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अध्याय इकतीसवाँ: भगवान श्री कृष्ण का अदृश्य होना
11.31श्रीशुक उबाच अथ तत्रागमद्गह्मा भवान्या च सम॑ भव: ।
महेन्द्रप्रमुखा देवामुनयः सप्रजेश्वरा: ॥
\r\१॥
\r\ श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--तब; तत्र--वहाँ; आगमत् -- आया; ब्रह्मा-- ब्रह्मा; भवान्या--उनकीप्रेयसी भवानी; च--तथा; समम्--सहित; भव: --शिवजी; महा-इन्द्र-प्रमुखा: --इन्द्र इत्यार्दा; देवा:--देवतागण; मुनय:--मुनिगण; स--सहित; प्रजा-ईश्वराः--ब्रह्माण्ड की प्रजा के जनक |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तब शिव तथा उनकी प्रेयसी, मुनियों प्रजापतियों तथा इन्द्रादिदेवताओं सहित, ब्रह्माजी प्रभास आये ।
" पितरः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगा: ।
चारणा यक्षरक्षांसि किन्नराप्सरसो द्विजा: ॥
२॥
द्रष्ठकामा भगवतो निर्याणं परमोत्सुका: ।
गायन्तश्न गृणन्तश्च शौरे: कर्माणि जन्म च ॥
३॥
पितर:--पूर्वज; सिद्ध-गन्धर्वा:--सिद्ध तथा गन्धर्वगण; विद्याधर-महा-उरगा: --विद्याधर तथा बड़े बड़े सर्प; चारणा: --चारणजन; यक्ष-रक्षांसि--यक्ष तथा राक्षसगण; किन्नर-अप्सरसः--किन्नर तथा अप्सराएँ; द्विजा:--बड़े बड़े पक्षी; द्रष्ट-कामा:--देखने के इच्छुक; भगवतः -- भगवान् का; निर्याणम्-- प्रस्थान; परम-उत्सुका: --अत्यन्त उत्सुक; गायन्तः--गाते हुए;च--तथा; गृणन्त:-- प्रशंसा करते हुए; च--तथा; शौरे: --शौरि ( कृष्ण ) के; कर्माणि--कार्यकलाप; जन्म--जन्म; च--तथा
भगवान् का प्रस्थान देखने के लिए चारणों यक्षों, राक्षसों, किन्नरों, अप्सााओं तथा गरुड़के सम्बन्धियों समेत पितरगण, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर तथा बड़े बड़े सर्प भी आये ।
आते समयवे सभी व्यक्ति भगवान् शौरि ( कृष्ण ) के जन्म तथा कार्यो का विविध प्रकार से गायन औरमहिमा-वर्णन कर रहे थे ।
" ववृषु: पुष्पवर्षाणि विमानावलिभिर्नभ: ।
कुर्वन्तः सड्डु ल॑ं राजन्भकत्या परमया युताः ॥
४॥
ववृषु:--वर्षा की; पुष्प-वर्षाणि--फूलों की वर्षा; विमान--वायुयानों की; आवलिभि:--पंक्तियों द्वारा; नभ:--आकाश;कुर्वन्तः--बनाते हुए; स्लु लमू--पूरित; राजन्--हे राजा परीक्षित; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; परमया--दिव्य; युता:--से युक्त
हे राजा, उन्होंने आकाश में अपने अनेक विमानों की भीड़ लगाकर अत्यन्त भक्ति के साथ'फूलों की वर्षा की ।
" भगवान्पितामहं वीक्ष्य विभूतीरात्मनो विभु: ।
संयोज्यात्मनि चात्मानं पद्ानेत्रे न््यमीलयत् ॥
५॥
भगवान्-- भगवान्; पितामहम्--ब्रह्माजी को; वीक्ष्य--देख कर; विभूती:--शक्तिमान अंशों, देवताओं को; आत्मन:--निजी;विभु:--शक्तिमान भगवान्; संयोज्य--स्थिर करके; आत्मनि--अपने में; च--तथा; आत्मानम्--अपनी चेतना; पद्दा-नेत्रे--'कमलनयमनों में; न््यमील्यत्--बन्द कर लिया |
