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अध्याय इकतीसवाँ: जीवित संस्थाओं की गतिविधियों पर भगवान कपिला के निर्देश
3.31श्रीभगवानुवाचकर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये ।
स्त्रिया: प्रविष्ट उदरं पुंसो रेतःकणाश्रय: ॥
१॥
श्री-भगवान् उवाच-- श्रीभगवान् ने कहा; कर्मणा--कर्मफल के द्वारा; दैव-नेत्रेण-- भगवान् की अध्यक्षता में;जन्तु:--जीव; देह--शरीर; उपपत्तये--प्राप्त करने के लिए; स्त्रिया:--स्त्री के; प्रविष्ट: --प्रवेश करता है; उदरम्ू--गर्भ में; पुंसः--पुरुष के; रेत:--वीर्य का; कण--सूक्ष्म भाग; आश्रय: --रहते हुए।
भगवान् ने कहा : परमेश्वर की अध्यक्षता में तथा अपने कर्मफल के अनुसार विशेषप्रकार का शरीर धारण करने के लिए जीव आत्मा को पुरुष के वीर्यकण के रूप मेंस्त्री के गर्भ में प्रवेश करना होता है।
कलल त्वेकरात्रेण पञ्ञरात्रेण बुद्दुदम् ।
दशाहेन तु कर्कन्धू: पेश्यण्डं वा ततः परम् ॥
२॥
कललम्ू--शुक्राणु तथा रज का मिश्रण; तु--तब; एक-रात्रेण--पहली रात में; पञ्ञ-रात्रेण--पाँचवी रात तक;बुह्दुदम--बुलबुला; दश-अहेन--दस दिनों में; तु--तब; कर्कन्धू:--बेर के बराबर; पेशी--मांस का लोथड़ा;अण्डम्--अंडा; वा-- अथवा; तत:--उससे; परम्--बाद में
पहली रात में शुक्राणु तथा रज मिलते हैं और पाँचवी रात में यह मिश्रण बुलबलेका रूप धारण कर लेता है।
दसवीं रात्रि को यह बढ़कर बेर जैसा हो जाता है और उसकेबाद धीरे-धीरे यह मांस के पिण्ड या अंडे में परिवर्तित हो जाता है।
मासेन तु शिरो द्वाभ्यां बाह्इटयाद्यड्भविग्रह: ।
नखलोमास्थिचर्माणि लिड्गच्छिद्रोद्धवस्त्रिभि: ॥
३॥
मासेन--एक मास के भीतर; तु--तब; शिर: --सिर; द्वाभ्यामू-दो महीने में; बाहु--हाथ; अड्ध्रि--पैर; आदि--इत्यादि; अड्र--शरीर के अवयव; विग्रह:--स्वरूप; नख--नाखून; लोम--रोएँ; अस्थि--हड्डियाँ; चर्माणि--तथाचमड़ी; लिड्र--शिश्न; छिद्र--छेद; उद्धव:--प्राकट्य; त्रिभि:--तीन मास में |
एक महीने के भीतर सिर बन जाता है और दो महीने के अन्त में हाथ, पाँव तथाअन्य अंग आकार पाते हैं।
तीसरे मास के अन्त तक नाखून, अँगुलियाँ, अँगूठे, रोएँ,हड्डियाँ तथा चमड़ी प्रकट हो आती हैं और इसी तरह जननेन्द्रिय तथा आँखें, नथुने,कान, मुँह तथा गुदा जैसे छिद्र भी प्रकट होते हैं।
चतुर्भिर्धातव: सप्त पञ्जभि: क्षुत्तुडुद्धवः ।
षड्भिर्जरायुणा वीतः कुक्षौ भ्राम्यति दक्षिणे ॥
४॥
चतुर्भिः--चार महीने के भीतर; धातव:--अवयव; सप्त--सात; पञ्ञभि: -- पाँच महीने के भीतर; क्षुत्-तृट्ू-- भूखतथा प्यास के; उद्धव: --प्राकट्य; षड़्भिः--छह मास के भीतर; जरायुणा--झिल्ली से; वीत:--घिर कर; कुक्षौ--उदर में; भ्राम्यति--चलता है; दक्षिणे--दाहिनी ओर
गर्भधारण के चार महीने के भीतर शरीर के सात मुख्य अवयव उत्पन्न हो जाते हैं।
इनके नाम हैं--रस, रक्त, मांस, चर्बी, हड्डी, मज्जा तथा वीर्य।
पाँच महीने में भूख तथाप्यास लगने लगती है और छह मास के अन्त तक झिल्ली जरायु के भीतर बन्द गर्भ भ्रूण उदर के दाहिनी भाग में चलने लगता है।
मातुर्जग्धान्नपानाथैरेधद्धातुरसम्मते ।
शेते विप्मूत्रयोर्गते स जन्तुर्जन्तुसम्भवे ॥
५॥
मातुः--माता का; जग्ध--ग्रहण किया गया; अन्न-पान-- भोजन तथा पेय पदार्थ, खाना-पीना; आद्यि:--इत्यादि से;एधत्--बढ़ते हुए; धातु:ः--शरीर के अवयव; असम्मते--गर्हित, घृणित; शेते--रहा आता है; विट्-मूत्रयो:--मल-मूत्र के; गर्ते-गड्डे में; सः--वह; जन्तु:-- भ्रूण; जन्तु-- कीड़ों के; सम्भवे--पोषण-स्थल में
माता द्वारा ग्रहण किये गये भोजन तथा जल से पोषण प्राप्त करके भ्रूण बढ़ता है और मल-मूत्र के घृणित स्थान में, जो सभी प्रकार के कीटाणुओं के उपजने का स्थानहै, रहा आता है।
कृमिभिः क्षतसर्वाड्र: सौकुमार्यात्प्रतिक्षणम् ।
मूर्च्छामाणोत्युरुक्लेशस्तत्रत्यै: श्षुधितैर्मुहु: ॥
६॥
कृमिभिः-कौड़ों द्वारा; क्षत--काटे जाने पर; सर्व-अड्डभ:--पूंरे शरीर में; सौकुमार्यात्--सुकुमार होने के कारण;प्रति-क्षणम्ू-- क्षण-क्षण; मूर्च्छाम्-- अचेत अवस्था को; आप्नोति--प्राप्त करता है; उरु-क्लेश:--महान् कष्ट;तत्रत्यै:--वहाँ उदर में रहकर; क्षुधितैः-- भूख से; मुहुः--पुनः पुनः |
उदर में भूखे कीड़ों द्वारा शरीर भर में बारम्बार काटे जाने पर शिशु को अपनी सुकुमारता के कारण अत्यधिक पीड़ा होती है।
इस भयावह स्थिति के कारण वह क्षण-क्षण अचेत होता रहता है।
कटुतीक्ष्णोष्णलवणरूक्षाम्लादिभिरुल्बणै: ।
मातृभुक्तैरुपस्पृष्ट: सर्वाड्रोत्थितवेदन: ॥
७॥
