← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची

अध्याय दस: सृष्टि के विभाग

3.10विदुर उवाचअन्त्िते भगवति ब्रह्मा लोकपितामहः ।

प्रजा: ससर्ज कतिधादैहिकीर्मानसीर्विभु: ॥

१॥

विदुरः उवाच-- श्री विदुर ने कहा; अन्तर्हिते--अन्तर्धान होने पर; भगवति-- भगवान्‌ के; ब्रह्मा-- प्रथम उत्पन्न प्राणी ने; लोक-पितामह:--समस्त लोकवासियों के दादा; प्रजा: --सनन्‍्तानें; ससर्ज--उत्पन्न किया; कतिधा: --कितनी; दैहिकी:-- अपने शरीरसे; मानसी:--अपने मन से; विभु:--महान्‌ |

श्री विदुर ने कहा : हे महर्षि, कृपया मुझे बतायें कि लोकवासियों के पितामह ब्रह्मा नेअन्तर्धान हो जाने पर किस तरह से अपने शरीर तथा मन से जीवों के शरीरों को उत्पन्न किया ?

ये च मे भगवस्पृष्टास्त्वय्यर्था बहुवित्तम ।

तान्वदस्वानुपूर्व्येण छिन्धि न: सर्वसंशयान्‌ ॥

२॥

ये--वे सभी; च--भी; मे--मेरे द्वारा; भगवन्‌--हे शक्तिशाली; पृष्ठाः --पूछे गये; त्वयि--तुमसे; अर्था:--प्रयोजन; बहु-वित्‌ू-तम--हे परम विद्वान; तानू--उन सबों को; वदस्व--कृपा करके वर्णन करें; आनुपूर्व्येण --आदि से अन्त तक; छिन्धि--कृपयासमूल नष्ट कीजिये; न:--मेरे; सर्व--समस्त; संशयान्‌--सन्देहों को |

हे महान्‌ विद्वान, कृपा करके मेरे सारे संशयों का निवारण करें और मैंने आपसे जो कुछजिज्ञासा की है उसे आदि से अन्त तक मुझे बताएँ।

सूत उवाचएवं सञ्जोदितस्तेन क्षत्रा कौषारविर्मुनि: ।

प्रीतः प्रत्याह तान्प्रश्नान्हदिस्थानथ भार्गव ॥

३॥

सूतः उबाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; सझ्ञोदितः--प्रोत्साहित हुआ; तेन--उसके द्वारा; क्षत्रा--विदुर से;'कौषारवि:--कुषार का पुत्र; मुनि:--मुनि ने; प्रीत:--प्रसन्न होकर; प्रत्याह--उत्तर दिया; तानू--उन; प्रश्नानू-- प्रश्नों के; हृदि-स्थान्‌ू--अपने हृदय के भीतर से; अथ--इस प्रकार; भार्गव--हे भूगु पुत्र |

सूत गोस्वामी ने कहा : हे भृगुपुत्र, महर्षि मैत्रेय मुनि विदुर से इस तरह सुनकर अत्यधिकप्रोत्साहित हुए।

हर वस्तु उनके हृदय में थी, अतः वे प्रश्नों का एक एक करके उत्तर देने लगे।

मैत्रेय उवाचविरिश्ञोपि तथा चक्रे दिव्यं वर्षशतं तपः ।

आत्मन्यात्मानमावेश्य यथाह भगवानज: ॥

४॥

मैत्रेय: उवाच--महर्षि मैत्रेय ने कहा; विरिज्ञ:ः --ब्रह्मा ने; अपि-- भी; तथा--उस तरह से; चक्रे--सम्पन्न किया; दिव्यम्‌ू--स्वर्गिक; वर्ष-शतम्‌--एक सौ वर्ष; तपः--तपस्या; आत्मनि-- भगवान्‌ की; आत्मानम्‌--अपने आप; आवेश्य--संलग्न रहकर; यथा आह--जैसा कहा गया था; भगवान्‌-- भगवान्‌; अज:--अजन्मा |

परम दिद्वान मैत्रेय मुनि ने कहा : हे विदुर, इस तरह भगवान्‌ द्वारा दी गई सलाह के अनुसारब्रह्मा ने एक सौ दिव्य वर्षों तक अपने को तपस्या में संलग्न रखा और अपने को भगवान्‌ कीभक्ति में लगाये रखा।

