← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची
अध्याय अठारह: वर्णाश्रम-धर्म का वर्णन
श्रीभगवानुवाचबन॑ विविश्षु: पुत्रेषु भार्या न््यस्य सहैव वा ।वन एव वसेच्छान्तस्तृतीयं भागमायुष: ॥
१॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; वनम्--जंगल में; विविश्लु:--प्रवेश करने का इच्छुक; पुत्रेषु--पुत्रों में से; भार्याम्--पतली को; न्यस्य--सौंप कर; सह--सहित; एव--निस्सन्देह; वा--अथवा; बने--जंगल में; एब--निश्चय ही; बसेत्--रहे;शान्तः--शान्त भाव से; तृतीयम्--तीसरे; भागम्-- भाग में; आयुष:--जीवन के |
भगवान् ने कहा : जो जीवन के तीसरे आश्रम अर्थात् वानप्रस्थ को ग्रहण करने का इच्छुकहो, उसे अपनी पत्नी को अपने जवान पुत्रों के साथ छोड़ कर या अपने साथ लेकर शान्त मन सेजंगल में प्रवेश करना चाहिए।
कन्दमूलफलैवर॑न्यमेंध्यैरवृत्ति प्रकल्पयेत् ।वसीत वलल््कलं वासस्तृणपर्णाजिनानि वा ॥
२॥
कन्द--कन्द; मूल--जड़ें; फलैः--तथा फलों से; वन्यै:--जंगल में उगने वाले; मेध्यै:--शुद्ध; वृत्तिमू--जीविका;प्रकल्पयेत्--व्यवस्था करे; वसीत--पहने; वल्कलम्--पेड़ की छाल; वासः--वस्त्रों के रूप में; तृण--घास; पर्ण--पत्ते;अजिनानि--पशुओं की खालें; वा--एवं |
वानप्रस्थ आश्रम अपनाने पर मनुष्य को चाहिए कि जंगल में उगने वाले शुद्ध कन्द, मूलतथा फल खाकर जीविका चलाये। वह पेड़ की छाल, घास, पत्ते या पशुओं की खाल पहने।
केशरोमनखएम श्रुमलानि बिभूयाहतः ।न धावेदप्सु मज्जेत त्रि काल॑ स्थण्डिलेशय: ॥
३॥
केश--सिर के बाल; रोम--शरीर के रोएँ; नख--नाखुन ( हाथ तथा पाँव के ); श्मश्रु-- मुँह के बाल ( दाढ़ी-मूछ ); मलानि--मल; बिभूयात्--सहन करे; दतः--दाँत; न धावेत्ू--साफ न करे; अप्सु--जल में; मज्जेत--स्नानकरे; त्रि-कालम्ू--दिन मेंतीन बार; स्थण्डिले-- पृथ्वी पर; शयः--लेटना।
वानप्रस्थ को अपने सिर, शरीर या मुखमंडल के बाल नहीं सँवारने चाहिए, अपने नाखुननहीं काटने चाहिए, अनियमित समय पर मल-मूत्र त्याग नहीं करना चाहिए और दाँतों कीसफाई का विशेष प्रयास नहीं करना चाहिए। उसे जल में नित्य तीन बार स्नान करके सन्तुष्टरहना चाहिए और जमीन पर सोना चाहिए।
ग्रीष्मे तप्येत पञ्ञाग्नीन्वर्षास्वासारषाडूजले ।आकण्थमग्न: शिशिर एवं वृत्तस्तपश्चेरत् ॥
४॥
ग्रीष्मे--गर्मी की ऋतु में; तप्येत--तपस्या करे; पञ्ञ-अग्नीन्ू--पाँच अग्नियाँ ( सिर के ऊपर सूर्य तथा चारों दिशाओं में जलनेवाली अग्नियाँ ); वर्षासु--वर्षा ऋतु में; आसार--वर्षा की झड़ी; षाटू--सहते हुए; जले--जल में; आ-कण्ठ--गले तक;मग्न:--डूबा हुआ; शिशिरे--जाड़े की ऋतु में; एवम्--इस प्रकार; वृत्त:--लगा हुआ; तपः--तपस्या; चरेत्--करे।
इस तरह वानप्रस्थ में लगा हुआ व्यक्ति तपते गर्मी के दिनों में अपने चारों ओर जलती अग्नितथा सिर के ऊपर तपते सूर्य को झेल कर तपस्या करे। वर्षा ऋतु में वह वर्षा की झड़ी में बाहररहे और ठिठुरती शीत ऋतु में वह गले तक पानी में डूबा रहे।
अग्निपक्वं समश्नीयात्कालपक्वमथापि वा ।उलूखलाश्मकुट्टो वा दन््तोलूखल एव वा ॥
५॥
अग्नि--आग से; पकक््वम्--पकाया गया; समश्नीयातू-- खाये; काल--समय के द्वारा; पकक््वम्--खाने के योग्य; अथ--अथवा; अपि--निस्सन्देह; वा--अथवा; उलूखल--ओखली से; अश्म--तथा पत्थर; कुट्ट;--कूटा या पीसा गया; वा--अथवा; दन््त--दाँतों का प्रयोग करते हुए; उलूखलः--ओखली के रूप में; एव--निस्सन्देह; वा-- अथवा |
वह अग्नि द्वारा तैयार किया गया भोजन यथा अन्न अथवा समय से पके फलों को खासकता है। वह अपने भोजन को बट्टे से या अपने दाँतों से पीस सकता है।
स्वयं सद्चिनुयात्सर्वमात्मनो वृत्तिकारणम् ।देशकालबलाभिज्ञो नाददीतान्यदाहतम् ॥
६॥
स्वयम्--अपने से; सश्चिनुयात्--एकत्र करे; सर्वम्--हर वस्तु; आत्मन:--अपनी ही; वृत्ति--जीविका; कारणम्--सुलभबनाने के लिए; देश--विशेष स्थान; काल--समय; बल--तथा शक्ति; अभिज्ञ:-- भली भाँति जानते हुए; न आददीत--न ले;अन्यदा--दूसरी बार के लिए; आहतम्--वस्तुएँ |
वानप्रस्थ को चाहिए कि देश, काल तथा अपनी सामर्थ्य का ध्यान रखते हुए, अपने शरीरके पालन हेतु जो आवश्यक हो, उसे एकत्र करे। उसे भविष्य के लिए कोई वस्तु संग्रह नहींकरना चाहिए।
वन्यैश्वरुपुरोडाशैर्निवपेत्कालचोदितान् ।नतु श्रौतेन पशुना मां यजेत वनाश्रमी ॥
७॥
