← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची
अध्याय बारह: श्रीमद-भागवतम के विषयों का सारांश
12.12सूत उबाचनमो धर्माय महते नमः कृष्णाय वेधसे ।
ब्रह्मणे भ्योनमस्कृत्यधर्मान्वक्ष्ये सनातनान् ॥
१॥
सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; नमः --नमस्कार; धर्माय--धर्म को; महते--महानतम; नम:--नमस्कार; कृष्णाय--कृष्ण को; वेधसे--स्त्रष्टा; ब्रह्मणेभ्य: --ब्राह्मणों को; नमस्कृत्य--नमस्कार करके; धर्मान्ू--धर्म को; वक्ष्ये--कहूँगा;सनातनानू-शाश्वत
सूत गोस्वामी ने कहा : परम धर्म भक्ति को, परम स्त्रष्टा भगवान् कृष्ण को तथा समस्तब्राह्मणों को नमस्कार करके, अब मैं धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों का वर्णन करूँगा।
"
एतद्ठः कथित विप्रा विष्णोश्वरितमद्भुतम् ।
भवद्धिर्यदहं पृष्टो नराणां पुरुषोचितम् ॥
२॥
एतत्--ये; वः--तुम सबों को; कथितम्--सुनाया; विप्रा:--हे ऋषियो; विष्णो:-- भगवान् विष्णु की; चरितम्--लीलाएँ; अद्भुतम्ू-- अद्भुत; भवद्धिः--आप लोगों द्वारा; यत्--जो; अहम्--मैं; पृष्ट:--पूछा गया; नराणाम्--मनुष्यों मेंसे; पुरुष--वास्तविक मनुष्य के लिए; उचितम्--उपयुक्त |
हे ऋषियो, मैं आप लोगों से भगवान् विष्णु की अद्भुत लीलाएँ कह चुका हूँ, क्योंकिआप लोगों ने इनके विषय में मुझसे पूछा था।
ऐसी कथाओं का सुनना उस व्यक्ति के लिएउचित है, जो वास्तव में मानव है।
"
अन्न सड्डीरतितः साक्षात्सर्वपापहरो हरि: ।
नारायणो हषीकेशो भगवान्सात्वताम्पति: ॥
३॥
अत्र--यहाँ, श्रीमद्भागवत में; सड्डी्तित:--पूरी तरह प्रशंसित; साक्षात्-प्रत्यक्ष; सर्व-पाप--सारे पापों का; हरः --हर्ता;हरिः--भगवान् हरि; नारायण:--नारायण; हषीकेश: --हषीकेश; भगवान्-- भगवान्; सात्वताम्--यदुओं के; पति: --स्वामी |
यह ग्रंथ उन भगवान् श्री हरि का पूर्ण गुणगान करने वाला है, जो अपने भक्तों के सारेपापों को दूर करने वाले हैं।
भगवान् का यह गुणगान नारायण, हषीकेश तथा सात्वतों केप्रभु के रूप में किया गया है।
"
अत्र ब्रह्म परं गुह्ां जगतः प्रभवाप्ययम् ।
ज्ञानं च तदुपाख्यान प्रोक्त विज्ञानसंयुतम् ॥
४॥
अन्न--यहाँ; ब्रह्म-- परब्रह्म; परमू--परम; गुह्ममू--गोपनीय; जगत: --इस ब्रह्माण्ड के; प्रभव--सृष्टि; अप्ययम्--तथासंहार; ज्ञामम्ू--ज्ञान; च--तथा; तत्-उपाख्यानमू--उसका अनुशीलन करने के साधन; प्रोक्तम्--कहे हुए; विज्ञान--दिव्यअनुभूति; संयुतम्-से युक्त |
यह ग्रंथ इस ब्रह्माण्ड के सृजन तथा संहार के स्त्रोत परब्रह्म के रहस्य का वर्णन करताहै।
यही नहीं, इसमें उनके देवी ज्ञान के साथ साथ उसके अनुशीलन की विधि तथा मनुष्यद्वारा प्राप्त होने वाली दिव्य अनुभूति का भी वर्णन हुआ है।
"
भक्तियोगः समाख्यातो वैराग्यं च तदाश्रयम् ।
पारीक्षितमुपाख्यानं नारदाख्यानमेव च ॥
५॥
भक्ति-योग:--भक्ति की विधि; समाख्यात:-- भलीभाँति कही गई; वैराग्यमू--वैराग्य; च--तथा; तत्-आश्रयम्--उससेगौण; पारीक्षितम्--महाराज परीक्षित का; उपाख्यानम्--इतिहास; नारद--नारद का; आख्यानमू--इतिहास; एव--निस्सन्देह; च--भी |
इसमें भक्ति की विधि के साथ साथ वैराग्य का गौण स्वरूप तथा महाराज परीक्षित एवंनारद मुनि के इतिहास का भी वर्णन हुआ है।
"
प्रायोपवेशो राजर्षेविप्रशापात्परीक्षित: ।
शुकस्य ब्रह्मर्षभस्य संवादश्च परीक्षित: ॥
६॥
प्राय-उपवेश: --आमरण उपवास; राज-ऋषे: --राजर्षि के; विप्र-शापात्--ब्राह्मण-पुत्र के शाप के कारण; परीक्षित:--राजा परीक्षित का; शुकस्य--शुकदेव की; ब्रह्य-ऋषभस्य--ब्राह्मण- श्रेष्ठ; संवाद: --वार्ता; च--तथा; परीक्षित:--परीक्षित से |
इसके साथ ही ब्राह्मण-पुत्र के शाप के शमनार्थ परीक्षित का आमरण उपवास करनातथा परीक्षित और ब्राह्मण- श्रेष्ठ शुकदेव के मध्य हुई वार्ता का भी वर्णन हुआ है।
"
योगधारणयोत्क्रान्ति: संवादो नारदाजयो: ।
अवतारानुगीतं च सर्ग: प्राधानिकोग्रत: ॥
७॥
योग-धारणया--योग में ध्यान स्थिर करके; उत्क्रान्ति:--मृत्यु के समय मोक्ष-लाभ; संवाद: --वार्ता; नारद-अजयो:--नारद तथा ब्रह्मा के बीच; अवतार-अनुगीतम्-- भगवान् के अवतारों की सूची प्रस्तुत करना; च--तथा; सर्ग:--सृष्टिक्रिया; प्राधानिक: --अव्यक्त प्रकृति से; अग्रतः--आगे-आगे।
भागवत बतलाती है कि किस तरह योग में ध्यान स्थिर करके मृत्यु के समय मोक्ष प्राप्तकिया जा सकता है।
इसमें नारद तथा ब्रह्मा के बीच हुईं वार्ता, भगवान् के अवतारों कीगणना तथा भौतिक प्रकृति की अव्यक्त अवस्था से लेकर क्रमशः यह ब्रह्माण्ड जिस तरहबना, उसका भी वर्णन हुआ है।
"
विदुरोद्धवसंवादः क्षत्तृमैत्रेययोस्तत: ।
पुराणसंहिताप्रश्नो महापुरुषसंस्थिति: ॥
८ ॥
विदुर-उद्धव--विदुर तथा उद्धव के बीच हुई; संवाद:--चर्चा; क्षत्तृ-मैत्रेययो: --विदुर तथा मैत्रेय के बीच; तत:--तब;पुराण-संहिता--पुराणों के संकलन के विषय में; प्रश्न: --प्रश्न; महा-पुरुष--भगवान् के भीतर; संस्थिति:--सृष्टि कालय।
इस शास्त्र में उद्धव तथा मैत्रेय के साथ विदुर के संवादों, इस पुराण के विषय में प्रश्न तथा प्रलय के समय भगवान् के शरीर में सृष्टि के विलीन होने का भी वर्णन हुआ है।
"
ततः प्राकृतिक: सर्ग: सप्त वैकृतिकाश्च ये ।
ततो ब्रह्माण्डसम्भूतिवैंराज: पुरुषो यत: ॥
९॥
ततः--तब; प्राकृतिक:--भौतिक प्रकृति से; सर्ग:--सृष्टि; सप्त--सात; बैकृतिका:--विकारों से उत्पन्न सृष्टि कीअवस्थाएँ; च--तथा; ये--जो; ततः--तत्पश्चात्; ब्रह्म-अण्ड--ब्रह्माण्ड के अंडे का; सम्भूति:--निर्माण; बैराज:पुरुष:-- भगवान् का विश्व रूप; यत:--जिससे।
प्रकृति के गुणों के क्षोभ से उत्पन्न सृष्टि, तात्विक विकारों से विकास की सात अवस्थाएँतथा उस विश्व अंडे का निर्माण जिससे भगवान् के विश्व रूप का उदय होता है--इन सबोंका इसमें पूरी तरह वर्णन हुआ है।
