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अध्याय ग्यारह: स्वायंभुव मनु ने ध्रुव महाराज को युद्ध बंद करने की सलाह दी

4.11मैत्रेय उबाचनिशम्य गदतामेवमृषीणां धनुषि श्रुवः ।

सन्दधेस्त्रमुपस्पृश्ययन्नारायणनिर्मितम्‌ ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय मुनि ने आगे कहा; निशम्य--सुनकर; गदताम्‌--शब्द; एवम्‌--इस प्रकार; ऋषीणाम्‌--ऋषियों के;धनुषि--अपने धनुष पर; श्रुव:ः-- ध्रुव महाराज ने; सन्दधे--सन्धान किया; अस्त्रमू--बाण; उपस्पृश्य--जल छूकर; यत्‌--जो;नारायण--नारायण द्वारा; निर्मितम्‌ू--बनाया गया।

श्री मैत्रेय ने कहा : हे विदुर, जब श्रुव महाराज ने ऋषियों के प्रेरक शब्द सुने तो उन्होंने जललेकर आचमन किया और भगवान्‌ नारायण द्वारा निर्मित बाण लेकर उसे अपने धनुष परचढ़ाया।

"

सन्धीयमान एतस्मिन्माया गुह्मकनिर्मिता: ।

क्षिप्रं विनेशुर्विदुर क्लेशा ज्ञानोदये यथा ॥

२॥

सन्धीयमाने-- धनुष पर रखते हुए; एतस्मिन्‌--इस नारायणास्त्र को; माया: --माया, मोह; गुह्मक-निर्मिता: --यक्षों द्वारा निर्मित;क्षिप्रमू--शीघ्र; विनेशु:--नष्ट हो गये; विदुर--हे विदुर; क्लेशा:--मोहजनित कष्ट तथा आनन्द; ज्ञान-उदये--ज्ञान के उदय होनेपर; यथा--जिस प्रकार।

ज्योंही श्रुव महाराज ने अपने धनुष पर नारायणास्त्र को चढ़ाया, त्योंही यक्षों द्वारा रची गईसारी माया उसी प्रकार तुरन्त दूर हो गई जिस प्रकार कि आत्मज्ञान होने पर समस्त भौतिक क्लेशतथा सुख विनष्ट हो जाते हैं।

"

तस्यार्षास्त्रं धनुषि प्रयुद्धतःसुवर्णपुद्जः कलहंसवासस: ।

विनिःसृता आविविशुद्धिषद्वलंयथा वन॑ भीमरवा: शिखण्डिन: ॥

३॥

तस्य--जब श्वुव ने; आर्ष-अस्त्रमू--नारायण ऋषि द्वारा प्रदत्त हथियार; धनुषि--अपने धनुष पर; प्रयुज्धत:--चढ़ाया; सुवर्ण-पुद्ठाः--सुनहले फलों वाले ( तीर ); कलहंस-वासस:--हंस के पंखों के समान; विनि:सृता:--निकल पड़े; आविविशु:--प्रविष्ट; द्विषत्‌-बलम्‌--शत्रु के सैनिक; यथा--जिस प्रकार; वनम्‌--वन में; भीम-रवा:-- भीषण शब्द करते; शिखण्डिन:--मोर

ध्रुव महाराज ने ज्योंही अपने धनुष पर नारायण ऋषि द्वारा निर्मित अस्त्र को चढ़ाया, उससेसुनहरे फलों तथा पंखोंवाले बाण हंस के पंखों के समान बाहर निकलने लगे।

वे फूत्कार करतेहुए शत्रु सैनिकों में उसी प्रकार घुसने लगे जिस प्रकार मोर केका ध्वनि करते हुए जंगल में प्रवेशकरते हैं।

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तैस्तिग्मधारैः प्रधने शिलीमुखैर्‌इतस्तत: पुण्यजना उपद्गुता: ।

तमभ्यधावन्कुपिता उदायुधा:सुपर्णमुन्नद्धफणा इबाहयः ॥

४॥

तैः--उनके द्वारा; तिग्म-धारैः--पैनी धार वाले; प्रधने--युद्धभूमि में; शिली-मुखैः--बाण; इतः तत:--इधर-उधर; पुण्य-जना:--यक्षगण; उपद्गुता:--अत्यन्त क्षुब्ध होकर; तम्‌-- ध्रुव महाराज की ओर; अभ्यधावन्‌--दौड़े; कुपिता: -क्रुद्ध;उदायुधा: --हथियार उठाये; सुपर्णम्‌ू--गरुड़ की ओर; उन्नद्ध-फणा:--फन उठाये; इब--सहृश; अहयः--सर्प |

उन तीखी धारवाले बाणों ने शत्रु-सैनिकों को विचलित कर दिया, और वे प्रायः मूर्च्छित हो गये।

किन्तु ध्रुव महाराज से क्रुद्ध होकर यक्षगण युद्धक्षेत्र में किसी न किसी प्रकार अपने-अपनेहथियार लेकर एकत्र हो गये और उन्होंने आक्रमण कर दिया।

