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अध्याय उनतीसवां: भगवान कपिल द्वारा भक्ति सेवा की व्याख्या
3.29देवहूतिरुवाचलक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च ।
स्वरूपं लक्ष्यतेडमीषां येन तत्पारमार्थिकम् ॥
१॥
यथा साड्ख्येषु कथित यन्मूलं तत्प्रचक्षते ।
भक्तियोगस्य मे मार्ग ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥
२॥
देवहूति: उबाच--देवहूति ने कहा; लक्षणम्--लक्षण; महत्-आदीनाम्--महत्-तत्त्व आदि का; प्रकृतेः--प्रकृति का;पुरुषस्य--आत्मा का; च--तथा; स्वरूपम्ू--स्वभाव; लक्ष्यते--वर्णन किया जाता है; अमीषाम्--उनका; येन--जिससे; तत्-पारम-अर्थिकम्--उनकी असली प्रकृति; यथा--जिस प्रकार; साड्ख्येषु--सांख्य दर्शन में; कथितम्--व्याख्यायित; यत्ू--जिसका; मूलमू--चरम परिणति; तत्--वह; प्रचक्षते--कहते हैं; भक्ति-योगस्य-- भक्ति का;मे--मुझको; मार्गम्ू--पथ; ब्रूहि--कहिये; विस्तरश: --विस्तार से; प्रभो--हे भगवान् कपिल ।
देवहूति ने जिज्ञासा की : हे प्रभु, आप सांख्य दर्शन के अनुसार सम्पूर्ण प्रकृति तथाआत्मा के लक्षणों का अत्यन्त वैज्ञानिक रीति से पहले ही वर्णन कर चुके हैं।
अब मैंआपसे प्रार्थना करूँगी कि आप भक्ति के मार्ग की व्याख्या करें, जो समस्त दार्शनिकप्रणालियों की चरम परिणति है।
विरागो येन पुरुषो भगवन्सर्वतो भवेत् ।
आचक्ष्व जीवलोकस्य विविधा मम संसृती: ॥
३॥
विराग:--विरक्त; येन--जिससे; पुरुष:--व्यक्ति; भगवन्--हे प्रभु; सर्वतः--पूर्णत:; भवेत्--हो सके; आचशक्ष्व--कृपया वर्णन करें; जीव-लोकस्य--जनसामान्य के लिए; विविधा: -- अनेक; मम--मेरा; संसृती:--जन्म-मरण काचक्र ।
देवहूति ने आगे कहा : हे प्रभु, कृपया मेरे तथा जन-साधारण दोनों के लिए जन्म-मरण की निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन करें, जिससे ऐसी विपदाओंको सुनकर हम इस भौतिक जगत के कार्यो से विरक्त हो सकें।
कालस्ये श्वररूपस्य परेषां च परस्य ते ।
स्वरूपं बत कुर्वन्ति यद्धेतो: कुशलं जना: ॥
४॥
कालस्य--काल का; ईश्वर-रूपस्थ-- भगवान् का प्रतिनिधि; परेषाम्--अन्य सबों का च--तथा; परस्य-- मुख्य;ते--तुम्हारा; स्वरूपम्-- प्रकृति; बत--ओह; कुर्वन्ति--करते हैं; यत्-हेतो:--जिसके प्रभाव से; कुशलम्--पुण्यकर्म; जना:--सामान्य जन
कृपया काल का भी वर्णन करें जो आपके स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है औरजिसके प्रभाव से सामान्य जन पुण्यकर्म करने में प्रवृत्त होते हैं।
लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुष-श्विरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये ।
श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धियात्वमाविरासी: किल योगभास्कर: ॥
५॥
लोकस्य--जीवों का; मिथ्या-अभिमते: --अहंकार से मोहग्रस्त; अचक्षुष:--अंधा; चिरम्--दीर्घकाल तक;प्रसुप्तस्थ--सोते हुए का; तमसि--अंधकार में; अनाश्रये--आश्रयविहीन; श्रान्तस्य--थके हुए के; कर्मसु--कर्मो केप्रति; अनुविद्धया--संलग्न, अनुरक्त; धिया--बुद्धि से; त्वम्--तुम; आविरासी:--प्रकट हुए हो; किल--निस्सन्देह;योग--योग प्रणाली का; भास्कर: --सूर्य |
हे भगवान्, आप सूर्य के समान हैं, क्योंकि आप जीवों के बद्धजीवन के अन्धकारको प्रकाशित करने वाले हैं।
उनके ज्ञान-चक्षु बन्द होने से वे आपके आश्रय के बिनाउस अन्धकार में लगातार सुप्त पड़े हुए हैं, फलत: वे अपने कर्मों के कार्य-कारण प्रभावसे झूठे ही व्यस्त रहते हैं और अत्यन्त थके हुए प्रतीत होते हैं।
मैत्रेय उबाचइति मातुर्वच: एलश्न्णं प्रतिनन््द्य महामुनि: ।
आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दित: ॥
६॥
मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; मातु:--उनकी माता के; वच:--शब्द; एलक्ष्णम्-- भद्र;प्रतिनन्द्य--स्वागत करते हुए; महा-मुनिः--ऋषि कपिल; आबभाषे--बोले; कुरु- श्रेष्ठ--हे कुरुओं में श्रेष्ठ, विदुर;प्रीत:ः--प्रसन्न; तामू--उससे; करुणा--दया से; अर्दितः --द्रवी भूत
श्री मैत्रेय ने कहा : हे कुरु श्रेष्ठ अपनी महिमामयी माता के शब्दों से प्रसन्न होकरतथा अत्यधिक अनुकम्पा से द्रवित होकर महामुनि कपिल इस प्रकार बोले।
श्रीभगवानुवाचभक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते ।
स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते ॥
७॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने उत्तर दिया; भक्ति-योग:--भक्ति; बहु-विध:--अनेक प्रकार के; मार्गैं:--मार्गों से;भामिनि--हे उत्तम स्त्री; भाव्यते-- प्रकट है; स्वभाव--प्रकृति; गुण--गुण; मार्गेण--व्यवहार के अनुसार; पुंसामू--साधकों के; भाव:--प्राकट्य; विभिद्यते--विभाजित हैभगवान् कपिल ने उत्तर दिया : हे भामिनि, साधक के विभिन्न गुणों के अनुसारभक्ति के अनेक मार्ग हैं।
अभिसन्धाय यो हिंसां दम्भं मात्सर्यमेव वा ।
संरम्भी भिन्नव्ग्भावं मयि कुर्यात्स तामस: ॥
८॥
अभिसन्धाय--दृष्टि में रखकर; य:--जो; हिंसाम्--हिंसा को; दम्भम्ू-गर्व को; मात्सर्यम्ू--ईर्ष्या को; एब--निस्सन्देह; वा--अथवा; संरम्भी--क्रोधी; भिन्न--पृथक्; हक्ू--जिसकी दृष्टि; भावम्-- भक्ति; मयि--मुझमें;कुर्यात्ू--करे; सः--वह; तामस: --तमोगुणी
ईर्ष्यालु, अहंकारी, हिंस्त्र तथा क्रोधी और पृथकतावादी व्यक्ति द्वारा की गई भक्तितमोगुण प्रधान मानी जाती है।
विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव वा ।
अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भाव: स राजसः ॥
९॥
विषयान्--विषय, भोग को; अभिसन्धाय--लक्ष्य करके; यशः--ख्याति; ऐश्वर्यम्--ऐश्वर्य; एब--निस्सन्देह; वा--अथवा; अर्चा-आदौ--विग्रह-पूजन आदि में; अर्चयेत्ू--पूजा करे; यः--जो; मामू--मुझको; पृथक्- भाव: --भेदभाव रखने वाला, पृथकतावादी; सः--वह; राजस:--रजोगुण में |
मन्दिर में एक पृथकतावादी द्वारा भौतिक भोग, यश तथा ऐश्वर्य के प्रयोजन से कीजानेवाली विग्रह-पूजा रजोगुणी भक्ति है।
कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन्वा तदर्पणम् ।
यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भाव: स सात्त्विक: ॥
१०॥
कर्म--सकाम कर्म; निर्हारमू--अपने आपको मुक्त करने के; उद्दिश्य--उद्देश्य से; परस्मिन्ू-- भगवान् को; वा--अथवा; ततू-अर्पणमू--कर्मफल का अर्पण; यजेत्--पूजा करे; यष्टव्यम्-पूजे जाने के लिए; इति--इस प्रकार;वा--अथवा; पृथक्-भाव:--पृथकतावादी; सः--वह; सात्त्विक: --सतोगुण में स्थित
जब भक्त भगवान् की पूजा करता है और अपने कर्मों की त्रुटि से मुक्त होने के लिएअपने कर्मफलों को अर्पित करता है, तो उसकी भक्ति सात्त्विक होती है।
मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये ।
मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गझ्जम्भसो म्बुधौ ॥
११॥
लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहतम् ।
अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥
१२॥
मत्--मेरा; गुण--गुण; श्रुति--सुनकर; मात्रेण--केवल; मयि--मेरे प्रति; सर्व-गुहा-आशये--प्रत्येक के हृदय मेंरहते हुए; मन:ः-गति:--हृदय का मार्ग; अविच्छिन्ना--समुद्र की ओर; यथा--जिस तरह; गड्जा--गंगा के; अम्भस:--जल का; अम्बुधौ--समुद्र की ओर; लक्षणम्--प्राकट्य; भक्ति-योगस्थ--भक्ति का; निर्गुणस्थ--अमिश्रित; हि--निस्सन्देह; उदाहतम्-- प्रकट; अहैतुकी --बिना कारण के; अव्यवहिता--अभिन्न; या--जो; भक्ति:--भक्ति; पुरुष-उत्तमे-- भगवान् के प्रति