"
'कालस्य स्थूलसूक्ष्मस्थ गति: पद्मसमुद्धव: ।
भुव उद्धरणेम्भोधेहिरण्याक्षवधो यथा ॥
१०॥
कालस्य--काल की; स्थूल-सूक्ष्मस्थ--स्थूल तथा सूक्ष्म; गति:--गति; पद्य--कमल का; समुद्धव: --उत्पन्न होना;भुव:--पृथ्वी का; उद्धरणे--उद्धार करने के सम्बन्ध में; अम्भोधे: --सागर से; हिरण्याक्ष-वध: --हिरण्याक्ष का वध;यथा--जिस तरह हुआ।
अन्य विषयों में काल की स्थूल तथा सूक्ष्म गतियाँ, गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि सेकमल की उत्पत्ति तथा हिरण्याक्ष असुर का वध जब गर्भोदक सागर से पृथ्वी का उद्धारहुआ, सम्मिलित हैं।
"
ऊर्ध्वतिर्यगवाक्सर्गो रुद्रसर्गस्तथेव च ।
अर्धनारीश्वरस्थाथ यतः स्वायम्भुवो मनु; ॥
११॥
ऊर्ध्व--उच्च योनियों, अर्थात् देवताओं का; तिर्यक्--पशुओं का; अवाक्--तथा निम्न योनियों का; सर्ग:--सृजन;रुद्र--शिव की; सर्ग:--उत्पत्ति; तथा--और; एव--निस्सन्देह; च-- भी; अर्ध-नारी-- आधे पुरुष तथा आधे नारी रूप में;ईश्वरस्थ--ई श्र का; अथ--तब; यत: --जिससे; स्वायम्भुव: मनु:--स्वायंभुव मनु
भागवत में देवताओं, पशुओं तथा आसुरी योनियों की उत्पत्ति, भगवान् रुद्र के जन्मतथा अर्धनारीश्वर से स्वायम्भुव मनु के प्राकट्य का भी वर्णन हुआ है।
"
शतरूपा च या स्त्रीणामाद्या प्रकृतिरुत्तमा ।
सन््तानो धर्मपत्नीनां कर्दमस्य प्रजापते: ॥
१२॥
शतरूपा--शतरूपा; च--तथा; या--जो; स्त्रीणाम्-स्त्रियों की; आद्या--पहली; प्रकृति: --प्रिया; उत्तमा--उत्तम;सनन््तान:--सन््तान; धर्म-पत्नीनाम्ू--पवित्र पत्नियों की; कर्दमस्य--कर्दम ऋषि की; प्रजापते:--प्रजापति |
इसमें प्रथम स्त्री शतरूपा, जोकि मनु की उत्तम प्रिया थीं तथा प्रजापति कर्दम की पवित्रपत्नियों की सन््तान का भी वर्णन हुआ है।
"
अवतारो भगवत: कपिलस्य महात्मन: ।
देवहूत्याश्व संवाद: कपिलेन च धीमता ॥
१३॥
अवतार:--अवतरण; भगवत:-- भगवान्; कपिलस्थ--कपिल का; महा-आत्मन:--परमात्मा; देवहूत्या:--देवहूति का;च--तथा; संवाद:--संवाद; कपिलेन--कपिल के साथ; च--तथा; धी-मता--बुद्धिमान |
भागवत में महान् कपिल मुनि के रूप में भगवान् के अवतार का और इस विद्वानमहात्मा तथा उनकी माता देवहूति के बीच हुई वार्ता का अंकन है।
"
नवब्रह्मसमुत्पत्तिर्द क्षजज्ञविनाशनम् ।
ध्रुवस्य चरितं पश्चात्पूथो: प्राचीनबर्हिष: ॥
१४॥
नारदस्य च संवादस्ततः प्रैयत्रतं द्विजा: ।
नाभेस्ततोनुचरितमृषभस्य भरतस्य च ॥
१५॥
नव-ब्रह्म--नौ ब्राह्मणों ( मरीचि आदि ब्रह्मा के पुत्रों ) की; समुत्पत्ति:--सन्तानें; दक्ष-यज्ञ-दक्ष द्वारा सम्पन्न यज्ञ का;विनाशनमू--विध्वंस; श्रुवस्थ-- श्रुव महाराज का; चरितम्--इतिहास; पश्चात्--तब; पृथो:--राजा पृथु का;प्राचीनबर्हिष: -- प्राचीनबर्हि का; नारदस्थ--नारद मुनि का; च--तथा; संवाद: --संवाद; ततः--तत्पश्चात् प्रैयत्रतम्--महाराज प्रियत्रत की कथा; द्विजा:--हे ब्राह्मणो; नाभे:--नाभि का; तत:--तब; अनुचरितम्--जीवन चरित्र; ऋषभस्य--राजा ऋषभ का; भरतस्य--भरत महाराज का; च--तथा
इसमें नौ महान् ब्राह्मणों की सन््तानों, दक्ष के यज्ञ के विध्वंस तथा श्रुव महाराज केइतिहास, तत्पश्चात् राजा पृथु एवं राजा प्राचीनबर्हिं की कथाओं, प्राचीनबर्हिं तथा नारद केबीच संवाद तथा महाराज प्रियत्रत के जीवन का वर्णन हुआ है।
तत्पश्चात् हे ब्राह्मणो,भागवत में राजा नाभि, भगवान् ऋषभ तथा राजा भरत के चरित्र एवं कार्यों का वर्णनमिलता है।
"
द्वीपवर्षसमुद्राणां गिरिनद्युपवर्णनम् ।
ज्योतिश्नक्रस्य संस्थानं पातालनरकस्थिति: ॥
१६॥
द्वीप-वर्ष-समुद्राणाम्-द्वीपों, बड़े द्वीपों तथा समुद्रों का; गिरि-नदी--पर्वतों तथा नदियों का; उपवर्णनम्--विस्तृत वर्णन;ज्योति:-चक्रस्य--स्वर्गिक मण्डल की; संस्थानम्--व्यवस्था; पाताल--अधोलोकों की; नरक--तथा नरक की;स्थिति:--स्थिति ।
भागवत में पृथ्वी के महाद्वीपों, वर्षों, समुद्रों, पर्वतों तथा नदियों का विस्तृत वर्णनमिलता है।
इसमें स्वर्गिक मण्डल की व्यवस्था तथा पाताल और नरक में विद्यमान स्थितियोंका भी वर्णन हुआ है।
"
दक्षजन्म प्रचेतोभ्यस्तत्पुत्रीणां च सन्तति: ।
यतो देवासुरनरास्तिर्यड्नगखगादय: ॥
१७॥
दक्ष-जन्म--दक्ष का जन्म; प्रचेतोभ्य:--प्रचेताओं से; तत्-पुत्रीणाम्--उसकी पुत्रियों की; च--तथा; सन्तति:--सन्तान;यतः--जिससे; देव-असुर-नरा:--देवता, असुर तथा मनुष्य; तिर्यक्-नग-खग-आदय:--पशु, सर्प, पक्षी आदि योनियाँ।
इसमें प्रचेताओं के पुत्र रूप में प्रजापति दक्ष का पुनर्जन्म तथा दक्ष की पुत्रियों कीसंतति जिससे देवताओं, असुरों, मनुष्यों, पशुओं, सर्पों, पक्षियों आदि की जातियाँ प्रारम्भहुई--इन सबों का वर्णन हुआ है।
"
त्वाष्ट्स्य जन्मनिधन पुत्रयोश्च दितेद्विजा: ।
दैत्येश्वरस्य चरितं प्रह्मदस्य महात्मनः ॥
१८ ॥
त्वाप्टस्थ--त्वष्टा के पुत्र ( वृत्र ) का; जन्म-निधनम्--जन्म तथा मृत्यु; पुत्रयो: --दो पुत्रों, हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकशिपु का;च--तथा; दिते:--दिति का; द्विजा:--हे ब्राह्मणो; दैत्य-ई श्वरस्थ--सबसे बड़े देत्य; चरितम्--इतिहास; प्रह्मदस्य--प्रह्मदका; महा-आत्मन:--महात्मा |
हे ब्राह्मणो, भागवत में वृत्रासुर के तथा दिति-पुत्र हिरण्याक्ष एवं हिरण्यकशिपु के जन्मोंतथा मृत्युओं का और उसी के साथ दिति के महानतम वंशज, महात्मा प्रह्ाद, के इतिहासका वर्णन हुआ है।
"
मन्वन्तरानुकथन गजेन्द्रस्थ विमोक्षणम् ।
मन्वन्तरावताराश्च विष्णोईयशिरादय: ॥
१९॥
मनु-अन्तर--विभिन्न मनुओं के शासनों के; अनुकथनम्--विस्तृत विवरण; गज-इन्द्रस्य--हाथियों के राजा का;विमोक्षणम्--मोक्ष; मनु-अन्तर-अवतारा: --प्रत्येक मन्वन्तर में भगवान् के विशिष्ट अवतार; च--तथा; विष्णो: -- भगवान्विष्णु के; हयशिर-आदय:--यथा हयशीर्ष |