'कटु--कड़वा; तीक्षण--तीता; उष्ण--गरम; लवण--नमकीन; रूक्ष--सूखा; अम्ल--खट्ठा; आदिभि: --इत्यादि से;उल्बणै: -- अत्यधिक; मातृ-भुक्तै: --माता द्वारा खाये गये भोजन से; उपस्पृष्ट: -- प्रभावित; सर्व-अड्ग--सारे शरीर में;उत्थित--उत्पन्न हुआ; वेदन:--दर्द, पीड़ा
माता के खाये कड़वे, तीखे, अत्यधिक नमकीन या खट्टे भोजन के कारण शिशु केशरीर में निरन्तर पीड़ा रहती है, जो प्रायः असह्य होती है।
उल्बेन संवृतस्तस्मिन्नन्त्रै श्र बहिरावृतः ।
आस्ते कृत्वा शिरः कुक्षौ भुग्नपृष्ठशिरोधर: ॥
८॥
उल्बेन--झिल्ली से; संवृत:--लिपटा हुआ; तस्मिनू--उस स्थान पर; अन्त्रै:--आँतों से; च--तथा; बहिः--बाहर;आवृतः--घिरा हुआ, ढका; आस्ते--लेटा रहता है; कृत्वा--रखा जाकर; शिरः:--सिर; कुक्षौ--पेट की ओर;भुग्न--झुका हुआ; पृष्ठ--पीठ; शिर:-धर:--गर्दन |
झिल्ली से लिपटा और बाहर से आँतों द्वारा ढका घिरा हुआ शिशु उदर में एकओर पड़ा रहता है।
उसका सिर उसके पेट की ओर मुड़ा हुआ रहता है और उसकी कमरतथा गर्दन धनुषाकार में मुड़े रहते हैं।
अकल्प: स्वाड्रचेष्टायां शकुन्त इव पञ्जरेतत्र लब्धस्मृतिर्देवात्कर्म जन्मशतोद्धवम् ।
स्मरन्दीर्घमनुच्छासं शर्म कि नाम विन्दते ॥
९॥
अकल्प:--अशक्त; स्व-अड्गड--अपने अंग; चेष्टायामू--हिलाने-डुलाने के लिए; शकुन्तः--पक्षी; इब--सहश;पञ्ञरे--पिंजड़े में; तत्र--वहाँ; लब्ध-स्मृति:--स्मृति को प्राप्त करके; दैवात्-- भाग्यवश; कर्म--कर्म; जन्म-शत-उद्धवम्-पिछले सौ जन्मों में घटित होने वाले; स्मरन्ू--याद करके; दीर्घम्--दीर्घकाल तक; अनुच्छासम्-- आहेंभरना; शर्म--मन को शान्ति; किमू--क्या; नाम--तब; विन्दते--प्राप्त कर सकता है |
इस तरह शिशु पिंजड़े के पक्षी के समान बिना हिले-डुले रह रहा होता है।
उससमय, यदि शिशु भाग्यवान हुआ, तो उसे विगत सौ जन्मों के कष्ट स्मरण हो आते हैं औरवह दुख से आहें भरता है।
भला ऐसी दशा में मन:शान्ति कैसे सम्भव है ?
आरशभ्य सप्तमान्मासाल्लब्धबोधोपि वेपित: ।
नैकत्रास्ते सूतिवातैर्विष्ठाभूरिव सोदर: ॥
१०॥
आरशभ्य--प्रारम्भ होने पर; सप्तमात् मासात्ू--सातवें महीने से; लब्ध-बोध: --चेतना प्राप्त; अपि--यद्यपि; वेपित:--हिलता डुलता; न--नहीं; एकत्र--एक स्थान पर; आस्ते--रहा आता है; सूति-वातैः--शिशु जन्म के लिए हवाओं प्रसूति वायु द्वारा; विष्ठा- भूः--क्री ड़ा; इब--सहृश; स-उदरः --उसी गर्भ से उत्पन्न ॥
इस प्रकार गर्भाधान के पश्चात् सातवें मास से चेतना विकसित होने पर यह शिशु उनहवाओं के द्वारा चलायमान रहता है, जो भ्रूण को प्रसव के कुछ सप्ताह पूर्व से दबातीरहती हैं।
वह उसी पेट की गन्दगी से उत्पन्न कीड़ों के समान एक स्थान में नहीं रहसकता।
नाथमान ऋषिर्भीत: सप्तवश्चि: कृताझ्जञलि: ।
स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेडर्पित: ॥
११॥
नाथमान:--याचना करता हुआ; ऋषि:--जीव; भीत:--डरा हुआ; सप्त-वश्चि:--सात आवरणों से बँधा; कृत-अज्जलि:--हाथ जोड़े; स्तुवीत--प्रार्थना करता है; तमू-- भगवान् को; विक्लवया--विकल होकर; वाचा--शब्दोंसे; येन--जिसके द्वारा; उदरे-गर्भ में; अर्पित:--स्थापित किया गया था।
इस भयभीत अवस्था में, भौतिक अवयवों के सात आवरणों से बँधा हुआ जीव हाथजोड़कर भगवान् से याचना करता है जिन्होंने उसे इस स्थिति में ला रखा है।
जन्तुरुवाचतस्योपसन्नमवितुं जगदिच्छयात्त-नानातनोर्भुवि चलच्चरणारविन्दम् ।
सोऊहं ब्रजामि शरणं हाकुतोभयं मेयेनेहशी गतिरदर्श्यसतो नुरूपा ॥
१२॥
जन्तु: उवाच--जीव कहता है; तस्य-- भगवान् का; उपसन्नम्--रक्षा के लिए पास आने पर; अवितुम्ू--रक्षा के लिए;जगत्--ब्रह्माण्ड; इच्छया--स्वेच्छा से; आत्त-नाना-तनो:--जो विभिन्न स्वरूपों को स्वीकार करता है; भुवि--पृथ्वीपर; चलत्--चलते हुए; चरण-अरविन्दमू--चरणकमल; सः अहमू--मैं स्वयं; ब्रजामि--जाता हूँ; शरणम्--शरणमें; हि--निस्सन्देह; अकुतः-भयम्--निर्भय बनाने; मे--मुझको; येन--जिससे; ईहशी--ऐसी; गति: -- जीवन दशा;अदर्शि--मानी जाती थी; असतः--अपवित्र; अनुरूपा--उपयुक्त |
जीव कहता है : मैं उन भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ जो अपनेविभिन्न नित्य स्वरूपों में प्रकट होते हैं और इस भूतल पर घूमते रहते हैं।
मैं उन्हीं कीशरण ग्रहण करता हूँ, क्योंकि वे ही मुझे निर्भय कर सकते हैं और उन्हीं से मुझे यहजीवन-अवस्था प्राप्त हुई है, जो मेरे अपवित्र कार्यों के सर्वथा अनुरूप है।
यस्त्वत्र बद्ध इव कर्मभिरावृतात्माभूतेन्द्रियशयमयीमवलम्ब्य मायाम् ।
आस्ते विशुद्धमविकारमखण्डबोध-मातप्यमानहृदयेवसितं नमामि ॥
१३॥
