← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची

अध्याय दो: महाराज निमि नौ योगेन्द्रों से मिले

11.2श्रीशुक उबाचगोविन्दभुजगुप्तायां द्वारवत्यां कुरूद्वह ।

अवात्सीन्नारदोभीक्ष्णं कृष्णोपासनलालस: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुक ने कहा; गोविन्द-- भगवान्‌ गोविन्द की; भुज--बाहुओं से; गुप्तायाम्‌--सुरक्षित; द्वारवत्याम्‌--द्वारवती राजधानी में; कुरू-उद्ठद-हे कुरु श्रेष्ठ; अवात्सीत्‌ू--रह रहे; नारद: --नारद मुनि; अभीक्षणम्‌--निरन्तर; कृष्ण-उपासन--कृष्ण की पूजा में लगे रहने की; लालस:--लालसा से।

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे कुरुश्रेष्ठ, भगवान्‌ कृष्ण की पूजा में संलग्न रहने के लिएउत्सुक नारद मुनि कुछ काल तक द्वारका में रहते रहे, जिसकी रक्षा गोविन्द सदैव अपनी बाहुओंसे करते थे।

"

को नु राजब्निन्द्रियवान्मुकुन्दबरणाम्बुजम्‌ ।

न भजेत्सर्वतोमृत्युरुपास्यममरोत्तमै: ॥

२॥

कः--कौन; नु--निस्सन्देह; राजन्‌--हे राजा; इन्द्रिय-वान्‌ू--इन्द्रियों से युक्त; मुकुन्द-चरण-अम्बुजम्‌-- भगवान्‌ मुकुन्द केचरणकमलों को; न भजेत्‌--नहीं पूजेगा; सर्वतः-मृत्यु:--सभी ओर से मृत्यु का सामना करते हुए; उपाश्यम्‌--पूज्य; अमर-उत्तमैः--सर्व श्रेष्ठ मुक्त पुरुषों द्वारा |

हे राजनू, इस भौतिक जगत में बद्धजीवों को जीवन के पग-पग पर मृत्यु का सामना करनापड़ता है।

इसलिए बद्धजीवों में ऐसा कौन होगा, जो बड़े से बड़े मुक्त पुरुष के लिए भी पूज्यभगवान्‌ मुकुन्द के चरणकमलों की सेवा नहीं करेगा।

"

तमेकदा तु देवर्षि बसुदेवो गृहागतम्‌ ।

अर्चितं सुखमासीनमभिवाह्येदमब्रवीत्‌ ॥

३ ॥

तम्‌--उसको; एकदा--एक बार; तु--तथा; देव-ऋषिम्‌--देवताओं के बीच ऋषि, नारद को; वसुदेव:--कृष्ण के पिताबसुदेव ने; गृह-आगतम्‌--अपने घर पर आये हुए; अर्चितमू--सामग्री द्वारा पूजन किया; सुखम्‌ आसीनम्‌--सुखपूर्वक बैठे हुए;अभिवाद्य--आदरपूर्वक सत्कार करके; इृदम्‌ू--यह; अब्रवीत्‌--कहा |

एक दिन देवर्षि नारद वसुदेव के घर आये।

उनकी उपयुक्त सामग्री से पूजा करके,सुखपूर्वक बिठाने तथा सादर प्रणाम करने के बाद वसुदेव इस प्रकार बोले।

"

श्रीवसुदेव उबाचभगवन्‍न्भवतो यात्रा स्वस्तये सर्वदेहिनाम्‌ ।

कृपणानां यथा पित्रोरुत्तमश्लोकवर्त्मनाम्‌ ॥

४॥

श्री-वसुदेव: उवाच-- श्री वसुदेव ने कहा; भगवन्‌ू--हे प्रभु; भवत:ः--आपका; यात्रा--आगमन; स्वस्तये--लाभ के लिए;सर्व-देहिनाम्‌ू--समस्त देहधारी प्राणियों के; कृपणानाम्‌--अत्यन्त दुखियारों के; यथा--जिस तरह; पित्रो:--पिता का; उत्तम-इलोक--उत्तम एलोकों से जिनकी प्रशंसा की जाती है, ऐसे भगवान्‌; वर्त्मनाम्‌--जो मार्ग पर स्थित हैं, उनके |

श्री वसुदेव ने कहा : हे प्रभु, जिस तरह पिता का आगमन उसके बच्चों के लिए लाभप्रदहोता है, उसी तरह आपका आगमन सारे जीवों के लाभ के लिए है।

आप उनमें से जो अत्यन्तदुखियारे हैं तथा साथ ही साथ वे जो उत्तमशलोक भगवान्‌ के पथ पर अग्रसर हैं, उनकी विशेषरूप से सहायता करते हैं।

"

भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।

सुखायैव हि साधूनां त्वाइशामच्युतात्मनाम्‌ ॥

५॥

भूतानाम्‌--जीवों के; देव-चरितम्‌--देवताओं के कार्यकलाप; दुःखाय--दुख के लिए; च-- भी; सुखाय--सुख में; च--तथा; सुखाय--सुख में; एब--केवल; हि--निस्सन्देह; साधूनाम्‌--सनन्‍्तों के; त्वाइशाम्‌--तुम्हारे समान; अच्युत--अच्युतभगवान्‌; आत्मनाम्‌--जिन्हें अपनी आत्मा के ही समान स्वीकार कर रखा है।

देवताओं के कार्यकलापों से जीवों को दुख तथा सुख दोनों प्राप्त होते हैं, किन्तु अच्युतभगवान्‌ को अपनी आत्मा मानने वाले, आप जैसे महान्‌ सन्‍्तों के कार्यों से समस्त प्राणियों कोकेवल सुख ही प्राप्त होता है।

"

भजन्ति ये यथा देवान्देवा अपि तथेव तान्‌ ।

छायेव कर्मसचिवा: साधवो दीनवत्सला: ॥

६॥

भजन्ति--पूजते हैं; ये--जो; यथा--जिस तरह; देवान्‌--देवताओं को; देवा:--देवतागण; अपि-- भी; तथा एव--उसी तरहसे; तानू--उनको; छाया--छाया में; इव--मानो; कर्म--भौतिक कर्म तथा उसके फल का; सचिवा:--अनुचर; साधव: --साधुगण; दीन-वत्सला: --पतितों पर दयालु।

जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे भेंट ( उपहार ) के अनुसार देवताओं से वैसा ही फल पातेहैं।

देवतागण कर्म के उसी तरह अनुचर हैं, जिस तरह मनुष्य की छाया मनुष्य की अनुचर है,किन्तु साधुगण सचमुच ही पतितों पर दयालु होते हैं।

"

ब्रह्म॑स्तथापि पृच्छामो धर्मान्भागवतांस्तव ।

याश्श्रुत्वा श्रद्धया मर्त्यों मुच्यते सर्वती भयात्‌ ॥

७॥

ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; तथा अपि--इतने पर भी ( यद्यपि आपके दर्शनों से ही मैं पूर्ण सन्तुष्ट हूँ ); पृच्छाम:--मैं पूछ रहा हूँ;धर्मानू-धार्मिक कर्तव्यों को; भागवतान्‌--जो विशेष रुप से भगवान्‌ को प्रसन्न करने के निमित्त हैं; तब--तुमसे; यान्‌ू--जिन्हें; श्रुत्वा--सुनकर; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; मर्त्य:--जिसका मरण निश्चित है; मुच्यते--छूट जाता है; सर्वतः--समस्त;भयातू-- भय से।

हे ब्राह्मण, यद्यपि मैं आपके दर्शन मात्र से सन्तुष्ट हूँ, तो भी आपसे मैं उन कर्तव्यों के विषयमें पूछना चाहता हूँ, जो भगवान्‌ को आनन्द प्रदान करने वाले हैं।

जो भी मर्त्य प्राणी इनके विषयमें श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, वह समस्त प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है।

"

अहं किल पुरानन्तं प्रजार्थों भुवि मुक्तिदम्‌ ।

अपूजयं न मोक्षाय मोहितो देवमायया ॥

८॥

अहम्‌--मैं; किल--निस्सन्देह; पुर--बहुत काल पूर्व; अनन्तम्‌-- भगवान्‌, जो अनन्त हैं; प्रजा-अर्थ:--सनन्‍्तान की कामनाकरते हुए; भुवि-- पृथ्वी पर; मुक्ति-दम्‌ू--मुक्ति देने वाले, भगवान्‌; अपूजयम्‌--मैंने पूजा की; न मोक्षाय--मुक्ति के लिए नहीं;मोहितः--मोह ग्रस्त; देव-मायया-- भगवान्‌ की माया द्वारा।

इस पृथ्वी पर मैंने अपने पूर्वजन्म में मुक्तिप्रदाता भगवान्‌ अनन्त की पूजा तो की, किन्तु मैंसन्‍्तान का इच्छुक था, अतएव मैंने उनकी पूजा मुक्ति के लिए नहीं की थी।

