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अध्याय नौ: ध्रुव महाराज घर लौटे

4.9मैत्रेय उवाचत एवसमुत्सबन्नभया उरुक्रमेकृतावनामा: प्रययुस्त्रिविष्टपम्‌ ।

सहस्त्रशीर्षापि ततो गरुत्मतामधोर्वन भृत्यदिदृक्षया गत: ॥

१॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; ते--देवतागण; एवम्‌--इस प्रकार; उत्सन्न-भया:--समस्त प्रकार के डर से रहित;उरुक़मे-- भगवान्‌ को, जिनके कार्य अलौलिक हैं; कृत-अवनामा:ः--नमस्कार किये गये; प्रययु:--वे लौट गये; त्रि-विष्टपम्‌--अपने अपने दैव लोकों को; सहस्त्र-शीर्षा अपि--सहस्त्रशीर्ष कहलानेवाले भगवान्‌ भी; ततः--वहाँ से; गरुत्मता--गरुड़ पर आरुढ़ होकर; मधो: वनम्‌--मधुवन; भृत्य--दास; दिदक्षया--देखने की इच्छा से; गत:--गये |

महर्षि मैत्रेय ने विदुर से कहा : जब भगवान्‌ ने देवताओं को इस प्रकार फिर से आश्वासनदिलाया तो वे समस्त प्रकार के भय से मुक्त हो गये और वे सब उन्हें नमस्कार करके अपने-अपने देवलोकों को चले गये।

तब भगवान्‌, जो साक्षात्‌ सहस्त्रशीर्ष अवतार हैं, गरुड़ पर सवारहुए और अपने दास श्रुव को देखने के लिए मधुवन गये।

"

स वै धिया योगविपाकतीकब्रयाहत्पद्यकोशे स्फुरितं तडित्प्रभम्‌ ।

तिरोहितं सहसैवोपलक्ष्यबहिःस्थितं तदवस्थं दरदर्श ॥

२॥

सः--श्लुव महाराज; बै-- भी; धिया-- ध्यान से; योग-विपाक-तीब्रया-- प्रखर योगाभ्यास के कारण; हत्‌--हृदय के; पद्म-कोशे--कमल पर; स्फुरितम्‌--प्रकट; तडित्‌-प्रभम्‌--बिजली के समान तेजमय; तिरोहितम्‌ू--विलीन हुईं; सहसा--अकस्मात्‌;एव--भी; उपलक्ष्य--देखकर; बहि:-स्थितम्‌--बाहर स्थित; तत्‌-अवस्थम्‌--उसी मुद्रा में; ददर्श--देख सकाध

्रुव महाराज अपने प्रखर योगाभ्यास के समय भगवान्‌ के जिस बिजली सहृश तेजमान रूपके ध्यान में निमग्न थे, वह सहसा विलीन हो गया।

फलत:ः श्लुव अत्यन्त विचलित हो उठे औरउनका ध्यान टूट गया।

किन्तु ज्योंही उन्होंने अपने नेत्र खोले, वैसे ही उन्होंने अपने समक्ष पूर्णपुरुषोत्तम भगवान्‌ को उसी रूप में साक्षात्‌ उपस्थित देखा, जिस रूप का दर्शन वे अपने हृदय मेंकर रहे थे।

"

तहर्शनेनागतसाध्वस: क्षिता-वबन्दताड़ूं विनमय्य दण्डवत्‌ ।

हृ्भ्यां प्रपश्यन्प्रपिबन्निवार्भक-श्लुम्बन्निवास्येन भुजैरिवाश्लिषन्‌ ॥

३॥

ततू-दर्शनेन-- भगवान्‌ का दर्शन करके; आगत-साध्वस:-- अत्यधिक विह्ल श्लुव महाराज; क्षितौ--पृथ्वी पर; अवन्दत--नमस्कार किया; अड्भडमू--शरीर; विनमय्य--गिरकर; दण्डवत्‌--डंडे के समान; दृग्भ्यामू--अपनी आँखों से; प्रपश्यन्‌--देखतेहुए; प्रपिबन्‌ू--पान करते हुए; इब--सहश; अर्भक:--बालक; चुम्बन्‌--चुम्बन; इब--सहृश्य; आस्येन--मुख से; भुजैः--अपनी बाहों से; इब--सहृश; आश्लिषन्‌-- भरते हुए।

जब श्रुव महाराज ने अपने भगवान्‌ को अपने सन्मुख देखा तो वे अत्यन्त विह्ल हो उठे औरउन्होंने उनका सादर अभिवादन किया।

