← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची

अध्याय सात: विदुर द्वारा आगे की पूछताछ

3.7श्रीशुक उबाचएवं ब्रुवाण मैत्रेयं द्वैवायनसुतो बुध: ।

प्रीणयन्निवभारत्या विदुर: प्रत्यभाषत ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; ब्रुवाणम्‌--बोलते हुए; मैत्रेयम्‌--मैत्रेयमुनि से मैत्रेय;द्वैषायन-सुत:ः--द्वैपायन का पुत्र; बुध:--विद्वान; प्रीणयन्‌--अच्छे लगने वाले ढंग से; इब--मानो; भारत्या--अनुरोध के रूपमें; बिदुर: --विदुर ने; प्रत्यभाषत--व्यक्त किया।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, जब महर्षि मैत्रेय इस प्रकार से बोल रहे थे तोद्वैपायन व्यास के दिद्वान पुत्र विदुर ने यह प्रश्न पूछते हुए मधुर ढंग से एक अनुरोध व्यक्त किया।

विदुर उवाचब्रह्मन्क थ॑ भगवतश्रिन्मात्रस्थाविकारिण: ।

लीलया चापि युज्येरन्निर्गुणस्य गुणा: क्रिया: ॥

२॥

विदुरः उवाच--विदुर ने कहा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; कथम्‌--कैसे; भगवतः -- भगवान्‌ का; चित्‌-मात्रस्य--पूर्ण आध्यात्मिकका; अविकारिण:--अपरिवर्तित का; लीलया--अपनी लीला से; च--अथवा; अपि--यद्यपि यह ऐसा है; युज्येरनू--घटितहोती हैं; निर्गुणस्थ--वह जो भौतिक गुणों से रहित है; गुणा:--प्रकृति के गुण; क्रिया:--कार्यकलाप |

श्री विदुर ने कहा : हे महान्‌ ब्राह्मण, चूँकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ संपूर्ण आध्यात्मिकसमष्टि हैं और अविकारी हैं, तो फिर वे प्रकृति के भौतिक गुणों तथा उनके कार्यकलापों से किसतरह सम्बन्धित हैं? यदि यह उनकी लीला है, तो फिर अविकारी के कार्यकलाप किस तरहघटित होते हैं और प्रकृति के गुणों के बिना गुणों को किस तरह प्रदर्शित करते हैं ?

क्रीडायामुद्यमो$र्भस्य कामश्चिक्रीडिषान्यत: ।

स्वतस्तृप्तस्थ च कं निवृत्तस्य सदान्यत: ॥

३॥

क्रीडायाम्‌--खेलने के मामले में; उद्यम: --उत्साह; अर्भस्य--बालकों का; काम: --इच्छा; चिक्रीडिषा--खेलने के लिए इच्छा;अन्यतः--अन्य बालकों के साथ; स्वतः-तृप्तस्य--जो आत्मतुष्ट है उसके लिए; च--भी; कथम्‌--किस लिए; निवृत्तस्थ--विरक्त; सदा--सदैव; अन्यतः--अन्यथा |

बालक अन्य बालकों के साथ या विविध क्रीड़ाओं में खेलने के लिए उत्सुक रहते हैं,क्योंकि वे इच्छा द्वारा प्रोत्साहित किये जाते हैं।

किन्तु भगवान्‌ में ऐसी इच्छा की कोई सम्भावनानहीं होती, क्योंकि वे आत्म-तुष्ट हैं और सदैव हर वस्तु से विरक्त रहते हैं।

अस््राक्षीद्धगवान्विश्व॑ं गुणमय्यात्ममायया ।

तया संस्थापयत्येतद्धूय: प्रत्यपिधास्यति ॥

४॥

अस्त्राक्षीत्‌-उत्पन्न कराया; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; गुण-मय्या-- भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से समन्वित;आत्म--अपनी; मायया--शक्ति द्वारा; तया--उसके द्वारा; संस्थापयति--पालन करता है; एतत्‌--ये सब; भूय:--तब पुनः;प्रत्यू-अपिधास्यति--उल्टे विलय भी करता है।

भगवान्‌ ने प्रकृति के तीन गुणों की स्वरक्षित शक्ति द्वारा इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि कराई।

वेउसी के द्वारा सृष्टि का पालन करते हैं और उल्टे पुन: पुनः: उसका विलय भी करते हैं।

देशतः कालतो योसाववस्थातः स्वतोउन्यतः ।

अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम्‌ ॥

५॥

देशतः--परिस्थितिवश; कालतः--काल के प्रभाव से; यः--जो; असौ--जीव; अवस्थात:--स्थिति से; स्वतः --स्वप्न से;अन्यतः--अन्यों द्वारा; अविलुप्त--लुप्त; अवबोध--चेतना; आत्मा--शुद्ध आत्मा; सः--वह; युज्येत--संलग्न; अजया--अज्ञान द्वारा; कथम्‌--यह ऐसा किस तरह है।

शुद्ध आत्मा विशुद्ध चेतना है और वह परिस्थितियों, काल, स्थितियों, स्वप्नों अथवा अन्यकारणों से कभी भी चेतना से बाहर नहीं होता।

तो फिर वह अविद्या में लिप्त क्‍यों होता है ?