इस तरह मैं भगवान्‌की माया से मोहग्रस्त था।

"

यथा विचित्रव्यसनाद्धवद्धिर्विश्चवतोभयात्‌ ।

मुच्येम हाञ्खसैवाद्धा तथा न: शाधि सुत्रत ॥

९॥

यथा--जिससे; विचित्र-व्यसनात्‌--विभिन्न खतरों से पूर्ण; भवदर्द्धः--आपके ही कारण से; विश्वतः-भयात्‌--( इस जगत से )जो प्रत्येक ओर से भयावह है; मुच्येम--मुक्त हो सकूँ; हि--निस्सन्देह; अज्सा--आसानी से; एव-- भी; अद्धा-प्रत्यक्षत:;तथा--इस तरह; नः--हमको; शाधि--कृपया आदेश दें; सु-ब्रत--हे अपने व्रत के सच्चे |

हे प्रभु, आप सदैव अपने व्रत पर खरे उतरते हैं।

कृपया मुझे स्पष्ट आदेश दें, जिससे आपकीदया से मैं अपने को इस संसार से आसानी से मुक्त कर सकूँ, जो अनेक संकटों से पूर्ण है औरहमें सदैव भय से बाँधे रहता है।

"

श्रीशुक उबाचराजन्नेवं कृतप्रश्नो वसुदेवेन धीमता ।

प्रीतस्तमाह देवर्षिहरे: संस्मारितो गुणै: ॥

१०॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; राजन्‌--हे राजा; एवम्‌--इस प्रकार; कृत-प्रश्न:--पूछे जाने के बाद;वसुदेवेन--वसुदेव द्वारा; धीमता--बुद्धिमान; प्रीत:--प्रसन्न; तमू--उनसे; आह--बोला; देव-ऋषि:--देवताओं में ऋषि;हरेः-- भगवान्‌ हरि के ; संस्मारित:--स्मरण कराने वाले; गुणैः--गुणों के द्वारा

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्‌, देवर्षि नारद अत्यन्त बुद्धिमान वसुदेव के प्रश्नों सेअतीव प्रसन्न हुए।

चूँकि वे प्रश्न भगवान्‌ के दिव्य गुणों का स्मरण कराने वाले थे, अतएव उन्हेंकृष्ण का स्मरण हो आया।

अतः नारद ने वसुदेव को इस प्रकार उत्तर दिया।

"

श्रीनारद उवाचसम्यगेतद्व्यवसितं भवता सात्वतर्षभ ।

यत्पृच्छसे भागवतान्धर्मास्त्वं विश्वभावनान्‌ ॥

११॥

श्री-नारद: उवाच--नारद मुनि ने कहा; सम्यक्‌ू--सही सही; एतत्‌--यह; व्यवसितम्‌--निश्चय, संकल्प; भवता--आपके द्वारा;सात्वत-ऋषभ--हे सात्वत वंश के सर्वश्रेष्ठ; यत्‌--चूँकि; पृच्छसे--पूछ रहे हो; भागवतान्‌ धर्मान्‌ू-- भगवान्‌ के प्रति कर्तव्योंको; त्वमू--तुम; विश्व-भावनान्‌--समस्त विश्व को शुद्ध ( पवित्र ) कर सकने वाले।

श्री नारद ने कहा : हे सात्वत- श्रेष्ठ, तुमने ठीक ही भगवान्‌ के प्रति जीव के शाश्वत कर्तव्यके विषय में मुझसे पूछा है।

भगवान्‌ के प्रति ऐसी भक्ति इतनी शक्तिशाली होती है कि इसकेकरने से सारा विश्व पवित्र हो सकता है।

"

श्रुतोडनुपठितो ध्यात आहतो वानुमोदितः ।

सद्यः पुनाति सद्धर्मो देवविश्वद्रहोडपि हि ॥

१२॥

श्रुतः--सुना हुआ; अनुपठित:--बाद में सुनाया गया; ध्यात:--ध्यान किया हुआ; आहत: -- श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया गया;बा--अथवा; अनुमोदित:ः--अन्यों द्वारा किये जाने पर प्रशंसित; सद्यः--तुरन्त; पुनाति--पवित्र कर देता है; सत्‌-धर्म:--शुद्धभक्ति; देव--देवताओं को; विश्व--तथा ब्रह्माण्ड को; द्रुहः--घृणा से भरे हुए; अपि हि--भी |

भगवान्‌ के प्रति की गई शुद्ध भक्ति आध्यात्मिक रूप से इतनी प्रबल होती है कि ऐसी दिव्यसेवा के विषय में मात्र सुनने, सुनकर इसकी महिमा का गायन करने, इसका ध्यान करने,आदरपूर्वक तथा श्रद्धापूर्वक इसे स्वीकार करने या अन्यों की भक्ति की प्रशंसा करने से, वेमनुष्य भी तुरन्त शुद्ध हो जाते हैं, जो देवताओं से तथा अन्य सारे जीवों से घृणा करते हैं।

"

त्वया परमकल्याण: पुण्यश्रवणकीर्तन: ।

स्मारितो भगवानद्य देवो नारायणो मम ॥

१३॥

त्वया--तुम्हारे द्वारा; परम--सर्वाधिक ; कल्याण: --आनन्दपूर्ण; पुण्य--अत्यन्त पवित्र; श्रवण--सुनना; कीर्तन:--तथा कीर्तन( किसके विषय में ); स्मारित:--स्मरण कराया गया; भगवान्‌-- भगवान्‌; अद्य--आज ; देव: नारायण:-- भगवान्‌ नारायण;मम--मेरे

आपने आज मुझे अपने प्रभु, परम आनन्दमय भगवान्‌ नारायण का स्मरण करा दिया।

परमेश्वर इतने कल्याणमय हैं कि जो कोई भी उनका श्रवण एवं कीर्तन करता है, वह पूरी तरह सेपवित्र बन जाता है।

"

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ ।

आर्षभाणां च संवादं विदेहस्य महात्मन: ॥

१४॥

अत्र अपि--इस मामले ( भागवत धर्म का वर्णन करने ) में; उदाहरन्ति-- उदाहरण दिया जाता है; इमम्‌--यह; इतिहासम्‌--ऐतिहासिक वृत्तान्त; पुरातनम्‌--प्राचीन; आर्षभाणाम्‌--ऋषभ--पुत्रों का; च--तथा; संवादम्‌--वार्ता; विदेहस्य--विदेह केराजा जनक से; महा-आत्मन:--विशाल हृदय वाला आत्मा।

भगवान्‌ की भक्तिमय सेवा की व्याख्या करने के लिए मुनियों ने महात्मा राजा विदेह तथाऋषभ-पुत्रों के मध्य हुई वार्ता का प्राचीन इतिहास सुनाया है।

"

प्रियत्रतो नाम सुतो मनो: स्वायम्भुवस्य यः ।

तस्याग्नीश्रस्ततो नाभिरृषभस्तत्सुतः स्मृत: ॥

१५॥

प्रियत्रत:ः --महाराज प्रियत्रत; नाम--नामक; सुतः--पुत्र; मनोः स्वायम्भुवस्य--स्वायम्भुव मनु का; य:ः--जो; तस्य--उसका;आग्नीक्ष:--आग्नीक्ष ( पुत्र था ); ततः--उससे ( आग्नीश्व से ); नाभि:--राजा नाभि; ऋषभ:-- भगवान्‌ ऋषभदेव; तत्‌-सुतः--उसका पुत्र; स्मृत:--स्मरण किया जाता है।

स्वायम्भुव मनु को महाराज प्रियत्रत नामक पुत्र हुआ और प्रिय्रत के पुत्रों में से आग्नीक्नथा, जिससे नाभि उत्पन्न हुआ।

नाभि का पुत्र ऋषभदेव कहलाया।

"

तमाहुर्वासुदेवांशं मोक्षधर्मविवक्षया ।

अवतीर्ण सुतशतं तस्यासीद्रह्मपारगम्‌ ॥

१६॥

तम्‌--उसे; आहु:--कहते हैं; वासुदेव-अंशम्‌-- भगवान्‌ वासुदेव का अंश; मोक्ष-धर्म--मोक्ष प्राप्त करने की विधि;विवक्षया--शिक्षा देने की इच्छा से; अवतीर्णम्‌--इस संसार में प्रकट हुआ; सुत--पुत्र; शतम्‌--एक सौ; तस्य--उसके ;आसीत्‌--थे; ब्रह्म --वेदों के; पार-गम्‌--पूर्णतया आत्मसात करने वाले।

श्री ऋषभदेव को भगवान्‌ वासुदेव का अंश माना जाता है।

उन्होंने इस जगत में उन धार्मिकसिद्धान्तों का प्रसार करने के लिए अवतार लिया था, जिनसे जीवों को चरम मोक्ष प्राप्त होता है।

