← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची
अध्याय पंद्रह: भगवान कृष्ण द्वारा रहस्यवादी योग सिद्धियों का वर्णन
श्रीभगवानुवाचजितेन्द्रियस्य युक्तस्थ जितश्वासस्थ योगिन: ।मयि धारयतश्चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः ॥
१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; जित-इन्द्रियस्थ--जिसने अपनी इन्द्रियाँ जीत ली हैं; युक्तस्थ--जिसने मन को स्थिर करलिया है; जित-श्वासस्थ--जिसने प्राणायाम पर विजय पा ली है; योगिन: --ऐसे योगी का; मयि--मुझमें; धारयत:--स्थिर करतेहुए; चेत:--अपनी चेतना; उपतिष्ठन्ति--प्रकट होती हैं; सिद्धयः--योग की सिद्धियाँ |
भगवान् ने कहा : हे उद्धव, योग-सिद्धियाँ उस योगी द्वारा अर्जित की जाती हैं जिसने अपनीइन्द्रियों पर विजय पा ली हो, अपने मन को स्थिर कर लिया हो, प्राणायाम को वश में कर लियाहो और जो अपने मन को मुझमें स्थिर कर चुका हो।
श्रीउद्धव उवाचकया धारणया का स्वित्कथं वा सिद्धिरच्युत ।कति वा सिद्धयो ब्रूहि योगिनां सिद्धिदो भवान् ॥
२॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; कया--किस; धारणया--ध्यान की विधि द्वारा; का स्वित्--क्या निस्सन्देह; कथम्--किस तरह से; वा--अथवा; सिद्द्धिः--योग-सिद्द्धि; अच्युत--हे प्रभु; कति--कितने; वा--अथवा; सिद्धयः--सिद्धियाँ;ब्रृहि--कृपा करके कहिए; योगिनाम्--समस्त योगियों के; सिद्धि-दः--सिद्धि दाता; भवान्ू--आप |
श्री उद्धव ने कहा : हे अच्युत, योग-सिद्धि किस विधि से प्राप्त की जा सकती है और ऐसीसिद्धि का स्वभाव क्या है? योग-सिद्ध्रियाँ कितनी हैं? कृपा करके ये बातें मुझसे बतलाइये।निस्सन्देह, आप समस्त योग-सिद्धियों के प्रदाता हैं। श्रीभगवानुवाचसिद्धयोउष्टादश प्रोक्ता धारणा योगपारगै: ।तासामष्टौ मत्प्रधाना दशैव गुणहेतव: ॥
३॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; सिद्धयः--योग-सिद्धियाँ; अष्टादश--अठारह; प्रोक्ता:--घोषित की जाती हैं;धारणा:--ध्यान; योग--योग के; पार-गै:--पारंगतों द्वारा; तासामू--उठारहों में से; अष्टौ-- आठ; मत्-प्रधाना:--मुझमें शरणपाती हैं; दश--दस; एव--निस्सन्देह; गुण-हेतवः--भौतिक सतोगुण से प्रकट हैं
भगवान् ने कहा : योग के पारंगतों ने घोषित किया है कि योग-सिद्धि तथा ध्यान केअठारह प्रकार हैं जिनमें से आठ मुख्य हैं, जो मेरे अधीन हैं और दस गौण हैं, जो सतोगुण सेप्रकट होती हैं।
अणिमा महिमा मूर्तेर्लधिमा प्राप्तिरिन्द्रिये: ।प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमीशिता ॥
४॥
गुणेष्वसड्रों वशिता यत्कामस्तदवस्यति ।एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मता: ॥
५॥
अणिमा--छोटे-से-छोटा बनने की सिद्धि; महिमा--बड़े-से-बड़ा बनना; मूर्तें:--शरीर का; लघिमा--हल्के-से-हल्का बनना;प्राप्ति:-- प्राप्ति; इन्द्रियै:--इन्द्रियों के द्वारा; प्राकाम्यम्--इच्छानुरूप कार्य की सम्पन्नता; श्रुत--न दिखने वाली वस्तुएँ, जिनकेबारे में केवल सुना जा सकता है; दृष्टेचु--तथा दिखाई पड़ने वाली वस्तुएँ; शक्ति-प्रेरणम्--माया की उपशक्तियों को काम मेंलगाना; ईशिता--नियंत्रण करने की सिद्द्धि; गुणेषु--प्रकृति के गुणों में; असड़ः--बिना रुकावट के; वशिता--अन्यों को वशमें करने की शक्ति; यत्--जो भी; काम:--इच्छा; तत्--वह; अवस्यति--प्राप्त कर सकता है; एता: --ये; मे--मेरी( शक्तियाँ ); सिद्धयः--सिद्धियाँ; सौम्य--हे सुशील उद्धव; अष्टौ-- आठ; औत्पत्तिका:--प्राकृतिक तथा अद्वितीय; मताः--मानी जानी चाहिए।
