← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची

अध्याय छह: महाराज परीक्षित का निधन

12.6सूत उबाचएतत्निशम्य मुनिनाभिहितं परीक्षिद्‌व्यासात्मजेन निखिलात्महशा समेन।

तत्पादमूलमुपसृत्य नतेन मूर्ध्नाबद्धाह्ललिस्तमिदमाह स विष्णुरात: ॥

१॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एतत्‌--यह; निशम्य--सुन कर; मुनिना--मुनि ( शुकदेव ) द्वारा; अभिहितम्‌--कहागया; परीक्षित्‌--महाराज परीक्षित; व्यास-आत्म-जेन--व्यासदेव के पुत्र द्वारा; नेखिल--सारे जीवों के; आत्म--परमे श्वर;हशा--द्रष्टा; समेन--पूर्णतया सन्तुलित; तत्‌--उस ( शुकदेव ) का; पाद-मूलम्‌--चरणकमलों तक; उपसृत्य--पहुँचकर; नतेन--झुके हुए; मूर्थश्ना--सिर से; बद्ध-अज्जलि: --हाथ जोड़े; तम्‌--उससे; इदम्‌--यह; आह--कहा; सः--वह;विष्णु-रात:--गर्भ में ही कृष्ण द्वारा रक्षा किया गया परीक्षित |

सूत गोस्वामी ने कहा : व्यासदेव के पुत्र, स्वरूपसिद्ध तथा समदृष्टि वाले शुकदेवगोस्वामी द्वारा जो कुछ कहा गया था उसे सुन कर महाराज परीक्षित नगम्रतापूर्वक उनके चरणकमलों के पास गये।

मुनि के चरणों पर अपना शीश झुकाते हुए, सम्मान में हाथजोड़े, जीवन-भर भगवान्‌ विष्णु के संरक्षण में रह चुके राजा ने इस प्रकार कहा।

"

राजोबाचसिद्धोउस्म्यनुगृहीतोस्मि भवता करुणात्मना ।

श्रावितो यच्च मे साक्षादनादिनिधनो हरि; ॥

२॥

राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; सिद्ध:--पूरी तरह सफल; अस्मि--हूँ; अनुगृहीत:--महती कृपा प्रदर्शित; अस्मि--मैं हूँ; भवता--आपके द्वारा; करूणा-आत्मना--दयालु; श्रावित:--सुनाया गया; यत्‌--क्योंकि; च--तथा; मे-- मुझको;साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; अनादि--आदि से रहित; निधन: --अथवा अन्त; हरिः-- भगवान्‌ |

महाराज परीक्षित ने कहा : अब मुझे अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त हो गया है क्योंकिआप सरीखे महान्‌ तथा दयालु आत्मा ने मुझ पर इतनी कृपा प्रदर्शित की है।

आपने स्वयंमुझसे आदि अथवा अन्त से रहित भगवान्‌ हरि की यह कथा कही है।

"

नात्यद्भधुतमहं मन्‍्ये महतामच्युतात्मनाम्‌ ।

अज्ेषु तापतप्तेषु भूतेषु यदनुग्रहः ॥

३॥

न--नहीं; अति-अद्भधुतम्‌--अत्यन्त आश्चर्यजनक; अहम्‌--ैं; मन्ये--सोचता हूँ; महताम्‌-महापुरुषों के लिए; अच्युत-आत्मनाम्‌ू--जिनके मन सदैव भगवान्‌ कृष्ण में लीन रहते हैं; अज्ञेषु--अज्ञानी पर; ताप--भौतिक जीवन के कष्टों से;तप्तेषु--सताये हुए; भूतेषु--बद्धात्माओं पर; यत्‌--जो; अनुग्रह:--दयामैं

इसे तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं मानता कि आप जैसे महात्मा, जिनके मन सदैवअच्युत भगवान्‌ में लीन रहते हैं, हम जैसे मूर्ख बद्धजीवों पर दया दिखाते हैं, जो भौतिकजीवन की समस्याओं से सताये होते हैं।

"

पुराणसंहितामेताम श्रौष्पम भवतो वयम्‌ ।

यस्यां खलूत्तम:शलोको भगवाननवर्ण्यते ॥

४॥

पुराण-संहिताम्‌--सारे पुराणों का आवश्यक सारांश; एताम्‌--इस; अश्रौष्म--सुना है; भवत:--आपसे; वयम्‌--हमने;यस्याम्‌--जिसमें; खलु--निस्सन्देह; उत्तम:-शलोक:--उत्तम एलोकों द्वारा वर्णित; भगवान्‌-- भगवान्‌; अनुवर्ण्यते--उचित रीति से वर्णन किया जाता है |

मैंने आपसे यह श्रीमद्धागवत का श्रवण किया है, जो सारे पुराणों का पूर्ण सार है और जो भगवान्‌ उत्तमशलोक का ठीक से वर्णन करता है।

"

भगवंस्तक्षकादिश्यो मृत्युभ्यो न बिभेम्यहम्‌ ।

प्रविष्टो ब्रह्म निर्वाणमभयं दर्शितं त्वया ॥

५॥

भगवनू-हे प्रभु; तक्षक--तक्षक सर्प से; आदिभ्य:--अथवा अन्य जीवों से; मृत्युभ्य:--बारम्बार मृत्यु से; न बिभेमि--नहीं डरता हूँ; अहम्‌--मैं; प्रविष्ट:--प्रवेश करके; ब्रह्म--परब्रह्म; निर्वाणम्‌--हर भौतिक वस्तु से परे; अभयम्‌--निर्भीकता; दर्शितमू--दिखाई गई; त्ववा--आपके द्वारा

हे प्रभु, अब मुझे तक्षक या अन्य जीव का या बारम्बार मृत्यु का भी भय नहीं रहाक्योंकि मैंने अपने को उस विशुद्ध आध्यात्मिक परब्रह्म में लीन कर दिया है, जिसकाउद्घाटन आपने किया है और जो सारे भय को नष्ट कर देता है।

"

अनुजानीहि मां ब्रह्मन्वाच॑ यच्छाम्यधोक्षजे ।

मुक्तकामाशयं चेत: प्रवेश्य विसृजाम्यसून्‌ ॥

६॥

अनुजानीहि--अनुमति दें; माम्‌--मुझको; ब्रह्मनू-हे महान्‌ ब्राह्मण; वाचम्‌ू--मेरी वाणी ( तथा अन्य इन्द्रिय-कार्य );यच्छामि--मैं रखूँगा; अधोक्षजे-- भगवान्‌ में; मुक्त--त्याग करके; काम-आशयम्‌--सारी कामुक इच्छाएँ; चेत:--अपनामन; प्रवेश्य--लीन करके; विसृजामि--मैं त्याग दूँगा; असून्‌ू--अपना प्राण

हे ब्राह्मण, मुझे अनुमति दें कि मैं अपनी वाणी तथा अपनी अन्य इन्द्रियों के कार्यों कोबन्द करके भगवान्‌ अधोक्षज को सौंप सकूँ।

कृपया मुझे अनुमति दें कि मैं अपने मन कोविषय-वासनाओं से शुद्ध करके उन्हीं में लीन कर सकूँ और इस तरह अपना जीवन त्यागसकूँ।

"

अज्ञानं च निरस्तं मे ज्ञानविज्ञाननिष्ठया ।

भवता दर्शितं क्षेमं परं भगवतः पदम्‌ ॥

७॥

अज्ञानम्‌--अज्ञान; च-भी; निरस्तम्‌--जड़मूल नष्ट हुआ; मे--मेरा; ज्ञान--परमेश्वर के ज्ञान; विज्ञान--तथा उनके ऐश्र्यतथा माधुर्य की प्रत्यक्ष अनुभूति; निष्ठया--स्थिर होकर; भवता--आपके द्वारा; दर्शितम्‌ू--दिखाया गया; क्षेमम्‌--सर्व-कल्याण; परम्‌--परम; भगवत:ः-- भगवान्‌ का; पदम्‌-पद |

आपने भगवान्‌ के परम मंगलमय साकार रूप का साक्षात्कार कराया है।

अब मैं ज्ञानतथा आत्म-साक्षात्कार में स्थिर हूँ और मेरा अज्ञान मिट चुका है।

"

सूत उबाचइत्युक्तस्तमनुज्ञाप्य भगवान्बादरायणिः ॥

जगाम भिक्षुभि: साक॑ नरदेवेन पूजित: ॥

८॥

सूतः उवाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; तम्‌--उससे; अनुज्ञाप्प--अनुमति देकर;भगवान्‌--शक्तिमान सन्त; बादरायणि: --बादरायण वेदव्यास के पुत्र शुकदेव; जगाम--चले गये; भिक्षुभि:--विरक्तमुनियों के; साकम्‌--साथ; नर-देवेन--राजा द्वारा; पूजित:--पूजा किया गया।

सूत गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार अनुनय-विनय किये जाने पर श्रील व्यासदेव के पुत्रने राजा परीक्षित को अनुमति दे दी।

तत्पश्चात्‌ राजा तथा वहाँ पर उपस्थित मुनियों द्वारापूजित होकर शुकदेव उस स्थान से चले गये।

"

परीक्षिदपि राजर्पिरात्मन्यात्मानमात्मना ।

समाधाय परं दध्यावस्पन्दासुर्यथा तर; ॥

९॥

प्राकूले बर्हिष्यासीनो गड्डाकूल उदड्मुख: ।

ब्रह्मभूतो महायोगी नि:सड़रश्छिन्नसंशय: ॥

१०॥

परीक्षित्‌--महाराज परीक्षित; अपि--आगे भी; राज-ऋषि:--सन्‍्त स्वभाव वाला महान्‌ राजा; आत्मनि--अपनीआध्यात्मिक पहचान के ही भीतर; आत्मानम्‌--अपने मन को; आत्मना--अपनी बुद्धि से; समाधाय--रख कर; परम्‌--परम में; दध्यौ-- ध्यान किया; अस्पन्द--गतिहीन; असु:--अपना प्राण; यथा--जिस तरह; तरु:--वृक्ष; प्राकू-कूले--पूर्व दिशा की ओर सिरे किये; ब्हिषि--दर्भ घास पर; आसीन:--बैठे हुए; गड्भा-कूले--गंगा के तट पर; उदक्‌-मुख:--उत्तर की ओर मुँह करके; ब्रह्म-भूतः--अपनी असली पहचान का पूर्ण साक्षात्कार करते हुए; महा-योगी--उच्च योगी;निःसड्भ:--समस्त भौतिक आसक्ति से मुक्त; छिन्न--तोड़ कर; संशय: --सारे सन्देह।

तब महाराज परीक्षित पूर्वाभिमुख दर्भ के बने आसन पर गंगा नदी के तट पर बैठ गयेऔर स्वयं उत्तर की ओर मुख कर लिया।

योगसिद्धि प्राप्त करने के बाद उन्हें पूर्ण आत्म-साक्षात्कार की अनुभूति हुई और वे समस्त भौतिक आसक्ति तथा संशय से मुक्त थे।

साधुराजा ने अपनी शुद्ध बुद्धि से अपने मन को अपने आत्मा के भीतर स्थिर कर लिया औरपरब्रह्म का ध्यान करने लगे।