भगवानेक एवैष सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः ।

अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभि: कुतः ॥

६॥

भगवान्‌-- भगवान्‌; एक:--एकमात्र; एव एष: --ये सभी; सर्व--समस्त; क्षेत्रेषु--जीवों में; अवस्थित:--स्थित; अमुष्य--जीवों का; दुर्भगत्वमू-दुर्भाग्य; वा--या; क्लेश:--कष्ट; वा--अथवा; कर्मभि:--कार्यो द्वारा; कुतः--किसलिए।

भगवान्‌ परमात्मा के रूप में हर जीव के हृदय में स्थित रहते हैं।

तो फिर जीवों के कर्मों सेदुर्भाग्य तथा कष्ट क्यों प्रतिफलित होते हैं ?

एतस्मिन्मे मनो विद्वन्खिद्यतेञज्ञानसड्डूटे ।

तन्नः पराणुद विभो कश्मलं मानसं महत्‌ ॥

७॥

एतस्मिनू--इसमें; मे--मेरा; मन:--मन; विद्वनू--हे विद्वान; खिद्यते--कष्ट दे रहा है; अज्ञान--अविद्या; सड्डुटे--संकट में;तत्‌--इसलिए; न:ः--मेरा; पराणुद--स्पष्ट कीजिये; विभो--हे महान्‌; कश्मलम्‌--मोह; मानसम्‌--मन विषयक; महतू--महान्‌।

हे महान्‌ एवं विद्वान पुरुष, मेरा मन इस अज्ञान के संकट द्वारा अत्यधिक मोहग्रस्त है,इसलिए मैं आप से प्रार्थना करता हूँ कि आप इसको स्पष्ट करें।

श्रीशुक उबाचस इत्थं चोदित: क्षत्ना तत्त्वजिज्ञासुना मुनि: ।

प्रत्याह भगवच्चित्त: स्मयन्निव गतस्मय: ॥

८॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह ( मैत्रेय मुनि ); इत्थम्‌--इस प्रकार; चोदित: --विश्षुब्ध किये जानेपर; क्षत्रा--विदुर द्वारा; तत्त्व-जिज्ञासुना--सत्य जानने के लिए पूछताछ करने के इच्छुक व्यक्ति द्वारा, जिज्ञासु द्वारा; मुनिः--मुनि ने; प्रत्याह--उत्तर दिया; भगवतू-चित्त:--ईशभावनाभावित; स्मयन्‌--आश्चर्य करते हुए; इब--मानो; गत-स्मय: --हिचकके बिना।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, इस तरह जिज्ञासु विदुर द्वारा विक्षुब्ध किये गयेमैत्रेय सर्वप्रथम आश्चर्यचकित प्रतीत हुए, किन्तु इसके बाद उन्होंने बिना किसी हिचक के उन्हेंउत्तर दिया, क्‍योंकि वे पूर्णरूपेण ईशभावनाभावित थे।

मैत्रेय उवाचसेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुध्यते ।

ईश्वरस्य विमुक्तस्य कार्पण्यमुत बन्धनम्‌ ॥

९॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; सा इयम्‌--ऐसा कथन; भगवत:-- भगवान्‌ की; माया--माया; यत्‌--जो; नयेन--तर्क द्वारा;विरुध्यते--विरोधी बन जाता है; ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ का; विमुक्तस्थ--नित्य मुक्त का; कार्पण्यम्‌--अपर्याप्तता; उत--क्याकहा जाय, जैसा भी; बन्धनम्‌--बन्धन

श्री मैत्रेय ने कहा : कुछ बद्धजीव यह सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं कि परब्रह्म या भगवान्‌ को माया द्वारा जीता जा सकता है, किन्तु साथ ही उनका यह भी मानना है कि वे अबद्ध हैं।

यहसमस्त तर्क के विपरित है।

यदर्थन विनामुष्य पुंस आत्मविपर्यय: ।

प्रतीयत उपद्रष्ट: स्वशिरश्छेदनादिक: ॥

१०॥

यत्‌--इस प्रकार; अर्थन--अभिप्राय या अर्थ; विना--बिना; अमुष्य--ऐसे; पुंसः:--जीव का; आत्म-विपर्यय:-- आत्म-पहचानके विषय में विभ्रमित; प्रतीयते--ऐसा लगता है; उपद्रष्ट:--उथले द्रष्टा का; स्व-शिर:--अपना सिर; छेदन-आदिक:--काटलेना।

जीव अपनी आत्म-पहचान के विषय में संकट में रहता है।

उसके पास वास्तविक पृष्ठभूमिनहीं होती, ठीक उसी तरह जैसे स्वप्न देखने वाला व्यक्ति यह देखे कि उसका सिर काट लियागया है।

यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुण: ।

हृश्यतेसन्नपि द्रष्टरात्मनो उनात्मनो गुण: ॥

११॥

यथा--जिस तरह; जले--जल में; चन्द्रमस: --चन्द्रमा का; कम्प-आदि: --कम्पन इत्यादि; तत्‌-कृत:--जल द्वारा किया गया;गुण:--गुण; दृश्यते--इस तरह दिखता है; असन्‌ अपि--बिना अस्तित्व के; द्रष्ट:--द्रष्टा का; आत्मन:--आत्मा का;अनात्मन:--आत्मा के अतिरिक्त अन्य का; गुण:--गुण |

जिस तरह जल में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा जल के गुण से सम्बद्ध होने के कारण देखने वालेको हिलता हुआ प्रतीत होता है उसी तरह पदार्थ से सम्बद्ध आत्मा पदार्थ के ही समान प्रतीत होताहै।