तद्विलोक्याब्जसम्भूतो वायुना यदधिष्ठित: ।

पद्ममम्भश्न तत्कालकृतवीर्येण कम्पितम्‌ ॥

५॥

तत्‌ विलोक्य--उसके भीतर देखकर; अब्ज-सम्भूत:--कमल से उत्पन्न; वायुना--वायु द्वारा; यत्‌--जो; अधिष्टित:--जिस परयह स्थित था; पद्ममू--कमल; अम्भ:--जल; च--भी; तत्‌-काल-कृत--जो नित्य काल द्वारा प्रभावित था; वीर्येण--अपनीनिहित शक्ति से; कम्पितम्‌ू--काँपता |

तत्पश्चात्‌ ब्रह्म ने देखा कि वह कमल जिस पर बे स्थित थे तथा वह जल जिसमें कमल उगाथा प्रबल प्रचण्ड वायु के कारण काँप रहे हैं।

तपसा होधमानेन विद्यया चात्मसंस्थया ।

विवृद्धविज्ञानबलो न्यपाद्वायुं सहाम्भसा ॥

६॥

तपसा--तपस्या से; हि--निश्चय ही; एधमानेन--बढ़ते हुए; विद्यया--दिव्य ज्ञान द्वारा; च-- भी; आत्म--आत्मा; संस्थया--आत्मस्थ; विवृद्ध--परिपक्व; विज्ञान--व्यावहारिक ज्ञान; बल:--शक्ति; न्यपात्‌--पी लिया; वायुम्‌ू--वायु को; सहअम्भसा--जल के सहित।

दीर्घकालीन तपस्या तथा आत्म-साक्षात्कार के दिव्य ज्ञान ने ब्रह्मा को व्यावहारिक ज्ञान मेंपरिपक्व बना दिया था, अतः उन्होंने वायु को पूर्णतः जल के साथ पी लिया।

तद्विलोक्य वियद्व्यापि पुष्करं यदधिष्टितम्‌ ।

अनेन लोकाऋच्प्राग्लीनानन्‍कल्पितास्मीत्यचिन्तयत्‌ ॥

७॥

तत्‌ विलोक्य--उसे देखकर; वियत्‌-व्यापि--अतीब विस्तृत; पुष्करम्‌--कमल; यत्‌--जो; अधिष्टठितम्‌--स्थित था; अनेन--इससे; लोकान्‌--सारे लोक; प्राकु-लीनान्‌--पहले प्रलय में मग्न; कल्पिता अस्मि--मैं सृजन करूँगा; इति--इस प्रकार;अचिन्तयत्‌--उसने सोचा।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने देखा कि वह कमल, जिस पर वे आसीन थे, ब्रह्माण्ड भर में फैला हुआ हैऔर उन्होंने विचार किया कि उन समस्त लोकों को किस तरह उत्पन्न किया जाय जो इसके पूर्वउसी कमल में लीन थे।

पद्मकोशं तदाविश्य भगवत्कर्मचोदितः ।

एक॑ व्यभाड्क्षीदुरुधा त्रिधा भाव्यं द्विसप्तथा ॥

८॥

पदा-कोशम्‌--कमल-चक्र में; तदा--तब; आविश्य--प्रवेश करके; भगवत्‌-- भगवान्‌ द्वारा; कर्म--कार्यकलाप में;चोदित:--प्रोत्साहित किया गया; एकम्‌--एक; व्यभाड्क्षीत्‌--विभाजित कर दिया; उरुधा--महान्‌ खण्ड; त्रिधा--तीनविभाग; भाव्यम्‌--आगे सृजन करने में समर्थ; द्वि-सप्तधा--चौदह विभाग ।

इस तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की सेवा में लगे ब्रह्माजी कमल के कोश में प्रविष्ट हुए औरचूँकि वह सारे ब्रह्माण्ड में फैला हुआ था, अतः उन्होंने इसे ब्रह्माण्ड के तीन विभागों में औरउसके बाद चौदह विभागों में बाँट दिया।

एतावाझ्जीवलोकस्य संस्थाभेद: समाहतः ।

धर्मस्य हानिमित्तस्थ विपाकः परमेष्ठयसौ ॥

९॥

एतावान्‌ू--यहाँ तक; जीव-लोकस्य--जीवों द्वारा निवसित लोकों के ; संस्था-भेदः--निवास स्थान की विभिन्न स्थितियाँ;समाहतः--पूरी तरह सम्पन्न; धर्मस्थ--धर्म का; हि--निश्चय ही; अनिमित्तस्य--अहैतुकता का; विपाक:--परिपक्व अवस्था;परमेष्ठी --ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च व्यक्ति; असौ--उस |

