← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची
अध्याय चार: ड्रूमिला ने राजा निमि को ईश्वर के अवतारों के बारे में बताया
11.4श्रीराजोबाचयानि यानीह कर्माणि यैयैं: स्वच्छन्दजन्मभि: ।
चक्रे करोतिकर्ता वा हरिस्तानि ब्रुवन्तु न: ॥
१॥
श्री-राजा उवाच--राजा ने कहा; यानि यानि-- प्रत्येक; इह--इस जगत में; कर्माणि--कर्मों के ; यै: यैः -- प्रत्येक द्वारा;स्वच्छन्द--स्वतंत्र रूप से; जन्मभि:--प्राकट्यों के ; चक्रे--सम्पन्न किया; करोति--सम्पन्न करता है; कर्ता--सम्पन्न करेगा;वा--अथवा; हरि:ः-- भगवान् हरि; तानि--उन््हें; ब्रुवन्तु--कहें; नः--हमसे
राजा निमि ने कहा : भगवान् अपनी अनन््तरंगा शक्ति से तथा अपनी इच्छानुसार भौतिकजगत में अवतरित होते हैं।
अतएव आप हमें भगवान् हरि की उन विविध लीलाओं को बतलायें,जिन्हें उन्होंने भूतकाल में सम्पन्न किया, इस समय कर रहे हैं और अपने विविध अवतारों मेंभविष्य में सम्पन्न करेंगे।
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श्रीद्रुमिल उवाच यो वा अनन्तस्य गुनाननन्तानू्अनुक्रमिष्यन्स तु बालबुर्द्धि: ।
रजांसि भूमेर्गणयेत्कथज्ञित्कालेन नैवाखिलशक्तिधाम्न: ॥
२॥
श्री-द्रुमिल: उवाच-- श्री द्रमिल ने कहा; यः--जो; बै--निस्सन्देह; अनन्तस्य-- असीम भगवान् के; गुरुणा--दिव्य गुणों को;अनन्तान्--असीम; अनुक्रमिष्यनू--वर्णन करने का प्रयास करते हुए; सः--वह; तु--निश्चय ही; बाल-बुद्धिः--बालकों जैसीबुद्धि वाला मनुष्य है; रजांसि--धूल के कण; भूमे:--पृथ्वी पर; गणयेत्--गिन सकता है; कथज्ञित्ू--किसी तरह; कालेन--समय के साथ; न एव--किन्तु नहीं; अखिल-शक्ति-धाम्न:--समस्त शक्तियों के आगार के ( गुणों )
श्री द्रमिल ने कहा : अनन्त भगवान् के अनन्त गुणों का वर्णन करने या गिनने का प्रयासकरने वाले व्यक्ति की बुद्धि मूर्ख बालक जैसी होती है।
भले ही कोई महान् प्रतिभाशाली व्यक्तिकिसी तरह से पृथ्वी की सतह के धूल-कणों की गिनती करने का समय-अपव्ययी प्रयास करले, किन्तु ऐसा व्यक्ति भगवान् के आकर्षक गुणों की गणना नहीं कर सकता, क्योंकि भगवान्समस्त शक्तियों के आगार हैं।
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भूतैर्यदा पदञ्जनभिरात्मसूष्टे:पुरं विराजं विरचय्य तस्मिन् ।
स्वांशेन विष्ट: पुरुषाभिधान-मवाप नारायण आदिदेव: ॥
३॥
भूतैः--तत्त्वों के द्वारा; यदा--जब; पञ्ञभि:--पाँच ( क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर ); आत्म-सूष्टैः --अपने से उत्पन्न;पुरम्ू--शरीर; विराजम्--सूक्ष्म रूप ब्रह्माण्ड की; विरचय्य--रचना करके; तस्मिनू--उसके भीतर; स्व-अंशेन--अपने अंश केद्वारा; विष्ट:--प्रवेश करते हुए; पुरुष-अभिधानम्-- पुरुष-नाम; अवाप-- धारण किया; नारायण:--नारायण; आदि-देव:ः--आदि भगवान् |
जब आदि भगवान् नारायण ने अपने में से उत्पन्न पाँच तत्त्वों से अपने विराट शरीर की रचनाकी और फिर अपने ही अंश से उस विराट शरीर में प्रविष्ट हो गये, तो वे पुरुष नाम से विख्यातहुए।
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यत्काय एष भुवनत्रयसन्निवेशोअस्येन्द्रियैस्तनु भूतामुभयेन्द्रियाणि ।
