← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची

अध्याय पच्चीसवाँ: प्रकृति और उससे परे के तीन तरीके

श्रीभगवानुवाचगुणानामसम्मिश्राणां पुमान्येन यथा भवेत्‌ ।तन्मे पुरुषवर्येदमुपधारय शंसतः ॥

१॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; गुणानाम्‌-प्रकृति के गुणों के; असम्मिश्राणाम्‌-शुद्ध अवस्था वाले; पुमानू-व्यक्ति;येन--जिस गुण से; यथा--कैसे; भवेत्‌--बन जाता है; तत्‌--वह; मे--मुझसे; पुरुष-वर्य --हे पुरुषों में श्रेष्ठ; इदम्‌--यह;उपधारय--समझने का प्रयत्त करो; शंसतः --मेंरे द्वारा कहा हुआ

भगवान्‌ ने कहा : हे पुरुष- श्रेष्ठ, मैं तुमसे वर्णन करूँगा कि जीव किस तरह किसी भौतिकगुण की संगति से विशेष स्वभाव प्राप्त करता है। तुम उसे सुनो।

शमो दमस्तितिक्षेक्षा तपः सत्यं दया स्मृति: ।तुष्टिस्त्यागोउस्पूहा श्रद्धा हीर्दयादिः स्वनिर्वृति: ॥

२॥

काम ईहा मदस्तृष्णा स्तम्भ आशीर्भिदा सुखम्‌ ।मदोत्साहो यशःप्रीतिर्हास्यं वीर्य बलोच्यम: ॥

३॥

क्रोधो लोभोनृतं हिंसा याच्ञा दम्भ: कलम: कलि: ।शोकमोहीौ विषादार्ती निद्राशा भीरनुद्यम: ॥

४॥

सत्त्वस्य रजसश्चैतास्तमसश्चानुपूर्वशः ।वृत्तयो वर्णितप्राया: सन्निपातमथो श्रूणु ॥

५॥

शमः--मन का संयम; दमः--इन्द्रिय संयम; तितिक्षा--सहिष्णुता; ईक्षा--संकल्प; तप: --अपने नियत कार्य का हढ़तापूर्वकपालन; सत्यम्‌--सत्य; दया--दया; स्मृतिः-- भूत तथा भविष्य का अवलोकन; तुष्टिः--सन्तोष; त्याग: --उदारता; अस्पृहा--इन्द्रियतृष्ति से विरक्ति; श्रद्धा--( गुरु तथा अन्य प्रामाणिक दिद्वानों के प्रति ) श्रद्धा; हीः--लज्जा ( अनुचित कार्य से ); दया-आदिः--दान, सरलता, दीनता आदि; स्व-निर्व॒तिः--भीतर से आनन्द मनाने; काम:-- भौतिक इच्छा; ईहा--उद्योग, प्रयत्न;मदः--घमंड; तृष्ण-- असंतोष; स्तम्भ: --मिथ्या गर्व; आशी:-- भौतिक लाभ के लिए देवी-देवताओं से प्रार्थना; भिदा--विलगाववादी प्रवृत्ति; सुखम्‌--इन्द्रियतृप्ति; मद-उत्साह:--नशे पर आधारित हिम्मत; यश: -प्रीति:-- प्रशंसा का भूखा;हास्यम्‌--हँसी उड़ाने में रत; वीर्यम्‌ू--अपनी शक्ति का प्रचार करने वाला; बल-उद्यम:--अपने बलबूते पर कार्य करने वाला;क्रोध:--असह्ाय क्रोध; लोभ:--लालच; अनृतम्‌--असत्य भाषण ( शास्त्र विरुद्ध बोलना ); हिंसा--दुश्मनी; याच्ञा--याचनाकरना; दम्भ:--दिखावा; कलम: --थकान; कलि:--कलह; शोक-मोहौ--शोक तथा मोह; विषाद-आर्ती --दुख तथा झूठीदीनता; निद्रा--नींद, अँगडाई; आशा--झूठी आशा; भी:-- भय; अनुद्यम:-- प्रयास का अभाव; सत्त्वस्थ--सतोगुण का;रजसः--रजोगुण का; च--तथा; एता:--ये; तमसः--तमोगुण का; च--तथा; आनुपूर्वश:--एक के बाद दूसरा; वृत्तय:--कार्य; वर्णित--कहे गये; प्राया:--अधिकांशत:; सन्निपातम्‌ू--इन सबों का मेल; अथो--अब; श्रूणु--सुनोमन तथा इन्द्रिय संयम, सहिष्णुता, विवेक, नियत कर्म का पालन, सत्य, दया, भूत तथाभविष्य का सतर्क अध्ययन, किसी भी स्थिति में सनन्‍्तोष, उदारता, इन्द्रियतृप्ति का परित्याग, गुरूमें श्रद्धा, अनुचित कर्म करने पर व्यग्रता, दान, सरलता, दीनता तथा अपने में संतोष--येसतोगुण के लक्षण हैं।