आठ प्रधान योग-सिद्धियों में तीन सिद्धियाँ, जिनसे मनुष्य अपने शरीर को रूपान्तरित करसकता है, अणिमा ( छोटे से छोटा बनना ), महिमा ( बड़े से बड़ा होना ) तथा लघिमा ( हल्के सेहल्का होना ) हैं। प्राप्ति सिद्धि द्वारा मनवांछित वस्तु प्राप्त की जा सकती है और प्राकाम्य सिद्धिद्वारा मनुष्य को उसकी भोग्य वस्तु का अनुभव इस लोक या अगले लोक में होता है। ईशितासिद्धि से मनुष्य माया की उपशक्तियों को पा सकता है और वशिता सिद्धि से मनुष्य तीनों गुणोंसे अबाध बन जाता है। जिसने कामावसायिता सिद्धि प्राप्त की होती है, वह कहीं से कोई भीवस्तु सर्वोच्च सीमा तक पा सकता है। हे उद्धव, ये आठ योग-सिद्धिदियाँ प्राकृतिक रूप सेविद्यमान होती हैं और इस जगत में अद्वितीय हैं।
अनूर्मिमत्त्वं देहेउस्मिन्दूरश्रवणदर्शनम् ।मनोजव: कामरूपं परकायप्रवेशनम् ॥
६॥
स्वच्छन्दमृत्युदेवानां सहक्रीडानुदर्शनम् ।यथासड्डूल्पसंसिद्द्िराज्ञाप्रतिहता गति: ॥
७॥
अनूर्मि-मत्त्वमू-- भूख, प्यास आदि से अविचलित रह कर; देहे अस्मिन्--इस शरीर को; दूर--दूरस्थ वस्तुएँ; श्रवण--सुनना;दर्शनम्--तथा देखना; मनः-जब:--मन की गति से शरीर को हिलाते हुए; काम-रूपम्--इच्छानुसार किसी भी शरीर कोधारण करते हुए; पर-काय--दूसरों के शरीर; प्रवेशनम्--प्रविष्ट होकर; स्व-छन्द--अपनी इच्छानुसार; मृत्यु;--मर रहे;देवानाम्ू--देवताओं के; सह--साथ में; क्रीडा--खिलवाड़; अनुदर्शनम्--देखते हुए; यथा--के अनुसार; सड्डूल्प-इढ़निश्चय; संसिद्धि:--पूर्ण सिद्धि; आज्ञा--निर्देश; अप्रतिहता--अबाध; गति:--प्रगति |
प्रकृति के गुणों से उत्पन्न होने वाली दस गौण योग-सिद्ध्रियाँ हैं-- भूख-प्यास तथा अन्यशारीरिक उत्पातों से अपने को मुक्त करने की शक्ति, काफी दूरी से वस्तुओं को देखने-सुनने की शक्ति, मन के वेग से शरीर को गतिशील बनाने की शक्ति, इच्छानुसार रूप धारण करने कीशक्ति, अन्यों के शरीर में प्रवेश करने की शक्ति, इच्छानुसार शरीर त्यागने की शक्ति, देवताओंतथा अप्सराओं की लीलाओं का दर्शन करने की शक्ति, अपने संकल्प को पूरा करने तथा ऐसेआदेश देने की शक्ति जिनका निर्बाध पालन हो सके।
त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्दं परचित्ताद्मभिज्ञता ।अम्न्य्काम्बुविषादीनां प्रतिष्टम्भोडषपराजय: ॥
८॥
एताश्नोद्देशतः प्रोक्ता योगधारणसिद्धयः ।यया धारणया या स्याद्यथा वा स्यातन्निबोध मे ॥
९॥
त्रि-काल-च्ञत्वम्-- भूत, वर्तमान तथा भविष्य जानने की सिद्धि; अद्न्द्मू-गर्मी तथा सर्दी जैसे द्वैतों से अप्रभावित रहना; पर--अन्यों के; चित्त--मन; आदि--इत्यादि; अभिज्ञता--जानना; अग्नि--अग्नि; अर्क--सूर्य; अम्बु--जल; विष--विष;आदीनाम्---इत्यादि की; प्रतिष्टम्भ:--शक्ति को रोकना; अपराजय: --दूसरे द्वारा हराया न जाना; एता:--ये; च-- भी;उद्देशतः--नामों तथा गुणों के उल्लेख मात्र से; प्रोक्ता:--कथित; योग--योग-प्रणाली का; धारण-- ध्यान की; सिद्धय:ः --सिद्धियाँ; यया--जिसमें; धारणया--ध ध्यान से; या--जो ( सिद्धि ); स्थातू--हो सके; यथा--जिसके द्वारा; वा--अथवा;स्थातू--हो सके; निबोध--सीख लो; मे--मुझसे |