स वी निवृत्तिधमेंण वासुदेवानुकम्पया ।

भगवद्धक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥

१२॥

सः--वह; वै-- भी; निवृत्ति--विरक्ति; धर्मेण-- संलग्न रहने से; वासुदेव-- भगवान्‌ की; अनुकम्पया--कृपा से; भगवत्‌ --भगवान्‌ के सम्बन्ध में; भक्ति-योगेन-- जुड़ने से; तिरोधत्ते--कम होती है; शनैः--क्रमश:; इह--इस संसार में |

किन्तु आत्म-पहचान की उस भ्रान्ति को भगवान्‌ वासुदेव की कृपा से विरक्त भाव सेभगवान्‌ की भक्तिमय सेवा की विधि के माध्यम से धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।

यदेन्द्रियोपरामोथ द्रष्टात्मनि परे हरौ ।

विलीयन्ते तदा क्लेशा: संसुप्तस्येव कृत्सनश: ॥

१३॥

यदा--जब; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; उपराम: --तृप्त; अथ--इस प्रकार; द्रष्ट-आत्मनि--द्रष्टा या परमात्मा के प्रति; परे--अध्यात्म में;हरौ--भगवान्‌ में; विलीयन्ते--लीन हो जाती है; तदा--उस समय; क्लेशा:--कष्ट; संसुप्तस्य--गहरी नींद का भोग कर चुकाव्यक्ति; इब--सहश; कृत्स्नश:--पूर्णतया |

जब इन्द्रियाँ द्रष्टा-परमात्मा अर्थात्‌ भगवान्‌ में तुष्ट हो जाती है और उनमें विलीन हो जाती है,तो सारे कष्ट उसी तरह पूर्णतया दूर हो जाते हैं जिस तरह ये गहरी नींद के बाद दूर हो जाते हैं।

अशेषसड्क्लेशशमं विधत्ते गुणानुवादश्रवर्णं मुरारे: ।

कि वा पुनस्तच्चरणारविन्दपरागसेवारतिरात्मलब्धा ॥

१४॥

अशेष--असीम; सड्क्लेश--कष्टमय स्थिति; शमम्‌--शमन; विधत्ते--सम्पन्न कर सकता है; गुण-अनुवाद--दिव्य नाम, रूप,गुण, लीला, पार्षद तथा साज-सामग्री इत्यादि का; श्रवणम्‌--सुनना तथा कीर्तन करना; मुरारे: --मुरारी ( श्रीकृष्ण ) का; किम्‌वा--और अधिक क्‍या कहा जाय; पुनः--फिर; तत्‌--उसके; चरण-अरविन्द--चरणकमल; पराग-सेवा --सुगंधित धूल कीसेवा के लिए; रतिः--आकर्षण; आत्म-लब्धा--जिन्होंने ऐसी आत्म-उपलब्धि प्राप्त कर ली है।

भगवान्‌ श्रीकृष्ण के दिव्य नाम, रूप इत्यादि के कीर्तन तथा श्रवण मात्र से मनुष्य कीअसीम कष्टप्रद अवस्थाएँ शमित हो सकती हैं।

अतएव उनके विषय में क्या कहा जाये, जिन्होंनेभगवान्‌ के चरणकमलों की धूल की सुगंध की सेवा करने के लिए आकर्षण प्राप्त कर लियाहो?

विदुर उवाचसज्छिन्न: संशयो मह्यं तव सूक्तासिना विभो ।

उभयत्रापि भगवन्मनो मे सम्प्रधावति ॥

१५॥

विदुर: उवाच--विदुर ने कहा; सज्छिन्न:--कटे हुए; संशय:--सन्देह; महाम्‌--मेरे; तव--तुम्हारे; सूक्त-असिना--विश्वसनीयशब्द रूपी हथियार से; विभो--हे प्रभु; उभयत्र अपि--ई श्र तथा जीव दोनों में; भगवन्‌--हे शक्तिमान; मन: --मन; मे--मेरा;सम्प्रधावति--पूरी तरह प्रवेश करता है।

विदुर ने कहा : हे शक्तिशाली मुनि, मेरे प्रभु, आपके विश्वसनीय शब्दों से पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ तथा जीवों से सम्बन्धित मेरे सारे संशय अब दूर हो गये हैं।

अब मेरा मन पूरी तरह सेउनमें प्रवेश कर रहा है।

साध्वेतद्व्याहतं विद्वन्नात्ममायायनं हरे: ।

आभात्यपार्थ निर्मूलं विश्वमूलं न यद्वहि: ॥

१६॥

साधु--उतनी अच्छी जितनी कि होनी चाहिए; एतत्‌--ये सारी व्याख्याएँ; व्याहतम्‌--इस तरह कही गई; विद्वनू--हे विद्वान;न--नहीं; आत्म--आत्मा; माया--शक्ति; अयनम्‌--गति; हरेः-- भगवान्‌ की; आभाति-- प्रकट होती है; अपार्थम्‌--बिना अर्थके, निरर्थक; निर्मूलमू--बिना किसी आधार के, निराधार; विश्व-मूलम्‌-- भगवान्‌ जिसका उद्गम है; न--नहीं; यत्‌--जो;बहिः--बाहरी |

हे विद्वान महर्षि, आपकी व्याख्याएँ अति उत्तम हैं जैसी कि उन्हें होना चाहिए।

बद्धजीव केविक्षोभों का आधार भगवान्‌ की बहिरंगा शक्ति की गतिविधि के अलावा कुछ भी नहीं ।

यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः ।

तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जन: ॥

१७॥

यः--जो; च--भी; मूढ-तमः --निकृष्टतम मूर्ख; लोके --संसार में; यः च--तथा जो; बुद्धेः--बुद्धि का; परम्‌--दिव्य;गतः--गया हुआ; तौ--उन; उभौ--दोनों; सुखम्‌--सुख; एथेते-- भोगते हैं; क्लिशयति--कष्ट पाते हैं; अन्तरित:--बीच मेंस्थित; जन:--लोग।

निकृष्ठतम मूर्ख तथा समस्त बुद्धि के परे रहने वाले दोनों ही सुख भोगते हैं, जबकि उनकेबीच के व्यक्ति भौतिक क्लेश पाते हैं।

अर्थाभावं विनिश्ित्य प्रतीतस्यापि नात्मन: ।

तां चापि युष्मच्चरणसेवयाहं पराणुदे ॥

१८॥

अर्थ-अभावम्‌--बिना सार के; विनिश्चित्य--सुनिश्चित करके; प्रतीतस्य--बाह्य मूल्यों का; अपि-- भी; न--कभी नहीं;आत्मन:--आत्मा का; तामू--उसे; च-- भी; अपि--इस तरह; युष्मत्‌-- तुम्हारे; चरण--पाँव की; सेवया--सेवाद्वारा; अहम्‌--मैं; पराणुदे--त्याग सकूँगा किन्तु

हे महोदय, मैं आपका कृतज्ञ हूँ, क्योंकि अब मैं समझ सकता हूँ कि यह भौतिक जगत साररहित है यद्यपि यह वास्तविक प्रतीत होता है।

मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके चरणोंकी सेवा करने से मेरे लिए इस मिथ्या विचार को त्याग सकना सम्भव हो सकेगा।

यत्सेवया भगवतः कूटस्थस्य मधुद्विष: ।

रतिरासो भवेत्तीत्र: पादयोव्यसनार्दन: ॥

१९॥

यत्‌--जिसको; सेवया--सेवा द्वारा; भगवत:ः -- भगवान्‌ का; कूट-स्थस्य--अपरिवर्तनीय का; मधु-द्विष: --मधु असुर का शत्रु;रति-रास:--विभिन्न सम्बश्धों में अनुरक्ति; भवेत्‌--उत्पन्न होती है; तीब्र:--अत्यन्त भावपूर्ण; पादयो: --चरणों की; व्यसन--क्लेश; अर्दन:--नष्ट करनेवाले

गुरु के चरणों की सेवा करने से मनुष्य उन भगवान्‌ की सेवा में दिव्य भावानुभूति उत्पन्नकरने में समर्थ होता है, जो मधु असुर के कूटस्थ शत्रु हैं और जिनकी सेवा से मनुष्य के भौतिकक्लेश दूर हो जाते हैं।

दुरापा ह्ल्पतपस: सेवा बैकुण्ठवर्त्मसु ।

यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दन: ॥

२०॥

दुरापा--दुर्लभ; हि--निश्चय ही; अल्प-तपस:--अल्प तपस्या वाले की; सेवा--सेवा; वैकुण्ठ--ईश्वर के धाम के; वर्त्मसु--मार्ग पर; यत्र--जिसमें; उपगीयते--महिमा गाई जाती है; नित्यमू--सदैव; देव--देवताओं के ; देव: --स्वामी; जन-अर्दन:--जीवों के नियन्ता |

जिन लोगों की तपस्या अत्यल्प है वे उन शुद्ध भक्तों की सेवा नहीं कर पाते हैं जो भगवद्धामअर्थात्‌ वैकुण्ठ के मार्ग पर अग्रसर हो रहे होते हैं।

शुद्धभक्त शत प्रतिशत उन परम प्रभु कीमहिमा के गायन में लगे रहते हैं, जो देवताओं के स्वामी तथा समस्त जीवों के नियन्ता हैं।

सृष्ठाग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात्‌ ।

तेभ्यो विराजमुद्धृत्य तमनु प्राविशद्विभु; ॥

२१॥

सृष्ठा--सृष्टि करके; अग्रे--प्रारम्भ में; महत्‌-आदीनि--सम्पूर्ण भौतिक शक्ति आदि की; स-विकाराणि--इन्द्रिय विषयों सहित;अनुक्रमात्‌--विभेदन की क्रमिक विधि द्वारा; तेभ्य:--उसमें से; विराजम्‌--विराट रूप; उद्धृत्य--प्रकट करके; तम्‌--उसमें ;अनु--बाद में; प्राविशत्‌-- प्रवेश किया; विभुः--परमेश्वर ने

सम्पूर्ण भौतिक शक्ति अर्थात्‌ महत्‌ तत्त्व की सृष्टि कर लेने के बाद तथा इन्द्रियों और इन्द्रियविषयों समेत विराट रूप को प्रकट कर लेने पर परमेश्वर उसके भीतर प्रविष्ट हो गये।

यमाहुराद्य॑ पुरुष सहस्त्राइट्यूरूबाहुकम्‌ ।

यत्र विश्व इमे लोकाः सविकाशं त आसते ॥

२२॥

यम्‌--जो; आहुः--कहलाता है; आद्यम्‌ू--आदि; पुरुषम्‌--विराट जगत का अवतार; सहस्त्र--हजार; अड्प्रि--पाँव; ऊरू--जंघाएँ; बाहुकम्‌--हाथ; यत्र--जिसमें; विश्व: --ब्रह्माण्ड; इमे--ये सब; लोकाः--लोक; स-विकाशम्‌-- अपने-अपनेविकासों के साथ; ते--वे सब; आसते--रह रहे हैं।

