← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची

अध्याय तेरह: ध्रुव महाराज के वंशजों का वर्णन

4.13सूत उबाचनिशम्य कौषारविणोपवर्णितंध्रुवस्य वैकुण्ठपदाधिरोहणम्‌ ।

प्ररूढठभावो भगवत्यधोक्षजेप्रष्ठ पुनस्तं विदुरः प्रचक्रमे ॥

१॥

सूतः उबाच--सूत गोस्वामी ने कहा; निशम्य--सुनकर; कौषारविणा--मैत्रेय से; उपवर्णितम्‌--वर्णित; श्रुवस्थ-- ध्रुव का;बैकुण्ठ-पद--विष्णु-धाम को; अधिरोहणम्‌--आरूढ़ होना; प्ररूढ--बढ़ा हुआ; भाव: -- भक्तिभाव; भगवति-- भगवान्‌ केप्रति; अधोक्षजे--जो प्रत्यक्ष अनुभव से परे है; प्रष्टमू--पूछने के लिए; पुनः--फिर; तम्‌--मैत्रेय को; विदुर:--विदुर ने;प्रचक्रमे-- प्रयास किया

सूत गोस्वामी ने शौनक इत्यादि समस्त ऋषियों से आगे कहा : मैत्रेय ऋषि द्वारा श्रुव महाराजके विष्णुधाम में आरोहण का वर्णन किये जाने पर विदुर में भक्तिभाव का अत्यधिक संचार होउठा और उन्होंने मैत्रेय से इस प्रकार पूछा।

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विदुर उवाचके ते प्रचेतसो नाम कस्यापत्यानि सुब्रत ।

कस्यान्ववाये प्रख्याता: कुत्र वा सत्रमासत ॥

२॥

विदुरः उवाच--विदुर ने पूछा; के --कौन थे; ते--वे; प्रचेतस:--प्रचेतागण; नाम--नाम के; कस्य--किसके; अपत्यानि--पुत्र; सु-ब्रत--हे शुभ ब्रतधारी मैत्रेय; कस्य--किसके ; अन्ववाये--कुल में; प्रख्याता:-- प्रसिद्ध; कुत्र--कहाँ; वा-- भी;सत्रम्‌ू-यज्ञ; आसत--सम्पन्न हुआ

विदुर ने मैत्रेय से पूछा : हे महान्‌ भक्त, प्रचेतागण कौन थे? वे किस कुल के थे? वेकिसके पुत्र थे और उन्होंने कहाँ पर महान्‌ यज्ञ सम्पन्न किये ?"

मन्ये महाभागवतं नारदं देवदर्शनम्‌ ।

येन प्रोक्त: क्रियायोग: परिचर्याविधिहरे: ॥

३॥

मन्ये--सोचता हूँ; महा-भागवतम्‌--समस्त भक्तों में महान्‌; नारदम्‌--नारद मुनि को; देव--भगवान्‌; दर्शनम्‌--मिलने वाले;येन--जिसके द्वारा; प्रोक्त:--कहा गया; क्रिया-योग:-- भक्तियोग; परिचर्या--सेवा करने के लिए; विधि:--विधि; हरे:--भगवान्‌ की।

विदुर ने कहा : मैं जानता हूँ कि नारद मुनि समस्त भक्तों के शिरोमणि हैं।

उन्होंने भक्ति कीपांचरात्रिक विधि का संकलन किया है और भगवान्‌ से साक्षात्‌ भेंट की है।

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स्वधर्मशीलै: पुरुषैरभगवान्यज्ञपूरुष: ।

इज्यमानो भक्तिमता नारदेनेरित: किल ॥

४॥

स्व-धर्म-शीलै:--यज्ञ कर्म करते हुए; पुरुषै:--व्यक्तियों द्वारा; भगवान्‌ू-- भगवान्‌; यज्ञ-पूरुष:--समस्त यज्ञों के भोक्ता;इज्यमान: --पूजित होकर; भक्तिमता--भक्त द्वारा; नारदेन--नारद द्वारा; ईरित:--वर्णित; किल--निस्सन्देह

जब समस्त प्रचेता धार्मिक अनुष्ठान तथा यज्ञकर्म कर रहे थे और इस प्रकार भगवान्‌ कोप्रसन्न करने के लिए पूजा कर रहे थे तो नारद मुनि ने ध्रुव महाराज के दिव्य गुणों का वर्णनकिया।

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यास्ता देवर्षिणा तत्र वर्णिता भगवत्कथा: ।

महां शुश्रूषवे ब्रह्मन्कार््स्येनाचष्टमहसि ॥

५॥

या:--जो; ताः--वे सब; देवर्षिणा--नारद ऋषि द्वारा; तत्र--वहाँ; वर्णिता:--उल्लिखित; भगवत्‌-कथा:-- भगवान्‌ केकार्यकलापों से सम्बन्धित उपदेश; महाम्‌--मुझको; शुश्रूषवे--सुनने के लिए इच्छुक; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; कार्त्स्येन -- पूर्णतः;आच्ष्टम्‌ अर्हसि--कृपया बताइये ।

हे ब्राह्मण, नारद ने भगवान्‌ का किस प्रकार गुणगान किया और उस सभा में किनलीलाओं का वर्णन हुआ? मैं उन्हें सुनने का इच्छुक हूँ।

कृपया विस्तार से भगवान्‌ की उसमहिमा का वर्णन कीजिये।

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मैत्रेय उवाचध्रुवस्यथ चोत्कल: पुत्र: पितरि प्रस्थिते वनम्‌ ।

सार्वभौमश्रियं नैच्छद्धिराजासनं पितु: ॥

६॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; ध्रुवस्थ-- ध्रुव महाराज का; च-- भी; उत्कल:--उत्कल; पुत्र:--पुत्र; पितरि--पिता के पश्चात्‌;प्रस्थिते--चले जाने पर; वनम्‌--जंगल में; सार्ब-भौम--समस्त देशों सहित; भ्रियम्‌ू--सम्पदा; न ऐच्छत्‌ू--इच्छा नहीं की;अधिराज--राजसी; आसनमू--सिंहासन; पितु:ः--पिता के महामुनि

मैत्रेय ने उत्तर दिया : हे विदुर, जब श्रुव महाराज वन को चले गये तो उनके पुत्रउत्कल ने अपने पिता के वैभवपूर्ण राज सिंहासन की कोई कामना नहीं की, क्योंकि वह तो इसलोक के समस्त देशों के शासक के निमित्त था।