भूत, वर्तमान तथा भविष्य जानने की शक्ति, शीत-घाम तथा अन्य द्वन्द्-ों को सहने कीशक्ति, अन्यों के मन को जान लेने, अग्नि, सूर्य, जल, विष इत्यादि के प्रभाव को रोकना तथाअन्यों द्वारा पराजित न होने की शक्ति--ये योग तथा ध्यान की पाँच सिद्ध्ियाँ हैं। मैं उन्हें, उनकेनामों तथा गुणों के अनुसार, यहाँ सूचीबद्ध कर रहा हूँ। तुम मुझसे सीख लो कि किस तरहविशेष ध्यान से विशिष्ट योग-सिद्ध्रियाँ उत्पन्न होती हैं और उनमें कौन-सी विशेष विधियाँ निहितहोती हैं।
भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्र॑ धारयेन्मन: ।अणिमानमवापष्नोति तन्मात्रोपासको मम ॥
१०॥
भूत-सूक्ष्म--सूक्ष्म तत्त्वों के; आत्मनि--आत्मा में; मयि--मुझमें; तत्-मात्रमू--अनुभूति के सूक्ष्म तात्विक रूपों पर; धारयेत्--एकाग्र करे; मनः--मन को; अणिमानम्--अणिमा नामक सिद्द्धि; अवाप्नोति--प्राप्त करता है; तत्-मात्र--सूक्ष्म तत्त्वों में;उपासकः--पूजा करने वाला; मम--मेरा |
जो व्यक्ति अपने मन को समस्त सूक्ष्म तत्त्वों में व्याप्त मेरे सूक्ष्म रूप में एकाग्र करके मेरीपूजा करता है, वह अणिमा नामक योग-सिद्धि प्राप्त करता है।
महत्तत्त्वात्मनि मयि यथासंस्थं मनो दधत् ।महिमानमवाणष्नोति भूतानां च पृथक्पृथक् ॥
११॥
महत्ू-तत्त्व--समस्त भौतिक शक्ति की; आत्मनि--आत्मा में; मयि--मुझमें; यथा--के अनुसार; संस्थम्--विशेष परिस्थिति;मनः--मन; दधत्--एकाग्र करते हुए; महिमानम्--महिमा नामक शक्ति; अवापष्नोति--प्राप्त करता है; भूतानाम्ू-- भौतिकतत्त्वों की; च--भी; पृथक् पृथक्ू--अलग अलग।
जो व्यक्ति महत् तत्त्व के विशेष रूप में अपने मन को लीन कर देता है और इस तरह समस्तजगत के परमात्मा रूप में मेरा ध्यान करता है उसे महिमा नामक योग-सिद्धि प्राप्त होती है। औरजो आकाश, वायु, अग्नि इत्यादि पृथक् पृथक् तत्त्वों में अपने मन को लीन करता है, वह हरभौतिक तत्त्व की महानता ( महत्ता ) को प्राप्त करता जाता है।
परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रझ्जयन् ।कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात् ॥
१२॥
'परम-अणु-मये--परमाणुओं के रूप में; चित्तमू--चेतना; भूतानाम्-- भौतिक तत्त्वों की; मयि--मुझमें; रक्ञयन्--अनुरक्तहोकर; काल--समय का; सूक्ष्म--सूक्ष्म; अर्थताम्--वस्तु; योगी--योगी; लघिमानम्--लघिमा नामक योगशक्ति;अवाणुयात्--प्राप्त कर सकते हैं।
मैं प्रत्येक वस्तु के भीतर रहता हूँ, इसलिए मैं भौतिक तत्त्वों के परमाणविक घटकों का सारहूँ। मेरे इस रूप में अपने मन को संलग्न करके, योगी लघिमा नामक सिद्धि प्राप्त कर सकता है,जिससे वह काल के समान सूक्ष्म परमाणविक वस्तु की अनुभूति कर सकता है।
धारयन्मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिके खिलम् ।सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्ति प्राप्पोति मन््मना: ॥
१३॥
धारयन्--एकाग्र करते हुए; मयि--मुझमें; अहम्-तत्त्वे--मिथ्या अहंकार के भीतर; मन:--मन; बैकारिके --सतोगुण से उत्पन्नहुए में; अखिलम्--पूर्णतया; सर्ब--सारे जीव; इन्द्रियाणाम्--इन्द्रियों का; आत्मत्वम्--स्वामित्व; प्राप्तिमू--प्राप्ति नामकसिद्धि; प्राप्पोति--प्राप्त करता है; मत्-सना:--योगी जिसका मन मुझमें स्थिर है।
सतोगुण से उत्पन्न मिथ्या अहंकार के भीतर अपने मन को पूरी तरह मुझमें एकाग्र करते हुएयोगी प्राप्ति नामक शक्ति प्राप्त करता है, जिससे वह समस्त जीवों की इन्द्रियों का स्वामी बनजाता है। वह ऐसी सिद्धि इसलिए प्राप्त करता है क्योंकि उसका मन मुझमें लीन रहता है।
महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम् ।प्राकाम्यं पारमेष्ठयं मे विन्दतेउव्यक्तजन्मन: ॥
१४॥
महति--महत्-तत्त्व में; आत्मनि--परमात्मा में; यः--जो; सूत्रे--सकाम कर्मों की श्रृंखला से जाना जाने वाला; धारयेत्--एकाग्र करे; मयि--मुझमें; मानसम्--मानसिक कार्य ; प्राकाम्यम्--प्राकाम्य नामक सिद्धि; पारमेष्ठयमम्--सर्वोत्तम; मे--मुझसे;विन्दते--प्राप्त करता है या भोगता है; अव्यक्त-जन्मन:--उससे जिसके प्राकट्य को इस जगत में अनुभव नहीं किया जासकता।
जो व्यक्ति सकाम कर्मो की श्रृंखला को अभिव्यक्त करने वाले महत् तत्त्व की उस अवस्थाके परमात्मा रूप मुझमें अपनी सारी मानसिक क्रियाएँ एकाग्र करता है, वह अव्यक्त रूप मुझसेप्राकाम्य नामक सर्वोत्तम योग-सिद्धि्ि प्राप्त करता है।
विष्णौ त्र्यधी श्वरे चित्तं धारयेत्कालविग्रहे ।स ईशित्वमवाणोत्ति क्षेत्रज्ञक्षेत्रचोदनाम् ॥
१५॥
विष्णौ--भगवान् विष्णु या परमात्मा में; त्रि-अधी श्वरे--तीन गुणों वाली माया के परम नियन्ता; चित्तम्--चेतना; धारयेत्--एकाग्र करता है; काल--काल का, जो कि मूल गतिप्रदाता है; विग्रहे--स्वरूप में; सः--वह, योगी; ईशित्वम्--वश में करनेकी सिद्धि; अवाष्नोति--प्राप्त करता है; क्षेत्र-ज्ञ--चेतन जीव; क्षेत्र--उपाधियों सहित शरीर; चोदनाम्--प्रेरित करते हुए।
जो मूल गतिप्रदाता तथा तीन गुणों से युक्त बहिरंगा शक्ति के परमेश्वर, परमात्मा विष्णु में अपनी चेतना स्थिर करता है, वह अन्य बद्धजीवों, उनके शरीरों तथा उनकी उपाधियों कोनियंत्रित करने की योग-सिद्धिि प्राप्त करता है।
नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते ।मनो मय्यादधद्योगी मद्धर्मा वशितामियात् ॥
१६॥
नारायणे-- भगवान् नारायण में; तुरीय-आख्ये--तुरीय नामक; भगवत्--समस्त ऐश्वर्य से पूर्ण; शब्द-शब्दिते--शब्द से जानाजाने वाला; मन:--मन; मयि--मुझमें; आदधत्--लगाते हुए; योगी--योगी; मत्-धर्मा--मेरे स्वभावको पाकर; वशिताम्--वशिता नामक सिद्धि; इयात्-मय् ओब्तैन्
जो योगी मेरे नारायण रूप में, जो कि समस्त ऐश्वर्यपूर्ण चौथी अवस्था ( तुरीय ) माना जाताहै, अपने मन को लगाता है, वह मेरे स्वभाव से युक्त हो जाता है और उसे वशिता नामक योग-सिद्धि प्राप्त होती है।
निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन्विशदं मनः ।परमानन्दमापष्नोति यत्र कामोइवसीयते ॥
१७॥
निर्गुणे--गुणरहित; ब्रह्मणि--ब्रह्म में; मयि--मुझमें; धारयन्--एकाग्र करके; विशदम्--शुद्ध; मन: --मन; परम-आनन्दम्--सर्वाधिक सुख; आण्नोति--प्राप्त करता है; यत्र--जहाँ; काम:--इच्छा; अवसीयते--पूर्णतया पूरित रहता है
जो व्यक्ति मेरे निर्विशेष ब्रह्म रूप में अपना शुद्ध मन स्थिर करता है, वह सर्वाधिक सुखप्राप्त करता है, जिसमें उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।
श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि ।धारयज्छेततां याति षडूमिरहितो नर: ॥
१८॥
श्वेत-द्वीप-- श्वेत द्वीप का, जो कि क्षीरोदकशायी विष्णु का धाम है; पतौ-- भगवान् में; चित्तमू--चेतना को; शुद्धे--साक्षात्सतोगुण में; धर्म-मये--दया में सदैव स्थित है, जो; मयि--मुझमें; धारयन्--एकाग्र करते हुए; श्वेतताम्ू--शुद्धता को; याति--प्राप्त करता है; घट्-ऊर्मि-- भौतिक उत्पात की छः लहरें; रहितः--से मुक्त; नरः--पुरुष।