जब मनुष्य का मन प्रत्येक व्यक्ति के हृदय के भीतर वास करने वाले भगवान् केदिव्य नाम तथा गुणों के श्रवण की ओर तुरन्त आकृष्ट हो जाता है, तो निर्गुण भक्ति काप्राकट्य होता है।
जिस प्रकार गंगा का पानी स्वभावतः समुद्र की ओर बहता है, उसीप्रकार ऐसा भक्तिमय आह्याद बिना रोक-टोक के परमेश्वर की ओर प्रवाहित होता है।
सालोक्यसाप्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत ।
दीयमानं न गृह्नन्ति विना मत्सेवनं जना: ॥
१३॥
सालोक्य--समान लोक में निवास; साप्टि--समान ऐश्वर्य वाला; सामीप्य--व्यक्तिगत पार्षद होना; सारूप्य--समानशारीरिक रूप वाला; एकत्वमू--तादात्म्य; अपि-- भी; उत--यहाँ तक कि; दीयमानम्-- प्रदान किये जाने पर; न--नहीं; गृहन्ति--स्वीकार करते हैं; विना--रहित; मत्--मेरी; सेवनम्-- भक्ति; जना: --शुद्ध भक्त
शुद्ध भक्त सालोक्य, साष्टि, सामीप्य, सारूप्य या एकत्व में से किसी प्रकार कामोक्ष स्वीकार नहीं करते, भले ही ये भगवान् द्वारा क्यों न दिये जा रहे हों।
स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहत: ।
येनातिक्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते ॥
१४॥
सः--यह; एव--निस्सन्देह; भक्ति-योग-- भक्ति; आख्य:--नामक; आत्यन्तिक:--सर्वोच्च पद; उदाहतः--कहागया; येन--जिससे; अतिक्रज्य--लाँघ कर; त्रि-गुणम्--प्रकृति के तीनों गुण; मत्-भावाय--मेरे दिव्य पद को;उपपद्यते-- प्राप्त करता है।
जैसा कि मैं बता चुका हूँ, भक्ति का उच्च पद प्राप्त करके मनुष्य प्रकृति के तीनोंगुणों के प्रभाव को लाँध सकता है और दिव्य पद पर स्थित हो सकता है, जिस तरहभगवान् हैं।
निषेवितेनानिमित्तेन स्वधर्मेण महीयसा ।
क्रियायोगेन शस्तेन नातिहिंस्त्रेण नित्यशः ॥
१५॥
निषेवितेन--की गईं; अनिमित्तेन--फल की आकांक्षा के बिना, निष्काम भाव से; स्व-धर्मेण-- अपने नियत कार्योसे; महीयसा--महिमायुक्त; क्रिया-योगेन-- भक्ति सम्बन्धी कार्यों के द्वारा; शस्तेन--शुभ; न--बिना; अतिहिंस्त्रेण--अत्यधिक हिंसा से; नित्यशः--नियमित रूप से।
भक्त को अपने नियत कार्यो को सम्पन्न करना चाहिए, जो यशस्वी हों और बिनाकिसी भौतिक लाभ के हों।
उसे अधिक हिंसा किये बिना अपने भक्ति कार्य नियमितरूप से करने चाहिए।
मद्धिष्ण्यदर्शनस्पर्शपूजास्तुत्यभिवन्दनै: ।
भूतेषु मद्भावनया सत्त्वेनासड्रमेन च ॥
१६॥
मत्-मेरी; धिष्णय--मूर्ति, प्रतिमा; दर्शन--देखना; स्पर्श--छूना; पूजा--पूजा करना; स्तुति--प्रार्थना;अभिवन्दनै:--नमस्कार या वन्दना द्वारा; भूतेषु--समस्त जीवों में; मत्--मेरा; भावनया--विचार से; सत्त्वेन--सतोगुण से; असड्रमेन--विरक्ति से; च--तथा |
भक्त को नियमित रूप से मन्दिर में मेरी प्रतिमा का दर्शन करना, मेरे चरणकमलस्पर्श करना तथा पूजन सामग्री एवं प्रार्थना अर्पित करना चाहिए।
उसे सात्त्विक भाव सेवैराग्य दृष्टि रखनी चाहिए और प्रत्येक जीव को आध्यात्मिक दृष्टि से देखना चाहिए।
महतां बहुमानेन दीनानामनुकम्पया ।
मैत्र्या चेवात्मतुल्येषु यमेन नियमेन च ॥
१७॥
महताम्-महापुरुषों को; बहु-मानेन--अत्यन्त सम्मान से; दीनानामू--गरीबों को; अनुकम्पया--दया से; मैत््या--मित्रता से; च--तथा; एब--निश्चय ही; आत्म-तुल्येषु-- अपने समान व्यक्तियों को; यमेन--इन्द्रियों को वश मेंकरके; नियमेन--नियमपूर्वक; च--तथा |
भक्त को चाहिए कि गुरु तथा आचार्यों को सर्वोच्च सम्मान प्रदान करते हुए भक्तिकरे।
उसे दीनों पर दयालु होना चाहिए और अपनी बराबरी के व्यक्तियों से मित्रता करनीचाहिए, किन्तु उसके सारे कार्यकलाप नियमपूर्वक तथा इन्द्रिय-संयम के साथ सम्पन्नहोने चाहिए।
आध्यात्मिकानुश्रवणान्नामसड्डीर्तनाच्च मे ।
आर्जवेनार्यसड़ेन निरहर्झक्रियया तथा ॥
१८॥