ज्ञानं स्वतः श्वसनतो बलमोज ईहासत्त्वादिभि: स्थितिलयोद्धव आदिकर्ता ॥
४॥
यतू-काये--जिनके शरीर के भीतर; एष:--यह; भुवन-त्रय--ब्रह्माण्ड के तीनों लोकों के; सन्निवेश: --विस्तृत व्यवस्था;यस्य--जिसकी; इन्द्रियैः--इन्द्रियों के द्वारा; तनु-भृताम्--देहधारी जीवों के; उभय-इन्द्रियाणि--दोनों प्रकार की ( ज्ञानार्जनकरने वाली तथा कर्म करने वाली ) इन्द्रियाँ; ज्ञानम्ू--ज्ञान; स्वतः--अपने से; श्वसनत:ः--उनके श्वास से; बलम्ू--शारीरिकबल; ओज:--इन्द्रियों की शक्ति; ईहा--कार्यकलाप; सत्त्व-आदिभि:--सतो, रजो तथा तमोगुणों द्वारा; स्थिति--पालन;लय--संहार; उद्धवे--तथा सृष्टि में; आदि-कर्ता--आदि कर्म करने वाला
उनके शरीर के भीतर इस ब्रह्माण्ड के तीनों लोक विस्तृत रूप से स्थित हैं।
उनकी दिव्यइन्द्रियाँ समस्त देहधारी जीवों की ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों को उत्पन्न करती हैं।
उनकी चेतना सेबद्ध-ज्ञान उत्पन्न होता है और उनके प्रबल श्वास से देहधारी जीवों का शारीरिक बल, ऐन्द्रियशक्ति तथा बद्ध-कर्म उत्पन्न होते हैं।
वे सतो, रजो तथा तमोगुणों के माध्यम से आदि गति प्रदानकरने वाले हैं।
इस प्रकार ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन और संहार होता है।
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आदावभूच्छतधूती रजसास्य सर्गेविष्णु: स्थितौ क्रतुपतिद्विजधर्मसेतु: ।
रुद्रोउप्ययाय तमसा पुरुष: स आद्यइत्युद्धवस्थितिलया: सततं प्रजासु ॥
५॥
आदौ-- प्रारम्भ में; अभूत्ू--बना; शत-धृति:--ब्रह्मा; रजसा--रजोगुण से; अस्य--इस जगत का; सर्गे--सृष्टि में; विष्णु: --भगवान् विष्णु; स्थितौ--पालन में; क्रतु-पति:--यज्ञ का स्वामी; द्विज--द्विजन्मा ब्राह्मणों का; धर्म--धार्मिक कर्तव्यों का;सेतुः--रक्षक; रुद्र:--शिव; अप्ययाय--संहार हेतु; तमसा--तमोगुण द्वारा; पुरुष: --परम पुरुष; सः--वह; आद्य:--आदि;इति--इस प्रकार; उद्धव-स्थिति-लया:--सृजन, पालन तथा संहार; सततम्--सदैव; प्रजासु--उत्पन्न किये गये प्राणियों में से |
प्रारम्भ में आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करने के निमित्त रजोगुणके माध्यम से ब्रह्म का रूप प्रकट किया।
भगवान् ने ब्रह्माण्ड का पालन करने के लिए विष्णु-रूप में अपना स्वरूप प्रकट किया, जो यज्ञ का स्वामी है और द्विजन्मा ब्राह्मणों तथा उनकेधार्मिक कर्तव्यों का रक्षक है।
और जब ब्रह्माण्ड का संहार करना होता है, तो यही भगवान्तमोगुण का प्रयोग करते हुए अपना रुद्र-रूप प्रकट करते हैं।
इस तरह उत्पन्न किये गये जीवसदैव सृष्टि, पालन तथा संहार की शक्तियों के अधीन रहते हैं।
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धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यानारायणो नर ऋषिप्रवर: प्रशान्तः ।
नैष्कर्म्यलक्षणमुवाच चचार कर्मयोउद्यापि चास्त ऋषिवर्यनिषेविताड्ध्रि: ॥
६॥
धर्मस्य--धर्म की ( पत्नी ); दक्ष-दुहितरि--दक्ष की पुत्री द्वारा; अजनिष्ट--उत्पन्न हुआ था; मूर्त्याम्--मूर्ति द्वारा; नारायण:नरः--नर-नारायण; ऋषि-प्रवर: --ऋषि श्रेष्ठ; प्रशान्तः--अत्यन्त शान्त; नैष्कर्म्प-लक्षणम्-- समस्त भौतिक कर्म की समाप्तिके लक्षण से युक्त; उबाच--कहा; चचार--तथा सम्पन्न किया; कर्म--कर्तव्य; य:--जो; अद्य अपि--आज भी; च--भी;आस्ते--जीवित है; ऋषि-वर्य-- श्रेष्ठ ऋषियों द्वारा; निषेवित--सेवा किया जाकर; अड्धूप्रि:--पाँव |