भौतिक इच्छा, महान्‌ उद्योग, मद, लाभ में भी असन्तोष, मिथ्याअभिमान, भौतिक उन्नति के लिए प्रार्थना, अन्यों से अपने को विलग तथा अच्छा मानना,इन्द्रियतृप्ति, लड़ने की छटपटाहट, अपनी प्रशंसा सुनने की चाह, अन्यों का मजाक उड़ाने कीप्रवृत्ति, अपने बल का विज्ञापन तथा अपने बल के द्वारा अपने कर्मों को सही बताना--येरजोगुण के लक्षण हैं। असहा क्रोध, कंजूसी, शास्त्रीय आधार के बिना बोलना, उग्र घृणा,परोपजीवन, दिखावा, अति थकान, कलह, शोक, मोह, दुख, उदासी, अत्यधिक निद्रा, झूठीआशा, भय तथा आलस्य--ये तमोगुणी लक्षण हैं। अब इन तीनों के मिश्रण के बारे में सुनो।

सन्निपातस्त्वहमिति ममेत्युद्धव या मतिः ।व्यवहार: सन्निपातो मनोमात्रेन्द्रियासुभि: ॥

६॥

सन्निपात:--गुणों का मिश्रण; तु--तथा; अहम्‌ इति--मैं; मम इति-- मेरा '; उद्धव--हे उद्धव; या--जो; मतिः--मनोवृत्ति;व्यवहार:--सामान्य कार्यकलाप; सन्निपात:--संयोग, मिश्रण; मन:--मन; मात्रा--अनुभूति के पदार्थी; इन्द्रिय--इन्द्रियों;असुभिः--तथा प्राण-वायुओं द्वारा

हे उद्धव, 'मैं' तथा 'मेरा' मनोवृत्ति में तीनों गुणों का संमिश्रण रहता है। इस जगत केसामान्य व्यवहार, जो मन, अनुभूति के विषयों ( तन्मात्राओं ), इन्द्रियों तथा शरीर की प्राण-वायुद्वारा सम्पन्न किये जाते हैं, भी गुणों के सम्मिश्रण पर आधारित होते हैं।

धर्मे चार्थ च कामे च यदासौ परिनिष्ठितः ।गुणानां सन्निकर्षोयं श्रद्धारतिधनावह: ॥

७॥

धर्मे-- धर्म में; च--तथा; अर्थ--आर्थिक विकास में; च--तथा; कामे--इन्द्रियतृप्ति में; च--तथा; यदा--जब; असौ--यहजीव; परिनिष्ठित:--स्थिर है; गुणानाम्‌-प्रकृति के गुणों के; सन्निकर्ष:--मिश्रण में; अयम्‌--यह; श्रद्धा-- श्रद्धा; रति--यौनभोग; धन--तथा धन; आवह:--जिसे हर एक लाता है।

जब मनुष्य धर्म, अर्थ तथा काम में अपने आप को लगाता है, तो उसके उद्योग से प्राप्तश्रद्धा, सम्पत्ति तथा यौन-सुख प्रकृति के तीनों गुणों की अन्योन्य क्रिया को प्रदर्शित करते हैं।

प्रवृत्तिलक्षणे निष्ठा पुमान्यर्हि गृहाश्रमे ।स्वधर्मे चानु तिष्ठेत गुणानां समितिर्हि सा ॥

८॥

प्रवृत्ति-- भौतिक भोग के मार्ग के; लक्षणे--लक्षण वाले में; निष्ठा--समर्पण; पुमान्‌--मनुष्य ; यहिं-- जब; गृह-आश्रमे --पारिवारिक जीवन में; स्व-धर्मे--नियत कार्यों में; च--तथा; अनु--बाद में; तिष्ठेत--खड़ा रहता है; गुणानाम्‌ू-गुणों की;समिति:--संयोग, मेल; हि--निस्सन्देह; सा--यह

जब मनुष्य पारिवारिक जीवन में अनुरक्त होने से इन्द्रियतृप्ति चाहता है और इसके'फलस्वरूप जब वह धार्मिक तथा वृत्तिपरक कार्यो में स्थित हो जाता है, तो प्रकृति के गुणों कामिश्रण प्रकट होता है।

पुरुषं सत्त्वसंयुक्तमनुमीयाच्छमादिभि: ।कामादिभी रजोयुक्त क्रोधाद्ैस्तमसा युतम्‌ ॥

९॥

पुरुषम्‌-व्यक्ति; सत्त्व-संयुक्तम्‌-सतोगुण से युक्त; अनुमीयात्‌--निकाला जा सकता है; शम-आदिभि:--इन्द्रिय-संयम केगुणों आदि से; काम-आदिभि: --विषय-वासना आदि से; रजः-युक्तम्‌--रजोगुणी व्यक्ति; क्रोध-आद्यै:--क्रोध इत्यादि से;तमसा--तमोगुण से; युतम्‌-युक्त |