उनके एक सौ पुत्र थे, वे सभी वैदिक ज्ञान में पारंगत थे।

"

तेषां वै भरतो ज्येष्टो नारायणपरायण: ।

विख्यात वर्षमेतद्यन्नाम्ना भारतमद्भुतम्‌ ॥

१७॥

तेषाम्‌-- उनमें से; वै--दरअसल; भरतः-- भरत; ज्येष्ठ:--सबसे बड़ा; नारायण-परायण:-- भगवान्‌ नारायण का भक्त;विख्यातम्‌--प्रसिद्ध है; वर्षम्‌--लोक; एतत्‌--यह; यत्‌-नाम्ना--जिसके नाम पर; भारतम्‌-- भारतवर्ष; अद्भुतम्‌ू-- अद्भुत |

भगवान्‌ ऋषभदेव के एक सौ पुत्रों में से सबसे ज्येष्ठ भरत थे, जो भगवान्‌ नारायण के प्रतिपूर्णतया समर्पित थे।

भरत की ख्याति के कारण ही यह लोक अब महान्‌ भारतवर्ष के नाम सेविख्यात है।

"

स भुक्तभोगां त्यक्त्वेमां निर्गतस्तपसा हरिम्‌ ।

उपासीनस्तत्पदवीं लेभे वै जनूनभिस्त्रिभि: ॥

१८॥

सः--वह; भुक्त-- भोगे गये; भोगाम्‌ू--आनन्दों को; त्यक्त्वा--त्याग कर; इमाम्‌--इस ( पृथ्वी ) के; निर्गतः--घर छोड़कर;तपसा--तपस्या से; हरिम्‌-- भगवान्‌ हरि को; उपासीन: --पूजा करके; तत्‌-पदवीम्‌--उसका गन्तव्य; लेभे--प्राप्त किया;वै--निस्सन्देह; जन्मभि:--जन्मों में; त्रिभिः--तीन

राजा भरत ने सारे भौतिक आनन्द को क्षणिक तथा व्यर्थ मानते हुए इस जगत का परित्यागकर दिया।

अपनी सुन्दर युवा पत्नी तथा परिवार को छोड़कर उन्होंने कठोर तपस्या द्वारा भगवान्‌की पूजा की और तीन जन्मों के बाद भगदवद्धाम प्राप्त किया।

"

तेषां नव नवद्वीपपतयोस्य समन्ततः ।

कर्मतन्त्रप्रणेतार एकाशीतिद्विजातय: ॥

१९॥

तेषामू--उन ( ऋषभदेव के एक सौ पुत्रों ) में से; नव--नौ; नव-द्वीप--नौ द्वीपों के ( जिनमें भारतवर्ष बना है ); पतयः --स्वामी; अस्य--इस वर्ष के; समन्तत:--इसे पूरी तरह से समेटते हुए; कर्म-तन्त्र--सकाम वैदिक यज्ञों के मार्ग के; प्रणेतार: --प्रणेता, प्रारम्भ करने वाले; एकाशीति:--इक्यासी; द्वि-जातय:--द्विज ब्राह्मण

ऋषभदेव के शेष पुत्रों में से नौ पुत्र भारतवर्ष के नौ द्वीपों के शासक बने।

और उन्होंने इसलोक पर पूर्ण आधिपत्य जमाया।

शेष इक्यासी पुत्र द्विज ब्राह्मण बन गये और उन्होंने सकामयज्ञों ( कर्मकाण्ड ) के वैदिक मार्ग का शुभारम्भ करने में सहायता की।

"

नवाभवन्महाभागा मुनयो ह्ार्थशंसिन: ।

श्रमणा वातरसना आत्मविद्याविशारदा: ॥

२०॥

कविर्ईविरन्तरीक्ष: प्रबुद्ध: पिप्पलायन: ।

आविदोंत्रोथ द्रमिलश्रमसः करभाजन: ॥

२१॥

नव--नौ; अभवनू-- थे; महा-भागा: --अ त्यन्त भाग्यवान; मुनयः --मुनि; हि--निस्सन्देह; अर्थ-शंसिन:--परब्रह्म की व्याख्याकरने में लगे हुए; श्रमणा: --इस तरह महान्‌ प्रयास करते हुए; वात-रसना:--वायु ओढ़े हुए ( नंगे ); आत्म-विद्या --आध्यात्मिक विज्ञान में; विशारदा:--विद्वान; कवि: हवि: अन्तरीक्ष:--कवि, हविर्‌, तथा अन्तरीक्ष; प्रबुद्ध: पिप्पलायन:--प्रबुद्ध तथा पिप्पलायन; आविदंत्र:--आविदोंत्र; अथ-- भी; द्रमिल:--द्रुमिल; चमस: करभाजन:--चमस तथा करभाजन।

ऋषभदेव के शेष नौ पुत्र अत्यन्त भाग्यशाली मुनि थे, जिन्होंने परम सत्य के ज्ञान काविस्तार करने के लिए घोर परिश्रम किया।

वे नंगे रहकर इधर-उधर विचरण करते थे औरआध्यात्मिक विज्ञान में अतीव दक्ष थे।

इनके नाम थे--कवि, हविर्‌, अन्तरीक्ष, प्रबुद्ध,पिप्पलायन, आविरहोंत्र, द्रमिल, चमस तथा करभाजन।

"

त एते भगवद्गूपं विश्व सदसदात्मकम आत्मनोव्यतिरिकेण पश्यन्तो व्यचरन्महीम्‌ ॥

२२॥

ते एते--ये ( नवों योगेन्द्र )) भगवत्‌-- भगवान्‌ के; रूपम्‌--रूप; विश्वम्‌--समस्त ब्रह्माण्ड को; सत्‌-असत्‌ू-आत्मकम्‌--स्थूलतथा सूक्ष्म पदार्थों से युक्त; आत्मन:--आत्मा से; अव्यतिरिकेण-- अभिन्न; पश्यन्त:--देखते हुए; व्यचरन्‌--घूमते थे; महीम्‌--पृथ्वी पर।

ये मुनि, समस्त ब्रह्माण्ड को इसके सारे स्थूल तथा सूक्ष्म पदार्थों सहित, भगवान्‌ के प्राकट्यके रूप में तथा आत्मा से अभिन्न देखते हुए पृथ्वी पर विचरण करते थे।

"

अव्याहतेष्टगतयः सुरसिद्धसाध्यगन्धर्वयक्षनरकिन्नरनागलोकान्‌ ।

मुक्ताश्चरन्ति मुनिचारणभूतनाथ-विद्याधरद्विजगवां भुवनानि कामम्‌ ॥

२३॥

अव्याहत--बिना रोक-टोक के; इष्ट-गतय: --इच्छानुसार घूमते हुए; सुर--देवताओं के; सिद्ध--पूर्ण योगी; साध्य--साध्यगण; गन्धर्व--स्वर्ग के गवैये; यक्ष--कुवेर के संगी; नर--मनुष्य; किन्नर--छोटे देवता, जो इच्छानुसार अपना रूप बदलसकते हैं; नाग--तथा सर्प; लोकान्‌--लोकों में; मुक्ता:--स्वतंत्र, मुक्त; चरन्ति--विचरण करते हैं; मुनि--मुनियों के;चारण--गवैये; भूत-नाथ--शिवजी के भूत-प्रेत अनुयायीगण; विद्याधर--विद्याधरगण; द्विज--ब्राह्मण; गवाम्‌--तथा गायोंके; भुवनानि--लोकों को; कामम्‌--जिसे भी वे चाहते हैं |

नवों योगेन्द्र मुक्तात्माएँ हैं, जो देवताओं, सिद्धों, साध्यों, गन्धर्वों, यक्षों, मानवों तथा किन्नरोंएवं सर्पो के लोकों में मुक्त भाव से विचरण करते हैं।

उनके मुक्त विचरण को कोई संसारी शक्तिरोक नहीं सकती और वे अपनी इच्छानुसार मुनियों, देवदूतों, शिवजी के भूत-प्रेत अनुयायियों,विद्याधरों, ब्राह्मणों तथा गौवों के लोकों में विचरण कर सकते हैं।

"

त एकदा निमेः सत्रमुपजम्मुर्यटच्छया ।

वितायमानमृषिभिरजनाभे महात्मन: ॥

२४॥

ते--वे; एकदा--एक बार; निमेः--राजा निमि के; सत्रम्‌--सोम यज्ञ में; उपजग्मु:--पहुँचे; यहच्छया--इच्छानुसार;वितायमानम्‌--ले जाये जाकर; ऋषिभि: --ऋषियों द्वारा; अजनाभे--अजनाभ ( भारतवर्ष का प्राचीन नाम ) में; महा-आत्मन:--महात्मा के |

