; मे--मेरा; भृत्य:ः--सेवक हो; सु-हत्--शुभचिन्तक;सखा--तथा मित्र
हे उद्धव, हे यदुकुल के प्रिय, चूँकि तुम मेरे सेवक, शुभचिन्तक तथा सखा हो, अतएवं अबमैं तुमसे अत्यन्त गुह्य ज्ञान कहूँगा। अब इसे सुनो, क्योंकि मैं इन महान् रहस्यों को तुम्हें बतलानेजारहा हूँ।