आध्यात्मिक--आध्यात्मिक बातें; अनुश्रवणात्--सुनने से; नाम-सड्डीर्तनातू--पवित्र नाम के संकीर्तन से; च--तथा;मे--मेरा; आर्जवेन--सरल आचरण से; आर्य-सड्जेन--साधु पुरुषों की संगति से; निरह्झ्ञक्रियया-- अहंकार रहित;तथा--इस प्रकार।
भक्त को चाहिए कि आध्यात्मिक बात ही सुने और अपने समय का सदुपयोगभगवान् के पवित्र नाम के जप में करे।
उसका आचरण सुस्पष्ट एवं सरल हो।
किन्तु वहईर्ष्यालु न हो।
वह सबों के प्रति मैत्रीपूर्ण होते हुए भी ऐसे व्यक्तियों की संगति से बचे जोआध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत नहीं हैं।
मद्धर्मणो गुणैरेतै: परिसंशुद्ध आशय: ।
पुरुषस्याज्साभ्येति श्रुतमात्रगुणं हि मामू ॥
१९॥
मतू-धर्मण:--मेरे भक्त के; गुणैः--गुणों से; एतै:--इन; परिसंशुद्ध:--पूर्णतया शुद्ध; आशय: --चेतना; पुरुषस्थ--पुरुष की; अज्ञसा--तुरन्त; अभ्येति--निकट आता है; श्रुत--सुनकर; मात्र--केवल; गुणम्--गुण; हि--निश्चय ही;माम्--मुझको |
जब मनुष्य इन समस्त लक्षणों से पूर्णतया सम्पन्न होता है और इस तरह उसकीचेतना पूरी तरह शुद्ध हो लेती है, तो वह मेरे नाम या मेरे दिव्य गुण के श्रवण मात्र सेतुरन्त ही आकर्षित होने लगता है।
यथा वातरथो प्राणमावृड्े गन्न्ध आशयात् ।
एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत्ू ॥
२०॥
यथा--जिस तरह; वात--वायु का; रथ:--रथ; घ्राणम्--सूँघने की इन्द्रिय, घ्राणेन्द्रिय; आवृड्डे --ग्रहण करती है;गन्ध:--सुगन्धि; आशयातू-- स्त्रोत से; एवम्--उसी तरह; योग-रतम्--भक्ति में लगी हुई; चेत:--चेतना;आत्मानम्--परमात्मा; अविकारि--अपरिवर्तनशील; यत्--जो |
जिस प्रकार वायु का रथ गन्ध को उसके स्त्रोत से ले जाता है और तुरन्त प्राणेन्द्रियतक पहुँचाता है, उसी प्रकार जो व्यक्ति निरन्तर कृष्णभावनाभावित भक्ति में संलग्न रहताहै, वह सर्वव्यापी परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थित: सदा ।
तमवज्ञाय मां मर्त्य: कुरुतेडर्चाविडम्बनम् ॥
२१॥
अहम्-मैं; सर्वेषु--समस्त; भूतेषु--जीवों में; भूत-आत्मा--सभी जीवों में परमात्मा; अवस्थित: --स्थित; सदा--सदैव; तम्--उस परमात्मा को; अवज्ञाय--अनादर करके; माम्--मुझको; मर्त्य:--मरणशील व्यक्ति; कुरुते--करता है; अर्चा--विग्रह की पूजा का; विडम्बनम्ू-- अनुकरण, स्वाँग |
मैं प्रत्येक जीव में परमात्मा रूप में स्थित हूँ।
यदि कोई ‘परमात्मा सर्वत्र है' इसकीउपेक्षा या अवमानना करके अपने आपको मन्दिर के विग्रह-पूजन में लगाता है, तो यहकेवल स्वाँग या दिखावा है।
यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमी श्वरम् ।
हित्वार्चा भजते मौढ्याद्धस्मन्येव जुहोति सः ॥
२२॥
यः--जो; माम्--मुझको; सर्वेषु--सभी; भूतेषु--जीवों में; सन््तम्--उपस्थित होकर; आत्मानम्--परमात्मा;ईश्वरम्-परमात्मा को; हित्वा--उपेक्षा करके; अर्चाम्--विग्रह को; भजते--पूजता है; मौढ्यात्-- अज्ञानवश;भस्मनि--राख में; एव--केवल; जुहोति-- आहुति डालता है; सः--
वह जो मन्दिरों में भगवान् के विग्रह का पूजन करता है, किन्तु यह नहीं जानता किपरमात्मा रूप में परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में आसीन हैं, वह अज्ञानी है और उसकीतुलना उस व्यक्ति से की जाती है, जो राख में आहुतियाँ डालता है।
द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिन: ।
भूतेषु बद्धवैरस्थ न मनः शान्तिमृच्छति ॥
२३॥
द्विषतः--द्वेष रखने वाले का; पर-काये--दूसरे के शरीर के प्रति; मामू--मुझको; मानिन:--आदर करते हुए; भिन्न-दर्शि:--पृथकतवादी का; भूतेषु--जीवों के प्रति; बद्ध-वैरस्थ--शत्रुता रखने वाले का; न--नहीं; मनः--मन;शान्तिमू--शान्ति; ऋच्छति-- प्राप्त करता है।
जो मुझे श्रद्धा अर्पित करता है, किन्तु अन्य जीवों से ईर्ष्यालु है, वह इस कारणपृथकतावादी है।