उनकी प्राणवायु ने गति करनी बन्द कर दी और वे वृक्ष कीतरह जड़ हो गये।

"

तक्षकः प्रहितो विप्रा: क्रुद्धेन द्विजसूनुना ।

हन्तुकामो नृपं गच्छन्ददर्श पथि कश्यपम्‌ ॥

११॥

तक्षक:--तक्षक; प्रहित:--भेजा गया; विप्रा: --हे विद्वान ब्राह्मणो; क्रुद्धेन--क्रुद्ध हुए; द्विज--शमीक मुनि के; सूनुना--पुत्र द्वारा; हन्तु-काम:--मारने की इच्छा से; नृपम्‌ू--राजा के पास; गच्छन्‌--जाते हुए; दरदर्श--देखा; पथि--रास्ते में;कश्यपम्‌--कश्यप मुनि

हे विद्वान ब्राह्मणो, ब्राह्मण के क्रुद्ध पुत्र द्वारा भेजा गया तक्षक सर्प राजा को मारने के लिए उसकी ओर जा रहा था कि उसने मार्ग में कश्यप मुनि को देखा।

"

त॑ तर्पयित्वा द्रविणैर्निवर्त्म विषहारिणम्‌ ।

द्विजरूपप्रतिच्छन्न: कामरूपोदशन्नूपम्‌ ॥

१२॥

तम्‌--उस ( कश्यप ) को; तर्पयित्वा--तुष्ट करके; द्रविणै:--बहुमूल्य भेंटों द्वारा; निवर्त्म--रोक कर; विष-हारिणम्‌--विष उतारने में दक्ष; द्विज-रूप--ब्राह्मण के रूप में; प्रतिच्छन्न:--वेश बदल कर; काम-रूप:--इच्छानुसार कोई भी रूपधारण करने में समर्थ तक्षक ने; अदशत्‌--काट लिया; नृपम्‌--राजा परीक्षित को

तक्षक ने कश्यप मुनि को, जोकि विष उतारने में दक्ष थे, बहुमूल्य भेंटे देकर महाराजपरीक्षित की रक्षा करने से रोक दिया।

तब इच्छानुसार रूप धारण करने वाला तक्षक, जोकिब्राह्मण के वेश में था, राजा के निकट गया और उसे काट लिया।

"

ब्रह्मभूतस्य राजर्षेदेहो हिगरलाग्निना ।

बभूव भस्मसात्सद्य: पश्यतां सर्वदेहिनाम्‌ ॥

१३॥

ब्रह्म-भूतस्य--पूर्णतया स्वरूपसिद्ध; राज-ऋषे:--राजर्षि के; देह:--शरीर; अहि--सर्प के; गरल--विष से; अग्निना--अग्नि से; बभूब--हो गया; भस्म-सात्‌--राख; सद्य:--तुरन्त; पश्यताम्‌--देखते-देखते; सर्व-देहिनाम्‌ू--सभी देहधारीजीवों के

ब्रह्माण्ड-भर के जीवों के देखते-देखते उस स्वरूपसिद्ध राजर्षि का शरीर सर्प-विष कीअग्नि से तुरन्त जल कर राख हो गया।

"

हाहाकारो महानासीद्धुवि खे दिक्षु सर्वतः ।

विस्मिता ह्यभवन्सर्वें देवासुरनरादय: ॥

१४॥

हाहा-कार:--शोक का क्रन्दन; महान्‌ू--अत्यधिक; आसीत्‌--हुआ; भुवि--पृथ्वी पर; खे--आकाश में; दिक्षु--दिशाओं में; सर्वतः--चारों ओर; विस्मिता:--चकित; हि--निस्सन्देह; अभवन्‌--हो गये; सर्वे--सभी; देव--देवता;असुर--असुरगण; नर--मनुष्य; आदय:--तथा अन्य प्राणी |

पृथ्वी पर तथा स्वर्ग में सभी दिशाओं में भीषण हाहाकार होने लगा और सारे देवता,असुर, मनुष्य तथा अन्य प्राणी चकित हो उठे।

"

देवदुन्दुभयो नेदुर्गन्धर्वाप्सरसो जगु: ।

वबवृषु: पुष्पवर्षाणि विबुधा: साधुवादिन: ॥

१५॥

देव--देवताओं की; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ; नेदु:--बजने लगीं; गन्धर्व-अप्सरस:--गन्धर्वों तथा अप्सराओं ने; जगु:--गाया; ववृषु:--वर्षा की; पुष्प-वर्षाणि--फूलों की वर्षा; विबुधा:--देवताओं ने; साधु-वादिन:--प्रशंसा करते हुए।

देव-लोक में दुन्दुभियाँ बजने लगीं और स्वर्ग के गन्धर्वों तथा अप्सराओं ने गीत गाये।

देवताओं ने फूलों की वर्षा की तथा प्रशंसात्मक शब्द कहे।

"

जन्मेजयः स्वपितरं श्रुत्वा तक्षकभक्षितम्‌ ।

यथाजुहाव सन्क्ुद्धो नागान्सत्रे सह द्विजै: ॥

१६॥

जन्मेजय:--परीक्षित पुत्र जनमेजय; स्व-पितरम्‌-- अपने पिता को; श्रुत्वा--सुन कर; तक्षक--तक्षक द्वारा; भक्षितम्‌--डसा गया; यथा--उचित रीति से; आजुहाव--हवन करने लगा; सड्क्ुद्ध:--अत्यन्त क्रुद्ध; नागान्‌ू--सर्पो को; सत्रे--महान्‌ यज्ञ में; सह--सहित; द्विजैः--ब्राह्मणों

यह सुन कर कि उसके पिता को तक्षक ने बुरी तरह से डस कर मार दिया है, महाराजजनमेजय अत्यधिक क्रुद्ध हुए और ब्राह्मणों से एक विशाल यज्ञ कराया जिसमें उन्होंने संसारके सारे सर्पो को यज्ञ-अग्नि में भेंट कर दिया।

"

सर्पसत्रे समिद्धाग्नौ दह्ममानान्महोरगान्‌ ।

हष्टेन्द्रं भयसंविग्नस्तक्षकः शरणं ययौ ॥

१७॥

सर्प-सत्रे--सर्प-यज्ञ में; समिद्ध--प्रज्वलित; अग्नौ--आग में; दह्ममानान्‌ू--जलाये जाते हुए; महा-उरगान्‌ू--विशालसर्पो को; दृष्टा--देख कर; इन्द्रमू--इन्द्र के पास; भय संविग्न:--अत्यधिक विचलित; तक्षक:--तक्षक; शरणम्‌--शरणके लिए; ययौ--गया।

जब तक्षक ने अत्यन्त शक्तिशाली सर्पों को भी उस सर्प-यज्ञ की प्रज्वलित अग्नि मेंजलाया जाते देखा, तो वह भय से आकुल हो उठा और शरण के लिए इन्द्र के पास पहुँचा।

"

अपयंस्तक्षकं तत्र राजा पारीक्षितो द्विजान्‌ ।

उवाच तक्षकः कस्मान्न दह्ोतोरगाधमः ॥

१८॥

अपश्यनू--न देखते हुए; तक्षकम्‌--तक्षक को; तत्र--वहाँ; राजा--राजा; पारीक्षित:--जनमेजय; द्विजानू--ब्राह्मणों से;उवाच--कहा; तक्षक:--तक्षक; कस्मात्‌--क्यों; न दह्मेत--नहीं जला; उरग--समस्तसर्पो में; अधम:--नीच

जब राजा जनमेजय ने तक्षक को यज्ञ-अग्नि में प्रवेश करते नहीं देखा तो उन्होंनेब्राह्मणों से कहा, 'समस्त सर्पों में नीच वह तक्षक इस अग्नि में क्‍यों नहीं जल रहा ?"

'तं गोपायति राजेन्द्र शक्र: शरणमागतम्‌ ।

तेन संस्तम्भितः सर्पस्तस्मान्नाग्नौ पतत्यसौ ॥

१९॥

तम्‌--उस ( तक्षक ) को; गोपायति--छिपाये है; राज-इन्द्र--हे राजाओं में श्रेष्ठ; शक्र:--इन्द्र; शरणम्‌--शरण के लिए;आगतम्‌--आया हुआ; तेन--उस इन्द्र द्वारा; संस्तम्भितः--रखा गया; सर्प:--सर्प; तस्मात्‌ू--इस तरह; न--नहीं;अग्नौ-- अग्नि में; पतति--गिरता है; असौ--वह।

ब्राह्मणों ने उत्तर दिया : 'हे राजेन्द्र, तक्षक सर्प इसलिए अग्नि में नहीं गिरा क्योंकि इन्द्रद्वारा उसकी रक्षा हो रही है, जिसके पास वह शरण के लिए पहुँचा है।

इन्द्र उसे अग्नि सेबचाये हुए है।

"

पारीक्षित इति श्रुत्वा प्राहर्त्विज उदारधी: ।

सहेन्द्रस्तक्षको विप्रा नाग्नौ किमिति पात्यते ॥

२०॥

पारीक्षित:--राजा जनमेजय ने; इति--ये वचन; श्रुत्वा--सुन कर; प्राह--उत्तर दिया; ऋत्विज:--पुरोहितों से; उदार--विशाल; धी:--बुद्धि वाले; सह--साथ; इन्द्र: --इन्द्र; तक्षकः--तक्षक; विप्रा: --हे ब्राह्मणो; न--नहीं; अग्नौ--आग में;किमू--क्यों; इति--निस्सन्देह; पात्यते--गिराया जाता है

इन शब्दों को सुन कर बुद्धिमान राजा जनमेजय ने पुरोहितों से कहा, 'तो हे ब्राह्मणो,तुम लोग तक्षक को, उसके रक्षक इन्द्र सहित, अग्नि में क्‍यों नहीं गिरा लेते ?"