जिस प्रकार गरुड़ के छेड़ने परसर्प अपना-अपना फन उठाकर गरुड़ की ओर दौड़ते हैं, उसी प्रकार समस्त यक्ष सैनिक अपने-अपने हथियार उठाये ध्रुव महाराज को जीतने की तैयारी करने लगे।

"

स तान्पृषत्कैरभिधावतो मृथेनिकृत्तबाहूर॒शिरोधरोदरान्‌ ।

निनाय लोकं परमर्कमण्डलंब्रजन्ति निर्भिद्य यमूध्वरितस: ॥

५॥

सः--वह ( ध्रुव ); तानू--समस्त यक्षों को; पृषत्कैः--अपने बाण से; अभिधावत:--आगे आते हुए; मृधे--युद्ध भूमि में;निकृत्त--विलग, छिन्न; बाहु-- भुजाएँ; ऊरु--जंघाएँ; शिर:-धर--गर्दन; उदरान्‌--तथा पेट; निनाय-- प्रदान किया;लोकम्‌--लोक को; परम्‌--परम; अर्क-मण्डलम्‌--सूर्य -मण्डल; ब्रजन्ति--जाते हैं; निर्भिद्य-- भेदते हुए; यम्‌--जिसको;ऊर्ध्व-रेतस:ः-- ऊध्वरिता ब्रह्मचारी, जो वीर्य स्खलित नहीं करते ।

जब श्रुव महाराज ने यक्षों को आगे बढ़ते देखा तो उन्होंने तुरन्त बाणों को चढ़ा लिया औरशत्रुओं को खण्ड-खण्ड कर डाला।

शरीरों से बाहु, पाँव, सिर तथा उदर अलग-अलग करकेउन्होंने यक्षों को सूर्य-मण्डल के ऊपर स्थित लोकों में भेज दिया, जो केवल श्रेष्ठ ऊर्ध्वरिताब्रह्मचारियों को प्राप्त हो पाता है।

"

तान्हन्यमानानभिवीक्ष्य गुह्यका-ननागसश्रित्ररथेन भूरिशः ।

औत्तानपादिं कृपया पितामहोमनुर्जगादोपगतः सहर्षिभि: ॥

६॥

तान्‌ू--उन यक्षों को; हन्यमानानू--मरे हुए; अभिवीक्ष्य-- देखकर; गुह्मकान्‌--यक्षगण; अनागस:--पाप-रहित; चित्र-रथेन--ध्रुव महाराज द्वारा, जिनके पास सुन्दर रथ था; भूरिश:--अत्यधिक; औत्तानपादिम्‌--उत्तानपाद के पुत्र को; कृपया--कृपा से;पिता-मह:--बाबा; मनुः--स्वायंभुव मनु ने; जगाद--उपदेश दिया; उपगत:--पास जाकर; सह-ऋषिभि:--ऋषियों सहित।

जब स्वायंभुव मनु ने देखा कि उनका पौत्र ध्रुव ऐसे अनेक यक्षों का वध कर रहा है, जोवास्तव में अपराधी नहीं हैं, तो वे करूणावश ऋषियों को साथ लेकर श्रुव के पास उन्हें सदुपदेश" देने गये ।

मनुरुवाचअलं वत्सातिरोषेण तमोद्वारेण पाप्मना ।

येन पुण्यजनानेतानवधीस्त्वमनागस: ॥

७॥

मनु: उबाच--मनु ने कहा; अलम्‌--बहुत हुआ, बस; वत्स--मेरे बालक; अतिरोषेण --अत्यन्त क्रोधपूर्वक; तमः-द्वारेण --अज्ञान का मार्ग; पाप्मना--पापी; येन--जिससे; पुण्य-जनानू--यक्षगण; एतानू--ये सब; अवधी:--तुम्हारे द्वारा मारे गये;त्वमू--तुम; अनागस: --निरपराध ।

श्री मनु ने कहा : हे पुत्र, बस करो।

वृथा क्रोध करना अच्छा नहीं--यह तो नारकीय जीवनका मार्ग है।

अब तुम यक्षों को मार कर अपनी सीमा से परे जा रहे हो, क्योंकि ये वास्तव मेंअपराधी नहीं हैं।

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नास्मत्कुलोचितं तात कर्मतत्सद्विगर्हितम्‌ ।

वधो यदुपदेवानामारब्धस्तेकृतैनसाम्‌ ॥

८॥

न--नहीं; अस्मत्‌-कुल--हमारे कुल के लिए; उचितम्‌--उचित, उपयुक्त; तात--मेरे पुत्र; कर्म--कर्म; एतत्‌--यह; सत्‌ --साधु पुरुष; विगर्हितम्‌--वर्जित; वध:--ह त्या; यत्‌--जो; उपदेवानाम्‌--यक्षों का; आरब्ध:--किया गया; ते--तुम्हारे द्वारा;अकृत-एनसाम्‌--पाप-विहीनों अथवा निर्दोषों का।

हे पुत्र, तुम निर्दोष यक्षों का जो यह वध कर रहे हो वह न तो अधिकृत पुरुषों द्वारा स्वीकार्यहै और न यह हमारे कुल को शोभा देनेवाला है क्योंकि तुमसे आशा की जाती है कि तुम धर्मतथा अधर्म के विधानों को जानो।