अपने समक्ष ब्रह्माण्ड के पितामह ब्रह्माजी को अन्य देवताओं के साथ देख कर जो किउनके निजी तथा शक्तिशाली अंश हैं, सर्वक्तिमान प्रभु ने अपने मन को अपने भीतर स्थिर कियाऔर अपने कमलनेत्र बन्द कर लिये ।
" लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमड्गनलम् ।
योगधारणयाग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत्स्वकम् ॥
६॥
लोक--सरे लोकों के प्रति; अभिरामाम्--अत्यन्त आकर्षक; स्व-तनुम्--अपने दिव्य शरीर को; धारणा--समाधि; ध्यान--तथा ध्यान का; मड़लम्--शुभ वस्तु; योग-धारणया--योग की समाधि से; आग्नेय्या--अग्नि पर केन्द्रित; अदग्ध्वा--बिनाजलाये; धाम-- धाम; आविशत्--प्रवेश किया; स्वकम्--अपने ।
अपने दिव्य शरीर को जलाने के लिए योगिक आग्नेयी ध्यान का उपयोग किये बिना,भगवान् कृष्ण अपने धाम में प्रविष्ट हो गये ।
उनका दिव्य शरीर सारे जगतों का सर्व-आकर्षकआश्रय है और समस्त धारणा तथा ध्यान का लक्ष्य है ।
" दिवि दुन्दुभयो नेदु: पेतु: सुमनसश्च खातू ।
सत्यं धर्मो धृतिर्भूमे: कीर्ति: श्री श्चानु तं ययु; ॥
७॥
दिवि--स्वर्ग में; दुन्दुभय: --दुन्दुभियाँ; नेदु:--बजने लगीं; पेतु:--गिरे; सुमनसः--फूल; च--तथा; खात्-- आकाश से;सत्यम्ू--सत्य; धर्म:--धर्म; धृतिः--आज्ञाकारिता; भूमेः--पृथ्वी से; कीर्ति:--यश; श्री:--सौन्दर्य; च--तथा; अनु--उनकेसाथ साथ; तम्--उनके पास; ययु:--गये ।
ज्योंही भगवान् श्रीकृष्ण ने इस पृथ्वी को छोड़ा, त्योंही सत्य, धर्म, धृति, कीर्ति तथा सौन्दर्यउनके पीछे हो लिये ।
स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाश से फूलों की वृष्टि होने लगी ।
" देवादयो ब्रह्ममुख्या न विशन्तं स्वधामनि ।
अविज्ञातगतिं कृष्णं दहशुश्चातिविस्मिता: ॥
८ ॥
देव-आदय:--देवता इत्यादि; ब्रह्म-मुख्या: --ब्रह्मा इत्यादि; न--नहीं; विशन्तम्--प्रवेश करते हुए; स्व-धामनि--अपने धाममें; अविज्ञात--अज्ञात; गतिम्--उनकी गतिविधियाँ; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; ददशुः--देखा; च--तथा; अति-विस्मिता:--अत्यन्त चकित
ब्रह्मा इत्यादि देवता तथा उच्चतर प्राणी भगवान् कृष्ण को उनके धाम में प्रवेश करते हुएनहीं देख सके क्योंकि भगवान् ने अपनी गतिविधियों को प्रकट नहीं होने दिया ।
किन्तु कुछेक नेउनको देख लिया और वे अत्यधिक चकित थे ।
" सौदामन्या यथाक्लाशे यान्त्या हित्वाभ्रमण्डलम् ।
गतिर्न लक्ष्यते मत्यैस्तथा कृष्णस्य दैवतैः ॥
९॥
सौदामन्या:--बिजली का; यथा--जिस तरह; आकाशे-- आकाश में; यान्त्या:--यात्रा कर रही; हित्वा--त्याग कर; अभ्र-मण्डलम्ू--बादल; गति:ः--चाल; न लक्ष्यते--निश्चित नहीं की जा सकती; मर्त्य:--मर्त्यों द्वारा; तथा--इसी तरह; कृष्णस्थ--कृष्ण का; दैवतैः--देवताओं द्वारा