वे उनके समक्ष दण्ड के समान गिर पड़े और भगवत्प्रेम में मग्न हो गये।

आनन्द में ध्रुव महाराज भगवान्‌ को इस प्रकार देख रहे थे, मानो उन्हें आँखों से पीरहे हों, उनके चरण कमलों को अपने मुख से चूम रहे हों और उन्हें अपनी भुजाओं में भर रहे हों।

"

सतं विवक्षन्तमतद्विदं हरि-ज्ञात्वास्य सर्वस्य च हद्यवस्थितः ।

कृताझलिं ब्रह्ममयेन कम्बुनापस्पर्श बालं कृपया कपोले ॥

४॥

सः--भगवान्‌; तम्‌--श्वुव महाराज को; विवक्षन्तम्‌-गुणों का गान करने की अभिलाषा से; अ-तत्‌-विदम्‌--उसमें पदु न होनेसे; हरिः-- भगवान्‌; ज्ञात्वा--जानकर; अस्य-- श्रुव का; सर्वस्य--प्रत्येक का; च--तथा; हृदि--हृदय में; अवस्थित:--स्थितहोकर; कृत-अज्जञलिम्‌--हाथ जोड़ कर; ब्रह्म-मयेन--वैदिक मंत्रों के शब्दों से युक्त; कम्बुना--अपने शंख से; पस्पर्श--स्पर्शकिया; बालमू--बालक को; कृपया--अहैतुकी कृपा से; कपोले--मस्तक पर

यद्यपि ध्रुव महाराज छोटे से बालक थे, किन्तु वे उपयुक्त शब्दों से भगवान्‌ की स्तुति करनाचाह रहे थे।

किन्तु अनुभवहीन होने के कारण वे तुरन्त अपने को सँभाल नहीं सके।

प्रत्येक हृदयमें वास करनेवाले भगवान्‌ श्रुव महाराज की विषम स्थिति को समझ गये।

अत: अपनी अहैतुकीकृपा से उन्होंने अपने समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हुए ध्रुव महाराज के मस्तक पर अपना शंख छुआदिया।

"

स बै तदैव प्रतिपादितां गिरंदैवीं परिज्ञातपरात्मनिर्णय: ।

त॑ भक्तिभावो भ्यगृणा दस त्वरंपरिश्रुतोरु श्रवसं श्रुवक्षिति: ॥

५॥

सः--श्लुव महाराज; बै--निश्चय ही; तदा--उस समय; एव--ही; प्रतिपादिताम्‌--प्राप्त करके; गिरमू--वाणी; दैवीम्‌--दिव्य;परिज्ञात--जाना हुआ; पर-आत्म--परम-आत्मा का; निर्णय:--निष्कर्ष ; तमू-- भगवान्‌ को; भक्ति-भावः--भक्ति में स्थित;अभ्यगृणात्‌--स्तुति की; असत्वरम्‌-बिना जल्दबाजी दिखाये; परिश्रुत--विख्यात; उरु- भ्रवसम्‌--जिसका यश; ध्रुव-क्षितिः--श्रुव जिसके लोक का नाश नहीं होगा

उस समय श्रुव महाराज को वैदिक निष्कर्ष का पूर्ण ज्ञान हो गया और वे परम सत्य तथासभी जीवात्माओं से उनके सम्बन्ध को जान गये।

भगवान्‌ के सेवाभाव के अनुसार विश्वविख्यातध्रुव ने, जिन्हें शीघ्र ही ऐसे लोक की प्राप्ति होनेवाली थी, जो कभी भी यहाँ तक कि प्रलयकाल में विनष्ट न होने वाला है, सहज भाव से सोदेश्य व निर्णयात्मक स्तुति की।

"

ध्रुव उवाचयोउन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तांसञ्जीवयत्यखिलशक्तिधर: स्वधाम्ना ।

अन्‍्यांश्व हस्तचरण भ्रवणत्वगादीन्‌प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्‌ ॥

६॥

श्रुव: उबाच-- ध्रुव महाराज ने कहा; यः--जो परमेश्वर; अन्त:--अन्तःकरण; प्रविश्य--प्रवेश करके ; मम--मेरे; वाचम्‌--शब्द; इमामू--ये सभी; प्रसुप्तामू-निश्चल या मृत; सञ्जीवबति--पुनः जीवित होता है; अखिल--विश्वव्यापी; शक्ति--शक्ति;धरः--धारण करनेवाला; स्व-धाम्ना--अपनी अन्तरंगा शक्ति से; अन्यान्‌ च--अन्य अंग भी; हस्त--यथा हाथ; चरण--पाँव;श्रवण--कान; त्वक्‌--चर्म; आदीन्‌--इत्यादि; प्राणान्‌ू-- प्राण, जीवन-शक्ति; नमः--नमस्कार है; भगवते-- भगवान्‌ को;पुरुषाय--परम पुरुष को; तुभ्यम्‌--तुमको |