कारणार्णव में शयन करता पुरुष अवतार भौतिक सृष्टियों में आदि पुरुष कहलाता है औरउनके विराट रूप में जिसमें सारे लोक तथा उनके निवासी रहते हैं, उस पुरुष के कई-कई हजारहाथ-पाँव होते हैं।

यस्मिन्द्शविध: प्राण: सेन्द्रियार्थन्द्रियस्त्रिवृत्‌ ।

त्वयेरितो यतो वर्णास्तद्विभूतीर्वदस्व नः ॥

२३॥

यस्मिनू--जिसमें; दश-विध: --दस प्रकार की; प्राण:--प्राणवायु; स--सहित; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; अर्थ--रुचि; इन्द्रियः--इन्द्रियों की; त्रि-वृतू--जीवनी शक्ति ( बल ) के तीन प्रकार; त्वया--आपके द्वारा; ईरित:--विवेचित; यत:--जिससे; वर्णा: --चार विभाग; ततू-विभूती:--पराक्रम; वदस्व-- कृपया वर्णन करें; न:--मुझसे |

हे महान्‌ ब्राह्मण, आपने मुझे बताया है कि विराट रूप तथा उनकी इन्द्रियाँ, इन्द्रिय विषयतथा दस प्रकार के प्राण तीन प्रकार की जीवनीशक्ति के साथ विद्यमान रहते हैं।

अब, यदि आपचाहें तो कृपा करके मुझे विशिष्ट विभागों ( वर्णों ) की विभिन्न शक्तियों का वर्णन करें।

यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभि: सह गोत्रजै: ।

प्रजा विचित्राकृतव आसन्याभिरिदं ततम्‌ ॥

२४॥

यत्र--जिसमें; पुत्रैः--पुत्रों; च--तथा; पौत्रै: --पौत्रों; च-- भी; नप्तृभि:--नातियों; सह--के सहित; गोत्र-जैः--एक हीपरिवार की; प्रजा:--सन्‍्तानें; विचित्र--विभिन्न प्रकार की; आकृतय:--इस तरह से की गई; आसन्‌ू--है; याभि:--जिससे;इदम्‌--ये सारे लोक; ततम्‌--विस्तार करते हैं।

हे प्रभु, मेरे विचार से पुत्रों, पौत्रों तथा परिजनों के रूप में प्रकट शक्ति ( बल ) सारे ब्रह्माण्ड में विभिन्न रूपों तथा योनियों में फैल गयी है।

प्रजापतीनां स पतिश्वक्रिपे कान्प्रजापतीन्‌ ।

सर्गश्चिवानुसर्गाश्च मनून्मन्वन्तराधिपान्‌ ॥

२५॥

प्रजा-पतीनाम्‌--ब्रह्मा इत्यादि देवताओं के; सः--वह; पतिः--अग्रणी ; चक़िपे--निश्चय किया; कान्‌--जिस किसी को;प्रजापतीन्‌--जीवों के पिताओं; सर्गानू--सनन्‍्तानें; च-- भी; एव--निश्चय ही; अनुसर्गान्‌--बाद की सनन्‍्तानें; च-- भी; मनून्‌--मनुओं को; मन्वन्तर-अधिपान्‌--तथा ऐसों के परिवर्तन |

हे विद्वान ब्राह्मण, कृपा करके बतायें कि किस तरह समस्त देवताओं के मुखिया प्रजापतिअर्थात्‌ ब्रह्मा ने विभिन्न युगों के अध्यक्ष विभिन्न मनुओं को स्थापित करने का निश्चय किया।

कृपा करके मनुओं का भी वर्णन करें तथा उन मनुओं की सन्‍्तानों का भी वर्णन करें।

उपर्यधश्च ये लोका भूमेर्मित्रात्मजासते ।

तेषां संस्थां प्रमाणं च भूलोकस्य च वर्णय ॥

२६॥

उपरि--सिर पर; अध: --नीचे; च-- भी; ये--जो; लोका:--लोक; भूमे:--पृथ्बी के; मित्र-आत्मज--हे मित्रा के पुत्र ( मैत्रेयमुनि ); आसते--विद्यमान हैं; तेषामू--उनके; संस्थाम्‌--स्थिति; प्रमाणम्‌ च--उनकी माप भी; भूः-लोकस्य--पृथ्वी लोकोंका; च--भी; वर्णय--वर्णन कीजिये।

हे मित्रा के पुत्र, कृपा करके इस बात का वर्णन करें कि किस तरह पृथ्वी के ऊपर के तथाउसके नीचे के लोक स्थित हैं और उनकी तथा पृथ्वी लोकों की प्रमाप का भी उल्लेख करें।

तिर्यड्मानुषदेवानां सरीसृपपतत्त्रिणाम्‌ ।

बद नः सर्गसंव्यूहं गार्भस्वेदद्विजोद्धिदाम्‌ ॥

२७॥

तिर्यक्‌ू--मानवेतर; मानुष--मानव प्राणी; देवानामू--अतिमानव प्राणियों या देवताओं का; सरीसृप--रेंगने वाले प्राणी;पतत्रिणाम्‌--पक्षियों का; वद--कृपया वर्णन करें; न:--मुझसे; सर्ग--उत्पत्ति; संव्यूहमू--विशिष्ट विभाग; गार्भ--गर्भस्थ;स्वेद--पसीना; ट्विज--द्विजन्मा; उद्धिदामू--लोकों आदि का।