वन्यै:--जंगल से प्राप्त; चरू--धान, जौ तथा दाल की आहुतियों से; पुरोडाशैः--तथा जंगली धान से तैयार की गई यज्ञ कीचपाती; निर्वपेत्ू--अर्पित करे; काल-चोदितान्--अनुष्ठान यथा आग्रयण जो ऋतु के अनुसार सम्पन्न होते हैं ( आग्रयण में वर्षाऋतु के बाद प्रकट होने वाले पहले फल अर्पित किये जाते हैं )) न--कभी नहीं; तु--निस्सन्देह; श्रोतेन--वेदों में उल्लिखित;पशुना--पशु-बलि के साथ; माम्--मुझको; यजेत--पूजा करे; वन-आश्रमी--वानप्रस्थ स्वीकार करके जंगल में जाने वाला।
जिसने वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार किया हो उसे चाहिए कि चरू तथा जंगल में पाये जाने वाले धान तथा अन्य अन्नों से तैयार की गई यज्ञ-रोटी ( पुरोडाश ) की आहुतियों से ऋतु केअनुसार यज्ञ सम्पन्न करे। किन्तु वानप्रस्थ को चाहिए कि वह मुझे पशु-बलि कभी न अर्पितकरे, यहाँ तक कि उन्हें भी जो वेदों में वर्णित हैं।
अग्निहोत्रं च दर्शश्न पौर्णमासश्च पूर्ववत् ।चातुर्मास्थानि च मुनेराम्नातानि च नैगमै: ॥
८ ॥
अग्नि-होत्रमू-- अग्नि-यज्ञ; च-- भी; दर्श:--प्रतिपादा को सम्पन्न किया गया यज्ञ; च--भी; पौर्ण-मास:ः --पूर्णमासी के दिनसम्पन्न यज्ञ; च-- भी; पूर्व-वत्--पहले की तरह, जैसाकि गृहस्थाश्रम में किया जाता था; चातु:-मास्यानि--चातुर्मास के व्रततथा यज्ञ; च-- भी; मुनेः:--वानप्रस्थ के; आम्नातानि--आदिष्ट; च-- भी; नैगमै: --वेदवेत्ताओं के द्वारा।
वानप्रस्थ को चाहिए कि अग्निहोत्र, दर्श तथा पौर्णमास यज्ञों को उसी तरह करता रहे जिसतरह गृहस्थाश्रम में करता था। उसे चातुर्मास्य के व्रत तथा यज्ञ भी सम्पन्न करने चाहिए क्योंकिबेदविदों ने वानप्रस्थों के लिए इन अनुष्ठानों का आदेश दिया है।
एवं चीर्णेन तपसा मुनिर्धमनिसन्ततः ।मां तपोमयमाराध्य ऋषिलोकादुपैति माम् ॥
९॥
एवम्--इस प्रकार; चीर्णेन-- अभ्यास से; तपसा--तपस्या के; मुनि:--सन््त वानप्रस्थ; धमनि-सन्ततः--जिसके शरीर की सारीनसें दिखने लगे, इतना दुर्बल; माम्--मुझको; तपः-मयम्--सारी तपस्या का लक्ष्य; आराध्य--पूजा करके; पिं-लोकातू --महलेंक से परे; उपैति--प्राप्त करता है; मामू--मुझको |
कठिन तपस्या करते हुए तथा जीवन की आवश्यकताओं मात्र को ही स्वीकार करते हुए,सन्त वानप्रस्थ इतना दुर्बल हो जाता है कि उसकी चमड़ी तथा अस्थियाँ ही रह जाती हैं। इस तरह कठिन तपस्या द्वारा मेरी पूजा करके वह महलोंक जाता है और वहाँ मुझे प्राप्त करता है।
यस्त्वेतत्कृच्छृतश्चीर्ण तपो नि: श्रेयसं महत् ।कामायालपीयसे युउ्ज्याद्वालिश: कोपरस्ततः ॥
१०॥
यः--जो; तु--निस्सन्देह; एतत्--यह; कृच्छुत:--कठिन तपस्या से; चीर्णम्ू--दीर्घकाल तक; तपः--तपस्या; नि: श्रेयसम् --परम मोक्ष प्रदान करते हुए; महत्--यशस्वी; कामाय--इन्द्रियतृप्ति के लिए; अल्पीयसे--नगण्य; युज्ज्यात्--अभ्यास करता है;बालिश:ः--ऐसा मूर्ख; क:ः--कौन; अपर: --अन्य; तत:--उसके अलावाजो व्यक्ति, मात्र क्षुद्र इन्द्रियतृप्ति के लिए, दीर्घकालीन प्रयल द्वारा इस कष्टप्रद किन्तु महान्तपस्या को सम्पन्न करता है, उसे सबसे बड़ा मूर्ख समझना चाहिए।
यदासौ नियमेकल्पो जरया जातवेपथु: ।आत्मन्यग्नीन्समारोप्य मच्चित्तोग्निं समाविशेत् ॥
११॥
यदा--जब; असौ--सन््त वानप्रस्थ; नियमे-- अपने नियत कर्तव्यों में; अकल्प:--करने में अक्षम; जरया--वृद्धावस्था केकारण; जात--उत्पन्न; वेपथु:--शरीर का कम्पन; आत्मनि--अपने हृदय में; अग्नीन्--यज्ञ-अग्नियों को; समारोप्य--रख कर;मतू-चित्त:--मुझमें अपना मन स्थिर करके; अग्निम्--अग्नि में; समाविशेत्-- प्रवेश करे।
यदि वानप्रस्थ वृद्धावस्था को प्राप्त हो और शरीर काँपने के कारण अपने नियत कर्म पूरा न कर सके, तो उसे चाहिए कि ध्यान द्वारा यज्ञ-अग्नि को अपने हृदय के भीतर स्थापित करे। फिरअपने मन को मुझमें टिकाकर उस अगिन में प्रवेश करके अपना शरीर त्याग दे।
यदा कर्मविपाकेषु लोकेषु निरयात्मसु ।विरागो जायते सम्यड्न्यस्ताग्नि: प्रव्नजेत्ततः ॥
१२॥
यदा--जब; कर्म--सकाम कर्म द्वारा; विपाकेषु--प्राप्तव्य में; लोकेषु--ब्रह्लोक तक के सारे लोकों में; निरय-आत्मसु--लोक जो नरकतुल्य हैं; विराग:--विरक्ति; जायते--उत्पन्न होती है; सम्यक्--पूरी तरह से; न्यस्त--त्याग कर; अग्नि: --वानप्रस्थ की यज्ञ-अग्नि; प्रव्रजेतू--संन्यास ले ले; ततः--तब |
यदि यह समझते हुए कि ब्रह्मलोक को भी प्राप्त कर पाना दयनीय स्थिति है, कोई वानप्रस्थसकाम कर्मों के सभी सम्भव परिणामों से पूर्ण विरक्ति उत्पन्न कर लेता है, तो वह संन्यास आश्रमग्रहण कर सकता है।
इष्ठा यथोपदेशं मां दरत्त्वा सर्वस्वमृत्विजे ।अग्नीन्स्वप्राण आवेश्य निरपेक्ष: परिव्रजेत् ॥