परम शान्त तथा ऋषियों में श्रेष्ठ नर-नारायण ऋषि का जन्म धर्म तथा उनकी पत्ली दक्षपुत्रीमुर्ति के पुत्र के रूप में हुआ था।
नर-नारायण ऋषि ने भगवद्भक्ति की शिक्षा दी, जिससेभौतिक कर्म का अन्त हो जाता है और उन्होंने स्वयं इस ज्ञान का पूरी तरह से अभ्यास किया।
वेआज भी जीवित हैं और उनके चरणकमलों की सेवा बड़े बड़े सन्त-पुरुषों द्वारा की जाती है।
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इन्द्रो विशड्क्य मम धाम जिधघृक्षतीतिकाम न्ययुड्भ सगणं स बदर्युपाख्यम् ।
गत्वाप्सरोगणवसन्तसुमन्दवातै:स्त्रीप्रेक्षणेषुभिरविध्यद्तन्महिज्ञ: ॥
७॥
इन्द्र:--इन्द्र; विशडक्य--डर कर; मम--मेरा; धाम--राज्य; जिघृक्षति--निगल जाना चाहता है; इति--इस प्रकार सोच कर;'कामम्--कामदेव को; न्ययुड्डू --लगाया; स-गणम्--उसके संगियों समेत; सः--उस ( कामदेव ) ने; बदरी-उपाख्यम्--बदरिकाश्रम तक; गत्वा--जाकर; अप्सर:-गण--अप्सराओं के साथ; वसनन््त--वसन्न्त ऋतु; सु-मन्द-वातैः--तथा मन्द वायु से;स्त्री-प्रेश्षण--स्त्रियों की चितवनों से ( बने ); इषुभि:--तीरों से; अविध्यत्--बींधने का प्रयास किया; अतत्-महि-ज्ञ:--उनकीमहानता को न जानते हुए
यह सोच कर कि नर-नारायण ऋषि अपनी कठिन तपस्या से अत्यन्त शक्तिशाली बन करउसका स्वर्ग का राज्य छीन लेंगे, राजा इन्द्र भभभीत हो उठा।
इस तरह भगवान् के अवतार कीदिव्य महिमा को न जानते हुए इन्द्र ने कामदेव तथा उसके संगियों को भगवान् के आवासबदरिकाश्रम भेजा।
जब वसन््त ऋतु की मनोहारी मन्द वायु ने अत्यन्त कामुक वातावरण उत्पन्नकर दिया, तो स्वयं कामदेव ने सुन्दर स्त्रियों की बाँकी चितवनों के तीरों से भगवान् परआक्रमण किया।
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विज्ञाय शक्रकृतमक्रममादिदेव:प्राह प्रहस्य गतविस्मय एजमानान् ।
मा भेर्विभो मदन मारुत देववध्वोगृह्वीत नो बलिमशून्यमिमं कुरुध्वम् ॥
८॥
विज्ञाय--जान कर; शक्र--३न्द्र द्वारा; कृतमू--किया गया; अक्रमम्--अपराध; आदि-देव:--आदि भगवान्; प्राह--बोले;प्रहस्थ--हँस कर; गत-विस्मय:--गर्व से रहित; एजमानान्-- थरथरा रहे; मा भैः--मत डरो; विभो--हे सर्वशक्तिमान; मदन--कामदेव; मारुत--हे वायु-देव; देव-वध्व:--हे देवताओं की पत्नियो; गृह्ीत--स्वीकार करो; नः--हमसे; बलिम्--ये उपहार;अशून्यम्ू--रिक्त नहीं; इमम्--इस ( आश्रम ) को; कुरुध्वम्--बनाइये |
इन्द्र द्वारा किये गये अपराध को समझते हुए आदि भगवान् गर्वित नहीं हुए।
अपितु कामदेवतथा कँपकँपा रहे उसके साथियों से वे हँसते हुए इस प्रकार बोले, 'हे शक्तिशाली मदन, हेवायु-देव तथा देवताओं की पत्नियो, डरो नहीं।
कृपया मेरे द्वारा दी जाने वाली भेंटें स्वीकारकरो और अपनी उपस्थिति से मेरे आश्रम को पवित्र बनाओ।
'!" इत्थं ब्रुवत्यभयदे नरदेव देवा:सब्रीडनप्रशिरस: सघृणं तमूचु: ।
नैतद्विभो त्वयि परेउविकृते विचित्रस्वारामधीरनिकरानतपादपदो ॥
९॥