परिपक्व दिव्य ज्ञान में भगवान्‌ की अहैतुकी भक्ति के कारण ब्रह्माजी ब्रह्माण्ड में सर्वोच्चपुरुष हैं।

इसीलिए उन्होंने विभिन्न प्रकार के जीवों के निवास स्थान के लिए चौदह लोकों कासृजन किया।

विदुर उवाचयथात्थ बहुरूपस्य हरेरद्धुतकर्मण: ।

कालाख्यं लक्षणं ब्रह्मन्यथा वर्णय नः प्रभो ॥

१०॥

विदुर: उवाच--विदुर ने कहा; यथा--जिस तरह; आत्थ--आपने कहा है; बहु-रूपस्य--विभिन्न रूपों वाले; हरेः-- भगवान्‌के; अद्भुत--विचित्र; कर्मण:-- अभिनेता का; काल--समय; आख्यम्‌--नामक; लक्षणम्‌--लक्षण; ब्रह्मनू--हे विद्वानब्राह्मण; यथा--यह जैसा है; वर्णय--कृपया वर्णन करें; नः--हमसे; प्रभो--हे प्रभु ॥

विदुर ने मैत्रेय से पूछा : हे प्रभु, हे परम विद्वान ऋषि, कृपा करके नित्यकाल का वर्णन करेंजो अद्भुत अभिनेता परमेश्वर का दूसरा रूप है।

नित्य काल के क्या लक्षण हैं ? कृपा करकेहमसे विस्तार से कहें।

मैत्रेय उवाचगुणव्यतिकराकारो निर्विशेषोप्रतिष्ठित: ।

पुरुषस्तदुपादानमात्मानं लीलयासूजत्‌ ॥

११॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; गुण-व्यतिकर-- प्रकृति के गुणों की अन्योन्य क्रियाओं का; आकार: --स््रोत; निर्विशेष:--विविधता रहित; अप्रतिष्ठित:--असीम; पुरुष: --परम पुरुष का; तत्‌--वह; उपादानम्‌--निमित्त; आत्मानम्‌-- भौतिक सृष्टि;लीलया--लीलाओं द्वारा; असृजत्‌--उत्पन्न किया

मैत्रेय ने कहा : नित्यकाल ही प्रकृति के तीनों गुणों की अन्योन्य क्रियाओं का आदि स्त्रोतहै।

यह अपरिवर्तनशील तथा सीमारहित है और भौतिक सृजन की लीलाओं में यह भगवान्‌ केनिमित्त रूप में कार्य करता है।

विश्व वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया ।

ईश्वेरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना ॥

१२॥

विश्वम्‌-- भौतिक चक्र; बै--निश्चय ही; ब्रह्म--ब्रह्म; तत्‌-मात्रमू--उसी तरह का; संस्थितम्‌--स्थित; विष्णु-मायया--विष्णुकी शक्ति से; ई श्वरण -- भगवान्‌ द्वारा; परिच्छिन्नम्‌ू--पृथक्‌ की गई; कालेन--नित्य काल द्वारा; अव्यक्त--अप्रकट; मूर्तिना--ऐसे स्वरूप द्वारा

यह विराट जगत भौतिक शक्ति के रूप में अप्रकट तथा भगवान्‌ के निर्विशेष स्वरूप कालद्वारा भगवान्‌ से विलग किया हुआ है।

यह विष्णु की उसी भौतिक शक्ति के प्रभाव के अधीनभगवान्‌ की वस्तुगत अभिव्यक्ति के रूप में स्थित है।

यथेदानीं तथाग्रे च पश्चादप्येतदीहशम्‌ ॥

१३॥

यथा--जिस तरह है; इृदानीम--इस समय; तथा--उसी तरह; अग्रे--प्रारम्भ में; च--तथा; पश्चात्‌-- अन्त में; अपि-- भी; एतत्‌ईहशम्‌--वैसा ही रहता है |