एक बार वे अजनाभ में ( पृथ्वी का पूर्ववर्ती नाम ) महाराजा निमि के यज्ञ में पहुँचे, जोमहर्षियों की देखरेख में सम्पन्न किया जा रहा था।

"

तान्दष्टा सूर्यसड्डाशान्महाभागवतान्रूष ।

यजमानोग्नयो विप्रा: सर्व एवोपतस्थिरे ॥

२५॥

तानू--उनको; हृष्ठा--देखकर; सूर्य--सूर्य; सड्भाशान्‌--तेज में स्पर्धा कर रहे; महा-भागवतान्‌-- भगवान्‌ के शुद्ध भक्तों को;नृप--हे राजा ( वसुदेव ); यजमान:--यज्ञ सम्पन्न करने वाला ( निमि महाराज ); अग्नयः--अग्नियाँ; विप्रा:--ब्राह्मणगण;सर्वे--सभी लोग; एव-- भी; उपतस्थिरे--सम्मान में खड़े हो गये।

हे राजन, तेज में सूर्य की बराबरी करने वाले उन भगवदभक्तों को देखकर वहाँ पर उपस्थितसबके सब--यज्ञ सम्पन्न करने वाले, ब्राह्मण तथा यज्ञ की अग्नियाँ भी--सम्मान में उठकर खड़ेहो गये।

"

विदेहस्तानभिप्रेत्य नारायणपरायणान्‌ ।

प्रीतः सम्पूजयां चक्रे आसनस्थान्यथाईत: ॥

२६॥

विदेह:--निमि महाराज; तान्‌ू--उनको; अभिप्रेत्य--पहचान कर; नारायण-परायणान्‌-- भक्तों को, जिनके एकमात्र लक्ष्यनारायण थे; प्रीत:ः--प्रसन्न; सम्पूजयाम्‌ चक्रे-- पूरी तरह से उनकी पूजा की; आसन-स्थान्‌--बैठाये गये; यथा-अह॑त:--जो जिस योग्य था

राजा विदेह ( निमि ) समझ गये कि नवों मुनि भगवान्‌ के परम भक्त थे।

इसलिए उनके शुभआगमन से अत्याधिक प्रफुछ्लित होकर उन्होंने उन्हें उचित आसन प्रदान किया और उचित ढंग सेपूजा की, जिस तरह कोई भगवान्‌ की पूजा करता है।

"

तात्रोचमानान्स्वरुचा ब्रह्मपुत्रोपमान्नव ।

पप्रच्छ परमप्रीतः प्रश्रयावनतो नृप: ॥

२७॥

तानू--उनको; रोचमानान्‌--चमकते हुए; स्व-रूुचा--अपने ही तेज से; ब्रह्म-पुत्र-उपमान्‌--ब्रह्मा के पुत्रों के समान; नव--नौ;पप्रच्छ--पूछा; परम-प्रीत:--आनन्दविभोर; प्रश्रय--विनयपूर्वक; अवनत:--नमस्कार किया; नृप:--राजा ने।

दिव्य आनन्द से विभोर होकर राजा ने विनयपूर्वक अपना शीश झुकाया और तब नौ मुनियोंसे प्रश्न पूछना शुरू किया।

ये नवों महात्मा अपने ही तेज से चमक रहे थे और इस प्रकार सेब्रह्मा के पुत्रों अर्थात्‌ चार कुमारों के समान प्रतीत हो रहे थे।

"

श्रीविदेह उबाचमन्ये भगवतः साक्षात्पार्षदान्वो मधुद्विष: ।

विष्णोर्भूतानि लोकानां पावनाय चरन्ति हि ॥

२८॥

श्री-विदेह: उवाच--राजा विदेह ने कहा; मन्ये--मानता हूँ; भगवतः--भगवान्‌ के; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; पार्षदान्‌ू--निजी संगियोंको; वः--तुम्हारे; मधु-द्विष:--मधु के शत्रु के; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णु के; भूतानि--सेवकों को; लोकानाम्‌--सारे लोकोंके; पावनाय--पवित्र करने के लिए; चरन्ति--इधर-उधर विचरण करते हैं; हि--निस्सन्देह |

राजा विदेह ने कहा : मैं सोचता हूँ कि आप मधु असुर के शत्रु-रूप में प्रसिद्ध भगवान्‌ केनिजी संगी हैं।

दरअसल, भगवान्‌ विष्णु के शुद्ध भक्त ब्रह्माण्ड-भर में किसी स्वार्थवश नहीं,अपितु समस्त बद्धजीवों को पवित्र करने के निमित्त विचरण करते रहते हैं।

"

दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभड्डरः ।

तत्रापि दुर्लभं मन्ये वैकुण्ठप्रियदर्शनम्‌ ॥

२९॥

दुर्लभ:--प्राप्त करना कठिन; मानुष:--मनुष्य का; देह: --शरीर; देहिनाम्‌ू--देहधारियों के लिए; क्षण-भब्ुरः --किसी भी क्षणविनष्ट हो जाने वाला; तत्र--उस मनुष्य-शरीर में; अपि-- भी; दुर्लभम्‌--प्राप्त करना अधिक कठिन; मन्ये--मानता हूँ;बैकुण्ठप्रिय--जो भगवान्‌ वैकुण्ठ को अत्यधिक प्रिय हैं, उनके; दर्शनम्‌--दर्शन को

बद्धजीवों के लिए मनुष्य-शरीर प्राप्त कर पाना सबसे अधिक कठिन है और यह किसी भीक्षण नष्ट हो सकता है।

किन्तु मैं सोचता हूँ कि जिन्होंने मनुष्य-जीवन प्राप्त कर भी लिया है,उनमें से विरले ही उन शुद्ध भक्तों की संगति प्राप्त कर पाते हैं, जो वैकुण्ठ के स्वामी को अत्यन्तप्रिय हैं।

"

अत आल्वन्तिकं क्षेमं पृष्छामो भवतोनघा: ।

संसारेस्मिन्क्षणार्धो पि सत्सड़ः शेवधिनृणाम्‌ ॥

३०॥

अतः--इसलिए; आत्यन्तिकम्‌-परम्‌; क्षेमम्‌ू--कल्याण; पृच्छाम: -- पूछ रहा हूँ; भवतः--आपसे; अनघा:--हे पापरहित;संसारे--जन्म-मृत्यु के चक्र में; अस्मिनू--इस; क्षण-अर्ध: --आधा क्षण तक चलने वाले; अपि--ही; सत्‌-सड्र:--भगवद्भक्तों की संगति; शेवधि:--महान्‌ कोश, निधि; नृणाम्‌-मनुष्यों का।

अतएव हे अनघो, मैं आपसे पूछता हूँ कि कृपा करके मुझे यह बतायें कि परम कल्याणक्या है? इस जन्म-मृत्यु के जगत में शुद्ध भक्तों के साथ आधे क्षण की भी संगति किसी मनुष्यके लिए अमूल्य निधि है।

"

धर्मान्भागवतान्ब्रूत यदि नः श्रुतये क्षमम्‌ ।

येः प्रसन्न: प्रपन्नाय दास्यत्यात्मानमप्यज: ॥

३१॥

धर्मान्‌ भागवतानू--भक्ति का विज्ञान; ब्रूत--कृपया कहें; यदि--यदि; न:ः--हमारे; श्रुतये --ठीक से सुनने के लिए; क्षमम्‌--क्षमता है; यैः--जिस ( भक्ति ) से; प्रसन्नः--प्रसन्न होकर; प्रपन्नाय--शरणागत के लिए; दास्यति--देगा; आत्मानम्‌--स्वयं को;अपि--भी; अज:--अजन्मा भगवान्‌

यदि आप यह समझें कि मैं इन कथाओं को ठीक तरह से सुनने में समर्थ हूँ, तो कृपा करकेबतलायें कि भगवान्‌ की भक्ति में किस तरह प्रवृत्त हुआ जाता है? जब कोई जीव भगवान्‌ कोअपनी सेवा अर्पित करता है, तो भगवान्‌ तुरन्त प्रसन्न हो जाते हैं और बदले में शरणागत व्यक्तिको अपने आपको भी दे डालते हैं।

"

श्रीनारद उवाचएवं ते निमिना पृष्टा वसुदेव महत्तमा: ।

प्रतिपूज्याब्रुवन्प्रीत्या ससदस्यर्त्विजं नृपम्‌ ॥

३२॥

श्री-नारद: उवाच-- श्री नारद ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; ते--वे; निमिना--राजा निमि द्वारा; पृष्टा:--पूछे गये; वसुदेव--हेबसुदेव; महतू-तमा:--सम्तों में सर्वश्रेष्ठ; प्रतिपूज्य--बदले में आदरसूचक शब्द कहकर; अब्लुवन्‌--वे बोले; प्रीत्या--स्नेहपूर्वक; स-सदस्य--यज्ञ सभा के सदस्यों के सहित; ऋत्विजम्‌--तथा पुरोहितों द्वारा; नृपमू--राजा से |