'तच्छुत्वाजुहुवुर्विप्रा: सहेन्द्रं तक्षक॑ मखे ।

तक्षकाशु पतस्वेह सहेन्द्रेण मरूत्वता ॥

२१॥

तत्‌--वह; श्रुत्वा--सुन कर; आजुहुव॒ु:--हवन किया; विप्रा:--ब्राह्मण पुरोहितों ने; सह--सहित; इद्धम्‌--इन्द्र;तक्षकम्‌--तक्षक को; मखे--यज्ञ-अग्नि में; तक्षक--हे तक्षक; आशु--तुरन्‍्त; पतस्व--गिरो; इह--यहाँ; सह इन्द्रेण--इन्द्र समेत; मरुत्‌ू-वता--सारे देवताओं के साथ।

यह सुन कर पुरोहितों ने इन्द्र समेत तक्षक को यज्ञ-अग्नि में आहुति के रूप अर्पित करनेके लिए यह मंत्र पढ़ा, 'हे तक्षक, तुम इस अग्नि में इन्द्र तथा उनके देवताओं के समूहसहित तुरन्त गिर पड़ो।

"

'इति ब्रह्मोदिताक्षेपैः स्थानादिन्द्र: प्रचालित: ।

बभूव सम्भ्रान्तमति: सविमान: सतक्षकः ॥

२२॥

इति--इस प्रकार; ब्रह्म--ब्राह्मणों द्वारा; उदित--कहे गये; आक्षेपै:-- अपमानजनक शब्दों द्वारा; स्थानात्‌ू-- अपने स्थानसे; इन्द्र:--इन्द्र; प्रचालित:--फेंका गया; बभूब--हो गया; सम्भ्रान्त--विचलित; मति:--अपने मन में; स-विमान:--अपने स्वर्गिक विमान सहित; स-तक्षक: --तक्षक समेत।

जब ब्राह्मणों के इन अपमानजनक शब्दों के कारण इन्द्र अपने विमान तथा तक्षक समेतसहसा अपने स्थान से च्युत होने लगा, तो वह अत्यन्त घबड़ा गया।

"

तं पतन्तं विमानेन सहतक्षकमम्बरात्‌ ।

विलोक्याड्रिरसः प्राह राजानं त॑ बृहस्पति: ॥

२३॥

तम्‌--उसको; पतन्तम्‌--गिरता हुआ; विमानेन--अपने विमान से; सह-तक्षकम्‌--तक्षक समेत; अम्बरात्‌-- आकाश से;विलोक्य--देख कर; आड्विरस:--अंगिरा पुत्र; प्राह--बोला; राजानम्‌--राजा ( जनमेजय ) से; तमू--उस; बृहस्पति:--बृहस्पति

जब अंगिरा मुनि के पुत्र बृहस्पति ने इन्द्र को तक्षक समेत आकाश से उसके विमान सेगिरते देखा तो वह राजा जनमेजय के पास पहुँचा और उनसे इस प्रकार कहा।

"

नैष त्वया मनुष्येन्द्र वधमहति सर्पराट्‌ ।

अनेन पीतममृतमथ वा अजरामर: ॥

२४॥

न--नहीं; एब:--यह तक्षक; त्वया--तुम्हारे द्वारा; मनुष्य-इन्द्र--हे मनुष्यों के शासक; वधम्‌--हत्या के; अर्हति--योग्यहै; सर्प-राट्‌--सर्पों का राजा; अनेन--उसके द्वारा; पीतम्‌-पिये हुए; अमृतम्‌--देवताओं का अमृत; अथ--इसलिए;बै--अथवा; अजर--बुढ़ापे के प्रभावों से मुक्त; अमर:--एक तरह से अमर

हे पुरुषों में राजा, यह उचित नहीं है कि यह सर्पराज आपके हाथों से मौत को प्राप्त होक्योंकि इसने अमर देवताओं का अमृत पी रखा है।

फलस्वरूप, इसे बुढ़ापा तथा मृत्यु केसामान्य लक्षण नहीं सताते।

"

'जीवितं मरणं जन्‍्तोर्गतिः स्वेनेव कर्मणा ।

राजं॑स्ततोन्यो नास्त्यस्य प्रदाता सुखदुःखयो: ॥

२५॥

जीवितम्‌--जीवित; मरणम्‌--मर रहे; जन्तो: --जीव का; गति:--अगले जीवन में गन्तव्य; स्वेन-- अपने ही द्वारा; एव--एकमात्र; कर्मणा--कर्म द्वारा; राजनू--हे राजा; ततः--उसकी अपेक्षा; अन्य:--दूसरा; न अस्ति--नहीं है; अस्य--उसका; प्रदाता--देने वाला; सुख-दुःखयो:--सुख तथा दुख का

देहधारी आत्मा का जीवन तथा मरण और अगले जीवन में उसका गन्तव्य--ये सभीउसके ही अपने कर्म द्वारा उत्पन्न होते हैं।

इसलिए हे राजन, किसी के सुख तथा दुख कोउत्पन्न करने के लिए वास्तव में कोई अन्य अभिकर्ता उत्तरदायी नहीं है।

"

सर्पचौराग्निविद्युदभ्य: क्षुत्तद्व्याध्यादिभिनूप ।

पदञ्नत्वमृच्छते जन्तुर्भुड़् आरब्धकर्म तत्‌ ॥

२६॥

सर्प--सर्पों; चौर--चोरों; अग्नि--आग; विद्युद्भ्य:--तथा आसमान की बिजली से; क्षुत्‌-- भूख; तृटू--प्यास;व्याधि--रोग; आदिभि:--आदि अन्य कारणों से; नृूप--हे राजा; पञ्ञत्वम्‌--मृत्यु; ऋच्छते--प्राप्त करता है; जन्तु: --बद्धजीव; भुड़े -- भोग करता है; आरब्ध--विगत कर्म से पहले से उत्पन्न; कर्म--सकाम कर्मफल; तत्‌--वह |

जब बद्धजीव सर्पो, चोरों, अग्नि, बिजली, भूख, रोग या अन्य किसी कारण से माराजाता है, तो वह अपने ही विगत कर्म के फल का अनुभव करता है।

"

'तस्मात्सत्रमिदं राजन्संस्थीयेताभिचारिकम्‌ ।

सर्पा अनागसो दग्धा जनैर्दिष्ट हि भुज्यते ॥

२७॥

तस्मात्‌--इसलिए; सत्रम्‌--यज्ञ को; इृदम्‌--इस; राजनू--हे राजा; संस्थीयेत--रोका जाना चाहिए; आभिचारिकमू--हानि पहुँचाने की मंशा से किया गया; सर्पा:--सर्प; अनागस:--निर्दोष; दग्धा:--जलाया गया; जनै: --व्यक्तियों द्वारा;दिष्टम्‌ू-- भाग्य; हि--निस्सन्देह; भुज्यते-- भोगा जाता है।

'इसलिए हे राजा, इस यज्ञ को जो अन्यों को हानि पहुँचाने की मंशा से चालू कियागया है, बन्द करा दें।

अनेक निर्दोष सर्प पहले ही जला कर मार दिये गये हैं।

निस्सन्देह सारेव्यक्तियों को अपने विगत कर्मो के अदृष्ट परिणामों को भोगना चाहिए।

"

'इत्युक्त: स तथेत्याह महर्षेमानयन्वच: ।

सर्पसत्रादुपरत:ः पूजयामास वाक्पतिम्‌ ॥

२८॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; स:--उसने ( जनमेजय ने ); तथा इति--तथास्तु; आह--कहा; महा-ऋषे: --महर्षियों के; मानयन्‌--सम्मान करते हुए; वच:--शब्द; सर्प-सत्रात्‌ू--सर्प-यज्ञ से;उपरतः--बन्द करते हुए; पूजयाम्‌ आस--पूजा की; वाक्‌-पतिम्‌--वाणी के स्वामी बृहस्पति को।

सूत गोस्वामी ने कहा : इस तरह सलाह दिये जाने पर महाराज जनमेजय ने उत्तर दिया,'तथास्तु'।

महर्षि के बचनों का आदर करते हुए उन्होंने सर्प-यज्ञ बन्द करा दिया और फिर" अत्यन्त वाक्पटु मुनि बृहस्पति की पूजा की।

सैषा विष्णोर्महामायाबाध्ययालक्षणा यया ।

मुहान्त्यस्यैवात्मभूता भूतेषु गुणवृत्तिभि: ॥

२९॥

सा एषा--यही; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु की; महा-माया--मोहमयी भौतिक शक्ति; अबाध्यया--जो उसके द्वारा जिसेरोका नहीं जा सकता; अलक्षणा--न दिखने वाली; यया--जिसके द्वारा; मुहान्ति--विमोहित हो जाते हैं; अस्थ-- भगवान्‌का; एव--निस्सन्देह; आत्म-भूता:--अंश रूप आत्माएँ; भूतेषु--उनके भौतिक शरीरों में; गुण--प्रकृति के गुणों के;वृत्तिभि: --कार्यो द्वारा

यह निस्सन्देह भगवान्‌ विष्णु की मायाशक्ति है, जो अबाध्य है और जिसे देख पानाकठिन है।

यद्यपि व्यष्टि आत्माएँ भगवान्‌ की भिन्नांश हैं, किन्तु इस मायाशक्ति के प्रभाव से,वे विविध भौतिक शरीरों के साथ अपनी पहचान से विमोहित हैं।

"

न यत्र दम्भीत्यभया विराजितामायात्मवादेसकृदात्मवादिभिः ।

न यद्विवादो विविधस्तदा श्रयोमनश्च सट्डूल्पविकल्पवृत्ति यत्‌ ॥

३०॥

न यत्र सृज्यं सृजतो भयो: परंश्रेयश्व जीवस्त्रिभिरन्वितस्त्वहम्‌ ।

तदेतदुत्सादितबाध्यबाधक॑निषिध्य चोर्मीन्विरमेत तन्मुनि: ॥

३१॥

न--नहीं; यत्र--जिसमें; दम्भी--दिखावटी व्यक्ति; इति--इस प्रकार सोचते हुए; अभया--निडर; विराजिता--हृश्य;माया--मायाशक्ति; आत्म-वादे--आध्यात्मिक पूछताछ किये जाने पर; असकृत्‌--निरन्तर; आत्म-वादिभि: --अध्यात्मविद्या का वर्णन करने वालों द्वारा; न--नहीं; यत्‌--जिसमें; विवाद:-- भौतिकतावादी तर्क-वितर्क; विविध:--नानाप्रकार का; तत्‌-आश्रय:--उस माया पर आश्रित; मन:--मन; च--तथा; सड्डूल्प--निर्णय; विकल्प--तथा संशय;वृत्ति--जिनके कार्य; यत्‌--जिसमें; न--नहीं; यत्र--जिसमें; सृज्यमू-- भौतिक जगत की सृजित वस्तुएँ; सृुजता--उनकेकारणों समेत; उभयो:--दोनों के द्वारा; परम्‌-प्राप्त किया हुआ; श्रेय:--लाभ; च--तथा; जीव: --जीव; त्रिभि:--तीन( गुणों ) से; अन्वित:ः--युक्त; तु--निस्सन्देह; अहम्‌-मिथ्या अहंकार ( से बद्ध ); तत्‌ एतत्‌--वह निस्सन्देह; उत्सादित--के अतिरिक्त; बाध्य--रोका गया ( बद्धजीव ); बाधकम्‌--तथा रोकने वाला ( गुण ); निषिध्य--छोड़ते हुए; च--तथा;ऊर्मीनू--लहरों को ( मिथ्या अहंकार आदि को ); विरमेत--विशेष आनन्द लूटे; तत्‌--उसमें; मुनिः--मुनि

किन्तु एक परम सत्य होता है, जिसमें माया यह सोचते हुए कि, 'मैं इस व्यक्ति को वशमें कर सकती हूँ क्योंकि यह कपटी है' निर्भय होकर अपना प्रभुत्व नहीं दिखा सकती।

सर्वोच्च सत्य में मायामय तर्क-वितर्क के दर्शन नहीं होते।

प्रत्युत उसमें अध्यात्म विद्या केअसली जिज्ञासु निरन्तर प्रमाणित आध्यात्मिक शोध में लगे रहते हैं।

उस परम सत्य मेंभौतिक मन की अभिव्यक्ति नहीं होती, जो कभी निर्णय तो कभी संशय के रूप में कार्यकरता है।

सृजित वस्तुएँ, उनके सूक्ष्म कारण और उनके उपयोग से प्राप्त आनन्द के लक्ष्यवहाँ विद्यमान नहीं रहते।

यही नहीं, उस परम सत्य में मिथ्या अहंकार तथा तीन गुणों सेआच्छादित कोई बद्ध आत्मा नहीं होता।