जिस तरह सामान्य लोग बादलों को त्यागती बिजली के मार्ग को निश्चित नहीं कर सकते,उसी तरह देवतागण अपने धाम लौटते हुए भगवान् कृष्ण की गतिविधियों का पता नहीं लगापाये ।
" ब्रह्मरुद्रादयस्ते तु दृष्ठा योगगतिं हरे: ।
विस्मितास्तां प्रशंसन्तः स्व॑ स्व॑ लोक॑ ययुस्तदा ॥
१०॥
ब्रह्म-रुद्र-आदय: --ब्रह्मा, रुद्र तथा अन्य; ते--वे; तु--लेकिन; हृष्टा--देख कर; योग-गतिम्--योगशक्ति; हरेः--भगवान्कृष्ण की; विस्मिता:--चकित; ताम्--उस शक्ति को; प्रशंसन्तः--यशोगान करते हुए; स्वम् स्वम्--अपने अपने; लोकम्--जगत को; ययु:--चले गये; तदा--तब |
किन्तु कुछ देवतागण--विशेष रूप से ब्रह्म तथा शिवजी--यह निश्चित कर सके कि किसतरह भगवान् की योगशक्ति कार्य कर रही है और इस तरह वे चकित थे ।
सारे देवताओं ने भगवान् की योगशक्ति की प्रशंसा की और तब वे अपने अपने लोक को लौट गये ।
" राजन्पयरस्य तनुभूज्जननाप्ययेहामायाविडम्बनमवेहि यथा नटस्य ।
सृष्ठात्मनेदमनुविश्य विह॒त्य चान्तेसंहत्य चात्ममहिनोपरत: स आस्ते ॥
११॥
राजनू--हे राजा परीक्षित; परस्य--ब्रह्म का; तनु- भूतू--देहधारी जीवों के सहश; जनन--जन्म; अप्यय--तथा अन्तर्धान;ईहा:--कर्म; माया--उनकी मायाशक्ति का; विडम्बनमू--झूठा प्रदर्शन; अवेहि--समझो; यथा--जसि तरह; नटस्य--अभिनेता का; सृघ्ठा--उत्पन्न करके; आत्मना--अपने द्वारा; इदम्--इस ब्रह्माण्ड को; अनुविश्य-- प्रवेश करके; विहृत्य--अभिनय करते हुए; च--तथा; अन्ते--अन्त में; संहत्य--समाप्त करते हुए; च--तथा; आत्म-महिना--अपने यश से; उपरत:--समाप्त करके; सः--वह; आस्ते--रहते आते हैं ।
हे राजा, तुम जान लो कि भगवान् का प्राकट्यू तथा उनका अन्तर्धान होना, जो देहधारीबद्धजीवों के ही सहृश होते हैं, वास्तव में उनकी मायाशक्ति द्वारा अभिनीत खेल हैं जैसा किकोई अभिनेता करता है ।
वे इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करके उसमें प्रवेश करते हैं, कुछ कालतकउसके भीतर खिलवाड़ करते हैं और अन्त में समेट लेते हैं ।
तब भगवान् विराट जगत के सारेकार्यों को बन्द करके, अपनी दिव्य महिमा में स्थित रहते जाते हैं ।
" मर्त्येन यो गुरुसुतं यमलोकनीतंत्वां चानयच्छरणदः परमास्त्रदग्धम् ।
जिग्येडन्तकान्तकमपीशमसावनीशःकि स्वावने स्वरनयन्मृगयुं सदेहम् ॥
१२॥
मर्त्येन--उसी मनुष्य शरीर में; यः--जो; गुरु-सुतम्--अपने गुरु के पुत्र को; यम-लोक--यमराज के लोक को; नीतमू--लायागया; त्वामू--तुमको; च--तथा; आनयत्--वापस लाया; शरण-दः --शरण देने वाला; परम-अस्त्र-ब्रह्म॒स्त्र; दग्धम्--जलाया गया; जिग्ये--जीत लिया; अन्तक- मृत्यु के दूतों के; अन्तकम्--जो मृत्यु है; अपि-- भी; ईशम्--शिवजी; असौ--वह, कृष्ण; अनीश:--असमर्थ; किम्--क्या; स्व-- अपनी; अवने--रक्षा में; स्व:--वैकुण्ठ-लोक को; अनयत्--लाया;मृगयुम्ू--शिकारी; स-देहम्--सशरीर ।