कृपया जीवों का विभिन्न विभागों के अन्तर्गत यथा मानवेतर, मानव, भ्रूण से उत्पन्न, पसीनेसे उत्पन्न, द्विजन्मा ( पक्षी ) तथा पौधों एवं शाकों का भी वर्णन करें।

कृपया उनकी पीढ़ियों तथाउपविभाजनों का भी वर्णन करें।

गुणावतारेर्विश्वस्य सर्गस्थित्यप्यया भ्रयम्‌ ।

सृजत: श्रीनिवासस्य व्याचक्ष्वोदारविक्रमम्‌ ॥

२८ ॥

गुण--प्रकृति के गुणों के; अवतारैः--अवतारों का; विश्वस्य--ब्रह्माण्ड के; सर्ग--सृष्टि; स्थिति--पालन; अप्यय--संहार;आश्रयम्‌--तथा चरम विश्राम; सृजतः--स्त्रष्टा का; श्रीनिवासस्थ-- भगवान्‌ का; व्याचक्ष्व--कृपया वर्णन करें; उदार--उदार;विक्रमम्‌--विशिष्ट कार्यकलाप |

कृपया प्रकृति के गुणावतारों-ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर-का भी वर्णन करें।

कृपया पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ के अवतार तथा उनके उदार कार्यकलापों का भी वर्णन करें।

वर्णाश्रमविभागां श्र रूपशीलस्वभावत: ।

ऋषीणां जन्मकर्माणि वेदस्य च विकर्षणम्‌ ॥

२९॥

वर्ण-आश्रम--सामाजिक पदों तथा आध्यात्मिक संस्कृति के चार विभाग; विभागान्‌ू--पृथक्‌ -पृथक्‌ विभागों; च--भी;रूप--निजी स्वरूप; शील-स्वभावत: --निजी चरित्र; ऋषीणाम्‌--ऋषियों के; जन्म--जन्म; कर्माणि--कार्यकलाप;वेदस्य--वेदों के; च--तथा; विकर्षणम्‌--कोटियों में विभाजन

हे महर्षि, कृपया मानव समाज के वर्णों तथा आश्रमों के विभाजनों का वर्णन उनकेलक्षणों, स्वभाव तथा मानसिक संतुलन एवं इन्द्रिय नियंत्रण के स्वरूपों के रूप के अनुसारकरें।

कृपया महर्षियों के जन्म तथा वेदों के कोटि-विभाजनों का भी वर्णन करें।

यज्ञस्थ च वितानानि योगस्य च पथः प्रभो ।

नैष्कर्म्यस्थ च साड्ख्यस्य तन्त्रं वा भगवत्स्पृतम्‌ ॥

३०॥

यज्ञस्य--यज्ञों का; च--भी; वितानानि--विस्तार; योगस्थ--योग शक्ति का; च-- भी; पथ:--मार्ग; प्रभो-हे प्रभु;नैष्कर्म्यस्थ--ज्ञान का; च--तथा; साड्ख्यस्य--वैश्लेषिक अध्ययन का; तन्त्रमू--भक्ति का मार्ग; वा--तथा; भगवत्‌--भगवान्‌ के सम्बन्ध में; स्मृतम्‌ू--विधि-विधान |

कृपया विभिन्न यज्ञों के विस्तारों तथा योग शक्तियों के मार्गों, ज्ञान के वैश्लेषिक अध्ययन( सांख्य ) तथा भक्ति-मय सेवा का उनके विधि-विधानों सहित वर्णन करें।

'पाषण्डपथवैषम्यं प्रतिलोमनिवेशनम्‌ ।

जीवस्य गतयो याश्व यावतीर्गुणकर्मजा: ॥

३१॥

पाषण्ड-पथ--अश्रद्धा का मार्ग; वैषम्यम्‌-विरोध के द्वारा अपूर्णता; प्रतिलोम--वर्णसंकर; निवेशनम्‌--स्थिति; जीवस्थ--जीवों की; गतयः--गतिविधियाँ; या: --वे जैसी हैं; च-- भी; यावती:--जितनी; गुण-- भौतिक प्रकृति के गुण; कर्म-जा:--विभिन्न प्रकार के कर्म से उत्पन्न

कृपया श्रद्धाविहीन नास्तिकों की अपूर्णताओं तथा विरोधों का, वर्णसंकरों की स्थिति तथाविभिन्न जीवों के प्राकृतिक गुणों तथा कर्म के अनुसार विभिन्न जीव-योनियों की गतिविधियोंका भी वर्णन करें।

धर्मार्थकाममोक्षाणां निमित्तान्यविरोधतः ।

वार्ताया दण्डनीतेश्व श्रुतस्य च विधि पृथक्‌ ॥

३२॥

धर्म--धार्मिकता; अर्थ--आर्थिक विकास; काम--इन्द्रियतृप्ति; मोक्षाणाम्‌--मोक्ष के; निमित्तानि--कारण; अविरोधत:--बिना विरोध के; वार्ताया:--जीविका के साधनों के सिद्धान्तों पर; दण्ड-नीतेः --कानून तथा व्यवस्था का; च-- भी; श्रुतस्थ--शास्त्र संहिता का; च-- भी; विधिम्‌ू--नियम; पृथक्‌--विभिन्न |