इसमें प्रत्येक मनु का शासनकाल, गजेन्द्र के मोक्ष तथा प्रत्येक मन्वन्तर में भगवान्विष्णु के विशिष्ट अवतारों, यथा भगवान् हयशीर्ष, का भी वर्णन है।
"
कौर्म मात्स्यं नारसिंहं वामनं च जगत्पते: ।
क्षीरोदमथनं तद्गदमृतार्थे दिवौकसाम् ॥
२०॥
कौर्मम्ू--कछुए के रूप में अवतार; मात्स्यम्ू--मछली का; नारसिंहम्--नृसिंह के रूप में; वामनम्--वामन के रूप में;च--तथा; जगतू-पते: --ब्रह्मण्ड के स्वामी का; क्षीर-उद--दूध के सागर का; मथनम्--मन्थन; तद्ब॒त्--इस प्रकार;अमृत-अर्थे--अमृत के हेतु; दिव-ओकसाम्ू-स्वर्ग के निवासियों द्वारा।
भागवत में कूर्म, मत्स्य, नरसिंह तथा वामन के रूप में ब्रह्माण्ड के स्वामी के प्राकट्योंएवं अमृत प्राप्ति के लिए देवताओं द्वारा क्षीर सागर के मंथन का भी वर्णन है।
"
देवासुरमहायुद्धं राजवंशानुकीर्तनम् ।
इक्ष्वाकुजन्म तद्वृंशः सुद्युम्नस्य महात्मतः ॥
२१॥
देव-असुर--देवताओं तथा असुरों का; महा-युद्धम्-महान् युद्ध; राज-वंश--राजाओं के वंशों का; अनुकीर्तनम्--एक -एक करके सुनाया जाना; इक्ष्वाकु-जन्म--इक्ष्वाकु का जन्म; ततू-वंश:--उसका वंश; सुद्यम्नस्य--तथा सुद्युम्न का( वंश ); महा-आत्मन:--महात्मा |
देवताओं तथा असुरों के बीच लड़ा गया महायुद्ध, विभिन्न राजाओं के वंशों काक्रमबद्ध वर्णन तथा इश्ष्वाकु के जन्म, उसके वंश एवं महात्मा सुद्युम्न के वंश से सम्बन्धितकथाएँ-इन सबों को इस ग्रंथ में प्रस्तुत किया गया है।
"
इलोपाख्यानमत्रोक्त तारोपाख्यानमेव च ।
सूर्यवंशानुक थनं शशादाद्या नृगादय: ॥
२२॥
इला-उपाख्यानम्--इला का इतिहास; अच्च--इसमें; उक्तम्--कहा गया है; तारा-उपाख्यानम्--तारा का इतिहास; एव--निस्सन्देह; च--भी; सूर्य-वंश--सूर्यदेव के वंश की; अनुकथनम्--क था; शशाद-आद्या:--शशाद इत्यादि; नृग-आदय:--नृग इत्यादि
इसमें इला तथा तारा के इतिहास तथा सूर्य देव के वंशजों का जिनमें शशाद तथा नृगजैसे राजा सम्मिलित हैं, वर्णन हुआ है।
"
सौकन्यं चाथ शर्याते: ककुत्स्थस्य च धीमत: ।
खट्वाडुस्य च मान्धातु: सौभरे: सगरस्य च ॥
२३॥
सौकन्यम्--सुकन्या की कथा; च--तथा; अथ--तब; शर्याते:--शर्याति की; ककुत्स्थस्य--ककुत्स्थ की; च--तथा;धी-मतः--बुद्धिमान राजा; खट्वाड्ुस्य--खट्वांग की; च--तथा; मान्धातु:--मान्धाता की; सौभरे: --सौभरि की;सगरस्य--सगर की; च--तथा
इसमें सुकन्या, शर्याति, बुद्धिमान ककुत्स्थ, खट्वांग, मान्धाता, सौभरि तथा सगर कीकथाएँ कही गई हैं।
"
रामस्य कोशलेन्द्रस्य चरितं किल्बिषापहम् ।
निमेरड्भपरित्यागो जनकानां च सम्भव: ॥
२४॥
रामस्थ--भगवान् रामचन्द्र की; कोशल-इन्द्रस्य--कोशल के राजा; चरितम्--लीलाएँ; किल्बिष-अपहम्--समस्त पापोंको भगाने वाली; निमेः--राजा निमि का; अड्भ-परित्याग: --शरीर त्याग; जनकानाम्ू--जनक के वंशजों की; च--तथा;सम्भव: --उत्पत्ति |
भागवत में कोशल के राजा भगवान् रामचन्द्र की पवित्रकारिणी लीलाओं का वर्णन हैऔर उसी के साथ यह भी बताया गया है कि राजा निमि ने किस तरह अपना भौतिक शरीरछोड़ा।
इसमें राजा जनक के वंशजों की उत्पत्ति का भी उल्लेख हुआ है।
"
रामस्य भार्गवेन्द्रस्थ नि:क्षतूईकरणं भुव: ।
ऐलस्य सोमवंशस्य ययातेर्नहुषस्थ च ॥
२५॥
दौष्मन्तेर्भरतस्यापि शान्तनोस्तत्सुतस्य च ।
ययातेरज्येप्ठपुत्रस्थ यदोर्वशो उनुकीर्तित: ॥
२६॥
रामस्थ--परशुराम का; भार्गव-इन्द्रस्य--भूगु मुनि के वंशजों में सबसे महान्; निःक्षत्री-करणम्--सरे क्षत्रियों कानिष्कासन; भुव:--पृथ्वी के; ऐलस्थ--महाराज ऐल का; सोम-वंशस्य--चन्द्र देव के वंश का; ययाते: --ययाति का;नहुषस्थ--नहुष का; च--तथा; दौष्मन्ते: --दुष्मन्त के पुत्र; भरतस्य--भरत का; अपि--भी; शान्तनो: --राजा शान्तनुका; तत्--उसका; सुतस्य--पुत्र, भीष्म का; च--तथा; ययाते: --ययाति के; ज्येष्ठ-पुत्रस्थ--ज्येष्ठ पुत्र; यदो:--यदु का;वंश:--वंश; अनु-कीर्तित:--महिमा-गायन किया गया है।
श्रीमद्भागवत में वर्णन हुआ है कि किस तरह भृगुवंशियों में सबसे महान् भगवान्परशुराम ने पृथ्वी से सारे क्षत्रियों का संहार किया।
इसमें उन यशस्वी राजाओं के जीवनों कावर्णन हुआ है, जो चन्द्रवंश में प्रकट हुए--यथा ऐल, ययाति, नहुष, दुष्मन्त पुत्र भरत,शान्तनु तथा शान््तनु पुत्र भीष्म जैसे राजा।
इसके साथ ही ययाति के ज्येष्ठ पुत्र राजा यदु द्वारास्थापित महान् वंश का भी वर्णन हुआ है।
"
यत्रावतीर्णो भगवान् कृष्णाख्यो जगदी श्वर: ।
वसुदेवगृहे जन्म ततो वृद्द्धिश्च गोकुले ॥
२७॥
यत्र--जिस वंश में; अवतीर्ण:--अवतरित हुए; भगवान् --पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्; कृष्ण-आख्य:--कृष्ण नामक; जगतू-ईश्वरः--ब्रह्माण्ड के स्वामी; वसुदेव-गृहे--वसुदेव के घर में; जन्म--जन्म; ततः--तत्पश्चात्; वृद्धिः--बड़ा होना; च--तथा; गोकुले--गोकुल में |
जिस तरह ब्रह्माण्ड के स्वामी भगवान् श्रीकृष्ण यदुवंश में अबतरित हुए, जिस तरहउन्होंने बसुदेव के घर में जन्म लिया और जिस तरह वे गोकुल में बड़े हुए--इन सबका इसमेंविस्तार से वर्णन हुआ है।
"
तस्य कर्माण्यपाराणि कीर्तितान्यसुरद्विष: ।
पूतनासुपयःपानं शकटोच्चाटनं शिशो: ॥
२८॥
तृणावर्तस्य निष्पेषस्तथेव बकवत्सयो: ।
अघासुरवधो धात्रा वत्सपालावगृहनम् ॥
२९॥
तस्य--उसके; कर्माणी--कार्यकलाप; अपाराणि--असंख्य; कीर्तितानि--स्तुति किये जाते हैं; असुर-द्विष:--असुरों केशत्रु; पूतना--पूतना के; असु--प्राण; पथयः--दूध के; पानम्ू--पीना; शकत--गाड़ी का; उच्चाटनम्--भंजन; शिशो:--शिशु द्वारा; तृणावर्तस्थ--तृणावर्त का; निष्पेष:--दलन; तथा--और; एव--निस्सन्देह; बक-वत्सयो: --बक तथा वत्सनामक असुरों के; अध-असुर--अघ नामक असुर का; वध:--वध; धात्रा--ब्रह्मा द्वारा; वत्स-पाल--बछड़े तथाग्वालबालों का; अवगूृहनम्--छिपाया जाना।