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स जन्मनोपशान्तात्मा निःसड्र: समदर्शन: ।

ददर्श लोके विततमात्मानं लोकमात्मनि ॥

७॥

सः--वह, उत्कल; जन्मना--अपने जन्म से ही; उपशान्त--अत्यन्त संतुष्ट, संतोषी; आत्मा--जीव; निःसड्र:--आसक्ति-रहित;सम-दर्शन:--समदर्शी ; ददर्श--देखा; लोके --संसार में; विततमू--फैला; आत्मानम्‌--परमात्मा; लोकम्‌--सारा संसार;आत्मनि--परमात्मा मेंउत्कल जन्म से ही पूर्णतया सन्तुष्ट था तथा संसार से अनासक्त था।

वह समदर्शी था, क्योंकिवह प्रत्येक वस्तु को परमात्मा में और प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में परमात्मा को स्थित देखता था।

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आत्मानं ब्रह्म निर्वाणं प्रत्यस्तमितविग्रहम्‌ ।

अवबोधरसैकात्म्यमानन्दमनुसन्ततम्‌ ॥

८ ॥

अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशय: ।

स्वरूपमवरुन्धानो नात्मनोन्यं तदैक्षत ॥

९॥

आत्मानम्‌--स्व; ब्रह्म--आत्मा; निर्वाणम्‌--अस्तित्व का लोप; प्रत्यस्तमित--रूका हुआ; विग्रहम्‌--पार्थक्य, वियोग;अवबोध-रस--ज्ञान के रस से; एक-आत्म्यम्‌ू--एकाकार; आनन्दम्‌--आनन्द; अनुसन्ततम्‌--विस्तीर्ण; अव्यवच्छिन्न--सतत;योग--योगाभ्यास से; अग्नि-- अग्नि से; दग्ध--जला हुआ; कर्म--सकाम इच्छाएँ; मल--मलिन; आशय:--अपने मन में;स्वरूपम्‌--स्वाभाविक स्थिति; अवरुन्धान:--अनुभव करते हुए; न--नहीं; आत्मन:--परमात्मा की अपेक्षा; अन्यम्‌ू--कुछभी; तदा--तब; ऐक्षत--देखा

उसने परब्रह्म के विषय में अपने ज्ञान के प्रसार द्वारा पहले ही शरीर-बन्धन से मुक्ति प्राप्तकर ली थी।

यह मुक्ति निर्वाण कहलाती है।

वह दिव्य आनन्द की स्थिति को प्राप्त था और उसीआनन्दमय स्थिति में रहता रहा, जो अधिकाधिक बढ़ती जा रही थी।

यह सतत भक्तियोग केकारण ही सम्भव था जिसकी तुलना अग्नि से की गई है, जो समस्त मलिन भौतिक वस्तुओं कोभस्म कर देती है।

वह सदैव आत्म-साक्षात्कार की अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहता था औरभगवान्‌ के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं देख सकता था और वह भक्तियोग में तल्‍लीन रहता था।

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जडान्धबधिरोन्मत्तमूकाकृतिरतन्मति: ।

लक्षितः पथि बालानां प्रशान्तार्चिरिवानल: ॥

१०॥

जड--मूर्ख; अन्ध--अन्धा; बधिर--बहरा; उन्मत्त--पागल; मूक --गूँगा; आकृति: -- आकृति; अ-तत्‌--उस प्रकार का नहीं;मतिः--बुद्धि; लक्षित:--देखा जाता था; पथि--मार्ग पर; बालानाम्‌--अल्पज्ञों द्वारा; प्रशान्त--शान्त; अर्चि:--ज्वालाओं सेयुक्त; इब--सहश; अनल:--अग्नि

अल्पज्ञानी राह चलते लोगों को उत्कल मूर्ख, अन्धा, गूँगा, बहरा तथा पागल सा प्रतीत होता था, किन्तु वह वास्तव में ऐसा था नहीं।

वह उस अग्नि के समान बना रहा जो राख से ढकी होनेके कारण लपटों से रहित होती है।

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मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धा: समन्त्रिण: ।

वबत्सरं भूपतिं चक्रुर्यवीयांसं भ्रमेः सुतम्‌ ॥

११॥

मत्वा--मान कर; तम्‌ू--उत्कल को; जडम्‌--बुद्धिहीन; उन्मत्तमू--पागल; कुल-वृद्धा:--कुल के गुरुजन; समन्त्रिण:--मंत्रियों समेत; वत्सरम्‌--वत्सर को; भू-पतिम्‌--संसार का शासक; चक्कु:--बनाया; यवीयांसम्‌--छोटा; भ्रमेः-- भ्रमि का;सुतम्‌-पुत्र |

फलत:ः मंत्रियों तथा कुल के समस्त गुरुजनों ने समझा कि उत्कल बुद्धिहीन और सचमुचही पागल है।

इस प्रकार उसका छोटा भाई, जिसका नाम वत्सर था और जो भ्रमि का पुत्र था,राजसिंहासन पर बिठा दिया गया और वह सारे संसार का राजा हो गया।

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स्वर्वथिर्वत्सरस्येष्टा भार्यासूत षडात्मजान्‌ ।

पुष्पार्ण तिग्मकेतुं च इषमूर्ज वसुं जयम्‌ ॥

१२॥

स्वर्वीधि: --स्वर्वीथि; वत्सरस्य--राजा वत्सर की; इष्टा--अत्यन्त प्रिय; भार्या--पत्नी ने; असूत--जन्म दिया; षघट्‌ू--छह;आत्मजान्‌--पुत्रों को; पुष्पार्णम्‌--पुष्पार्ण; तिग्मकेतुम्‌--तिग्मकेतु; च-- भी; इषम्‌--इष; ऊर्जम्‌--ऊर्ज; वसुम्‌--वसु;जयम्‌--जय

राजा वत्सर की अत्यन्त प्रिय पत्नी स्वर्वीथि थी और उस ने छह पुत्रों को जन्म दिया जिनकेनाम थे पुष्पार्ण, तिग्मकेतु, इष, ऊर्ज, वसु तथा जय।

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पुष्पार्णस्य प्रभा भार्या दोषा च द्वे बभूवतु: ।