वह सत्य प्रत्येक सीमित अथवा असीमित वस्तु कोअपने से अलग करता है।

इसलिए जो बुद्धिमान है उसे चाहिए कि भौतिक जीवन की तरंगोंको रोक कर परम सत्य के भीतर आनन्द लूटे।

"

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद्‌यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः ।

विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहदाहृदोपगुह्यावसितं समाहितेः ॥

३२॥

परमू--परम; पदम्‌--पद; वैष्णवम्‌-- भगवान्‌ विष्णु का; आमनन्ति--नामकरण करते हैं; ततू--वह; यत्‌--जो; न इति नइति--' नेति नेति'; इति--इस प्रकार विश्लेषण करते हुए; अतत्‌--हर वस्तु बाहरी; उत्सिसृक्षव: --त्यागने के इच्छुकजन; विसृज्य--त्याग कर; दौरात्म्यम्‌--क्षुद्र भौतिकता; अनन्य--अनन्य; सौहदा:--उनका स्नेह; हृदा--अपने हृदयों केभीतर; उपगुहा--उनका आलिंगन करके; अवसितम्‌--बन्दी बनाया हुआ; समाहितैः--समाधि में उनका ध्यान करने वालोंके द्वारा

जो लोग उन सारी वस्तुओं को बाह्य के निषेध द्वारा त्याग देना चाहते हैं, जो वास्तव मेंसत्य नहीं है, वे भगवान्‌ विष्णु के परम पद की ओर नियमित रूप से आगे बढ़ते जाते हैं।

वेक्षुद्र भौतिकता को त्याग कर अपने हृदयों के भीतर परब्रह्म को ही अपना प्रेम प्रदान करते हैंऔर स्थिर ध्यान में उस सर्वोच्च सत्य का आलिंगन करते हैं।

"

त एतदधिगच्छन्ति विष्णोर्यत्परमं पदम्‌ ।

अहं ममेति दौर्जन्यं न येषां देहगेहजम्‌ ॥

३३॥

ते--वे; एतत्‌--यह; अधिगच्छन्ति--जान पाते हैं; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु का; यत्‌--जो; परमम्‌--परम; पदम्‌ू--पद;अहम्‌ू--मैं; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; दौर्जन्यमू-दुर्जनता; न--नहीं है; येषामू--जिसके लिए; देह--शरीर; गेह--तथा घर; जम्‌--पर आधारित

ऐसे भक्त भगवान्‌ विष्णु के परम आध्यात्मिक पद को समझ पाते हैं क्‍योंकि वे 'मैं'तथा ' मेरा ' के विचारों से, जो शरीर तथा घर पर आधारित हैं, दूषित नहीं होते।

"

अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्ञन ।

न चेम॑ देहमाश्नित्य वैरं कुर्वीत केनचित्‌ ॥

३४॥

अति-वादान्‌--अपमानजनक शब्द; तितिक्षेतर--सहन करे; न--कभी नहीं; अवमन्येत--अनादर करे; कञ्लन--किसीका; न च--न तो; इमम्‌--इस; देहम्‌-- भौतिक शरीर; आश्रित्य--पहचान बनाकर; वैरम्‌--शत्रुता; कुर्वीत--करे;केनचित्‌--किसी से

मनुष्य को सारा अपमान सहन कर लेना चाहिए और किसी व्यक्ति के प्रति उचितसम्मान प्रदर्शित करने से चूकना नहीं चाहिए।

भौतिक शरीर से पहचान बनाने से बचते हुएमनुष्य को किसी के साथ शत्रुता उत्पन्न नहीं करनी चाहिए।

"

नमो भगवते तस्मै कृष्णायाकुण्ठमेथसे ।

यत्पादाम्बुरुह्ृध्यानात्संहितामध्यगामिमाम्‌ ॥

३५॥

नमः--नमस्कार; भगवते-- भगवान्‌; तस्मै--उन; कृष्णाय--कृष्ण को; अकुण्ठ-मेधसे--जिनकी शक्ति कभी रुद्ध नहींहोती; यत्‌--जिनके ; पाद-अम्बु-रह--चरणकमलों पर; ध्यानात्‌ू-- ध्यान से; संहिताम्‌--शास्त्र को; अध्यगाम्‌-- मैंनेआत्मसात किया है; इमाम्‌--इस।

मैं अनवरुद्ध भगवान्‌ कृष्ण को नमस्कार करता हूँ।

उनके चरणकमलों पर ध्यान धरनेसे ही मैं इस महान्‌ ग्रंथ का अध्ययन कर सका और इसकी सराहना कर सका।

"

श्रीशौनक उबाचपैलादिभिव्यासशिष्यैरवेंदाचार्यमहात्मभि: ।

वेदाश्व कथिता व्यस्ता एतत्सौम्याभिधेहि न: ॥

३६॥

श्री-शौनक: उवाच-- श्री शौनक ऋषि ने कहा; पैल-आदिभि:--पैल तथा अन्यों द्वारा; व्यास-शिष्यै: -- श्रील व्यासदेव केशिष्य; वेद-आचार्य: --वेदों के आदर्श अधिकारियों द्वारा; महा-आत्मभि:--महान्‌ बुद्धि वाले; बेदा:--वेद; च--तथा;'कथिता:--कहा गया; व्यस्ता:--विभाजित; एतत्‌--यह; सौम्य--हे भद्र सूत; अभिधेहि--कृपया कह सुनायें; न: --हमसे |

शौनक ऋषि ने कहा : हे सौम्य सूत, कृपा करके हमें बतलायें कि किस तरह पैल तथाश्रील व्यासदेव के अत्यन्त परम बुद्धिमान शिष्यों ने, जो कि वैदिक विद्या के आदर्शअधिकारी माने जाते हैं, वेदों का प्रवचन तथा सम्पादन किया।

"

सूत उबाचसमाहितात्मनो ब्रह्मन्ब्रह्मण: परमेष्ठिन: ।

इृद्याकाशादभून्नादो वृत्तिरोधाद्विभाव्यते ॥

३७॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; समाहित-आत्मन:--जिसका मन पूरी तरह से स्थिर था; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण( शौनक ); ब्रह्मण: --ब्रह्मा का; परमे-स्थिन: --जीवों में सर्वोच्च; हदि--हृदय में; आकाशात्‌-- आकाश से; अभूत्‌--उठी; नाद:--दिव्य सूक्ष्म ध्वनि; वृत्ति-रोधात्‌-कार्य ( कानों का ) रोकने पर; विभाव्यते-- अनुभव किया जाता है

सूत गोस्वामी ने कहा : हे ब्राह्मण, दिव्य ध्वनि की प्रथम सूक्ष्म गूँज सर्वश्रेष्ठ ब्रह्माजी के हृदयरूपी आकाश से प्रकट हुई जिनका मन आध्यात्मिक साक्षात्कार में पूरी तरह स्थिर था।

इस सूक्ष्म गूँ का अनुभव कोई भी व्यक्ति कर सकता है जब वह अपनी सारी बाह्य श्रवण-क्रिया को रोक लेता है।

"

यदुपासनया ब्रह्मन्योगिनो मलमात्मन: ।

द्रव्यक्रियाकारकाख्यं धूत्वा यान्त्यपुनर्भवम्‌ ॥

३८ ॥

यत्‌--जिस ( वेदों के सूक्ष्म रूप ) की; उपासनया--पूजा से; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; योगिन:--योगीजन; मलम्‌--कल्मष के;आत्मन:--हृदय के; द्रव्य--वस्तु; क्रिया--सक्रियता; कारक--तथा कर्ता; आख्यम्‌--उपाधिवाला; धूत्वा--स्वच्छकरके; यान्ति--प्राप्त करते हैं; अपुन:-भवम्‌--पुनर्जन्म से छुटकारा |

हे ब्राह्मण, वेदों के इस सूक्ष्म रूप की पूजा द्वारा योगीजन वस्तु की अशुद्द्धि, क्रिया तथाकर्ता से उत्पन्न सारे कल्मष से अपने हृदयों को स्वच्छ बनाते हैं और इस तरह वे बारम्बारजन्म-मृत्यु से छुटकारा प्राप्त कर लेते हैं।

"

ततोभूत्रिवृदोंकारों योउव्यक्तप्रभवः स्वराट्‌ ।

यत्तल्लिड्रं भगवतो ब्रह्मण: परमात्मनः ॥

३९॥

ततः--उससे; अभूत्‌--उत्पन्न हुआ; त्रि-वृत्‌ू--तीन मात्राओं वाला; ३०-कार:--» अक्षर; यः--जो; अव्यक्त--अप्रकट;प्रभव:--जिसका प्रभाव; स्व-राट्‌--आत्म-अभिव्यक्ति; यत्‌ू--जो; तत्‌--वह; लिड्रम्‌ू-- स्वरूप; भगवत: -- भगवान्‌ का;ब्रह्मण: --परब्रह्म का उनके निर्विशेष रूप में; परम-आत्मन:--तथा परमात्मा का

उस दिव्य सूक्ष्म गूँज से तीन मात्राओं वाला ॐकार उत्पन्न हुआ।

कार में अदृश्यशक्तियाँ हैं और यह शुद्ध हृदय के भीतर अपने आप प्रकट होता है।

यह परब्रह्म की तीनोंअवस्थाओं-- भगवान्‌, परमात्मा तथा परम निर्विशेष सत्य--में उनका स्वरूप है।

"

श्रूणोति य इम॑ स्फोर्ट सुप्तश्रोत्रे च शून्यहक्‌ ।

येन वाग्व्यज्यते यस्य व्यक्तिराकाश आत्मनः ॥

४०॥

स्वधाम्नो ब्राह्मण: साक्षाद्वाचक्र: परमात्मन: ।

स सर्वमन्त्रोपनिषद्वेदबीजं सनातनम्‌ ॥

४१॥

श्रूणोति--सुनता है; यः:--जो; इमम्‌ू--इस; स्फोटम्‌--अव्यक्त तथा नित्य सूक्ष्म ध्वनि को; सुप्त-श्रोत्रे--जब श्रवणेन्द्रियसुप्त रहती है; च--तथा; शून्य-हक्‌-- भौतिक दृष्टि तथा अन्य ऐन्द्रिय कार्यों से विहीन; येन--जसिसे; वाक्‌--वैदिकध्वनि का विस्तार; व्यज्यते--विस्तृत किया जाता है; यस्य--जिसका; व्यक्ति: -- अभिव्यक्ति; आकाशे--आकाश ( हृदयके ) में; आत्मन:--आत्मा से; स्व-धाम्न:--जो अपना ही उद्गम है; ब्रह्मण:--परब्रह्म का; साक्षात्‌-- प्रत्यक्ष; वाचक: --नामसूचक पद; परम-आत्मन:--परमात्मा का; सः--वह; सर्व--सभी; मन्त्र--वैदिक स्तोत्र; उपनिषत्‌--गुहा; वेद--वेदोंका; बीजम्‌--बीज; सनातनम्‌--शाश्वत ।

यह ॐकार, जोकि अन्ततः अभौतिक तथा अश्रव्य होता है, उसे परमात्मा कान या कोई अन्य इन्द्रियाँ न होते हुए भी सुनता है।

वैदिक ध्वनि का पूरा विस्तार कार से ही हुआ है,जो हृदय के आकाश के भीतर आत्मा से प्रकट होता है।