श्री नारद ने कहा : हे वसुदेव, जब महाराज निमि नव-योगेन्द्रों से भगवद्भक्ति के विषय मेंपूछ चुके, तो उन साथु-श्रेष्ठों ने राजा को उसके प्रश्नों के लिए धन्यवाद दिया और यज्ञ सभा केसदस्यों तथा ब्राह्मण पुरोहितों की उपस्थिति में उससे स्नेहपूर्वक कहा।

"

श्रीकविरुवाचमन्येकुतश्चिद्धयमच्युतस्यपादाम्बुजोपासनमत्र नित्यम्‌ ।

उद्ठिग्नबुद्धेरसदात्म भावाद्‌विश्वात्मना यत्र निवर्तते भी: ॥

३३॥

श्री-कविः उवाच-- श्री कवि ने कहा; मन्ये--मैं मानता हूँ; अकुतश्चित्‌-भयम्‌--निर्भीकता; अच्युतस्य--अच्युत भगवान्‌ की;पाद-अम्बुज--चरणकमलों की; उपासनम्‌-पूजा; अत्र--इस जगत में; नित्यम्‌--निरन्तर; उद्ठिग्न-बुद्धेः--विचलित बुद्धिवालेका; असत्‌-केवल क्षणभंगुर; आत्म-भावात्‌--आत्मा के रूप में सोचने से; विश्व-आत्मना--पूरी तरह से; यत्र--जिस( भगवद्भक्ति ) में; निवर्तते-- भाग जाता है; भी:ः-- भय |

श्री कवि ने कहा: मैं मानता हूँ कि जिसकी बुद्धि भौतिक क्षणभंगुर जगत को हीमिथ्यापूर्वक आत्मस्वरूप मानने से निरन्तर विचलित रहती है, वह अच्युत भगवान्‌ केचरणकमलों की पूजा द्वारा ही अपने भय से मुक्ति पा सकता है।

ऐसी भक्ति में सारा भय दूर होजाता है।

"

ये वै भगवता प्रोक्ता उपाया ह्यात्मलब्धये ।

अज्ञ: पुंसामविदुषां विद्धि भागवतान्‌ हि तान्‌ ॥

३४॥

ये--जो; वै--निस्सन्देह; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; प्रोक्ताः--कहा हुआ; उपाया:--साधनों; हि--निस्सन्देह; आत्म-लब्धये--परमात्मा की अनुभूति करने के लिए; अज्भ:--सरलता से; पुंसाम्‌ू--जीव द्वारा; अविदुषाम्‌--अल्प बुद्धि वाले; विर्द्धि--जानतेहैं; भागवतान्‌-- भागवतधर्म बनने के लिए; हि--निश्चय ही; तानू--इन |

अज्ञानी जीव भी परमेश्वर को सरलता से जान पाते हैं, यदि वे उन साधनों को अपनाएँ, जिन्हेंभगवान्‌ ने स्वयं निर्दिष्ट किया है।

भगवान्‌ ने जो विधि संस्तुत की है, वह भागवतधर्म अथवाभगवान्‌ की भक्ति है।

"

यानास्थाय नरो राजन्न प्रमाद्मेत कर्हिचित्‌ ।

धावन्निमील्य वा नेत्रे न स्खलेन्न पतेदिह ॥

३५॥

यान्‌--जिन ( साधनों ) को; आस्थाय--स्वीकार करके; नर:--मनुष्य; राजन्‌--हे राजा; न प्रमादेत--मोहित नहीं होता;कर्हिचित्‌ू--कभी भी; धावन्‌--दौड़ते हुए; निमील्य--बन्द करके ; वा--अथवा; नेत्रे--उसकी आँखों में; न स्खलेत्‌--च्युतनहीं होगा; न पतेतू--पतित नहीं होगा; इह--इस मार्ग पर

हे राजन, जो व्यक्ति भगवान्‌ के प्रति इस भक्तियोग को स्वीकार कर लेता है, वह इस संसारमें अपने मार्ग पर कभी कोई बड़ी भूल नहीं करेगा।

यदि वह अपनी आँखें बन्द करके दौड़ लगालो, तो भी वह न तो लड़खड़ाएगा न पतित होगा।

"

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वाबुद्धयात्मना वानुसृतस्वभावात्‌ ।

करोति यद्यत्सकलं परस्मैनारायणायेति समर्पयेत्तत्‌ ॥

३६॥

कायेन--शरीर से; वाचा--वाणी से; मनसा--मन से; इन्द्रियै:--इन्द्रियों से; वा--अथवा; बुद्धया--बुद्धि से; आत्मना--शुद्धचेतना से; वा--अथवा; अनुसृत-- अनुसरण किया हुआ; स्वभावात्‌--किसी के स्वभाव के अनुसार; करोति--करता है; यत्‌यत्‌--जो जो; सकलम्‌--सभी; परस्मै--ब्रह्म को; नारायणाय इति--यह सोचते हुए कि यह नारायण के लिए है; समर्पयेत्‌--समर्पण करना चाहिए; तत्‌--वह |

बद्ध जीवन में अर्जित विशेष स्वभाव के अनुसार मनुष्य अपने शरीर, वचन, मन, इन्द्रिय,बुद्धि या शुद्ध चेतना से, जो कुछ करता है उसे यह सोचते हुए परमात्मा को अर्पित करना चाहिएकि यह भगवान्‌ नारायण की प्रसन्नता के लिए है।

"

भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या-दीशादपेतस्य विपर्ययोउस्मृति: ।

तन्माययातो बुध आभजेत्तंभक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥

३७॥

भयमू--भय; द्वितीय-- भगवान्‌ के अतिरिक्त किसी अन्य वस्तु में; अभिनिवेशत:--लीन रहने से; स्थात्‌--उत्पन्न होगी;ईशात्‌-- भगवान्‌ से; अपेतस्थ--जिसने निकाल दिया उसके लिए; विपर्यय:--गलत पहचान; अस्मृति:--विस्मरणशीलता;ततू--उस भगवान्‌ की; मायया--माया से; अत:--इसलिए; बुध: --बुद्धिमान व्यक्ति; आभजेत्‌--पूरी तरह पूजा करे; तमू--उसको; भक्त्या--भक्ति के सहित; एकया--अनन्य; ईशम्‌-- भगवान्‌ को; गुरु-देवता-आत्मा--जो अपने गुरु को अपनास्वामी तथा आत्मा तक मानता है।

जब जीव भगवान्‌ की बहिरंगा माया शक्ति में लीन होने के कारण भौतिक शरीर के रूप मेंगलत से अपनी पहचान करता है, तब भय उत्पन्न होता है।

इस प्रकार जीव जब भगवान्‌ से मुखमोड़ लेता है, तो वह भगवान्‌ के दास रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति को भी भूल जाता है।

यह मोहने वाली भयपूर्ण दशा माया द्वारा प्रभावित होती है।

इसलिए बुद्धिमान पुरुष कोप्रामाणिक गुरु के निर्देशन में भगवान्‌ की अनन्य भक्ति में लगना चाहिए।

और गुरु को हीअपना आराध्यदेव तथा अपना प्राणधन स्वीकार करना चाहिए ॥

" अविद्यमानोप्यवभाति हि द्वयोध्यातुर्धिया स्वप्ममनोरथौ यथा ।

तत्कर्मसड्डूल्पविकल्पकं मनोबुधो निरुन्ध्यादभयं ततः स्यात्‌ ॥

३८ ॥

अविद्यमान:--वास्तव में उपस्थित नहीं; अपि--यद्यपि; अवभाति-- प्रकट होता है; हि--निस्सन्देह; द्वयः--द्वैत; ध्यातुः--अनुभव करने वाले व्यक्ति की; धिया--बुद्धि से; स्व्न--सपना; मन:-रथौ--अथवा इच्छा का उत्पन्न होना; यथा--जिस तरह;ततू--इसलिए; कर्म--कर्मो का; सड्जूल्प-विकल्पकम्‌--संकल्प-विकल्प को; मन: --मन; बुध: --बुद्धिमान व्यक्ति;निरुन्ध्यात्‌ू--वश में लाना चाहिए; अभयम्‌--निर्भीकता; तत:ः--इस तरह से; स्थातू--हो सकता है

यद्यपि भौतिक जगत का द्वैत अन्ततः विद्यमान नहीं रहता, किन्तु बद्धजीव अपनी बद्ध-बुद्धि के प्रभाववश इसे असली अनुभव करता है।

कृष्ण से पृथक्‌ जगत के काल्पनिक अनुभवकी तुलना स्वप्न देखने तथा इच्छा करने से की जा सकती है।