उसे अन्य जीवों के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने के कारण कभी भी मन की शान्ति प्राप्त नहीं हो पाती।
अहमुच्चावचेद्द्रव्यै: क्रिययोत्पन्नयानघे ।
नैव तुष्येडर्चितोर्चायां भूतग्रामावमानिन: ॥
२४॥
अहम्--मैं; उच्च-अवचै:--विविध; द्वव्यैः --सामग्री से; क्रियया--धार्मिक अनुष्ठानों से; उत्पन्नया--सम्पन्न; अनघे--हे निष्कलुष माता; न--नहीं; एव--निश्चय ही; तुष्ये-- प्रसन्न होता हूँ; अर्चित:--पूजित; अर्चायाम्--प्रतिमा रूप में;भूत-ग्राम--अन्य जीवों को; अवमानिन:--अनादर करने वालों से |
हे माते, भले ही कोई पुरुष सही अनुष्ठानों तथा सामग्री द्वारा मेरी पूजा करता हो,किन्तु यदि वह समस्त प्राणियों में मेरी उपस्थिति से अनजान रहता है, तो वह मन्दिर मेंमेरे विग्रह की कितनी ही पूजा क्यों न करे, मैं उससे कभी प्रसन्न नहीं होता।
अर्चादावर्चयेत्तावदी श्वरं मां स्वकर्मकृत् ।
यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥
२५॥
अर्चा-आदौ--अर्चा पूजा इत्यादि; अर्चयेत्--पूजा करे; तावत्--तब तक; ई श्वरमू-- भगवान् को; मामू-- मुझ;स्व--अपना; कर्म--निर्दिष्ट कर्तव्य; कृतू--किये हुए; यावत्--जब तक; न--नहीं; वेद-- अनुभव करता है; स्व-हृदि--अपने हृदय में; सर्व-भूतेषु--समस्त जीवों में; अवस्थितम्--स्थित |
मनुष्य को चाहिए कि अपने निर्दिष्ट कर्म करते हुए भगवान् के अर्चाविग्रह का तबतक पूजन करता रहे, जब तक उसे अपने हृदय में तथा साथ ही साथ अन्य जीवों केहृदय में मेरी उपस्थिति का अनुभव न हो जाय।
आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् ।
तस्य भिन्नदशो मृत्युर्विदधे भयमुल्बणम् ॥
२६॥
आत्मन:--स्व का, अपना; च--तथा; परस्य--दूसरे का; अपि-- भी; यः--जो कोई; करोति-- भेदभाव रखता है;अन्तरा--मध्य में; उदरम्--शरीर के; तस्य--उसका; भिन्न-हश:-- भेद-दर्शी ; मृत्यु:--मृत्यु के रूप में; विदधे--मैंउत्पन्न करता हूँ; भयम्--डर; उल्बणम्--महान |
जो भी अपने में तथा अन्य जीवों के बीच भिन्न दृष्टिकोण के कारण तनिक भीभेदभाव करता है उसके लिए मैं मृत्यु की प्रज्वलित अग्नि के समान महान् भय उत्पन्नकरता हूँ।
अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम् ।
अर्हयेह्दानमानाभ्यां मैत्र्याभिन्नेन चक्षुषा ॥
२७॥
अथ--अतः; माम्--मुझको; सर्व-भूतेषु--समस्त प्राणियों में; भूत-आत्मानम्--सभी जीवों में आत्म स्व ; कृत-आलयमू--निवास करते हुए; अर्हयेत्--पूजा करनी चाहिए; दान-मानाभ्याम्--दान तथा आदर से; मैत्रया--मित्रतासे; अभिन्नेन--समान; चक्षुषा--देखने से |
अतः दान तथा सत्कार के साथ ही साथ मैत्रीपूर्ण आचरण से तथा सबों पर एक सीइृष्टि रखते हुए मनुष्य को मेरी पूजा करनी चाहिए, क्योंकि मैं सभी प्राणियों में उनकेआत्मा के रूप में निवास करता हूँ।
जीवा: श्रेष्ठा ह्मजीवानां ततः प्राणभूतः शुभे ।
ततः सचित्ता: प्रवरास्ततश्रेन्द्रियवृत्तय: ॥
२८ ॥
जीवा:--जीव; श्रेष्ठा:--अधिक अच्छे; हि--निस्सन्देह; अजीवानाम्--अचेतन पदार्थों से; ततः--उनकी अपेक्षा;प्राण-भूत:ः--जीवन के लक्षणों से युक्त जीव; शुभे--हे कल्याणी माता; ततः--उनकी अपेक्षा; स-चित्ता:--विकसित चेतना से युक्त जीव; प्रवरा: -- श्रेष्ठ; ततः--उनसे; च--तथा; इन्द्रिय-वृत्तय: --अनुभूति से युक्त |
हे कल्याणी माँ, जीवात्माएँ अचेतन पदार्थों से श्रेष्ठ हैं और इनमें से जो जीवन केलक्षणों से युक्त हैं, वे श्रेष्ठ हैं।
इनकी अपेक्षा विकसित चेतना वाले पशु श्रेष्ठ हैं और इनसेभी श्रेष्ठ वे हैं जिनमें इन्द्रिय अनुभूति विकसित हो चुकी है।
तत्रापि स्पर्शवेदिभ्य: प्रवरा रसवेदिन: ।
तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदों वरा: ॥
२९॥