"

नन्वेकस्यापराधेन प्रसड्राद्वववो हता: ।

भ्रातुर्वधाभितप्तेन त्वयाड्र भ्रातृवत्सल ॥

९॥

ननु--निश्चय ही; एकस्य--एक ( यक्ष ) के; अपराधेन--अपराध से; प्रसझझत्‌--संगति से; बहवः--अनेक; हता: --मारे गये;भ्रातु:--अपने भाई की; बध--मृत्यु से; अभितप्तेन--शोक से; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अड्र-हे पुत्र; भ्रातृ-वत्सल--अपने भाईके प्रिय

हे पुत्र, यह सिद्ध हो चुका है कि तुम अपने भाई के प्रति कितने वत्सल हो और यक्षों द्वाराउसके मारे जाने से तुम कितने सन्तप्त हो, किन्तु जगा सोचो तो कि केवल एक यक्ष के अपराधके कारण तुमने कितने अन्य निर्दोष यक्षों का वध कर दिया है।

"

नायं मार्गो हि साधूनां हषीकेशानुवर्तिनाम्‌ ।

यदात्मानं पराग्गृह्य पशुवद्धृतवैशसम्‌ ॥

१०॥

न--नहीं; अयम्‌--यह; मार्ग: --रास्ता; हि--निश्चय ही; साधूनाम्‌-- भले पुरुषों का; हषीकेश-- भगवान्‌ के; अनुवर्तिनामू--पथ का अनुगमन करते; यत्‌--जो; आत्मानम्‌--स्वयं; पराक्‌--शरीर; गृह्य--मानकर; पशु-वत्‌--पशुओं के तुल्य; भूत--जीवात्माओं का; वैशसम्‌ू--वध |

मनुष्य को चाहिए कि वह शरीर को आत्मा न माने और इस प्रकार पशुओं की भाँति अन्योंका वध न करे।

भगवान्‌ की भक्ति के पथ का अनुसरण करनेवाले साधु पुरुषों ने इसे विशेषरूप से वर्जित किया है।

"

सर्वभूतात्मभावेन भूतावासं हरिं भवान्‌ ।

आशाध्याप दुराराध्यं विष्णोस्तत्परमं पदम्‌ ॥

११॥

सर्व-भूत--समस्त जीवात्माओं में; आत्म--परमात्मा के ऊपर; भावेन-- ध्यान से; भूत--समस्त संसार का; आवासम्‌--घर;हरिम्‌-- भगवान्‌ हरि; भवान्‌ू--आप; आराध्य--पूजा करके; आप--प्राप्त कर लिया है; दुराराध्यम्‌ू--जिनकी आराधना करना'कठिन है; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णु के; तत्‌--उस; परमम्‌--परम; पदम्‌--स्थान या, स्थिति को |

वैकुण्ठलोक में हरि के धाम को प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर है; किन्तु तुम इतने भाग्यशालीहो कि समस्त जीवात्माओं के परमधाम भगवान्‌ की पूजा द्वारा तुम्हारा उस धाम को जाना निश्चित हो चुका है।

"

स त्वं हरेरनुध्यातस्तत्पुंसामपि सम्मतः ।

कथं त्ववद्यं कृतवाननुशिक्षन्सतां ब्रतम्‌ ॥

१२॥

सः--वह व्यक्ति; त्वमू--तुम; हरेः--परमे श्वर द्वारा; अनुध्यात:-- सदैव स्मरण किया जाकर; तत्‌--उसका; पुंसाम्‌ू-भक्तोंद्वारा; अपि-- भी; सम्मत:--पूज्य; कथम्‌--क्यों; तु--तब; अवद्यम्‌ू--निन्दनीय ( कार्य ); कृतवान्‌--किया गया;अनुशिक्षन्‌--दृष्टान्त उपस्थित करके; सताम्‌ू--साधु पुरुषों का; ब्रतम्‌--ब्रत |

भगवान्‌ के शुद्ध भक्त होने के कारण भगवान्‌ सदैव तुम्हारे बारे में सोचते रहते हैं और तुमभी उनके सभी परम विश्वस्त भक्तों द्वारा मान्य हो।

तुम्हारा जीवन आदर्श आचरण के निमित्त है।

अतः मुझे आश्चर्य हो रहा है कि तुमने ऐसा निन्दनीय कार्य कैसे किया।

"

तितिक्षया करुणया मैत्रया चाखिलजन्तुषु ।

समत्वेन च सर्वात्मा भगवान्सम्प्रसीदति ॥

१३॥

तितिक्षया--सहनशीलता से; करुणया--दया से; मैत्रया--मैत्री से; च-- भी; अखिल--समस्त; जन्तुषु--जीवात्माओं के;समत्वेन--समता से; च-- भी; सर्व-आत्मा--परमात्मा; भगवान्‌-- भगवान्‌; सम्प्रसीदति-- प्रसन्न हो जाता है।

भगवान्‌ अपने भक्तों से तब अत्यधिक प्रसन्न होते हैं जब वे अन्य लोगों के साथ सहिष्णुता,दया, मैत्री तथा समता का बर्ताव करते हैं।

"