आत्मसंयम जैसे गुणों को प्रदर्शित करने वाला व्यक्ति मुख्यतया सतोगुणी माना जाता है।इसी तरह रजोगुणी व्यक्ति अपनी विषय-वासना से पहचाना जाता है तथा तमोगुणी व्यक्ति क्रोधजैसे गुण से पहचाना जाता है।

यदा भजति मां भकत्या निरपेक्ष: स्वकर्मभि: ।त॑ सत्त्वप्रकृतिं विद्यात्पुरुषं स्त्रियमिव वा ॥

१०॥

यदा--जब; भजति--पूजा करता है; माम्‌--मेरी; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; निरपेक्ष:--फल की परवाह न करने वाला; स्व-कर्मभि:--अपने नियत कार्यो से; तम्‌--उसको; सत्त्व-प्रकृतिमू--सतोगुणी स्वभाव वाला व्यक्ति; विद्यात्‌--समझे; पुरुषम्‌--पुरुष को; स्त्रियम्‌--स्त्री को; एब-- भी; वा--अथवा।

कोई व्यक्ति, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, यदि अपने नियत कार्यो को बिना किसी आसक्तिके मुझे अर्पित करते हुए मेरी पूजा करता है, तो वह सतोगुणी समझा जाता है।

यदा आशिष आशास्य मां भजेत स्वकर्मभिः ।त॑ रज:प्रकृतिं विद्यात्‌ हिंसामाशास्य तामसम्‌ ॥

११॥

यदा--जब; आशिष: --आशीर्वाद; आशास्य--की आशा से; माम्‌--मुझको; भजेत--पूजता है; स्व-कर्मभि:--अपने कार्योंसे; तम्‌--उसको; रज:-प्रकृतिम्‌ू--रजोगुणी व्यक्ति; विद्यात्‌ू--समझे; हिंसामू--हिंसा; आशास्य--की आशा करते हुए;तामसमू्‌--तमोगुणी व्यक्ति

जब कोई व्यक्ति भौतिक लाभ पाने की आशा से अपने नियत कर्मों द्वारा मेरी पूजा करताहै, उसका स्वभाव रजोगुणी समझना चाहिए और जब कोई व्यक्ति अन्यों के साथ हिंसा करनेकी इच्छा से मेरी पूजा करता है, वह तमोगुण में स्थित होता है।

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा जीवस्य नैव मे ।चित्तजा यैस्तु भूतानां सज्ञमानो निबध्यते ॥

१२॥

सत्त्वम्‌--सतोगुण; रज: --रजोगुण; तम: -- तमोगुण; इति--इस प्रकार; गुणा:--गुण; जीवस्य--आत्मा से सम्बन्धित; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; मे-- मुझको; चित्त-जा:--मन के भीतर प्रकट; यैः--जिन गुणों से; तु--तथा; भूतानाम्‌ू-- भौतिकप्राणियों का; सज्ञमान:--अनुरक्त होकर; निबध्यते--बाँधा जाता है।प्रकृति के तीनों गुण--सतो, रजो तथा तमोगुण--जीव को तो प्रभावित करते हैं, मुझेनहीं।

उसके मन में प्रकट होकर ये जीव को भौतिक शरीरों तथा अन्य उत्पन्न वस्तुओं से अनुरक्तहोने के लिए प्रेरित करते हैं। इस तरह जीव बँध जाता है।

यदेतरौ जयेत्सत्त्वं भास्वरं विशदं शिवम्‌ ।तदा सुखेन युज्येत धर्मज्ञानादिभि: पुमान्‌ ॥

१३॥

यदा--जब; इतरौ--अन्य दो; जयेत्‌--जीत लेता है; सत्त्वमू--सतोगुण; भास्वरम--प्रकाशमान; विशदम्‌--शुद्ध। शिवम्‌--शुभ; तदा--तब; सुखेन--सुख से; युज्येत--से युक्त होता है; धर्म--धर्म; ज्ञान--ज्ञान; आदिभि:--आदि अन्य गुणों से;पुमान्‌--मनुष्य |

जब प्रदीप्त शुद्ध तथा शुभ सतोगुण रजोगुण तथा तमोगुण पर हावी होता है, तो मनुष्यसुख, प्रतिभा, ज्ञान तथा अन्य गुणों से युक्त हो जाता है।

यदा जयेत्तम: सत्त्वं रज: सड़ं भिदा चलम्‌ ।तदा दुःखेन युज्येत कर्मणा यशसा थ्रिया ॥

१४॥

यदा--जब; जयेत्‌--जीत लेता है; तमः सत्त्वम्‌ू--तमो तथा सतोगुण; रज:--रजो; सड्न्‍रम्‌--अनुरक्ति ( का कारण ); भिदा--विलगाव; चलम्‌--तथा परिवर्तन; तदा--तब; दुःखेन--दुख से; युज्येत--युक्त हो जाता है; कर्मणा-- भौतिक कार्य से;यशसा--यश ( की इच्छा ) से; अ्िया--तथा एऐ श्वर्य से |