१३॥
इश्ला--पूज कर; यथा--के अनुसार; उपदेशम्--शास्त्रीय आदेशों; माम्--मुझको; दरत्त्वा--देकर; सर्व-स्वम्--जो कुछ भीपास में हो; ऋत्विजे--पुरोहित को; अग्नीन्--यम-अग्नि को; स्व-प्राणे--अपने भीतर; आवेश्य--रख कर; निरपेक्ष:--आसक्तिरहित; परिब्रजेतू--सन्यास लेकर निकल पड़े |
शास्त्रीय आदेशों के अनुसार मेरी पूजा करके तथा यज्ञ-पुरोहित को अपनी सारी सम्पत्तिदेकर, उसे यज्ञ-अग्नि को अपने भीतर रख लेना चाहिए। इस तरह मन को पूर्णतया विरक्तकरके वह संन्यास आश्रम में प्रवेश करे।
विप्रस्य वै सन््यसतो देवा दारादिरूपिण: ।विघ्नान्कुर्वन्त्ययं ह्ास्मानाक्रम्य समियात्परम् ॥
१४॥
विप्रस्थ--सन्त पुरुष का; वै--निस्सन्देह; सन््यसतः--संन्यास ग्रहण करते हुए; देवा:--देवतागण; दार-आदि-रूपिण: --उसकी पत्नी तथा अन्य आकर्षक वस्तुओं के रूप में प्रकट होकर; विघ्नान्ू--अवरोध; कुर्वन्ति--उत्पन्न करते हैं; अयम्--संन्यासी; हि--निस्सन्देह; अस्मान्--देवताओं को; आक्रम्य--पार करके; समियात्--जाय; परम्-- भगवद्धाम |
देवतागण यह सोच कर कि, 'संन्यास लेकर यह व्यक्ति हमसे आगे निकल कर भगवद्धामजा रहा है' संन्यासी के मार्ग में उसकी पूर्व पत्नी या अन्य स्त्रियों तथा आकर्षक वस्तुओं के रूपमें प्रकट होकर अवरोध उत्पन्न करते हैं। किन्तु संन््यासी को चाहिए कि इन देवताओं तथा उनकेस्वरूपों पर कोई ध्यान न दे।
बिभृयाच्चेन्मुनिर्वास: कौपीनाच्छादनं परम् ।त्यक्त न दण्डपात्रा भ्यामन्यत्किल्लिदनापदि ॥
१५॥
बिभूयात्--पहने; चेत्ू--यदि; मुनि:--संन्यासी; वास: -- वस्त्र; कौपीन--लँगोट; आच्छादनम्ू-- आवरण, पर्दा; परमू--अन्य;त्यक्तमू--छोड़ा हुआ; न--कभी नहीं; दण्ड--अपने डंडे के अतिरिक्त; पात्राभ्यामू--तथा कमंडल; अन्यत्--अन्य; किश्ञित्--कोई वस्तु; अनापदि--जब कोई आपात्काल न हो।
यदि संन्यासी लँगोटे के अतिरिक्त भी कुछ पहनना चाहे तो वह कौपीन को ढकने के लिएअपनी कमर और कूल्हे के चारों ओर कोई आवरण इस्तेमाल कर सकता है। अन्यथा, यदिविशेष आवश्यकता न हो तो वह दण्ड तथा कमण्डलु के अतिरिक्त कुछ भी स्वीकार न करे।
इष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलम् ।सत्यपूतां वदेद्वाच॑ं मनःपूतं समाचरेत् ॥
१६॥
इृष्टि--देखने से; पूतम्--शुद्ध; न्यसेत्--रखे; पादम्--अपना पाँव; वस्त्र--कपड़े से; पूतमू--छाना हुआ; पिबेत्--पिये;जलम्--जल; सत्य--सत्य द्वारा; पूतामू--पवित्र; वदेतू--बोले; वाचमू--शब्द; मन: --मन से निश्चित किया हुआ; पूतम्--पवित्र; समाचरेत्--सम्पन्न करे।
सन्त पुरुष को चाहिए कि अपनी आँखों से यह निश्चित करके अपना पाँव रखे कि ऐसाकोई जीव या कीड़ा तो नहीं है, जो उसके पाँव से कुचल जायगा। उसे अपने वस्त्र के एक छोरसे छान कर ही जल पीना चाहिए और ऐसे शब्द बोलने चाहिए जिनमें सचाई की शुद्धता हो।इसी प्रकार उसे वे ही कर्म करने चाहिए जिन्हें उसके मन ने शुद्ध निश्चित कर लिया हो।
मौनानीहानिलायामा दण्डा वाग्देहचेतसाम् ।न होते यस्य सन्त्यड् वेणुभिर्न भवेद्यति: ॥
१७॥
मौन--व्यर्थ भाषण से बचना; अनीह--सकाम कर्मों का त्याग; अनिल-आयामा:-- श्वास क्रिया को नियंत्रित करना; दण्डा:--अनुशासन; वाक्--वाणी; देह--शरीर का; चेतसाम्ू--मन का; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; एते--ये अनुशासन; यस्य--जिसके; सन्ति--होते हैं; अड्र--हे उद्धव; वेणुभि:--बाँस के डंडों से; न--कभी नहीं; भवेत्--होता है; यतिः--असलीसंनन््यासी |
जिसने व्यर्थ बोलने, व्यर्थ के कार्य करने तथा प्राण-वायु को नियंत्रण में रखने के इन तीनआन्तरिक अनुशासनों को ग्रहण नहीं किया, वह बाँस के दण्ड उठाने मात्र से संन्यासी नहीं मानाजा सकता।
भिक्षां चतुर्षु वर्णेषु विग्ान्वर्जयं श्वरेत् ।सप्तागारानसड्डि प्तांस्तुष्पेल्लब्धेन तावता ॥
१८॥
भिक्षाम्-- भीख माँगने से प्राप्त दान; चतुर्षु--चारों; वर्णेषु--वर्णो में; विगह्मनू--गर्हित, अशुद्ध; वर्जयन्--तिरस्कार करतेहुए; चरेत्-पहुँचे; सप्त--सात; आगारानू--घरों में; असड्डलिप्तान्ू--बिना किसी अनुमान या इच्छा के; तुष्येत्-तुष्ट हो ले;लब्धेन--प्राप्त हुए से; तावता--उतने से ही |
जो घर दूषित तथा अस्पृश्य हों उनका तिरस्कार करके वानप्रस्थ को चाहिए कि बिना पूर्वनिश्चय के सात घरों में जाय और उनमें भीख माँगने से जो भी प्राप्त हो उससे तुष्ट हो ले।आवश्यकतानुसार वह चारों वर्णों के घरों में जा सकता है।
बहिर्जलाशयं गत्वा तत्रोपस्पृश्य वाग्यत: ।विभज्य पावितं शेष भुञ्जीताशेषमाहतम् ॥