जब बद्धजीव रात में इच्छित याभयावनी वस्तु का सपना देखता है अथवा जब वह जो कुछ चाहता है या जिससे दूर रहनाचाहता है उनका दिवास्वप्न देखता है, तो वह ऐसी वास्तविकता को जन्म देता है, जिसकाअस्तित्व उसकी कल्पना से परे नहीं होता।

मन की प्रवृत्ति इन्द्रियतृप्ति पर आधारित विविध कार्योको स्वीकार करने तथा उन्हें बहिष्कृत करने की होती है।

इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को मन परनियंत्रण रखना चाहिए और वस्तुओं को कृष्ण से पृथक्‌ देखने के भ्रम से इसे अलग रखनाचाहिए।

जब मन इस तरह वश में हो जायेगा, तो उसे वास्तविक निर्भीकता का अनुभव होगा।

"

श्रृण्वन्सुभद्राणि रथाड्रपाणे-जन्मानि कर्माणि च यानि लोके ।

गीतानि नामानि तदर्थकानिगायन्विलज्जो विचरेदसड्रः ॥

३९॥

श्रण्वन्‌ू--सुनते हुए; सु-भद्राणि--सर्वमंगलमय; रथ-अड्ग-पाणे: --जिनके हाथ में रथ का पहिया है, उनके ; जन्मानि--जन्मोंको; कर्माणि--कार्यो को; च--तथा; यानि--जिन जिन; लोके--इस लोक में; गीतानि--गाये जाते हैं; नामानि--नामों को;ततू-अर्थकानि--इन जन्मों तथा कर्मों को बताने वाले; गायन्‌ू-गाते हुए; विलज्ज: --क्षोभ से मुक्त; विचरेत्‌--विचरण करनाचाहिए; असड्ु:--भौतिक संगति के बिना।

जिस बुद्धिमान व्यक्ति ने अपने मन को वश में कर लिया है और भय पर विजय प्राप्त करली है, उसे पत्नी, परिवार, राष्ट्र जैसे भौतिक वस्तुओं के प्रति सारी आसक्ति को त्याग देनाचाहिए और निरद्धन्द्द होकर चक्रपाणि भगवान्‌ के पवित्र नामों का श्रवण और कीर्तन करते हुएमुक्त भाव से विचरण करना चाहिए।

कृष्ण के पवित्र नाम सर्वमंगलकारी हैं, क्योंकि वे उनकेदिव्य जन्म तथा बद्धजीवों के मोक्ष के लिए इस जगत में किये जाने वाले उनके कार्यों का वर्णनकरने वाले हैं।

इस तरह भगवान्‌ के पवित्र नामों का विश्व-भर में गायन होता है।

"

एवंब्रत: स्वप्रियनामकीर्त्याजातानुरागो द्वुतचित्त उच्चै: ।

हसत्यथो रोदिति रौति गाय-त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्य: ॥

४०॥

एवमू-ब्रतः--जब कोई कीर्तन करने तथा नाचने के ब्रत में लगता है; स्व--अपना; प्रिय--अत्यन्त प्रिय; नाम--पवित्र नाम;कीर्त्य--कीर्तन के द्वारा; जात--इस तरह उत्पन्न; अनुराग: --अनुरक्ति; द्रुत-चित्त:--द्रवित हृदय; उच्चै:--उच्च स्वर से;हसति--हँसता है; अथो-- भी; रोदिति--रोता है; रौति--विश्षुब्ध होता है; गायति--कीर्तन करता है; उन्माद-वत्‌--उन्मत्त कीतरह; नृत्यति--नाचता है; लोक-बाह्य:--बाहरी लोगों की परवाह न करके |

भगवान्‌ के पवित्र नाम का कीर्तन करने से मनुष्य भगवत्प्रेम की अवस्था को प्राप्त करताहै।

तब भक्त भगवान्‌ के नित्य दास रूपी ब्रत में स्थिर हो जाता है और क्रमश: भगवान्‌ के किसी एक नाम तथा रूप के प्रति अत्यधिक अनुरक्त हो उठता है।

जब उसका हृदय भावमय प्रेम सेद्रवित होता है, तो वह जोर-जोर से हँसता या रोता है अथवा चिल्लाता है।

कभी कभी वह उन्मत्तकी तरह गाता और नाचता है, क्योंकि वह जन-मत के प्रति उदासीन रहता है।

"

खं वायुमग्नि सलिलं महीं चज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्‌ ।

सरित्समुद्रांश्व हरे: शरीरंयत्कि च भूतं प्रणमेदनन्य: ॥

४१॥

खम्‌--शून्य; वायुमू--वायु; अग्निमू--अग्नि; सलिलमू--जल; महीम्‌--पृथ्वी; च--तथा; ज्योतींषि--सूर्य, चन्द्रमा तथा अन्यदैवी प्रकाशमान पिंड; सत्त्वानि--सारे जीव; दिश:--दिशाएँ; द्रम-आदीन्‌--वृक्ष तथा अन्य अचर प्राणियों को; सरित्‌--नदियाँ; समुद्रान्‌ू--तथा समुद्र; च-- भी; हरेः-- भगवान्‌ हरि के; शरीरम्‌--शरीर को; यत्‌ किम्‌ च--जिसे भी; भूतम्‌--सूष्टजगत में; प्रणमेत्‌-- प्रणाम करना चाहिए; अनन्य:--भगवान्‌ से पृथक्‌ कुछ भी नहीं है

इस प्रकार सोचते हुएभक्त को चाहिए कि किसी भी वस्तु को भगवान्‌ कृष्ण से पृथक्‌ नहीं देखे।

शून्य, अग्नि,वायु, जल, पृथ्वी, सूर्य तथा अन्य नक्षत्र, सारे जीव, दिशाएँ, वृक्ष तथा अन्य पौधे, नदियाँ तथासमुद्र इनमें से भक्त को जिस किसी का भी अनुभव हो, उसे वह कृष्ण का अंश माने।

इस प्रकारसृष्टि के भीतर विद्यमान हर वस्तु को भगवान्‌ हरि के शरीर के रूप में देखते हुए भक्त को चाहिएकि भगवान्‌ के शरीर के सम्पूर्ण विस्तार के प्रति नमस्कार करे।

"

भक्ति: परेशानुभवो विरक्ति-रन्यत्र चैष त्रिक एककालः ।

प्रपद्यममानस्यथ यथाश्नतः स्थुस्‌तुष्टिः पुष्टि: क्षुदपायोउनुघासम्‌ ॥

४२॥

भक्ति:-- भक्ति; पर-ईश-- भगवान्‌ की; अनुभव: -- प्रत्यक्ष अनुभूति; विरक्ति:--विराग; अन्यत्र--अन्यत्र वस्तुओं से; च--तथा; एब: --यह; त्रिक:--तीन का समूह; एक-काल:--एक ही समय; प्रपद्ममानस्थ--शरणागत होने वाले के लिए; यथा--जिस तरह; अश्नतः--भोजन करने में व्यस्त; स्यु:--घटित होते हैं; तुष्टिः--तुष्टि; पुष्टिः--पोषण; क्षुतू-अपाय:-- भूख सेछुटकारा; अनु-घासम्‌- प्रत्येक कौर के साथ बढ़ती हुई।

जिस व्यक्ति ने भगवान्‌ की शरण ग्रहण कर ली है, उसके लिए भक्ति, भगवान्‌ का प्रत्यक्षअनुभव तथा अन्य वस्तुओं से विरक्ति--ये तीनों एक साथ बैसे ही घटित होते हैं, जिस तरहभोजन करने वाले व्यक्ति के लिए प्रत्येक कौर में आनन्द, पोषण तथा भूख से छुटकारा--येसभी एकसाथ और अधिकाधिक होते जाते हैं।

"

इत्यच्युताडिंघ्र भजतो<नुवृत्त्याभक्तिर्विरक्तिर्भगवत्प्रबोध: ।

भवन्ति वै भागवतस्य राजं-स्ततः परां शान्तिमुपैति साक्षात्‌ ॥

४३॥

इति--इस प्रकार; अच्युत--अच्युत भगवान्‌ के; अड्प्रिमू--चरणों को; भजतः--पूजा करने वाले को; अनुवृत्त्या--निरन्तरअभ्यास द्वारा; भक्ति:--भक्ति; विरक्ति:--विराग; भगवत्‌-प्रबोध:-- भगवान्‌ का ज्ञान; भवन्ति-- प्रकट करते हैं; वै--निस्सन्देह; भागवतस्य--भक्त के लिए; राजनू--हे राजा निमि; ततः--तब; पराम्‌ शान्तिम्‌-- परम शान्ति; उपैति-- प्राप्त करताहै; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष

हे राजनू, जो भक्त अच्युत भगवान्‌ के चरणकमलों की पूजा सतत प्रयततशील रहकर करताहै, वह अचल भक्ति, विरक्ति तथा भगवान्‌ का अनुभवगम्य ज्ञान प्राप्त करता है।