यह स्व-जन्मा परब्रह्म परमात्मा कीप्रत्यक्ष उपाधि है और गुह्य सार तथा समस्त वैदिक स्तोत्रों का नित्य बीज है।

"

तस्य ह्संस्त्रयो वर्णा अकाराद्या भूगूद्ह ।

धार्यन्ते यैस्त्रयो भावा गुणनामार्थवृत्तय: ॥

४२॥

तस्य--उस ॐकार के; हि--निस्सन्देह; आसन्‌--हुए; त्रय:--तीन; वर्णा:--अक्षर की ध्वनियाँ; अ-कार-आद्या:--अअक्षर से प्रारम्भ करके; भृगु-उद्ठद-हे भृगुवंशियों में अत्यन्त प्रसिद्ध; धार्यन्ते-- धारण किये जाते हैं; यैः--जिन तीनध्वनियों से; त्रय:--तीन; भावा:--संसार की स्थितियाँ; गुण--प्रकृति के गुण; नाम--नाम; अर्थ--लक्ष्य; वृत्तय:--तथा

चेतना की स्थितियाँ<»कार से आ, उ तथा म वर्णों की तीन मौलिक ध्वनियाँ प्रकट हुईं।

हे भृगुवंशियों मेंप्रसिद्ध, ये तीनों भौतिक जगत के तीन विभिन्न पक्षों को धारण करते हैं जिनमें प्रकृति केतीन गुण ऋक्‌, यजुर्‌ तथा साम वेदों के नाम से, भूर, भुवर्‌ तथा स्वर्‌ लोकों के नाम सेविख्यात लक्ष्य तथा जागृत, सुप्त एवं सुषुप्त नामक तीन वृत्तियाँ धारण करते हैं।

"

ततोक्षरसमाम्नायमसृजद्धगवानज: ॥

अन्तस्थोष्मस्वरस्पर्शहस्वदीर्घादिलक्षणम्‌ ॥

४३॥

ततः--उस ॐकार से; अक्षर--विभिन्न ध्वनियों का; समाम्नायम्‌--सम्पूर्ण संग्रह ( वर्णमाला ); असृजत्‌--उत्पन्न किया;भगवानू्‌--शक्तिमान देवता; अज:--अजन्मा ब्रह्मा; अन्त-स्थ--अर्द्धस्वरों के रूप में; उष्म--उष्म; स्वर--स्वर; स्पर्श--तथा व्यंजन; हस्व-दीर्घ--लघु तथा गुरु रूप; आदि--इत्यादि; लक्षणम्‌-लक्षणों से युक्त |

ब्रह्म ने ॐकार से अक्षर की सारी ध्वनियाँ--स्वर, व्यंजन, अर्धस्वर, उष्म, स्पर्शइत्यादि उत्पन्न कीं जो हस्व तथा दीर्घ माप जैसे गुणों से विभेदित की जाती हैं।

"

तेनासौ चतुरो वेदांश्वतुर्भिर्वदनैर्विभु: ।

सव्याहतिकास्सोंकारां श्वातु्हों त्रविवक्षया ॥

४४॥

तेन--उस ध्वनि समूह से; असौ--उसने; चतुर: --चार; वेदान्‌ू--वेदों को; चतुर्भि:--अपने चार; वदनै:--मुखों से;विभु:--सर्वशक्तिमान; स-व्याहतिकान्‌--व्याहतियों ( भू:, भुवः, स्व:, मह:, जनः, तपः तथा सत्य नामक सात लोकों केनाम ) सहित; स-ओंकारान्‌-- ॐ बीज समेत; चातु:-होत्र--चारों वेदों में से प्रत्येक के पुरोहितों द्वारा सम्पन्न यज्ञ के चारपक्ष; विवक्षया--वर्णन करने की इच्छा से |

सर्वशक्तिमान ब्रह्मा ने ध्वनियों के इस समूह का उपयोग अपने चार मुखों से चार वेदोंको उत्पन्न करने के लिए किया जो पवित्र ४कार तथा सात व्याहतियों समेत प्रकट हुए।

उनका अभीष्ट वैदिक यज्ञ विधि को चार वेदों में से प्रत्येक के पुरोहितों द्वारा सम्पन्न विभिन्नकार्यो तक विस्तार देना था।

"

पुत्रानध्यापयत्तांस्तु ब्रह्मर्षीन्त्रह्यकोविदान्‌ ।

ते तु धर्मोपदेष्टार: स्वपुत्रेभ्य: समादिशन्‌ ॥

४५॥

पुत्रान्‌ू--अपने पुत्रों को; अध्यापयत्‌--पढ़ाया; तान्‌--उन वेदों को; तु--तथा; ब्रह्म-ऋषीन्‌--ब्रह्मर्षियों को; ब्रह्म--वैदिक पाठ की कला में; कोविदान्‌ू--पटु; ते--वे; तु--यही नहीं; धर्म--धार्मिक अनुष्ठानों में; उपदेष्टारः--शिक्षकों; स्व-पुत्रेभ्य:--अपने पुत्रों को; समादिशन्‌--प्रदान किया |

ब्रह्मा ने इन वेदों की शिक्षा अपने पुत्रों को दी जो ब्राह्मणों में ब्रह्मर्षि थे और वैदिकवाचन-कला में पटु थे।

फिर उन्होंने स्वयं आचार्यों की भूमिका ग्रहण की और अपने-अपनेपुत्रों को वेदों की शिक्षा दी।

"

ते परम्परया प्राप्तास्तत्तच्छिष्यैर्थृतब्रतेः ।

चतुर्युगेष्वथ व्यस्ता द्वापरादौ महर्षिभि: ॥

४६॥

ते--ये वेद; परम्परया--परम्परा से; प्राप्ताः--प्राप्त; तत्‌-तत्‌--प्रत्येक अगली पीढ़ी के; शिष्यै:--शिष्यों द्वारा; धृत-ब्रतेः --अपने ब्रतों में हढ़; चतुः-युगेषु--चारों युगों में; अथ--तब; व्यस्ता:--विभाजित कर दिये गये; द्वापर-आदौ--द्वापर युग के अन्त में; महा-ऋषिभि:--महान्‌ आचार्यो द्वारा

इस तरह चतुर्युग के सारे चक्रों में दृढ़त्रत शिष्यों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी ने परम्परा द्वारा इनवेदों को प्राप्त किया।

प्रत्येक द्वापर युग के अन्त में इन वेदों को प्रसिद्ध मुनिगण पृथक्‌विभागों में संपादित करते हैं।

"

क्षीणायुष: क्षीणसत्त्वान्दुर्मे धान्वी क्षय कालत: ।

वेदान्त्रह्मर्षयो व्यस्यन्हदिस्थाच्युतचोदिता: ॥

४७॥

क्षीण-आयुष:--घटी हुई आयु वाले; क्षीण-सत्त्वानू-घटे हुए बल वाले; दुर्मेधान्‌--अल्पज्ञों को; वीक्ष्य--देख कर;कालतः--काल के प्रभाव से; वेदान्‌ू--वेदों को; ब्रहा-ऋषय:--प्रमुख मुनियों ने; व्यस्यन्‌--विभाजित कर दिया; हृदि-स्थ--अपने हृदयों के भीतर स्थित; अच्युत--अच्युत भगवान्‌ द्वारा; चोदिता: --प्रेरित |

यह देख कर कि काल के प्रभाव से सामान्यतया लोगों की आयु, शक्ति तथा बुद्धिघटती जा रही है, महामुनियों ने अपने हृदयों में स्थित भगवान्‌ से प्रेरणा ली और वेदों काक्रमबद्ध विभाजन कर दिया।

"

अस्मिन्नप्यन्तरे ब्रह्मन्भगवान्लोकभावन: ।

ब्रहोेशाद्यैलोकपालैर्याचितो धर्मगुप्तये ॥

४८॥

पराशरात्सत्यवत्यामंशांशकलया विभुः ।

अवतीर्णो महाभाग वेदं चक्रे चतुर्विधम्‌ ॥

४९॥

अस्मिन्‌--इसमें; अपि-- भी; अन्तरे--मनु के शासन में; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण ( शौनक ); भगवान्‌-- भगवान्‌; लोक --ब्रह्माण्ड के; भावन:--रक्षक; ब्रह्म-- ब्रह्मा; ईश--शिव; आद्यि:--तथा अन्यों द्वारा; लोक-पालैः--विभिन्न लोकों केशासकों द्वारा; याचित: --प्रार्थना किये जाने पर; धर्म-गुप्तये-- धर्म की रक्षा के लिए; पराशरात्‌--पराशर मुनि से;सत्यवत्याम्‌--सत्यवती के गर्भ से; अंश--अपने स्वांश ( संकर्षण ); अंश--अंश ( विष्णु ) के; कलया--कला के रूपमें; विभु;:--भगवान्‌; अवतीर्ण:--अवतरित; महा-भाग--हे परम भाग्यवान्‌; वेदम्‌--वेदों को; चक्रे--कर दिया; चतुः-विधम्‌--चार भागों में |

हे ब्राह्मण, वैवस्वत मनु के वर्तमान युग में, ब्रह्मा, शिव इत्यादि ब्रह्माण्ड के नायकों नेसमस्त जगतों के रक्षक भगवान्‌ से धर्म के सिद्धान्तों की रक्षा करने के लिए प्रार्थना की।

हेपरम भाग्यवान शौनक, तब अपने स्वांश के अंश का दैवी स्फुलिंग प्रदर्शित करतेहुए पराशरके पुत्र के रूप में सत्यवती के गर्भ से भगवान्‌ प्रकट हुए।

इस रूप में, जिसे कृष्ण द्वैपायनव्यास कहते हैं, उन्होंने एक वेद के चार भाग कर दिये।

"

ऋगथर्वयजु:साम्नां राशीरुद्धृत्य वर्गशः ।

चतर्त्र: संहिताश्चक्रे मन्त्रेमीणिगणा इव ॥

५०॥

ऋक्‌-अथर्व-यजु:-साम्नामू--ऋग्‌, अथर्व, यजुर तथा सामवेद; राशी:--( मंत्रों का ) संकलन; उद्धृत्य--विलग करके;वर्गश:--विशिष्ट वर्गों में; चतस्त्र:--चार; संहिता: --संग्रह; चक्रे --कर दिया; मन्त्रै:--मंत्रों से; मणि-गणा:--मणियों के;इब--सहश।

श्रील व्यासदेव ने ऋग्‌ू, अथर्व, यजुर्‌ तथा साम वेदों के मंत्रों को चार वर्गों में विलगकर दिया जिस तरह मणियों के मिले-जुले संग्रह में से ढेरियाँ लगा दी जाती हैं।

इस तरहउन्होंने चार पृथक्‌-पृथक्‌ वैदिक ग्रंथों की रचना की।

"

तासां स चतुरः शिष्यानुपाहूय महामतिः ।

एकैकां संहितां ब्रह्मन्नेकेकस्मै ददौ विभु:ः ॥

५१॥

तासाम्‌--उन चार संग्रहों के; सः--उसने; चतुर:--चार; शिष्यान्‌--शिष्यों को; उपाहूय--पास बुलाकर; महा-मति:--अत्यन्त बुद्धिमान मुनि; एक-एकाम्‌--एक-एक करके; संहिताम्‌--संग्रह; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; एक-एकस्मै--उनमें सेप्रत्येक को; ददौ--दे दिया; विभु:--शक्तिमान व्यासदेव ने |