१९॥
बहिः--शहरी क्षेत्र से बाहर, एकान्त स्थान में; जल--पानी के; आशयम्--आगार या भण्डार में; गत्वा--जाकर; तत्र--वहाँ;उपस्पृश्य--जल के स्पर्श से शुद्ध होकर; वाक्ू-यत:--बिना बोले; विभज्य--ठीक से वितरित करके; पावितम्-शुद्ध कियाहुआ; शेषमू--बचा हुआ; भुझ्जीत--खाये; अशेषम्--पूरी तरह; आहतम्--भिक्षा माँग कर एकत्र किया हुआ।
वह भिक्षा माँगने से एकत्र हुआ भोजन लेकर, जनसंख्य वाले क्षेत्रों को त्याग कर एकान्तस्थान में किसी जलाशय के निकट जाये। वहाँ पर स्नान करके तथा भलीभाँति हाथ धोकरभोजन का कुछ अंश माँगने वालों में बाँटे। वह बिना बोले ऐसा करे। तब शेष बचे भाग कोठीक से साफ करके, अपनी थाली का सारा भोजन खा ले और बाद के लिए कुछ भी न छोड़े।
एकश्चरेन्महीमेतां नि:ःसड़ः संयतेन्द्रिय: ।आत्मक्रीड आत्मरत आत्मवान्समदर्शन: ॥
२०॥
एक:--अकेला; चरेत्--इधर-उधर जाये; महीम्--पृथ्वी पर; एतामू--यह; निःसड्:--किसी भौतिक आसक्ति में बिना; संयत-इन्द्रियः--इन्द्रियों को पूरी तरह वश में करते हुए; आत्म-क्रीड:--परमात्मा के साक्षात्कार से उत्साहित; आत्म-रतः--आध्यात्मिक ज्ञान में पूर्णतया तुष्ट; आत्म-वान्ू--आध्यात्मिक पद पर स्थित; सम-दर्शन:--सर्वत्र समान दृष्टि से |
बिना किसी आसक्ति के, इन्द्रियों को पूरी तरह वश में करके, उत्साही बने रह कर तथाभगवान् के साक्षात्कार एवं अपने में तुष्ट सन्त पुरुष को अकेले ही पृथ्वी पर विचरण करनाचाहिए। उसे सर्वत्र समदृष्टि रखते हुए आध्यात्मिक पद पर स्थिर रहना चाहिए।
विविक्तक्षेमशरणो मद्धावविमलाशयः ।आत्मानं चिन्तयेदेकमभेदेन मया मुनि: ॥
२१॥
विविक्त--अकेला; क्षेम--सुरक्षित; शरण: --उसका निवासस्थान; मत्--मुझमें; भाव--निरन्तर विचार से; विमल--शुद्ध;आशयः--चेतना; आत्मानम्--आत्मा के विषय में; चिन्तयेत्--केन्द्रित करे; एकम्--अकेला; अभेदेन-- अभिन्न; मया--मुझसे; मुनि:--मुनि।
मुनि को चाहिए कि सुरक्षित तथा एकान्त स्थान में रहते हुए और निरन्तर मेरे ध्यान द्वारा मनको शुद्ध करके, अपने को मुझसे अभिन्न मानते हुए एकमात्र आत्मा में अपने को एकाग्र करे।
अन्वीक्षेतात्मनो बन्ध॑ मोक्ष च ज्ञाननिष्ठया ।बन्ध इन्द्रियविक्षेपो मोक्ष एषां च संयम: ॥
२२॥
अन्वीक्षेत--सतर्क अध्ययन द्वारा देखे; आत्मन:--आत्मा का; बन्धम्--बन्धन; मोक्षम्--मोक्ष; च-- भी; ज्ञान--ज्ञान में;निष्ठया--स्थिरता द्वारा; बन्ध:--बन्धन; इन्द्रिय--इन्द्रियों का; विक्षेप:--इन्द्रियतृप्ति की ओर विचलन; मोक्ष:--मोक्ष; एषाम्--इन इन्द्रियों के; च-- भी; संयम: --पूर्ण नियंत्रण |
मुनि को चाहिए कि स्थिर ज्ञान द्वारा वह आत्मा के बन्धन तथा मोक्ष की प्रकृति को निश्चितकर ले। बन्धन तब होता है जब इन्द्रियाँ इन्द्रियतृप्ति की ओर चलायमान होती हैं और इन्द्रियों परपूर्ण नियंत्रण ही मोक्ष है।
तस्मान्नियम्य षड्वर्ग मद्धावेन चरेन्मुनि: ।विरक्त: क्षुद्रकामे भ्यो लब्ध्वात्मनि सुखं महत् ॥
२३॥
तस्मात्--इसलिए; नियम्य-- पूरी तरह नियंत्रित करके; षट्-वर्गम्--छहों इन्द्रियों को ( दृष्टि, श्रवण, प्राण, स्पर्श, स्वाद तथामन ); मत्-भावेन--मेरी चेतना द्वारा; चरेत्ू--रहे; मुनि:--मुनि; विरक्त:--विरक्त; क्षुद्र--नगण्य; कामेभ्य:--इन्द्रियतृप्ति से;लब्ध्वा--अनुभव करके; आत्मनि--स्वयं में; सुखम्--सुख; महत्--महान
इसलिए पाँचों इन्द्रियों तथा मन को कृष्णभावनामृत द्वारा पूर्ण नियंत्रण में रखते हुए, मुनिको अपने भीतर आध्यात्मिक आनन्द का अनुभव करके, श्षुद्र इन्द्रियतृप्ति से विरक्त हो जानाचाहिए।
पुरग्रामब्रजान्सार्थान्भिक्षार्थ प्रविशंश्चरेत् ।पुण्यदेशसरिच्छैलवना श्रमवर्ती महीम् ॥
२४॥
पुर--शहर; ग्राम--गाँव; ब्रजानू--तथा चरागाह; स-अर्थान्--जीवन-निर्वाह के लिए कार्य करने वाले; भिक्षा-अर्थम्-- भीखमाँगने के लिए; प्रविशन्--प्रवेश करते हुए; चरेत्ू--विचरण करे; पुण्य--शुद्ध; देश--स्थान; सरित्--नदियों; शैल--पर्वत;वबन--तथा जंगलों सहित; आश्रम-वतीम्--ऐसे निवास-स्थानों वाली; महीम्--पृथ्वी |
मुनि को चाहिए कि वह पवित्र स्थानों में बहती नदियों के किनारे तथा पर्वतों एवं जंगलों केएकान्त में घूमे। वह अपने जीवन-निर्वाह के लिए भिक्षा माँगने के लिए ही, शहरों, ग्रामों तथाचरागाहों में प्रवेश करे और सामान्य कामकाजी लोगों के पास जाये।
वानप्रस्था श्रमपदेष्वभी क्ष्णं भेक्ष्यमाचरेत् ।संसिध्यत्याश्रसम्मोहः शुद्धसत्त्व: शिलान्धसा ॥
२५॥