इस प्रकारसफल भगवद्भक्त को परम आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त होती है।

"

श्रीराजोबाचअथ भागवतं ब्रूत यद्धर्मों याहशो नृणाम्‌ ।

यथाचरति यहूते यैलिड्रैर्भगवत्प्रिय: ॥

४४॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; अथ--इसके बाद; भागवतम्‌-- भगवान्‌ के भक्त के विषय में; ब्रूत--कृपया मुझे बतायें;यतू-धर्म:--जो धर्म है; याहशः--जिस तरह का; नृणाम्‌--मनुष्यों में से; यथा--कैसे; आचरति--आचरण करता है; यत्‌--जो; बूते--बोलता है; यैः--जिस; लिड्लैः--दृश्य लक्षणों के द्वारा; भगवत््‌-प्रिय: -- भगवान्‌ का प्रिय ( कहलाता है )

महाराज निमि ने कहा : अब कृपया मुझे भगवद्भक्तों के विषय में विस्तार से बतलायें।

वेकौन से सहज लक्षण हैं, जिनके द्वारा मैं अत्यन्त बढ़े-चढ़े, मध्यम स्तर के तथा नवदीक्षित भक्तोंमें अन्तर कर सकूँ ? वैष्णव के लाक्षणिक धार्मिक कर्तव्य क्‍या हैं? और वह कैसे बोलता है?आप विशेष रूप से उन लक्षणों तथा गुणों का वर्णन करें, जिनसे वैष्णवजन भगवान्‌ के प्रियबनते हैं।

"

श्रीहविरुवाचसर्वभूतेषु यः पश्येद्धगवद्धावमात्मन: ।

भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तम: ॥

४५॥

श्री-हवि: उवाच-- श्री हविर्‌ ने कहा; सर्व-भूतेषु--सारे पदार्थों में ( पदार्थ, आत्मा तथा पदार्थ एवं आत्मा का मेल ); यः--जोकोई; पश्येत्‌ू--देखता है; भगवत्‌-भावम्‌-- भगवद्भक्ति में लगे रहने की क्षमता; आत्मन:--परमात्मा का, भौतिक जीवन-बोधसे परे अध्यात्म; भूतानि--सारे जीवों को; भगवति-- भगवान्‌ में; आत्मनि--समस्त जगत का मूल सार; एष:--यह; भागवत-उत्तमः--भक्ति में बढ़ा-चढ़ा व्यक्ति |

श्री हविर्‌ ने कहा : सर्वाधिक उत्कृष्ट भक्त हर वस्तु के भीतर समस्त आत्माओं के आत्माभगवान्‌ कृष्ण को देखता है।

फलस्वरूप वह हर वस्तु को भगवान्‌ से सम्बन्धित देखता है औरयह समझता है कि प्रत्येक विद्यमान वस्तु भगवान्‌ के भीतर नित्य स्थित है।

"

ईस्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च ।

प्रेममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यम: ॥

४६॥

ईश्वरे-- भगवान्‌ के प्रति; तत्‌ू-अधीनेषु--कृष्णभावनामृत के प्रति समर्पित लोगों को; बालिशेषु -- अज्ञानी या नवदीक्षितों केप्रति; द्विषत्सु--कृष्ण तथा उनके भक्तों से द्वेष रखने वालों के प्रति; च--तथा; प्रेम--प्रेम; मैत्री--मित्रता; कृपा--दया;उपेक्षा:--उपेक्षा; य:--जो कोई; करोति--करता है; सः--वह; मध्यम:--द्वितीय कोटि का भक्त |

द्वितीय कोटि का भक्त, जो मध्यम अधिकारी कहलाता है, भगवान्‌ को अपना प्रेम अर्पितकरता है, वह भगवान्‌ के समस्त भक्तों का निष्ठावान मित्र होता है, वह अज्ञानी व्यक्तियों पर दयाकरता है जो अबोध है और उनकी उपेक्षा करता है, जो भगवान्‌ से द्वेष रखते हैं।

"

अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते ।

न तद्धक्तेषु चान्येषु स भक्त: प्राकृतः स्मृतः: ॥

४७॥

अर्चायाम्‌--अर्चा विग्रह के; एब--निश्चय ही; हरये-- भगवान्‌ हरि को; पूजाम्‌--पूजा; य:--जो; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक;ईहते--लगाता है; न--नहीं; तत्‌ू--कृष्ण के; भक्तेषु-- भक्तों के प्रति; च--तथा; अन्येषु--सामान्य लोगों के प्रति; सः--वह;भक्त: प्राकृः--भौतिकतावादी भक्त; स्मृतः--कहलाता है।

जो भक्त मन्दिर में अर्चाविग्रह की श्रद्धापूर्वक पूजा में लगा रहता है, किन्तु अन्य भक्तों केप्रति या सामान्य जनता के प्रति उच्चित रीति का आचरण नहीं करता, वह प्राकृत भक्त अर्थात्‌भौतिकतावादी भक्त कहलाता है और निम्नतम पद पर स्थित माना जाता है।

"

गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान्यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।

विष्णोर्मायामिदं पश्यन्स वै भागवतोत्तम: ॥

४८ ॥

गृहीत्वा--स्वीकार करके; अपि--यद्यपि; इन्द्रिय:--इन्द्रियों के द्वारा; अर्थानू--इन्द्रिय-विषयों को; यः--जो; न द्वेष्टि--ईर्ष्यानहीं करता; न हृष्यति--हर्षित नहीं होता; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णु की; मायाम्‌--माया को; इृदम्‌--इस भौतिक ब्रह्माण्ड को;पश्यन्‌--देखते हुए; सः--वह; बै--निस्सन्देह; भागवत-उत्तम:--प्रथम कोटि का भक्त |

इन्द्रिय-विषयों में लगे रहकर भी, जो इस सम्पूर्ण जगत को भगवान्‌ विष्णु की शक्ति केरूप में देखता है, वह न तो विकर्षित होता है, न हर्षित।

वह निस्सन्देह, भक्तों में सबसे महान्‌होता है।

"

"text":"देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्धयतर्षकृच्छै: ।

संसारधर्मैरविमुहामान: स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधान: ॥

४९॥

देह--शरीर की; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; प्राण--प्राण-वायु; मन:--मन; धियाम्‌--तथा बुद्धि; यः--जो; जन्म--जन्म; अप्यय-- क्षय; क्षुत्‌-- भूख; भय-- डर; तर्ष--प्यास; कृच्छै:--तथा थकान से; संसार-- भौतिक जीवन के; धर्म: --अभिन्न गुणों से; अविमुदह्ामान: --मोहित नहीं; स्मृत्या--स्मृति के कारण; हरेः-- भगवान्‌ हरि के; भागवत-प्रधान: --भक्तों में सर्वप्रमुख |

इस भौतिक जगत में मनुष्य का भौतिक शरीर सदैव जन्म तथा मृत्यु के अधीन रहता है।

इसी तरह प्राण को भूख तथा प्यास सताते हैं, मन सदैव चिन्तित रहता है, बुद्धि उसके लिए लालायित रहती है, जिसे प्राप्त नहीं किया जा सकता और ये सारी इन्द्रियाँ भौतिक प्रकृति से निरन्तर संघर्ष करते रहने से अन्ततः थक जाती हैं।

जो व्यक्ति भौतिक जगत के अपरिहार्य दुखों से मोहग्रस्त नहीं होता और भगवान्‌ के चरणकमलों के स्मरण मात्र से उन सबसे अलग रहता है, उसे ही भागवत-प्रधान अर्थात्‌ भगवान्‌ का अग्रणी भक्त कहा जाता है।

" न कामकर्मबीजानां यस्य चेतसि सम्भव: ।

वासुदेवैकनिलय: स वै भागवतोत्तम: ॥

५०॥

न--कभी नहीं; काम--काम-वासना; कर्म--सकाम कर्म; बीजानामू--या भौतिक लालसाओं के, जो सकाम कर्म के बीजरूप हैं; यस्थ--जिसका; चेतसि--मन में ; सम्भव:--ऊपर उठने का अवसर; वासुदेव-एक-निलय: --जिसकी एकमात्र शरणभगवान्‌ वासुदेव हों उसके लिए; सः--वह; बै--निस्सन्देह; भागवत-उत्तम:--प्रथम श्रेणी का भक्त है |

जिसने एकमात्र भगवान्‌ वासुदेव की शरण ले रखी है, वह उन सकाम कर्मों से मुक्त होजाता है, जो भौतिक काम-वासना पर आधारित हैं।

वस्तुतः जिसने भगवान्‌ के चरणकमलों कीशरण ले रखी है, वह भौतिक इन्द्रियतृप्ति को भोगने की इच्छा से भी मुक्त हो जाता है।