अत्यन्त शक्तिमान तथा बुद्धिमान व्यासदेव ने अपने चार शिष्यों को बुलाया और हेब्राह्मण, उनमें से हर एक को इन चार संहिताओं में से एक-एक का भार सौंप दिया।

"

पैलाय संहितामाद्यां बह्नचाख्यां उवाच ह ।

वैशम्पायनसंज्ञाय निगदाख्य॑ यजुर्गणम्‌ ॥

५२॥

साम्नां जैमिनये प्राह तथा छन्दोगसंहिताम्‌ ।

अथर्वाड्रिस्सीं नाम स्वशिष्याय सुमन्तवे ॥

५३॥

पैलाय--पैल को; संहिताम्‌ू--संग्रह; आद्याम्‌--प्रथम ( ऋग्वेद का ); बहु-ऋच-आख्यम्‌--बह्नच नामक; उवाच--कहा;ह--निस्सन्देह; वैशम्पायन-संज्ञाय--वैशम्पायन नामक मुनि को; निगद-आख्यम्‌--निगद नामक; यजु: -गणम्‌--यजुर्मत्रोंका संग्रह; साम्नामू--सामवेद के मंत्रों को; जैमिनये--जैमिनि को; प्राह--कहा; तथा--और; छन्दोग-संहिताम्‌--छंदोगनामक संहिता; अथर्व-अड्विरसीम्‌--अथर्व तथा अंगिरा मुनियों के नाम पर वेद; नाम--निस्सन्देह; स्व-शिष्याय-- अपनेशिष्य; सुमन्तवे--सुमन्तु को |

श्रील व्यासदेव ने प्रथम संहिता ऋग्वेद की शिक्षा पैल को दी और इस संग्रह का नामबह्नच रखा।

मुनि वैशम्पायन से उन्होंने यजुर्मत्रों का संग्रह, निगद, का प्रवचन किया।

उन्होंनेजैमिनि को सामवेद के मंत्रों की शिक्षा दी जिनका नाम छन्दोग संहिता था और अपने प्रियशिष्य सुमन्तु से उन्होंने अथर्ववेद कहा।

"

पैल: स्वसंहितामूचे इन्द्रप्रमितये मुनि: ।

बाष्कलाय च सोप्याह शिष्येभ्य: संहितां स्वकाम्‌ ॥

५४॥

चतुर्धा व्यस्य बोध्याय याज्ञवल्क्याय भार्गव ।

पराशरायाम्निमित्र इन्द्रप्रमितिरात्मवान्‌ ॥

५५॥

अध्यापयत्संहितां स्वां माण्डूकेयमृषिं कविम्‌ ।

तस्य शिष्यो देवमित्र: सौभर्यादिभ्य ऊचिवान्‌ ॥

५६॥

पैल:--पैल ने; स्व-संहिताम्‌--अपने संग्रह को; ऊचे--कहा; इन्द्रप्रमितये--इन्द्रप्रमिति से; मुनिः--मुनि; बाष्कलाय--बाष्कल को; च--तथा; सः--उसने ( बाष्कल ने ); अपि-- भी; आह--कहा; शिष्येभ्य:--अपने शिष्यों से; संहिताम्‌ू--संग्रह; स्वकाम्‌--अपना; चतुर्धा--चार भागों में; व्यस्थ--विभाजित करके; बोध्याय--बोध्य से; याज्ञवल्क्याय--याज्ञवल्क्य से; भार्गव--हे भूगुबंशी ( शौनक ); पराशराय--पराशर से; अग्निमित्रे--अग्निमित्र से; इन्द्रप्रमिति:--इन्द्रप्रमति; आत्म-वान्‌--आत्मसंयमी; अध्यापयत्‌--शिक्षा दी; संहिताम्‌--संग्रह को; स्वाम्‌--अपने; माण्डूकेयम्‌--माण्डूकेय से; ऋषिम्‌ू--ऋषि; कविम्‌--विद्वान; तस्य--उसका ( माण्डूकेय का ); शिष्य:--शिष्य; देवमित्र: --देवमित्र;सौभरि-आदिशभ्य:--सौभरि तथा अन्यों से; ऊचिवानू--कहा।

अपनी संहिता को दो भागों में विभक्त करने के बाद विद्वान पैल ने इसे इन्द्रप्रमति तथाबाष्कल को बताया।

हे भार्गव, बाष्कल ने अपने संग्रह को पुनः चार भागों में विभाजित करदिया और उन्हें अपने चार शिष्यों--बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर तथा अग्निमित्र को पढ़ाया।

आत्मसंयमी ऋषि इन्द्रप्रमति ने अपनी संहिता विद्वान योगी माण्डूकेय को पढ़ाई जिसकेशिष्य देवमित्र ने आगे चल कर सौभरि तथा अन्यों को ऋग्वेद के सारे विभाग दे दिये।

"

शाकल्यस्तत्सुतः स्वां तु पञ्ञधा व्यस्य संहिताम्‌ ।

वात्स्यमुदूगलशालीयगोखल्यशिशिरेष्वधात्‌ ॥

५७॥

शाकल्य:--शाकल्य; तत्‌-सुतः--माण्डूकेय का पुत्र; स्वामू--अपनी; तु--तथा; पञ्ञधा--पाँच भागों में; व्यस्थ--विभाजित करके; संहितामू--संहिता का; वात्स्य-मुद्गल-शालीय--वात्स्य, मुदूगल तथा शालीय को; गोखल्य-शिशिरिषु--तथा गोखल्य और शिशिर को; अधात्‌--दिया

माण्डूकेय के पुत्र शाकल्य ने अपनी संहिता को पाँच भागों में बाँट दिया और इनमें सेप्रत्येक उपविभाग वात्स्य, मुदूगल, शालीय, गोखल्य तथा शिशिर को सौंप दिये।

"

जातूकर्णय्य श्व॒ तच्छिष्य: सनिरुक्तां स्वसंहिताम्‌ ।

बलाकपैलजाबालविरजेभ्यो ददौ मुनि: ॥

५८॥

जातूकर्णर्य:--जातूकर्ण्य; च--तथा; तत्‌-शिष्य:--शाकल्य का शिष्य; स-निरुक्तामू--कठिन शब्दों की व्याख्या करनेवाले शब्द संग्रह के साथ; स्व-संहिताम्‌--प्राप्त हुए संग्रह को; बलाक-पैल-जाबाल-विरजेभ्य:--बलाक, पैल, जाबालतथा विरज को; ददौ--दे दिया; मुनि:--मुनि

नेमुनि जातूकर्ण्य भी शाकल्य का शिष्य था।

उसने शाकल्य से प्राप्त संहिता के तीनविभाग किये और उसमें एक चौथा अनुभाग वैदिक शब्द संग्रह ( निरुक्त ) का जोड़ दिया।

उसने इन चारों भागों में से एक-एक विभाग अपने चार शिष्यों--बलाक, द्वितीय पैल,जाबाल तथा विरज को पढ़ाया।

"

बाष्कलिः प्रतिशाखाभ्यो वालखिल्याख्यसंहिताम्‌ ।

चक्रे वालायनिर्भज्य: काशारश्चैव तां दधु: ॥

५९॥

बाष्कलि:--बाष्कल का पुत्र बाष्कलि; प्रति-शाखाभ्य: --विभिन्न शाखाओं से; वालखिल्य-आख्य---वालखिल्य शीर्षकवाले; संहिताम्‌--संग्रह को; चक्रे --बनाया; वालायनि:--वालायनि; भज्य:-- भज्य; काशार: --काशार; च--तथा;एव--निस्सन्देह; तामू--उसको; दथु:--स्वीकार किया।

बाष्कलि ने, ऋग्वेद की समस्त शाखाओं से, वालखिल्य संहिता तैयार की।

यह संहितावालायनि, भज्य तथा काशार को प्राप्त हुई ।

"

बह्ृुचा: संहिता होता एभिन्रह्ार्पिभिर्धृता: ।

श्र॒ुत्वैतच्छन्दसां व्यासं सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥

६० ॥

बहु-ऋचा: --ऋग्वेद की; संहिता:--संहिताएँ; हि--निस्सन्देह; एता:--ये; एभि:--इन; ब्रह्म-ऋषिभि: --सन्त ब्राह्मणोंद्वारा; धृता:--परम्परा से धारण की हुई; श्रुत्वा--सुन कर; एतत्‌--उनके; छन्दसाम्‌--पवित्र एलोकों के; व्यासमू--विभाजन की विधि; सर्व-पापै:--सभी पापों से; प्रमुच्यते--छूट जाता है |

इन सन्त ब्राह्मणों ने ऋग्वेद की इन विविध संहिताओं को शिष्य-परम्परा द्वारा बनायेरखा।

वैदिक स्तोत्रों के इस विभाजन को सुनने मात्र से मनुष्य सारे पापों से छूट जाता है।

"

वैशम्पायनशिष्या वै चरकाध्वर्यवोभवन्‌ ।

यच्चेरुब्रह्महत्यांह: क्षपणं स्वगुरोबत्रतम्‌ ॥

६१॥

वैशम्पायन-शिष्या: --वैशम्पायन के शिष्य; वै--निस्सन्देह; चरक--चरक नाम के; अध्वर्यव: --अथर्ववेद के आचार्य;अभवनू--बने; यत्‌--क्योंकि; चेरु: --उन्होंने सम्पन्न किया; ब्रह्म-हत्या--ब्राह्मण-वध के कारण; अंह:--पाप का;क्षपणम्‌-प्रायश्चित्त; स्व-गुरो:-- अपने ही गुरु के लिए; ब्रतम्‌-ब्रत |

वैशम्पायन के शिष्य अथर्ववेद के आचार्य बने।

वे चरक कहलाते थे क्योंकि उन्होंनेअपने गुरु को ब्राह्मण-हत्या के पाप से मुक्त कराने के लिए कठिन ब्रत किए थे।

"

याज्ञवल्क्यश्न तच्छिष्य आहाहो भगवन्कियत्‌ ।

चरितेनाल्पसाराणां चरिष्येहं सुदुश्चरम्‌ ॥

६२॥

याज्ञवल्क्य:--याज्ञवल्क्य; च--तथा; तत्‌-शिष्य:--वैशम्पायन का शिष्य; आह--कहा; अहो--जरा देखो; भगवन्‌--हेप्रभु; कियत्‌ू--कितना; चरितेन--प्रयत्त से; अल्प-साराणाम्‌--इन निर्बल व्यक्तियों के; चरिष्ये--पूरा करूँगा; अहम्‌--मैं; सु-दुश्चवरम्‌--जिसे पूरा कर पाना अत्यन्त कठिन है।

एक बार वैशम्पायन के एक शिष्य याज्ञवल्क्य ने कहा 'हे प्रभु, आपके इन निर्बलशिष्यों के दुर्बल प्रयासों से कितना लाभ प्राप्त किया जा सकता है? मैं स्वयं कुछ अद्वितीय तपस्या करूँगा।

"