वानप्रस्थ-आश्रम--वानप्रस्थ आ श्रम के; पदेषु--पद पर; अभीक्षणम्--सदैव; भैक्ष्यम्ू--भिक्षा माँगना; आचरेत्--सम्पन्न करे;संसिध्यति--आध्यात्मिक रूप से सिद्ध बनता है; आशु--तुरन्त; असम्मोहः --मोह से मुक्त; शुद्ध--शुद्ध; सत्त्वः--अस्तित्व;शील--भिक्षा से या बीन कर प्राप्त; अन्धसा-- भोजन से।
वानप्रस्थ आश्रम में जीवन बिताने वाले को चाहिए कि वह अन्यों से दान लेता रहे क्योंकिइससे वह मोह से छूट जाता है और शीघ्र ही आध्यात्मिक जीवन में सिद्ध बन जाता है।निस्सन्देह, जो इस विनीत भाव से प्राप्त भोजन से अपना पेट पालता है, उसका जीवन शुद्ध होजाता है।
नैतद्वस्तुतया पश्येहृश्यमानं विनश्यति ।असक्तचित्तो विरमेदिहामुत्रचिकीर्षितात् ॥
२६॥
न--कभी नहीं; एतत्--इसे; वस्तुतवा--चरम सत्य के रूप में; पश्येत्--देखे; दृश्यमानम्--प्रत्यक्ष अनुभव से दिखने वाला;विनश्यति--नष्ट हो जाता है; असक्त--आसक्ति रहित; चित्त:--चेतना वाला; विरमेत्--विरक्त हो ले; इह--इस जगत में;अमुत्र--तथा भावी जीवन में; चिकीर्षितात्-- भौतिक प्रगति के लिए सम्पन्न किये जाने वाले कार्यो से |
मनुष्य को चाहिए कि जो भौतिक वस्तुएँ नष्ट हो जायेंगी, उन्हें चरम सत्य के रूप में न देखे।भौतिक आसक्ति से रहित चेतना द्वारा उसे उन सारे कार्यो से विलग हो जाना चाहिए जो इसजीवन में तथा अगले जीवन की भौतिक प्रगति के निमित्त हों।
यदेतदात्मनि जगन्मनोवाक्प्राणसंहतम् ।सर्व मायेति तर्केण स्वस्थस्त्यक्त्वा न तत्स्मरेत् ॥
२७॥
यत्--जो; एतत्--यह; आत्मनि-- भगवान् में; जगत्--ब्रह्माण्ड; मन: --मन; वाक्--वाणी; प्राण--तथा प्राण-वायु से;संहतम्--निर्मित; सर्वम्ू--समस्त; माया--भौतिक मोह; इति--इस प्रकार; तर्केण--तर्क-वितर्क द्वारा; स्व-स्थ:--अपने मेंस्थिर; त्यक्त्वा--त्याग कर; न--कभी नहीं; तत्--वह; स्मरेत्--स्मरण करे |
उसे चाहिए कि भगवान् के भीतर स्थित ब्रह्माण्ड तथा मन, वाणी एवं प्राण-वायु से निर्मितअपने भौतिक शरीर को तर्क-वितर्क द्वारा भगवान् की मायाशक्ति का ही प्रतिफल माने। इसतरह अपने में स्थित होकर उसे इन वस्तुओं से अपनी श्रद्धा हटा लेनी चाहिए और उन्हें फिर कभीअपने ध्यान की वस्तु नहीं बनानी चाहिए।
ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा मद्धक्तो वानपेक्षक: ।सलिड्डानाश्रमांस्त्यक्त्वा चरेदविधिगोचर: ॥
२८॥
ज्ञान-दार्शनिक ज्ञान के प्रति; निष्ठ: --समर्पित; विरक्त:-- भौतिक स्वरूपों से विरक्त; ब--या तो; मतू-भक्त:--मेरा भक्त;बा--अथवा; अनपेक्षक:--मोक्ष भी न चाहने वाला; स-लिझन्--अनुष्ठानों तथा बाह्य विधानों सहति; आश्रमान्--किसीआश्रम से सम्बद्ध कर्तव्यों को; त्यक्त्वा--त्याग कर; चरेत्ू--आचरण करे; अविधि-गोचर: --विधि-विधानों की परिधि सेबाहर
ज्ञान के अनुशीलन के प्रति समर्पित तथा बाह्य पदार्थों से विरक्त हुआ विद्वान अध्यात्मवादी(योगी ) या मोक्ष की भी इच्छा से विरक्त मेरा भक्त--ये दोनों ही, उन कर्तव्यों की उपेक्षा करतेहैं, जो बाह्य अनुष्ठानों अथवा साज-सामग्री पर आधारित होते हैं। इस तरह उनका आचरणविधि-विधानों की सीमा से परे होता है।
बुधो बालकवत्क्रीडेत्कुशलो जडवच्चरेत् ।वदेदुन्मत्तवद्विद्वान्गोचर्या नैगमश्चरेत् ॥
२९॥
बुध:--यद्यपि बुद्धिमान; बालक-वत्--बच्चे के समान ( मान-अपमान का ध्यान न रखते हुए ); क्रीडेत्--जीवन का भोग करे;कुशलः--यद्यपि दक्ष; जड-वत्--जड़ व्यक्ति की तरह; चरेत्--कार्य करे; वदेत्--बोले; उन्मत्त-वत्--विक्षिप्त की तरह;विद्वानू--विद्वान होने पर भी; गो-चर्याम्--अनियंत्रित आचरण; नैगम:--वैदिक आदेशों में दक्ष होते हुए भी; चरेत्--सम्पन्नकरे।
परम चतुर होते हुए भी परमहंस को चाहिए कि मान-अपमान को भुलाकर बालक केसमान जीवन का भोग करे, परम दक्ष होते हुए भी जड़ तथा अकुशल व्यक्ति की तरह आचरणकरे, परम विद्वान होते हुए भी विक्षिप्त व्यक्ति की तरह बोले तथा वैदिक विधियों का पंडित होतेहुए भी अनियंत्रित ढंग से आचरण करे।
वेदवादरतो न स्यान्न पाषण्डी न हैतुकः ।शुष्कवादविवादे न कश्ित्पक्ष॑ं समाश्रयेत् ॥
३०॥
बेद-वाद--वेदों के कर्मकाण्ड अनुभाग में; रत:ः--लगा हुआ; न--कभी नहीं; स्थातू--हो; न--न तो; पाषण्डी--नास्तिक,वैदिक आदेशों के विरुद्ध; न--न ही; हैतुकः--कोरा तार्किक या संशयवादी; शुष्क-वाद--व्यर्थ के विषयों के; विवादे--तर्क-वितर्क में; न--कभी नहीं; कश्जलित्--कोई ; पक्षम्--पश्ष; समाश्रयेत्--ग्रहण करे।