तत्र--उनमें से; अपि--इसके अतिरिक्त; स्पर्श-वेदिभ्य:--स्पर्श का अनुभव करने वालों से; प्रवरा:-- श्रेष्ठ; रस-वेदिन:--स्वाद का अनुभव करने वाले; तेभ्य:--उनसे; गन्ध-विदः --गन्ध अनुभव करने वाले; श्रेष्ठा: -- श्रेष्ठ;ततः--उनसे भी; शब्द-विदः--ध्वनि का अनुभव करने वाले; वरा:-- श्रेष्ठ
इन्द्रियवृत्ति अनुभूति से युक्त जीवों में से जिन्होंने स्वाद की अनुभूति विकसितकर ली है वे स्पर्श अनुभूति विकसित किये हुए जीवों से श्रेष्ठ हैं।
इनसे भी श्रेष्ठ वे हैंजिन्होंने गंध की अनुभूति विकसति कर ली है और इनसे भी श्रेष्ठ वे हैं जिनकीश्रवणेन्द्रिय विकसित है।
रूपभेदविदस्तत्र ततश्लोभयतोदतः ।
तेषां बहुपदाः श्रेष्ठाश्चतुष्पादस्ततो द्विपातू ॥
३०॥
रूप-भेद--रूप में अन्तर; विदः--जानने वाले; तत्र--उनकी उपेक्षा; ततः--उनसे; च--तथा; उभयत:--दोनों जबड़ोंमें; दतः--दाँतों से युक्त; तेषाम्ू--उनमें से; बहु-पदाः--अनेक पाँवों वाले; श्रेष्ठा:-- श्रेष्ठ; चतु:-पाद:--चौपाया;ततः--उनसे; द्वि-पातू-दो पाँव वाले |
ध्वनि सुन सकने वाले प्राणियों की अपेक्षा वे श्रेष्ठ हैं, जो एक रूप तथा दूसरे रूप मेंअन्तर जान लेते हैं।
इनसे भी अच्छे वे हैं जिनके ऊपरी तथा निचले दाँत होते हैं औरइनसे भी श्रेष्ठ अनेक पाँव वाले जीव हैं।
इनसे भी श्रेष्ठ चौपाये और चौपाये से भी बढ़करमनुष्य हैं।
ततो वर्णाश्व चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तम: ।
ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो हार्थज्ञो भ्यधिकस्ततः ॥
३१॥
ततः--उनमें से; वर्णा:--वर्ग; च--तथा; चत्वार:--चार; तेषाम्--उनमें से; ब्राह्मण: --ब्राह्मण; उत्तम: --सर्व श्रेष्ठ;ब्राह्मणेषु--ब्राह्मणों में से; अपि-- भी; वेद--वेदों का; ज्ञ:--जानने वाला; हि--निश्चय ही; अर्थ--प्रयोजन; ज्ञ:--जानने वाला; अभ्यधिक: -- श्रेष्ठ; ततः--उससे
मनुष्यों में वह समाज सर्वोत्तम है, जो गुण तथा कर्म के अनुसार विभाजित कियागया है और जिस समाज में बुद्धिमान जनों को ब्राह्मण पद दिया जाता है, वह सर्वोत्तमसमाज है।
ब्राह्मणों में से जिसने वेदों का अध्ययन किया है, वही सर्वोत्तम है और वेदज्ञब्राह्मणों में भी वेद के वास्तविक तात्पर्य को जानने वाला सर्वोत्तिम है।
अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान्स्वकर्मकृत् ।
मुक्तसड्रस्ततो भूयानदोग्धा धर्ममात्मनः ॥
३२॥
अर्थ-ज्ञात्ू-वेदों का तात्पर्य समझने वाले की अपेक्षा; संशय--सन्देह; छेत्ता--छिन्न करने वाला; ततः--उसकीउपेक्षा; श्रेयान्-- श्रेष्ठ; स्व-कर्म--अपने निर्धारित कार्य; कृतू--करने वाला; मुक्त-सड्र:-- भौतिक संगति से मुक्त;ततः--उससे; भूयान्-- श्रेष्ठ; अदोग्धा--न करने वाला; धर्मम्--भक्ति; आत्मन:--अपने लिए
वेदों का तात्पर्य समझने वाले ब्राह्मण की अपेक्षा वह मनुष्य श्रेष्ठ है, जो सारे संशयोंका निवारण कर दे और उससे भी श्रेष्ठ वह है, जो ब्राह्मण-नियमों का हृढ़तापूर्वक पालनकरता है।
उससे भी श्रेष्ठ है समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त व्यक्ति।
इससे भी श्रेष्ठ वहशुद्ध भक्त है, जो निष्काम भाव से भक्ति करता है।
तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मा निरन्तरःमय्यर्पितात्मन: पुंसो मयि सन्न्यस्तकर्मण: ।
न पश्यामि पर भूतमकर्तु: समदर्शनात् ॥
३३॥
तस्मात्--उसकी अपेक्षा; मयि--मुझको; अर्पित-- भेंट किया गया; अशेष--समस्त; क्रिया--कर्म; अर्थ--सम्पत्ति;आत्मा--जीवन, आत्मा; निरन्तर: --बिना रुके; मयि--मुझको; अर्पित--अर्पित; आत्मन:--जिसका मन; पुंस:ः--मनुष्य की अपेक्षा; मयि--मुझको; सन्न्यस्त--अर्पित; कर्मण:--जिसके कर्म; न--नहीं; पश्यामि--देखता हूँ;परम्ू--महानतम्; भूतम्--जीव को; अकर्तु:--स्वामित्व के बिना; सम--सम, वही; दर्शनात्--जिसको दृष्टि