ध्रुव महाराज ने कहा : हे भगवन्‌, आप सर्वशक्तिमान हैं।

मेरे अन्तःकरण में प्रविष्ट होकरआपने मेरी सभी सोई हुई इन्द्रियों को--हाथों, पाँवों, स्प्शेन्द्रिय, प्राण तथा मेरी वाणी को--जाग्रत कर दिया है।

मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

"

एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्यामायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम्‌ ।

सृष्ठानुविश्य पुरुषस्तदसद्‌गुणेषुनानेव दारुषु विभावसुवद्दधिभासि ॥

७॥

एकः--एक; त्वमू--तुम; एव--निश्चय ही; भगवन्‌--हे भगवन्‌; इृदम्‌--यह भौतिक जगत; आत्म-शकत्या--अपनी शक्ति से;माया-आख्यया--माया नाम की; उरु--अत्यन्त शक्तिशाली; गुणया--प्रकृति के गुणों से युक्त; महत्‌ू-आदि--महत्‌-तत्त्वआदि; अशेषम्‌--- अनन्त; सृष्ठा--सृष्टि करके; अनुविश्य--फिर प्रवेश करके; पुरुष: --परमात्मा; ततू--माया का; असतू-गुणेषु-- क्षणिक प्रकट गुणों में; नाना--प्रत्येक प्रकार से; इब--मानो; दारुषु--काष्ठ खण्डों में; विभावसु-वत्‌-- अग्नि केसमान; विभासि--प्रकट होते हो

हे भगवन्‌, आप सर्वश्रेष्ठ हैं, किन्तु आप आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों में अपनी विभिन्नशक्तियों के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रकट होते रहते हैं।

आप अपनी बहिरंगा शक्ति सेभौतिक जगत की समस्त शक्ति को उत्पन्न करके बाद में भौतिक जगत में परमात्मा के रूप मेंप्रविष्ट हो जाते हैं।

आप परम पुरुष हैं और क्षणिक गुणों से अनेक प्रकार की सृष्टि करते हैं, जिसप्रकार कि अग्नि विभिन्न आकार के काष्ट्खण्डों में प्रविष्ट होकर विविध रूपों में चमकती हुईजलती है।

"

त्वद्त्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वसुप्तप्रबुद्ध इब नाथ भवत्प्रपन्न: ।

तस्यापवर्ग्यशरणं तब पादमूलंविस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो ॥

८॥

त्वतू-दत्तया--तुम्हारे द्वारा प्रदत्त; वयुनया--ज्ञान से; इदम्‌--यह; अचष्ट--देख सकता है; विश्वम्‌--समग्र ब्रह्माण्ड; सुप्त-प्रबुद्ध;:--सोकर जगे हुए पुरुष; इब--के समान; नाथ-हे प्रभु; भवत्‌-प्रपन्न:-- भगवान्‌ ब्रह्म, जो आपके शरणागत हैं;तस्य--उसका; आपवर्ग्य--मुक्ति के इच्छुक; शरणम्‌--शरण; तब--तुम्हारी; पाद-मूलम्‌--चरणकमल; विस्मर्यते-- भुलायाजा सकता है; कृत-विदा--विद्वान पुरुष; कथम्‌--किस प्रकार; आर्त-बन्धो--हे दुखियों के मित्र |

हे स्वामी, ब्रह्मा पूर्ण रूप से आपके शरणागत हैं।

आरम्भ में आपने उन्हें ज्ञान दिया तो वेसमस्त ब्रह्माण्ड को उसी तरह देख और समझ पाये जिस प्रकार कोई मनुष्य नींद से जगकरतुरन्त अपने कार्य समझने लगता है।

आप मुक्तिकामी समस्त पुरुषों के एकमात्र आश्रय हैं औरआप समस्त दीन-दुखियों के मित्र हैं।

अतः पूर्ण ज्ञान से युक्त विद्वान पुरुष आपको किस प्रकारभुला सकता है?"

नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया तेये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतो: ।

अर्चन्ति कल्पकतरूं कुणपोपभोग्य-मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेडपि नृणाम्‌ ॥

९॥

नूनमू--अवश्य ही; विमुष्ट-मतय:--जिन्होंने अपनी बुद्धि खो दी है; तब--तुम्हारी; मायया--माया के प्रभाव से; ते--वे; ये--जो; त्वाम्‌ू--तुम; भव--जन्म से; अप्यय--तथा मृत्यु; विमोक्षणम्‌--मुक्ति का कारण; अन्य-हेतो:--अन्य कार्यो के लिए;अर्चन्ति--पूजते हैं; कल्पक-तरुम्‌--जो कल्पतरु के समान हैं; कुणप--इस मृत शरीर का; उपभोग्यम्‌--इन्द्रियतृप्ति;इच्छन्ति--इच्छा करते हैं; यत्‌--जो; स्पर्श-जम्‌--स्पर्श से उत्पन्न; निरये--नरक में; अपि-- भी; नृणाम्‌ू--मनुष्यों के लिए।

जो व्यक्ति इस चमड़े के थेले ( शवतुल्य देह ) की इन्द्रियतृप्ति के लिए ही आपकी पूजाकरते हैं, वे निश्चय ही आपकी माया द्वारा प्रभावित हैं।

आप जैसे कल्पवृक्ष तथा जन्म-मृत्यु से मुक्ति के कारण को पार करके भी मेरे समान मूर्ख व्यक्ति आपसे इन्द्रियतृप्ति हेतु वरदान चाहतेहैं, जो नरक में रहनेवाले व्यक्तियों के लिए भी उपलब्ध हैं।

"

या निर्वृतिस्तनुभूृतां तव पादपद्ा-ध्यानाद्धवज्जनकथा श्रवणेन वा स्थात्‌ ।

सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत्‌कि त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात्‌ ॥

१०॥

या--वह जो; निर्व॒ृतिः--आनन्द; तनु-भृताम्‌--देह धारियों का; तब--तुम्हारे; पाद-पढ्य--चरणकमल का; ध्यानातू--ध्यानकरने से; भवत्‌-जन--आपके अन्तरंगी भक्तों से; कथा--कथा; श्रवणेन--सुनने से; वा-- अथवा; स्थात्‌ू--सम्भव; सा--वहआनन्द; ब्रह्मणि--निर्गुण ब्रह्म में; स्व-महिमनि---अपनी महिमा; अपि-- भी; नाथ--हे भगवन्‌; मा--कभी नहीं; भूत्‌--उपस्थित रहता है; किम्‌--क्या कहना; तु--तब; अन्तक-असि--मृत्यु की तलवार से; लुलितात्‌--विनष्ट होकर; पतताम्‌--गिरेहुओं का; विमानात्‌ू--विमान से |

हे भगवन्‌, आपके चरणकमलों के ध्यान से या शुद्ध भक्तों से आपकी महिमा का श्रवणकरने से जो दिव्य आनन्द प्राप्त होता है, वह उस ब्रह्मानन्द अवस्था से कहीं बढ़कर है, जिसमेंमनुष्य अपने को निर्गुण ब्रह्म से तदाकार हुआ सोचता है।

चूँकि ब्रह्मानन्द भी भक्ति सेमिलनेवाले दिव्य आनन्द से परास्त हो जाता है, अतः उस क्षणिक आनन्दमयता का क्‍या कहना,जिसमें कोई स्वर्ग तक पहुँच जाये और जो कालरूपी तलवार के द्वारा विनष्ट हो जाता है? भलेही कोई स्वर्ग तक क्‍यों न उठ जाये, कालक्रम में वह नीचे गिर जाता है।

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भक्ति मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसड़ोभूयादनन्त महताममलाशयानाम्‌ ।

येनाझ्सोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धि नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्त: ॥

११॥

भक्तिम्‌ू--भक्ति; मुहुः --निरन्तर; प्रवहताम्‌--करनेवालों का; त्वयि--तुमको; मे--मेरा; प्रसड़र:--अन्तरंग संगति; भूयात्‌--सम्भव है कि; अनन्त--हे अनन्त; महताम्‌--महान्‌ भक्तों का; अमल-आशयानाम्‌--जिनके हृदय भौतिक कल्मष से रहित हैं;येन--जिससे; अज्ञसा--सरलतापूर्वक; उल्बणम्‌-- भयंकर; उरुू--बड़ा; व्यसनम्‌--संकटों से पूर्ण; भव-अब्धिम्‌ू--संसार-सागर; नेष्ये-- पार करूँगा; भवत्‌--आपके; गुण--दिव्य गुण; कथा--लीलाएँ; अमृत--अमृत, शाश्वत; पान--पीकर;मत्त:--मस्त, पागल।