जब अनुरक्ति, विलगाव तथा कर्मठता का कारणरूप रजोगुण, तमोगुण तथा सतोगुण कोजीत लेता है, तो मनुष्य प्रतिष्ठा तथा सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए कठिन श्रम करने लगता है। इसतरह रजोगुण में मनुष्य चिन्ता तथा संघर्ष का अनुभव करता है।

यदा जयेद्‌ रज: सत्त्वं तमो मूढं लयं जडम्‌ ।युज्येत शोकमोहाभ्यां निद्रया हिंसयाशया ॥

१५॥

यदा--जब; जयेत्‌--जीत लेता है; रज: सत्त्वम्‌--रजोगुण तथा सतोगुण; तम:--तमोगुण; मूढम्‌--विवेक-शक्ति को खोचुका; लयम्‌--चेतना के ऊपर का आवरण; जडम्‌--उद्योग से विहीन; युज्येत--युक्त हो जाता है; शोक--शोक;मोहाभ्याम्‌--तथा मोह से; निद्रया--अत्यधिक सोने से; हिंसया--हिंसक गुणों से; आशया--तथा झूठी आशाओं से |

जब तमोगुण रजोगुण तथा सतोगुणों को जीत लेता है, तो वह मनुष्य की चेतना को ढकलेता है और उसे मूर्ख तथा जड़ बना देता है। तमोगुणी मनुष्य शोक तथा मोह में पड़ करअत्यधिक सोता है, झूठी आशा करने लगता है और अन्यों के प्रति हिंसा प्रदर्शित करता है।

यदा चित्तं प्रसीदेत इन्द्रियाणां च निर्वृति: ।देहेभयं मनोसड़ूं तत्सत्त्वं विद्धि मत्पदम्‌ ॥

१६॥

यदा--जब; चित्तम्‌--चेतना; प्रसीदेत--स्वच्छ हो जाती है; इन्द्रियाणाम्‌--इन्द्रियों की; च--तथा; निर्वृतिः--संसारी कार्यो कीसमाप्ति; देहे--शरीर में; अभयम्‌--निर्भयता; मन:--मन की; असड्रम्‌-विरक्ता; तत्‌--उसे; सत्त्वमू--सतोगुण; विर्द्धि--जानो; मत्‌--मेरा साक्षात्कार; पदम्‌--वह पद जिसमें इसे प्राप्त किया जा सके |

जब चेतना स्वच्छ हो जाती हैं और इन्द्रियाँ पदार्थ से विरक्त हो जाती हैं, तो मनुष्य भौतिकशरीर के भीतर निर्भीकता तथा भौतिक मन से विरक्ति का अनुभव करता है। इस स्थिति कोसतोगुण की प्रधानता समझना चाहिए क्योंकि इसमें मनुष्य को मेरा साक्षात्कार करने का अवसरमलिता है।

विकुर्वन्क्रियया चाधीरनिवृत्तिश्व चेतसाम्‌ ।गात्रास्वास्थ्यं मनो भ्रान्तं रज एतर्निशामय ॥

१७॥

विकुर्वनू--विकृत होकर; क्रियया--कर्म से; च--तथा; आ--तक; धी:ः--बुद्धि; अनिवृत्ति:--रोक न पाना; च--एवं;चेतसाम्‌--बुद्धि तथा इन्द्रियों की चेतनता पर; गात्र--कर्मेन्द्रियों का; अस्वास्थ्यम्‌--अस्वस्थ स्थिति; मनः--मन; भ्रान्तम्‌--अस्थिर; रज:--रजोगुण; एतै:--इन लक्षणों से; निशामय--तुम्हें समझना चाहिए।

तुम्हें रजोगुण का पता उसके लक्षणों से--अत्यधिक कर्म के कारण बुद्धि की विकृति,अनुभव करने वाली इन्द्रियों की संसारी वस्तुओं से अपने को छुड़ाने की असमर्थता, कर्मेन्द्रियोंकी अस्वस्थ दशा तथा मन की अस्थिरता से--लगा लेना चाहिये।

सीदच्चित्तं विलीयेत चेतसो ग्रहणेक्षमम्‌ ।मनो नष्ट तमो ग्लानिस्तमस्तदुपधारय ॥

१८॥

सीदत्‌--विफल हो जाती है; चित्तम्‌--चेतना की उच्चतर इन्द्रिय; विलीयेत--विलीन हो जाती है; चेतस:--जागरूकता;ग्रहणे--नियंत्रित करने में; अक्षमम्‌--अक्षम; मन:--मन; नष्टम्‌--विनष्ट; तम:--अज्ञान; ग्लानि:--विषाद; तम:--तमोगुण;तत्‌--वह; उपधारय--तुम समझो

जब मनुष्य की उच्चतर जागरूकता काम न दे और अन्त में लुप्त हो जाय तथा इस तरहमनुष्य अपना ध्यान एकाग्र न कर सके, तो उसका मन नष्ट हो जाता है और अज्ञान तथा विषादप्रकट करता है। तुम इस स्थिति को तमोगुण की प्रधानता समझो।