भक्त को न तो वेदों के कर्मकाण्ड अनुभाग में उल्लिखित सकाम अनुष्ठानों में लगनाचाहिए, न ही वैदिक आदेशों के विरुद्ध कार्य करके या बोल कर नास्तिक बनना चाहिए। इसीतरह उसे न तो निरे तार्किक या संशयवादी की तरह बोलना चाहिए न व्यर्थ के वाद-विवाद में किसी का पक्ष लेना चाहिए।
नोद्विजेत जनाद्धीरो जन॑ चोद्वेजयेन्न तु ।अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्न ।देहमुद्दिश्य पशुवद्वैरं कुर्यान्न केनचित् ॥
३१॥
न--कभी नहीं; उद्विजेत--विचलित या भयभीत हो; जनात्ू--अन्य लोगों के कारण; धीर:--सन््त पुरुष; जनम्ू--अन्य लोग;च--भी; उद्देजयेत्--डराये या विचलित करे; न--कभी नहीं; तु--निस्सन्देह; अति-वादान्ू--अपमानजनक या कटु वचन;तितिक्षेत--सहन करे; न--कभी नहीं; अवमन्येत--कम करके माने; कञज्लन--कोई भी; देहम्--शरीर; उद्िश्य--के हेतु; पशु-बत्--जानवर के समान; वैरम्--दुश्मनी, शत्रुता; कुर्यात्--उत्पन्न करे; न--कभी नहीं; केनचित्--किसी से
सन्त पुरुष को चाहिए कि वह न तो किसी के डराने या विचलित करने से डरे, न ही अन्यलोगों को डराये-धमकाये। उसे अन्यों द्वारा किया गया अपमान सहना चाहिए और कभी किसीको छोटा नहीं समझना चाहिए। भौतिक शरीर के लिए वह किसी से शत्रुता न उत्पन्न करेक्योंकि तब वह पशु-तुल्य होगा।
एक एव परो ह्ात्मा भूतेष्वात्मन्यवस्थितः ।यथेन्दुरुदपात्रेषु भूतान्येकात्मकानि च ॥
३२॥
एकः--एक; एव--निस्सन्देह; पर:ः--परम; हि--निश्चय ही; आत्मा-- भगवान्; भूतेषु--सारे शरीरों के भीतर; आत्मनि--जीवके भीतर; अवस्थित:--स्थित; यथा--जिस प्रकार; इन्दु:--चन्द्रमा; उद--जल के; पात्रेषु--विभिन्न जलाशयों में; भूतानि--सारे शरीर; एक--एक परसेश्वर की; आत्मकानि--शक्ति से बने; च--भी |
एक ही परमेश्वर समस्त भौतिक शरीरों के भीतर तथा हर एक की आत्मा के भीतर स्थित है।जिस तरह चन्द्रमा असंख्य जलाशयों में प्रतिबिम्बित होता है, उसी तरह परमेश्वर एक होकर भीहर एक के भीतर उपस्थित है। इस तरह हर भौतिक शरीर अन्ततः एक ही भगवान् की शक्ति सेबना है।
अलब्ध्वा न विषीदेत काले कालेशनं क्वचित् ।लब्ध्वा न हृष्येद्धृतिमानुभयं दैवतन्त्रितम् ॥
३३॥
अलब्ध्वा--न मिलने पर; न--नहीं; विषीदेत--दुखी हो; काले काले--विभिन्न समयों पर; अशनम्--भोजन; क्वचित्--जोभी; लब्ध्वा--पाकर; न--नहीं; हृष्येत्ू--हर्षित हो; धृति-मान्--संकल्प वाला; उभयम्--दोनों ( अच्छा भोजन पाने तथा न पानेपर ); दैव--ईश्वर की परम शक्ति के; तन्त्रितम्--वश में
यदि किसी को विभिन्न समयों पर उचित भोजन नहीं मिलता, तो उसे दुखी नहीं होना चाहिएऔर जब उसे अच्छा भोजन मिले तो हर्षित नहीं होना चाहिए। हढ़ संकल्प करके उसे दोनों हीस्थितियों को ईश्वर के अधीन समझना चाहिए।
आहारार्थ समीहेत युक्त तत्प्राणधारणम् ।तत्त्वं विमृश्यते तेन तद्विज्ञाय विमुच्यते ॥
३४॥
आहार--भोजन; अर्थम्--के हेतु; समीहेत--प्रयास करे; युक्तमू--उचित; तत्--व्यक्ति का; प्राण--जीवनी-शक्ति; धारणम्--धारण करते हुए; तत्त्वम्--आध्यात्मिक सत्य; विमृश्यते--चिन्तन किया जाता है; तेन--मन, इन्द्रिय तथा प्राण के उस बल पर;तत्--वह सत्य; विज्ञाय--जान कर; विमुच्यते--मुक्त हो जाता है।
आवश्यकता पड़े तो उसे चाहिए कि पर्याप्त भोजन पाने के लिए प्रयास करे क्योंकिस्वास्थ्य बनाये रखने के लिए यह आवश्यक तथा उचित है। इन्द्रियाँ, मन तथा प्राण के स्वस्थरहने पर, वह आध्यात्मिक सत्य का चिन्तन कर सकता है और सत्य समझने पर वह मुक्त होजाता है।
यहच्छयोपपन्नान्नमद्याच्छेष्ठमुतापरम् ।तथा वासस्तथा श्यां प्राप्तं प्राप्त भजेन्मुनि: ॥
३५॥
यहच्छया--मनमाना; उपपन्न--अर्जित; अन्नमू-- भोजन; अद्यात्--खाये; श्रेष्ठमू--उत्तम; उत--अथवा; अपरम्--निम्न जातिका; तथा--उसी तरह; वास: --वस्त्र; तथा--उसी तरह; शब्याम्--बिस्तर; प्राप्तम् प्राप्तम्-- अपने आप मिल जाने वाला;भजेत्-- स्वीकार करे; मुनि:--मुनि।
मुनि को चाहिए कि अपने आप मिल जाने वाला उत्तम या निम्न कोटि का जैसा भी भोजन,वस्त्र तथा बिस्तर हो, उसे स्वीकार करे।
शौचमाचमन स्नान न तु चोदनया चरेत् ।अन््यांश्व नियमाउल्नानी यथाह लीलयेश्वरः ॥
३६॥
शौचम्--सामान्य स्वच्छता; आचमनम्--जल से हाथ साफ करना; स्नानमू--स्नान करना; न--नहीं; तु--निस्सन्देह;चोदनया--बल पूर्वक; चरेत्--सम्पन्न करे; अन्यान्-- अन्य; च-- भी; नियमान्--नियमित कार्य ; ज्ञानी -- जिसने मेरा ज्ञान प्राप्तकर लिया है; यथा--जिस तरह; अहम्--मैं; लीलया--स्वेच्छा से; ईश्वर: --परमेश्वर
