← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 4 की सूची

अध्याय अट्ठाईसवां: पुरंजना अगले जन्म में एक महिला बनती है

4.28नारद उबवा सैनिका भयनाम्नो ये बर्दिष्मन्दिष्टकारिण: ।

प्रज्वारकालकन्या भ्यां विचेरुरवनीमिमाम्‌ ॥

१॥

नारद: उवाच--नारद मुनि ने कहा; सैनिका:--सैनिक; भय-नाम्त:-- भय के; ये--जो; बर्हिष्पन्‌ू-- हे राजा प्राचीनबर्हिषत्‌;दिष्ट-कारिण: --काल की आज्ञा के पालक; प्रज्वार--प्रज्वार; काल-कन्याभ्यामू-- तथा कालकन्या सहित; विचेरु: --घूमनेलगे; अवनीम्‌-पृथ्वी पर; इमामू-इस |

नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा प्राचीनबर्हिषत्‌, तत्पश्चात्‌ यवनराज साक्षात्‌ भय, प्रज्वार, काल-कन्या तथा अपने सैनिकों सहित सारे संसार में विचरने लगा।

"

त एकदा तु रभसा पुरझ्जनपुरी नूप ।

रुरुधुरभौमभोगाढ्य़ां जरत्पन्नगपालिताम्‌ ॥

२॥

ते--वे; एकदा--एक बार; तु--तब; रभसा--अ त्यन्त वेग से; पुरक्षन-पुरीम्‌--पुरझ्न की नगरी को; नृप--हे राजा; रुरुधु: --घेर लिया; भौम-भोग-आढ्य्ाम्‌--इन्द्रियभोग से परिपूर्ण; जरत्‌--बूढ़ा; पन्नग--सर्प द्वारा; पालिताम्‌--सुरक्षित |

एक बार इन भयानक सैनिकों ने पुरझन-नगरी पर बड़े वेग से आक्रमण किया।

यद्यपि यहनगरी भोग की सारी सामग्री से परिपूर्ण थी, किन्तु इसकी रखवाली एक बूढ़ा सर्प कर रहा था।

"

कालकन्यापि बुभुजे पुरझ्ञनपुरं बलातू ।

ययाभिभूतः पुरुष: सद्यो निःसारतामियात्‌ ॥

३॥

काल-कन्या--काल की पुत्री ने; अपि--भी; बुभुजे--अधिकार कर लिया; पुरझ्ञन-पुरम्‌--पुरञझ्षन की नगरी पर; बलातू--बलपूर्वक; यया--जिसके द्वारा; अभिभूत:--चंगुल में फँसकर; पुरुष: --मनुष्य; सद्यः--तुरन्त; निःसारतामू--निकम्मापन;इयात्‌--प्राप्त करता है

धीरे-धीरे कालकन्या ने घातक सैनिकों की सहायता से पुरञझ्नन की नगरी के समस्त वासियोंपर आक्रमण कर दिया और उन्हें सभी प्रकार से निकम्मा बना दिया।

"

तयोपभुज्यमानां वै यवना: सर्वतोदिशम्‌ ।

द्वार्भि: प्रविश्य सुभूशं प्रार्दयन्सकलां पुरीम्‌ ॥

४॥

तया--कालक-न्या द्वारा; उपभुज्यमानाम्‌-- अधिकृत; बै--निश्चय ही; यवना:--यवनगण; सर्वतः-दिशम्‌--सभी दिशाओं से;द्वार्भि:--द्वारों से; प्रविश्य--घुस कर; सु-भूशम्‌-- अत्यधिक; प्रार्दयन्‌--कष्ट देते हुए; सकलामू--सर्वत्र; पुरीम्‌--नगरी में |

जब कालकन्या ने शरीर पर आक्रमण किया, तो यवनराज के घातक सैनिक विभिन्न द्वारोंसे नगरी में घुस आये।

फिर वे सभी नागरिकों को अत्यधिक कष्ट देने लगे।

"

तस्यां प्रपीड्यमानायामभिमानी पुरझ्जनः ।

अवापोरुविधांस्तापान्कुटुम्बी ममताकुल: ॥

५॥

तस्याम्‌ू--उस नगरी के; प्रपीड्यमानायाम्‌--विभिन्न कष्टों में पड़ कर; अभिमानी--अत्यधिक लिप्त; पुरञ्नन:--राजा पुरझ्ञन ने;अवाप- प्राप्त किया; उरु--अनेक; विधानू--प्रकार के; तापानू--क्लेश; कुटुम्बी--परिवार वाले; ममता-आकुल: --परिवारसे लगाव के कारण अत्यधिक व्यग्र।

जब इस प्रकार वह नगरी सैनिकों तथा कालकन्या के द्वारा विपदाग्रस्त हो गई तो अपनेपरिवार की ममता में लिप्त राजा पुरकझ्षन यवनराज तथा काल-कन्या के आक्रमण से संकट मेंपड़ गया।

"

कन्योपगूढो नष्टश्री: कृपणो विषयात्मक: ।

नष्टप्रज्ञो हतैश्वर्यों गन्धर्वयवनेर्बलातू ॥

६॥

कन्या--कालक-्या के द्वारा; उपगूढः--आलिंगित होकर; नष्ट- श्री:--समस्त सौंदर्य से रहित; कृपण: --कंजूस; विषय-आत्मकः--इन्द्रियतृप्ति में लिप्त; नष्ट-प्रज्ञः--बुद्धि से विहीन; हृत-ऐश्वर्य:--ऐश्वर्य से वंचित; गन्धर्व--गन्धर्वों; यवनैः--तथायवनों द्वारा; बलातू--बलपूर्वक

कालकया द्वारा आलिंगन किए जाने से धीरे-धीरे राजा पुरज्नन का सारा शारीरिक सौंदर्य जाता रहा।

अत्यधिक विषयासक्त होने से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई और उसका सारा ऐश्वर्य नष्ट होगया।

सभी कुछ खो जाने पर गन्धर्वों तथा यवनों ने उसे बलपूर्वक जीत लिया।

"

विशीर्णा स्वपुरीं वीक्ष्य प्रतिकूलाननाहतान्‌ ।

पुत्रान्पौत्रानुगामात्याज्ञायां च गतसौहदाम्‌ ॥

७॥

विशीर्णाम्‌-छिन्न-भिन्न; स्व-पुरीम्‌-- अपनी नगरी को; वीक्ष्य--देखकर; प्रतिकूलान्‌--प्रतिकूल बातें; अनाहतान्‌ू-- अनाहतहोकर; पुत्रान्‌--पुत्रों को; पौत्र--नाती; अनुग--नौकर; अमात्यान्‌--मंत्रीगण को; जायाम्‌--स्त्री को; च--यथा; गत-सौहदाम्‌-प्रतिकूल

तब राजा पुरञ्ञन ने देखा कि उसकी नगरी अस्त-व्यस्त हो गई है और उसके पुत्र, पौत्र,नौकर तथा मंत्री सभी क्रमशः उसके विरोधी बनते जा रहे हैं।

उसने यह भी देखा कि उसकीपतली स्नेहशून्य एवं अन्यमनस्क हो रही है।

"

आत्मानं कन्यया ग्रस्तं पञ्नालानरिदूषितान्‌ ।

दुरनन्‍्तचिन्तामापन्नो न लेभे तत्प्रतिक्रियाम्‌ ॥

८॥

आत्मानम्‌--अपने आपको; कन्यया--कालक-्य द्वारा; ग्रस्तम्‌ू--आलिंगित; पञ्ञालानू--पञ्ञाल; अरि-दूषितान्‌ू--शत्रुओं सेदूषित; दुरन्‍्त--अलंघ्य; चिन्तामू--चिन्ता; आपन्न:--प्राप्त करके; न--नहीं; लेभे--प्राप्त किया; तत्‌--उसका; प्रतिक्रियाम्‌--उपाय।

जब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसके परिवार के समस्त प्राणी, उसके सम्बन्धी, अनुचर,दास, मंत्री तथा अन्य सभी उसके विरुद्ध हो गये हैं, तो वह अत्यन्त चिन्तित हुआ।

किन्तु उसे इसस्थिति से छूटने का कोई उपाय न दिखाई दिया, क्योंकि वह कालक-्या द्वारा बुरी तरह परास्तकर दिया गया था।

"