प्रार्मध्यन्दिनं सायमिति ह्यासन्प्रभासुता: ॥

१३॥

पुष्पार्णस्य--पुष्पार्ण की; प्रभा--प्रभा; भार्या--पत्नी; दोषा--दोषा; च-- भी ; द्वे-- दो; बभूवतु: --थीं; प्रातः--प्रातः ;मध्यन्दिनमू--मध्यन्दिनम्‌; सायम्‌--सायम्‌; इति--इस प्रकार; हि--निश्चय ही; आसन्‌-- थे; प्रभा-सुताः--प्रभा के पुत्र

पुष्पार्ण के दो पत्नियाँ थीं, जिनके नाम प्रभा तथा दोषा थे।

प्रभा के तीन पुत्र हुए जिनकेनाम प्रातः, मध्यन्दिनम्‌ तथा सायम्‌ थे।

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प्रदोषो निशिथो व्युष्ट इति दोषासुतास्त्रय: ।

व्युष्ट: सुतं पुष्करिण्यां सर्ववेजसमादधे ॥

१४॥

प्रदोष: --प्रदोष; निशिथ:--निशिथ ; व्युष्ट: --व्युष्ट; इति--इस प्रकार; दोषा--दोषा के ; सुता:--पुत्र; त्रय:--तीन; व्युष्ट: --व्यूष्ट; सुतम्‌-पुत्र; पुष्करिण्याम्‌--पुष्करिणी में; सर्व-तेजसम्‌--सर्वतेजा ( सर्वशक्तिमान ) नामक; आदधे--उत्पन्न किया दोषा के तीन पुत्र थे--प्रदोष, निशिथ तथा व्युष्ट।

व्युप्ट की पत्ती का नाम पुष्करिणी था,जिसने सर्वतेजा नामक अत्यन्त बलशाली पुत्र को जन्म दिया।

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स चनश्लु: सुतमाकूत्यां पत्यां मनुमवाप ह ।

मनोरसूत महिषी विरजान्नड्वला सुतान्‌ ॥

१५॥

पुरुं कुत्सं त्रितं दुम्न॑ सत्यवन्तमृतं ब्रतम्‌ ।

अग्निष्टोममतीरात्र प्रद्युम्नं शिबिमुल्मुकम्‌ ॥

१६॥

सः--वह ( सर्वतेजा ); चक्षु;--चक्षु नामक; सुतम्‌--पुत्र; आकूत्याम्‌ू--आकृति में; पत्याम्‌-पत्नी में; मनुम्‌-चाक्षुष मनु;अवाप--प्राप्त किया; ह--निस्सन्देह; मनो: --मनु की; असूत--जन्म दिया; महिषी--रानी; विरजानू--निर्विकार; नड्वला--नड्वला ने; सुतान्‌--पुत्र; पुरुम्‌-पुरु; कुत्सम्‌-कुत्स; त्रितम्‌-त्रित; द्युम्मम्‌ू--झुम्न; सत्यवन्तम्‌--सत्यवान; ऋतम्‌--ऋत;ब्रतम्‌-ब्रत; अग्निष्टोमम्‌--अग्निष्टोम; अतीरात्रमू--अतितात्र; प्रद्मम्मम्‌--प्रद्यम्म; शिबिम्‌ू--शिबि; उल्मुकम्‌--उल्मुक कोस

र्वतेजा की पतली आकृति ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम चाक्षुष था, जो मनुकल्पान्त में छठा मनु बना।

चाक्षुष मनु की पत्नी नड्वला ने निम्नलिखित निर्दोष पुत्रों को जन्मदिया--पुरु, कुत्स, त्रित, झुम्न, सत्यवान्‌, ऋत, व्रत, अग्निष्टोमू, अतितरात्र, प्रद्यम्म, शित्रि तथाउल्मुक।

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उल्मुकोजनयत्पत्रान्पुष्करिण्यां षद्त्तमान्‌ ।

अड्डू सुमनसं ख्यातिं क्रतुमड्रिसं गयम्‌ ॥

१७॥

उल्मुक:--उल्मुक ने; अजनयत्‌--उत्पन्न किया; पुत्रान्‌ू--पुत्रों को; पुष्करिण्याम्‌--अपनी पतली पुष्करिणी सें; घटू--छह;उत्तमान्‌ू--अत्यन्त उत्तम; अड्भमू-- अंग; सुमनसम्‌--सुमना; ख्यातिम्‌-ख्याति; क्रतुम्‌-क्रतु; अड्धिस्‍सम्‌-- अंगिरा; गयम्‌--गय।

उल्मुक के बारह पुत्रों में से छह पुत्र उनकी पत्नी पुष्करिणी से उत्पन्न हुए।

वे सभी अति उत्तमपुत्र थे।

उनके नाम थे अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा तथा गय।

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सुनीथाडुस्य या पत्नी सुषुवे वेनमुल्बणम्‌ ।

यहौःशील्यात्स राजर्षिनिर्विण्णो निरगात्पुरातू ॥

१८॥

सुनीथा--सुनीथा; अड्डस्थ--अंग की; या--जो; पत्ती-- पत्नी; सुषुबे--जन्म दिया; वेनमू--वेन; उल्बणम्‌--अत्यन्त कुटिल;यत्‌--जिसका; दौःशील्यात्‌--बुरा आचरण होने से; सः--वह; राज-ऋषि: --राजर्षि अंग; निर्विण्ण:--अत्यन्त निराश;निरगात्‌--बाहर चला गया; पुरात्‌ू--घर से |

अंग की पत्नी सुनीथा से वेन नामक पुत्र उत्पन्न हुआ जो अत्यन्त कुटिल था।

साधु स्वभावका राजा अंग वेन के दुराचरण से अत्यन्त निराश था, फलत: उसने घर तथा राजपाट छोड़ दियाऔर जंगल चला गया।

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यमड़ शेपु: कुपिता वाग्वज़्ा मुनय:ः किल ।

गतासोस्तस्य भूयस्ते ममन्थुर्दक्षिणं करम्‌ ॥

१९॥

अराजके तदा लोके दस्युभिः पीडिताः प्रजा: ।

जातो नारायणांशेन पृथुराद्यः क्षितीश्वर: ॥

२०॥

यम्‌--जिसको ( वेन को ); अड़--हे विदुर; शेपु:--उन्होंने शाप दिया; कुपिता:--क्रुद्ध; वाक्‌-वज़ा:--जिनके शब्द बज्र केसमान कठोर हैं; मुनयः--बड़े-बड़े मुनि; किल--निस्सन्देह; गत-असो: --मरने के बाद; तस्य--उसका; भूय:--साथ ही; ते--वे; ममन्थु;--मथा; दक्षिणम्‌--दाहिना; करमू--हाथ; अराजके--बिना राजा के; तदा--तब; लोके--संसार में; दस्युभि: --बदमाशों तथा चोरों के द्वारा; पीडिता:--दुखी; प्रजा:--सभी नागरिक; जात:--उत्पन्न हुआ; नारायण-- भगवान्‌ के; अंशेन--आंशिक प्रतिरूप द्वारा; पृथु:--पुथु; आद्य:--मूल; क्षिति-ई श्वरः--संसार का शासक |