आप धर्म, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृष्ति तथा मोक्ष के परस्पर विरोधी कारणों का और उसीके साथ जीविका के विभिन्न साधनों, विधि की विभिन्न विधियों तथा शास्त्रों में उल्लिखितव्यवस्था का भी वर्णन करें।

श्राद्धस्य च विधि ब्रह्मन्पितृणां सर्गमेव च ।

ग्रहनक्षत्रताराणां कालावयवसंस्थितिम्‌ ॥

३३॥

श्राद्धस्य--समय-समय पर सम्मानसूचक भेंटों का; च-- भी; विधिम्‌--नियम; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; पितृणाम्‌--पूर्वजों की;सर्गम्‌ू--सृष्टि; एब--जिस तरह; च--भी; ग्रह--ग्रह प्रणाली; नक्षत्र--तारे; ताराणाम्‌--ज्योतिपिण्डों; काल--समय;अवयव-- अवधि; संस्थितिम्‌--स्थितियाँ

कृपा करके पूर्वजों के श्राद्ध के विधि-विधानों, पितृलोक की सृष्टि, ग्रहों, नक्षत्रों तथातारकों के काल-विधान तथा उनकी अपनी-अपनी स्थितियों के विषय में भी बतलाएँ।

दानस्य तपसो वापि यच्चेष्टापूर्तयो: फलम्‌ ।

प्रवासस्थस्य यो धर्मो यश्च पुंस उतापदि ॥

३४॥

दानस्य--दान का; तपसः--तपस्या का; वापि--बावड़ी; यत्‌--जो; च--तथा; इष्टा-- प्रयास; पूर्तयो: --जलाशयों का;'फलम्‌--सकाम फल; प्रवास-स्थस्य--घर से दूर रहने वाले का; य:ः--जो; धर्म:--कर्तव्य; यः च--और जो; पुंस:--मनुष्यका; उत--वर्णित; आपदि--आपत्ति में

कृपया दान तथा तपस्या का एवं जलाशय खुदवाने के सकाम फलों का भी वर्णन करें।

कृपया घर से दूर रहने वालों की स्थिति का तथा आपदग्रस्त मनुष्य के कर्तव्य का भी वर्णनकरें।

येन वा भगवांस्तुष्येद्धर्मयोनिर्जनार्दन: ।

सम्प्रसीदति वा येषामेतदाख्याहि मेडनघ ॥

३५॥

येन--जिससे; वा--अथवा; भगवान्‌-- भगवान्‌; तुष्येत्‌--तुष्ट होता है; धर्म-योनि:--समस्त धर्मों का पिता; जनार्दन:--सारेजीवों का नियन्ता; सम्प्रसीदति--पूर्णतया तुष्ट होता है; वा--अथवा; येषाम्‌ू--जिनका; एतत्‌--ये सभी; आख्याहि--कृपयावर्णन करें; मे-- मुझसे; अनघ--हे निष्पाप पुरुष

हे निष्पाप पुरुष, चूँकि समस्त जीवों के नियन्ता भगवान्‌ समस्त धर्मों के तथा धार्मिक कर्मकरने वाले समस्त लोगों के पिता हैं, अतएव कृपा करके इसका वर्णन कीजिये कि उन्हें किसप्रकार पूरी तरह से तुष्ट किया जा सकता है।

अनुव्रतानां शिष्याणां पुत्राणां च द्विजोत्तम ।

अनापृष्टमपि ब्रूयुर्गुर॒वो दीनवत्सला: ॥

३६॥

अनुव्रतानाम्‌--अनुयायियों के; शिष्याणाम्‌--शिष्यों के; पुत्राणाम्‌ू--पुत्रों के; च-- भी; द्विज-उत्तम-हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ;अनापृष्टमू--अनपूछा; अपि-- भी; ब्रूयु:--कृपया वर्णन करें; गुरवः--गुरुजन; दीन-वत्सला:--दीनों के प्रति कृपालुहे ब्राह्मणश्रेष्ठ, जो गुरुजन हैं, वे दीनों पर अत्यन्त कृपालु रहते हैं।

वे अपने अनुयायियों,शिष्यों तथा पुत्रों के प्रति सदैव कृपालु होते हैं और उनके द्वारा बिना पूछे ही सारा ज्ञान प्रदानकरते हैं।

तत्त्वानां भगवंस्तेषां कतिधा प्रतिसड्क्रम: ।

तत्रेमं क उपासीरन्क उ स्विदनुशेरते ॥

३७॥

तत्त्वानाम्‌ू--प्रकृति के तत्त्वों का; भगवनू्‌--हे महर्षि; तेषामू--उनके; कतिधा--कितने; प्रतिसड्क्रम:--प्रलय; तत्र--वहाँ;इमम्‌-- भगवान्‌ को; के --वे कौन हैं; उपासीरनू--बचाया जाकर; के--वे कौन हैं; उ--जो; स्वित्‌--कर सकती है;अनुशेरते-- भगवान्‌ के शयन करते समय सेवा।

कृपया इसका वर्णन करें कि भौतिक प्रकृति के तत्त्वों का कितनी बार प्रलय होता है औरइन प्रलयों के बाद जब भगवान्‌ सोये रहते हैं उन की सेवा करने के लिए कौन जीवित रहता है?