कामानभिलषन्दीनो यातयामांश्व कन्यया ।

विगतात्मगतिस्नेहः पुत्रदारांश्व लालयन्‌ ॥

९॥

कामान्‌--सुख के साधन; अभिलषन्‌--अभिलाषा करते हुए; दीन:--बेचारा; यात-यामान्‌--बासी; च-- भी; कन्यया--'कालकन्या के प्रभाव से; विगत--खोया हुआ; आत्म-गति--जीवन का असली लक्ष्य; स्नेहः:--आसक्ति; पुत्र--पुत्रों; दारान्‌ू--पतली; च--तथा; लालयन्‌--दुलारते हुए।

कालकन्या के प्रभाव से विषयभोग की सारी वस्तुएँ बासी पड़ गई थीं।

अपनी कामेच्छाओंके बने रहने के कारण राजा पुरज्जन अत्यन्त दीन बन चुका था।

उसे अपने जीवन-लक्ष्य का भीपता न था।

वह अब भी अपनी पत्नी तथा बच्चों के प्रति अत्यन्त आसक्त था और उनके पालन के सम्बन्ध में चिन्तित था।

"

गन्धर्वयवनाक्रान्तां कालकन्योपमर्दिताम्‌ ।

हातुं प्रचक्रमे राजा तां पुरीमनिकामतः ॥

१०॥

गन्धर्व--गन्धर्व सैनिकों; यवन--तथा यवन सैनिकों द्वारा; आक्रान्तामू--हराया हुआ; काल-कन्या--कालक-्या द्वारा;उपमर्दितामू--कुचला हुआ; हातुम्‌-त्यागने के लिए; प्रचक्रमे--बाध्य हुआ; राजा--राजा पुरज्ञन; ताम्‌--उस; पुरीम्‌--पुरीको; अनिकामत:-- अनिच्छित |

राजा पुरञ्नन की नगरी गन्धर्व तथा यवन सैनिकों द्वारा जीत ली गई और यद्यपि राजा इसनगरी को त्यागना नहीं चाहता था, किन्तु परिस्थितिवश उसे ऐसा करना पड़ा, क्योंकिकालकन्या ने उसे कुचल दिया था।

"

भयनाम्नोग्रजो क्राता प्रज्वारः प्रत्युपस्थितः ।

ददाह तां पुरी कृत्स्नां भ्रातु: प्रियचिकीर्षया ॥

११॥

भय-नाम्न:--भय नामक; अग्र-ज:--बड़ा; भ्राता-- भाई; प्रज्वार: --प्रज्वार ने; प्रत्युपस्थित:--वहाँ उपस्थित होकर; ददाह--आग लगा दी; ताम्‌--उस; पुरीम्‌-पुरी में; कृत्स्नामू-पूरी तरह से; भ्रातु:--अपने भाई को; प्रिय-चिकीर्षया--प्रसन्न करने केलिए

ऐसी दशा में यवनराज के बड़े भाई प्रज्वार ने अपने छोटे भाई भय को प्रसन्न करने के लिएनगरी में आग लगा दी।

"

तस्यां सन्दह्ममानायां सपौर: सपरिच्छद: ।

कौटुम्बिक: कुटुम्बिन्या उपातप्यत सान्वय: ॥

१२॥

तस्याम्‌ू--उस पुरी के; सन्दह्ममानायाम्‌-- अग्नि में प्रज्वति होने पर; स-पौर:--समस्त पुरवासियों सहित; स-परिच्छद: --समस्तनौकरों तथा भृत्यों सहित; कौटुम्बिक:-- अनेक सम्बन्धियों वाला राजा; कुटुम्बिन्या--अपनी पत्नी सहित; उपातप्यत--उसअग्नि का ताप सहने लगा; स-अन्वयः--अपने अनुचरों सहित |

जब सारी नगरी जलने लगी तो सारे नागरिक तथा राजा के नौकर, उसके परिवार केसदस्य, पुत्र, पौत्र, पत्तनियाँ तथा अन्य सम्बन्धी अग्नि की चपेट में आ गये।

इस प्रकार राजापुरझ्न अत्यन्त दुखी हो गया।

"

यवनोपरूद्धायतनो ग्रस्तायां कालकन्यया ।

पुर्या प्रज्वारसंसृष्ट: पुरपालोउन्वतप्यत ॥

१३॥

यवन--यवतनों द्वारा; उपरुद्ध--आक्रमण किया गया; आयतन:--अपना घर; ग्रस्तायाम्‌-- अधिकार में किया गया; काल-कन्यया--कालकन-्य द्वारा; पुर्यामू--नगरी; प्रज्वार-संसृष्ट:--प्रज्वार द्वारा निकट पहुँचा जाकर; पुर-पाल:--नगरी का पालक;अन्वतप्यत-- अत्यन्त दुखी हुआ

जब नगरी की रखवाली करने वाले सर्प ने देखा कि नागरिकों पर काल-कन्या काआक्रमण हो रहा है, तो वह यह देखकर अत्यन्त सन्तप्त हुआ कि यवनों ने आक्रमण करकेउसके घर में आग लगा दी है।

"

न शेके सोवितुं तत्र पुरुकृच्छोरुवेषथु: ।

गन्तुमैच्छत्ततो वृक्षकोटरादिव सानलातू ॥

१४॥

न--नहीं; शेके --समर्थ; सः--वह; अवितुम्‌--रक्षा करने में; तत्र--वहाँ; पुरु-- अत्यधिक; कृच्छू--कठिनाई; उरू--बड़ी;वेपथु:--पीड़ा; गन्तुमू--बाहर जाने के लिए; ऐच्छत्‌--इच्छा की; ततः--वहाँ से; वृक्ष--वृक्ष के; कोटरातू--कोटर से; इब--सहश; स-अनलातू--अग्नि लगे हुए

जिस प्रकार जंगल में आग लगने पर वृक्ष के कोटर में रहने वाला सर्प उस वृक्ष को छोड़नाचाहता है, उसी प्रकार वह नगर अधीक्षक सर्प भी अग्नि के प्रचण्ड ताप के कारण नगरी छोड़नेके लिए इच्छुक हो उठा।

"

शिथिलावयवो यर्हि गन्धर्वेद्तपौरुष: ।

यवनैररिभी राजन्नुपरुद्धो रुरोद ह ॥

१५॥

शिधिल--ढीले; अवयव:--अंग-प्रत्यंग; यहिं-- जब; गन्धर्वै: --गन्धर्वों के द्वारा; हत--पराजित; पौरुष: --शारीरिक शक्ति;यवनैः--यवतनों के द्वारा; अरिभि: --शत्रुओं द्वारा; राजन्‌--हे राजा प्राचीनबर्हिषत्‌; उपरुद्धः--रोके जाने पर; रुरोद--जोर सेचिल्लाया; ह--वस्तुत: |

गन्धर्वों तथा यवन सैनिकों द्वारा उस सर्प के शरीर के अंग जर्जर कर दिए गए, क्योंकिउन्होंने उसकी शारीरिक शक्ति को परास्त कर दिया था।

जब उसने शरीर त्यागना चाहा तो उसकेशत्रुओं ने रोक लिया।

अपने प्रयास में विफल होने के कारण वह जोर से चीत्कार करने लगा।

"

दुहितृः पुत्रपौत्रां श्र जामिजामातृपार्षदान्‌ ।

स्वत्वावशिष्ट यत्किल्चिद्गृहकोशपरिच्छदम्‌ ॥

१६॥

दुहितृः--पुत्रियों; पुत्र--पुत्रों; पौत्रानू--नातियों के विषय में; च--तथा; जामि--बहुओं; जामातृ--दामादों; पार्षदान्‌-पार्ष दों;स्वत्व--सम्पत्ति; अवशिष्टम्‌-शेष; यत्‌ किल्ञित्‌--जो कुछ भी; गृह--घर; कोश--खजाना; परिच्छदम्‌-घरेलू साज-सामान

तब राजा पुरज्न अपनी पुत्रियों, पुत्रों, पौत्रों, पुत्रवधुओं, जामाता, नौकरों तथा अन्य पार्षदोंके साथ-साथ अपने घर, घर के सारे साज-सामान तथा जो कुछ भी सश्नित धन था, उन सबकेविषय में सोचने लगा।

"

अहं ममेति स्वीकृत्य गृहेषु कुमतिर्गृही ।

दध्यौ प्रमदया दीनो विप्रयोग उपस्थिते ॥

१७॥

अहमू-मैं; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; स्वी-कृत्य--स्वीकार करके ; गृहेषु--घर में; कु-मतिः--दुर्बुर्द्धि; गृही--गृहस्थ;दध्यौ-- ध्यान दिया; प्रमदया-- अपनी पत्नी सहित; दीन:--अत्यन्त निर्धन; विप्रयोगे--जब वियोग; उपस्थिते-- आ उपस्थितहुआ