यह विराट जगत जैसा अब है वैसा ही रहता है।

यह भूतकाल में भी ऐसा ही था और भविष्यमें इसी तरह रहेगा।

सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतस्तु यः ।

कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविध: प्रतिसड्क्रम: ॥

१४॥

सर्ग:--सृष्टि; नव-विध: --नौ भिन्न-भिन्न प्रकार की; तस्य--इसका; प्राकृत:-- भौतिक; वैकृत:--प्रकृति के गुणों द्वारा; तु--लेकिन; यः--जो; काल--नित्यकाल; द्रव्य--पदार्थ; गुणैः --गुणों के द्वारा; अस्थ--इसके; त्रि-विध: --तीन प्रकार;प्रतिसड्क्रम:--संहार |

उस एक सृष्टि के अतिरिक्त जो गुणों की अन्योन्य क्रियाओं के फलस्वरूप स्वाभाविक रूप से घटित होती है नौ प्रकार की अन्य सृष्टियाँ भी हैं।

नित्य काल, भौतिक तत्त्वों तथा मनुष्य केकार्य के गुण के कारण प्रलय तीन प्रकार का है।

आद्मस्तु महतः सर्गो गुणवैषम्यमात्मनः ।

द्वितीयस्त्वहमो यत्र द्रव्यज्ञानक्रियोदयः ॥

१५॥

आद्य:-प्रथम; तु--लेकिन; महत:-- भगवान्‌ से पूर्ण उद्भास की; सर्ग:--सृष्टि; गुण-वैषम्यम्‌-- भौतिक गुणों की अन्योन्यक्रिया; आत्मन:--ब्रह्म का; द्वितीय:--दूसरी; तु--लेकिन; अहम: --मिथ्या अहंकार; यत्र--जिसमें; द्रव्य-- भौतिक घटक;ज्ञान--भौतिक ज्ञान; क्रिया-उदय:--कार्य की जागृति

नौ सृष्टरियों में से पहली सृष्टि महत्‌ तत्त्वसृष्टि अर्थात्‌ भौतिक घटकों की समग्रता है, जिसमेंपरमेश्वर की उपस्थिति के कारण गुणों में परस्पर क्रिया होती है।

द्वितीय सृष्टि में मिथ्या अहंकारउत्पन्न होता है, जिसमें से भौतिक घटक, भौतिक ज्ञान तथा भौतिक कार्यकलाप प्रकट होते हैं।

भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रो द्रव्यशक्तिमान्‌ ।

चतुर्थ ऐन्द्रियः सर्गो यस्तु ज्ञानक्रियात्मक: ॥

१६॥

भूत-सर्ग:--पदार्थ की उत्पत्ति; तृतीय:--तीसरी; तु--लेकिन; ततू-मात्र:--इन्द्रियविषय; द्रव्य--तत्वों के; शक्तिमान्‌--स्त्रष्टा;चतुर्थ: --चौथा; ऐन्द्रियः--इन्द्रियों के विषय में; सर्ग:--सृष्टि; यः--जो; तु--लेकिन; ज्ञान--ज्ञान-अर्जन; क्रिया--कार्य करनेकी; आत्मक:--मूलतः ।

इन्द्रिय विषयों का सृजन तृतीय सृष्टि में होता है और इनसे तत्त्व उत्पन्न होते हैं।

चौथी सृष्टि हैज्ञान तथा कार्य-क्षमता ( क्रियाशक्ति ) का सृजन।

वैकारिको देवसर्ग: पञ्ञमो यन्मयं मनः ।

षष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभोः ॥

१७॥

वैकारिक:--सतोगुण की अन्योन्य क्रिया; देव--देवता या अधिष्ठाता देव; सर्ग:--सृष्टि; पश्ञमः--पाँचवीं; यत्‌ू-- जो; मयम्‌--सम्पूर्णता; मनः--मन; षष्ठ:--छठी; तु--लेकिन; तमस:--तमोगुण की; सर्ग:--सृष्टि; यः--जो; तु--अनुपूरक; अबुद्धि-कृतः--मूर्ख बनाई गई; प्रभो:--स्वामी की |

पाँचवीं सृष्टि सतोगुण की अन्योन्य क्रिया द्वारा बने अधिष्ठाता देवों की है, जिसका सारसमाहार मन है।

छठी सृष्टि जीव के अज्ञानतापूर्ण अंधकार की है, जिससे स्वामी मूर्ख की तरहकार्य करता है।