सम्प्रसन्ने भगवति पुरुष: प्राकृतैर्गुणै: ।

विमुक्तो जीवनिर्मुक्तो ब्रह्म निर्वाणमृच्छति ॥

१४॥

सम्प्रसन्ने--प्रसन्न होने पर; भगवति-- भगवान्‌ के; पुरुष:--पुरुष; प्राकृते:--भौतिक; गुणैः -- प्रकृति के गुणों से; विमुक्त:--मुक्त हुए; जीव-निर्मुक्त:--सूक्ष्म शरीर से भी मुक्त; ब्रहा-- अनन्त; निर्वाणमू--आत्म-आनन्द; ऋच्छति--प्राप्त करता है

जो मनुष्य अपने जीवनकाल में भगवान्‌ को सचमुच प्रसन्न कर लेता है, वह स्थूल तथासूक्ष्म भौतिक परिस्थितियों से मुक्त हो जाता है।

इस प्रकार समस्त भौतिक गुणों से छूटकर वहअनन्त आत्म-आनच्द प्राप्त करता है।

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भूतेः पञ्ञभिरारब्धेयोषित्पुरुष एव हि ।

तयोवव्यवायात्सम्भूतियोंषित्पुरुषयोरिह ॥

१५॥

भूतीः-- भौतिक तत्त्वों द्वारा; पञ्ञभि:--पाँच; आरब्धै:--प्रारम्भ की गई; योषित्‌--स्त्री; पुरुष:--पुरुष; एबव--की तरह; हि--निश्चय ही; तयो:--उनके; व्यवायात्‌--विषयी जीवन द्वारा; सम्भूति:--पुनः सृष्टि; योषित्‌--स्त्रियों की; पुरुषयो: --तथा पुरुषोंकी; इह--इस जगत में |

भौतिक जगत की सृष्टि पाँच तत्त्वों से प्रारम्भ होती है और इस तरह प्रत्येक वस्तु, जिसमेंपुरुष अथवा स्त्री का शरीर भी सम्मिलित है, इन तत्त्वों से उत्पन्न होती है।

पुरुष तथा स्त्री केविषयी जीवन ( समागम ) से इस जगत में पुरुषों तथा स्त्रियों की संख्या में और वृद्धि होती है।

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एवं प्रवर्तते सर्ग: स्थिति: संयम एव च ।

गुणव्यतिकराद्राजन्मायया परमात्मन: ॥

१६॥

एवम्‌--इस प्रकार; प्रवर्तते--घटित होता है; सर्ग:--सृष्टि; स्थितिः--पालन; संयम:--प्रलय; एव--निश्चय ही; च--तथा;गुण--गुणों की; व्यतिकरात्‌--पारस्परिक क्रिया से; राजन्‌ू--हे राजा; मायया--माया द्वारा; परम-आत्मन:-- भगवान्‌ की |

मनु ने आगे कहा : हे राजा श्रुव, भगवान्‌ की मोहमयी भौतिक शक्ति के द्वारा तथा भौतिकप्रकृति के तीनों गुणों की पारस्परिक क्रिया से ही सृष्टि, पालन तथा संहार होता रहता है।

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निमित्तमात्रं तत्रासीच्निर्गुण: पुरुषर्षभ: ।

व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्व॑ं यत्र भ्रमति लोहवतू ॥

१७॥

निमित्त-मात्रमू-दूरस्थ कारण; तत्र--तब; आसीतू-- था; निर्गुण:--कल्मषरहित; पुरुष-ऋषभ: -- परम पुरुष; व्यक्त--प्रकट;अव्यक्तमू--अप्रकट; इृदम्‌--यह; विश्वम्‌--जगत; यत्र--जहाँ; भ्रमति--घूमता है; लोह-वत्‌--लोहे के समान |

हे श्रुव, भगवान्‌ प्रकृति के गुणों के द्वारा कलुषित नहीं होते।

वे इस भौतिक दृश्य जगत कीउत्पति के दूरस्थ कारण ( निमित्त ) हैं।

उनकी प्रेरणा से अन्य अनेक कारण तथा कार्य उत्पन्न होतेहैं और तब यह सारा ब्रह्माण्ड उसी प्रकार घूमता है जैसे कि लोहा चुम्बक की संचित शक्ति सेघूमता है।

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स खल्विदं भगवान्कालशक्त्यागुणप्रवाहेण विभक्तवीर्य: ।

करोत्यकर्तेव निहन्त्यहन्ताचेष्टा विभूम्न: खलु दुर्विभाव्या ॥

१८॥

सः--वह; खलु--फिर भी; इृदम्‌--यह ( ब्रह्माण्ड ); भगवानू-- भगवान्‌; काल--समय की; शक्त्या--शक्ति से; गुण-प्रवाहेण--गुणों की अन्योन्य क्रिया से; विभक्त--विभाजित; बीर्य:--( जिसकी ) शक्तियाँ; करोति-- प्रभाव डालता है;अकर्ता--न करनेवाला; एव--यद्यपि; निहन्ति--मारता है; अहन्ता--न मारनेवाला; चेष्टा--शक्ति; विभूम्न:--भगवान्‌ की;खलु--निश्चय ही; दुर्विभाव्या--अचिन्तनीय |