इसमें असुरों के शत्रु श्रीकृष्ण की असंख्य लीलाओं का, जिनमें पूतना के स्तनों से दुग्धके साथ प्राण को चूस लेने, शकट भंजन, तृणावर्त दलन, बकासुर-वध, वत्सासुर तथाअघासुर के वध की बाल-लीलाएँ और ब्रह्मा द्वारा उनके बछड़ों तथा ग्वालबाल मित्रों कागुफा में छिपाये जाने के समय की गई लीलाओं का महिमा-गायन है।
"
धेनुकस्य सहश्चातु: प्रलम्बस्थ च सड्झ्षयः ।
गोपानां च परित्राणं दावाग्ने: परिसर्पत: ॥
३०॥
धेनुकस्य--धेनुक का; सह- भ्रातु:-- साथियों समेत; प्रलम्बस्थ--प्रलम्ब का; च--तथा; सड्क्षय:--विनाश; गोपानामू--ग्वालबालों की; च--तथा; परित्राणम्--रक्षा; दाव-अग्ने: --जंगल की आग से; परिसर्पत: --घेरे हुई |
श्रीमद्भागवत में बताया गया है कि किस तरह भगवान् कृष्ण तथा बलराम नेधेनुकासुर तथा उसके साथियों को मारा, किस तरह बलराम ने प्रलम्बासुर का विनाश कियाऔर किस तरह कृष्ण ने दावाग्नि से घिरे ग्वालबालों को बचाया।
"
दमन कालियस्याहेर्महाहेर्नन्दमोक्षणम् ।
ब्रतचर्या तु कन्यानां यत्र तुष्टोउच्युतो ब्रते: ॥
३१॥
प्रसादो यज्ञपत्नीभ्यो विप्राणां चानुतापनम् ।
गोवर्धनोद्धारणं च शक्रस्य सुरभेरथ ॥
३२॥
यज्ञभिषेकः कृष्णस्य स्त्रीभि: क्रीडा च रात्रिषु ।
श्डुचूडस्य दुर्बुद्धेर्वधो उरिष्टस्थ केशिन: ॥
३३॥
दमनम्--दमन; कालियस्य--कालिय का; अहे:--सर्प; महा-अहेः --विशाल सर्प से; नन्द-मोक्षणम्--महाराज नन्द कोछुड़ाना; ब्रत-चर्या--ब्रत रखना; तु--तथा; कन्यानाम्--गोपियों का; यत्र--जिससे; तुष्ट: --तुष्ट हुए; अच्युत:-- भगवान्कृष्ण; ब्रतैः--उनके ब्रतों से; प्रसाद: --कृपा; यज्ञ-पत्लीभ्य:--वैदिक यज्ञ करने वाले ब्राह्मण पत्तियों को; विप्राणाम्--ब्राह्मण पतियों का; च--तथा; अनुतापनम्--पश्चाताप; गोवर्धन-उद्धारणम्--गोवर्धन पर्वत का उठाया जाना; च--तथा;शक्रस्य--इनद्र द्वारा; सुरभेः--सुरभि गाय के साथ; अथ--तब; यज्ञ-अभिषेक:--पूजा तथा अनुष्ठानिक स्नान कराना;कृष्णस्य--भगवान् कृष्ण का; स्त्रीभि:--स्त्रियों के साथ; क्रीडा--खेलकूद; च--तथा; रात्रिषु--रातों में; शट्डुचूडस्य--शंखचूड़ असुर का; दुर्बुद्धेः--मूर्ख; बध:--मारा जाना; अरिष्टस्थ--अरिष्ट का; केशिन:--केशी का।
कालिय नाग का दमन, नन्द महाराज का विशाल सर्प से बचाया जाना, तरुण गोपियोंद्वारा कठिन ब्रत किया जाना और इस तरह कृष्ण का तुष्ट होना, उन वैदिक ब्राह्मणों कीपश्चाताप कर रही पत्नियों के प्रति कृपा-प्रदर्शन, गोवर्धन पर्वत के उठाये जाने के बाद इन्द्रतथा सुरभि गाय द्वारा पूजा तथा अभिषेक किया जाना, गोपियों के साथ कृष्ण कीरात्रिकालीन लीलाएँ तथा शंखचूड़, अरिष्ट एवं केशी जैसे मूर्ख असुरों का वध--ये सारीलीलाएँ इसमें विस्तार से वर्णित हैं।
"
अक्रूरागमनं पश्चात्प्रस्थानं रामकृष्णयो: ।
ब्रजस्त्रीणां विलापश्च मथुरालोकनं ततः ॥
३४॥
अक्रूर--अक्रूर का; आगमनम्-- आना; पश्चात्--उसके बाद; प्रस्थानम्-- प्रस्थान; राम-कृष्णयो: >बलराम तथा कृष्णका; ब्रज-स्त्रीणाम्--वृन्दावन की स्त्रियों का; विलाप:--शोक; च--तथा; मथुरा-आलोकनमू--मथुरा का देखना;ततः--तब
भागवत में अक्रूर के आने, तत्पश्चात् कृष्ण तथा बलराम का जाना, गोपियों का विलापऔर मथुरा भ्रमण का वर्णन मिलता है।
"
गजमुष्टिकचाणूरकंसादीनां तथा वध: ।
मृतस्यानयनं सूनो: पुनः सान्दीपनेग्गुरो: ॥
३५॥
गज--कुवलयापीड़ नामक हाथी का; मुष्टिक-चाणूर--मुष्टिक तथा चाणूर नामक मल्लों का; कंस--कंस का;आदीनाम्--तथा अन्यों का; तथा-- भी; वध:--मारा जाना; मृतस्य--मरे हुए; आनयनम्--वापस लाया जाना; सूनो: --पुत्र का; पुन:--फिर से; सान्दीपने: --सान्दीपनि के; गुरो:--अपने गुरु |
इसमें इसका भी वर्णन हुआ है कि किस तरह कृष्ण तथा बलराम ने कुवलयापीड़हाथी, मुष्टिक तथा चाणूर मल्लों एवं कंस आदि असुरों का वध किया और किस तरह कृष्णअपने गुरु सान्दीपनि मुनि के मृत पुत्र को वापस ले आये।
मथुरायां निवसता यदुचक्रस्य यत्प्रियम् ।
कृतमुद्धवरामाभ्यां युतेन हरिणा द्विजा: ॥
३६॥
मथुरायाम्-मथुरा में; निवसता--रहते हुए; यदु-चक्रस्थ--यदुवंशियों के हेतु; यत्--जो; प्रियम्--तृप्तिकारक; कृतम्--किया गया; उद्धव-रामाभ्याम्--उबद्भव तथा बलराम के साथ; युतेन--युक्त; हरिणा--हरि द्वारा; द्विजा:--हे ब्राह्मणो |
तत्पश्चात् हे ब्राह्मणो, इस शास्त्र में बतलाया गया है कि किस तरह उद्धव और बलराम के साथ मथुरा में निवास करते हुए भगवान् हरि ने यदुवंश की तुष्टि के लिए लीलाएँ कीं।
"
जरासन्धसमानीतसैन्यस्य बहुशो वध: ।
घातनं यवनेन्द्रस्य कुशस्थल्या निवेशनम् ॥
३७॥
जरासन्ध--जरासश्थ द्वारा; समानीत--एकत्र की गई; सैन्यस्थ--सेना का; बहुश:--अनेक बार; वध:--विनाश;घातनम्ू--वध; यवन-इन्द्रस्य--बर्बरों के राजाओं का; कुशस्थल्या:--द्वारका की; निवेशनम्--स्थापना |
इसके साथ ही जरासन्ध द्वारा लाईं गई अनेक सेनाओं का संहार, बर्बर राजा कालयवनका वध तथा द्वारकापुरी की स्थापना का भी वर्णन हुआ है।
"
आदानं पारिजातस्य सुधर्माया: सुरालयात् ।
रुक्मिण्या हरणं युद्धे प्रमथ्य द्विषतो हरे: ॥
३८ ॥
आदानम्-प्राप्त करना; पारिजातस्य--पारिजात वृक्ष का; सुधर्माया:--सुधर्मा सभाभवन का; सुर-आलयात्--देवताओंके धाम से; रुक्मिण्या:--रुक्मिणी का; हरणम्--हरण; युद्धे--युद्ध में; प्रमथ्य--हराकर; द्विषतः --अपने प्रतिद्वन्द्रियोंको; हरेः-- भगवान् हरि द्वारा
इस कृति में इसका भी वर्णन है कि भगवान् कृष्ण किस तरह स्वर्ग से पारिजात वृक्षतथा सुधर्मा सभाभवन लाये और उन्होंने किस तरह युद्ध में अपने प्रतिद्वन्द्रियों को हराकररुक्मिणी का हरण किया।
"
हरस्य जृम्भणं युद्धे बाणस्य भुजकृन्तनम् ।
प्राग्ज्योतिषपतिं हत्वा कन्यानां हरणं च यत् ॥
३९॥