राजा पुरझ्षन अपने परिवार के प्रति तथा 'मैं' और 'मेरे' विचार में अत्यधिक आसक्तथा।

चूँकि वह अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक मोहित था, इसलिए वह पहले से दीन बन चुकाथा।

वियोग के समय वह अत्यन्त दुखी हो गया।

"

लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी ।

वर्तिष्यते कथं त्वेषा बालकाननुशोचती ॥

१८॥

लोक-अन्तरम्‌--अन्य जीवन में; गतवति मयि--मेरे चले जाने पर; अनाथा--पतिविहीन; कुटुम्बिनी--अपने परिवार से घिरी;वर्तिष्यते--रहेगी; कथम्‌--कैसे; तु--तब; एषा--यह स्त्री; बालकान्‌--बच्चों को; अनुशोचती--विलाप करती हुई |

राजा पुरक्ञन अत्यन्त चिन्तित होकर सोचने लगा, 'हाय! मेरी पत्नी इतने सारे बच्चों सेपरेशान होगी।

जब मैं यह शरीर छोड़ दूँगा तो यह किस प्रकार परिवार के इन सभी सदस्यों कापालन करेगी ? हाय! वह परिवार पालन के विचार से अत्यधिक कष्ट पाएगी।

"

'न मय्यनाशिते भुड्ढे नास्नाते स्नाति मत्परा ।

मयि रुष्टे सुसन्त्रस्ता भर्तिसिते यतवाग्भयात्‌ ॥

१९॥

न--कभी नहीं; मयि--जब तक मैं; अनाशिते--खा नहीं लेता था; भुड्ढे --वह खाती थी; न--नहीं; अस्नाते--स्नान नहीं करलेता था; स्नाति--नहाती थी; मत्‌-परा--मेरे प्रति अनुरक्त; मयि--जब मैं; रुष्टे--नाराज होता था; सु-सन्त्रस्ता--अत्यन्त डरीरहती थी; भर्तिसिति--जब मैं डाँटता फटकारता था; यत-वाक्‌ू--संयमित वाणी; भयात्‌--डर से |

राजा पुरझ्ञषन अपनी पत्नी के साथ अपने पुराने व्यवहारों को सोचने लगा।

उसे याद आयाकि उसकी पत्नी तब तक भोजन नहीं करती थी, जब तक वह स्वयं खा नहीं चुकता था; वहतब तक नहीं नहाती थी जब तक वह नहीं नहा लेता था और वह उस पर सदा इतनी अधिकअनुरक्त थी कि यदि वह कभी झिड़क देता था और उस पर नाराज हो जाता था, तो वह मौनरहकर उसके दुर्व्यवहार को सह लेती थी।

"

प्रबोधयति माविज्ञं व्युषिते शोककर्शिता ।

वर्त्मतद्गृहमेधीयं वीरसूरपि नेष्यति ॥

२०॥

प्रबोधयति--अच्छी सलाह देती है; मा--मुझको; अविज्ञम्‌ू-- मूर्ख; व्युषिते-- मेरे बाहर जाने पर; शोक--शोक से; करशिता--दुख से सूखी हुई; बर्त्म--रास्ता; एतत्‌--यह; गृह-मेधीयम्‌--गृहस्थी के कार्यो का; वीर-सू:--वीरों की जननी; अपि--यद्यपि;नेष्यति--क्या कर सकेगी।

राजा पुरञ्जन सोचता रहा कि उसके मोहग्रस्त होने पर किस तरह उसकी पत्नी उसे अच्छीसलाह देती थी और उसके घर से बाहर चले जाने पर वह कितनी दुखी हो जाती थी।

यद्यपि वहअनेक पुत्रों एवं वीरों की माता थी तो भी राजा को डर था कि वह गृहस्थी का भार नहीं ढोसकेगी।

"

कथं नु दारका दीना दारकीर्वापरायणा: ।

वर्तिष्यन्ते मयि गते भिन्ननाव इवोदधौ ॥

२१॥

कथम्‌--कैसे; नु--वस्तुतः ; दारका:--पुत्र; दीना:--बेचारे, अनाथ; दारकीः --पुत्रियों; वा-- अथवा; अपरायणा:--जिनकाकोई आश्रय नहीं है; वर्तिष्यन्ते-- रहेंगे; मयि--जब मैं; गते--इस संसार से चला जाऊँगा; भिन्न--विदीर्ण, टूटी हुई; नाव:--नाव; इब--सहश; उदधौ--सागर में |

राजा पुरझ्ञन आगे भी चिन्तित रहने लगा: 'जब मैं इस संसार से चला जाऊँगा तो मेरे ऊपरपूर्णतः आश्ित पुत्र तथा पुत्रियाँ किस प्रकार अपना जीवन निर्वाह करेंगी ? उनकी स्थिति जहाजमें चढ़े हुए उन यात्रियों के समान है जिनका जहाज सागर के बीच में ही टूट जाता है।

'" एवं कृपणया बुद्धया शोचन्तमतदर्हणम्‌ ।

ग्रहीतुं कृतधीरेनं भयनामा भ्यपद्यत ॥

२२॥

एवम्‌--इस प्रकार; कृपणया--दीन; बुद्धयरा--बुद्धि से; शोचन्तम्‌--पछताते हुए; अ-तत्‌-अर्हणम्‌--जिस पर उसे नहीं पछतानाचाहिए था; ग्रहीतुमू--बन्दी बनाने के लिए; कृत-धी:--हढ़संकल्प यवनराज; एनम्‌--उसको; भय-नामा-- भय नामक;अभ्यपद्यत--तुरन्त आ गया।

यद्यपि राजा पुरकझ्षन को अपनी पतली तथा बच्चों के भाग्य के विषय में पश्चात्ताप नहीं करनाचाहिए था फिर भी उसने अपनी दीन बुद्धि के कारण ऐसा किया।

उसी समय, भय नामकयवनराज उसे बन्दी करने के लिए तुरन्त निकट आ धमका।

राजा के अनुचर अत्यन्त शोकाकुल हो उठे।

उन्हें भी विलाप करते हुए राजा के साथ-साथ जानापड़ा।

"

पशुवद्यवनैरेष नीयमान: स्वकं क्षयम्‌ ।

अन्वद्रवन्ननुपथा: शोचन्तो भृशमातुरा: ॥

२३॥

पशु-वत्‌--पशु के समान; यवनै:--यवतनों के द्वारा; एष:--यह, पुरज्ञन; नीयमान:--बन्दी बनाकर ले जाया गया; स्वकम्‌--अपने; क्षयम्‌-घर; अन्वद्रवन्‌--पीछे-पीछे; अनुपथा: --उसके सेवक; शोचन्त:--विलाप करते; भृशम्‌-- अत्यधिक;आतुरा:--अत्यन्त दुखी ।

जब यवनगण राजा पुरज्ञन को पशु की भाँति बाँधकर उसे अपने स्थान को ले जाने लगे तो राजा के अनुचर अत्यन्त शोकाकुल हो उठे।

उन्हें भी विलाप करते हुए राजा के साथ-साथ जाना पड़ा।

"

पुरीं विहायोपगत उपरुद्धो भुजड़मः ।

यदा तमेवानु पुरी विशीर्णा प्रकृतिं गता ॥

२४॥

पुरीमू--नगरी को; विहाय--छोड़कर; उपगत:--चला गया; उपरुद्ध: --बन्दी; भुजड़म:--सर्प; यदा--जब; तम्‌--उसको;एव--निश्चय ही; अनु--पीछे-पीछे; पुरी--नगरी; विशीर्णा--ध्वस्त, तहस-नहस; प्रकृतिम्‌--पदार्थ में; गता--परिणत होगयी।

वह सर्प भी, जिसे यवनराज के सैनिकों ने बन्दी बनाकर पहले ही नगरी के बाहर कर दियाथा, अन्यों के साथ अपने स्वामी के पीछे-पीछे चलपड़ा।

ज्योंही इन सबों ने नगरी को छोड़ दियात्योंही वह नगरी तहस-नहस (९ ध्वस्त ) होकर धूल में मिल गई।

"