इत्युक्तो गुरुरप्याह कुपितो याह्यलं त्वया ।

विप्रावमन्त्रा शिष्येण मदधीतं त्यजाश्चिति ॥

६३॥

इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; गुरु:--उसके गुरु ने; अपि-- भी; आह--कहा; कुपित:--क्रुद्ध; याहि--चलेजाओ; अलम्‌--बहुत हुआ; त्ववा--तुमसे; विप्र-अवमन्त्रा--ब्राह्मणों का अपमान करने वाले; शिष्येण--ऐसे शिष्य से;मत्‌-अधीतम्‌--मेरे द्वारा जो पढ़ाया गया; त्यज--त्याग दो; आशु--तुरनन्‍्त; इति--इस प्रकार |

ऐसा कहे जाने पर गुरु वैशम्पायन क्रुद्ध हो उठे और कहा : 'यहाँ से निकल जाओ!ओरे ब्राह्मणों का अपमान करने वाले शिष्य! बहुत हो चुका।

तुम तुरन्त ही वह सब लौटा दोजो मैंने तुम्हें पढ़ाया है।

"

'देवरातसुतः सोपि छर्दित्वा यजुषां गणम्‌ ।

ततो गतोथ मुनयो दहशुस्तान्यजुर्गणान्‌ ॥

६४॥

यजूंषि तित्तिरा भूत्वा तललोलुपतयाददु: ।

तैत्तिरीया इति यजु:शाखा आसन्सुपेशला: ॥

६५॥

देवरात-सुतः--देवरात का पुत्र ( याज्ञवल्क्य ); सः--वह; अपि--निस्सन्देह; छर्दित्वा--उगलते हुए; यजुषाम्‌--यजुर्वेदके; गणम्‌--संचित मंत्र; ततः--वहाँ से; गतः--चला गया; अथ--तब; मुनय:--मुनियों ने; दहशु:--देखा; तान्‌ू--उन;यजु:-गणानू--यजुर्मत्रों को; यजूंषि--ये यजु:; तित्तिरा:--तीतर; भूत्वा--बन कर; तत्‌--उन मंत्रों के लिए;लोलुपतया--ललचाई इच्छा से; आददु:--उन्‍्हें चुग लिया; तैत्तिरीया:--तैत्तिरीय नाम से; इति--इस प्रकार; यजु:-शाखा:--यजुर्वेद की शाखाएँ; आसन्‌--बनीं; सु-पेशला: --अत्यन्त सुन्दर |

तब देवरात पुत्र याज्ञवल्क्य ने यजुर्वेद के मंत्र उगल दिए और वहाँ से चला गया।

इनयजुर्मत्रों को ललचाई दृष्टि से देख रहे एकत्र शिष्यों ने तीतरों का रूप धारण करके उन्हें चुगलिया।

इसलिए यजुर्वेद के ये विभाग अत्यन्त सुन्दर तैत्तिरीय संहिता अर्थात्‌ तीतरों द्वारासंकलित मंत्र के नाम से विख्यात हुए।

"

याज्ञवल्क्यस्ततो ब्रह्मंश्छन्दांस्यधि गवेषयन्‌ ।

गुरोरविद्यमानानि सूपतस्थेर्कमी श्वरम्‌ ॥

६६॥

याज्ञवल्क्य:--याज्ञवल्क्य; ततः--तत्पश्चात्‌; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; छन्दांसि--मंत्रों; अधि-- अतिरिक्त; गवेषयन्‌--ढूँढते हुए;गुरो:--अपने गुरु के; अविद्यमानानि--अज्ञात; सु-उपतस्थे--सावधानी से पूजा की; अर्कम्‌--सूर्य की; ईश्वरम्‌--शक्तिमान नियन्ता

हे ब्राह्मण शौनक, तब याज्ञवाल्क्य ने ऐसे नवीन यजुर्मत्रों की खोज करनी चाही जोउसके गुरु को भी ज्ञात न हों।

इसे मन में रख कर उसने शक्तिशाली सूर्य देव की ध्यानपूर्वकपूजा की।

"

श्रीयाज्ञवल्क्य उवाचॐ नमो भगवते आदित्यायाखिलजगतामात्मस्वरूपेण काल स्वरूपेण चतुर्विधभूतनिकायानांब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामन्तईदयेषु बहिरपि चाकाश इवोपाधिनाव्यवधीयमानो भवानेकएवं क्षणलवनिमेषावयवोपचितसंवत्सरगणेनापामादान विसर्गाभ्यामिमां लोकयात्रामनुवहति ॥

६७॥

श्री-याज्ञवल्क्य: उवाच-- श्री याज्ञवल्क्य ने कहा; ॐ नम:--मैं सादर नमस्कार करता हूँ; भगवते-- भगवान्‌ को;आदित्याय--सूर्य देव के रूप में प्रकट होने वाले; अखिल-जगताम्‌--सम्पूर्ण लोकों के; आत्म-स्वरूपेण--परमात्मा केरूप में; काल-स्वरूपेण--काल के रूप में; चतु:ः-विध--चार प्रकार के; भूत-निकायानाम्‌--समस्त जीवों के; ब्रह्म-आदि--ब्रह्म इत्यादि; स्तम्ब-पर्यन्तानामू--तथा घास की पत्ती तक; अन्तः-हृदयेषु--उनके हृदयों के रिक्त स्थानों में;बहिः--बाह्य रूप से; अपि-- भी; च--तथा; आकाश: इबव--आकाश की तरह; उपाधिना--उपाधियों से;अव्यवधीयमान:--आच्छादित न होकर; भवान्‌ू--आप; एक: --एकमात्र; एव--निस्सन्देह; क्षण-लव-निमेष-- क्षण, लवतथा निमेष ( समय के सूक्ष्मतम खंड ); अवयव--इन खंडों से; उपचित--एकसाथ संकलित; संबत्सर-गणेन--वर्षो तक;अपाम्‌--जल के; आदान--निकाल लेने से; विसर्गाभ्याम्‌ू--तथा देने से; इमाम्‌ू--इस; लोक--ब्रह्माण्ड का; यात्राम्‌ू--पालन; अनुवहति--वहन करता है।

श्री याज्ञवल्क्य ने कहा: मैं सूर्य देव के रूप में प्रकट भगवान्‌ को सादर नमस्कारकरता हूँ।

आप चार प्रकार के जीवों के जिनमें ब्रह्म से लेकर घास की पत्ती तक सम्मिलितहैं, नियन्ता के रूप में उपस्थित हैं।

जिस तरह आकाश हर जीव के भीतर तथा बाहरविद्यमान रहता है, उसी तरह आप परमात्मा रूप में सभी के हृदयों के भीतर तथा काल रूपमें उनके बाहर उपस्थित रहते हैं।

जिस तरह आकाश उसमें विद्यमान बादलों से आच्छादितनहीं हो सकता उसी तरह आप मिथ्या भौतिक उपाधि से कभी प्रच्छन्न नहीं होते।

एक वर्षक्षण, लव तथा निमेष जैसे लघु काल-खण्डों से बना है और वर्षो के प्रवाह से आप जलको सुखा कर तथा पुनः उसे वर्षा के रूप में जगत को प्रदान करके, उसका अकेले हीपालन-पोषण करते हैं।

"

यदु ह वाव विबुधर्षभ सवितरदस्तपत्थनुसवनमहर्‌अहराम्नायविधिनोपतिष्ठमानानामखिलदुरितवृजिन बीजावभर्जन भगवत:ः समभिधीमहि तपनमण्डलमू, ॥

६८॥

यत्‌--जो; उ ह वाव--निस्सन्देह; विबुध-ऋषभ--हे देवताओं के प्रधान; सवितः--हे सूर्य देव; अद:ः--वह; तपति--चमकता है; अनुसवनम्‌--दिन की हर संधि पर ( सूर्योदय, दोपहर तथा सूर्यास्त पर ); अहः अह:ः--प्रतिदिन; आम्नाय-विधिना--शिष्य-परम्परा से प्राप्त वैदिक मार्ग द्वारा; उपतिष्ठमानानामू-स्तुति करने वालों का; अखिल-दुरित--सारेपापकर्म; वृजिन--मिलने वाले कष्ट; बीज--तथा उसके मूल बीज; अवभर्जन--हे जलाने वाले; भगवत:--परम नियन्ताका; समभिधीमहि--मैं पूरे मनोयोग से ध्यान करता हूँ; तपन--हे तपने वाले; मण्डलम्‌ू--गोले पर।

हे चमकने वाले, हे शक्तिमान सूर्य देव, आप सारे देवताओं में प्रमुख हैं।

मैं आपके तेजमण्डल का मनोयोग से ध्यान करता हूँ क्योंकि जो कोई परम्परा से प्राप्त वैदिक विधि द्वाराप्रतिदिन आपकी तीन बार स्तुति करता है, उसके सारे पापकर्मो, सारे परवर्ती कष्टों तथाइच्छाके मूल बीज तक को आप जला देते हैं।

"

य इह वाव स्थिरचरनिकराणां निजनिकेतनानां मनइन्द्रियासु गणाननात्मन: स्वयमात्मान्तर्यामीप्रचोदयति ॥

६९॥

यः--जो; इह--इस जगत में; वाव--निस्सन्देह; स्थिर-चर-निकराणाम्‌--समस्त जड़ तथा चेतन जीवों के; निज-निकेतनानाम्‌--जो आपकी शरण पर निर्भर हैं; मनः-इन्द्रिय-असु-गणान्‌--मन, इन्द्रियाँ तथा प्राण; अनात्मन:--जो जड़पदार्थ हैं; स्वयम्‌-स्वयं; आत्म--उनके हृदयों में; अन्त:-यामी--अन्तर में निवास करने वाले प्रभु; प्रचोदयति--कर्म केलिए प्रेरित करता है।

आप उन समस्त जड़ तथा चेतन जीवों के हृदयों में अन्तर्यामी प्रभु के रूप में उपस्थितरहते हैं, जो पूरी तरह आपकी शरण पर आश्रित हैं।

निस्सन्देह आप उनके मनों, इन्द्रियों तथाप्राणों को कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।

"

य एवेम॑ं लोकमतिकरालवदनान्धकारसंज्ञाजगरग्रह गिलितं मृतकमिव विचेतनमवलोक्यानुकम्पया'परमकारुणिक ईक्षयैवोत्थाप्याहरहरनुसवनं श्रेयसि स्वधर्माख्यात्मावस्थाने प्रवर्तयति ॥

७०॥

यः--जो; एव--एकमात्र; इमम्‌--इस; लोकम्‌--जगत को; अति-कराल--अ त्यन्त भयावना; वदन--जिसका मुँह;अन्धकार-संज्ञा-- अंधकार कहलाने वाला; अजगर---अजग र द्वारा; ग्रह--पकड़ा हुआ; गिलितमू--तथा निगला हुआ;मृतकम्‌--मृत; इब--मानो; विचेतनम्‌-- अचेत; अवलोक्य--देख कर; अनुकम्पया--दयापूर्वक; परम-कारुणिक: --अत्यन्त करुणामय; ईक्षया--दृष्टि फेर कर; एब--निस्सन्देह; उत्थाप्य--उन्हें उठाकर; अह: अह:--दिन-प्रतदिनि; अनु-सवनमू्‌--दिन की तीन संधियों पर; श्रेयसि--परम लाभ में; स्व-धर्म-आख्य--आत्मा का उचित कर्म के रूप में विख्यात;आत्म-अवस्थाने--आध्यात्मिक जीवन के प्रति झुकाव में; प्रवर्तमति--लग जाता है |