हरस्य--शिवजी का; जृम्भणम्--जबरन जँभाई लाकर; युद्धे--युद्ध में; बाणस्थ--बाण की; भुज--भुजाओं का;कृन्तनम्--काटा जाना; प्राग्ज्योतिष-पतिम्--प्राग्ज्योतिषपुर के स्वामी को; हत्वा--मार कर; कन्यानाम्--कुमारियों का;हरणम्--हरण करना; च--तथा; यत्--जिससे |
इसमें इसका भी वर्णन हुआ है कि कृष्ण ने किस तरह बाणासुर के साथ युद्ध में, शिवको जँभाई दिलाकर परास्त किया, किस तरह उन्होंने बाणासुर की भुजाएँ काटीं और किसतरह प्राग्ज्योतिषपुर के स्वामी को मारा तथा उसके बाद उस नगरी में बन्दी की गई कुमारियोंको छुड़ाया।
"
चैद्यपौण्ड्रकशाल्वानां दन्तवक्रस्य दुर्मते: ।
शम्बरो द्विविद: पीठो मुरः पञ्ञजनादयः ॥
४०॥
माहात्म्यं च वधस्तेषां वाराणस्याश्व॒ दाहनम् ।
भारावतरणं भूमेर्निमित्तीकृत्य पाण्डवान् ॥
४१॥
चैद्य--चेदि राजा शिशुपाल का; पौण्डूक--पौण्ड्रक का; शाल्वानाम्ू--तथा शाल्व का; दन्तवक्रस्य--दन्तवक़र का;दुर्मतेः--मूर्ख ; शम्बर: द्विविद: पीठ:--शम्बर, द्विविद तथा पीठ नामक असुरों; मुरः पञ्णनजन-आदय:--मुर, पञ्ञजन तथाअन्यों; माहात्म्यम्ू--पराक्रम; च--तथा; वध:--मृत्यु; तेषामू--उनकी; वाराणस्या: --वाराणसी ( बनारस ) नामक पवित्रनगरी का; च--तथा; दाहनम्--जलाया जाना; भार-- भार का; अवतरणम्--उतारा जाना या कमी लाना; भूमे:--पृथ्वीका; निमित्ती-कृत्य--कारण बनाकर; पाण्डवान्--पाण्डु-पुत्रों को |
भागवत में चेदिराज, पौण्ड्रक, शाल्व, मूर्ख दन्तवक्र, शम्बर, द्विविद, पीठ, मुर,पञ्ञजन तथा अन्य असुरों के पराक्रमों तथा मृत्युओं के वर्णन के साथ-साथ बनारस केजलाये जाने का वर्णन है।
इसमें यह भी बताया गया है कि किस तरह कृष्ण ने कुरुक्षेत्र केयुद्ध में पाण्डवों को लगाकर पृथ्वी के भार को कम किया।
"
विप्रशापापदेशेन संहार: स्वकुलस्य च ।
उद्धवस्य च संवादो वसुदेवस्य चाद्भुतः: ॥
४२॥
यत्रात्मविद्या हाखिला प्रोक्ता धर्मविनिर्णय: ।
ततो मर्त्यपरित्याग आत्मयोगानुभावत: ॥
४३॥
विप्र-शाप--ब्राह्मण के शाप के; अपदेशेन--बहाने; संहार:--मारा जाना; स्व-कुलस्य-- अपने ही परिवार का; च--तथा; उद्धवस्य--उद्धव के साथ; च--तथा; संवाद:--बातचीत; वसुदेवस्य--( नारद के साथ ) वासुदेव की; च--तथा;अद्भुतः--अद्भुत्; यत्र--जिसमें; आत्म-विद्या--आत्मा का विज्ञान; हि--निस्सन्देह; अखिला--पूर्णरूपेण; प्रोक्ता--कहा गया; धर्म-विनिर्णय: --धर्म का सुनिश्चित किया जाना; तत:--तब; मर्त्य--मर्त्य जगत का; परित्याग: --त्याग;आत्म-योग--अपनी योगशक्ति के; अनुभावत:--बल पर
भगवान् द्वारा ब्राह्मण शाप के बहाने अपने वंश की समाप्ति, नारद के साथ वसुदेव कासंवाद, उद्धव तथा कृष्ण के बीच असाधारण बातचीत जो आत्म-विज्ञान को विस्तार सेप्रकट करने वाली है और मानव समाज के धर्म की व्याख्या करती है और फिर भगवान्कृष्ण द्वारा अपने योग-बल से इस मर्त्यलोक का परित्याग करना--इन सारी घटनाओं काभागवत में वर्णन हुआ है।
"
युगलक्षणवृत्तिश्न कलौ नृणामुपप्लव: ।
चतुर्विधश्च प्रलय उत्पत्तिस्त्रविधा तथा ॥
४४॥
युग--विभिन्न युगों के; लक्षण--लक्षण; वृत्तिः--तथा संगत कार्य; च-- भी; कलौ--वर्तमान कलियुग में; नृणाम्--मनुष्यों के; उपप्लव:--पूर्ण उत्पात; चतु:-विध:--चार प्रकार की; च--तथा; प्रलयः--प्रलय की विर्धा; उत्पत्ति: --सृष्टि;त्रि-विधा--तीन प्रकार की; तथा-- और
इस कृति में विभिन्न युगों में लोगों के लक्षण तथा आचरण, कलियुग में मनुष्यों द्वाराअनुभव की जाने वाली अव्यवस्था, चार प्रकार के प्रलय तथा तीन प्रकार की सृष्टि का भी वर्णन हुआ है।
"
देहत्यागश्च राजर्षेविंष्णुरातस्य धीमत: ।
शाखाप्रणयनमृषेर्मार्कण्डेयस्य सत्कथा ।
महापुरुषविन्यास: सूर्यस्य जगदात्मन: ॥
४५॥
देह-त्याग:--शरीर का छोड़ना; च--तथा; राज-ऋषे:--सन््त साधु स्वभाव वाले राजा द्वारा; विष्णु-रातस्य--परीक्षितका; धी-मतः--बुर्द्धिमान; शाखा--वेदों की शाखाओं का; प्रणयनम्-- प्रसार; ऋषे:--ऋषि व्यासदेव से;मार्कण्डेयस्य--मार्कण्डेय ऋषि की; सत् -कथा--शुभ कथा; महा-पुरुष--भगवान् के विश्व रूप का; विन्यास:--विस्तृतव्यवस्था; सूर्यस्थ--सूर्य की; जगत्-आत्मन:--ब्रह्माण्ड की आत्मा स्वरूप
इसमें बुद्धिमान तथा साधु स्वभाव वाले राजा विष्णुरात ( परीक्षित ) के निधन का,श्रील व्यासदेव द्वारा वेदों की शाखाओं के प्रसार की व्याख्या का, मार्कण्डेय ऋषि विषयकशुभ कथा का तथा भगवान् के विश्व रूप एवं ब्रह्माण्ड की आत्मा सूर्य के रूप में उनके रूपकी विस्तृत व्याख्या का भी विवरण है।
"
इतिचोक्तं द्विजश्रेष्ठा यत्पृष्टोडहमिहास्मि वः ।
लीलावतारकर्माणि कीर्तितानीह सर्वशः ॥
४६॥
इति--इस प्रकार; च--और ; उक्तम्--कहा गया; द्विज-दश्रेष्ठा:--हे ब्राह्मण- श्रेष्ठ; यत्ू--जो; पृष्ट:--पूछा गया; अहम्--मैं; इह--यहाँ; अस्मि--हूँ; व: --तुम्हारे द्वारा; लीला-अवतार--अपने ही आनन्द के लिए भगवान् के दैवी अवतरण;कर्माणि--कार्य; कीर्तितानि--स्तुति किये गये; इह--इस शास्त्र में; सर्वश:--पूरी तरह से ॥
इस प्रकार हे ब्राह्मण-श्रेष्ठो, यहाँ पर तुम लोगों ने जो कुछ मुझसे पूछा था, वह सब मैंनेबतला दिया।
इस ग्रंथ में भगवान् के लीला अवतारों के कार्यकलापों का विस्तार सेगुणगान हुआ है।
"
'पतित: स्खलितश्चार्त: क्षुत्ता वा विवशो गृणन् ।
हरये नम इत्युच्चैर्मुच्यते सर्वपातकात् ॥
४७॥
पतितः--गिरते हुए; स्खलित:--लड़खड़ाते; च--तथा; आर्त:--पीड़ा का अनुभव करते हुए; श्षुत्ता--छींकते हुए; वा--अथवा; विवश:--विवश होकर; गृणन्--कीर्तन करते हुए; हरये नम:--हरि को नमस्कार; इति--इस प्रकार; उच्चै: --जोर-जोर से; मुच्यते--मुक्त हो जाता है; सर्व-पातकात्--सभी पापों से |
यदि गिरते, लड़खड़ाते, पीड़ा अनुभव करते या छींकते समय कोई विवशता से भी उच्चस्वर से ' भगवान् हरि की जय हो ' चिल्लाता है, तो वह स्वतः सारे पापों से मुक्त हो जाताहै।