हे विदुर, जब ऋषिगण शाप देते हैं, तो उनके शब्द वज्ञ के समान कठोर होते हैं।

अत: जबउन्होंने क्रोधवश वेन को शाप दे दिया तो वह मर गया।

उसकी मृत्यु के बाद कोई राजा न होने सेचोर-उचक्के पनपने लगे, राज्य में अनियमितता फैल गयी और समस्त नागरिकों को भारी कष्टझेलना पड़ा।

यह देखकर ऋषियों ने बेन की दाहिनी भुजा को दण्ड मथनी बना लिया औरउनके मथने के कारण भगवान्‌ विष्णु अपने अंश रूप में संसार के आदि सप्राट राजा पृथु केरूप में अवतरित हुए।

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तस्य शीलनिधे: साधोर्ब्रह्मण्यस्य महात्मन: ।

राज्ञ: कथमभूहुष्टा प्रजा यद्विमना ययौ ॥

२१॥

विदुर: उवाच--विदुर ने कहा; तस्य--उसका ( अंग का ); शील-निधे: --उत्तम गुणों का आगार; साधो:--सन्तु पुरुष;ब्रह्मण्यस्थ--ब्राह्मण सभ्यता का प्रेमी; महात्मत:--महापुरुष; राज्:--राजा का; कथम्‌--किस तरह; अभूत्‌-- था; दुष्टा--बुरा;प्रजा--पुत्र; यत्‌ू--जिससे; विमना: -- अन्यमनस्क; ययौ--छोड़ दिया।

विदुर ने मैत्रेय से पूछा : हे ब्राह्मण, राजा अंग तो अत्यन्त भद्र था।

वह अत्यन्त चरित्रवानतथा साधु पुरुष था और ब्राह्मण-संस्कृति का प्रेमी था।

तो फिर इतने महान्‌ पुरुष के बेन जैसादुष्ट पुत्र कैसे उत्पन्न हुआ जिससे वह अपने राज्य के प्रति अन्यमनस्क हो उठा और उसे छोड़ दिया?"

कि वांहो वेन उद्दिश्य ब्रह्मदण्डमयूयुजन्‌ ।

दण्डब्रतधरे राज्ञि मुनयो धर्मकोबिदा: ॥

२२॥

किम्‌--क्यों; वा-- भी; अंह:--पापकर्म; वेने--वेन को; उद्दिश्य--देखकर; ब्रह्म-दण्डम्‌--ब्राह्मण का शाप; अयूयुजन्‌--दण्डित करना चाहा; दण्ड-ब्रत-धरे--जो दण्ड के डण्डे को धारण करता है; राज्ञि--राजा को; मुनयः--मुनिगण; धर्म-कोविदा:--धर्म से पूरी तरह ज्ञात

विदुर ने आगे पूछा कि महान्‌ धर्मात्मा ऋषियों ने राजा बेन को, जो स्वयं दण्ड देनेवालेदण्ड को धारण करनेवाला था, क्योंकर शाप देना चाहा और इस प्रकार उसे सबसे बड़ा दण्ड ( ब्रह्मशाप ) दे डाला ?"

नावध्येय: प्रजापाल: प्रजाभिरघवानपि ।

यदसौ लोकपालानां बिभर्त्योज: स्वतेजसा ॥

२३॥

न--कभी नहीं; अवध्येय:-- अपमानित होने के लिए; प्रजा-पाल: --राजा; प्रजाभि: --प्रजा द्वारा; अधवान्‌--पाप से पूर्ण;अपि--यद्यपि; यत्‌-- क्योंकि; असौ--वह; लोक-पालानाम्‌-- अनेक राजाओं का; बिभर्ति--पालन करता है; ओज:--ओज,तेज; स्व-तेजसा--व्यक्तिगत प्रभाव से |

प्रजा का कर्तव्य है कि वह राजा का अपमान न करे, चाहे यदाकदा वह अत्यन्त पापपूर्णकृत्य करता हुआ ही क्‍यों न प्रतीत हो।

अपने तेज के कारण राजा अन्य शासनकर्ता प्रमुखों सेसदैव अधिक प्रभावशाली होता है।

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एतदाख्याहि मे ब्रह्मन्सुनीथात्मजचेष्टितम्‌ ।

अ्रहदधानाय भक्ताय त्वं परावरवित्तम: ॥

२४॥

एतत्‌--ये सब; आख्याहि--वर्णन करें; मे--मुझसे; ब्रह्मनू--हे परम ब्राह्मण; सुनीथधा-आत्मज--सुनीथा के पुत्र वेन का;चेष्टितमू--कार्यकलाप; श्रद्धानाय-- श्रद्धालु, आज्ञाकारी; भक्ताय--अपने भक्त को; त्वम्‌--तुम; पर-अवर-- भूत तथाभविष्य सहित; वितू्‌-तम:--सुपरिचित |

विदुर ने मैत्रेय से अनुरोध किया : हे ब्राह्मण, आप भूत तथा भविष्य के समस्त विषयों मेंपारंगत हैं।

अतः मैं आपसे राजा वेन के समस्त कार्यकलापों को सुनना चाहता हूँ।

मैं आपकाश्रद्धालु भक्त हूँ, अतः आप इसे विस्तार से कहें।

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मैत्रेय उवाचअड्जो श्रमेधं॑ राजर्षिराजहार महाक्रतुम्‌ ।

नाजम्मुर्देवतास्तस्मिन्नाहूता ब्रह्मगादिभि: ॥

२५॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने उत्तर दिया; अड्भ:--राजा अंग ने; अश्वमेधम्‌-- अश्वमेध यज्ञ; राज-ऋषि:--साधु राजा; आजहार--सम्पन्न किया; महा-क्रतुम्‌ू--महान्‌ यज्ञ; न--नहीं; आजम्मु:--आये; देवता: --देवता; तस्मिन्‌--उस यज्ञ में; आहूता:--बुलायेगये; ब्रह्य-वादिभि: --यज्ञ करने में ब्राह्मणों द्वारा