जो व्यक्ति मेरे धर्म को धारण करने वाले, साक्षात् शुद्धता तथा श्वेत द्वीप के स्वामी के रूपमुझमें, अपना मन एकाग्र करता है, वह शुद्ध जीवन को प्राप्त करता है, जिसमें वह भौतिकउपद्रव की छह ऊर्मियों से अर्थात् भूख, प्यास, क्षय, मृत्यु, शोक तथा मोह से--मुक्त हो जाताहै।
मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्दहन् ।तत्रोपलब्धा भूतानां हंसो वाच: श्रुणोत्यसौ ॥
१९॥
मयि--मुझमें; आकाश-आत्मनि--आकाश रूप; प्राणे-- प्राण में; मनसा--मन से; घोषम्--दिव्य ध्वनि; उद्दहन्ू--एकाग्र करतेहुए; तत्र--आकाश में; उपलब्धा:-- अनुभूत; भूतानाम्--सारे जीवों का; हंस:--शुद्ध जीव; वाच:--शब्द या वाणी;श्रुणोति--सुनता है; असौ--वह।
वह शुद्ध जीव जो मेरे भीतर होने वाली असामान्य ध्वनि पर साक्षात् आकाश तथा प्राण-वायु के रूप में अपना मन स्थिर करता है, वह आकाश में सारे जीवों की वाणी का अनुभव करसकता है।
चक्षुस्त्वष्टरे संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि ।मां तत्र मनसा ध्यायन् विश्व पश्यति दूरत: ॥
२०॥
चक्षु;--आँखें; त्वष्टरि--सूर्य में; संयोज्य--तादात्म्य करके; त्वष्टारम्ू--सूर्य को; अपि-- भी; चक्षुषि-- अपनी आँखों में;माम्--मुझको; तत्र--वहाँ, सूर्य तथा आँख के पारस्परिक तादात्म्य में; मनसा--मन से; ध्यायन्--ध्यान करते हुए; विश्वम्--हरवस्तु को; पश्यति--देखता है; दूरत:--दूर स्थित |
मनुष्य को चाहिए कि अपनी दृष्टि को सूर्यलोक में और सूर्यलोक को अपनी आँखों में लीनकरके, सूर्य तथा दृष्टि के संमेल के भीतर मुझे स्थित मान कर, मेरा ध्यान करे। इस तरह वहकिसी भी दूर की वस्तु को देखने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।
मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनुवायुना ।मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मन: ॥
२१॥
मनः--मन; मयि--मुझमें; सु-संयोज्य--ठीक से संयुक्त करके; देहम्-- भौतिक शरीर; तत्ू--मन; अनु-वायुना--पीछे पीछेचलने वाली हवा से; मत्-धारणा--मेरे ध्यान का; अनुभावेन--शक्ति द्वारा; तत्र--वहाँ; आत्मा-- भौतिक शरीर ( चला जाताहै ); यत्र--जहाँ जहाँ; वै--निश्चय ही; मनः--मन ( चला जाता है )
जो योगी अपना मन मुझमें लीन कर देता है और इसके बाद मन का अनुसरण करने वालीवायु का उपयोग भौतिक शरीर को मुझमें लीन करने के लिए करता है, वह मेरे ध्यान की शक्तिसे उस योग-सिद्धि को प्राप्त करता है, जिससे उसका शरीर तुरन्त ही मन के पीछे पीछे जाता है।
यदा मन उपादाय यद्यद्रूपं बुभूषति ।तत्तद्धवेन्मनोरूपं मद्योगबलमा श्रय: ॥
२२॥
यदा--जब; मन: --मन; उपादाय-प्रयुक्त करके; यत् यत्--जो जो; रूपम्--रूप; बुभूषति--धारण करना चाहता है; तत्तत्--वही रूप; भवेत्--प्रकट हो सकता है; मन:-रूपम्ू--मन द्वारा इच्छित रूप; मत्-योग-बलम्--मेरी अचिन्त्य योगशक्तिजिससे मैं असंख्य रूप प्रकट करता हूँ; आभ्रयः:--आश्रय रूप।
जब कोई योगी किसी विशेष विधि से अपने मन को लगाकर कोई विशिष्ट रूप धारणकरना चाहता है, तो वही रूप तुरन्त प्रकट होता है। ऐसी सिद्धि मेरी उस अचिन्त्य योगशक्ति केआश्रय में मन को लीन करने से सम्भव है, जिसके द्वारा मैं असंख्य रूप धारण करता हूँ।परकायं विशन्सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत् ।