इत्थम्--इस तरह से; ब्रुवति--बोल चुकने पर; अभय-दे--अभय प्रदान करने वाला; नर-देव--हे राजा ( निमि ); देवा: --देवतागण ( कामदेव तथा उसके साथी ); स-ब्रीड--लज्जावश; नप्र--झुके हुए; शिरस:ः-- अपने सिरों से; स-घृणम्--दया कीभीख माँगते; तमू-- उससे; ऊचु:--बोले; न--नहीं; एतत्--यह; विभो--हे सर्वशक्तिमान; त्वयि--तुम्हारे लिए; परे--परम;अविकृते--अपरिवर्तित; विचित्रम्--विस्मयकारी; स्व-आराम--आत्मतुष्ट; धीर--तथा गम्भीर मन वाले; निकर--समूह द्वारा;आनत--झुकाया गया; पाद-पद्मे--चरणकमलों पर
हे राजा निमि, जब नर-नारायण ऋषि ने देवताओं के भय को दूर करते हुए इस प्रकारकहा, तो उन्होंने लज्जा से अपने सिर झुका लिये और भगवान् से दया की भीख माँगते हुए इसप्रकार बोले, 'हे प्रभु, आप सदैव दिव्य हैं, मोह की पहुँच से परे हैं, अतएव आप नित्यअविकारी हैं।
हमारे महान् अपराध के बावजूद आपकी अहैतुकी कृपा आपमें कोई असामान्यघटना नहीं है, क्योंकि असंख्य आत्माराम तथा क्रोध और मिथ्या अहंकार से मुक्त मुनिजनआपके चरणकमलों पर विनयपूर्वक अपना शीश झूुकाते हैं।
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त्वां सेवतां सुरकृता बहवोउन्तराया:स्वौको विलड्घ्य परम॑ ब्रजतां पदं ते ।
नान्यस्य बर्हिषि बलीन्ददतः स्वभागान्धत्ते पदं त्वमविता यदि विघ्नमूर्ध्नि ॥
१०॥
त्वाम--तुम; सेवताम्--सेवा करने वालों को; सुर-कृताः:--देवताओं द्वारा बनाये गये; बहवः--अनेक; अन्तराया:--उत्पात;स्व-ओकः:--अपने ही धाम ( देव-लोक ); विलड्घ्य--पार करके; परमम्--परम; ब्रजताम्--जाने वाले; पदम्-- धाम को;ते--तुम्हारे; न--ऐसे नहीं हैं; अन्यस्य--दूसरों के; बर्हिषि--यज्ञों में; बलीन्-- भेंटें; ददतः--देने वाले के लिए; स्व-भागानू--अपने अपने हिस्सों को; धत्ते--( भक्तों के ) स्थान; पदम्--पाँव; त्वम्--तुम; अविता--रक्षक; यदि--इसलिए; विघ्त--बाधाके; मूर्धिनि--सिर पर |
देवतागण उन लोगों के मार्ग में अनेक अवरोध प्रस्तुत करते हैं, जो देवताओं के अस्थायीआवासों को लाँघ कर, आपके परम धाम पहुँचने के लिए आपकी पूजा करते हैं।
वे लोग, जोयज्ञों में देवताओं को उनका नियत भाग भेंट में दे देते हैं, ऐसे किसी अवरोध का सामना नहींकरते।
किन्तु क्योंकि आप अपने भक्त के प्रत्यक्ष रक्षक हैं, अतएव वह उन सभी अवरोधों को,जो उसके सामने देवताओं द्वारा रखे जाते हैं, लाँघ जाने में समर्थ होता है।
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क्षुत्तटित्रकालगुणमारुतजैह्कशैष्णा-नस्मानपारजलधीनतितीर्य केचित् ।
क्रोधस्य यान्ति विफलस्य वशं पदे गो-म॑ज्जन्ति दुश्चवरतपश्च वृथोत्सूजन्ति ॥
११॥
क्षुतू-- भूख; तृदू--प्यास; त्रि-काल-गुण--काल की तीन अवस्थाओं की अभिव्यक्ति ( यथा गर्मी, सर्दी, वर्षा आदि );मारुत--हवा; जैह--जीभ का भोग; शैष्णान्--तथा शिश्न के; अस्मान्ू--हम; अपार--असंख्य; जल-धीन्--समुद्र;अतितीर्य--पार करके; केचित्--कुछ मनुष्य; क्रोधस्य--क्रो ध का; यान्ति--प्राप्त करते हैं; विफलस्य--जो कि व्यर्थ है;वशम्--वेग को; पदे--पाँव या खुर ( के चिह्न ) में; गोः--गाय के; मज्जन्ति--डूब जाते हैं; दुश्चर--कर पाना कठिन; तपः--तपस्या; च--तथा; वृथा--व्यर्थ; उत्सृजन्ति--वे फेंक देते हैं