श्री मैत्रेय ने उत्तर दिया : हे विदुर, एक बार राजा अंग ने अश्वमेध नामक महान्‌ यज्ञ सम्पन्नकरने की योजना बनाई।

वहाँ पर उपस्थित समस्त सुयोग्य ब्राह्मण जानते थे कि देवताओं काआवाहन कैसे किया जाता है, किन्तु उनके प्रयास के बावजूद भी किसी देवता ने न तो भागलिया और न ही कोई उस यज्ञ में प्रकट हुआ।

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तमूचुर्विस्मितास्तत्र यजमानमथर्त्विज: ।

हवींषि हूयमानानि न ते गृह्लन्ति देवता: ॥

२६॥

तम्‌ू--राजा अंग को; ऊचु:--कहा; विस्मिता:--आश्चर्यचकित; तत्र--वहाँ; यजमानम्‌--यज्ञ करानेवाले को; अथ--तब;ऋत्विज: --पुरोहित; हवींषि--शुद्ध घी की आहुतियाँ; हूयमानानि--डाले जाने पर; न--नहीं; ते--वे; गृह्वन्ति--स्वीकार करतेहैं; देवता:--देवतागण |

तब यज्ञ में लगे पुरोहितों ने राजा अंग को सूचित किया : हे राजन, हम यज्ञ में विधिपूर्वकशुद्ध घी की आहुति दे रहे हैं, किन्तु हमारे सारे यत्नों के बावजूद देवतागण उसे स्वीकार नहीं कररहे हैं।

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राजन्हवींष्यदुष्टानि श्रद्धयासादितानि ते ।

छन्दांस्थयातयामानि योजितानि धृतक्रतैः ॥

२७॥

राजनू--हे राजा; हवींषि---यज्ञ की बलि, होमसामग्री; अदुष्टानि--दूषित नहीं; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा सावधानी सहित;आसादितानि--एकत्र की गई; ते--तुम्हारे; छन्दांसि--मंत्र; अयात-यामानि--न्यून नहीं; योजितानि--विधिपूर्वक सम्पन्न; धृत-ब्रतैः--सुपात्र ब्राह्मणों द्वारा |

हे राजन, हमें ज्ञात है कि आपने अत्यन्त श्रद्धा तथा सावधानी से यज्ञ की सारी सामग्रीएकत्रित की है और वह दूषित नहीं है।

हमारे द्वारा उच्चरित वैदिक मंत्रों में भी किसी प्रकार कीकमी नहीं है क्योंकि यहां उपस्थित सभी ब्राह्मण तथा पुरोहित योग्य है और समस्त कृत्यों कोठीक से कर भी रहे हैं।

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न विदामेह देवानां हेलनं वयमण्वपि ।

यन्न गृहन्ति भागान्स्वान्ये देवा: कर्मसाक्षिण: ॥

२८ ॥

न--नहीं; विदाम--जान सकना; इह--इस प्रसंग में; देवानामू--देवताओं का; हेलनम्‌--तिरस्कार, उपेक्षा; वयम्‌--हम;अणु--सूक्ष्स; अपि-- भी; यत्‌--जिससे; न--नहीं; गृह्वन्ति--स्वीकार करते हैं; भागान्‌ू-- भाग, अंश; स्वान्‌ू--अपने-अपने;ये--जो; देवा:--देवतागण; कर्म-साक्षिण:--यज्ञ के साक्षी |

हे राजन, हमें ऐसा कोई कारण नहीं दिखता जिससे देवतागण अपने को किसी प्रकार सेअपमानित या उपेक्षित समझ सकें, तो भी यज्ञ के साक्षी देवता अपना भाग ग्रहण नहीं कर रहेहैं।

हमारी समझ में नहीं आता कि ऐसा क्‍यों है ?"

मैत्रेय उवाचअड़ोो द्विजवच: श्रुत्वा यजमानः सुदुर्मना: ।

तत्प्रष्टं व्यसृजद्वाचं सदस्यांस्तदनुज्ञया ॥

२९॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने उत्तर दिया; अड्ढ:--राजा अंग; द्विज-वच:--ब्राह्मणों के वचन; श्रुत्वा--सुनकर; यजमान: --यज्ञकर्ता;सुदुर्मना:--मन में अत्यन्त खिन्न; तत्‌ू--उसके सम्बध में; प्रष्टमू--पूछने के उद्देश्य से; व्यसृजत्‌ वाचम्‌ू--वह बोला; सदस्यान्‌--पुरोहितों से; तत्‌--उनकी; अनुज्ञया--अनुमति से |

मैत्रेय ने बतलाया कि पुरोहितों के इस कथन को सुनकर राजा अंग अत्यधिक खिन्न होउठा।

तब उसने पुरोहितों से कुछ कहने की अनुमति माँगी और यज्ञस्थल में उपस्थित समस्तपुरोहितों से उसने पूछा।

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नागच्छन्त्याहुता देवा न गृह्नन्ति ग्रहानिह ।

सदसस्पतयो ब्रूत किमवद्यं मया कृतम्‌ ॥

३०॥

न--नहीं; आगच्छन्ति--आ रहे हैं; आहुता:--आमंत्रित किये जाने पर; देवा: --देवगण; न--नहीं; गृह्वन्ति--स्वीकार कर रहेहैं; ग्रहान्‌-- भाग; इह--इस यज्ञ में; सदसः-पतय:--हे पुरोहितो; ब्रूत--कृपया बताएँ; किमू-- क्या; अवद्यमू--अपराध;मया--मेरे द्वारा; कृतम्‌ू--किया गया।

राजा अंग ने पुरोहित वर्ग को सम्बोधित करते हुए पूछा : हे पुरोहितो, आप कृपा करकेबताएँ कि मुझसे कौन सा अपराध हुआ है।

आमंत्रित होने पर भी देवता न तो यज्ञ में सम्मिलितहो रहे हैं और न अपना भाग ग्रहण कर रहे हैं।

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सदसस्पतय ऊचुःनरदेवेह भवतो नाघं तावन्मनाक्स्थितम्‌ ।