विकृष्यमाण: प्रसभं यवनेन बलीयसा ।

नाविन्दत्तमसाविष्ट: सखायं सुहृदं पुर: ॥

२५॥

विकृष्यमाण:--खींचे जाने पर; प्रसभम्‌--बलपूर्वक; यवनेन--यवन के द्वारा; बलीयसा--अत्यन्त शक्तिशाली; न अविन्दत्‌--स्मरण नहीं कर सकता; तमसा--तमोगुण से; आविष्ट: --आच्छादित होने से; सखायम्‌--अपने मित्र को; सुहृदम्‌--शुभेषी;पुरः-प्रारम्भ से |

जब राजा पुरज्ञन शक्तिशाली यवन द्वारा बलपूर्वक घसीटा जा रहा था, तब भी अपनी निरीमूर्खता के कारण वह अपने मित्र तथा हितैषी परमात्मा का स्मरण नहीं कर सका।

"

त॑ यज्ञपशवोडनेन संज्ञप्ता येडददयालुना ।

कुठारैश्विच्छिदु: क्रुद्धा: स्मरन्तोडमीवमस्य तत्‌ ॥

२६॥

तम्‌--उसको; यज्ञ-पशव: --यज्ञ में बलि दिये गये पशु; अनेन--उसके द्वारा; संज्ञप्ता:--मारे गये; ये--जो; अदयालुना--अत्यन्त निर्दय द्वारा; कुठार:ः--फरसे से; चिच्छिदु:--खण्ड खण्ड; क्रुद्धा:--अत्यन्त क्रुद्ध होकर; स्मरन्‍्तः--याद करते हुए;अमीवम्‌--पापकर्म; अस्य--उसके; तत्‌--वह।

उस घोर निर्दयी राजा पुरज्न ने विविध यज्ञों में अनेक पशुओं का वध किया था।

अब वेसारे पशु इस अवसर का लाभ उठाकर उसे अपने सींगों से बेधने लगे।

ऐसा प्रतीत हो रहा थामानो उसे फरसों से टुकड़े-टुकड़े करके काटा जा रहा है।

"

अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृति: समा: ।

शाश्वतीरनुभूयार्ति प्रमदासड्रदूषित: ॥

२७॥

अनन्त-पोरे--अपार; तमसि--संसार के अंधकार में; मग्न:--डूबा हुआ; नष्ट-स्मृतिः--समस्त बुद्धि से रहित; समा:ः--अनेकवर्षो तक; शाश्वती: --निरन्तर; अनुभूय-- अनुभव करके; आर्तिमू--तीनों ताप; प्रमदा--स्त्री के; सड़--संगति से; दूषित:--मलिन।

स्त्रियों की दूषित संगति के कारण जीवरूप राजा पुरझ्ञन निरन्तर संसार के समस्त कष्टों कोसहता है और अनेकानेक वर्षो तक समस्त प्रकार की स्मृति से शून्य होकर भौतिक जीवन केअंधकार क्षेत्र में पड़ा रहता है।

"

तामेव मनसा गृह्नन्बभूव प्रमदोत्तमा ।

अनन्तरं विदर्भस्य राजसिंहस्य वेश्मनि ॥

२८॥

तामू--उसके; एब--निश्चय ही; मनसा--मन से; गृहन्‌ू--स्वीकार करते हुए; बभूव--हो गया; प्रमदा--स्त्री; उत्तमा--कुलीन;अनन्तरम्‌-मृत्यु के पश्चात्‌; विदर्भस्य--विदर्भ के; राज-सिंहस्थ--अत्यन्त शक्तिशाली राजा के; वेश्मनि--घर में |

चूँकि राजा पुरञझ्ञन ने अपनी पत्नी का स्मरण करते हुए अपने शरीर का त्याग किया था,अतः वह अगले जन्म में अच्छे कुल की एक अत्यन्त सुन्दर स्त्री बनी।

उसने राजा विदर्भ के घर मेंराजा की कन्या रूप में अगला जन्म लिया।

"

उपयेमे वीर्यपणां वैदर्भी मलयध्वज: ।

युधि निर्जित्य राजन्यान्पाण्ड्य: परपुरञ्ञय: ॥

२९॥

उपयेमे--विवाह किया; वीर्य--शौर्य का; पणाम्‌-- पुरस्कार; वैदर्भीम्‌--विदर्भ की कन्या; मलय-ध्वज:--मलयध्वज; युधि--युद्ध में; निर्जित्य--विजयी होकर; राजन्यान्‌--अन्य राजकुमार; पाण्ड्य:--पाएडु देश में उत्पन्न अथवा सर्वश्रेष्ठ विद्वान; पर--दिव्य; पुरमू--नगरी; जय:--विजेता |

यह निश्चय हुआ था कि राजा विदर्भ की कन्या वैदर्भी का विवाह अत्यन्त शक्तिशाली पुरुषमलयध्वज के साथ किया जाये जो पाण्डुदेश का रहने वाला था।

उसने अन्य राजकुमारों कोपराजित करके राजा विदर्भ की कन्या के साथ विवाह कर लिया।

"

तस्यां स जनयां चक्र आत्मजामसितेक्षणाम्‌ ।

यवीयस: सप्त सुतान्सप्त द्रविडभूभूतः ॥

३०॥

तस्याम्‌ू--उससे; सः--राजा ने; जनयाम्‌ चक्रे--उत्पन्न किया; आत्मजामू्‌--पुत्री; असित--श्याम; ईक्षणाम्‌-- आँखों वाली;यवीयस:--छोटा, अत्यन्त शक्तिमान; सप्त--सात; सुतान्‌--पुत्र; सप्त--सात; द्रविड--द्रविड़ देश ( दक्षिण भारत ); भू--भूभाग के; भूत:ः--राजा |

राजा मलयध्वज के एक पुत्री हुई जिसकी आँखें श्यामल थीं।

उसके सात पुत्र भी हुए जोआगे चलकर द्रविड़ नामक देश के शासक बने।

इस प्रकार उस देश में सात राजा हुए।

"

एकैकस्याभवत्तेषां राजन्नर्बुदमर्बुदम्‌ ।

भोक्ष्यते यद्वंशधरैर्मही मन्वन्तरं परम्‌ ॥

३१॥

एक-एकस्थ--हर एक के; अभवत्‌--हुए; तेषाम्‌--उनके; राजन्‌--हे राजा; अर्बुदम्‌--एक करोड़; अर्बुदम्‌ू--एक करोड़;भोक्ष्यते-- भोगेंगे; यत्‌--जिसका; बंश-धरैः--वंशजों द्वारा; मही--सारा संसार; मनु-अन्तरम्‌--एक मनु के अन्त तक; परमू--तथा उसके पश्चात्‌)

हे राजा प्राचीनबर्हिषतू, मलयध्वज राजा के पुत्रों ने लाखों पुत्रों को जन्म दिया और ये सबएक मनु की अवधि के अन्त तक तथा उसके बाद भी सारे संसार का पालन करते रहे।

"

अग्स्त्यः प्राग्दुहितरमुपयेमे धृतद्नरताम्‌ ।

यस्यां हृढच्युतो जात इध्मवाहात्मजो मुनि: ॥

३२॥

अगस्त्य:--अग्स्त्य मुनि ने; प्राकु--पहली; दुहितरम्‌--कन्या को; उपयेमे--विवाह दिया; धृत-ब्रताम्‌ू--ब्रत धारण किये;यस्याम्‌--जिससे; हृढच्युतः --हृढच्युत नामक; जात:--उत्पन्न हुआ; इध्मवाह--इध्मवाह नामक; आत्म-जः --पुत्र; मुनि: --मुनि

भगवान्‌ कृष्ण के परम भक्त मलयध्वज की पहली कन्या का विवाह अगस्त्य मुनि के साथहुआ।

उससे एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम हढच्युत था जिससे इध्मवाह नामक एक पुत्रउत्पन्न हुआ।

जो भक्ति में दीक्षित होते हैं, वे वैदिक शास्त्रीय आदेशों के दृढ़पालक होते हैं।

"

विभज्य तनयेभ्य: क्ष्मां राजर्षिमलयध्वज: ।

आरिराधयिषु: कृष्णं स जगाम कुलाचलम्‌ ॥

३३॥

विभज्य--बाँटकर; तनयेभ्य:--अपने पुत्रों में; क्ष्मम्‌--सम्पूर्ण पृथ्वी को; राज-ऋषि:--परम साधु राजा; मलयध्वज: --मलयध्वज; आरिराधयिषु:--आराधना करने की इच्छा से; कृष्णम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण की; सः--वह; जगाम--चला गया;कुलाचलम्‌--कुलाचल नामक स्थान में