पिण्डं हित्वा विशेत्प्राणो वायुभूतः षडड्घ्रिवत् ॥
२३॥
पर--दूसरे के; कायम्--शरीर में; विशन्--प्रवेश करने की इच्छा करते हुए; सिद्धः--योगाभ्यास में निपुण; आत्मानम्--स्वयं;तत्र--उस शरीर में; भावयेत्--कल्पना करता है; पिण्डम्--अपने ही स्थूल शरीर को; हित्वा--त्याग कर; विशेत्-- प्रवेश करे;प्राण:--सूक्ष्म शरीर में; वायु-भूत:--वायु जैसा बन कर; षट्-अड्घ्रि-वत्-- भौरें की तरह
जो एक फूल से दूसरे फूल परमँडराता हैजब कोई पूर्ण योगी किसी अन्य के शरीर में प्रवेश करना चाहता है, तो उसे चाहिए किअन्य के शरीर में अपना ध्यान करे और तब अपना निजी स्थूल शरीर त्याग कर, वायु के मार्गों सेहोकर अन्य के शरीर में उसी तरह प्रवेश करे जिस तरह भौंरा उड़ कर एक फूल छोड़ कर दूसरेपर चला जाता है।
पाष्ण्यापीडबद्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्थसु ।आरणेषप्य ब्रहारन्श्रेण ब्रह्म नीत्वोत्सूजेत्तनुम्ू ॥
२४॥
पाष्ण्या--एड़ी से; आपीड्य--रोक कर; गुदम्--गुदा को; प्राणम्--जीव को ले जाने वाला प्राण; हत्--हृदय से; उर:--वक्षस्थल पर; कण्ठ--गले तक; मूर्थसु--तथा सिर पर; आरोप्य--रख कर; ब्रह्म-रन्श्रेण--सरि के ऊपर आध्यात्मिक स्थानद्वारा; ब्रह्य--आध्यात्मिक जगत या निर्विशेष ब्रह्म तक; नीत्वा--ले जाकर; उत्सूजेत्--त्याग दे; तनुमू--शरीर |
जिस योगी ने स्वच्छन्द-मृत्यु नामक योगशक्ति प्राप्त कर ली होती है, वह अपनी गुदा कोपाँव की एड़ी से दबाता है और तब आत्मा को हृदय से उठाकर क्रमशः वक्षस्थल, गर्दन तथाअन्त में सिर तक उठाता है। तब ब्रह्म-रन्ध्र में स्थित योगी अपने शरीर को त्याग देता है औरआत्मा को चुने हुए गन्तव्य तक ले जाता है।
विहरिष्यन्सुराक्रीडे मत्स्थं सत्त्वं विभावयेत् ।विमानेनोपतिष्ठन्ति सत्त्ववृत्ती: सुरस्त्रियः ॥
२५॥
विहरिष्यनू-- भोग करने की इच्छा से; सुर--देवताओं के; आक्रीडे--क्रीड़ा-स्थल में; मत्--मुझमें; स्थम्--स्थित; सत्त्वमू--सतोगुण; विभावयेत्-- ध्यान करे; विमानेन--वायुयान या विमान के द्वारा; उपतिष्ठन्ति--प्राप्त होते हैं; सत्त्त--सतोगुण में;वृत्ती:--प्रकट होकर; सुर--देवताओं की; स्त्रियः--स्त्रियाँ |
जो योगी देवताओं के क्रीड़ा-उद्यानों का भोग करना चाहता है उसे मुझमें स्थित शुद्धसतोगुण का ध्यान करना चाहिए और तब सतोगुण से उत्पन्न अप्सराएँ विमानों में चढ़ कर उसकेपास आयेंगी।
यथा सड्डूल्पयेह्ठुद्धया यदा वा मत्परः पुमान् ।मयि सत्ये मनो युखझ्ध॑स्तथा तत्समुपाश्नुते ॥
२६॥
यथा--जिस साधनों से; सट्डूल्पयेतू--मन में संकल्प करे या निश्चित करे; बुद्धया--मन के द्वारा; यदा--जब; बवा--अथवा;मत्ू-परः--मुझमें श्रद्धा रखते हुए; पुमानू--योगी; मयि--मुझ में; सत्ये--जिसकी इच्छा सच उतरती है; मन:ः--मन; युझ्ञनू--युक्त करते हुए; तथा--उस साधन से; तत्--वही अभिप्राय; समुपाश्नुते--प्राप्त करता है
जो योगी मुझमें अपने मन को लीन करके तथा यह जानते हुए कि मेरा अभिप्राय सदैव पूराहोता है, मुझमें श्रद्धा रखता है, वह सदैव उन्हीं साधनों से, जिनका पालन करने का उसनेसंकल्प ले रखा है, अपना मन्तव्य प्राप्त करेगा।
यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान् ।कुतश्चित्न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम ॥
२७॥