भगवान् कृष्ण अपने गुरु-पुत्र को सशरीर यमराज के लोक से वापस ले आये और जब तुमअश्रत्थामा के ब्रह्मास्त्र द्वारा जला दिये गये थे, तो उन्होंने परम रक्षक के रूप में तुम्हें भी बचाया ।
उन्होंने मृत्यु के दूतों को भी मृत्यु देने वाले शिवजी को युद्ध में परास्त किया और जरा शिकारीको उसके मानव शरीर में वैकुण्ठ भेज दिया ।
क्या कभी ऐसा पुरुष अपनी रक्षा करने में असमर्थहो सकता है?" तथाप्यशेषस्थितिसम्भवाप्यये-घ्वनन्यहेतुर्यदशेषशक्तिधृक् ।
नैच्छत्प्रणेतुं वपुरत्र शेषितं मर्त्येन कि स्वस्थगतिं प्रदर्शयन् ॥
१३॥
तथा अपि--तो भी; अशेष--समस्त सृजित वस्तुओं के; स्थिति--पालन-पोषण में; सम्भव--सृष्टि; अप्ययेषु--तथा संहार में;अनन्य-हेतु:--एकमात्र कारण; यत्-- क्योंकि; अशेष--असीम; शक्ति--शक्ति; धृक्--से युक्त; न ऐच्छत्--इच्छा नहीं की;प्रणेतुम--रखने के लिए; वपु:--अपना दिव्य शरीर; अत्र--यहाँ; शेषितम्--शेष; मर्त्येन--इस भौतिक जगत से; किमू--क्यालाभ; स्व-स्थ--उनमें स्थित रहने वालों के; गतिम्--गन्तव्य को; प्रदर्शयन्ू--दिखलाते हुए ।
असीम शक्तियों के स्वामी भगवान् कृष्ण असंख्य जीवों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार केएकमात्र कारण होते हुए भी, इस जगत में अपने शरीर को अब और अधिक नहीं रखना चाहतेथे ।
इस तरह उन्होंने आत्मस्थ लोगों को गन्तव्य दिखलाया और यह प्रदर्शित किया कि इस मर्त्यजगत का कोई अपना मूल्य नहीं है ।
" य एतां प्रातरुत्थाय कृष्णस्य पदवीं पराम् ।
प्रयतः कीर्तयेद्धक्त्या तामेवाप्नोत्यनुत्तमाम् ॥
१४॥
यः--जो कोई; एताम्--इसे; प्रातः--प्रातःकाल; उत्थाय--उठ कर; कृष्णस्य--कृष्ण के; पदवीम्--गन्तव्य को; पराम्ू--परम; प्रयत:ः--ध्यानपूर्वक; कीर्तयेत्ू--यशोगान करता है; भक्त्या--भक्ति से; तामू--उस गन्तव्य को; एव--निस्सन्देह;आणोति--प्राप्त करता है; अनुत्तममू--अद्वितीय |
जो व्यक्ति प्रातःकाल नियमित रूप से जगता है और भगवान् कृष्ण के दिव्य तिरोधान तथाउनके निजी धाम लौटने की महिमा का भक्तिपूर्वक कीर्तन करता है, वह निश्चय ही उसी परमपद को प्राप्त करेगा ।
" दारुको द्वारकामेत्य वसुदेवोग्रसेनयो: ।
पतित्वा चरणावस््रै्न्यषिज्ञत्कृष्णविच्युत: ॥
१५॥
दारुक:--दारूक; द्वारकाम्-द्वारका में; एत्य--आकर; वसुदेव-उग्रसेनयो: --वसुदेव तथा उग्रसेन के ; पतित्वा--गिर कर;चरणौ--पैरों पर; अस्त्रै:--आँसुओं से; न्यषिज्ञत्ू--भिगो दिया; कृष्ण-विच्युत:--कृष्ण से बिछुड़े |
द्वारका पहुँचते ही दारुक वसुदेव तथा उग्रसेन के चरणों पर गिर पड़ा और भगवान् कृष्णकी क्षति पर शोक करते हुए अपने आँसुओं से उनके चरणों को भिगो दिया ।
" कथयामास निधन वृष्णीनां कृत्स्नशो नृप ।
तच्छ॒त्वोद्विग्नहदया जना: शोकविर्मूच्छिता: ॥
१६॥
तत्र सम त्वरिता जग्मुः कृष्णविश्लेषविहला: ।