इसके पश्चात्‌ राजर्षि मलयध्वज ने अपना सारा राज्य अपने पुत्रों में बाँठ दिया।

तब वे पूरेमनोयोग से भगवान्‌ कृष्ण की पूजा करने के लिए कुलाचल नामक एकान्त स्थान में चले गये।

"

हित्वा गृहान्सुतान्भोगान्वैदर्भी मदिरिक्षणा ।

अन्वधावत पाण्ड्येशं ज्योत्स्नेव रजनीकरम्‌ ॥

३४॥

हित्वा--त्याग कर; गृहान्‌--घर को; सुतान्‌ू--बच्चों को; भोगान्‌ू-- भौतिक सुखों को; बैदर्भी--राजा विदर्भ की पुत्री; मदिर-ईक्षणा--मादक लोचनों वाली; अन्वधावत--अनुगमन किया; पाण्ड्य-ईशम्‌--राजा मलयध्वज का; ज्योत्स्ना इब--चन्द्रिकाके समान; रजनी-करम्‌--चन्द्रमा

जिस प्रकार रात्रि में चाँदनी चन्द्रमा का अनुसरण करती है, उसी तरह राजा मलयध्वज केकुलाचल जाते ही मादक नेत्रों वाली उसकी अनुरक्त पत्नी अपने घर, पुत्र के होते हुए भी समस्तभोगों को तिलांजलि देकर उसके साथ हो ली।

"

तत्र चन्द्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका ।

तत्पुण्यसलिलैर्नित्यमुभयत्रात्मनो मृजन्‌ ॥

३५॥

कन्दाष्ट्रिभिर्मूलफलै: पुष्पपर्णैस्तूणोदकै: ।

वर्तमान: शनैर्गात्रकर्शनं तप आस्थितः ॥

३६॥

तत्र--वहाँ; चन्द्रबसा--चन्द्रवसा नदी; नाम--नामक; ताम्रपर्णी --ताप्रपर्णी नदी; बटोदका--वटोदका नदी; तत्‌ू--उन नदियोंके; पुण्य--पवित्र; सलिलैः --जल से; नित्यम्‌ू--नित्य प्रति; उभयत्र--दोनों प्रकार से; आत्मन:--अपने आपको; मृजनू--नहाकर; कन्द--मूल; अष्टिभिः--तथा बीजों से; मूल--जड़ें; फलैः--तथा फलों से; पुष्प--फूल; पर्ण:--तथा पत्तों से;तृणा--घास; उदकैः--तथा जल से; वर्तमान:--निर्वाह करते हुए; शनैः-- धीरे-धीरे; गात्र-- अपना शरीर; कर्शनम्‌ू--दुबलाकरके; तपः--तपस्या; आस्थित:--किया |

कुलाचल प्रान्त में चन्द्रवसा, ताम्रपर्णी तथा बटोदका नाम की तीन नदियाँ थीं।

राजामलयध्वज नित्य ही इन पवित्र नदियों में जाकर स्नान करता था।

इस प्रकार उसने बाहर तथाअन्दर से अपने को पवित्र कर लिया था।

वह स्नान करता और कन्द, बीज, पत्तियाँ, फूल, जड़ें,'फल तथा घास खाता तथा जल पीता था।

इस प्रकार वह कठिन तपस्या करने लगा।

अन्त में वहअत्यन्त कृश कार्य हो गया।

"

शीतोष्णवातवर्षाणि क्षुत्पिपासे प्रियाप्रिये ।

सुखदु:खे इति द्वन्द्वान्यजयत्समदर्शन: ॥

३७॥

शीत--जाड़ा; उष्ण--गर्मी; वात--हवा; वर्षाणि--तथा वर्षा ऋतुएँ; क्षुत्‌-- भूख; पिपासे--तथा प्यास; प्रिय--सुहावना;अप्रिये--तथा न अच्छा लगने वाला; सुख--सुख; दुःखे--तथा कष्ट; इति--इस प्रकार; द्वन्द्दानि--द्वै( भाव को; अजयतू--जीत लिया; सम-दर्शन:--समदर्शी, समदृष्टि रखने वाला।

तपस्या के द्वारा राजा मलयध्वज धीरे-धीरे शरीर तथा मन से जाड़ा तथा गर्मी, सुख तथादुख, वायु तथा वर्षा, भूख तथा प्यास, अच्छा तथा बुरा इन द्वैतभावों के प्रति समान दृष्टि वालाहो गया।

इस प्रकार उसने सभी द्वन्द्दों पर विजय प्राप्त कर ली।

"

तपसा विद्यया पक्‍्वकषायो नियमैर्यमै: ।

युयुजे ब्रह्मण्यात्मानं विजिताक्षानिलाशयः ॥

३८ ॥

तपसा--तपस्या से; विद्यया--शिक्षा से; पकक्‍्व--जलाकर; कषाय:--समस्त मल; नियमै:--विधानों से; यमै:-- आत्मसंयम से;युयुजे--उसने स्थिर किया; ब्रह्मणि--ब्रह्म में, आत्म-साक्षात्कार में; आत्मानम्‌--अपने आपको; विजित--पूर्णतया वश में;अक्ष--इन्द्रियाँ; अनिल-- प्राण; आशय:--चेतना |

पूजा से, तप साधना से तथा नियमों के पालन से राजा मलयध्वज ने अपनी इन्द्रियों, प्राणतथा चेतना को जीत लिया।

इस प्रकार उसने हर वस्तु को परब्रह्म ( कृष्ण ) रूपी केन्द्रबिन्दु परस्थिर कर लिया।

"

आस्ते स्थाणुरिवैकत्र दिव्यं वर्षशतं स्थिर: ।

वबासुदेवे भगवति नान्यद्वेदोद्ठहत्नतिम्‌ ॥

३९॥

आस्ते--रहे आये; स्थाणु:--अचल; इब--सहश; एकत्र--एक स्थान पर; दिव्यम्‌--देवताओं के; वर्ष--वर्ष; शतम्‌--एकसौ; स्थिर:--स्थिर; वासुदेवे-- भगवान्‌ कृष्ण पर; भगवति-- भगवान्‌; न--नहीं; अन्यत्‌-- अन्य कुछ; बेद--जान पाये;उद्ददन्‌-- रखते हुए; रतिम्‌ू--आसक्ति |

इस प्रकार देवों की गणना के एक सौ वर्षों तक वे एक ही स्थान पर अचल बने रहे।

इसकेबाद उन्हें भगवान्‌ कृष्ण के प्रति भक्तिमयी आसक्ति उत्पन्न हुई और वे उसी स्थिति में स्थिर रहे।

"

स व्यापकतयात्मानं व्यतिरिक्ततयात्मनि ।

विद्वान्स्वप्न इवामर्शसाक्षिणं विरराम ह ॥

४०॥

सः--राजा मलयध्वज; व्यापकतया--सर्वव्यापी होने से; आत्मानम्‌--परमात्मा को; व्यतिरिक्ततया--विभेद से; आत्मनि--अपने आप में; विद्वानू--सुशिक्षित; स्वप्ने--स्वण में; इब--सहृश; अमर्श--ज्ञान; साक्षिणम्‌--साक्षी; विरराम--उदासीन होगया; ह--निश्चय ही।

आत्मा और परमात्मा में अन्तर कर सकने के कारण राजा मलयध्वज ने पूर्ण ज्ञान प्राप्त करलिया।

आत्मा एक-स्थानिक है, जबकि परमात्मा सर्वव्यापी है।

यह भौतिक देह आत्मा नहीं है,अपितु आत्मा इस भौतिक देह का साक्षी है--उन्हें इसका पूरा-पूरा ज्ञान हो गया।

"

साक्षाद्धगवतोक्तेन गुरुणा हरिणा नूप ।

विशुद्धज्ञानदीपेन स्फुरता विश्वतोमुखम्‌ ॥

४१॥

साक्षात्‌-प्रत्यक्ष; भगवता--भगवान्‌ द्वारा; उक्तेन--आदेशित; गुरुणा--गुरु द्वारा; हरिणा-- भगवान्‌ हरि द्वारा; नृप--हे राजा;विशुद्ध- शुद्ध; ज्ञान--ज्ञान के; दीपेन--प्रकाश से; स्फुरता--प्रकाशित; विश्वत: -मुखम्‌--चारों ओर।

इस प्रकार राजा मलयध्वज को पूर्ण ज्ञान की प्राप्ति हुई, क्योंकि शुद्ध अवस्था में उसेसाक्षात्‌ भगवान्‌ ने उपदेश दिया था।