यह संसार अंधकार रूपी अजगर के विकराल मुख में पड़ कर निगला जा चुका है औरइस तरह अचेत है, मानो मृत है।

किन्तु आप संसार के सोते हुए लोगों पर कृपापूर्ण दृष्टि फेरतेहुए, अपनी दृष्टि के उपहार से उन्हें जगाते हैं।

इस तरह आप सर्वाधिक करुणाकर हैं।

प्रतिदिन तीनों पवित्र संधियों पर आप पुण्यात्माओं को परम श्रेयस मार्ग में लगाते हैं और उन्हेंधार्मिक कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं जिससे वे आध्यात्मिक पद को प्राप्त होते हैं।

"

अवनिपतिरिवासाधूनां भयमुदीरयन्नटति परित आशापालैस्‌ तत्र तत्रकमलकोशाझलिभिरुपहताईण: ॥

७१॥

अवनि-पति:--राजा; इब--सहृश; असाधूनाम्‌--अपवित्र लोगों के; भयम्‌--भय; उदीरयन्‌--उत्पन्न करते हुए; अटति--इधर-उधर विचरण करता है; परित:--चारों ओर; आशा-पालै: --दिशाओं के अधिष्ठाता देवों द्वारा; तत्र तत्र--वहाँ वहाँ;कमल-कोश--कमल के फूल पकड़े हुए; अज्जलिभि:--अंजुलियों से; उपहत--भ भेंट की गई; अर्हण: --भेंटें |

आप पृथ्वी के राजा की ही तरह सर्वत्र विचरण करते हुए असाधुओं के बीच भयफैलाते हैं और दिशाओं के शक्तिमान देव हाथ जोड़ कर आपको कमल के फूल तथा अन्यआदरपूर्ण भेंटे प्रदान करते हैं।

"

अथ ह भगवंस्तव चरणनलिनयुगलं त्रिभुवनगुरुभिरभिवन्दितमहमयातयामयजुष्काम।

उपसरामीति ॥

७२॥

अथ--इस प्रकार; ह--निस्सन्देह; भगवन्‌--हे प्रभु; तब--तुम्हारा; चरण-नलिन-युगलम्‌--दो चरणकमल; त्रि-भुवन--तीन लोकों के; गुरुभि: --गुरुओं द्वारा; अभिवन्दितम्‌--सम्मानित; अहम्‌--मैं; अथात-याम--अन्य किसी से अज्ञात;यजु:-काम: --यजुर्मत्र पाने के लिए इच्छुक; उपसरामि--पूजा के साथ निकट आ रहा हूँ; इति--इस प्रकार।

इसलिए हे प्रभु, मैं आपकी स्तुति करते हुए आप के उन चरणों तक पहुँचना चाहता हूँजिनका सम्मान तीनों लोकों के आध्यात्मिक स्वामी करते हैं क्योंकि मैं आप से यजुर्वेद केउन मंत्रों को पाने के लिए आशान्वित हूँ जो अन्य किसी को ज्ञात नहीं हैं।

"

सूत उबाचएवं स्तुतः स भगवान्वाजिरूपधरो रवि: ।

यजुंष्ययातयामानि मुनयेउदात्प्रसादित: ॥

७३॥

सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; स्तुत:--स्तुति किये गये; सः--उसने; भगवान्‌--शक्तिशालीदेवता; वाजि-रूप--धघोड़े के रूप में; धर:-- धारण करके; रवि:--सूर्य देव; यजूंषि--यजुर्मत्र; अयात-यामानि-- अन्यकिसी मर्त्य प्राणी से कुछ सीखा नहीं गया; मुनये--मुनि को; अदात्‌-- प्रस्तुत किया; प्रसादित:--प्रसन्न होकर |

सूत गोस्वामी ने कहा : ऐसी स्तुति से प्रसन्न होकर शक्तिशाली सूर्य देव ने घोड़े का रूपधारण कर लिया और याज्ञवल्क्य मुनि को वे यजुर्मत्र प्रदान किये जो मानव समाज में पहलेअज्ञात थे।

"

यजुर्भिरकरोच्छाखा दश पश्ज शर्तैर्विभु: ।

जगुहुर्वाजसन्यस्ता: काण्वमाध्यन्दिनादय: ॥

७४॥

अजुर्भि:--यजुर्मत्रों से; अकरोत्‌--बनायी; शाखा:--शाखाएँ; दश--दस; पञ्ञ--तथा पाँच; शतैः --सैकड़ों में; विभु:--शक्तिमान; जगृहुः--उन्होंने स्वीकार किया; वाज-सन्य:--घोड़े के अयाल से उत्पन्न अत: वाजसनेयी नाम से विख्यात;ताः--उनको; काण्व-माध्यन्दिन-आदय: --काण्व तथा अध्यन्दिन आदि ऋषियों के शिष्य

यजुर्वेद के इन सैकड़ों मंत्रों से शक्तिशाली मुनि ने वैदिक वाडमय की पन्द्रह नवीनशाखाएँ बनाईं।

ये वाजसनेयि संहिता के नाम से विख्यात हुईं क्योंकि वे घोड़े के अयालों सेउत्पन्न हुई थीं और इन्हें काण्व, माध्यन्दिन तथा अन्य ऋषियों के अनुयायियों ने शिष्य-परम्परा में स्वीकार कर लिया।

"

जैमिने: सामगस्यासीत्सुमन्तुस्तनयो मुनि: ।

सुत्वांस्तु तत्सुतस्ताभ्यामेकैकां प्राह संहिताम्‌ ॥

७५॥

जैमिने:--जैमिनि के; साम-गस्य--सामवेद का गवैया; आसीत्‌ -- था; सुमन्तु:--सुमन्तु; तनय: --पुत्र; मुनि:--मुनि( जैमिनि ) के; सुत्वानू--सुत्वान; तु--तथा; तत्‌-सुतः--सुमन्तु का पुत्र; ताभ्याम्‌--उनमें से प्रत्येक को; एक-एकाम्‌--दो हिस्सों में से एक-एक नाम; प्राह--वह बोला; संहितामू--संकलन।

सामवेद के अधिकारी जैमिनि ऋषि के सुमन्तु नाम का पुत्र था और सुमन्तु का पुत्रसुत्वान था।

जैमिनि मुनि ने उनमें से हर एक को सामवेद संहिता के विभिन्न अंग सुनाये।

"

सुकर्मा चापि तच्छिष्य: सामवेदतरोम॑हान्‌ ।

सहस्त्रसंहिताभेदं चक्रे साम्नां ततो द्विज ॥

७६॥

हिरण्यनाभ: कौशल्य: पौष्यज्लिश्व सुकर्मण: ।

शिष्यौ जगृहतुश्चान्य आवन्त्यो ब्रह्मवित्तम: ॥

७७॥

सुकर्मा--सुकर्मा; च--तथा; अपि--निस्सन्देह; तत्‌-शिष्य:--जैमिनि शिष्य; साम-वेद-तरो: --सामवेद रूपी वृक्ष के;महानू--महान्‌ चिन्तक; सहस्त्र-संहिता--एक हजार संग्रहों का; भेदम्‌ू--एक भाग; चक्रे --बनाया; साम्नाम्‌--साम मंत्रोंका; तत:--और तब; द्विज--हे ब्राह्मण ( शौनक ); हिरण्यनाभ: कौशल्य:--कुशलपुत्र हिरण्यनाभ; पौष्यज्धि:--पौष्यञ्ञि;च--तथा; सुकर्मण: --सुकर्मा के; शिष्यौ--दो शिष्य; जगृहतु:--ले लिया; च--तथा; अन्य:--दूसरा; आवन्त्य:--आव्लन्त्य; ब्रह्मय-वित्‌-तम:--पर ब्रह्म के ज्ञान में पूर्णतया स्वरूपसिद्ध।

जैमिनि का दूसरा शिष्य सुकर्मा महान्‌ पंडित था।

उसने सामवेद रूपी विशाल वृक्ष कोएक हजार संहिताओं में बाँट दिया।

तब हे ब्राह्मण, सुकर्मा के तीन शिष्यों--कुशलपुत्रहिरण्यनाभ, पौष्यज्ञि तथा आध्यात्मिक साक्षात्कार में अग्रणी आवन्त्य--ने साम मंत्रों काभार सँभाला।

"

उदीच्या: सामगा: शिष्या आसन्पञ्नशतानि वै ।

पौष्यज्ज्यावन्त्ययो श्रापि तांश्व प्राच्यान्प्रचक्षते ॥

७८ ॥

उदीच्या:--उत्तर दिशा के सम्बद्ध; साम-गा:--सामवेद का गायक; शिष्या:--शिष्य; आसनू-- थे; पञ्ञ-शतानि--पाँचसौ; बै--निस्सन्देह; पौष्यज्जि-आवन्त्ययो: --पौष्यज्धि तथा आवन्त्य के; च--तथा; अपि--निस्सन्देह; तानू--उनको; च--भी; प्राच्यान्‌--पूर्व के रहने वाले; प्रचक्षते--कहलाते हैं |

पौष्यज्ञि तथा आवन्त्य के ५०० शिष्य सामवेद के उदीच्य गायक के नाम से प्रसिद्ध हुएऔर बाद में उनमें से कुछ तो प्राच्य गायक भी कहलाने लगे।

लौगाक्षि्माड्लि: कुल्य: कुशीदः कुक्षिरेव च ।

पौष्यज्लिसिष्या जगृहु: संहितास्ते शतं शतम्‌ ॥

७९॥

लौगाक्षि: माडलि: कुल्य:--लौगाक्षि, मांगलि तथा कुल्य; कुशीद: कुक्षि:--कुशीद तथा कुक्षि; एब--निस्सन्देह; च--भी; पौष्यज्धि-शिष्या:--पौष्यज्ञि के शिष्यों ने; जगृहु:--ले लिया; संहिता:--संग्रह; ते--वे; शतम्‌ शतम्‌--प्रत्येक नेएक-एक सौ।

पौष्यज्धि के पाँच अन्य शिष्यों, लौगाक्षि, मांगलि, कुल्य, कुशीद तथा कुक्षि में से हरएक को एक-एक सौ संहिताएँ मिलीं ।

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कृतो हिरण्यनाभस्य चतुर्विशति संहिता: ।

शिष्य ऊचे स्वशिष्येभ्य: शेषा आवन्त्य आत्मवान्‌ ॥

८०॥

कृत:--कृत; हिरण्यनाभस्थ--हिरण्यनाभ के; चतु:-विंशति--चौबीस; संहिता:--संग्रह; शिष्य: --शिष्य; ऊचे--बोला;स्व-शिष्येभ्य: -- अपने शिष्यों से; शेषा:--शेष ( संग्रह ); आवन्त्यः--आवन्त्य; आत्म-वान्‌ू--आत्मसंयमीहिरण्यनाभ के शिष्य कृत ने अपने शिष्यों से चौबीस संहिताएँ कहीं और शेष संहिताएँस्वरूपसिद्ध मुनि आवन्त्य द्वारा आगे चलाई गईं।

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