घडिमे प्राकृताः सर्गा वैकृतानपि मे श्रुणु ।

रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः ॥

१८॥

घट्‌ू--छठी; इमे--ये सब; प्राकृताः:--भौतिक शक्ति की; सर्गाः--सृष्टियाँ; वैकृतान्‌--ब्रह्मा द्वारा गौण सृष्टियाँ; अपि-- भी;मे--मुझसे; श्रुणु--सुनो; रज:-भाज:--रजोगुण के अवतार ( ब्रह्म ) का; भगवतः--अत्यन्त शक्तिशाली की; लीला--लीला;इयम्‌--यह; हरि-- भगवान्‌; मेधस:--ऐसे मस्तिष्क वाले का

उपर्युक्त समस्त सृष्टियाँ भगवान्‌ की बहिरंगा शक्ति की प्राकृतिक सृष्टियाँ हैं।

अब मुझसे उनब्रह्माजी द्वारा की गई सृष्टियों के विषय में सुनो जो रजोगुण के अवतार हैं और सृष्टि के मामले मेंजिनका मस्तिष्क भगवान्‌ जैसा ही है।

सप्तमो मुख्यसर्गस्तु षड्िवधस्तस्थुषां च यः ।

वनस्पत्योषधिलतात्वक्सारा वीरुधो द्रुमा: ॥

१९॥

सप्तम:ः--सातवीं; मुख्य-- प्रधान; सर्ग: --सृष्टि; तु--निस्सन्देह; षघटू-विध:--छ: प्रकार की; तस्थुषाम्‌ू--न चलने वालों की;च--भी; यः--वे; वनस्पति--बिना फूल वाले फल वृक्ष; ओषधि--पेड़-पौधे जो फल के पकने तक जीवित रहते हैं; लता--लताएँ; त्वक्साराः:--नलीदार पौधे; वीरुध:--बिना आधार वाली लताएँ; द्रुमाः--फलफूल वाले वृक्ष

सातवीं सृष्टि अचर प्राणियों की है, जो छः प्रकार के हैं: फूलरहित फलवाले वृक्ष, फल पकने तक जीवित रहने वाले पेड़-पौधे, लताएं, नलीदार पौधे; बिना आधार वाली लताएँ तथा'फलफूल वाले वृक्ष।

उत्स्नोतसस्तमःप्राया अन्तःस्पर्शा विशेषिण: ॥

२०॥

उत्स्रोतस:--ऊर्ध्वगामी, नीचे से ऊपर की ओर; तम:-प्राया:--प्रायः अचेत; अन्तः-स्पर्शा:-- भीतर कुछ कुछ अनुभव करतेहुए; विशेषिण:--नाना प्रकार के स्वरूपों से युक्त |

सारे अचर पेड़-पौधे ऊपर की ओर बढ़ते हैं।

वे अचेतप्राय होते हैं, किन्तु भीतर ही भीतरउनमें पीड़ा की अनुभूति होती है।

वे नाना प्रकारों में प्रकट होते हैं।

तिरश्नामष्टम: सर्ग: सोउष्टाविंशद्विधो मतः ।

अविदो भूरितमसो प्राणज्ञा हृद्यवेदिन: ॥

२१॥

तिरश्वामू--निम्न पशुओं की जातियाँ; अष्टम:--आठवीं ; सर्ग:--सृष्टि; सः--वे हैं; अष्टाविंशत्‌-- अट्टाईस; विध:--प्रकार;मतः--माने हुए; अविदः--कल के ज्ञान से रहित; भूरि--अत्यधिक; तमस:--अज्ञानी; प्राण-ज्ञा:--गन्ध से इच्छित वस्तुओं कोजानने वाले; हृदि अवेदिन:--हृदय में बहुत कम स्मरण रखने वाले |

आठवीं सृष्टि निम्नतर जीवयोनियों की है और उनकी अट्ठाईस विभिन्न जातियाँ हैं।

वे सभीअत्यधिक मूर्ख तथा अज्ञानी होती हैं।

वे गन्ध से अपनी इच्छित वस्तुएँ जान पाती हैं, किन्तु हृदयमें कुछ भी स्मरण रखने में अशक्य होती हैं।

गौरजो महिषः कृष्ण: सूकरो गवयो रुरु: ।

द्विशफा: पशवश्चेमे अविरुष्टश्न सत्तम ॥

२२॥

गौः--गाय; अजः--बकरी; महिष:-- भेंस; कृष्ण: --एक प्रकार का बारहसिंगा; सूकर:--सुअर; गवयः--पशु की एक जाति( नीलगाय ); रुरु:--हिरन; द्वि-शफा:--दो खुरों वाले; पशव:--पशु; च-- भी; इमे--ये सभी; अवि:--मेंढा; उ्ट:--ऊँट;च--तथा; सत्तम-हे शुद्धतम |