ऐसे दिव्य ज्ञान के द्वारा वह प्रत्येक वस्तु को समस्तदृष्टिकोणों से समझ सकता था।

"

परे ब्रह्मणि चात्मानं परं ब्रह्म तथात्मनि ।

वीक्षमाणो विहायेक्षामस्मादुपरराम ह ॥

४२॥

परे--दिव्य; ब्रह्मणि--ब्रह्म में; च--तथा; आत्मानम्‌--आत्मा को; परम्‌--परम; ब्रह्म --ब्रह्म; तथा-- भी; आत्मनि--अपने में;वीक्षमाण: --देखते हुए; विहाय--त्याग कर; ईक्षाम्‌-- अन्तर; अस्मात्‌--इस विधि से; उपरराम--शान्त हो गया; ह--निश्चयही

इस प्रकार राजा मलयध्वज परमात्मा को अपने पास बैठा हुआ और स्वयं आत्मा रूप कोपरमात्मा के निकट बैठा हुआ देख सकता था।

चूँकि वे दोनों साथ-साथ थे, अतः उनके स्वार्थोंका भिन्न होना आवश्यक न था।

इस प्रकार उसने ऐसे कार्य करने बन्द कर दिये।

"

पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम्‌ ।

प्रेम्णा पर्यचरद्द्धित्वा भोगान्सा पतिदेवता ॥

४३॥

'पतिम्‌--अपने पति; परम--परम; धर्म-ज्ञम-- धर्म का ज्ञाता; वैदर्भी--राजा विदर्भ की पुत्री ने; मलय-ध्वजमू--मलयध्वज को;प्रेम्णा--प्रेम से; पर्यचरत्‌-- भक्ति-पूर्वक सेवा की; हित्वा--त्याग कर; भोगान्‌--इन्द्रियसुख; सा--उसने; पति-देवता--पतिको परमेश्वर मानकर।

राजा विदर्भ की कन्या अपने पति को परमेश्वर रूप में सर्वेसर्वा मानती थी।

उसने सारे इन्द्रिय-सुख त्याग दिये और पूर्णतः विरक्त होकर वह अपने परम ज्ञानी पति के सिद्धान्तों कापालन करने लगी।

इस प्रकार वह उसकी सेवा में लगी रही।

"

चीरवासा ब्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा ।

बभावुप पतिं शान्ता शिखा शान्तमिवानलम्‌ ॥

४४॥

चीर-वासा--पुराने वस्त्र पहने; ब्रत-क्षामा--तपस्या के कारण अत्यन्त दुर्बल; वेणी-भूत--उलझे हुए, लटें पड़ीं; शिरोरूहा--उसके बाल; बभौ--चमकती थी; उप पतिम्‌ू--अपने पति के निकट; शान्ता--अत्यन्त शान्त; शिखा--लपढटें ; शान्तम्‌--बुझीहुईं; इब--सहृश; अनलमू--अग्नि के

राजा विदर्भ की पुत्री पुराने वस्त्र पहनती थी।

वह तपस्या के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गईथी।

वह अपने बाल नहीं सँवारती थी जिससे उसमें लटें पड़ गईं थीं।

यद्यपि वह सदैव अपने पतिके निकट रहती थी, किन्तु वह अत्यन्त मौन थी तथा अविचलित अग्नि की लपट के समानअश्षुब्ध ( शान्त ) थी।

"

अजानती प्रियतमं यदोपरतमड़ना ।

सुस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत्‌ ॥

४५॥

अजानती--न जानने से; प्रिय-तमम्‌--प्राणप्रिय पति को; यदा--जब; उपरतम्‌ू--मर गया; अड्डना--स्त्री; सुस्थिर--अविचल;आसनम्‌--आसन में; आसाद्य--निकट जाकर; यथा--जिस तरह; पूर्वमू--पहले; उपाचरत्‌--सेवा करती रही |

राजा विदर्भ की पुत्री सुस्थिर मुद्रा में आसन लगाये अपने पति की तब तक पूर्ववत्‌ सेवाकरती रही, जब तक उसे यह पता नहीं लग गया कि उसने इस शरीर से कूच कर दिया है।

"

यदा नोपलभेताडश्रावृष्माणं पत्युर्चती ।

आसीत्संविग्नहदया यूथशभ्रष्टा मृगी यथा ॥

४६॥

यदा--जब; न--नहीं; उपलभेत-- अनुभव किया; अड्घ्नौ--पावों में; ऊष्माणम्‌--गर्मी; पत्यु:--अपने पति के; अर्चती--सेवाकरते समय; आसीत्‌--हुई; संविग्न--चिन्तित; हृदया--हृदय में; यूथ- भ्रष्टा--अपने पति से बिछुड़ी; मृगी--हिरनी; यथा--जिस प्रकार।

जब वह अपने पति के चरण दबा रही थी तो उसे अनुभव हुआ कि उसके पाँव अब गरमनहीं हैं, अतः वह समझ गई कि उसने पहले ही इस शरीर को त्याग दिया है।

अकेली छूट जानेपर उसे अत्यधिक चिन्ता हुईं।

अपने पति के साथ से विरहित वह अपने को उस मृगी के समानअनुभव करने लगी जो अपने पति से बिछुड़ गई हो।

"

आत्मानं शोचती दीनमबन्धुं विक्लवाश्रुभि: ।

स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्रसरोद सा ॥

४७॥

आत्मानम्‌--अपने विषय में; शोचती--विलाप करती; दीनमू--दुखियारी; अबन्धुम्‌--बिना मित्र के; विक्लब-- भग्नहदया;अश्रुभि:--आँसुओं से; स्तनौ--उसके स्तन; आसिच्य--भिगोती; विपिने--जंगल में; सुस्वरम्‌--जोर से; प्रररोद--रोने लगी;सा--वह।

जंगल में अकेली तथा विधवा जाने पर विदर्भ की पुत्री विलाप करने लगी; उसके आँसूनिरन्तर झड़ रहे थे जिससे उसके स्तन भीग गये थे और वह जोर-जोर से रो रही थी।

"

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे इमामुदधिमेखलाम्‌ ।

दस्युभ्य: क्षत्रबन्धु भ्यो बिभ्यतीं पातुमहसि ॥

४८ ॥

उत्तिष्ठ--उठिये; उत्तिष्ठ--उठिये; राज-ऋषे--हे राजर्षि; इमाम्‌--यह पृथ्वी; उदधि--समुद्र से; मेखलाम्‌--घिरी हुईं; दस्युभ्य:--चोरों से; क्षत्र-बन्धुभ्य:--दुष्ट राजाओं से; बिभ्यतीमू-- अत्यधिक डरी; पातुम्‌--रक्षा करना; अ्हसि--तुम्हें चाहिए।

हे राजर्षि, उठिये, उठिये, देखिये, 'जल से घिरी हुईं यह पृथ्वी चोरों एवं तथाकथितराजाओं से भरी पड़ी है।

यह संसार अत्यधिक भयभीत है।

आपका कर्तव्य है कि आप उसकीरक्षा करें।

"

एवं विलपन्ती बाला विपिनेनुगता पतिम्‌ ।

पतिता पादयोर्भ्॑तू रूदत्यश्रूण्यवर्तयत्‌ ॥

४९॥

एवम्‌--इस प्रकार; विलपन्ती--विलाप करती; बाला--अबोध स्त्री, अबला; विपिने--निर्जन बन में; अनुगता--साथ गई हुईं;'पतिम्‌--पति को; पतिता--गिरी हुई; पादयो: --पैरों पर; भर्तु:--पति के; रुदती--रोती हुई; अश्रूणि-- आँसू; अवर्तयत्‌--गिरारही थी

इस प्रकार वह परम आज्ञाकारिणी पत्नी अपने मृत पति के चरणों पर गिर पड़ी और उसएकान्त वन में करुण क्रन्दन करने लगी।

उसकी आँखों से आँसू झर रहे थे।

"

चितिं दारुमयीं चित्वा तस्यां पत्यु: कलेवरम्‌ ।

आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे ॥

५०॥

चितिम्‌ू--चिता; दारु-मयीम्‌--लकड़ी से बनी; चित्वा--चुनकर; तस्याम्‌--उस पर; पत्यु:--पति का; कलेवरम्‌--शरीर;आदीप्य--जलाकर; च-- भी; अनुमरणे--उसके साथ मरने के लिए; विलपन्ती--विलाप करती; मन:--अपना मन; दधे--स्थिर किया।

तब उसने लकड़ियो से चिता बनाकर और अग्नि लगाकर उसमें अपने पति के शव को रखदिया।

इस सबके बाद वह दारूण विलाप करने लगी और अपने पति के साथ अग्नि में भस्महोने के लिए स्वयं भी तैयार हो गयी।

"

तत्र पूर्वतर: कश्चित्सखा ब्राह्मण आत्मवान्‌ ।

सान्त्वयन्वल्गुना साम्ना तामाह रुदतीं प्रभो ॥

५१॥

तत्र--वहाँ; पूर्वतर:ः--पहले का पुराना; कश्चित्‌--कोई; सखा--मित्र; ब्राह्मण: --ब्राह्मण ने; आत्मवान्‌-- अत्यन्त विद्वान;सान्त्वयन्‌--सान्त्वना देते हुए; वल्गुना--अत्यन्त मधुर; साम्ना--शमन करने वाली वाणी से; तामू--उसको; आह--कहा;रुदतीम्‌--रोदन करती हुई; प्रभो--हे राजा!