यः--जो; तु-- भी; अन्र--यहाँ; बद्ध:--बँधा हुआ; इब--मानो; कर्मभि: --कार्यों से; आवृत--आच्छादित;आत्मा--शुद्ध आत्मा; भूत--स्थूल तत्त्व; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आशय--मन; मयीम्--से युक्त; अवलम्ब्य--गिरकर;मायाम्--माया में; आस्ते--रहता है; विशुद्धम्--पूर्णतया शुद्ध; अविकारम्--परिवर्तन-रहित; अखण्ड-बोधम्--अनन्त ज्ञान से युक्त; आतप्यमान--संतप्त; हृदये--हृदय में; अवसितम्--रहते हुए; नमामि--नमस्कार करता हूँ।
मैं विशुद्ध आत्मा अपने कर्म के द्वारा बँधा हुआ, माया की व्यवस्थावश इस समयअपनी माता के गर्भ में पड़ा हुआ हूँ।
मैं उन भगवान् को नमस्कार करता हूँ जो यहाँ मेरेसाथ हैं, किन्तु जो अप्रभावित हैं और अपरिवर्तनशील हैं।
वे असीम हैं, किन्तु संतप्तहृदय में देखे जाते हैं।
मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।
यः पञ्जञभूतरचिते रहितः शरीरेच्छन्नो उयथेन्द्रियगुणार्थचिदात्मकोहम् ।
तेनाविकुण्ठमहिमानमृषिं तमेनंबन्दे परं प्रकृतिपूरुषयो: पुमांसम् ॥
१४॥
यः--जो; पश्च-भूत--पाँच स्थूल तत्त्व से; रचिते--निर्मित; रहित:--पृथक्; शरीरे-- भौतिक शरीर में; छल्नः--आवृत; अयथा--अनुपयुक्त; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; गुण--गुण; अर्थ--विषय; चित्--गर्ब; आत्मक:--से युक्त;अहमू--ैं; तेन--शरीर द्वारा; अविकुण्ठ-महिमानम्ू--जिसकी महिमा प्रकट है; ऋषिम्--सर्वज्ञ; तमू--उस; एनमू--उसको; वन्दे--नमस्कार करता हूँ; परम्--दिव्य; प्रकृति--प्रकृति को; पूरुषयो: --जीव को; पुमांसम्-- भगवान्को।
मैं अपने इस पंचभूतों से निर्मित भौतिक शरीर में होने के कारण परमेश्वर से विलगहो गया हूँ, फलत:ः मेरे गुणों तथा इन्द्रियों का दुरुपयोग हो रहा है, यद्यपि मैं मूलतःआध्यात्मिक हूँ।
चूँकि ऐसे भौतिक शरीर से रहित होने के कारण भगवान् प्रकृति तथाजीव से परे हैं और चूँकि उनके आध्यात्मिक गुण महिमामय हैं, अतः मैं उन्हें नमस्कारकरता हूँ।
यन्माययोरुगुणकर्मनिबन्धनेस्मिन्सांसारिके पथि चरंस्तदभिश्रमेण ।
नष्टस्मृति: पुनरयं प्रवृणीत लोक॑युकत्या कया महदनुग्रहमन्तरेण ॥
१५॥
यत्--भगवान् की; मायया--माया से; उरु-गुण--महान् गुणों से निकलने वाला; कर्म--कर्म; निबन्धने--बन्धों से;अस्मिन्ू--इस; सांसारिके--बारम्बार जन्म तथा मृत्यु के; पथि--रास्ते पर; चरन्--चलते हुए; तत्--उसका;अभिश्रमेण --अत्यधिक कष्ट के साथ; नष्ट-- भ्रष्ट; स्मृति: --स्मरण शक्ति; पुनः--फिर; अयम्--यह जीव;प्रवृणीत--अनुभव कर सकता है; लोकम्--अपनी असली प्रकृति; युक्त्या कया--जिस किसी साधन से; महत्-अनुग्रहम्-- भगवान् की कृपा; अन्तरेण--बिना |
जीव आगे प्रार्थना करता है : जीवात्मा प्रकृति के वशीभूत रहता है और जन्म तथामरण का चक्र बनाये रखने के लिए कठिन श्रम करता रहता है।
यह बद्ध जीवन भगवान्के साथ अपने सम्बन्ध की विस्मृति के कारण है।
अतः बिना भगवान् की कृपा के कोईभगवान् की दिव्य प्रेमा-भक्ति में पुन: किस प्रकार संलग्न हो सकता है ?
ज्ञानं यदेतददधात्कतमः स देव-स्त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांश: ।
त॑ जीवकर्मपदवीमनुवर्तमाना-स्तापत्रयोपशमनाय वयं भजेम ॥
१६॥
ज्ञानमू--ज्ञान; यत्ू--जो; एतत्--यह; अदधात्--दिया; कतम:--के अतिरिक्त दूसरा; सः--वह; देवः--भगवान्;त्रै-कालिकम्--तीनों कालों का; स्थिर-चरेषु--जड़ तथा जंगम में; अनुवर्तित--रहते हुए; अंश:--उनका आंशिकस्वरूप; तमू--उसको; जीव--जीवात्माओं का; कर्म-पदवीम्--सकाम कर्मो का मार्ग; अनुवर्तमाना: --पालन करनेवाले; ताप-त्रय--तीन प्रकार के कष्ट; उपशमनाय--मुक्त होने के लिए; वयम्--हम; भजेम--शरण में जाएँ ।
भगवान् के आंशिक स्वरूप अनन््तर्यामी परमात्मा के अतिरिक्त और कौन समस्त चरतथा अचर वस्तुओं का निर्देशन कर रहा है? वे काल की इन तीनों अवस्थाओं भूत,वर्तमान तथा भविष्य में उपस्थित रहते हैं।
अतः बद्धजीव उनके ही आदेश से विभिन्नकर्मो में रत है और इस बद्ध जीवन के तीनों तापों से मुक्त होने के लिए हमें उनकी हीशरण ग्रहण करनी होगी।
देहान्यदेहविवरे जठराग्निनासूगू-विण्मूत्रकृपपतितो भूशतप्तदेह: ।
इच्छन्नितो विवसितुं गणयन्स्वमासान्निर्वास्यते कृपणधीर्भगवन्कदा नु ॥
१७॥
देही--देहधारी जीव; अन्य-देह--दूसरे शरीर के; विवरे--उदर में; जठर--पेट की; अग्निना--अग्नि से; असृक्--रक्त; विटू--मल; मूत्र--तथा मूत्र के; कूप--कुएँ में; पतित:--गिरा हुआ; भूश--प्रबल रूप से; तप्त--जला हुआ;देह:--उसका शरीर; इच्छन्--चाहते हुए; इत:--इस स्थान से; विवसितुम्--बाहर निकलने के लिए; गणयन्--गिनते हुए; स्वमासान्--अपने महीने; निर्वास्थते--मुक्त किया जावेगा; कृपण-धी: --कृपण बुद्धि का व्यक्ति;भगवनू--हे भगवान्; कदा--कब; नु--निस्सन्देह |