कुछ लोग तो ऐसे हैं, जो हमारे प्रभाव को लाँघने के उद्देश्य से कठिन तपस्या करते हैं, जोभूख, प्यास, गर्मी, सर्दी तथा कालजनित अन्य परिस्थितियों यथा रसनेन्द्रिय और जननेन्द्रिय केवेगों की अन्तहीन लहरों से युक्त अगाध समुद्र की तरह है।
इस तरह कठिन तपस्या के द्वाराइन्द्रिय-तृप्ति के इस समुद्र को पार कर लेने पर भी, ऐसे व्यक्ति व्यर्थ के क्रोध के वशीभूत होने पर मूर्खता से गो-खुर में डूब जाते हैं।
इस तरह वे अपनी कठिन तपस्या के लाभ को व्यर्थ गँवाबैठते हैं।
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इति प्रगृणतां तेषां स्त्रियोउत्यद्भुतदर्शना: ।
दर्शयामास शुश्रूषां स्वर्चिता: कुर्वतीर्विभु: ॥
१२॥
इति--इस प्रकार; प्रगूणताम्--प्रशंसा कर रहे; तेषामू--उनकी उपस्थिति में; स्त्रियः--स्त्रियाँ; अति-अद्भुत-- अत्यन्त विचित्र;दर्शना:--देखने में; दर्शयाम् आस--दिखलाया; शुश्रूषाम्ू--आदरपूर्ण सेवा; सु-अर्चिता:--अच्छी तरह से अलंकृत;कुर्वती:--करते हुए; विभु:--सर्वशक्तिमान ईश्वर
जब देवतागण इस तरह से भगवान् की प्रशंसा कर रहे थे, तो सर्वशक्तिमान प्रभु ने सहसाउनकी आँखों के सामने अनेक स्त्रियाँ प्रकट कर दीं, जो आश्चर्यजनक ढंग से भव्य लगती थींऔर सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से सज्जित थीं और भगवान् की सेवा में लगी हुई थीं।
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ते देवानुचरा हृष्ठा स्त्रियः श्रीरिव रूपिणी: ।
गन्धेन मुमुहुस्तासां रूपौदार्यहतरिय: ॥
१३॥
ते--वे; देव-अनुचरा:--देवताओं के अनुयायी; हृष्ला--देख कर; स्त्रियः:--इन स्त्रियों को; श्री:--लक्ष्मी देवी; इब--मानो;रूपिणी:--साक्षात्; गन्धेन--सुगन्ध से; मुमुहुः--मोहित हो गये; तासाम्--उन स्त्रियों के; रूप--सौन्दर्य के; औदार्य--भव्यतासे; हत--विनष्ट; अ्रिय:--उनका एऐश्वर्य |
जब देवताओं के अनुयायियों ने नर-नारायण ऋषि द्वारा उत्पन्न स्त्रियों के मोहक सौन्दर्य कीओर निहारा और उनके शरीरों की सुगन्ध को सूँघा तो उनके मन मुग्ध हो गये।
निस्सन्देह ऐसीस्त्रियों के सौन्दर्य तथा उनकी भव्यता को देख कर देवताओं के अनुयायी अपने ऐश्वर्य को तुच्छसमझने लगे।
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तानाह देवदेवेश: प्रणतान्प्रहसन्निव ।
आसामेकततमां वृड्ध्वं सवर्णा स्वर्गभूषणाम् ॥
१४॥
तानू-- उनसे; आह--कहा; देव-देव-ईश: --समस्त देवताओं के परमेश्वर; प्रणतान्--जिन्होंने उनके समक्ष शीश झुकाया था;प्रहसन् इब--मानो हँस रहे हों; आसाम्--इन स्त्रियों के; एकतमाम्--एक; वृड्ध्वमू--चुन लीजिये; स-वर्णाम्--उपयुक्त;स्वर्ग--स्वर्ग का; भूषणाम्ू--आभूषण |
तब देवों के परमेश्वर किंचित मुसकाये और अपने समक्ष नतमस्तक स्वर्ग के प्रतिनिधियों सेकहा, 'तुम इन स्त्रियों में से जिस किसी को भी अपने उपयुक्त समझो, उसे चुन लो।
वहस्वर्गलोक की आभूषण ( शोभा बढ़ाने वाली ) बन जायेगी।
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ओमित्यादेशमादाय नत्वा तं सुरवन्दिन: ।
उर्वशीमप्सर: श्रेष्ठां पुरस्कृत्य दिवं ययु: ॥
१५॥