हे राजनू, एक ब्राह्मण, जो राजा पुरझ्जन का पुराना मित्र था उस स्थान पर आया और रानीको मृदुल वाणी से सान्‍त्वना देने लगा।

"

ब्राह्मण उवाचका त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि ।

जानासि किं सखाय॑ मां येनाग्रे विचचर्थ ह ॥

५२॥

ब्राह्मण: उवाच--विद्वान्‌ ब्राह्मण ने कहा; का--कौन; त्वम्‌--तुम; कस्य--किसकी; असि--हो; कः--कौन; वा-- अथवा;अयम्‌--यह पुरुष; शयान:--लेटा हुआ; यस्य--जिसके लिए; शोचसि--तुम विलाप कर रही हो; जानासि किम्‌-क्या तुमजानती हो; सखायम्‌--मित्र को; मामू--मुझको; येन--जिसके साथ; अग्रे--पहले; विचचर्थ--तुम विचार-विमर्श करती थी;ह--निश्चय ही

ब्राह्मण ने इस प्रकार पूछा: तुम कौन हो ? तुम किसकी पत्नी या पुत्री हो ? यहाँ लेटा हुआपुरुष कौन है? ऐसा प्रतीत होता है कि तुम इस मृत शरीर के लिए विलाप कर रही हो।

क्या तुममुझे नहीं पहचानती हो ? मैं तुम्हारा शाश्वत सखा हूँ।

तुम्हें स्मरण होगा कि पहले तुमने मुझसे कईबार परामर्श किया है।

"

अपि स्मरसि चात्मानमविज्ञातसखं सखे ।

हित्वा मां पदमन्विच्छन्‍्भौमभोगरतो गत: ॥

५३॥

अपि स्मरसि--क्या तुम्हें स्मरण है; च-- भी; आत्मानम्‌--परमात्मा को; अविज्ञात--अज्ञात; सखमू्‌--मित्र को; सखे--हे मित्र;हित्वा--छोड़कर; माम्‌--मुझको; पदम्‌--पद, स्थिति; अन्विच्छन्‌ू--चाहते हुए; भौम-- भौतिक; भोग --सुख; रतः--अनुरक्त;गतः--हो गये |

ब्राह्मण ने आगे कहा : हे मित्र, यद्यपि इस समय तुम मुझे तुरन्त नहीं पहचान सकते हो,किन्तु क्या तुम्हें स्मरण नहीं है कि भूतकाल में तुम मेरे अन्तरंग मित्र थे? दुर्भाग्यवश तुमने मेरासाथ छोड़ कर इस भौतिक जगत के भोक्ता का पद स्वीकार किया था।

"

हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ ।

अभूतामन्तरा वौकः सहस्त्रपरिवत्सरान्‌ ॥

५४॥

हंसौ--दो हंस; अहम्‌ू--मैं; च--यथा; त्वमू--तुम; च-- भी; आर्य--हे महापुरुष; सखायौ--दो मित्र; मानस-अयनौ--मानससरोवर में एकसाथ; अभूताम्‌--हो गये; अन्तरा--पृथक्‌ ; वा--निस्सन्देह; ओक:--अपने असली घर से; सहस्त्र--हजारों;परि--लगातार; वत्सरान्‌ू--वर्षो |

हे मित्र, मैं और तुम दोनों हंसों के तुल्य हैं।

हम एक ही मानसरोवर रूपी हृदय में साथ-साथरहते हैं, यद्यपि हम हजारों वर्षों से साथ साथ रह रहे हैं।

किन्तु फिर भी हम अपने मूल निवास सेबहुत दूर हैं।

"

स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम्‌ ।

विचरन्पदमद्राक्षी: कयाचिच्निर्मितं स्त्रिया ॥

५५॥

सः--वह हंस; त्वम्‌-तुम्हीं; विहाय--छोड़कर; मामू--मुझको; बन्धो--हे मित्र; गत:--चला गया; ग्राम्य-- भौतिक; मतिः --चेतना; महीम्‌--पृथ्वी पर; विचरन्‌ू--घूमते हुए; पदम्‌--पद; अद्राक्षी:--तुमने देखा; कयाचित्‌--किसी के द्वारा; निर्मितम्‌--निर्मित; स्त्रिया--स्त्री द्वारा |

हे मित्र, तुम मेरे वही मित्र हो।

जबसे तुमने मुझे छोड़ा है, तुम अधिकाधिक भौतिकतावादीहो गये हो और मेरी ओर न देख कर तुम इस संसार में, जिसे किसी स्त्री ने निर्मित किया है,विभिन्न रूपों में घूमते रहे हो।

"

पश्मारामं नवद्वारमेकपालं त्रिकोष्ठकम्‌ ।

षट्कुलं पञ्जञविपणं पञ्ञप्रकृति स्त्रीधवम्‌ ॥

५६॥

पश्च-आरामम्‌--पाँच उद्यान; नव-द्वारम्‌--नौ द्वार; एक--एक; पालमू--पालक; त्रि--तीन; कोष्ठकम्‌ू-- कमरे; घट्‌ू--छह;'कुलम्‌ू-परिवार; पञ्ञ-- पाँच; विपणम्‌--बाजार; पशञ्न--पाँच; प्रकृति-- भौतिक तत्त्व; स्त्री--स्त्री; धवम्‌--स्वामी |

उस नगर ( शरीर ) में पाँच उद्यान, नौ द्वार, एक पालक ( रक्षक ), तीन कमरे, छह परिवार,पाँच बाजार, पाँच तत्त्व तथा एक स्त्री है, जो घर की स्वामिनी है।

"

पश्न्द्रियार्था आरामा द्वार: प्राणा नव प्रभो ।

तेजोबन्नानि कोष्ठानि कुलमिन्द्रियसड्ग्रह: ॥

५७॥

पञ्ञ--पाँच; इन्द्रिय-अर्था:--इन्द्रियविषय; आरामा:--उद्यानों; द्वारः--दरवाजे; प्राणा:--इन्द्रियों के छिद्र; नव--नौ; प्रभो--हेराजा; तेज:-अपू--अग्नि तथा जल; अन्नानि--अन्न या पृथ्वी; कोष्ठानि--कोठे, कमरे; कुलम्‌--कुल, परिवार; इन्द्रिय-सड़्ग्रह:--पाँचों इन्द्रियाँ तथा मन |

हे मित्र, पाँच उद्यान पाँच प्रकार के इन्द्रियसुख के विषय हैं और इसका रखवाला प्राण है,जो नौ द्वारों से आता जाता है।

तीन प्रकोष्ठ तीन प्रमुख अवयव--अग्नि, जल तथा पृथ्वी--हैं।

"

मन समेत पाँचों इन्द्रियों का समुच्चय इसके छह परिवार हैं।

विपणस्तु क्रियाशक्तिर्भूतप्रकृतिरव्यया ।

शक्त्यधीश: पुमांस्त्वत्र प्रविष्टो नावबुध्यते ॥

५८ ॥

विपण:--बाजार; तु--तब; क्रिया-शक्ति: --कर्मेन्द्रियाँ; भूत-- पाँच स्थूल तत्त्व; प्रकृतिः--भौतिक तत्त्व; अव्यया--शाश्वत;शक्ति--शक्ति; अधीश:ः--नियामक; पुमान्‌--मनुष्य; तु--तब; अत्र--यहाँ; प्रविष्ट:--घुसा हुआ; न--नहीं; अवबुध्यते--समझ में आता है।