अपनी माता के उदर में रक्त, मल तथा मूत्र के कूप में गिर कर और अपनी माँ कीजठराग्नि से दग्ध देहधारी जीव बाहर निकलने की व्यग्रता में महीनों की गिनती करतारहता है और प्रार्थना करता है, ‘हे भगवान्, यह अभागा जीव कब इस कारागार से मुक्तहो पाएगा ? !" येनेहशी गतिमसौ दशमास्य ईशसड्ग्राहितः पुरुदयेन भवाहशेन ।
स्वेनैव तुष्यतु कृतेन स दीननाथःको नाम तत्प्रति विनाञ्जलिमस्य कुर्यात् ॥
१८॥
येन--जिसके द्वारा भगवान् के द्वारा ; ईहशीम्--ऐसी; गतिम्--स्थिति; असौ--वह व्यक्ति मैं ; दश-मास्य:--दस मास का; ईश-हे प्रभु; सड्ग्राहित:--स्वीकार कराया जाता है; पुरु-दयेन--अत्यन्त दयालु; भवाहशेन--अतुलनीय; स्वेन--अपना; एव--अकेला; तुष्यतु--वे प्रसन्न हों; कृतेन--अपने कर्म से; सः--वह; दीन-नाथ: --पतितों के आश्रय; कः--कौन; नाम--निस्सन्देह; तत्--वह दया; प्रति--बदले में; विना--अतिरिक्त; अज्ललिमू--हाथ जोड़कर; अस्य-- भगवान् के; कुर्यात्ू--कर सकता है।
हे भगवान्, आपकी अहैतुकी कृपा से मुझमें चेतना आईं, यद्यपि मैं अभी केवल दसमास का हूँ।
पतितात्माओं के मित्र भगवान् की इस अहैतुकी कृपा के लिए कृतज्ञताप्रकट करने के हेतु मेरे पास हाथ जोड़कर प्रार्थना करने के अतिरिक्त है ही कया ?
कुछ सम्भव है।
पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तव्नि:शारीरके दमशरीर्यपरः स्वदेहे ।
यत्सृष्टयासं तमहं पुरुष पुराणंपश्ये बहिईदि च चैत्यमिव प्रतीतम् ॥
१९॥
'पश्यति--देखता है; अयम्--यह जीव; धिषणया--बुद्धि से; ननु--केवल; सप्त-वश्चिः--सात आवरणों से घिरा;शारीरके --ग्राह्म तथा अग्राह्म अनुभव; दम-शरीरी --आत्म-निग्रह के लिए शरीर धारण करने वाला; अपर: --दूसरा;स्व-देहे--अपने शरीरमें; यत्--पर मे श्वर द्वारा; सृष्टया--प्रदत्त; आसम्-- था; तम्--उस; अहम्--मैं; पुरुषम्--पुरुषको; पुराणम्--प्राचीनतम्; पश्ये--देखता हूँ; बहिः--बाहर; हृदि--हृदय में; च--तथा; चैत्यम्-- अहंकार का स्त्रोत;इब--निस्सन्देह; प्रतीतम्ू--मान्य ।
अन्य प्रकार का शरीरधारी जीव केवल अन््तःप्रेरणा से देखता है, वह उस शरीर केग्राह्म तथा अग्राह्म अनुभवों से ही परिचित होता है, किन्तु मुझे ऐसा शरीर प्राप्त है, जिसमेंमैं अपनी इन्द्रियों को वश में रखता हूँ और अपने गन्तव्य को समझता हूँ, अतः मैं उनभगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ जिनके आशीर्वाद से मुझे यह शरीर प्राप्त हुआ हैऔर जिनकी कृपा से मैं उन्हें भीतर और बाहर देख सकता हूँ।
सोहं वसन्नपि विभो बहुदुःखवासंगर्भान्न निर्जिगमिषे बहिरन्धकूपे ।
यत्रोपयातमुपसर्पति देवमायामिथ्या मतिर्यदनु संसृतिचक्रमेतत् ॥
२०॥
सः अहम्--मैं स्वयं; वसन्--रहते हुए; अपि--यद्यपि; विभो--हे प्रभु; बहु-दुःख--अनेक दुखों से; वासम्--अवस्था में; गर्भातू--उदर से; न--नहीं; निर्जिगमिषे--जाना चाहता हूँ; बहिः--बाहर; अन्ध-कूपे--अंधे कुएँ में;यत्र--जहाँ; उपयातम्--जाने वाले को; उपसर्पति--पकड़ लेती है; देव-माया-- भगवान् की बहिरंगा शक्ति;मिथ्या--झूठी; मतिः--पहचान; यत्--जो माया; अनु--के अनुसार; संसृति--जन्म-मृत्यु का; चक्रमू--चक्र;एतत्--यह अतः
हे प्रभु, यद्यपि मैं अत्यन्त भयावह परिस्थिति में रह रहा हूँ, किन्तु मैं अपनी माँके गर्भ से बाहर आकर भौतिक जीवन के अन्धकृूप में गिरना नहीं चाहता।
देवमायानामक आपकी बहिरंगा शक्ति तुरन्त नवजात शिशु को पकड़ लेती है और उसके बादतुरन्त ही झूठा स्वरूपज्ञान प्रारम्भ हो जाता है, जो निरन्तर जन्म तथा मृत्यु के चक्र काशुभारम्भ है।
तस्मादहं विगतविक्लव उद्धरिष्यआत्मानमाशु तमस: सुहदात्मनैव ।
भूयो यथा व्यसनमेतदनेकरन्श्॑मा में भविष्यदुपसादितविष्णुपाद: ॥
२१॥
तस्मातू--अतः; अहम्ू--मैं; विगत--छोड़कर, रहित; विक्लव: --क्षोभ, व्याकुलता; उद्धरिष्ये--उद्धार करूँगा;आत्मानम्--अपना; आशु--शीघ्र; तमस: --अंधकार से; सुहदा आत्मना--मित्र रूपी बुद्धि से; एब--निस्सन्देह;भूय:ः--पुन:; यथा--जिससे; व्यसनम्--दयनीय स्थिति; एतत्--यह; अनेक-रन्ध्रमू--अनेक गर्भों में प्रविष्ट होना;मा--नहीं; मे--मेरा; भविष्यत्--होगा; उपसादित-- मन में रखा हुआ; विष्णु-पाद:-- भगवान् विष्णु केचरणकमल।
अतः और अधिक क्षुब्ध न होकर मैं अपने मित्र विशुद्ध चेतना की सहायता सेअज्ञान के अन्धकार से अपना उद्धार करूँगा।