यः--जो ( योगी ); वै--निस्सन्देह; मत्--मुझसे; भावम्--स्वभाव; आपन्नः--प्राप्त किया गया; ईशितु:--परम शासक से;वशितु:--परम नियन्ता से; पुमान्ू--पुरुष ( योगी ); कुतश्चित्ू--किसी प्रकार से; न विहन्येत--विचलित नहीं हो सकता;तस्य--उसका; च-- भी; आज्ञा-- आदेश; यथा--जिस तरह; मम--मेरा |
जो व्यक्ति ठीक से मेरा ध्यान करता है, वह परम शासक तथा नियन्ता होने का मेरा स्वभावप्राप्त कर लेता है। तब मेरे ही समान उसका आदेश किसी भी तरह से व्यर्थ नहीं जाता।
मद्धक्त्या शुद्धसत्त्वस्थ योगिनो धारणाविद: ।तस्य त्रैकालिकी बुद्धदर्जन्ममृत्यूपबृंहिता ॥
२८ ॥
मतू-भक्त्या--मेरे प्रति भक्ति से; शुद्ध-सत्त्वस्य--जिसका जीवन शुद्ध हो जाता है उसका; योगिन:--योगी का; धारणा-विदः--ध्यान-विधि को जानने वाला; तस्य--उसका; त्रै-कालिकी--काल की तीनों अवस्थाओं, भूत, वर्तमान तथा भविष्य मेंकार्य करते हुए; बुद्धिः--बुद्धि; जन्म-मृत्यु--जन्म तथा मृत्यु; उपबूंहिता--समेत |
जिस योगी ने मेरी भक्ति द्वारा अपने जीवन को शुद्ध कर लिया है और जो इस तरह ध्यानकी विधि को भलीभाँति जानता है, वह भूत, वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञान प्राप्त करता है। अतःवह अपने तथा अनन््यों के जन्म तथा मृत्यु को देख सकता है।
अग्न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपु: ।मद्योगशान्तचित्तस्य यादसामुद्कं यथा ॥
२९॥
अग्नि--आग; आदिभि:--इत्यादि ( सूर्य, जल, विष इत्यादि ) के द्वारा; न--नहीं; हन्येत--चोट पहुँचाया जा सकता है;मुनेः--चतुर योगी के; योग-मयम्--योग-विज्ञान में पूरी तरह अनुशीलित; बषु:--शरीर; मत्-योग--मेरी भक्ति से; शान्त--शान्त किया गया; चित्तस्थ--चित्त वाले का; यादसाम्ू--जलचरों के; उदकम्--जल; यथा--जिस तरह।
जिस तरह जलचरों के शरीरों को जल से चोट नहीं पहुँचती, उसी प्रकार जिस योगी कीचेतना मेरी भक्ति से शान्त हुई रहती है और जो योग-विज्ञान में पूर्णतया विकसित होता है,उसका शरीर अग्नि, सूर्य, जल, विष इत्यादि से क्षतिग्रस्त नहीं किया जा सकता।
मद्विभूतीरभिध्यायन्श्रीवत्सास्त्रविभूषिता: ।ध्वजातपत्रव्यजनै: स भवेदपराजित: ॥
३०॥
मतू-मेरे; विभूती:--ऐश्वर्यमय अवतारों से; अभिध्यायन्-- ध्यान करते हुए; श्रीवत्स--भगवान् के श्रीवत्स ऐश्वर्य समेत;अस्त्र--हथियार; विभूषिता:--अलंकृत; ध्वज--झंडों से; आतपत्र--छाते से; व्यजनै: --तथा नाना प्रकार के पंखों से; सः--वह, भक्त-योगी; भवेत्--बन जाता है; अपराजितः --अन्यों द्वारा न जीता जा सकने वाला।
मेरा भक्त मेरे ऐश्वर्यमय अवतारों का ध्यान करके अपराजेय बन जाता है। मेरे ये अवतारश्रीवत्स तथा विविध हथियारों से अलंकृत और ध्वजों, आलंकारिक छातों तथा पंखों जैसेराजसी साज-सामान से युक्त होते हैं।
उपासकस्य मामेवं योगधारणया मुनेः ।सिद्धय: पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः ॥
३१॥
उपासकस्य--पूजा करने वाले का; माम्--मुझको; एवम्--इस प्रकार; योग-धारणया--यौगिक ध्यान द्वारा; मुनेः--विद्वानपुरुष का; सिद्धयः--सिद्धियाँ; पूर्व--पहले; कथिता:--कही हुई; उपतिष्ठन्ति--पास पहुँचती हैं; अशेषत:--सभी प्रकार से |
जो विद्वान भक्त योग-दध्यान द्वारा मेरी पूजा करता है, वह निश्चय ही सभी तरह से उन योग-सिद्ध्ियों को प्राप्त करता है जिनका वर्णन मैंने अभी किया है।
जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्वासात्मनो मुनेः ।मद्धारणां धारयतः का सा सिद्धि: सुदुर्लभा ॥