"
सड्डीत्यमानो भगवाननन्तःश्रुतानुभावो व्यसन हि पुंसाम् ।
प्रविश्य चित्तं विधुनोत्यशेषंयथा तमोकॉ$< भ्रमिवातिवात: ॥
४८ ॥
सड्लीतत्यमान:--ठीक से कीर्तन किये जाने पर; भगवान्-- भगवान्; अनन्त:--असीम; श्रुत--सुना जाकर; अनुभाव:--उनकी शक्ति; व्यसनम्--कष्ट; हि--निस्सन्देह; पुंसामू--मनुष्यों के; प्रविश्य--प्रवेश करके; चित्तम्--हृदय में;विधुनोति--स्वच्छ कर देता है; अशेषम्--पूरी तरह से; यथा--जिस तरह; तम:--अंधकार; अर्क:--सूर्य; अभ्रम्--बादलों को; इब--सह्ृश; अति-वात:--प्रबल वायु।
जब लोग ठीक से भगवान् की महिमा का गायन करते हैं या उनकी शक्तियों के विषयमें श्रवण करते हैं, तो भगवान् स्वयं उनके हृदयों में प्रवेश करते हैं और सारे दुर्भाग्य को उसीतरह दूर कर देते हैं जिस तरह सूर्य अंधेरे को दूर करता है या कि प्रबल वायु बादलों को उड़ाले जाती है।
"
तेमृषा गिरस्ता हासतीरसत्कथान कथ्यते यद्धगवानधोक्षज: ।
तदेव सत्य तदु हैव मड़लंतदेव पुण्यं भगवद्गुणोदयम् ॥
४९॥
मृषा:--झूठे; गिर: --शब्द; ताः--वे; हि--निस्सन्देह; असती:--असत्य; असत्-कथा:--जो नित्य नहीं है उसकी व्यर्थचर्चा; न कथ्यते--नहीं कही जाती; यत्--जिसमें; भगवान्-- भगवान्; अधोक्षज: --दिव्य प्रभु; तत्--वह; एब--एकमात्र; सत्यम्-सत्य; तत्ू--वह; उ ह--निस्सन्देह; एब--एकमात्र; मड्गलम्--शुभ; तत्ू--वह; एव--एकमात्र;पुण्यम्--पवित्र; भगवत्-गुण--भगवान् के गुणों को; उदयम्--प्रकट करने वाला
जो शब्द दिव्य भगवान् का वर्णन नहीं करते अपितु क्षणिक व्यापारों की चर्चा चलातेहैं, वे निरे झूठे तथा व्यर्थ होते हैं।
केवल वे शब्द जो भगवान् के दिव्य गुणों को प्रकट करतेहैं, वास्तव में, सत्य, शुभ तथा पवित्र हैं।
"
तदेव रम्यं रुचिरं नवं नवंतदेव शश्वन्मनसो महोत्सवम् ।
तदेव शोकार्णवशोषण नृणांयदुत्तम:शलोकयशो<नुगीयते ॥
५०॥
तत्--वह; एव--निस्सन्देह; रम्यमू-- आकर्षक; रुचिरम्-- अच्छा लगने वाला; नवम् नवम्--नया से नया; तत्--वह;एव--निस्सन्देह; शश्वत्--निरन्तर; मनस:--मन से; महा-उत्सवम्--महान् उत्सव; तत्ू--वह; एव--निस्सन्देह; शोक -अर्णब--दुख का सागर; शोषणम्--सुखाने वाला; नृणाम्--मनुष्यों के लिए; यत्--जिसमें; उत्तम:शलोक--सर्व-प्रसिद्धभगवान् का; यशः--यश; अनुगीयते--गाया जाता है।
सर्व-प्रसिद्ध भगवान् के यश का वर्णन करने वाले वे शब्द आकर्षक, आस्वाद्य तथासदैव नवीन रहते हैं।
निस्सन्देह, ऐसे शब्द मन के लिए शाश्वत उत्सव हैं और वे कष्ट केसागर को सुखाने वाले हैं।
"
न यद्वचश्चित्रपदं हरे्यशोजगत्पवित्रं प्रगुणीत कर्हिंचित् ।
तद्ध्वाड्ज्नतीऋथं न तु हंससेवितंयत्राच्युतस्तत्र हि साधवोमला: ॥
५१॥
न--नहीं; यत्--जो; वच:--वाणी; चित्र-पदम्--अलंकृत शब्द; हरेः--भगवान् के; यश:--यश; जगत्--ब्रह्माण्ड;पवित्रम्--पवित्र करने वाली; प्रगूणीत--वर्णन करते हैं; कर्हिचित्--सदैव; तत्--वह; ध्वाइक्ष--कौवों के; तीर्थम्--तीर्थस्थान; न--नहीं; तु--दूसरी ओर; हंस--ज्ञानी सन्त पुरुषों द्वारा; सेवितम्--सेवित; यत्र--जिसमें; अच्युत:-- भगवान्अच्युत ( का वर्णन रहता है ); तत्र--वहाँ; हि--एकमात्र; साधव:--साधुजन; अमला: -शुद्ध |
जो शब्द उन भगवान् के यश का वर्णन नहीं करते जो सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड के वातावरणको पवित्र करने वाले हैं, वे कौवों के तीर्थस्थान के समान हैं तथा ज्ञानी मनुष्य कभी भीउनका सहारा नहीं लेते।
शुद्ध तथा साधु स्वभाव वाले भक्तगण केवल अच्युत भगवान् केयश को वर्णनकरने वाली कथाओं में रुचि लेते हैं।
"
तद्बवाग्विस्गों जनताघसम्प्लवोयस्मिन्प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि ।
नामान्यनन्तस्य यशोडड्लितानि य-च्छुण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधव: ॥
५२॥
तत्ू--वह; वाक्ू--वाणी; विसर्ग:--सृष्टि; जनता--सामान्य लोगों के; अध--पापों के; सम्प्लव:--विप्लव; यस्मिन्ू--जिसमें; प्रति-॥
लोकम्--हर श्लोक; अबद्धवति-- अनियमित ढंग से रचा जाता है; अपि--यद्यपि; नामानि--दिव्य नाम;अनन्तस्य--अनन्त भगवान् के; यश:ः--यश; अड्वितानि-- अंकित; यत्--जो; श्रृण्वन्ति--सुनते हैं; गायन्ति--गाते हैं;गृणन्ति--स्वीकार करते हैं; साधव:--ईमानदार शुद्ध पुरुष |
दूसरी ओर, जो साहित्य अनन्त भगवान् के नाम, यश, रूप लीला आदि की दिव्यमहिमा के वर्णनों से पूर्ण होता है, वह एक सर्वथा भिन्न सृष्टि है, जो इस संसार की गुमराहसभ्यता के अपवित्र जीवन में क्रान्ति लाने वाले दिव्य शब्दों से पूर्ण होती है।
ऐसे ग्रंथ भलेही ठीकसे रचे हुए न हों, किन्तु उन शुद्ध पुरुषों द्वारा जो पूरी तरह से ईमानदार हैं, सुने, गायेऔर स्वीकार किये जाते हैं।
"
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितंन शोभते ज्ञानमलं निरज्ञनम् ।
कुतः पुनः शश्वदभद्रमी श्वरेनहार्पितं कर्म यदप्यनुत्तमम् ॥
५३॥
नैष्कर्म्यमू--सकाम कर्म के फलों से मुक्त रहना, आत्म-साक्षात्कार; अपि--यद्यपि; अच्युत--अच्युत भगवान् की;भाव--धारणा; वर्जितमू--से विहीन; न--नहीं; शोभते--शोभा देता; ज्ञानम्ू--दिव्य ज्ञान; अलमू्--वस्तुत: ; निरझ्नम्--उपाधियों से रहित; कुतः--कहाँ है; पुन:--फिर; शश्वत्--सदैव; अभद्रमू--अशोभनीय; ई श्वेरे--ई श्वर के प्रति; न--नहीं;हि--निस्सन्देह; अर्पितम्-- अर्पित; कर्म--सकाम कर्म; यत्--जो; अपि--भी; अनुत्तमम्--बेजोड़ |
आत्म-साक्षात्कार का ज्ञान समस्त भौतिक आसक्ति से मुक्त होते हुए भी ठीक से कामनहीं करता यदि वह अच्युत (ईश्वर ) के भाव से विहीन हो।
तब अच्छे से अच्छे सम्पन्न कर्मजो प्रारम्भ से पीड़ादायक तथा क्षणिक स्वभाव के होते हैं, किस काम के हो सकते हैं यदिउनका उपयोग भगवान् की भक्ति के लिए नहीं किया जाता ?"