एथमाने गुणे सत्त्वे देवानां बलमेधते ।असुराणां च रजसि तमस्युद्धव रक्षसाम्‌ ॥

१९॥

एधमाने--वृद्धि करता हुआ; गुणे--गुण में; सत्त्वे--सतो; देवानामू--देवताओं की; बलम्‌ू--शक्ति; एधते--बढ़ती है;असुराणाम्‌-देवताओं के शत्रुओं की; च--तथा; रजसि--रजोगुण के बढ़ने पर; तमसि--तमोगुण के बढ़ने पर; उद्धव-हेउद्धव; रक्षसामू--मानव भक्षियों को |

सतोगुण की वृद्धि होने के साथ साथ, देवताओं की शक्ति भी बढ़ती जाती है। जब रजोगुणबढ़ता है, तो असुरगण प्रबल हो उठते हैं और तमोगुण की वृद्धि से हे उद्धव! अत्यन्त दुष्ट लोगोंकी शक्ति बढ़ जाती है।

सत्त्वाजागरणं विद्याद्रजसा स्वणमादिशेत्‌ ।प्रस्वापं तमसा जन्‍्तोस्तुरीयं त्रिषु सन्‍्ततम्‌ ॥

२०॥

सत्त्वात्‌ू-सतोगुण से; जागरणम्‌--जागरूक चेतना; विद्यात्‌--समझे; रजसा--रजोगुण से; स्वणम्‌--नींद; आदिशेत्‌ --सूचितहोती है; प्रस्वापम्‌--गहरी नींद; तमसा--तमोगुण से; जन्तो:--जीव की; तुरीयम्‌--चतुर्थ दिव्य अवस्था; त्रिषु--तीनों में;सन्ततम्‌-व्याप्त

यह जान लेना चाहिए कि जागरूक चैतन्यता सतोगुण से आती है, नींद रजोगुणी स्वप्नदेखने से तथा गहरी स्वप्नरहित नींद तमोगुण से आती है। चेतना की चतुर्थ अवस्था इन तीनों मेंव्याप्त रहती है और दिव्य होती है।

उपर्युपरि गच्छन्ति सत्त्वेन ब्राह्मणा जना: ।तमसाधोध आमुख्याद्रजसान्तरचारिण: ॥

२१॥

उपरि उपरि--ऊँचे और ऊँचे; गच्छन्ति--जाते हैं; सत्त्वेन--सतोगुण से; ब्राह्मणा:--वैदिक सिद्धान्तों के प्रति समर्पित लोग;जना:--ऐसे लोग; तमसा--तमोगुण द्वारा; अध: अध:--नीचे और नीचे; आ-मुख्यात्‌--सिर के बल; रजसा--रजोगुण द्वारा;अन्तर-चारिण: --मध्यवर्ती स्थितियों में रहते हुएवैदिक संस्कृति के प्रति समर्पित विद्वान पुरुष सतोगुण से उत्तरोत्तर उच्च पदों को प्राप्त होतेहैं। किन्तु तमोगुण मनुष्य को सिर के बल निम्न से निम्नतर जन्मों में गिरने के लिए बाध्य करता है। रजोगुण से मनुष्य मानव शरीरों में से होकर निरन्तर देहान्तरण करता रहता है।

सच्त्वे प्रलीना: स्वर्यान्ति नरलोक॑ रजोलया: ।तमोलयास्तु निरयं यान्ति मामेव निर्गुणा: ॥

२२॥

सत्त्वे--सतोगुण में; प्रलीना:--मरने वाले; स्वः--स्वर्ग; यान्ति--जाते हैं; नर-लोकम्‌--मनुष्य लोक में; रज:-लया:--रजोगुणमें मरने वाले; तमः-लयाः--तमोगुण में मरने वाले; तु--तथा; निरयम्‌--नरक में; यान्ति--जाते हैं; मामू--मुझ तक; एव--किन्तु; निर्गुणा:--समस्त गुणों से रहित हैं, जो |

जो लोग सतोगुण में रहते हुए इस जगत को छोड़ते हैं, वे स्वर्गलोक जाते हैं; जो रजोगुण मेंरहते हुए छोड़ते हैं, वे मनुष्य-लोक में रह जाते हैं और तमोगुण में मरने वाले नरक-लोक में जातेहैं। किन्तु जो प्रकृति के सारे गुणों से मुक्त हैं, वे मेरे पास आते हैं।

मदर्पणं निष्फलं वा सात्त्विकं निजकर्म तत्‌ ।राजसं फलसड्डूल्पं हिंसाप्रायादि तामसम्‌ ॥

२३॥

मतू-अर्पणम्‌--मुझे अर्पित; निष्फलम्‌--किसी फल-प्राप्ति की आशा के बिना सम्पन्न; वा--तथा; सात्त्विकम्‌--सतोगुण में;निज--अपना नियत कर्म मान कर; कर्म--कार्य; तत्‌--वह; राजसम्‌ू--रजोगुणी; फल-सड्जूल्पम्‌--किसीफल प्राप्ति कीआशा से सम्पन्न; हिंसा-प्राय-आदि--हिंसा, ईर्ष्या आदि के बिना सम्पन्न; तामसमू--तमोगुण में |