भगवान्‌ अपनी अचिन्त्य काल-रूप परम शक्ति से प्रकृति के तीनों गुणों में अन्योन्य क्रियाउत्पन्न करते हैं जिससे नाना प्रकार की शक्तियाँ प्रकट होती हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि वेकार्यशील हैं, किन्तु वे कर्ता नहीं हैं।

वे संहार तो करते हैं, किन्तु संहारकर्ता नहीं हैं।

अत: यहमाना जाता है कि केवल उनकी अचिन्तनीय शक्ति से सब कुछ घट रहा है।

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सोनन्तोन्तकर: कालोनादिरादिकृदव्यय: ।

जन॑ जनेन जनयन्मारयन्पृत्युनान्‍नतकम्‌ ॥

१९॥

सः--वह; अनन्त:--अनन्त; अन्त-करः--संहारकर्ता; काल:--काल, समय; अनादि: --जिसका आदि नहीं है; आदि-कृत्‌--प्रत्येक वस्तु का आदि; अव्यय:--न चुकने वाले; जनम्‌--जीवात्माएँ; जनेन--जीवात्माओं के द्वारा; जनयन्‌--उत्पन्न कराकर;मारयन्‌--मारना; मृत्युना--के द्वारा; अन्तकम्‌--वधकर्ता |

हे ध्रुव, भगवान्‌ नित्य हैं, किन्तु कालरूप में वे सबों को मारनेवाले हैं।

उनका आदि नहीं है,यद्यपि वे हर वस्तु के आदि कर्ता हैं।

वे अव्यय हैं, यद्यपि कालक्रम में हर वस्तु चुक जाती है।

जीवात्मा की उत्पत्ति पिता के माध्यम से होती है और मृत्यु द्वारा उसका विनाश होता है, किन्तुभगवान्‌ जन्म तथा मृत्यु से सदा मुक्त हैं।

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न वे स्वपक्षोस्य विपक्ष एव वापरस्य मृत्योर्विशतः सम॑ प्रजा: ।

त॑ धावमानमनुधावन्त्यनीशायथा रजांस्यनिलं भूतसड्जाः ॥

२०॥

न--नहीं; वै--फिर भी; स्व-पक्ष:--मित्र-पक्ष; अस्य-- भगवान्‌ का; विपक्ष:--शत्रु; एव--निश्चय ही; वा--अथवा; परस्यथ--परमेश्वर का; मृत्यो:--काल रूप में; विशतः--प्रवेश करता; समम्‌--समान रूप से; प्रजा:--जीवात्माएँ; तम्‌--उसको;धावमानम्‌--चलायमान; अनुधावन्ति-- अनुसरण करते हैं; अनीशा:--पराश्रित जीवात्माएँ; यथा--जिस तरह; रजांसि-- धूलके कण; अनिलम्‌--वायु; भूत-सझ्ञ:--अन्य भौतिक तत्त्व

अपने शाश्वत काल रूप में श्रीभगवान्‌ इस भौतिक जगत में विद्यमान हैं और सबों के प्रतिसमभाव रखनेवाले हैं।

न तो उनका कोई मित्र है, न शत्रु।

काल की परिधि में हर कोई अपनेकर्मों का फल भोगता है।

जिस प्रकार वायु के चलने पर श्षुद्र धूल के कण हवा में उड़ते हैं, उसीप्रकार अपने कर्म के अनुसार मनुष्य भौतिक जीवन का सुख भोगता या कष्ट उठाता है।

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आयुषोपचयं जन्तोस्तथेवोपचयं विभु: ।

उभाभ्यां रहितः स्वस्थो दुःस्थस्य विदधात्यसौ ॥

२१॥

आयुष:--जीवन अवधि का; अपचयम्‌--हास; जन्तो:--जीवात्माओं का; तथा--उसी प्रकार; एब-- भी; उपचयम्‌--वृद्धि;विभुः--भगवान्‌; उभाभ्याम्‌--उन दोनों से; रहित:--रहित, मुक्त; स्व-स्थ:--अपनी दिव्य स्थिति में सदैव स्थित; दुःस्थस्य--कर्म के नियम के अन्तर्गत जीवात्मा का; विदधाति--देता है; असौ--वह ।

भगवान्‌ विष्णु सर्वशक्तिमान हैं और वे प्रत्येक को सकाम कर्मों का फल देते हैं।

इस प्रकारजीवात्मा चाहे अल्पजीवी हो या दीर्घजीवी, भगवान्‌ तो सदा ही दिव्य पद पर रहते हैं और उनकीजीवन-अवधि के घटने या बढ़ने का कोई प्रश्न नहीं उठता।

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केचित्कर्म वदन्त्येनं स्‍्वभावमपरे नृप ।

एके काल परे देव पुंसः काममुतापरे ॥

२२॥

केचित्‌--कुछ; कर्म--सकाम कर्म; वदन्ति--कहते हैं; एनमू--वह; स्वभावम्‌--स्वभाव; अपरे--अन्य; नृप--हे राजा श्रुव;एके--कुछ; कालम्‌--समय, काल; परे-- अन्य; दैवम्‌-- भाग्य; पुंसः--जीवात्मा की; कामम्‌--इच्छा; उत-- भी; अपरे--अन्य