जिस तरह मैं भगवान् होते हुए, स्वेच्छा से अपने नैत्यिक कर्म करता हूँ, उसी तरह मेरा ज्ञानप्राप्त कर चुकने वाले को सामान्य स्वच्छता बरतनी चाहिए, अपने हाथों को जल से साफ करनाचाहिए, स्नान करना चाहिए और अन्य नियमित कार्यों को किसी दबाव से नहीं बल्कि स्वेच्छासे सम्पन्न करना चाहिए।
नहि तस्य विकल्पाख्या या च मद्वीक्षया हता ।आदेहान्तात्क्वचित्ख्यातिस्तत: सम्पद्यते मया ॥
३७॥
न--नहीं; हि--निश्चय ही; तस्य--ज्ञान का; विकल्प--कृष्ण से पृथक् किसी वस्तु की; आख्या--अनुभूति; या--जो; च--भी; मत्-मेरे; वीक्षया--ज्ञान द्वारा; हता--विनष्ट; आ--तब तक; देह--शरीर की; अन्तात्--मृत्यु; क्वचित्--कभी कभी;ख्याति:--ऐसी अनुभूति; ततः--तब; सम्पद्यते--समान ऐश्वर्य पाता है; मया--मेरे साथ |
ज्ञानी किसी भी वस्तु को मुझसे पृथक् नहीं देखता क्योंकि मेरा ज्ञान हो जाने से वह ऐसीभ्रामक अनुभूति को नष्ट कर चुका होता है। चूँकि भौतिक देह तथा मन ऐसी अनुभूति के लिएपहले से अभ्यस्त होते हैं अत: ऐसी अनुभूति की पुनरावृत्ति हो सकती है, किन्तु मृत्यु के समयऐसा ज्ञानी मेरे समान ही ऐश्वर्य प्राप्त करता है।
दुःखोदर्केषु कामेषु जातनिर्वेद आत्मवान् ।अज्ज्ञासितमद्धर्मो मुनिं गुरुमुपब्रजेत्ू ॥
३८॥
दुःख--दुख; उदर्केषु-- भावी फल के रूप में; कामेषु--इन्द्रियतृप्ति में; जात--उत्पन्न; निर्वेद:--विरक्ति; आत्म-वान्ू--जीवनमें आध्यात्मिक सिद्धि का इच्छुक; अजिज्ञासित--ठीक से विचार न करने वाला; मत्--मुझको; धर्म:--प्राप्त करने की विधि;मुनिम्--ज्ञानी व्यक्ति; गुरुम्-गुरु के पास; उपब्रजेतू--जाये।
जो व्यक्ति इन्द्रितृष्ति के फल को दुखदायी जानते हुए, उससे विरक्त है और जोआध्यात्मिक सिद्धि चाहता है, किन्तु जिसने मुझे प्राप्त करने की विधि का गम्भीरता सेविश्लेषण नहीं किया है, उसे प्रामाणिक तथा विद्वान गुरु के पास जाना चाहिए।
तावत्परिचरेद्धक्त: श्रद्धावाननसूयक: ।यावद्गह्म विजानीयान्मामेव गुरुमाहत: ॥
३९॥
तावत्--तब तक; परिचरेत्--सेवा करे; भक्त:--भक्त; श्रद्धा-वान्-- श्रद्धा समेत; अनसूयक:--ईर्ष्या-द्वेष के बिना रह कर;यावत्--जब तक; ब्रह्म--आध्यात्मिक ज्ञान; विजानीयात्--अच्छी तरह जान लेता है; माम्ू--मुझको; एव--निस्सन्देह;गुरुम्ू-गुरु; आहत:--आदर समेत
जब तक भक्त को पूरी तरह आध्यात्मिक ज्ञान की अनुभूति न हो ले, उसे चाहिए कि परमश्रद्धा तथा आदरपूर्वक एवं ट्वेषहहित होकर गुरु की सेवा करे, क्योंकि गुरु मुझसे अभिन्न होताहै।
यस्त्वसंयतषड्वर्ग: प्रचण्डेन्द्रियसारथि: ।ज्ञानवैराग्यरहितस्त्रिदण्डमुपजीवति ॥
४०॥
सुरानात्मानमात्मस्थं निहुते मां च धर्महा ।अविपक्वकषायो स्मादमुष्माच्च विहीयते ॥
४१॥
यः--जो; तु--लेकिन; असंयत--वश में न करके; षट्ू--छह; वर्ग:--कल्मष का प्रकार; प्रचण्ड-- भयानक; इन्द्रिय--इन्द्रियों के; सारथि:--चालक, बुद्धि; ज्ञान--ज्ञान का; वैराग्य--तथा वैराग्य; रहित:--विहीन; त्रि-दण्डम्ू--संन्यास आश्रम;उपजीवति--अपने जीवन-निर्वाह के लिए प्रयुक्त करते हुए; सुरान्--पूज्य देवताओं; आत्मानमू--अपने को; आत्म-स्थम्--अपने में स्थित; निहुते--अस्वीकार करता है; मामू--मुझको; च-- भी; धर्महा--धर्म का विनष्ट करने वाला; अविपक्व--जोलीन न हो पाया हो; कषाय:--कल्मष; अस्मात्--इस जगत से; अमुष्मात्--अगले जीवन से; च--भी; विहीयते--विपथ होजाता है।
जिसने छह प्रकार के मोहों ( काम, क्रोध, लोभ, उत्तेजना, मिथ्या अहंकार तथा नशा ) परनियंत्रण नहीं पा लिया, जिसकी बुद्धि जो कि इन्द्रियों की अगुवा है, भौतिक वस्तुओं परअत्यधिक आसक्त रहती है, जो ज्ञान तथा वैराग्य से रहित हैं, जो अपनी जीविका चलाने के लिएसंन्यास ग्रहण करता है, जो पूज्य देवताओं, स्वात्म तथा अपने भीतर के परमेश्वर को अस्वीकारकरता है और इस तरह सारा धर्म नष्ट कर देता है और जो अब भी भौतिक कल्मष से दूषित रहताहै, वह विपथ होकर इस जन्म को तथा अगले जन्म को भी विनष्ट कर देता है।
भिक्षोर्धर्म: शमोहिंसा तप ईक्षा वनौकस:ः ।गृहिणो भूतरक्षेज्या द्विजस्थाचार्यसेवनम् ॥
४२॥
भिक्षो:--संन्यासी का; धर्म:--मुख्य धार्मिक सिद्धान्त; शम:--समता; अहिंसा--अहिंसा; तप: --तपस्या; ईक्षा-- भेदभाव( मन तथा शरीर में ); बन--जंगल में; ओकस:--वास करने वाले का, वानप्रस्थ का; गृहिण:--गृहस्थ का; भूत-रक्षा--समस्तजीवों को शरण प्रदान करते हुए; इज्या--यज्ञ सम्पन्न करना; द्वि-जस्य--ब्रह्मचारी का; आचार्य--गुरु; सेवनम्--सेवा |