फल का विचार किये बिना जो कर्म मुझे अपिर्त किया जाता है, वह सतोगुणी माना जाताहै। फल की भोगेच्छा से सम्पन्न कर्म रजोगुणी है और हिंसा तथा ईर्ष्या से प्रेरित कर्म तमोगुणीहोता है।

कैवल्यं सात्त्विकं ज्ञानं रजो वैकल्पिकं च यत्‌ ।प्राकृतं तामसं ज्ञान मन्निष्ठं निर्गुणं स्मृतम्‌ ॥

२४॥

कैवल्यम्‌ू--केवल, परम; सात्त्विकम्‌ू--सतोगुणी; ज्ञानम्‌ू--ज्ञान; रज:--रजोगुण; वैकल्पिकम्‌--कई; च--तथा; यत्‌--जो;प्राकृतम्‌-- भौतिकतावादी; तामसम्‌--तमोगुणी; ज्ञानमू--ज्ञान; मत्‌-निष्ठम्‌--मुझमें एकाग्र चित्त; निर्गुणम्‌--दिव्य; स्मृतम्‌--माना जाता है।

परम ज्ञान सात्त्विक होता है; द्वैत पर आधारित ज्ञान राजसी होता है और मूर्खतापूर्णभौतिकतावादी ज्ञान तामसिक है। किन्तु जो ज्ञान मुझ पर आधारित होता है, वह दिव्य मानाजाता है।

बनं तु सात्त्विको वासो ग्रामो राजस उच्यते ।तामसं द्यूतसदन मन्निकेतं तु निर्गुणम्‌ ॥

२५॥

वनम्‌--जंगल; तु--जबकि; सात्त्विक:--सतोगुणी; वास:--आवास; ग्राम:--गाँव; राजसः--रजोगुणी; उच्यते--कहा जाताहै; तामसम्‌--तमोगुणी; द्यूत-सदनम्‌--जुआ खेलने का स्थान; मत्‌-निकेतम्‌--मेरा निवास; तु--लेकिन; निर्गुणम्‌-दिव्य |

जंगल का वास सतोगुणी, कस्बे का वास रजोगुणी, जुआ घर का वास तमोगुणी तथा मेरेधाम का वास दिव्य होता है।

सात्त्विक: कारकोसड़ी रागान्धो राजसः स्मृतः ।तामसः स्मृतिविश्रष्टो निर्गुणो मदपाभ्रय: ॥

२६॥

सात्त्विक:--सतोगुणी; कारक:--कर्म करने वाला, कर्ता; असड्री--अनुरक्ति से रहित; राग-अन्ध:--निजी इच्छा से अंधा हुआ;राजस:ः--रजोगुणी; स्मृत: --माना जाता है; तामस:ः--तमोगुणी; स्मृति--कौन क्या है इसकी स्मृति से; विश्रष्ट:--पतित;निर्गुण:--दिव्य; मत्‌-अपा भ्रय:--जिसने मेरी शरण ग्रहण कर ली है

आसक्तिरहित कर्ता सात्विक होता है; निजी इच्छा से अंधा हुआ कर्ता राजसी तथा अच्छे-बुरेभेद को पूरी तरह भुला देने वाला कर्ता तामसिक है। किन्तु जिस कर्ता ने मेरी शरण ले रखी है,वह प्रकृति के गुणों से परे माना जाता है।

सात्त्विक्याध्यात्मिकी श्रद्धा कर्मअ्रद्धा तु राजसी ।तामस्यधर्मे या श्रद्धा मत्सेवायां तु निर्गुणा ॥

२७॥

सात्त्विकी--सतोगुणी; आध्यात्मिकी --आध्यात्मिक; श्रद्धा-- श्रद्धा; कर्म--कर्म में; श्रद्धा-- श्रद्धा; तु--लेकिन; राजसी--रजोगुणी; तामसी--तमोगुणी; अधर्मे -- अधर्म में; या--जो; श्रद्धा-- श्रद्धा; मत्‌-सेवायाम्‌--मेरी भक्ति में; तु--लेकिन;निर्गुणा--दिव्य ।

आध्यात्मिक जीवन की दिशा में लक्षित श्रद्धा सात्विक होती है; सकाम कर्म पर आधारितश्रद्धा राजसी होती है और अधार्मिक कृत्यों में वास करने वाली श्रद्धा तामसी होती है किन्तु मेरीभक्ति में जो श्रद्धा की जाती है, वह शुद्ध रूप से दिव्य होती है।

पथ्यं पूतमनायस्तमाहार्य सात्त्विकं स्मृतम्‌ ।राजसं चेन्द्रियप्रेष्ठ तामसं चार्तिदाशुचि ॥