कुछ लोग विभिन्न योनियों तथा उनके सुख-दुख में पाये जाने वाले अन्तर को कर्म-फलबताते हैं।

कुछ इसे प्रकृति के कारण, अन्य लोग काल तथा भाग्य के कारण और शेष इच्छाओंके कारण बताते हैं।

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अव्यक्तस्थाप्रमेयस्य नानाशक्त्युदयस्य च ।

न वै चिकीर्षितं तात को वेदाथ स्वसम्भवम्‌ ॥

२३॥

अव्यक्तस्थ--अप्रकट का; अप्रमेयस्थ--अप्रमेय का; नाना--अनेक; शक्ति--शक्तियाँ; उदयस्य-- प्रकट करनेवाले का; च--भी; न--कभी नहीं; वै--निश्चय ही; चिकीर्षितम्‌--योजना; तात--हे बालक; कः--कौन; वेद--जान सकता है; अथ--अतः; स्व--अपनी; सम्भवम्‌--उत्पत्ति |

परम सत्य अर्थात्‌ सत्त्त कभी भी अपूर्ण ऐन्द्रिय प्रयास द्वारा जानने का विषय नहीं रहा है, नही उसका प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

वह पूर्ण भौतिक शक्ति सहश नाना प्रकार कीशक्तियों का स्वामी है और उसकी योजना या कार्यों को कोई भी नहीं समझ सकता।

अतःनिष्कर्ष यह निकलता है कि वे समस्त कारणों के आदि कारणस्वरूप हैं, अतः उन्हें कल्पना द्वारा नहीं जाना जा सकता।

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न चैते पुत्रक भ्रातुर्हन्तारो धनदानुगा: ।

विसर्गादानयोस्तात पुंसो दैवं हि कारणम्‌ ॥

२४॥

न--कभी नहीं; च-- भी; एते--ये सब; पुत्रक-हे पुत्र; भ्रातु:ः--तुम्हारे भाई के; हन्तार: --मारनेवाले; धनद--कुवेर के;अनुगा:--अनुचर; विसर्ग--जन्म; आदानयो:--मृत्यु का; तात--हे पुत्र; पुंसः--जीवात्मा का; दैवम्‌--ई श्वर; हि--निश्चय ही;कारणमू--कारण।

हे पुत्र, वे कुवेर के अनुचर यक्षगण तुम्हारे भाई के वास्तविक हत्यारे नहीं हैं; प्रत्येकजीवात्मा का जन्म तथा मृत्यु तो समस्त कारणों के कारण परमेश्वर द्वारा ही तय होती है।

स एव विश्व सृजति स एवावति हन्ति च ।

"

अथापि ह्ानहड्जारान्राज्यते गुणकर्मभि: ॥

२५॥

सः--वह; एव--निश्चय ही; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; सृजति--उत्पन्न करता है; सः--वह; एब--निश्चय ही; अवति--पालता है;हन्ति--संहार करता है; च-- भी; अथ अपि--और भी; हि--निश्चय ही; अनहड्जारात्‌ू--अहंकाररहित होने से; न--नहीं;अज्यते--फँसता है; गुण--गुणों से; कर्मभि:--कर्मों से

भगवान्‌ ही इस भौतिक जगत की सृष्टि करते, पालते और यथासमय संहार करते हैं, किन्तुऐसे कार्यों से परे रहने के कारण वे इनमें न तो अहंकार से और न प्रकृति के गुणों द्वारा प्रभावितहोते हैं।

"

एष भूतानि भूतात्मा भूतेशों भूतभावन: ।

स्वशकत्या मायया युक्त: सृजत्यत्ति च पाति च ॥

२६॥

एक: --यह; भूतानि--समस्त प्राणी; भूत-आत्मा--समस्त जीवात्माओं का परमात्मा; भूत-ईश: --प्रत्येक का नियन्ता; भूत-भावन: --प्रत्येक का पालनकर्ता; स्व-शकत्या--अपनी शक्ति से; मायया--बहिरंगा शक्ति से; युक्त:--ऐसे साधन से; सृजति--उत्पन्न करता है; अत्ति--संहार करता है; च--तथा; पाति--पालन करता है; च--और।

भगवान्‌ समस्त जीवात्माओं के परमात्मा हैं।

वे हर एक के नियामक तथा पालक हैं; वेअपनी बहिरंगा शक्ति के माध्यम से सभी जीवों का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं।

"

तमेव मृत्युममृतं तात दैव॑सर्वात्मनोपेहि जगत्परायणम्‌ ।

यस्मै बलिं विश्वसृजो हरन्तिगावो यथा वै नसि दामयन्त्रिता: ॥

२७॥

तम्‌--उनको; एव--निश्चय ही; मृत्युम्‌-मृत्यु; अमृतम्‌-- अमरत्व; तात--हे पुत्र; दैवम्‌ू--ई श्वर; सर्व-आत्मना--सभी प्रकार से;उपेहि--शरण में जाओ; जगत्‌--जगत का; परायणम्‌--परिणति, चरम लक्ष्य; यस्मै--जिसको; बलिमू-- भेंट; विश्व-सृज:--ब्रह्मा जैसे समस्त देवता; हरन्ति--ले जाते हैं; गाव: --बैल; यथा--जिस प्रकार; बै--निश्चय ही; नसि--नाक में; दाम--रस्सीसे; यन्त्रिता:--वश में किये गये।