हे शुद्धतम विदुर, निम्नतर पशुओं में गाय, बकरी, भेंस, काला बारहसिंगा, सूकर,नीलगाय, हिरन, मेंढा तथा ऊँट ये सब दो खुरों वाले हैं।

खरोश्वो श्वतरो गौर: शरभश्नमरी तथा ।

एते चैकशफा: क्षत्तः श्रुणु पञ्ननखान्पशून्‌ ॥

२३॥

खरः--गधा; अश्वः--घोड़ा; अश्वतर: --खच्चर; गौर: --सफेद हिरन; शरभ: -- भैंसा; चमरी -- चँवरी गाय; तथा--इस प्रकार;एते--ये सभी; च--तथा; एक--केवल एक; शफा:--खुर; क्षत्त:--हे विदुर; श्रेणु--सुनो; पञ्ञ-- पाँच; नखान्‌--नाखूनवाले; पशून्‌--पशुओं के बारे में |

घोड़ा, खच्चर, गधा, गौर, शरभ-भेंसा तथा चँवरी गाय इन सबों में केवल एक खुर होताहै।

अब मुझसे उन पशुओं के बारे में सुनो जिनके पाँच नाखून होते हैं।

श्वा सृगालो वृको व्याप्रो मार्जार: शशशल्लकौ ।

सिंहः कपिर्गजः कूर्मो गोधा च मकरादय: ॥

२४॥

श्रा--कुत्ता; सृगाल:--सियार; वृकः--लोमड़ी; व्याप्र:--बाघ; मार्जार: --बिल्ली; शश--खरगोश; शललकौ--सजारू( स्थाही, जिसके शरीर पर काँटे होते हैं )।

सिंहः--शेर; कपि:--बन्दर; गज:--हाथी; कूर्म:--कछुआ; गोधा--गोसाप( गोह ); च-- भी; मकर-आदय: --मगर इत्यादि |

कुत्ता, सियार, बाघ, लोमड़ी, बिल्ली, खरगोश, सजारु ( स्याही ), सिंह, बन्दर, हाथी,कछुवा, मगर, गोसाप ( गोह ) इत्यादि के पंजों में पाँच नाखून होते हैं।

वे पञ्ननख अर्थात्‌ पाँचनाखूनों वाले पशु कहलाते हैं।

कड्डगृश्रबकश्येनभासभल्लूकबर्हिण: ।

हंससारसचक्राहकाकोलूकादयः खगा: ॥

२५॥

कड्ढू--बगुला; गृश्च--गीध; बक--बगुला; श्येन--बाज; भास-- भास; भल्लूक-- भल्लूक ( भालू ); ब्हिण: --मोर; हंस--हंस; सारस--सारस; चअक्राह्म-- चक्रवाक, ( चकई चकवा ); काक--कौवा; उलूक- उल्लू; आदय: --इत्यादि; खगा:--पक्षी ।

कंक, गीध, बगुला, बाज, भास, भल्लूक, मोर, हंस, सारस, चक्रवाक, कौवा, उल्लूइत्यादि पक्षी कहलाते हैं।

अर्वाक्स्नोतस्तु नवमः क्षत्तेकविधो नृणाम्‌ ।

रजोधिका: कर्मपरा दुःखे च सुखमानिन: ॥

२६॥

अर्वाक्‌--नीचे की ओर; स्रोत:--भोजन की नली; तु--लेकिन; नवमः--नौवीं ; क्षत्त:--हे विदुर; एक-विध:--एक जाति;नृणाम्‌--मनुष्यों की; रज:--रजोगुण; अधिका: --अत्यन्त प्रधान; कर्म-परा:--कर्म में रुचि रखने वाले; दुःखे--दुख में; च--लेकिन; सुख--सुख; मानिन:--सोचने वाले |

मनुष्यों की सृष्टि क्रमानुसार नौवीं है।

यही केवल एक ही योनि ( जाति ) ऐसी है और अपनाआहार उदर में संचित करते हैं।

मानव जाति में रजोगुण की प्रधानता होती है।

मनुष्यगदुखीजीवन में भी सदैव व्यस्त रहते हैं, किन्तु वे अपने को सभी प्रकार से सुखी समझते हैं।