उसकेमन में यौन-जीवन, सामाजिक प्रतिष्ठा और धन का भोग करने की योजनाएँ उत्पन्न नहीं होसकतीं।

इस प्रकार वह भागवतोत्तम अर्थात्‌ सर्वोच्च पद को प्राप्त भगवान्‌ का शुद्ध भक्त मानाजाता है।

"

न यस्य जन्मकर्म भ्यां न वर्णाश्रमजातिभि: ।

सज्तेस्मिन्नहंभावो देहे वै स हरे: प्रियः ॥

५१॥

न--नहीं; यस्य--जिसका; जन्म--अच्छे जन्म से; कर्मभ्याम्‌--या अच्छे कार्यो से; न--नहीं; वर्ण-आश्रम--वृत्तिपरक नियमोंया धार्मिक कर्तव्य में हढ़ रहकर; जातिभि:--अथवा किसी जाति से सम्बन्धित होने से; सजजते--अपने को जोड़ता है;अस्मिनू--इस; अहम्‌-भाव: --अहंकार की भावना; देहे--शरीर में; बै--निस्सन्देह; सः--वह; हरेः-- भगवान्‌ हरि को;प्रिय:--प्रिय है |

उच्च कुल में जन्म तथा तपोमय एवं पुण्यकर्मो का निष्पादन निश्चय ही किसी को अपनेऊपर गर्व जताने वाले हैं।

इसी तरह, यदि समाज में किसी को प्रतिष्ठा मिलती है, क्योंकि उसकेमाता-पिता वर्णाश्रम की सामाजिक प्रणाली में अत्यधिक आदरित हैं, तो वह और भी ज्यादापागल हो जाता है।

किन्तु यदि इतने उत्तम भौतिक गुणों के उपरांत भी कोई व्यक्ति अपने भीतरतनिक भी गर्व का अनुभव नहीं करता, तो उसे भगवान्‌ का सर्वाधिक प्रिय सेवक माना जानाचाहिए।

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न यस्य स्वः पर इति वित्तेष्वात्मनि वा भिदा ।

सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तम: ॥

५२॥

न--नहीं है; यस्य--जिसका; स्वः पर: इति--अपना तथा पराया; वित्तेषु--अपनी सम्पत्ति के विषय में; आत्मनि--अपने शरीरके विषय में; वा-- अथवा; भिदा--द्वैत के रूप में सोचते हुए; सर्व-भूत--सारे जीवों के प्रति; सम:--समान; शान्तः--शान्त;सः--वह; बै--निस्सन्देह; भागवत-उत्तम:--भ क्तों में श्रेष्ठ |

जब भक्त उस स्वार्थमयी धारणा को त्याग देता है, जिससे मनुष्य सोचता है कि 'यह मेरीसम्पत्ति है और वह पराई है' तथा जब वह अपने ही भौतिक शरीर से सम्बद्ध आनन्द अथवाअन्यों की असुविधाओं के प्रति उदासीनता से कोई वास्ता नहीं रखता, तो वह पूरी तरह शान्ततथा तुष्ट हो जाता है।

वह अपने आपको उन जीवों में से एक मानता है, जो समान रूप सेभगवान्‌ के भिन्नांश हैं।

ऐसा तुष्ट वैष्णव भक्ति के सर्वोच्च आदर्श पर स्थित माना जाता है।

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त्रिभुवनविभवहेतवेउप्यकुण्ठ-स्मृतिरजितात्मसुरादिभिर्विमृग्यात्‌ ।

न चलति भगवत्पदारविन्दा-क्लवनिमिषार्धमपि यः स वैष्णवाछय: ॥

५३॥

त्रि-भुवन-- भौतिक ब्रह्माण्ड के तीनों लोकों के; विभव-हेतवे--ऐश्वर्य हेतु; अपि-- भी; अकुण्ठ-स्मृति:--जिसकी स्मृतिअविचल है; अजित-आत्म--अपराजेय भगवान्‌ ही जिसकी आत्मा है उसकी; सुर-आदिभि:--देवताओं तथा अन्यों द्वारा;विमृग्यात्‌--खोजे जाते हैं; न चलति--चला नहीं जाता; भगवत्‌-- भगवान्‌ के ; पद-अरविन्दात्‌ू--चरणकमलों से; लव--एकसेकंड के ८/४५ वें भाग के; निमिष--अथवा उससे तीन गुना का; अर्धमू--आधा; अपि-- भी; यः -- जो; सः--वह; वैष्णव-अछय:ः-कभगवान्‌ विष्णु के भक्तों में सर्वश्रेष्ठ |

भगवान्‌ के चरणकमलों की खोज ब्रह्मा तथा शिव जैसे बड़े बड़े देवताओं द्वारा भी कीजाती है, जिन्होंने भगवान्‌ को अपना प्राण तथा आत्मा स्वीकार कर रखा है।

भगवान्‌ का शुद्धभक्त उन चरणकमलों को किसी भी अवस्था में नहीं भूलता।

वह भगवान्‌ के चरणकमलों कीशरण एक क्षण के लिए भी नहीं--आधे क्षण के लिए भी नहीं--छोड़ पाता भले ही बदले मेंउसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का शासन तथा ऐ श्वर्य-भोग का वर क्यों न मिले।

भगवान्‌ के ऐसे भक्त कोवैष्णवों में सर्वश्रेष्ठ मानना चाहिए।

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भगवत उरुविक्रमाड्प्रिशाखा-नखमणिचन्द्रिकया निरस्ततापे ।

हृदि कथमुपसीदतां पुनः सप्रभवति चन्द्र इवोदितेडकताप: ॥

५४॥

भगवतः--भगवान्‌ का; उरु-विक्रम--महान्‌ बीरतापूर्ण कार्य कर चुका; अड्घ्रि--चरणकमलों के; शाखा--अँगुलियों के;नख--नाखूनों के; मणि--मणियों सहश; चन्द्रिकबा--चाँदनी द्वारा; निरस्त-तापे-- पीड़ा के दूर हो जाने पर; हृदि--हृदय में;कथम्‌--किस तरह भला; उपसीदताम्‌--पूजा करने वालों को; पुनः--फिर से; सः--वह पीड़ा; प्रभवति--अपना प्रभावदिखाती है; चन्द्रे-- चन्द्रमा के; इब--सहृश; उदिते--उदय होने पर; अर्क --सूर्य का; ताप:ः--जलती गर्मी |

जो लोग भगवान्‌ की पूजा करते हैं, उनके हृदयों को भौतिक कष्ट रूपी आग भला किसतरह जलाती रह सकती है? भगवान्‌ के चरणकमलों ने अनेक वीरतापूर्ण कार्य किये हैं औरउनके पाँव की अँगुलियों के नाखून मूल्यवान मणियों सहश लगते हैं।

इन नाखूनों से निकलनेवाला तेज चन्द्रमा की शीतल चाँदनी सद्ृश है, क्योंकि वह शुद्ध भक्त के हृदय के भीतर के कष्टको उसी तरह दूर करता है, जिस तरह चन्द्रमा की शीतल चाँदनी सूर्य के प्रखर ताप से छुटकारादिलाती है।

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विसृजति हृदयं न यस्य साक्षा-द्धरिरवशाभिहितोप्यघौघनाश: ।

प्रणयरसनया धृताड्प्रिपदा:स भवति भागवतप्रधान उक्त: ॥

५५॥

विसृजति--त्याग देता है; हृदयम्‌--हृदय को; न--कभी नहीं; यस्य--जिसका; साक्षात्‌--स्वयं; हरि:ः-- भगवान्‌ हरि;अवश--सहसा; अभिहित:--कहलाने वाला; अपि--यद्यपि; अध--पापों के; ओघ--समूह; नाश: --नाश करने वाला;प्रणय--प्रेम की; रसनया--रस्सियों द्वारा; धृत--पकड़े; अद्धघ्रि-पद्मः--उनके चरणकमल; सः--वह; भवति--है; भागवत-प्रधान:--सर्व श्रेष्ठ भक्त; उक्त:--कहा गया।

भगवान्‌ बद्धजीवों के प्रति इतने दयालु हैं कि यदि वे जीव अनजाने में भी उनका नाम लेकरपुकारते हैं, तो भगवान्‌ उनके हृदयों में असंख्य पापों को नष्ट करने के लिए उद्यत रहते हैं।

इसलिए जब उनके चरणों की शरण में आया हुआ भक्त प्रेमपूर्वक कृष्ण के पवित्र नाम काकीर्तन करता है, तो भगवान्‌ ऐसे भक्त के हृदय को कभी भी नहीं छोड़ पाते।

इस तरह जिसनेभगवान्‌ को अपने हृदय के भीतर बाँध रखा है, वह भागवत-प्रधान अर्थात्‌ अत्यधिक उच्चस्थभक्त कहलाता है।

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