व्यसव: शेरते यत्र ज्ञातयो घ्नन््त आननम् ॥
१७॥
कथयाम् आस--उसे कह सुनाया; निधनम्--विनाश ; वृष्णीनाम्--वृष्णियों का; कृत्स्नश:--पूर्ण; नृप--हे राजा परीक्षित;तत्--वह; श्रुत्वा--सुन कर; उद्दिग्न--क्षुब्ध; हृदया:--हृदयों से; जना:--लोग; शोक--शोक से; विर्मूच्छिता: --संज्ञाहीन हुए;तत्र--वहाँ; स्म--निस्सन्देह; त्वरिता:--तेजी से; जग्मु:;--गये; कृष्ण-विश्लेष--कृष्ण के विछोह से; विहला:--अभिभूत;व्यसवः--प्राणहीन; शेरते--पड़े हुए थे; यत्र--जहाँ; ज्ञातय:--उनके सम्बन्धी; घ्नन्त:ः--प्रहार करते हुए; आननम्--अपने हीमुखों पर ।
दारुक ने वृष्णियों के पूर्ण विनाश का वृत्तान्त कह सुनाया और हे परीक्षित, यह सुन करलोग अपने हृदयों में अतीव किंकर्तव्यविमूढ़ और शोक से स्तम्भित हो गये ।
वे कृष्ण के विछोहसे विहल अपना सिर पीटते उस स्थान के लिए जल्दी जाने लगे जहाँ उनके सम्बन्धी मृत पड़े थे ।
" ददेवकी रोहिणी चैव वसुदेवस्तथा सुतौ ।
कृष्णरामावपश्यन्तः शोकार्ता विजहु: स्मृतिम्ू ॥
१८॥
ेवकी--देवकी; रोहिणी--रोहिणी; च-- भी; एव--निस्सन्देह; वसुदेव:--वसुदेव; तथा-- भी; सुतौ--दोनों पुत्रों; कृष्ण -रामौ--कृष्ण तथा राम को; अपश्यन्त:--न देखते हुए; शोक-आर्ता:--शोक से पीड़ित; विजहु: --खोदी; स्मृतिमू-- अपनीअपनी चेतना ।
जब देवकी, रोहिणी तथा वसुदेव ने अपने कृष्ण तथा बलराम पुत्रों को नहीं पाया, तो वेशोक से अचेत हो गये ।
प्राणां श्व विजहुस्तत्र भगवद्विरहातुरा: ।
उपगुह्य पतींस्तात चितामारुरुहुः स्त्रियः ॥
१९॥
प्राणान्--अपने प्राण; च--तथा; विजहु: --त्याग दिये; तत्र--वहाँ; भगवत्-- भगवान् के ; विरह--वियोग के कारण;आतुरा:--सताये हुए; उपगह्म--आलिंगन करके; पतीन्--अपने पतियों को; तात--हे परीक्षित; चिताम्--चिता में;आरुरुहु:--चढ़ गईं; स्त्रिय:--पत्नियाँ
भगवान् के वियोग से आतुर उनके माता-पिता ने उसी स्थान पर अपने प्राण त्याग दिये ।
हेपरीक्षित, तब यादवों की पत्नियाँ अपने अपने मृत पतियों का आलिंगन करके चिताओं पर चढ़गईं ।
" रामपल्यश्च तद्देहमुपगुह्याग्निमाविशन् ।
वसुदेवपल्यस्तदगात्रं प्रद्युम्नादीनहरे: स्नुषा: ।
कृष्णपत्योविशन्नग्नि रुक्मिण्याद्यास्तदात्मिका: ॥
२०॥
राम-पत्य:--बलराम की पत्नियाँ; च--तथा; ततू-देहम्--उनके शरीर को; उपगुहा--चूम कर; अग्निमू-- अग्नि में;आविशनू-प्रविष्ट हुईं; वसुदेव-पत्न्यः--वसुदेव की पत्नियाँ; तत्-गात्रमू--उसके शरीर को; प्रद्युम्म-आदीनू--प्रद्युम्न इत्यादि;हरे:ः-- भगवान् हरि के; स्नुषा:--पतोहुएँ; कृष्ण-पत्य:--कृष्ण की पत्नियाँ; अविशनू--प्रविष्ट हुईं; अग्निम्-- अग्नि में;रुक्मिणी-आद्या: --महारानी रुक्मिनी इत्यादि; तत्-आत्मिका:--जिनकी चेतना उनमें पूर्णतया लीन थी ।
बलरामजी की पत्नियाँ भी अग्नि में प्रविष्ट हुई और उनके शरीर का आलिंगन किया ।