केवल भगवान् विष्णु के चरणकमलों कोअपने मन में धारण करके मैं बारम्बार जन्म तथा मृत्यु के लिए अनेक माताओं के गर्भो मेंप्रविष्ट करने से बच सकूँगा।
कपिल उवाचएवं कृतमतिर्गर्भ दशमास्य: स्तुवन्नृषि: ।
सद्यः क्षिपत्यवाचीन प्रसूत्य सूतिमारुतः ॥
२२॥
कपिल: उवाच-- भगवान् कपिल ने कहा; एवम्--इस प्रकार; कृत-मति:--इच्छा करते हुए; गर्भ--गर्भ में; दश-मास्य:--दस मास का; स्तुवन्--स्तुति करता हुआ; ऋषि:--जीव; सद्यः--उसी समय; क्षिपति--बाहर फेंकती है;अवाचीनम्--औंधा, अधोमुख,; प्रसूत्य--जन्म के लिए; सूति-मारुत:--प्रसव काल की वायु।
भगवान् कपिल ने कहा : अभी तक गर्भ में स्थित इस दस मास के जीव की भीऐसी कामनाएँ होती हैं।
किन्तु जब वह भगवान् की स्तुति करता रहता है तभी प्रसूतिकाल की वायु औंधे मुँह पड़े हुए उस शिशु को बाहर की ओर धकेलती है, जिससे वहजन्म ले सके।
तेनावसृष्ठ: सहसा कृत्वावाक्शिर आतुरः ।
विनिष्क्रामति कृच्छेण निरुच्छासो हतस्मृतिः ॥
२३॥
तेन--उस वायु से; अवसृष्ट:--बाहर की ओर धकेला जाकर; सहसा--अकस्मात्; कृत्वा--करके; अवाक्--ऑऔंधा;शिरः--शिर; आतुरः--कष्ट पाता हुआ; विनिष्क्रामति--बाहर आता है; कृच्छेण--कठिनाई से; निरुच्छास: --श्रासरहित; हत--विनष्ट; स्मृतिः--स्मृति ।
वायु द्वारा सहसा नीचे की ओर धकेला जाकर अत्यन्त कठिनाई से, सिर के बल,श्वासरहित तथा तीब्र वेदना के कारण स्मृति से विहीन होकर शिशु बाहर आता है।
पतितो भुव्यसूड्मिश्र: विष्ठाभूरिव चेष्टते ।
रोरूयति गते ज्ञाने विपरीतां गति गत: ॥
२४॥
'पतित:--गिरा हुआ; भुवि--पृथ्वी पर; असृक्ू--रक्त से; मिश्र: --सना हुआ; विष्ठा-भू:--कीड़ा; इब--सहश;चेष्टते--छटपटाता है; रोरूयति--जोर से चिल्लाता है; गते--नष्ट होने पर; ज्ञाने--अपनी चतुराई; विपरीताम्--विपरीत; गतिमू-- अवस्था को; गतः--गया हुआ।
इस प्रकार वह शिशु मल तथा रक्त से सना हुआ पृथ्वी पर आ गिरता है और मल सेउत्पन्न कीड़े के समान छटपटाता है।
उसका श्रेष्ठ ज्ञान नष्ट हो जाता है और वह माया केमोहजाल में विलखता है।
परच्छन्दं न विदुषा पुष्यमाणो जनेन सः ।
अनभिप्रेतमापतन्नः प्रत्याख्यातुमनी श्र: ॥
२५॥
पर-छन्दम्ू--पराई इच्छा; न--नहीं; विदुषा--समझ करके; पुष्यममाण:--पालित होकर; जनेन--व्यक्तियों द्वारा;सः--वह; अनभिप्रेतम्-- अवांछित परिस्थितियों में; आपन्न:--गिरा हुआ; प्रत्याख्यातुमू--इनकार करने के लिए;अनी श्वर:--असमर्थ |
उदर से निकलने के बाद शिशु ऐसे लोगों की देख-रेख में आ जाता है और उसकापालन ऐसे लोगों द्वारा होता रहता है, जो यह नहीं समझ पाते कि वह चाहता क्या है।
उसेजो कुछ मिलता है उसे वह इनकार न कर सकने के कारण वह अवांछित परिस्थिति में आ पढ़ता है।
शायितोशुचिपर्यड्डे जन्तु: स्वेदजदूषिते ।
नेश: कण्डूयनेझनामासनोत्थानचेष्टने ॥
२६॥
शायितः--लिटाया गया; अशुचि-पर्यड्जे--मैले कुचैले बिस्तर पर; जन्तु:--शिशु; स्वेद-ज--पसीने से उत्पन्न प्राणियोंसे; दूषिते--पूर्ण; न ईशः--असमर्थ; कण्डूयने--खुजलाते हुए; अड्भानाम्ू--अपने अंगों का; आसन--बैठे हुए;उत्थान--खड़े हुए; चेष्टने--या चलते हुए
पसीने तथा कीड़ों से भरे हुए मैले-कुचैले बिस्तर पर लिटाया हुआ शिशु खुजलाहटसे मुक्ति पाने के लिए अपना शरीर खुजला भी नहीं पाता; बैठने, खड़े होने या चलने कीबात तो दूर रही।
तुदन्त्यामत्वचं दंशा मशका मत्कुणादयः ।
रुदन्तं विगतज्ञानं कृमयः कृमिकं यथा ॥
२७॥
तुदन्ति--काटते हैं; आम-त्वचम्--मुलायम चमड़ी वाले बालक को; दंशा:--डाँस बड़ा मच्छर ; मशकाः:--मच्छर; मत्कुण--खटमल; आदय:--इत्यादि अन्य प्राणी; रुदन््तम्--रोते हुए; विगत--विनष्ट; ज्ञामम्ू--ज्ञान;कृमयः--कीड़े; कृमिकम्--कीड़े को; यथा--जिस तरह |
इस असहाय अवस्था में मुलायम त्वचा वाले बालक को डाँस, मच्छर, खटमल तथाअन्य कीड़े काटते रहते हैं, जिस तरह बड़े कीड़े को छोटे-छोटे कीड़े काटते रहते हैं।
बालक अपना सारा ज्ञान गँवा कर जोर-जोर से चिल्लाता है।
इत्येवं शैशवं भुक्त्वा दुःखं पौगण्डमेव च ।
अलब्धाभीप्सितोउज्ञानादिद्धमन्यु: शुचार्पित: ॥
२८ ॥
इति एवम्--इस प्रकार से; शैशवम्--बाल्यकाल को; भुक््त्वा--बिताकर; दुःखम्--दुख को; पौगण्डम्--किशोरावस्था को; एव--ही; च--तथा; अलब्ध-- अप्राप्त; अभीष्सित:--जिसकी इच्छाएँ; अज्ञानातू--अज्ञानवश;इद्ध--प्रज्वलित; मन्यु:--क्रोध; शुचचा--शोक से; अर्पित:--अभिभूत, संतप्त।
इस प्रकार विविध प्रकार के कष्ट भोगता हुआ शिशु अपना बाल्यकाल बिता करकिशोरवस्था प्राप्त करता है।
किशोरावस्था में भी वह अप्राप्य वस्तुओं की इच्छा करताहै, किन्तु उनके न प्राप्त होने पर उसे पीड़ा होती है।