अतः मुझे उस व्यक्ति से बड़ा कोई नहीं दिखता जो मेरे अतिरिक्त कोई अन्य रुचिनहीं रखता, जो अनवरत मुझे ही अपने समस्त कर्म तथा अपना सारा जीवन--सब कुछअर्पित करता है।
मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्ठहुमानयन् ।
ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥
३४॥
मनसा--मन से; एतानि--इन; भूतानि--जीवों को; प्रणमेत्--प्रणाम करे; बहु-मानयन्--आदर प्रदर्शित करते हुए;ईश्वरःः--नियामक ; जीव--जीवों का; कलया--परमात्मा के रूप में अपने अंश से; प्रविष्ट:--प्रवेश किया है;भगवानू्-- श्रीभगवान्; इति--इस प्रकार ।
ऐसा पूर्ण भक्त प्रत्येक जीव को प्रणाम करता है, क्योंकि उसका दृढ़ विश्वास है किभगवान् प्रत्येक जीव के शरीर के भीतर परमात्मा या नियामक के रूप में प्रविष्ट रहते हैं।
भक्तियोगश्च योगश्न मया मानव्युदीरित: ।
ययोरेकतरेणैव पुरुष: पुरुषं ब्रजेतू ॥
३५॥
भक्ति-योग:--भक्ति; च--तथा; योग: --योग; च--तथा; मया--मेरे द्वारा; मानवि--हे मनुपुत्री; उदीरित:--वर्णित;ययो:--जिस दो का; एकतरेण--किसी एक से; एव--अकेला; पुरुष:--पुरुष; पुरुषम्--परम पुरुष को; ब्रजेत्--प्राप्त कर सकता है।
हे माता, हे मनुपुत्री, जो भक्त इस प्रकार से भक्ति तथा योग का साधन करता है उसेकेवल भक्ति से ही परम पुरुष का धाम प्राप्त हो सकता है।
एतद्धगवतो रूप॑ ब्रह्मण: परमात्मन: ।
परं प्रधान पुरुष दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥
३६॥
एतत्--यह; भगवतः --भगवान् का; रूपमू--रूप; ब्रह्मण: --ब्रह्म का; परम-आत्मन: -- परमात्मा का; परम्--दिव्य;प्रधानम्-प्रधान; पुरुषम्--पुरुष; दैवम्--दैवी, आध्यात्मिक; कर्म-विचेष्टितम्ू--जिनके कार्यकलाप |
वह पुरुष जिस तक प्रत्येक जीव को पहुँचना है, उस भगवान् का शाश्वत रूप है, जोब्रह्म तथा परमात्मा कहलाता है।
वह प्रधान दिव्य पुरुष है और उसके कार्यकलापअध्यात्मिक हैं।
रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते ।
भूतानां महदादीनां यतो भिन्नद॒शां भयम् ॥
३७॥
रूप-भेद--रूपों के परिवर्तन का; आस्पदम्--कारण; दिव्यम्--दिव्य; काल:--काल, समय; इति--इस प्रकार;अभिधीयते--जाना जाता है; भूतानाम्--जीवों का; महत्-आदीनाम्--ब्रह्म आदि; यत:--जिससे; भिन्न-हशाम्--पृथक् दृष्टिकोण से; भयम्--डर।
विभिन्न भौतिक रूपान्तरों को उत्पन्न करने वाला काल भगवान् का ही एक अन्यस्वरूप है।
जो व्यक्ति यह नहीं जानता कि काल तथा भगवान् एक ही हैं वह काल सेभयभीत रहता है।
योउन्तः प्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रय: ।
स विष्ण्वाख्योधियज्ञोइ॥
सौ काल: कलयतां प्रभु: ॥
३८ ॥
यः--जो; अन्तः-- भीतर; प्रविश्य--घुसकर; भूतानि--जीवों को; भूतैः--जीवों के द्वारा; अत्ति--संहार करता है;अखिल-हर एक का; आश्रय:--आधार; सः--वह; विष्णु--विष्णु; आख्य:--नामक; अधियज्ञ:--समस्त यज्ञोंका भोक्ता; असौ--वह; काल:--काल; कलयताम्--समस्त स्वामियों का; प्रभुः--स्वामी |
समस्त यज्ञों के भोक्ता भगवान् विष्णु कालस्वरूप हैं तथा समस्त स्वामियों केस्वामी हैं।
वे प्रत्येक के हृदय में प्रविष्ट करने वाले हैं, वे सबके आश्रय हैं और प्रत्येकजीव का दूसरे जीव के द्वारा संहार कराने का कारण हैं।
नचास्य कश्रचिदयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः ।
आविश्त्यप्रमत्तो उसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥
३९॥
न--नहीं; च--तथा; अस्य-- भगवान् का; कश्चित्--कोई; दयितः--प्रिय; न--नहीं ; द्वेष्:--शत्रु; न--नहीं; च--तथा; बान्धव:--मित्र; आविशति--निकट जाता है; अप्रमत्त:--सजग; असौ--वह; प्रमत्तम्ू--असावधान; जनमू--व्यक्ति को; अन्त-कृत्ू--विनाशकर्ता
भगवान् का न तो कोई प्रिय है, न ही कोई शत्रु या मित्र है।