इसीतरह वसुदेव की पत्लियाँ उनकी चिता में प्रविष्ट हुईं और उनके शरीर को चूमा ।
हरि की पतोहुएँप्रद्यम्गादि अपने अपने पतियों की चिताओं में प्रविष्ट हुईं ।
रुक्मिणी तथा भगवान् कृष्ण की अन्यपत्नयाँ, जिनके हृदय उन्हीं में पूर्णतया लीन थे, उनकी चिता में प्रविष्ट हुईं ।
" अर्जुन: प्रेयसः सख्यु: कृष्णस्य विरहातुर: ।
आत्मानं सान्त्वयामास कृष्णगीतै: सदुक्तिभि: ॥
२१॥
अर्जुन:--अर्जुन ने; प्रेयस:--अपने प्रिय; सख्यु:--मित्र का; कृष्णस्य--कृष्ण के; विरह--विछोह से; आतुरः--दुखी;आत्मानम्-- अपने को; सान्त्ववाम् आस--सान्त्वना दी; कृष्ण-गीतैः--कृष्ण द्वारा गाये गये गीतों ( भगवद्गीता ) से; सतू-उक्तिभि:--दिव्य शब्दों से
अर्जुन अपने सर्वप्रिय मित्र भगवान् कृष्ण के विछोह से अत्यधिक दुखी हुए ।
किन्तु उन्होंनेभगवान् के उन दिव्य शब्दों का स्मरण करके, जिन्हें उन्होंने उनसे गीत रूप में गाया था, अपनेको सान्त्वना दी ।
" बन्धूनां नष्टगोत्राणामर्जुन: साम्परायिकम् ।
हतानां कारयामास यथावदनुपूर्वशः ॥
२२॥
बन्धूनामू--सम्बन्धियों के; नष्ट-गोत्राणामू--जिनके परिवार में कोई निकट परिवार वाला नहीं बचा था; अर्जुन: --अर्जुन ने;साम्परायिकम्-दाह-कर्म; हतानामू--मारे हुओं का; कारयाम् आस--सम्पन्न किया; यथा-बत्--वेद वर्णित विधि से;अनुपूर्वशः--मृतकों की आयु के क्रम से |
तत्पश्चात् अर्जुन ने इस बात का ध्यान रखा कि उन मृतकों का उचित रीति से दाह-कर्मकिया जाये जिनके परिवार में कोई पुरुष सदस्य नहीं बचा था ।
उन्होंने एक-एक करके सारेयदुओं के वांछित कृत्य पूरे किये ।
" द्वारकां हरिणा त्यक्तां समुद्रोप्लावयत्क्षणात् ।
वर्जयित्वा महाराज श्रीमद्धगवदालयम् ॥
२३॥
द्वारकाम्-द्वारका; हरिणा-- भगवान् हरि द्वारा; त्यक्तामू-त्यागी हुई; समुद्र: --समुद्र ने; अप्लावयत्--जलमग्न कर लिया;क्षणात्-तुरन्त; वर्जयित्वा--के अतिरिक्त; महा-राज--हे राजा; श्रीमत्-भगवत्-- भगवान् का; आलयम्--आवास |
जैसे ही भगवान् ने द्वारका का परित्याग किया, त्योंही, हे राजा, समुद्र ने उसे चारों ओर सेघेर लिया और एकमात्र उनका महल ही अछूता रहा ।
नित्य सन्निहितस्तत्र भगवान्मधुसूदन: ।
स्मृत्याशेषाशुभहरं सर्वमड्गलमड्रलम् ॥
२४॥
नित्यम्ू--नित्य ही; सन्निहित:ः--उपस्थित; तत्र--वहाँ; भगवान्ू--भगवान्; मधुसूदन: --मधुसूदन; स्मृत्या--स्मरण करने से;अशेष-अशुभ- प्रत्येक अशुभ वस्तु का; हरम्--हरण करने वाला; सर्व-मड्ल--समस्त शुभ वस्तुओं का; मड्जलम्--अत्यन्तशुभ, मंगलकारी ।
भगवान् मधुसूदन शाश्वत रीति से द्वारका में उपस्थित रहते हैं ।
यह समस्त शुभ स्थानों मेंसर्वाधिक शुभ है और इसके स्मरण मात्र से सारे कल्मष नष्ट हो जाते हैं ।
" स्त्रीबालवृद्धानादाय हतशेषान्धनझ्जय: ।
इन्द्रप्रस्थं समावेश्य वज्ज॑ तत्राभ्यषेचयत् ॥
२५॥