ओम इति--स्वीकृति सूचक ३४ का उच्चारण करके; आदेशम्--उनका आदेश; आदाय--लेकर; नत्वा--नमस्कार करके;तम्--उसको; सुर--देवताओं के; वन्दिन:--उन सेवकों ने; उर्वशीम्--उर्वशी को; अप्सरः - श्रेष्ठामू--अप्सराओं में सर्वश्रेष्ठ;पुरः-कृत्य--आदरबश आगे करके; दिवम्--स्वर्ग; ययु;:--लौट गये।
देवताओं के उन सेवकों ने ३» शब्द का उच्चारण करते हुए अप्सराओं में सर्वोत्कृष्ट उर्वशीको चुन लिया।
वे आदरपूर्वक उसे आगे करके स्वर्गलोक लौट गए।
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इन्द्रायानम्य सदसि श्रुण्वतां त्रिदिवौकसाम् ।
ऊचुर्नारायणबलं शक्रस्तत्रास विस्मित: ॥
१६॥
इन्द्राय--इन्ध को; आनम्य--झुक कर; सदसि--सभा में; श्रुण्वताम्--सुनने में व्यस्त; त्रि-दिव--तीनों स्वर्ग; ओकसाम्--जिनके निवासी; ऊचु:--उन्होंने कहा; नारायण-बलम्-- भगवान् नारायण के बल के बारे में; शक्रः--इन्द्र; तत्र--उस पर;आस--हुआ; विस्मित:--चकित।
देवताओं के सेवक इन्द्र-सभा में जा पहुँचे और तीनों स्वर्गों के निवासियों के सुनते सुनतेउन्होंने इन्द्र से नारायण के परम बल के बारे में बतलाया।
जब इन्द्र ने नर-नारायण ऋषि के बारेमें सुना और अपने अपराध के विषय में अवगत हुआ, तो वह डरा और चकित भी हुआ।
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हंसस्वरूप्यवददच्युत आत्मयोगंदत्त: कुमार ऋषभो भगवान्पिता न: ।
विष्णु: शिवाय जगतां कलयावतिर्ण-स्तेनाहता मधुभिदा श्रुतयो हयास्ये ॥
१७॥
हंस-स्वरूपी--हंस-अवतार का अपना नित्य स्वरूप धारण किये; अवदत्--बोले; अच्युत:--अच्युत भगवान्; आत्म-योगम्--आत्म-साक्षात्कार; दत्त:--दत्तात्रेय; कुमार:--सनक इत्यादि कुमारगण; ऋषभ:--ऋषभदेव; भगवान्-- भगवान्; पिता--पिता; न:--हमारा; विष्णु: -- भगवान् विष्णु; शिवाय--कल्याण हेतु; जगताम्--सारे जगत के; कलया--अपने गौण अंशोंद्वारा, कलाओं द्वारा; अवतीर्ण:--इस जगत में अवतरित होकर; तेन--उसके द्वारा; आहता:--( पाताल-लोक से ) वापस लायेगये; मधु-भिदा--मधु असुर के मारने वाले के द्वारा; श्रुतप:ः--वेदों के मूल ग्रंथ; हय-आस्ये--घोड़े के सिर वाले अवतार में ।
अच्युत भगवान् विष्णु इस जगत में अपने विविध आंशिक अवतारों के रूप में अवतरित हुएहैं यथा हंस, दत्तात्रेय, चारों कुमार तथा हमारे अपने पिता, महान् ऋषभदेव।
ऐसे अवतारों केद्वारा भगवान् सारे ब्रह्माण्ड के लाभ हेतु आत्म-साक्षात्कार का विज्ञान पढ़ाते हैं।
उन्होंने हयग्रीवके रूप में प्रकट होकर मधु असुर का वध किया और इस तरह वे पाताल-लोक से वेदों कोवापस लाये।
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गुप्तोउप्यये मनुरिलौषधयश्च मात्स्येक्रौडे हतो दितिज उद्धरताम्भस: क्ष्माम् ।
कौर्मे धृतोद्विस्मृतोन्मथने स्वपृष्टेग्राहात्प्रपन्नमिभराजममुझ्नदार्तम् ॥
१८॥
गुप्त:--रक्षित; अप्यये--प्रलय के समय; मनु:--वैवस्वत मनु; इला--पृथ्वी-लोक; ओषधय:--वनस्पतियाँ; च--तथा;मात्स्ये--अपने मत्स्य अवतार में; क़ौडे--वराह अवतार में; हतः--मारा गया; दिति-ज:--दिति-पुत्र हिरण्याक्ष; उद्धरता--उद्धारकर्ता द्वारा; अम्भस:--जल से; क्ष्मामू--पृथ्वी को; कौमें--कच्छप के रूप में; धृत:-- धारण किया हुआ; अद्वि:--पर्वत( मन्दर ); अमृत-उन्मथने--जब अमृत मन्थन हो रहा था ( असुरों तथा देवों द्वारा एक साथ ); स्व-पृष्ठे--अपनी पीठ पर;ग्राहातू-ग्राह या घड़ियाल से; प्रपन्नम्ू--शरणागत; इभ-राजम्--गजेन्द्र; अमुञ्जञत्ू--छुड़ाया; आर्तमू-पीड़ित |