यशःश्रियामेव परिश्रम: परोवर्णाश्रमाचारतप: श्रुतादिषु ।
अविस्मृतिः श्रीधरपादपद्ययो-गुणानुवादभ्रवणादरादिभि: ॥
५४॥
यशः--यश; थ्रियाम्--तथा ऐश्वर्य में; एव--एकमात्र; परिश्रम: -- श्रम; पर:--महान्; वर्ण-आश्रम-आचार--वर्णा श्रमप्रणाली में अपने कार्यो को सम्पन्न करके; तपः--तपस्या; श्रुत--पवित्र शास्त्रों का सुनना; आदिषु--इत्यादि में;अविस्मृति: --स्मृति; श्रीधर-- श्री को धारण करने वाले के; पाद-पदायो:--चरणकमलों के; गुण-अनुवाद--गुणों केकीर्तन का; श्रवण--सुनने से; आदर--आदर; आदिभि:--इत्यादि से
वर्णाश्रम प्रणाली में सामान्य सामाजिक तथा धार्मिक कर्तव्यों को निबाहने में, तपस्याकरने में तथा वेदों को श्रवण करने में जो महान् श्रम करना पड़ता है, उससे संसारी यश तथाऐश्वर्य की ही उपलब्धि हो पाती है।
किन्तु भगवान् लक्ष्मीपति के दिव्य गुणों का आदर करनेतथा ध्यानपूर्वक उनका पाठ सुनने से मनुष्य उनके चरणकमलों का स्मरण कर सकता है।
"
अविस्मृति: कृष्णपदारविन्दयो:क्षिणोत्यभद्राणि च शं तनोति ।
सत्त्वस्य शुद्धि परमात्मभक्तिज्ञानं च विज्ञानविरागयुक्तम् ॥
५५॥
अविस्मृतिः --स्मृति; कृष्ण-पद-अरविन्दयो:-- भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की; क्षिणोति--नष्ट करती है; अभद्राणि--अशुभ वस्तुओं को; च--तथा; शम्--सौभाग्य; तनोति--विस्तार करती है; सत्त्वस्थ--हृदय का; शुर्द्मू--शुद्धि; परम-आत्म-परमात्मा के लिए; भक्तिमू--भक्ति; ज्ञाममू--ज्ञान; च--तथा; विज्ञान--प्रत्यक्ष अनुभूति; विराग--तथा वैराग्य;युक्तमू-से युक्त |
भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की स्मृति प्रत्येक अशुभ वस्तु को नष्ट करती है औरपरम सौभाग्य प्रदान करती है।
यह हृदय को स्वच्छ बनाती है और परमात्मा की भक्ति केसाथ साथ अनुभूति तथा त्याग से युक्त ज्ञान प्रदान करती है।
"
यूय॑ं द्विजाछया बत भूरिभागायच्छश्चदात्मन्यखिलात्मभूतम् ।
नारायणं देवमदेवमीश-मजस्त्रभावा भजताविवेश्य ॥
५६॥
यूयम्ू--तुम सभी; द्विज-अछया:-हे ब्राह्मणों में परम विख्यात; बत--निस्सन्देह; भूरि-भागा:--अत्यन्त भाग्यशाली;यत्-क्योंकि; शश्वत्ू--निरन्तर; आत्मनि--अपने हृदयों में; अखिल--समस्त; आत्म-भूतम्--जो परम आत्मा है;नारायणम्--भगवान् नारायण को; देवम्-- भगवान् को; अदेवम्--जिनसे बढ़कर कोई देव नहीं है; ईशम्--परम नियन्ता;अजस््र--बिना व्यवधान के; भावा:--प्रेमपूर्ण;, भजत--तुम लोग पूजा करो; आविवेश्य--रख कर
हे सुप्रसिद्ध ब्राह्यणो, तुम लोग सचमुच अत्यन्त भाग्यशाली हो क्योंकि तुम लोगों नेपहले ही अपने हृदयों में भगवान् श्री नारायण को--परम नियन्ता तथा सारे जगत के परमआत्मा भगवान् को--धारण कर रखा है जिनसे बढ़ कर कोई अन्य देव नहीं है।
तुम लोगोंमें उनके लिए अविचल प्रेम है, अतएव मैं तुम लोगों से उनकी पूजा करने के लिए अनुरोधकरता हूँ।
"
अहं च संस्मारित आत्मतत्त्वंश्रुतं पुरा मे परमर्षिवक्त्रात् ।
प्रायोपवेशे नृपतेः परीक्षितःसदस्यृषीणां महतां च श्रृण्वताम् ॥
५७॥
अहम्-मैं; च-- भी; संस्मारित:--स्मरण कराया गया हूँ; आत्म-तत्त्वमू-परमात्मा का विज्ञान; श्रुतम्--सुना हुआ;पुरा--पहले; मे--मेरे द्वारा; परम-ऋषि--ऋषियों में सर्वश्रेष्ठ, शुकदेव के; वक्त्रात्ू--मुख से; प्राय-उपवेशे --मृत्युपर्यन्तउपवास के समय; नृपते: --राजा के; परीक्षित: --परीक्षित; सदसि--सभा में; ऋषीणाम्--ऋषियों के; महताम्--महान्;च--तथा; श्रृण्वताम्--उनके सुनते हुए |
अब मुझे उस ईश्वर-विज्ञान का पूरी तरह स्मरण हो आया है, जिसे मैंने पहले महर्षिशुकदेव गोस्वामी के मुख से सुना था।
मैं महर्षियों की उस सभा में उपस्थित था जिन्होंनेमृत्युपर्यन्त उपवास पर बैठे राजा परीक्षित से कहते उन्हें सुना था।
"
एतद्द: कथितं विप्रा: कथनीयोरुकर्मण: ।
माहात्म्यं वासुदेवस्य सर्वाशुभविनाशनम् ॥
५८॥
एतत्--यह; वः--तुम लोगों से; कथितम्--सुनाया; विप्रा:--हे ब्राह्मणो; कथनीय--उसका, जो वर्णन करने योग्य है;उरु-कर्मण:--तथा जिसके कार्य अत्यन्त महान् हैं; माहात्म्यमू--यश; वासुदेवस्थ--वासुदेव का; सर्व-अशुभ--समस्तअशुभ को; विनाशनमू्--नष्ट कर देने वाला
हे ब्राह्मणो, इस तरह मैंने तुम लोगों से भगवान् वासुदेव की महिमा का वर्णन कियाजिनके असामान्य कार्य स्तुति के योग्य हैं।
यह वर्णन अशुभ का विनाश करने वाला है।
"
य एतत्श्रावयेन्नित्यं यामक्षणमनन्यधी: ।
एइलोकमेकं तदर्ध वा पादं पादार्धमेव वा ।
श्रद्धावान्यो<नु श्रुणुयात्पुनात्यात्मानमेव स: ॥
५९॥
यः--जो; एतत्--यह; श्रावयेत्--अन्यों को सुनाता है; नित्यमू--सदैव; याम-क्षणम्--हर घण्टे तथा हर मिनट; अनन्य-धी:--अविचल ध्यान से; श्लोकम्--श्लोक; एकम्--एक; तत्-अर्धम्--उसका आधा; वा--अथवा; पादम्--एक भीपंक्ति; पाद-अर्धम्--आधी पंक्ति; एब--निस्सन्देह; वा--अथवा; श्रद्धा-वान्-- श्रद्धापूर्वक; य:--जो; अनुश्रुणुयात् --उचित स्त्रोत से सुनता है; पुनाति--पवित्र बनाता है; आत्मानम्--स्वयं को; एव--निस्सन्देह; सः--वह |
जो व्यक्ति अविचल ध्यान से इस ग्रंथ को प्रत्येक घण्टे के प्रत्येक क्षण निरन्तर सुनाता हैतथा जो व्यक्ति एक अथवा आधा एलोक, अथवा एक या आधी भी पंक्ति श्रद्धा भाव सेसुनता है, वह अपने को पवित्र बना लेता है।
"
द्वादश्यामेकादश्यां वा श्रृण्वन्नायुष्यवान्भवेत् ।
'पठत्यनशए्नन्प्रयतः पूतो भवति पातकातू ॥
६०॥
द्वादश्यामू--माह की द्वादशी को; एकादश्याम्--एकादशी को; वा--अथवा; श्रृण्वन्--सुनते हुए; आयुष्य-वान्--दीर्घआयु वाला; भवेत्--हो जाता है; पठति--यदि पाठ करता है; अनश्नन्ू--बिना भोजन किये; प्रयत:--ध्यानपूर्वक;पूतः--पवित्र; भवति--हो जाता है; पातकात्ू-पापों के फल से
जो कोई इस भागवत को एकादशी या द्वादशी के दिन सुनता है उसे निश्चित रूप सेदीर्घायु प्राप्त होती है और जो व्यक्ति उपवास रखते हुए इसे ध्यानपूर्वक सुनाता है, वह सारेपापों के फल से शुद्ध हो जाता है।
"
पुष्करे मथुरयां च द्वारवत्यां यतात्मवान् ।
उपोष्य संहितामेतां पठित्वा मुच्यते भयात् ॥
६१॥
पुष्करे--पुष्कर नामक पवित्र स्थान में; मथुरायाम्--मथुरा में; च--तथा; द्वारवत्याम्ू-द्वारका में; यत-आत्म-वान्--आत्मसंयमी; उपोष्य--उपवास रख कर; संहिताम्--ग्रंथ को; एताम्--इस; पठित्वा--सुनाकर, बाँच कर; मुच्यते--मुक्तहो जाता है; भयात्-- भय से।
जो व्यक्ति मन को वश में रखता है, जो पुष्कर, मथुरा या द्वारका जैसे पवित्र स्थानों मेंउपवास रखता है और इस शास्त्र का अध्ययन करता है, वह सारे भय से मुक्त हो जाता है।
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देवता मुनयः सिद्धा: पितरो मनवो नृपा: ।
यच्छन्ति कामान्गृणतः श्रुण्वतो यस्य कीर्तनात् ॥
६२॥
देवता:--देवता; मुनयः--मुनिगण; सिद्धा:--सिद्ध योगी; पितर:--पुरखे; मनव:--मनुष्य को जन्म देने वाले; नृप:--पृथ्वी के राजे; यच्छन्ति-- प्रदान करते हैं; कामान्ू--इच्छाएँ; गृूणत:ः--कीर्तन करने वाले को; श्रृण्वतः--सुनने वाले को;यस्य--जिसका; कीर्तनात्ू--कीर्तन करने के कारण |