स्त्री--स्त्रियाँ; बाल--बच्चे; वृद्धानू--तथा बूढ़ों; आदाय--लेकर; हत--मारे हुओं के; शेषान्ू--बचे हुओं को; धनझय:--अर्जुन ने; इन्द्रप्रस्थम्--पाण्डवों की राजधानी में; समावेश्य--फिर से बसाकर; वज़म्--अनिरुद्ध के पुत्र वज्र को; तत्र--वहाँ;अभ्यषेचयत्-- सिंहासन पर बिठाया ।
अर्जुन यदुवंश की बची हुई स्त्रियों, बच्चों तथा बूढ़ों को इन्द्रप्रस्थ ले आये जहाँ उन्होंने अनिरुद्ध के पुत्र वज़ को यदुओं के शासक के रूप में प्रतिष्ठापित किया ।
" श्र॒ुत्वा सुहद्गधं राजन्नर्जुनात्ते पितामहा: ।
त्वां तु वंशधरं कृत्वा जग्मुः सर्वे महापथम् ॥
२६॥
श्रुत्वा--सुन कर; सुहृत्-मित्रों की; वधम्--मृत्यु; राजन्ू--हे राजा; अर्जुनात्ू--अर्जुन से; ते--तुम्हारे; पितामहा: --बाबा लोग( युधिष्ठिर तथा उनके भाई ); त्वामू-तुमको; तु--तथा; बंश-धरम्--वंश कोबनाये रखने वाला; कृत्वा--बनाकर; जम्मु:--चले गये; सर्वे--वे सभी; महा-पथम्--महान् यात्रा के लिए ।
हे राजा, अर्जुन से अपने मित्र की मृत्यु सुन कर आपके बाबा लोगों ने आपको वंश केधारक के रूप में स्थापित कर दिया और इस जगत से अपने प्रयाण की तैयारी के लिए चलपड़े ।
" य एतह्देवदेवस्य विष्णो: कर्माणि जन्म च ।
कीर्तयेच्छुद्धया मर्त्य: सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥
२७॥
यः--जो; एतत्--इन; देव-देवस्य--देवों के देव का; विष्णो: --विष्णु के; कर्माणि--कार्यकलापों; जन्म--जन्म; च--तथा;कीर्तयेतू--कीर्तन करता है; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; मर्त्य:--मानव प्राणी; सर्व-पापैः--सारे पापों से; प्रमुच्यते--छूट जाता है ।
जो व्यक्ति देवताओं के देवता विष्णु की इन विविध लीलाओं तथा अवतारों की महिमाओंका श्रद्धापूर्वक कीर्तन करता है, वह सारे पापों से मोक्ष प्राप्त करता है ।
" इत्थं हरेर्भगवतो रुचिरावतार-वीर्याणि बालचरितानि च शन्तमानि ।
अन्यत्र चेह च श्रुतानि गृणन्मनुष्योभक्ति परां परमहंसगतौ लभेत ॥
२८॥
इत्थम्--इस प्रकार; हरेः-- भगवान् हरि के; भगवतः-- भगवान् के; रुचिर--आकर्षक; अवतार--अवतारों के; वीर्याणि--पराक्रमों; बाल--बचपन; चरितानि--लीलाएँ; च--तथा; शम्ू-तमानि-- अत्यन्त शुभ; अन्यत्र--और कहीं; च--तथा; इह--यहाँ; च--भी; श्रुतानि--सुना हुआ; गृणन्--स्पष्ट कीर्तन करते; मनुष्य: --मनुष्य; भक्तिमू-- भक्ति; परामू--दिव्य ; परमहंस--सिद्ध मुनियों के; गतौ--गन्तव्य ( श्रीकृष्ण ) के लिए; लभेत-प्राप्त करेगा ।
भगवान् श्रीकृष्ण के सर्व-आकर्षक अवतारों के सर्वमंगल पराक्रम तथा उनके द्वाराबाल्यकाल में की गई लीलाएँ इस श्रीमदभागवत तथा अन्य शाम्त्रों में वर्णित हैं ।
जो कोई उनकीलीलाओं के इन वर्णनों का स्पष्ट कीर्तन करता है, उसे उन भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति प्राप्त होगी जो समस्त सिद्ध मुनियों के गन्तव्य हैं ।
"