हे बालक श्रुव, तुम भगवान्‌ की शरण में जाओ जो जगत की प्रगति के चरम लक्ष्य हैं।

ब्रह्मादि सहित सभी देवगण उनके नियंत्रण में कार्य कर रहे हैं, जिस प्रकार नाक में रस्सी पड़ाबैल अपने स्वामी द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

"

यः पञ्जञवर्षो जननीं त्वं विहायमातु: सपत्या वचसा भिन्नमर्मा ।

बन॑ गतस्तपसा प्रत्यगक्ष-माराध्य लेभे मूर्ध्नि पदं त्रिलोक्या: ॥

२८॥

यः--जो; पश्ञ-वर्ष:--पाँच साल के; जननीम्‌--माता को; त्वमू--तुम; विहाय--छोड़ कर; मातु:--माता का; स-पत्या: --सौतों के; वचसा--शब्दों से; भिन्न-मर्मा--हृदय में शोकाकुल; वनम्‌--जंगल को; गत:--गये हुए; तपसा--तपस्या द्वारा;प्रत्यक्‌-अक्षम्‌--परमे ध्वर को; आराध्य--पूज कर; लेभे--प्राप्त किया; मूर्ध्िनि--चोटी पर; पदम्‌--पद; त्रि-लोक्या:--तीनोंलोकों की।

हे श्रुव, तुम केवल पाँच वर्ष की आयु में ही अपनी माता कि सौत के बचनों से अत्यन्त दुखीहुए और बड़ी बहादुरी से अपनी माता का संरक्षण त्याग दिया तथा भगवान्‌ का साक्षात्कार करनेके उद्देश्य से योगाभ्यास में संलग्न होने के लिए जंगल चले गये थे।

इस कारण तुमने पहले से हीतीनों लोकों में सर्वोच्च पद प्राप्त कर लिया है।

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तमेनमझ्त्मनि मुक्तविग्रहेव्यपाश्नितं निर्गुणमेकमक्षरम्‌ ।

आत्मानमन्विच्छ विमुक्तमात्महग्‌यस्मिन्रिदं भेदमसत्प्रतीयते ॥

२९॥

तम्‌--उसको; एनम्‌--वह; अड्र--हे ध्रुव; आत्मनि--मन में; मुक्त-विग्रहे--क्रो ध-रहित; व्यपाभ्रितम्‌--स्थित; निर्गुणम्‌--दिव्य; एकम्‌--एक; अक्षरम्‌--अच्युत ब्रह्म; आत्मानम्‌ू--स्व; अन्विच्छ--ढूँढने का यत्न करो; विमुक्तम्‌ू--अकलुषित; आत्म-हक्‌--परमात्मा की ओर मुख किये; यस्मिन्‌--जिसमें; इदम्--यह; भेदम्‌्--अन्तर; असत्‌--असत्य; प्रतीयते--प्रतीत होता है |

अतः हे ध्रुव, अपना ध्यान परम पुरुष अच्युत ब्रह्म की ओर फेरो।

तुम अपनी मूल स्थिति में रह कर भगवान्‌ का दर्शन करो।

इस तरह आत्म-साक्षात्कार द्वारा तुम इस भौतिक अन्तर कोक्षणिक पाओगे।

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त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्तआनन्दमात्र उपपन्नसमस्तशक्तौ ।

भक्ति विधाय परमां शनकैरविद्या-ग्रन्थि विभेत्स्यसि ममाहमिति प्ररूढम्‌ ॥

३०॥

त्वमू--तुम; प्रत्यकू-आत्मनि--परमात्मा को; तदा--उस समय; भगवति-- भगवान्‌ को; अनन्ते--असीम को; आनन्द-मात्रे--समस्त आनन्द का आगार; उपपन्न--से युक्त; समस्त--सर्व; शक्तौ--शक्तियाँ; भक्तिम्‌-- भक्ति; विधाय--करके; परमाम्‌--परम; शनकै: --तुरन्त; अविद्या--माया की; ग्रन्थिमू--गाँठ; विभेत्स्यसि--नष्ट कर दोगे, काट दोगे; मम--मेरा; अहमू--मैं;इति--इस प्रकार; प्ररूढम्‌--ह॒ढ़तापूर्वक स्थित, सुदृढ़

इस प्रकार अपनी सहज स्थिति प्राप्त करके तथा समस्त आनन्द के सर्व शक्तिसम्पन्न आगारतथा प्रत्येक जीवात्मा में परमात्मा में स्थित परमेश्वर की सेवा करके तुम तुरन्त ही 'मैं' तथा'मेरा' के मायाजनित बोध को भल जाओगे।

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संयच्छ रोषं भद्वं ते प्रतीपं श्रेयसां परम्‌ ।