अस्त्येकं प्राक्तनमघं यदिहेहक्त्वमप्रज: ॥

३१॥

सदसः-पतय: ऊचु:--प्रधान पुरोहित ने कहा; नर-देव--हे राजन; इह--इस जीवन में; भवत:--आपका; न--नहीं; अघम्‌--पापकर्म; तावत्‌ मनाक्‌--रंचमात्र भी; स्थितम्‌--स्थित; अस्ति-- है; एकम्‌--एक; प्राक्तनम्‌--पूर्वजन्म में; अघम्‌--पापकर्म;यत्‌--जिससे; इह--जीवन में; ईहक्‌--इस प्रकार; त्वमू-तुम; अप्रज: --पुत्रहीन |

प्रधान पुरोहित ने कहा : हे राजन, हमें तो आपके इस जीवन में आप के मन से किया गयाभी कोई भी पापकर्म नहीं दिखता, अतः आप तनिक भी अपराधी नहीं हैं।

किन्तु हमें दिखता हैकि आपने पूर्वजन्म में पापकर्म किये हैं जिनके कारण समस्त गुणों के होते हुए भी आप पुत्रहीनहैं।

"

तथा साधय भद्वं ते आत्मानं सुप्रजं नूप ।

इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्र दास्यति यज्ञभुक्‌ू ॥

३२॥

तथा--अतः; साधय--प्राप्त करने के लिए यज्ञ करें; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; आत्मानम्‌-- अपना; सु-प्रजम्‌--उत्तमपुत्र; नृप--हे राजा; इष्ट:--पूजित होकर; ते--तुम्हारे द्वारा; पुत्र-कामस्य--पुत्र की कामना से; पुत्रमू--पुत्र; दास्यति--प्रदानकरेगा; यज्ञ-भुक्‌ू--यज्ञ का भोक्ता श्रीभगवान्‌ |

हे राजन, आपका कल्याण हो।

आपके कोई पुत्र नहीं हैं, अतः यदि आप तुरन्त भगवान्‌ सेप्रार्थना करें और पुत्र माँगें तथा यदि इस कार्य के लिए यज्ञ करें तो यज्ञभोक्ता भगवान्‌ आपकीकामना को पूर्ण करेंगे।

"

तथा स्वभागथधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः ।

यद्यज्ञपुरुष: साक्षादपत्याय हरिव्वृतः ॥

३३ ॥

तथा--तत्पश्चात्‌; स्व-भाग-धेयानि--यज्ञ में अपने-अपने भाग; ग्रहीष्यन्ति--ग्रहण करेंगे; दिब-ओकसः:--समस्त देवता;यत्‌--क्योंकि; यज्ञ-पुरुष:--समस्त यज्ञों का भोक्ता; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; अपत्याय--पुत्र के लिए; हरि: -- भगवान्‌; वृत:ः--आमंत्रित किया जाता है।

जब समस्त यज्ञों के भोक्ता हरि को पुत्र की कामना पूरी करने के लिए आमंत्रित कियाजाएगा, तो सभी देवता उनके साथ आएँगे और अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करेंगे।

"

तांस्तान्कामान्हरिदद्याद्यान्यान्‍्कामयते जनः ।

आराधितो यथेवैष तथा पुंसां फलोदय: ॥

३४॥

तान्‌ तानू--वही वही; कामान्‌--इच्छित वस्तुएँ; हरिः-- भगवान्‌; दद्यातू-देंगे; यान्‌ यानू--जो जो; कामयते--इच्छा करता;जनः--व्यक्ति; आराधित:--पूजित होकर; यथा--जिस तरह; एव--निश्चय ही; एब: -- भगवान्‌; तथा--उसी प्रकार; पुंसाम्‌ू--मनुष्यों का; फल-उदयः--फल।

यज्ञों का कर्ता ( कर्मकाण्ड के अन्तर्गत ) जिस कामना से भगवान्‌ की पूजा करता है, वहकामना पूरी होती है।

"

इति व्यवसिता विप्रास्तस्य राज्ञः प्रजातये ।

पुरोडाशं निरवपन्शिपिविष्टाय विष्णवे ॥

३५॥

इति--इस प्रकार; व्यवसिता:--निश्चय करके; विप्रा: --समस्त ब्राह्मण; तस्य--उसके; राज्:--राजा के; प्रजातये--पुत्र-प्राप्तिके उद्देश्य से; पुरोडाशम्‌--यज्ञ की सामग्री; निरवपन्‌--प्रदान की; शिपि-विष्टाय--यज्ञ की अग्नि में स्थित, भगवान्‌ को;विष्णवे-- भगवान्‌ विष्णु को |

इस प्रकार राजा अंग को पुत्र प्राप्ति कराने के लिए उन्होंने घट-घट वासी भगवान्‌ विष्णु कोआहुतियाँ अर्पित करने का निश्चय किया।

"

तस्मात्पुरुष उत्तस्थौ हेममाल्यमलाम्बर: ।

हिरण्मयेन पात्रेण सिद्धमादाय पायसम्‌ ॥

३६॥

तस्मात्‌--उस अग्नि से; पुरुष:--पुरुष; उत्तस्थौ--प्रकट हुआ; हेम-माली--सोने का हार पहने; अमल-अम्बर: -- श्वेत वन्त्नों में;हिरण्मयेन--सुनहले; पात्रेण--पात्र से; सिद्धमू--पकाया हुआ; आदाय--लाकर; पायसम्‌--खीर

अग्नि में आहुति डालते ही, अग्निकुण्ड से सोने का हार पहने तथा श्वेत वस्त्र धारण कियेएक पुरुष प्रकट हुआ।

वह एक स्वर्णपात्र में खीर लिये हुए था।

"

स विप्रानुमतो राजा गृहीत्वाज्ललिनौदनम्‌ ।

अवष्नाय मुदा युक्तः प्रादात्पत्या उदारधीः ॥

३७॥

सः--वह; विप्र--ब्राह्मणों की; अनुमत:-- अनुमति से; राजा--राजा; गृहीत्वा--लेकर; अद्जलिना--अंजुली में; ओदनम्‌--खीर; अवध्राय--सूँघ कर; मुदा--अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; युक्त:--सहित; प्रादात्‌--प्रदान किया; पत्यै--अपनी पत्नी को;उदार-धी:--उदार हृदय |

राजा अत्यन्त उदार था।

उसने पुरोहितों की अनुमति से उस खीर को अपनी अंजुली में लेलिया और फिर सूँघ कर उसका एक भाग अपनी पतली को दे दिया।

"