इस प्रकार अज्ञान के कारण वहक्रुद्ध तथा दुखित होता है।
सह देहेन मानेन वर्धमानेन मन्युना ।
करोति विग्रह कामी कामिष्वन्ताय चात्मनः ॥
२९॥
सह--साथ; देहेन--शरीर के; मानेन--झूठी प्रतिष्ठा से; वर्धभानेन--बढ़ने से; मन्युना--क्रो ध से; करोति--उत्पन्नकरता है; विग्रहम्--शत्रुता, बैर; कामी--विषयी पुरुष; कामिषु--दूसरे विषयी पुरुष के प्रति; अन्ताय--विनाश केलिए; च--तथा; आत्मन:--अपने आत्मा का।
शरीर बढ़ने के साथ ही जीव अपने आत्मा को परास्त करने के लिए अपनी झुठीप्रतिष्ठा को तथा क्रोध को बढ़ाता है और इस तरह अपने ही जैसे कामी पुरुषों के साथबैर उत्पन्न करता है।
श़" भूतेः पञ्नभिरारब्धे देहे देहाबुधोसकृत् ।
अहं ममेत्यसदग्राह: करोति कुमतिर्मतिम्ू ॥
३०॥
भूतैः-- भौतिक तत्त्वों के द्वारा; पञ्ञभि:--पाँच; आरब्धे--निर्मित; देहे-- शरीर में; देही--जीव; अबुध:--अज्ञानी;असकृत्--निरन्तर; अहम्--मैं; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; असत्--अस्थायी वस्तुएँ; ग्राहः--स्वीकार करते हुए;'करोति--करता है; कु-मतिः--मूर्ख होने के कारण; मतिमू--विचार |
ऐसे अज्ञान से जीव पंचतत्त्वों से निर्मित भौतिक शरीर को 'स्व' मान लेता है।
इसभ्रम के कारण वह क्षणिक वस्तुओं को निजी समझता है और अन्धकारमय क्षेत्र मेंअपना अज्ञान बढ़ाता है।
तदर्थ कुरुते कर्म यद्वद्धो याति संसृतिम् ।
योउनुयाति ददत्क्लेशमविद्याकर्मबन्धन: ॥
३१॥
तत्-अर्थम्--शरीर के लिए; कुरुते--करता है; कर्म--कर्म; यत्-बद्धः--जिससे बँधकर; याति--जाता है;संसृतिम्--जन्म तथा मृत्यु के चक्र को; यः--जो शरीर; अनुयाति-- अनुसरण करता है; ददत्--देते हुए; क्लेशम्--क्लेश; अविद्या--अज्ञान से; कर्म--सकाम कर्म से; बन्धन:--बन्धन का कारण
जो शरीर जीव के लिए निरन्तर कष्ट का साधन है और जो अज्ञान तथा कर्म केबन्धन से बँधे जीव का अनुगमन करता है, उस शरीर के लिए जीव अनेक प्रकार केकार्य करने पड़ते हैं जिससे वह जन्म-मृत्यु के चक्र के अधीन हो जाता है।
यद्यसद्धिः पथि पुनः शिश्नोदरकृतोद्यमै: ।
आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत् ॥
३२॥
यदि--यदि; असद्धि:ः--बुरों के साथ; पथि--मार्ग पर; पुनः--फिर से; शिश्न--लिंग के लिए; उदर--पेट के लिए;'कृत--किया गया; उद्यमै:ः--जिसके प्रयास; आस्थित:ः--संगति करते हुए; रमते-- भोग करता है; जन्तु:ः--जीव;तम:ः--अन्धकार; विशति-- प्रवेश करता है; पूर्व-वत्--पहले की तरह
अतः यदि जीव विषय-भोग में लगे हुए ऐसे कामी पुरुषों से प्रभावित होकर, जोस्त्रीसंग-सुख व स्वाद की तुष्टि में ही रत हैं, असत् मार्ग का अनुसरण करता है, तो वहपहले की तरह पुनः नरक को जाता है।
सत्यं शौचं दया मौन बुद्धि: श्रीहीर्यशः क्षमा ।
शमो दमो भगश्चेति यत्सड्राद्याति सड्क्षयम् ॥
३३॥
सत्यम्--सत्य; शौचम्--स्वच्छता; दया--दया; मौनम्--गम्भीरता; बुद्ध्धि:--बुद्धि; श्री:--सम्पन्नता; ही:--लज्जा;यशः--ख्याति; क्षमा-- क्षमा; शम:ः--मन का निग्रह; दम:--इन्द्रियों का निग्रह; भग: --सम्पत्ति; च--तथा; इति--इस प्रकार; यत्-सड्ात्--जिसकी संगति से; याति सड्क्षयम्--विनष्ट हो जाते हैं
वह सत्य, शौच, दया, गम्भीरता, आध्यात्मिक बुदर्द्धि, लजञा, संयम, यश, क्षमा,मन-निग्रह, इन्द्रिय-निग्रह, सौभाग्य और ऐसे ही अन्य सुअवसरों से विहीन हो जाता है।
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु ।
सड़ूं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥
३४॥
तेषु--उन; अशान्तेषु --अभद्र; मूढेषु--मूर्खो की; खण्डित-आत्मसु--आत्म-साक्षात्कार से रहित; असाधुषु--दुष्टोंकी; सड्रम्-संगति; न--नहीं; कुर्यातू-करे; शोच्येषु--शोचनीय; योषित्--स्त्रियों का; क्रीडा-मृगेषु--नाचनेवाला कुत्ता; च--तथा
मनुष्य को चाहिए कि ऐसे अभद्र अशान्त मूर्ख की संगति न करे जो आत्म-साक्षात्कार के ज्ञान से रहित हो और स्त्री के हाथों का नाचने वाला कुत्ता बन कर रहगया हो।
न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसड्भरतः ।
योषित्सझद्यथा पुंसो यथा तत्सड्रिसड्गरतः ॥
३५॥
न--नहीं; तथा--उस तरह से; अस्य--इस मनुष्य का; भवेत्--हो सके; मोह: --मुग्धता, प्रेमान्धता; बन्ध: --बन्धन;च--तथा; अन्य-प्रसड्गतः--अन्य किसी वस्तु के प्रति आसक्ति से; योषित्-सड्जात्--स्त्रियों के प्रति आसक्ति से;यथा--जिस तरह; पुंसः--मनुष्य का; यथा--जिस तरह; तत्-सड्लि--स्त्रियों के इच्छुक पुरुषों के; सड़त:--साथसे