वैकृतास्त्रय एवते देवसर्गश्व सत्तम ।

वैकारिकस्तु यः प्रोक्त: कौमारस्तूभयात्मक: ॥

२७॥

वैकृताः--ब्रह्मा की सृष्टियाँ; त्रयः--तीन प्रकार की; एव--निश्चय ही; एते--ये सभी; देव-सर्ग:--देवताओं का प्राकट्य; च--भी; सत्तम--हे उत्तम विदुर; वैकारिक:--प्रकृति द्वारा देवताओं की सृष्टि; तु--लेकिन; यः--जो; प्रोक्त:--पहले वर्णित;'कौमारः--चारों कुमार; तु--लेकिन; उभय-आत्मकः--दोनों प्रकार ( यथा वैकृत तथा प्राकृत )

हे श्रेष्ठ विदुर, ये अन्तिम तीन सृष्टियाँ तथा देवताओं की सृष्टि ( दसवीं सृष्टि ) वैकृत सृष्टियाँहैं, जो पूर्ववर्णित प्राकृत ( प्राकृतिक ) सृष्टियों से भिन्न हैं।

कुमारों का प्राकट्य दोनों ही सृष्टियाँहैं।

देवसर्गश्राष्टविधो विबुधा: पितरोसुरा: ।

गन्धर्वाप्सरस: सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणा: ॥

२८॥

भूतप्रेतपिशाचाश्च विद्याश्रा: किन्नरादय: ।

दशते विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वस॒क्कता: ॥

२९॥

देव-सर्ग:--देवताओं की सृष्टि; च--भी; अष्ट-विध:-- आठ प्रकार की; विबुधा: --देवता; पितर:--पूर्वज; असुरा: --असुरगण; गन्धर्व--उच्चलोक के दक्ष कलाकार; अप्सरस:--देवदूत; सिद्धा:--योगशक्तियों में सिद्ध व्यक्ति; यक्ष--सर्वोत्कृष्टरक्षक; रक्षांसि--राक्षस; चारणा:--देवलोक के गवैये; भूत--जिन्न, भूत; प्रेत--बुरी आत्माएँ, प्रेत; पिशाचा:-- अनुगामी भूत;च--भी; विद्याक्रा:--विद्याधर नामक दैवी निवासी; किन्नर--अतिमानव; आदय:--इत्यादि; दश एते--ये दस ( सृष्टियाँ );विदुर--हे विदुर; आख्याता:--वर्णित; सर्गा:--सृष्टियाँ; ते--तुमसे; विश्व-सृक्‌--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा ( ब्रह्मा ) द्वारा; कृता:--सम्पन्नदेवताओं की सृष्टि आठ प्रकार की है--( १) देवता (२) पितरगण (३) असुरगण(४) गन्धर्व तथा अप्सराएँ (५) यक्ष तथा राक्षस ( ६ ) सिद्ध, चारण तथा विद्याधर ( ७ ) भूत,प्रेत तथा पिशाच (८ ) किन्नर--अतिमानवीय प्राणी, देवलोक के गायक इत्यादि।

ये सब ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न हैं।

अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान्मन्वन्तराणि चएवं रजःप्लुत: स्त्रष्टा कल्पादिष्वात्म भूहरिः ।

सृजत्यमोघसड्डल्प आत्मैवात्मानमात्मना ॥

३०॥

अतः--यहाँ; परम्‌--बाद में; प्रवक्ष्यामि--बतलाऊँगा; वंशानू--वंशज; मन्वन्तराणि--मनुओं के विभिन्न अवतरण; च--तथा;एवम्‌--इस प्रकार; रज:-प्लुत:--रजोगुण से संतृप्त; स्त्रष्टा--निर्माता; कल्प-आदिषु--विभिन्न कल्पों में; आत्म-भू: --स्वयंअवतार; हरिः-- भगवान्‌; सृजति--उत्पन्न करता है; अमोघ--बिना चूक के; सड्डूल्प:--हृढ़निश्चय; आत्मा एव--वे स्वयं;आत्मानम्‌--स्वयं; आत्मना--अपनी ही शक्ति से |

अब मैं मनुओं के वंशजों का वर्णन करूँगा।

स्त्रष्टा ब्रह्मा जो कि भगवान्‌ के रजोगुणीअवतार हैं भगवान्‌ की शक्ति के बल से प्रत्येक कल्प में अचूक इच्छाओं सहित विश्व प्रपंच कीसृष्टि करते हैं।

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