जो व्यक्ति इस पुराण का कीर्तन करके अथवा इसको सुन कर इसकी स्तुति करते हैंउन्हें देवता, ऋषि, सिद्ध, पितर, मनु तथा पृथ्वी के राजा समस्त वांछित वस्तुएँ प्रदान करतेहैं।
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ऋचो यजूंषि सामानि द्विजोधीत्यानुविन्दते ।
मधुकुल्या घृतकुल्या: पयःकुल्याश्व॒ तत्फलम् ॥
६३॥
ऋच: --ऋग्वेद के; यजूंषि--यजुर्वेद के; सामानि--तथा सामवेद के मंत्र; द्विज:--ब्राह्मण; अधीत्य--पढ़ कर;अनुविन्दते--प्राप्त करता है; मधु-कुल्या: --शहद की नदियाँ; घृत-कुल्या:--घी की नदियाँ; पयः-कुल्या:--दूध कीनदियाँ; च--तथा; तत्ू--वह; फलम्ू--फल।
इस भागवत को पढ़ कर एक ब्राह्मण उन्हीं शहद, घी तथा दूध की नदियों को भोग सकता है जिन्हें वह ऋग्, यजुर् तथा सामवेदों के मंत्रों का अध्ययन करके भोग सकता है।
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पुराणसंहितामेतामधीत्य प्रयतो द्विजः ।
प्रोक्ते भगवता यत्तु तत्पदं परम॑ ब्रजेत्ू ॥
६४॥
पुराण-संहिताम्--सारे पुराणों के अनिवार्य संकलन को; एताम्--इस; अधीत्य--पढ़ कर; प्रयत:--ध्यानपूर्वक; द्विज:--ब्राह्मण; प्रोक्तमू--वर्णित; भगवता-- भगवान् द्वारा; यत्--जो; तु--निस्सन्देह; तत्--वह; पदम्--पद; परमम्--परम;ब्रजेत्--प्राप्त करता है।
जो ब्राह्मण समस्त पुराणों के इस अनिवार्य संकलन को भश्रमपूर्वक पढ़ता है, वह परमगन्तव्य को प्राप्त होता है, जिसका वर्णन स्वयं भगवान् ने इसमें किया है।
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विप्रोधीत्याण्नुयात्प्रज्ञां राजन्योदधिमेखलाम् ।
वैश्यो निधिपतित्वं च शूद्र: शुध्येत पातकात् ॥
६५॥
विप्र:--ब्राह्मण; अधीत्य--पढ़ कर; आप्नुयात्--प्राप्त करता है; प्रज्ञामू--भक्ति में बुद्धि; राजन्य--राजा; उदधि-मेखलाम्--समुद्रों द्वारा बँधी हुई ( पृथ्वी ); वैश्य: --व्यापारी; निधि--कोशों का; पतित्वम्--स्वामित्व; च--तथा;शूद्रः--श्रमिक; शुध्येत--शुद्ध हो जाता है; पातकात्-पापों से
जो ब्राह्मण श्रीयद्भागवत को पढ़ता है, वह भक्ति में दृढ़ बुद्धि प्राप्त करता है।
जो राजाइसका अध्ययन करता है, वह पृथ्वी पर सार्वभौम सत्ता प्राप्त करता है, वैश्य विपुल कोशपा लेता है और शूद्र पापों से छूट जाता है।
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'कलिमलसंहतिकालनोखिलेशोहरिरितरत्र न गीयते हाभीक्ष्णम् ।
इह तु पुनर्भगवानशेषपमूर्ति:परिपठितो<नुपदं कथाप्रसड्रैः ॥
६६॥
कलि--कलह के युग का; मल-संहति--सारे कल्मष का; कालन:--संहारकर्ता; अखिल-ईशः:--सारे जीवों के परमनियन्ता; हरिः-- भगवान् हरि; इतरत्र--अन्यत्र; न गीयते--वर्णित नहीं होते; हि--निस्सन्देह; अभी क्षणम्--निरन्तर; इह--यहाँ; तु--फिर भी; पुनः--दूसरी ओर; भगवान्-- भगवान्; अशेष-मूर्ति:--जो अनन्त साकार रूपों में विस्तार करता है;परिपठित:--कथा में खुल कर वर्णन किया गया है; अनु-पदम्-प्रत्येक श्लोक में; कथा-प्रसड्रैः--कहानियों के बहाने |
सारे जीवों के परम नियन्ता भगवान् हरि कलियुग के संचित पापों का संहार करने वालेहैं, फिर भी अन्य ग्रंथों में उनकी स्तुति नहीं मिलती।
किन्तु असंख्य साकार अंशों के रूप मेंप्रकट होने वाले ये भगवान् इस श्रीमद्भागवत की विविध कथाओं में निरन्तर तथा प्रचुरमात्रा में वर्णित हुए हैं।
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तमहमजमनन्तमात्मतत्त्वंजगदुदयस्थितिसंयमात्मशक्तिम् ।
झुपतिभिरजशक्रशडूराद्यै-दुरवसितस्तवमच्युतं नतोउस्मि ॥
६७॥
तम्--उस; अहम्--मैं; अजम्-- अजन्मा; अनन्तम्ू--अनन्त; आत्म-तत्त्वम्--आदि परमात्मा को; जगत्-- भौतिकब्रह्मण्ड की; उदय--उत्पत्ति; स्थिति--पालन; संयम--तथा संहार; आत्म-शक्तिमू--जिनकी निजी शक्तियों से; द्यु-'पतिभि: --स्वर्ग के स्वामियों द्वारा; अज-शक्र-शड्डूर-आद्यि: --ब्रह्मा, इन्द्र, शिव आदि द्वारा; दुरवसित--समझ में न आनेवाले; स्तवम्--स्तुतियाँ; अच्युतम्--अच्युत भगवान् को; नतः--विनत; अस्मि--हूँ।
मैं अजन्मे तथा अनन्त परमात्मा को नमन करता हूँ जिनकी निजी शक्तियाँ ब्रह्माण्ड कीउत्पत्ति, पालन तथा संहार के लिए उत्तरदायी हैं।
यहाँ तक कि ब्रह्मा, इन्द्र, शंकर तथास्वर्गलोकों के अन्य स्वामी भी उस अच्युत भगवान् की महिमा की थाह नहीं पा सकते।
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उपचितनवशृक्तिभि: स्व आत्म-न्युपरचितस्थिरजड्रमालयाय ।
भगवत उपलब्धिमात्रधम्नेसुरऋषभाय नमः सनातनाय ॥
६८॥
उपचित--पूरी तरह विकसित; नव-शक्तिभि:--उनकी नौ शक्तियों ( प्रकृति, पुरुष, महत्, अहंकार तथा पाँच सूक्ष्मअनुभूति के रूप ) द्वारा; स्वे आत्मनि--अपने भीतर; उपरचित--निकट ही व्यवस्थित; स्थिर जड़म--चर तथा अचर दोनोंप्रकार के जीवों का; आलयाय--धाम; भगवते-- भगवान् को; उपलबभ्थि-मात्र--शुद्ध चेतना; धाम्ने--जिसकीअभिव्यक्ति; सुर--देवताओं का; ऋषभाय--प्रमुख; नमः --मेरा नमस्कार; सनातनाय--नित्य भगवान् को ।
मैं उन भगवान् को नमस्कार करता हूँ जो नित्य प्रभु हैं और अन्य सारे देवों के प्रधान हैं,जिन्होंने अपनी नौ शक्तियों को विकसित करके अपने भीतर सारे चर तथा अचर प्राणियोंका धाम व्यवस्थित कर रखा है और जो सदैव शुद्ध दिव्य चेतना में स्थित रहते हैं।
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स्वसुखनिभूतचेतास्तद्व्युदस्तान्यभावो-प्यजितरुचिरलीलाकृष्टसारस्तदीयम् ।
व्यतनुत कृपया यस्तत्त्वदीपं पुराणंतमखिलवृजिनघ्नं व्याससूनुं नतोउस्मि ॥
६९॥
स्व-सुख--अपने सुख में; निभृत--एकाकी; चेता:-- चेतना वाला; तत्--उसके कारण; व्युदस्त--परित्यक्त; अन्य-भाव:--अन्य की चेतना; अपि--यद्यपि; अजित--न जीते जा सकने वाले प्रभु, श्रीकृष्ण की; रुचिर--सुहावनी;लीला--लीलाओं से; आकृष्ट--आकर्षित; सार:--जिसका हृदय; तदीयम्-- भगवान् के कार्यकलापों से युक्त;व्यतनुत--विस्तृत, व्यक्त; कृपया--दयापूर्वक; य:--जो; तत्त्व-दीपम्--परब्रह्म का तेज प्रकाश; पुराणम्--पुराण( श्रीमद्भागवत ); तम्--उनको; अखिल-वृजिन-घ्नम्--हर अशुभ वस्तु को नष्ट करने वाले; व्यास-सूनुम्--व्यासदेव केपुत्र को; नतः अस्मि--नमस्कार करता हूँ।
मैं अपने गुरु व्यासदेव पुत्र, शुकदेव गोस्वामी, को सादर नमस्कार करता हूँ।
वे ही इसब्रह्माण्ड की सारी अशुभ वस्तुओं को नष्ट करते हैं।
यद्यपि प्रारम्भ में वे ब्रह्म-साक्षात्कार केसुख में लीन थे और अन्य समस्त चेतनाओं को त्याग कर एकान्त स्थान में रह रहेथे, किन्तुवे भगवान् श्रीकृष्ण की मनोहर तथा अत्यन्त मधुमयी लीलाओं के द्वारा आकृष्ट हुए।
अतएवउन्होंने अत्यन्त कृपा करके इस सर्वश्रेष्ठ पुराण, श्रीमद्भागवत, का प्रवचन किया जो परब्रह्मका तेज प्रकाश है और भगवान् के कार्यकलापों का वर्णन करने वाला है।
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