किन्तु जो उन्हें भूले नहीं हैं, उन्हें वे प्रेरणा प्रदान करते हैं और जो उन्हें भूल चुके हैं उनका क्षय करते हैं।
यद्भयाद्वाति बातोयं सूर्यस्तपति यद्धयात् ।
यद्भयाद्वर्षते देवों भगणो भाति यद्धयात् ॥
४०॥
यत्--जिस परमेश्वर के; भयात्-- भय से; वाति--बहती है; वात:--वायु; अयम्--यह; सूर्य:--सूर्य; तपति--चमकता है; यत्--जिसके; भयात्-- भय से; यत्--जिसके; भयात्-- भय से; वर्षते--वर्षा करता है; देव: --वर्षाका देवता; भ-गण:--नक्षत्रों का समूह; भाति--चमकता है; यत्--जिसके; भयात्-- भय से ।
भगवान् के ही भय से वायु बहती है, उन्हीं के भय से सूर्य चमकता है, वर्षा कादेवता पानी बरसाता है और उन्हीं के भय से नक्षत्रों का समूह चमकता है।
यद्वनस्पतयो भीता लताश्रौषधिभि: सह ।
स्वे स्वे कालेउभिगृह्नन्ति पुष्पाणि च फलानि च ॥
४१॥
यत्--जिसके कारण; वनः-पतयः--वृक्ष; भीताः-- भयभीत; लता:--लताएँ; च--तथा; ओषधिभि: --जड़ी-बूटियाँ; सह--साथ; स्वे स्वे काले-- अपनी-अपनी ऋतु में; अभिगृह्न्ति-- धारण करते हैं; पुष्पाणि-- फूल; च--तथा; फलानि--फल; च--भी |
भगवान् के भय से वृक्ष, लताएँ, जड़ी-बूटियाँ तथा मौसमी पौधे और फूल अपनी-अपनी ऋतु में फूलते और फलते हैं।
स्त्रवन्ति सरितो भीता नोत्सर्पत्युदधिर्यतः ।
अग्निरिन्धे सगिरिभिर्भूर्न मजति यद्भधयात् ॥
४२॥
स्त्रवन्ति--बहती हैं; सरित:--नदियाँ; भीता:--डरी हुई; न--नहीं; उत्सर्पति--उमड़ कर बहते हैं; उद-धि:--सागर;यत:--जिसके कारण; अग्नि:--अग्नि; इन्धे--जलती है; स-गिरिभि:--पर्वतों सहित; भू:ः--पृथ्वी; न--नहीं;मज्जति--डूबती है; यत्--जिसके; भयात्-- भय से
भगवान् के भय से नदियाँ बहती हैं तथा सागर कभी भरकर बाहर नहीं बहते।
उनकेही भय से अग्नि जलती है और पृथ्वी अपने पर्वतों सहित ब्रह्माण्ड के जल में डूबतीनहीं।
नभो ददाति श्वसतां पदं यन्नियमादद: ।
लोकं स्वदेहं तनुते महान्सप्तभिरावृतम् ॥
४३॥
नभः--आकाश; ददाति--देता है; श्रसताम्--जीवों को; पदम्--आवास; यत्--जिस भगवान् के; नियमात्--नियन्त्रण में; अदः--वह; लोकम्--ब्रह्माण्ड को; स्व-देहम्--अपने शरीर को; तनुते--विस्तार करता है; महान्--महत् तत्त्व; सप्तभि:--सात कोशों सहित; आवृतम्--आच्छादित |
भगवान् के ही नियन्त्रण में अन्तरक्षि में आकाश सारे लोकों को स्थान देता है जिनमेंअसंख्य जीव रहते हैं।
उन्हीं के नियन्त्रण में ही सकल विराट शरीर अपने सातों कोशोंसहित विस्तार करता है।
गुणाभिमानिनो देवा: सर्गादिष्वस्थ यद्धयात् ।
वर्तन्तेडनुयुगं येषां वश एतच्चराचरम् ॥
४४॥
गुण--प्रकृति के गुण; अभिमानिन:--के अधीन; देवा:--देवता; सर्ग-आदिषु--सृष्टि करने आदि में; अस्य--इसजगत का; यत्-भयात्--जिसके भय से; वर्तन्ते--कार्य करते हैं; अनुयुगम्--युगों के अनुसार; येषामू--जिनके;वशे--अधीन; एतत्--यह; चर-अचरम्--सारे सजीव तथा निर्जीव
भगवान् के भय से ही प्रकृति के गुणों के अधिष्ठाता देवता सृष्टि, पालन तथा संहारका कार्य करते हैं।
इस भौतिक जगत की प्रत्येक निर्जीव तथा सजीव वस्तु उनके हीअधीन है।
सोनन्तोउन्तकर: कालोनादिरादिकृद॒व्यय: ।
जन॑ जनेन जनयन्मारयन्पृत्युनान्तकम् ॥
४५॥
सः--वह; अनन्त:--अन्तहीन; अन्त-करः--विनाशकर्ता; काल:--समय; अनादिः -- जिसका आदि न हो; आदि-कृत्ू--स्त्रष्टा; अव्यय:--जिसमें परिवर्तन न हो; जनम्--लोगों को; जनेन--लोगों द्वारा; जनयन्--उत्पन्न करते हुए;मारयनू्--विनष्ट करते हुए; मृत्युना--मृत्यु द्वारा; अन्तकम्--म
ृत्यु का स्वामी शाश्रत काल खण्ड का न आदि है और न अन्त।
वह इस पातकी संसार के स्त्रष्टाभगवान् का प्रतिनिधि है।
वह दृश्य जगत का अन्त कर देता है, एक को मार कर दूसरे को जन्म देता है और इसका सृजन कार्य करता है।
इसी तरह मृत्यु के स्वामी यम को भीनष्ट करके ब्रह्माण्ड का विलय कर देता है।