पाँच बाजार पाँचों कर्मेन्द्रियाँ हैं।

वे पाँच शाश्वत तत्त्वों की संयुक्त शक्ति से अपना व्यापारकरती हैं।

इस सारी कर्मठता के पीछे आत्मा काम करता है।

आत्मा पुरुष है और वही वास्तविकभोक्ता है।

किन्तु इस समय शरीर रूपी नगर के भीतर छिपा होने के कारण वह ज्ञानशून्य है।

"

तस्मिस्त्वं रामया स्पृष्टो रममाणो श्रुतस्मृति: ।

तत्सड्भादीहशी प्राप्तो दशां पापीयर्ी प्रभो ॥

५९॥

तस्मिन्‌ू--उस स्थिति में; त्वम्‌--तुम; रामया--स्त्री के साथ; स्पृष्ट:ः --सम्पर्क में होने से; रममाण:--रमण करते हुए; अश्रुत-स्मृतिः--आध्यात्मिक अस्तित्व की याद किये बिना; तत्‌--उसके; सड्भात्‌--संगति से; ईहशीम्‌-- इस तरह की; प्राप्त: --प्राप्तहुईं; दशाम्‌--दशा, अवस्था; पापीयसीम्‌--पापकर्मों से पूर्ण; प्रभो--मेरे मित्र ।

हे मित्र, जब तुम भौतिक इच्छा रूपी स्त्री के साथ ऐसे शरीर में प्रवेश करते हो तो तुमइन्द्रियसुख में अत्यधिक लिप्त हो जाते हो।

इसीलिए तुम्हें अपना आध्यात्मिक जीवन भूल गयाहै।

अपनी भौतिक अवधारणाओं के कारण तुम्हें नाना कष्ट उठाने पड़ रहे हैं।

"

न त्वं विदर्भदुहिता नायं वीर: सुहृत्तव ।

न पतिस्त्वं पुरञ्जन्या रुद्धो नवमुखे यया ॥

६०॥

न--न तो; त्वमू-तुम; विदर्भ-दुहिता--विदर्भ की पुत्री; न--नहीं; अयम्‌--यह; वीर:--वीर; सु-हत्‌--हितैषी पति; तव--तुम्हारा; न--नहीं; पति:--पति; त्वम्‌--तुम; पुरक्षन्या:--पुरञ्ञनी की; रुद्ध:--बन्दी; नव-मुखे--नव द्वार वाले शरीर में;यया--माया सेवास्तव में न तो तुम विदर्भ की पुत्री हो और न यह पुरुष ( मलयध्वज ) तुम्हारा हितेच्छु पतिहै।

न ही तुम पुरझनी के वास्तविक पति थे।

तुम तो इस नव द्वार वाले शरीर में केवल बन्दी थे।

"

माया होषा मया सूष्टा यत्पुमांसं स्त्रियं सतीम्‌ ।

मन्यसे नोभयं यद्दै हंसी पश्यावयोगतिम्‌ ॥

६१॥

माया--माया; हि--निश्चय ही; एघा--यह; मया--मेरे द्वारा; सृष्ठा--रचित; यत्‌--जिससे; पुमांसम्‌--नर को; स्त्रियमू--नारीको; सतीम्‌ू--साध्वी; मन्यसे--तुम मानते हो; न--नहीं; उभयम्‌--दोनों; यत्‌--क्योंकि; वै--निश्चय ही; हंसौ-- भौतिक'कल्मष से रहित; पश्य--देखो; आवयो: -- हमारी; गतिम्‌-- अन्तिम स्थिति |

तुम कभी अपने को पुरुष, कभी सती स्त्री और कभी नपुंसक मानते हो।

यह सब शरीर केकारण है, जो माया द्वारा उत्पन्न है।

यह माया मेरी शक्ति है और वास्तव में हम दोनों--तुम औरमैं--विशुद्ध आध्यात्मिक स्वरूप हैं।

तुम इसे समझने का प्रयास करो।

मैं वास्तविक स्थितिबताने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

"

अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाहं विचक्ष्व भो: ।

न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रं जातु मनागपि ॥

६२॥

अहम्‌ू-ैं; भवानू--तुम; न--नहीं; च-- भी; अन्य: --भिन्न; त्वमू--तुम; त्वमू--तुम; एव--निश्चय ही; अहमू--मैं हूँ;विचक्ष्व--देखो; भो:--हे मित्र; न--नहीं; नौ--हमारा; पश्यन्ति--देखते हैं; कवयः--विद्वान पुरुष; छिद्रमू--दोष; जातु--किसी समय; मनाक्‌--किश्ञलित; अपि-- भी

हे मित्र, मैं परमात्मा और तुम आत्मा होकर भी हम गुणों में भिन्न नहीं हैं, क्योंकि हम दोनोंआध्यात्मिक हैं।

वास्तव में, हे मित्र, तुम मुझसे अपनी स्वाभाविक स्थिति में भी गुणात्मक रूपसे भिन्न नहीं हो।

तुम इस विषय पर तनिक विचार करो।

जो वास्तव में महान्‌ विद्वान्‌ हैं औरजिल्हें ज्ञान है वे तुममें तथा मुझमें कोई गुणात्मक अन्तर नहीं पाते।

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यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचश्षुषो: ।

द्विधाभूतमवेक्षेत तथेवान्तरमावयो: ॥

६३ ॥

यथा--जिस तरह; पुरुष: --जीवात्मा; आत्मानम्‌--अपने शरीर को; एकम्‌--एक; आदर्श--दर्पण में; चक्षुषो: --आँखों से;द्विधा-आभूतम्‌--दो के रूप में उपस्थित; अवेक्षेत--देखता है; तथा--उसी तरह; एव--निश्चय ही; अन्तरम्‌--अन्तर;आवयो:--हम दोनों में |

जिस प्रकार मनुष्य अपने शरीर के प्रतिबिम्ब को दर्पण में अपने से अभिन्न देखता है जब किदूसरे लोग वास्तव में दो शरीर देखते हैं, उसी प्रकार अपनी इस भौतिक अवस्था में जिसमें जीवप्रभावित होकर भी प्रभावित नहीं होता, ईश्वर तथा जीव में अन्तर होता है।

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एवं स मानसो हंसो हंसेन प्रतिबोधित: ।

स्वस्थस्तद्व्यभिचारेण नष्टामाप पुनः स्मृतिम्‌ ॥

६४॥

एवम्‌--इस प्रकार; सः--वह ( जीवात्मा ); मानस:--मन में एकसाथ रहने वाला; हंस:--हंस के समान; हंसेन--दूसरे हंस के द्वारा; प्रतिबोधित:--उपदेशित होकर; स्व-स्थ:--आत्म-साक्षात्कार में स्थित; तत्‌-व्यभिचारेण-- परमात्मा से बिछुड़ने के कारण; नष्टामू--नष्ट हुआ; आप-प्राप्त; पुन:--फिर से; स्मृतिमू--वास्तविक स्मरण शक्ति

इस प्रकार दोनों हंस हृदय में एकसाथ रहते हैं।

जब एक हंस दूसरे को उपदेश देता है, तो वह अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहता है।

इसका अर्थ है कि वह अपनी मूल कृष्णचेतना को प्राप्त कर लेता है, जिसे उसने भौतिक आसक्ति के कारण खो दिया था।

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बह्दिष्मन्नेतदध्यात्मं पारोक्ष्येण प्रदर्शितम्‌ ।

यत्परोक्षप्रियो देवो भगवान्विश्वभावन: ॥

६५॥

बर्हिष्मन्‌--हे राजा प्राचीनबर्हिं; एतत्‌--यह; अध्यात्मम्‌--आत्म-साक्षात्कार का वर्णन; पारोक्ष्येण--परोक्ष रूप से;प्रदर्शितम्‌ू--उपदेश किया; यत्‌--क्योंकि ; परोक्ष-प्रिय:--अ प्रत्यक्ष वर्णन से रोचक; देव:--परमे ध्वर; भगवान्‌-- भगवान्‌;विश्व-भावन:--समस्त कारणों के कारण।

हे राजा प्राचीनबर्हि, समस्त कारणों के कारण भगवान्‌ परोक्ष रूप से समझे जाने के लिएसुविख्यात हैं।

इस प्रकार मैने तुमसे पुरश्नन की कथा कही।

वास्तव में यह आत्म-साक्षात्कार केलिए उपदेश है।

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