सा तत्पुंसवन राज्ञी प्राश्य वै पत्युरादथे ।

गर्भ काल उपावृत्ते कुमारं सुषुवेप्रजा ॥

३८ ॥

सा--वह; तत्‌--वह खीर; पुमू-सवनम्‌--जिससे पुत्र उत्पन्न होता है; राज्ञी--रानी; प्राशय--खाकर; बै--निस्सन्देह; पत्यु:--पति से; आदधे-- धारण किया; गर्भम्‌-गर्भ; काले--उचित समय पर; उपावृत्ते--प्रकट हुआ; कुमारम्‌--पुत्र; सुषुबे--जन्मदिया; अप्रजा--सन्तानहीन |

यद्यपि रानी को कोई पुत्र न था, किन्तु पुत्र उत्पन्न करने की शक्ति वाली उस खीर के खानेसे, वह अपने पति के सहवास से गर्भवती हो गई और यथासमय उसने एक पुत्र को जन्म दिया।

"

स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रत: ।

अधर्माशोद्धवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिक: ॥

३९॥

सः--वह; बाल:--बालक; एव--निश्चय ही; पुरुष: --नर; माता-महम्‌--नाना; अनुव्रत:--पालक, अनुगामी; अधर्म--अधर्मका; अंश--एक अंश से; उद्धवम्‌--प्रकट, अवतीर्ण; मृत्युम्‌ू--मृत्यु; तेन--इससे; अभवत्‌--हुआ; अधार्मिक:--धर्म को नमाननेवाला।

वह बालक अंशत: अधर्म के वंश में उत्पन्न था।

उसका नाना साक्षात्‌ मृत्यु था और वहबालक उसका अनुगामी बना और अत्यन्त अधार्मिक व्यक्ति बन गया।

"

स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचर: ।

हन्त्यसाधुरमृगान्दीनान्वेनो सावित्यरौज्जन: ॥

४०॥

सः--वह, वेन नामक बालक; शरासनमू्‌-- अपना धनुष; उद्यम्य--लेकर; मृगयु:--शिकारी; वन-गोचर: --जंगल में जाकर;हन्ति--मारता था; असाधु:--अत्यन्त क्रूर होकर; मृगान्‌--मृगों को; दीनानू--दीन; वेन: --वेन; असौ--वह रहा, वह आया;इति--इस प्रकार; अरौत्‌--चिल्लाते; जन:--सभी लोग।

वह दुष्ट बालक धनुष-बाण चढ़ाकर जंगल में जाता और वृथा ही निर्दोष ( दीन ) हिरनों कोमार डालता।

ज्योंही वह आता कि सभी लोग चिल्ला उठते, 'वह आया क्रूर बेन! वह आया क्रूरबेन!'" आक्रीडे क्रीडतो बालान्ववस्थानतिदारुण: ।

प्रसह्य निरनुक्रोशः पशुमारममारयत्‌ ॥

४१॥

आक्रीडे-- खेल के मैदान में; क्रीडत:ः--खेलता हुआ; बालान्‌ू--लड़के; वयस्यान्‌--अपनी उप्र के; अति-दारुण:--अत्यन्तक्रूर; प्रसह्ा--बल से; निरनुक्रोश: --निर्दयतापूर्वक; पशु-मारम्‌--मानो पशु की हत्या कर रहा हो; अमारयत्‌--मारता था।

वह बालक ऐसा क्रूर था कि समवयस्क बालकों के साथ खेलते हुए उन्हें इतनी निर्दयता केसाथ मारता मानो वे बध किये जाने वाले पशु हों।

"

तं विचक्ष्य खल॑ पुत्र शासनैर्विविधे्नूप: ।

यदा न शासितुं कल्पो भृशमासीत्सुदुर्मना: ॥

४२॥

तम्‌--उसे; विचक्ष्य--देख कर; खलम्‌--क्रूर; पुत्रम्‌-पुत्र को; शासनै:--दण्ड द्वारा; विविधै:--विविध प्रकार के; नृप:--राजा; यदा--जब; न--नहीं; शासितुम्‌--वश में करने के लिए; कल्प:--समर्थ; भूशम्‌--अत्यधिक; आसीत्‌--हो गया; सु-दुर्मना:--खित्न ।

अपने पुत्र बेन का क्रूर तथा निष्ठर आचरण देख कर, राजा अंग ने उसे सुधारने के लिएतरह-तरह के दण्ड दिये, किन्तु वह उसे सन्मार्ग में न ला सका।

वह इस प्रकार से अत्यधिकखिन्न रहने लगा।

"

प्रायेणाभ्यर्चितो देवो येप्रजा गृहमेधिन: ।

कदपत्यभृतं दुःखं ये न विन्दन्ति दुर्भरम्‌ ॥

४३॥

प्रायेण--सम्भवत:; अभ्यर्चित:--पूजा किया गया; देव: -- भगवान्‌; ये-- जो; अप्रजा: --पुत्रहीन; गृह-मेधिन: --गृहस्थ लोग;कद््‌-अपत्य--बुरे पुत्र से; भृतम्‌-- उत्पन्न; दुःखम्‌--दुख; ये--जो; न--नहीं; विन्दन्ति--कष्ट भोगते हैं; दुर्भरम्‌--असहनीय ।

राजा ने मन में सोचा कि पुत्रहीन व्यक्ति निश्चय ही भाग्यशाली हैं।

उन्होंने अवश्य हीपूर्वजन्मों में भगवान्‌ की पूजा की होगी जिससे उन्हें किसी कुपुत्र द्वारा दिया गया असह्य दुख नउठाना पड़े।

"

यतः पापीयसी कीर्तिरधर्मश्च महान्रणाम्‌ ।

यतो विरोध: सर्वेषां यत आधिरनन्तक: ॥

४४॥

यतः--कुपुत्र के कारण; पापीयसी--पापमय; कीर्ति:--यश; अधर्म:--अधर्म; च-- भी; महान्‌--महान; नृणाम्‌-- मनुष्यों का;यतः--जिससे; विरोध: --झगड़ा; सर्वेषाम्‌--समस्त लोगों का; यत:ः--जिससे; आधि:--चिन्ता; अनन्तक:--अपार, असीम

पापी पुत्र के कारण मनुष्य का यश मिट्टी में मिल जाता है।

उसके अधार्मिक कृत्यों से घर मेंअधर्म और सबों में झगड़ा फैलता है।

इससे केवल अन्तहीन तनाव ही उत्पन्न होता है।

"