अन्य किसी वस्तु के प्रति आसक्ति से उत्पन्न मुग्धता तथा बन्धन उतने पूर्ण नहीं होतेजितने कि किसी स्त्री के प्रति आसक्ति से या उन व्यक्तियों के साथ से जो स्त्रियों के'कामी रहते हैं।
प्रजापति: स्वां दुहितरं दृष्टा तद्रूपधर्षित: ।
रोहिद्धूतां सोउन्वधावहक्षरूपी हतत्रप: ॥
३६॥
प्रजा-पति: --ब्रह्माजी ने; स्वामू--अपनी; दुहितरम्--पुत्री को; दृष्टा--देखकर; तत्-रूप--उसके लावण्य से;धर्षित:--मोहित; रोहित्-भूताम्--मृगी के रूप में; सः--वह; अन्वधावत्--दौड़ा; ऋक्ष-रूपी --मृग के रूप में;हत--विहीन; त्रप:--लज्जा |
ब्रह्मा अपनी पुत्री को देखकर उसके रूप पर मोहित हो गये और जब उसने मृगी कारूप धारण कर लिया तो वे मृग रूप में निर्लज्ञतापूर्वक उसका पीछा करने लगे।
तत्सृष्टसृष्टसृष्टेपु को न््वखण्डितधी: पुमान् ।
ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥
३७॥
तत्ू--ब्रहा द्वारा; सृष्ट-सृष्ट-सूष्टेपु-- समस्त उत्पन्न जीवों में से; क:ः--कौन; नु--निस्सन्देह; अखण्डित--विपथ नहोने वाली; धी:--बुद्धि वाला; पुमान्ू--पुरुष; ऋषिम्--ऋषि; नारायणम्ू--नारायण; ऋते--के अतिरिक्त; योषितू -मय्या--स्त्री के रूप में; इह--यहाँ; मायया--माया के द्वारा।
ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न समस्त जीवों--अर्थात् मनुष्य, देवता तथा पशु में से ऋषि नारायणके अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा नहीं है, जो स्त्री रूपी माया के आकर्षण के प्रति निश्चेष्ट हो।
बल॑ मे पश्य मायाया: स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् ।
या करोति पदाक्रान्तान्धूविजृम्भेण केवलम् ॥
३८ ॥
बलमू--शक्ति; मे--मेरा; पश्य--देखो; मायाया: --माया का; स्त्री-मय्या:--स्त्री के रूप में; जयिन:--विजेता;दिशाम्--सभी दिशाओं का; या--जो; करोति--करती है; पद-आक्रान्तान्ू--उसके पीछे-पीछे; भ्रूवि--उसकी भौंहकी; जृम्भेण--गति से; केवलम्--केवल |
तनिक स्त्री रूपी मेरी माया की अपार शक्ति को समझने का प्रयत्न तो करो, जो मात्रअपनी भौहों की गति से संसार के बड़े से बड़े विजेताओं को भी अपनी मुट्ठी में रखतीहै।
ज्नार्ग सतिश ज्प्ट टतिटास्स में गोसे यनेत्म टफ्शास्त पाप्त हैं ज्ताँ पात्म सान स़ि्तेता स्मिस्यी" सड् न कुर्यात्प्रमदासु जातुयोगस्य पारं परमारुरुक्षु: ।
मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभोबदन्ति या निरयद्वारमस्य ॥
३९॥
सड़म्--संगति; न--नहीं; कुर्यात्ू--करे; प्रमदासु--स्त्रियों की; जातु--कभी भी; योगस्थ--योग की; पारम्--पराकाष्ठा; परमू--सर्वोच्च; आरुरुक्षु:--पहुँचने की इच्छा करने वाला; मत्-सेवया--मेरी सेवा करके; प्रतिलब्ध--प्राप्त; आत्म-लाभ:--आत्म-साक्षात्कार; वदन्ति--कहते हैं; या:--जो स्त्रियाँ; निरय--नरक का; द्वारमू-द्वार;अस्य--आगे बढ़ने वाले भक्त का।
जो योग की पराकाष्ठा को प्राप्त करना चाहता हो तथा जिसने मेरी सेवा करकेआत्म-साक्षात्कार कर लिया हो उसे चाहिए कि वह कभी किसी आकर्षक स्त्री कीसंगति न करे, क्योंकि शास्त्रों में घोषणा की गई है कि प्रगतिशील के लिए ऐसी स्त्रीनरक के द्वार तुल्य है।
योपयाति शनैर्माया योषिद्देवविनिर्मिता ।
तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणे: कूपमिवावृतम् ॥
४० ॥
या--जो; उपयाति--निकट आती है; शनै:ः--धीरे-धीरे; माया--माया स्वरूपा; योषित्--स्त्री; देव-- भगवान् द्वारा;विनिर्मिता--उत्पन्न; तामू--उसको; ईक्षेत--मानना चाहिए; आत्मन:ः --आत्मा की; मृत्युम्--मृत्यु; तृणैः--घास से;कूपम्--कुआँ; इब--सहश; आवृतम्--ढका हुआ।
भगवान् द्वारा उत्पन्न स्त्री माया स्वरूपा है और जो ऐसी माया की सेवाएँ स्वीकारकरके उसकी संगति करता है उसे यह भलीभाँति समझ लेना चाहिए कि यह घास सेढके हुए अंधे कुएँ के समान उसकी मृत्यु का मार्ग है।
यां मन्यते पतिं मोहान्मन्मायामृषभायतीम् ।
स्त्रीत्वं स्त्रीसड्रतः प्राप्तो वित्तापत्यगृहप्रदम् ॥
४१॥
याम्--जिसको; मन्यते--वह सोचती है; पतिम्ू--अपना पति; मोहात्ू--मोहवश; मत्-मायाम्--मेरी माया; ऋषभ--पुरुष रूप में; आयतीम्--आती हुई; स्त्रीत्वम्-स्त्री बनने की दशा, स्त्रीत्व; स्त्री-सड्रत:ः--किसी स्त्री की संगति से;प्राप्त: --प्राप्त; वित्त--सम्पत्ति; अपत्य--सन्तान; गृह--घर; प्रदम्--प्रदान करने वाला
पूर्व जीवन में स्त्री-आसक्ति के कारण जीव स्त्री का रूप प्राप्त करता है मूर्खतावशमाया को अपना पति मानकर उसे ही सम्पत्ति, सन््तान, घर तथा अन्य भौतिक साज-समान देने वाला समझता है।
तामात्मनो विजानीयात्पत्यपत्यगृहात्मकम् ।
दैवोपसादितं मृत्युं मृगयोर्गायनं यथा ॥
४२॥