२८ ॥

पशथ्यम्‌--लाभप्रद; पूतम्‌--शुद्ध; अनायस्तम्‌--बिना कठिनाई के प्राप्त की गई; आहार्यमू--भोजन; सात्त्विकम्‌--सतोगुणी;स्मृतम्‌--माना जाता है; राजसम्‌--राजसी; च--तथा; इन्द्रिय-प्रेष्ठमू--इन्द्रियों को अत्यन्तप्रिय; तामसमू--तामसी; च--तथा;आर्ति-द--कष्टप्रद; अशुचि--अशुद्ध है

जो भोजन लाभप्रद, शुद्ध तथा बिना कठिनाई के उपलब्ध हो सके, वह सात्विक होता है;जो भोजन इन्द्रियों को तुरन्त आनन्द प्रदान करता हो, वह राजसी है और जो भोजन गन्दा हो तथाकष्ट उत्पन्न करने वाला हो, वह तामसी है।

सात्त्विकं सुखमात्मोत्थं विषयोत्थं तु राजसम्‌ ।तामसं मोहदैन्योत्थं निर्गुणं मदपाश्रयम्‌ ॥

२९॥

सात्त्विकम्‌--सतोगुणी; सुखम्‌--सुख; आत्म-उत्थम्‌--आत्मा से उत्पन्न; विषय-उत्थम्‌--इन्द्रिय-विषयों से उत्पन्न; तु--लेकिन;राजसम्‌--राजसी; तामसम्‌--तामसी; मोह--मोह; दैन्य--तथा दीनता से; उत्थम्‌--उत्पन्न; निर्गुणम्‌--दिव्य; मत्‌-अपाश्रयम्‌--मेरे भीतर

आत्मा से प्राप्त सुख सात्विक है; इन्द्रियतृप्ति पर आधारित सुख राजसी है और मोह तथादीनता पर आधारित सुख तामसी है। किन्तु मेरे भीतर पाया जाने वाला सुख दिव्य है।

द्रव्यं देश: फलं कालो ज्ञानं कर्म च कारक: ।श्रद्धावस्थाकृतिर्निष्ठा त्रैगुण्य: सर्व एव हि ॥

३०॥

द्रव्यमू--वस्तु; देश:--स्थान; फलमू--परिणाम; काल: --समय; ज्ञानमू--ज्ञान; कर्म--कर्म; च--तथा; कारक:--कर्ता ;श्रद्धा-- श्रद्धा; अवस्था-- चेतना की अवस्था; आकृति:--किस्म; निष्ठा--गन्तव्य; त्रै-गुण्यः--तीन गुणों वाला; सर्व:--येसारे; एव हि--निश्चय ही |

इसलिए भौतिक वस्तु, स्थान, कर्मफल, काल, ज्ञान, कर्म, कर्ता, श्रद्धा, चेतना की दशा,जीव योनि तथा मृत्यु के बाद गन्तव्य--ये सभी प्रकृति के तीन गुणों पर आश्नित हैं।

सर्वे गुणमया भावा: पुरुषाव्यक्तधिष्टिता: ।इृष्टे श्रुतं अनुध्यातं बुद्धया वा पुरुषर्षभ ॥

३१॥

सर्वे--समस्त; गुण-मया:--प्रकृति के गुणों से बने; भावा:--जीवन की स्थितियाँ; पुरुष--भोग करने वाले आत्मा द्वारा;अव्यक्त--तथा सूक्ष्म प्रकृति; थिष्टिता:--स्थापित तथा पालित; दृष्टमू--देखा हुआ; श्रुतम्‌--सुना हुआ; अनुध्यातम्‌--सोचाहुआ; बुद्धबा--बुद्धि के द्वारा; वा--अथवा; पुरुष-ऋषभ--हे पुरुष- श्रेष्ठ |

हे पुरुष-श्रेष्ठ, भौतिकवादिता की सारी दशाएँ भोक्ता आत्मा तथा भौतिक प्रकृति की अन्योन्य क्रिया से सम्बन्धित हैं। चाहे वे देखी हुई हों, सुनी हुई हों या मन के भीतर सोची-विचारी गई हों, वे किसी अपवाद के बिना प्रकृति के गुणों से बनी हुई होती हैं।

एता: संसृतयः पुंसो गुणकर्मनिबन्धना: ।येनेमे निर्जिता: सौम्य गुणा जीवेन चित्तजा: ।भक्तियोगेन मन्निष्ठो मद्भावाय प्रपद्यते ॥

३२॥

एता:--ये; संसृतय:ः --जगत के उत्पन्न पक्ष; पुंस:--जीव का; गुण--भौतिक गुण; कर्म--तथा कर्म से; निबन्धना:--सम्बद्ध;येन--जिससे; इमे--ये; निर्जिता:--जीते जाते हैं; सौम्य--हे भद्ग उद्धव; गुणा:--प्रकृति के गुण; जीवेन--जीव द्वारा; चित्त-जा:--मन से प्रकट होने वाले; भक्ति-योगेन-- भक्ति-विधि से; मत्‌ू-निष्ठ: --मेरे प्रति समर्पित; मत्‌-भावाय--मेरे प्रति प्रेम का;प्रपद्यते--पाता है |