३२॥
जित-इन्द्रियस्य--इन्द्रियों को जीत लेने वाले का; दान्तस्य--अनुशासित तथा आत्मसंयमित का; जित-श्वास--जिसने श्वास परविजय पा ली है; आत्मन:--तथा जिसने मन को जीत लिया है; मुनेः--ऐसे मुनि का; मत्--मुझमें; धारणाम्--ध्यान;धारयतः--करने वाला; का--क्या है; सा--वह; सिद्धि:--सिद्धि; सु-दुर्लभा--जिसको प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है |
जिस मुनि ने अपनी इन्द्रियों, श्वास तथा मन को जीत लिया है, जो आत्मसंयमी है और सदामेरे ध्यान में लीन रहता है, उसके लिए कौन-सी योग-सिद्धिि प्राप्त करना कठिन है ? अन्तरायान्वदन्त्येता युज्ग़तो योगमुत्तमम् ।मया सम्पद्यमानस्य 'कालक्षपणहेतव: ॥
३३॥
अन्तरायान्--अवरोध; वदन्ति--कहते हैं; एता:--ये सिद्धियाँ; युज्ञतः--लगने वाले के; योगम्--ब्रह्म से संयोग; उत्तमम्--परम अवस्था; मया--मेरे साथ; सम्पद्ममानस्य--पूरी तरह ऐ श्वर्यवान बनने वाले के; काल--समय का; क्षपण--अवरोध का,बर्बादी; हेतव:--कारण |
भक्ति के दिद्वान पंडितों का कहना है कि योग-सिद्धियाँ, जिनका मैंने उल्लेख किया है,वास्तव में उस परम योग का अभ्यास करने वाले व्यक्ति के लिए अवरोधक तथा समय काअपव्यय हैं जिसके द्वारा वह मुझसे सीधे समस्त जीवन-सिद्ध्ियाँ प्राप्त करता है।
जन्मौषधितपोमन्त्रै्यावतीरिह सिद्धयः ।योगेनाप्नोति ताः सर्वा नान्यैर्योगगतिं व्रजेतू ॥
३४॥
जन्म--जन्म; औषधि--जड़ी-बूटियों; तपः--तपस्या; मन्त्रै:--तथा मंत्रों से; यावती:--जितने हैं; इह--इस जगत में;सिद्धयः--सिद्धियाँ; योगेन--मेरी भक्ति से; आप्नोति--प्राप्त करता है; ता:ः--वे; सर्वा:--सभी; न--नहीं; अन्यैः -- अन्यविधियों से; योग-गतिमू--वास्तविक योग-सिद्धि; ब्रजेत्--प्राप्त करता है |
अच्छे जन्म, औषधियों, तपस्याओं तथा मंत्रों से जो भी योग-सिद्ध्वियाँ प्राप्तकी जा सकतीहैं उन सबों को मेरी भक्ति करके प्राप्त किया जा सकता है। निस्सन्देह, कोई भी व्यक्ति अन्यकिसी साधन से वास्तविक योग-सिद्धि प्राप्त नहीं कर सकता।
सर्वासामपि सिद्धीनां हेतु: पतिरहं प्रभु: ।अहं योगस्य साड्ख्यस्य धर्मस्य ब्रह्मगादिनाम् ॥
३५॥
सर्वासामू--सभी से; अपि--निस्सन्देह; सिद्धीनाम्--सिद्ध्रियों में से; हेतु:--कारण; पति:ः--रक्षक; अहम्--मैं हूँ; प्रभु:--स्वामी; अहम्--मैं; योगस्य--मेरे शुद्ध ध्यान का; साइ्ख्यस्य--सांख्य ज्ञान का; धर्मस्थ--निष्काम भाव से किये गये कर्म का;ब्रह्म-वादिनाम्ू--वैदिक शिक्षकों का।
हे उद्धव, मैं समस्त योग-सिद्धियों, योग-पद्धति, सांख्य ज्ञान, शुद्ध कर्म तथा विद्वान वैदिकशिक्षकों का कारण, रक्षक तथा स्वामी हूँ।
अहमात्मान्तरो बाह्योनावृत: सर्वदेहिनाम् ।यथा भूतानि भूतेषु बहिरन्तः स्वयं तथा ॥
३६॥
अहम्-मैं; आत्मा-- भगवान्; आन्तर:--परमात्मा के भीतर स्थित; बाह्य:--मेरे सर्वव्यापक रूप के बाहर स्थित; अनावृत:--खुला; सर्व-देहिनाम्--सारे जीवों के; यथा--जिस तरह; भूतानि-- भौतिक तत्त्व; भूतेषु--जीवों में; बहि:ः--बाहर से; अन्त:--भीतर से; स्वयम्-स्वयं; तथा--उसी तरह से |
जिस तरह समस्त भौतिक शरीरों के भीतर तथा बाहर एक जैसे भौतिक तत्त्व उपस्थित रहतेहैं, उसी तरह मैं किसी अन्य वस्तु से आच्छादित नहीं किया जा सकता। मैं हर वस्तु के भीतरपरमात्मा रूप में और हर वस्तु के बाहर अपने सर्वव्यापक रूप में उपस्थित रहता हूँ।