संन्यासी के मुख्य धार्मिक कार्य हैं समता तथा अहिंसा जबकि तपस्या तथा शरीर औरआत्मा के अन्तर का दार्शनिक ज्ञान ही वानप्रस्थ में प्रधान होते हैं। गृहस्थ के मुख्य कर्तव्य हैं सारेजीवों को आश्रय देना तथा यज्ञ सम्पन्न करना और ब्रह्मचारी मुख्यतया गुरु की सेवा करने में लगा रहता है।
ब्रह्मचर्य तप: शौच सनन््तोषो भूतसौहदम् ।गृहस्थस्याप्यृतौ गन्तु: सर्वेषां मदुपासनम् ॥
४३॥
ब्रह्म-चर्यम्-ब्रह्मचर्य; तप: --तपस्या; शौचम्--आसक्ति रहित मन की शुद्धता; सनन््तोष:--पूर्ण सन््तोष; भूत--सारे जीवों केप्रति; सौहदम्--मैत्री; गृहस्थस्य--गृहस्थ की; अपि-- भी; ऋतौ-- उचित समय पर; गन्तु:--अपनी पतली के पास जाकर;सर्वेषाम्--सभी मनुष्यों की; मत्--मेरी; उपासनम्ू--पूजा |
गृहस्थ को चाहिए कि सन््तान उत्पन्न करने के लिए ही नियत समय पर अपनी पत्नी के साथसंभोग ( सहवास ) करे। अन्यथा वह ब्रह्मचर्य तपस्या, मन तथा शरीर की स्वच्छता, अपनेस्वाभाविक पद पर संतोष तथा सभी जीवों के प्रति मैत्री का अभ्यास करे। मेरी पूजा तो वर्णअथवा आश्रम का भेदभाव त्याग कर सबों को करनी चाहिए।
इति मां यः स्वधर्मेण भजेन्नित्यमनन्यभाक् ।सर्वभूतेषु मद्भावो मद्भक्ति विन्दते हढाम् ॥
४४॥
इति--इस प्रकार; माम्--मुझको; यः--जो; स्व-धर्मेण-- अपने नियत कर्तव्य द्वारा; भजेत्ू--पूजा करता है; नित्यम्ू--सदैव;अनन्य-भाक्--पूजा की अन्य सामग्री से नहीं; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों में; मत्--मेरे; भाव:--अवगत; मत्-भक्तिम्ू--मेरीभक्ति; विन्दते--प्राप्त करता है; हढामू--अटल।
जो व्यक्ति अनन्य भाव से मेरी पूजा करता है और जो सारे जीवों में मुझे उपस्थित समझताहै, वह मेरी अविचल भक्ति प्राप्त करता है।
भक्त्योद्धवानपायिन्या सर्वलोकमहे श्वरम् ।सर्वोत्पत्त्यप्ययं ब्रह्म कारणं मोपयाति सः ॥
४५॥
भक्त्या--प्रेमाभक्ति से; उद्धव--हे उद्धव; अनपायिन्या--अचल; सर्व--समस्त; लोक--लोकों के; महा-ई श्वरम् -- परमेश्वरको; सर्व--हर वस्तु की; उत्पत्ति--सृष्टि का कारण; अप्ययम्--तथा संहार का; ब्रह्म--परब्रह्मय; कारणम्--ब्रह्मण्ड काकारण; मा--मेरे पास; उपयाति--आता है; सः--वह।
हे उद्धव, मैं सारे लोकों का परमेश्वर हूँ और परम कारण होने से, मैं इस ब्रह्माण्ड का सृजनऔर विनाश करता हूँ। इस तरह मैं परब्रह्म हूँ और जो अविचल भक्ति के साथ मेरी पूजा करताहै, वह मेरे पास आता है।
इति स्वधर्मनिर्णिक्तसत्त्वो निर्ज्नातमद्गति: ।ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो न चिरात्समुपैति माम् ॥
४६॥
इति--इस प्रकार; स्व-धर्म--अपना नियत कार्य करके; निर्णिक्त--शुद्ध करके; सत्त्वः--अपना जीव; निर्ज्ञत--पूरी तरहजानते हुए; मत्-गति:--मेरा परम पद; ज्ञान--शास्त्रीय ज्ञान से; विज्ञान--तथा आत्म-ज्ञान से; सम्पन्न:--युक्त; न चिरात्ू--निकट भविष्य में; समुपैति--ठीक से प्राप्त करता है; मामू--मुझको |
इस तरह जो अपने नियत कर्म करके अपने जीवन को शुद्ध कर चुका होता है, जो मेरे परमपद को पूरी तरह से समझता है और जो शास्त्रीय तथा स्वरूपसिद्ध ज्ञान से युक्त होता है, वहशीघ्र ही मुझे प्राप्त करता है।
वर्णाश्रमवतां धर्म एब आचारलक्षण: ।स एव मद्धक्तियुतो नि: श्रेयसकरः पर: ॥
४७॥
वर्णाश्रम-वताम्--वर्णा श्रम प्रणाली के अनुयायियों का; धर्म:--धार्मिक सिद्धान्त; एब:--यह; आचार--प्रामाणिक प्रथा केअनुसार उचित आचरण द्वारा; लक्षण:--लक्षणों से युक्त; सः--वह; एव--निस्सन्देह; मत्-भक्ति--मेरी भक्ति से; युत:--युक्त;निःश्रेयस--जीवन की सर्वोच्च सिद्धि; कर:--देने वाला; पर:--परम |
जो इस वर्णाश्रम प्रणाली के अनुयायी हैं, वे उचित आचार की प्रामाणिक प्रथाओं केअनुसार धार्मिक सिद्धान्तों को स्वीकार करते हैं। जब प्रेमाभक्ति में ऐसे वर्णाश्रम कर्म मुझेअर्पित किये जाते हैं, तो वे जीवन की चरम सिद्धि देने वाले होते हैं।
एतत्तेडभिहितं साधो भवान्पृच्छति यच्च माम् ।यथा स्वधर्मसंयुक्तो भक्तो मां समियात्परम् ॥
४८॥
एतत्--यह; ते--तुमसे; अभिहितमू--कहा गया; साधो--हे साधु उद्धव; भवान्--तुमने; पृच्छति--पूछा है; यत्ू--जो; च--तथा; माम्--मुझसे; यथा--साधन जिनसे; स्व-धर्म--अपने नियत कर्तव्य में; संयुक्त: --पूरी तरह लगा हुआ; भक्त:--भक्तहोने से; मामू--मेरे पास; समियात्--आ सके; परम्ू--परम |
हे साधु उद्धव, तुमने जैसा पूछा मैंने तुम्हें वे सारे साधन बतला दिये हैं, जिनसे अपने नियतकर्म में लगा हुआ मेरा भक्त मेरे पास वापस आ सकता है।