हे सौम्य उद्धव, बद्ध जीवन की ये विभिन्न अवस्थाएँ प्रकृति के गुणों से पैदा हुए कर्म सेउत्पन्न होती हैं। जो जीव इन गुणों को, जो मन से प्रकट होते हैं, जीत लेता है, वह भक्तियोगद्वारा अपने आपको मुझे अर्पित कर देता है और इस तरह मेरे प्रति शुद्ध प्रेम प्राप्त करता है।

तस्माद्देहमिमं लब्ध्वा ज्ञानविज्ञानसम्भवम्‌ ।गुणसड़ूं विनिर्धूय मां भजन्तु विचक्षणा: ॥

३३॥

तस्मात्‌ू--इसलिए; देहम्‌ू--शरीर; इमम्‌--यह; लब्ध्वा--प्राप्त करके ; ज्ञान--शुष्क ज्ञान; विज्ञान--तथा अनुभूत ज्ञान का;सम्भवम्‌--उत्पत्ति-स्थान; गुण-सड्रम्‌-गुणों का सात्निध्य; विनिर्धूय--पूरी तरह धो डालना; माम्‌--मुझको; भजन्तु--पूजतेहैं; विचक्षणा: --अत्यन्त बुद्धिमान लोग

इसलिए इस मनुष्य जीवन को, जो पूर्ण ज्ञान विकसित करने की छूट देता है, प्राप्त करकेबुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वे अपने को प्रकृति के गुणों के सारे कल्मष से मुक्त कर लें औरएकमात्र मेरी भक्ति में लग जायें।

निःसड़ुो मां भजेद्विद्वानप्रमत्तो जितेन्द्रिय: ।रजस्तमश्वाभिजयेत्सत्त्वसंसेवया मुनि: ॥

३४॥

निःसड्ृः-- भौतिक संगति से मुक्त; माम्‌ू--मुझको; भजेत्‌--पूजा करें; विद्वानू--विद्वान व्यक्ति; अप्रमत्त:--जो मोहग्रस्त न हो;जित-इन्द्रियः--जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है; रज:--रजोगुण; तमः--तमोगुण; च--तथा; अभिजयेत्‌--जीते; सत्त्व-संसेवया--सतोगुण ग्रहण करके; मुनि:--मुनि, साधु

समस्त भौतिक संगति से मुक्त तथा मोह से मुक्त बुद्धिमान साधु को चाहिए कि अपनीइन्द्रियों का दमन करे और मेरी पूजा करे। उसे चाहिए कि सतोगुणी वस्तुओं में ही अपने कोलगाकर रजो तथा तमोगुणों को जीत ले।

सत्त्वं चाभिजयेद्युक्तो नैरपेक्ष्येण शान्तधीः ।सम्पद्यते गुणैर्मुक्तो जीवो जीव॑ विहाय माम्‌ ॥

३५॥

सत्त्वमू--सतोगुण; च-- भी; अभिजयेत्‌--जीते; युक्त:--भक्ति में लगा हुआ; नैरपेक्ष्येण--गुणों से अन्यमनस्क रहते हुए;शान्त--शान्त; धी:--बुद्धि वाला; सम्पद्यते--प्राप्त करता है; गुणैः--गुणों से; मुक्त:--मुक्त; जीव:--जीव; जीवम्‌-- अपनेबन्धन का कारण; विहाय--त्याग कर; माम्‌ू--मुझको |

तब भक्ति में स्थिर होकर साधु को चाहिए कि गुणों के प्रति अन्यमनस्क रह कर सतोगुणको जीत ले। इस तरह अपने मन में शान्त एवं प्रकृति के गुणों से मुक्त आत्मा, अपने बद्ध जीवनके कारण का ही परित्याग कर देता है और मुझे पा लेता है।

जीवो जीवविनिर्मुक्तो गुणैश्वाशयसम्भवै: ।मयैव ब्रह्मणा पूर्णो न बहिर्नान्तरश्चरेत्‌ ॥

३६॥

जीव:--जीव; जीव-विनिर्मुक्त:-- भौतिक जीवन की सूक्ष्म बद्धता से मुक्त हुआ; गुणैः --गुणों से; च--तथा; आशय-सम्भवैः--उसके मन में प्रकट हुए; मया--मेरे द्वारा; एबव--निस्सन्देह; ब्रह्मणा--पर ब्रह्म द्वारा; पूर्ण:--पूर्ण तथा सन्तुष्ट; न--नहीं; बहिः--बाहर ( इन्द्रियतृप्ति ); न--न तो; अन्तर: -- भीतर ( इन्द्रियतृप्ति की स्मृति ); चरेतू--विचरण करे।

मन की सूक्ष्म बद्धता तथा भौतिक चेतना से उत्पन्न गुणों से मुक्त हुआ जीव मेरे दिव्य स्वरूपका अनुभव करने से पूर्णतया तुष्ट हो जाता है। वह न तो बहिरंगा शक्ति में भोग को ढूँढता है, नही अपने मन में ऐसे भोग का चिन्तन या स्मरण करता है।

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