मत्स्य अवतार में भगवान् ने सत्यव्रत मनु, पृथ्वी तथा उसकी मूल्यवान औषधियों की रक्षाकी।
उन्होंने प्रलय-जल से उनकी रक्षा की।
सूकर के रूप में भगवान् ने दिति-पुत्र हिरण्याक्ष कावध किया और ब्रह्माण्ड-जल से पृथ्वी का उद्धार किया।
कच्छप-रूप में उन्होंने अपनी पीठ परमन्दर पर्वत को उठा लिया, जिससे समुद्र को मथ कर अमृत निकाला जा सके।
भगवान् नेशरणागत गजेन्द्र को बचाया, जो घड़ियाल के चँगुल में भीषण यातना पा रहा था।
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संस्तुन्ब॒तो निपतितान्श्रमणानृषी श्रशक्रं च वृत्रवधतस्तमसि प्रविष्टम् ।
देवस्त्रियोसुरगृहे पिहिता अनाथाजघ्नेसुरेन्द्रभभयाय सतां नृसिंहे ॥
१९॥
संस्तुन्व॒तः --स्तुति कर रहे; निपतितान्ू--( गो-खुर के जल में ) गिरे हुए; श्रमणान्--साधुओं को; ऋषीन्--ऋषियों( वालखिल्यों ) को; च--तथा; शक्रम्--इन्द्र को; च--तथा; बृत्र-बधत:--वृत्रासुर के वध से; तमसि--अंधकार में;प्रविष्टमू--लीन; देव-स्त्रियः:--देव-पत्नियाँ; असुर-गृहे--असुर के महल में; पिहिता:--बन्दी बनाई गई; अनाथा: --असहाय;जघ्ने--मार डाला; असुर-इन्द्रमू--असुरों के राजा, हिरण्यकशिपु को; अभयाय--अभयदान के निमित्त; सतामू--सन्त-भक्तोंको; नृसिंहे--नूसिंह-अवतार में
भगवान् ने वालखिल्य नामक लघु-रूप मुनियों का भी उद्धार किया, जब वे गो-खुर-जलमें गिर गये थे और इन्द्र उन पर हँस रहा था।
तत्पश्चात्, भगवान् ने इन्द्र को भी बचाया, जोवृत्रासुर-वध के पापकर्म के फलस्वरूप अंधकार से प्रच्छन्न था।
जब देव-पत्नियाँ असुरों केमहल में असहाय होकर बन्दी बनाई गई थीं, तो भगवान् ने ही उन्हें बचाया।
अपने नृसिंह-अवतार में भगवान् ने अपने सन्त-भक्तों का भय दूर करने के लिए असुरराज हिरण्यकशिपु कावध किया था।
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देवासुरे युधि च दैत्यपतीन्सुरार्थिहत्वान्तरेषु भुवनान्यद्धात्कलाभिः ।
भूत्वाथ वामन इमामहरद्वले: क्ष्मांयाच्ञाच्छलेन समदाददिते: सुतेभ्य; ॥
२०॥
देव-असुरे--देवताओं तथा असुरों के; युधि--युद्ध में; च--तथा; दैत्य-पतीन्-- असुरों-नायकों को; सुर-अर्थे--देवताओं केहेतु; हत्वा--मार कर; अन्तरेषु --प्रत्येक मन्वन्तर में; भुवनानि--सारे लोकों में; अदधात्--रक्षा की; कलाभि:--विविधकलाओं द्वारा; भूत्वा--बन कर; अथ--और भी; वामन:--बौने ब्राह्मण बालक के रूप में अवतार; इमाम्--यह; अहरत्ू--लेलिया; बलेः--बलि महाराज से; क्ष्माम्-पृथ्वी; याच्ञा-छलेन--दान माँगने के बहाने; समदात्--दिया; अदितेः--अदिति के;सुतेभ्य:--पुत्रों ( देवताओं ) को |
भगवान् देवताओं तथा असुरों के बीच होने वाले युद्धों का लाभ निरन्तर असुरों-नायकों कोमारने के लिए उठाते हैं।
इस प्रकार भगवान् प्रत्येक मन्वन्तर में अपने विभिन्न अवतारों के माध्यमसे ब्रह्माण्ड की रक्षा करके देवताओं को प्रोत्साहित करते हैं।
भगवान् वामन के रूप में भी प्रकटहुए और तीन पग भूमि माँगने के बहाने बलि महाराज से पृथ्वी ले ली।