कस्तं प्रजापदेशं वै मोहबन्धनमात्मन: ।

पण्डितो बहु मन्येत यदर्था: क्लेशदा गृहा: ॥

४५॥

'कः--कौन; तम्‌--उसको ; प्रजा-अपदेशम्‌--केवल नाम का पुत्र; वै--निश्चय ही; मोह--मोह का; बन्धनम्‌--बन्धन;आत्मन:--आत्मा के लिए; पण्डित:--बुद्धिमान पुरुष; बहु मन्येत--सम्मान करेगा; यत्‌-अर्था: --जिसके कारण; क्लेश-दाः--कष्ट-कारक; गृहा:--घर

ऐसा कौन समझदार और बुद्धिमान है, जो इस तरह का निकम्मा पुत्र चाहेगा? ऐसा पुत्रजीवात्मा के लिए मोह का बन्धनमात्र होता है और वह मनुष्य के घर को दुखी बनाता है।

"

कदपत्यं वरं मनन्‍्ये सदपत्याच्छुचां पदात्‌ ।

निर्विद्येत गृहान्मत्यों यत्कलेशनिवहा गृहा: ॥

४६॥

कद््‌-अपत्यमू--कुपुत्र; वरम्‌-- श्रेष्ठ; मन्ये--मैं सोचता हूँ; सत्‌-अपत्यात्‌-- अच्छे पुत्र की अपेक्षा; शुचामू-शोक का;पदातू--साधन; निर्विद्येत--विरक्त हो जाता है; गृहात्‌-घर से; मर्त्य:--मरणशील मनुष्य; यत्‌--जिसके कारण; क्लेश-निवहा:--नारकीय; गृहा:--घर |

तब राजा ने सोचा : सुपुत्र की अपेक्षा कुपुत्र ही अच्छा है, क्योंकि सुपुत्र से घर के प्रतिआसक्ति उत्पन्न होती है, किन्तु कुपुत्र से नहीं।

कुपुत्र घर को नरक बना देता है, जिससे बुद्धिमान मनुष्य सरलता से अपने को अनासक्त कर लेता है।

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एवं स निर्विण्णमना नृपो गृहा-न्रिशीथ उत्थाय महोदयोदयात्‌ ।

अलब्धनिद्रोनुपलक्षितो नृभि-हित्वा गतो वेनसुव॒ं प्रसुप्ताम्‌ ॥

४७॥

एवम्‌--इस प्रकार; सः--वह; निर्विणण-मना: --उदास मन; नृप:--राजा अंग; गृहात्‌--घर से; निशीथे--अर्द्ध॑रात्रि में;उत्थाय--उठकर; महा-उदय-उदयात्‌--महापुरुषों के आशीर्वाद से ऐश्वर्ययुक्त; अलब्ध-निद्र:--बिना नींद के; अनुपलक्षित: --बिना दिखे; नृभि:--मनुष्यों के द्वारा; हित्वा--त्याग कर; गत:--चला गया; वेन-सुवम्‌--वेन की माता को; प्रस॒ुप्तामू--गहरीनिद्रा में मग्न

इस प्रकार से सोचते हुए राजा अंग को रात भर नींद नहीं आई।

वह गृहस्थ जीवन से पूर्णतःउदास हो गया।

अतः एक दिन अर्धरात्रि में वह अपने बिस्तर से उठा और बेन की माता ( अपनीपत्नी ) को गहरी निद्रा में सोते हुए छोड़कर चला गया।

उसने अपने महान्‌ ऐश्वर्यमय राज्य कामोह त्याग दिया और चुपके से अपना घर तथा ऐश्वर्य छोड़कर जंगल की ओर चला गया।

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विज्ञाय निर्विद्य गतं पतिं प्रजा:पुरोहितामात्यसुहद्गणादय: ।

विचिक्युरुव्यामतिशोककातरायथा निगूढं पुरुष कुयोगिन: ॥

४८ ॥

विज्ञाय--जानकर; निर्विद्य--उदास; गतम्‌--चला गया; पतिम्‌--राजा; प्रजा:--समस्त नागरिक; पुरोहित--पुरोहित;आमात्य--मंत्री; सुहृत्‌ू-मित्र; गण-आदय: --तथा सामान्यजन; विचिक्यु:--खोजने लगे; उर्व्याम्‌--पृथ्वी पर; अति-शोक-कातरा:--अ त्यन्त दुखी होकर; यथा--जिस प्रकार; निगूढम्‌--छिपा हुआ; पुरुषम्‌--परमात्मा को; कु-योगिन:--अनुभवहीनयोगी

जब यह पता चला कि राजा ने उदास होकर गृहत्याग कर दिया है, तो समस्त नागरिक,पुरोहित, मंत्री, मित्र तथा सामान्यजन अत्यन्त दुखी हुए।

वे सर्वत्र उसकी खोज करने लगे जैसेकोई अनुभवहीन योगी अपने भीतर परमात्मा की खोज करता है।

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अलक्षयन्तः पदवीं प्रजापते-ईतोद्यमा: प्रत्युपसृत्य ते पुरीम्‌ ।

ऋषीन्समेतानभिवन्द्य साश्रवोन्यवेदयन्पौरव भर्तृविप्लवम्‌ ॥

४९॥

अलक्षयन्त:--न पाकर; पदवीम्‌ू--कोई चिह्न, पता; प्रजापते:--राजा अंग का; हत-उद्यमा: --निराश होकर; प्रत्युपसृत्य--लौटकर; ते--वे नागरिक; पुरीमू--नगर को; ऋषीन्‌--ऋषि; समेतान्‌ू--एकत्रित; अभिवन्द्य--नमस्कार करके; स-अश्रव:--आँखों में आँसू भर कर; न्यवेदयन्‌--सूचित किया, निवेदन किया; पौरव--हे विदुर; भर्त्‌--राजा की; विप्लवम्‌--अनुपस्थिति।

जब सर्वत्र खोज करने पर नागरिकों को राजा का कोई पता न चला तो वे अत्यधिक निराशहुए और नगर को लौट आये, जहाँ पर राजा की अनुपस्थिति के कारण देश के समस्त बड़े-बड़ेऋषि एकत्र हुए थे।

अश्रुपूरित नागरिकों ने ऋषियों को नमस्कार किया और विस्तारपूर्वकबताया कि वे कहीं भी राजा को नहीं पा सके ।

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