तामू-- भगवान् की माया को; आत्मन: --अपना; विजानीयात्-- जाने; पति--स्वामी; अपत्य--संतान; गृह--घर;आत्मकमू--से युक्त; दैव-- भगवान् की कृपा से; उपसादितम्--लाई हुई; मृत्युम्--मृत्यु; मृगयो:--बहेलिया,शिकारी का; गायनम्-गाते हुए; यथा-- जिस प्रकार।
अतएव स्त्री को अपने पति, घरबार और अपने बच्चों को उसकी मृत्यु के लिएभगवान् की बहिरंगा शक्ति की व्यवस्था के रूप में मानना चाहिए।
ठीक उसी तरह जैसेशिकारी की मधुर तान हिरन के लिए मृत्यु होती है।
देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् ।
भुज्जान एवं कर्माणि करोत्यविरतं पुमान् ॥
४३॥
देहेन--शरीर के कारण; जीव-भूतेन--जीव द्वारा अधिकृत; लोकात्--एक लोक से; लोकम्--दूसरे लोक को;अनुब्रजन्--घूमते हुए; भुज्ञान: -- भोग करते हुए; एव--इस प्रकार; कर्माणि--सकाम कर्म; करोति--करता है;अविरतम्--निरन्तर; पुमान्ू--जीव
विशेष प्रकार का शरीर होने के कारण भौतिकतावादी जीव अपने कर्मो के अनुसारएक लोक से दूसरे लोक में भटकता रहता है।
इसी प्रकार वह अपने आपको सकामकर्मों में लगा लेता है और निरन्तर फल का भोग करता है।
जीवो ह्ास्यानुगो देहो भूतेन्द्रियमनोमय: ।
तन्निरोधोस्य मरणमाविर्भावस्तु सम्भव: ॥
४४॥
जीव:--जीव; हि--निस्सन्देह; अस्य--उसका; अनुग: --उपयुक्त; देह:--शरीर; भूत--स्थूल तत्त्व; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ;मनः--मन; मयः--से निर्मित; तत्ू--शरीर का; निरोध: --विनाश; अस्य--जीव का; मरणम्--मृत्यु; आविर्भाव:--प्राकट्य; तु--तब; सम्भव:--जन्म |
इस प्रकार सकाम कर्मो के अनुसार जीवात्मा को मन तथा इन्द्रियों से युक्त उपयुक्तशरीर प्राप्त होता है।
जब किसी कर्म का फल चुक जाता है, तो इस अन्त को मृत्यु कहतेहैं और जब कोई फल प्रारम्भ होता है, तो उस शुभारम्भ को जन्म कहते हैं।
द्रव्योपलब्धिस्थानस्य द्रव्येक्षायोग्यता यदा ।
तत्पञ्जञत्वमहंमानादुत्पत्तिद्रव्यदर्शनम् ॥
४५॥
यथाध्ष्णोर्द्रव्यावयवर्दर्शनायोग्यता यदा ।
तदैव चक्षुषो द्रष्ट॒र्दष्टत्वायोग्यतानयो: ॥
४६॥
द्रव्य--वस्तुओं की; उपलब्धि-- अनुभूति का; स्थानस्य--स्थान का; द्रव्य--वस्तुओं की; ईक्षा-- अनुभूति का;अयोग्यता--असमर्थता; यदा--जब; तत्--वह; पदञ्जञत्वम्-मृत्यु; अहम्-मानात्---' मैं ' की भ्रान्त धारणा से;उत्पत्ति:-- जन्म; द्रव्य--शरीर; दर्शनम्--दर्शन; यथा--जिस प्रकार; अक्ष्णो:--आँखों का; द्र॒व्य--वस्तुओं का;अवयव--अंग; दर्शन--देखने की; अयोग्यता--असमर्थता; यदा--जब; तदा--तब; एव--निस्सन्देह; चक्षुष: --देखने की इन्द्रिय से; द्रष्ठ:--द्रष्टा का; द्रष्टव--देखने की शक्ति का; अयोग्यता--अपात्रता; अनयो:--इन दोनों की |
जब दृष्टि-तंत्रिका के प्रभावित होने से आँखें रंग या रूप को देखने की शक्ति खोदेती हैं, तो चक्षु-इन्द्रिय मृतप्राय हो जाती है।
तब आँख तथा दृष्टि का द्रष्टा जीव अपनीदेखने की शक्ति खो देता है।
इसी प्रकार जब भौतिक शरीर, जो वस्तुओं की अनुभूतिका स्थल है, अनुभव करना बन्द कर देता है, तो इस अयोग्यता को मृत्यु कहते हैं।
जबमनुष्य शरीर को स्व मानने लगता है, तो इसे जन्म कहते हैं।
तस्मान्न कार्य: सन्त्रासो न कार्पण्यं न सम्भ्रम: ।
बुद्ध्वा जीवगतिं धीरो मुक्तसड्रश्चेरदिह ॥
४७॥
तस्मात्--मृत्यु के कारण; न--नहीं; कार्य:--करना चाहिए; सन्व्रास:-- भय; न--नहीं ; कार्पण्यम्--कंजूसी; न--नहीं; सम्भ्रम: --लाभ के लिए उत्सकुता; बुद्ध्वा--समझ करके; जीव-गतिम्--जीव के वास्तविक प्रकृति को;धीर:--स्थिर; मुक्त-सड्भ:--आसक्ति रहित; चरेतू--चलना चाहिए; इह--इस संसार में |
अतः मनुष्य को न तो मृत्यु को भयभीत होकर देखना चाहिए, न शरीर को आत्मामानना चाहिए, न ही जीवन की आवश्यकताओं के शारीरिक भोग को बढ़ा-चढ़ा करसमझना चाहिए।
जीव की असली प्रकृति को समझते हुए मनुष्य को आसक्ति से रहिततथा उद्देश्य में हढ़ होकर संसार में विचरण करना चाहिए।
सम्यग्दर्शनया बुद्ध योगवैराग्ययुक्तया ।
मायाविरचिते लोके चरेनज््यस्य कलेवरम् ॥
४८ ॥
सम्यक्-दर्शनया--सही दृष्टि से; बुद्धघा--तर्क से; योग--भक्ति से; बैराग्य--विरक्ति से; युक्तया--समन्वित, युक्त;माया-विरचिते--माया द्वारा व्यवस्थित; लोके--इस संसार में; चरेत्ू--चलना फिरना चाहिए; न्यस्य--गिरवी करके;कलेवरम्--शरीर को
सही-सही दृष्टि से युक्त तथा भक्ति से पुष्ट होकर एवं भौतिक पहचान के प्रतिनिराशावादी दृष्टिकोण से समन्वित होकर मनुष्य को तर्क द्वारा अपना शरीर इस मायामयसंसार को गिरवी कर देनी चाहिए।
इस तरह वह इस जगत से अपना सम्बन्ध छुड़ासकता है।