तत्पश्चात्, भगवान् नेअदिति-पुत्रों को सारा जगत वापस कर दिया।
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निःक्षत्रियामकृत गां च त्रिःसप्तकृत्वोरामस्तु हैहयकुलाप्ययभार्गवाग्नि: ।
सोउब्धि बबन्ध दशवक्त्रमहन्सलड़ूंसीतापतिर्जयति लोकमलघ्नकीऋति: ॥
२१॥
निःक्षत्रियाम्--क्षत्रियविहीन; अकृत--बना दिया; गाम्--पृथ्वी को; च--तथा; त्रि:-सप्त-कृत्व: --इक्कीस बार; राम:--परशुराम ने; तु--निस्सन्देह; हैहय-कुल--हैहयवंश के; अप्यय--विनाश; भार्गव-- भूगुवंशी; अग्निः-- अग्नि; सः--वह;अब्धिम्--सागर; बबन्ध--अपने अधीन कर लिया; दश-वक्त्रमू--दस सिर वाले रावण को; अहनू--मार डाला; स-लड्ढम्--अपने राज्य लंका के सैनिकों समेत; सीता-पति:--सीता के पति भगवान् रामचन्द्र; जयति--सदैव विजयी होते हैं; लोक--सम्पूर्ण जगत के; मल--कल्मष; घ्न--नष्ट करने वाला; कीर्ति:--जिनके यश का वर्णन करने के कारण |
परशुराम का जन्म भृगुवंश में अग्नि के रूप में हुआ, जिसने हैहय कुल को जलाकर भस्मकर दिया।
इस प्रकार भगवान् परशुराम ने पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से विहीन कर दिया।
वही भगवान् सीतादेवी के पति रामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए और उन्होंने दस सिरों वाले रावणको लंका के सारे सैनिकों समेत मारा।
वे श्रीराम जिनकी कीर्ति संसार के कल्मष को नष्ट करतीहै सदैव विजयी हों!" भूमेर्भरावतरणाय यदुष्वजन्माजात: करिष्यति सुरैरपि दुष्कराणि ।
वादैर्विमोहयति यज्ञकृतोतदर्हान्शूद्रान्कलौ क्षितिभुजो न्यहनिष्यदन्ते ॥
२२॥
भूमे: -- पृथ्वी का; भर-- भार; अवतरणाय--उतारने के लिए; यदुषु--यदुवंश में; अजन्मा--अजन्मा भगवान्; जात:--जन्मलेकर; करिष्यति--करेंगे; सुरैः--देवताओं द्वारा; अपि-- भी; दुष्कराणि-- कठिन कर्म; वादैः --तर्को द्वारा; विमोहयति--मोहित करेंगे; यज्ञ-कृतः--वैदिक यज्ञों के कर्ता; अतत्-अर्हानू--जो इस तरह लगे रहने के योग्य नहीं हैं; शूद्रान्--शूद्रों को;कलौ--कलियुग में; क्षिति-भुज:--शासक; न्यहनिष्यत्--वध करेगा; अन्ते--अन्त में |
पृथ्वी का भार उतारने के लिए अजन्मा भगवान् यदुवंश में जन्म लेंगे और ऐसे कर्म करेंगे,जो देवताओं के लिए भी कर पाना असम्भव है।
वे बुद्ध के रूप में तर्कदर्शन की स्थापना करतेहुए अयोग्य वैदिक यज्ञकर्ताओं को मोहित करेंगे।
और कल्कि के रूप में वे कलियुग के अन्त मेंअपने को शासक बतलाने वाले सारे निम्न श्रेणी के लोगों का वध करेंगे।
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एवंविधानि जन्मानि कर्माणि च जगत्पते: ।
भूरीणि भूरियशसो वर्णितानि महाभुज ॥
२३॥
एवम्-विधानि--इस तरह के; जन्मानि--जन्म; कर्माणि--कर्म; च--तथा; जगत्-पते: --ब्रह्माण्ड के स्वामी के; भूरीणि--असंख्य; भूरि-यशसः--अत्यन्त यशस्वी; वर्णितानि--वर्णित; महा-भुज--हे बलशाली राजा निमि।
हे महाबाहु राजा, ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान् के ऐसे जन्म तथा कर्म असंख्य हैं, जिस तरहकि मैं वर्णन कर चुका हूँ।
वस्तुतः भगवान् की कीर्ति अनन्त है।
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