श्रुतेन भूयसा राजन्नगदेन यथामयम्‌ ॥

३१॥

संयच्छ--जरा रोको; रोषम्‌--क्रोध को; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; प्रतीपम्‌--शत्रु; श्रेयसाम्‌--समस्त अच्छाई का;परम्‌--अग्रणी; श्रुतेन--सुनकर; भूयसा--निरन्तर; राजन्‌--हे राजा; अगदेन--उपचार से; यथा--जिस प्रकार; आमयम्‌--रोग

हे राजन, मैंने तुम्हें जो कुछ कहा है, उस पर विचार करो।

यह राग पर ओषधि के समानकाम करेगा।

अपने क्रोध को रोको, क्योंकि आत्मबोध के मार्ग में क्रोध सबसे बड़ा शत्रु है।

मैंतुम्हारे मंगल की कामना करता हूँ।

तुम मेरे उपदेशों का पालन करो।

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येनोपसूष्टात्ुरुषाललोक उद्विजते भूशम्‌ ।

न बुधस्तद्वशं गच्छेदिच्छन्नभयमात्मन: ॥

३२॥

येन--जिससे; उपसृष्टात्‌--वशीभूत होकर; पुरुषात्‌--पुरुष द्वारा; लोक: -- प्रत्येक व्यक्ति; उद्धिजते-- भयभीत होता है;भूशम्‌--अत्यधिक; न--कभी नहीं; बुध: --बुद्धिमान पुरुष; ततू-क्रोध के; वशम्‌--वश में; गच्छेत्‌--जाए; इच्छन्‌--चाहतेहुए; अभयम्‌--निर्भीकता, मुक्ति; आत्मन:--स्व की |

जो व्यक्ति इस भौतिक जगत से मुक्ति चाहता है उसे चाहिए कि वह क्रोध के वशीभूत न हो,क्योंकि क्रोध से मोहग्रस्त होने पर वह अन्य सबों के लिए भय का कारण बन जाता है।

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हेलनं गिरिश क्षातुर्धनदस्य त्वया कृतम्‌ ।

यज्जघध्निवान्पुण्यजनान्भ्रातृष्नानित्यमर्षित: ॥

३३॥

हेलनम्‌--दुर्व्यवहार; गिरिश--शिवजी के; भ्रातु:-- भाई; धनदस्य--कुवेर का; त्वया--तुम्हारे द्वारा; कृतम्‌--किया गया;यत्‌--क्योंकि; जध्निवान्‌--तुम्हारे द्वारा मारे गये; पुण्य-जनान्‌ू--यक्षगण; भ्रातृ-तुम्हारे भाई के; घ्नान्‌ू--मारने वाले; इति--इस प्रकार ( सोचकर ); अमर्षित:--क्रुद्ध |

हे ध्रुव, तुमने सोचा कि यक्षों ने तुम्हारे भाई का वध किया है, अतः तुमने अनेक यक्षों कोमार डाला है।

किन्तु इस कृत्य से तुमने शिवजी के भ्राता एवं देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर केमन को क्षुब्ध कर दिया हैं।

ख्याल करो कि तुम्हारे ये कर्म कुबेर तथा शिव दोनों के प्रति अतीवअवज्ञापूर्ण हैं।

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त॑ं प्रसादय वत्साशु सन्नत्या प्रश्रयोक्तिभि: ।

न यावन्महतां तेज: कुल नोउभिभविष्यति ॥

३४॥

तम्‌--उसको; प्रसादय--शान्त करो; वत्स--मेरे पुत्र; आशु--शीघ्र; सन्नत्या--नमस्कार द्वारा; प्रश्रया--सदाचरण से;उक्तिभि:--विनीत वचनों से; न यावत्‌--इसके पूर्व कि; महताम्‌-महान्‌ पुरुषों का; तेज:--कोप; कुलम्‌ू--परिवार को;नः--हमारे; अभिभविष्यति-- प्रभावित कर दे।

इस कारण, हे पुत्र, तुम विनीत बचनों तथा प्रार्थना द्वारा कुबेर को शीघ्र शान्त कर लोजिससे कि उनका कोप हमारे परिवार को किसी तरह प्रभावित न कर सके।

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एवं स्वायम्भुव: पौत्रमनुशास्य मनुर्ध्रुवम्‌ ।

तेनाभिवन्दितः साकमृषिश्रिः स्वपुरं ययौ ॥

३५॥

एवम्‌--इस प्रकार; स्वायम्भुव: --स्वायंभुव; पौत्रम्‌-- अपने पौत्र को; अनुशास्य--शिक्षा देकर; मनुः--मनु; ध्रुवम्‌-- धुवमहाराज को; तेन--उसके द्वारा; अभिवन्दितः--नमस्कृत; साकम्‌--साथ-साथ; ऋषिभि:--ऋषियों के साथ; स्व-पुरम्‌ू-- अपनेधाम को; ययौ--चले गये।

इस प्रकार जब स्वायंभुव मनु अपने पौत्र ध्रुव महाराज को शिक्षा दे चुके तो श्वुव ने उन्हें सादर नमस्कार किया।

फिर ऋषियों समेत मनु अपने धाम को चले गये।

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