पुरुषस्य च संस्थान स्वरूपं वा परस्थ च ।

ज्ञानं च नैगमं यत्तदगुरुशिष्यप्रयोजनम्‌ ॥

३८॥

पुरुषस्थ--जीव का; च--भी; संस्थानम्‌--अस्तित्व; स्वरूपम्‌--पहचान; वा--या; परस्थय--परम का; च-- भी; ज्ञामम्‌--ज्ञान; च--भी; नैगमम्‌--उपनिषदों के विषय में; यत्‌--जो; तत्‌ू--वही; गुरु--गुरु; शिष्य--शिष्य; प्रयोजनम्‌-- अनिवार्यता |

जीवों तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के विषय में क्या क्‍या सच्चाइयाँ हैं ? उनके स्वरूप क्‍याक्या हैं? वेदों में ज्ञान के क्या विशिष्ट मूल्य हैं और गुरु तथा उसके शिष्यों की अनिवार्यताएँ क्‍याहैं?

निमित्तानि च तस्येह प्रोक्तान्यनघसूरिभि: ।

स्वतो ज्ञानं कुतः पुंसां भक्तिवैराग्यमेव वा ॥

३९॥

निमित्तानि--ज्ञान का स्त्रोत; च-- भी; तस्य--ऐसे ज्ञान का; इह--इस संसार में; प्रोक्तानि-- कहे गये; अनध--निष्कलंक;सूरिभिः--भक्तों द्वारा; स्वत:ः--आत्म-निर्भर; ज्ञाममू--ज्ञान; कुतः--कैसे; पुंसामू--जीव का; भक्ति: --भक्ति; वैराग्यम्‌ू--विरक्ति; एव--निश्चय ही; वा--भी |

भगवान्‌ के निष्कलुष भक्तों ने ऐसे ज्ञान के स्त्रोत का उल्लेख किया है।

ऐसे भक्तों कीसहायता के बिना कोई व्यक्ति भला किस तरह भक्ति तथा वैराग्य के ज्ञान को पा सकता है?

एतान्मे पृच्छतः प्रशनानहरे: कर्मविवित्सया ।

ब्रृहि मेउज्ञस्य मित्र॒त्वादजया नष्टचक्षुष: ॥

४०॥

एतानू--ये सारे; मे--मेरे; पृच्छत: -- पूछने वाले के; प्रश्नान्‌-- प्रश्नों को; हरेः-- भगवान्‌ की; कर्म--लीलाएँ; विवित्सया--जानने की इच्छा करते हुए; ब्रूहि--कृपया वर्णन करें; मे-- मुझसे; अज्ञस्थ--अज्ञानी की; मित्रत्वातू-मित्रता के कारण;अजया--बहिरंगा शक्ति द्वारा; नष्ट-चक्षुष:--वे जिनकी दृष्टि नष्ट हो चुकी है।

हे मुनि, मैंने आपके समक्ष इन सारे प्रश्नों को अर्थात्‌ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ हरि कीलीलाओं को जानने के उद्देश्य से ही रखा है।

आप सबों के मित्र हैं, अतएव कृपा करके उन सबोंके लाभार्थ जिनकी दृष्टि नष्ट हो चुकी हैं उनका वर्णन करें।

सर्वे वेदाश्व यज्ञाश्न तपो दानानि चानघ ।

जीवाभयप्रदानस्य न कुर्वीरन्‍्कलामपि ॥

४१॥

सर्वे--सभी तरह के; वेदा:ः--वेदों के विभाग; च-- भी; यज्ञा:--यज्ञ; च-- भी; तप:--तपस्याएँ; दानानि--दान; च--तथा;अनघ--हे निष्कलुष; जीव--जीव; अभय--भौतिक पीड़ाओं से मुक्ति; प्रदानस्य--ऐसा आश्वासन देने वाले का; न--नहीं;कुर्वीरनू--बराबरी की जा सकती है; कलाम्‌ू--अंशतः भी; अपि--निश्चय ही

हे अनघ, इन सरे प्रश्नों के आप के द्वारा दिए जाने वाले उत्तर समस्त भौतिक कष्टों से मुक्ति दिला सकेंगे।

ऐसा दान समस्त वैदिक दानों, यज्ञों, तपस्याओं इत्यादि से बढ़कर है।

श्रीशुक उवाचस इत्थमापृष्टपुराणकल्पः कुरुप्रधानेन मुनिप्रधान: ।

प्रवृद्धर्षो भगवत्कथायां सद्जोदितस्तं प्रहसन्निवाह ॥

४२॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह; इत्थम्‌--इस प्रकार; आपृष्ट-- पूछे जाने पर; पुराण-कल्प:--जोबेदों के पूरकों ( पुराणों ) की व्याख्या करना जानता है; कुरु-प्रधानेन--कुरुओं के प्रधान द्वारा; मुनि-प्रधान:--प्रमुख मुनि;प्रवृद्ध-पर्याप्त रूप से समृद्ध; हर्ष:--सन्तोष; भगवत्‌-- भगवान्‌ की; कथायाम्‌--कथाओं में; सज्ञोदित:--इस तरह प्रेरितहोकर; तम्‌--विदुर को; प्रहसन्‌--हँसते हुए; इब--मानो; आह--उत्तर दिया।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह वे मुनियों में-प्रधान, जो भगवान्‌ विषयक कथाओंका वर्णन करने के लिए सदैव उत्साहित रहते थे, विदुर द्वारा इस तरह प्रेरित किये जाने परपुराणों की विवरणात्मक व्याख्या का बखान करने लगे।

वे भगवान्‌ के दिव्य कार्यकलापों केविषय में बोलने के लिए अत्यधिक उत्साहित थे।

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