भ्रुव महाराज ने आगे कहा : हे अनन्त भगवान्‌, कृपया मुझे आशीर्वाद दें जिससे मैं उनमहान्‌ भक्तों की संगति कर सकूँ जो आपकी दिव्य प्रेमा भक्ति में उसी प्रकार निरन्तर लगे रहते हैंजिस प्रकार नदी की तरंगें लगातार बहती रहती हैं।

ऐसे दिव्य भक्त नितान्त कल्मषरहित जीवनबिताते हैं।

मुझे विश्वास है कि भक्तियोग से मैं संसार रूपी अज्ञान के सागर को पार कर सकूँगाजिसमें अग्नि की लपटों के समान भयंकर संकटों की लहरें उठ रही हैं।

यह मेरे लिए सरलरहेगा, क्योंकि मैं आपके दिव्य गुणों तथा लीलाओं के सुनने के लिए पागल हो रहा हूँ, जिनकाअस्तित्व शाश्वत है।

"

ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यये चान्वदः सुतसुहृदगृहवित्तदारा: ।

ये त्वव्जनाभ भवदीयपदारविन्द-सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसड़ाः ॥

१२॥

ते--वे; न--कभी नहीं; स्मरन्ति--स्मरण करते हैं; अतितराम्‌--अत्यधिक; प्रियम्‌--प्रिय; ईश--हे भगवान्‌; मर्त्यमू-- भौतिकदेह; ये--जो; च-- भी; अनु--के अनुसार; अदः--वह; सुत--पुत्र; सुहृत्‌--मित्र; गृह--घर; वित्त--सम्पत्ति; दारा:--पत्ली;ये--जो; तु--लेकिन; अब्ज-नाभ--हे कमलनाभि वाले भगवान्‌; भवदीय--आपका; पद-अरविन्द--चरणकमल;सौगन्ध्य--सुगन्धि; लुब्ध--आकृष्ट; हृदयेषु-- भक्तों सहित, जिनके हृदय; कृत-प्रसड्राः--संगति करते हैं।

हे कमलनाभ भगवान्‌, यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसे भक्त की संगति करता है, जिसका हृदयसदैव आपके चरणकमलों की सुगन्ध में लुब्ध रहता है, तो वह न तो कभी अपने भौतिक शरीरके प्रति आसक्त रहता है और न सन्तति, मित्र, घर, सम्पति तथा पत्नी के प्रति देहात्मबुद्धि रखताहै, जो भौतिकतावादी पुरुषों को अत्यन्त ही प्रिय हैं।

वस्तुतः वह उनकी तनिक भी परवाह नहींकरता।

"

तिर्यड्नगद्विजसरीसूपदेवदैत्य-मर्त्यादिभि: परिचितं सदसद्विशेषम्‌ ।

रूप॑ स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकंनातः परं परम वेद्ि न यत्र वाद: ॥

१३॥

तिर्यक्‌ू--पशुओं; नग--वृक्ष; द्विज--पक्षी; सरीसृप--रेंगनेवाले जीव; देव--देवता; दैत्य--असुर; मर्त्य-आदिभि:--मनुष्योंइत्यादि के द्वारा; परिचितम्‌--परिव्याप्त; सत्‌-असतू-विशेषम्‌--प्रकट तथा अप्रकट योनियों द्वारा; रूपम्‌ू--रूप; स्थविष्ठम्‌--स्थूल विश्व का; अज--हे अजन्मा; ते--तुम्हारा; महत्‌ू-आदि--सम्पूर्ण भौतिक शक्ति से उत्पन्न; अनेकम्‌-- अनेक कारण; न--नहीं; अतः--इससे; परम्‌ू--दिव्य; परम--हे परम; वेद्धि--जानता हूँ; न--नहीं ; यत्र--जहाँ; वाद: --विभिन्न तर्क |

हे भगवन्‌, हे परम अजन्मा, मैं जानता हूँ कि जीवात्माओं की विभिन्न योनियाँ, यथा पशु,पक्षी, रेंगनेवाले जीव, देवता तथा मनुष्य सारे ब्रह्माण्ड में फैली हुई हैं, जो समग्र भौतिक शक्तिसे उत्पन्न हैं।

मैं यह भी जानता हूँ कि ये कभी प्रकट रूप में रहती हैं, तो कभी अप्रकट रूप में,किन्तु मैने ऐसा परम रूप कभी नहीं देखा जैसा कि अब आप का देख रहा हूँ।

अब किसी भीसिद्धान्त के बनाने की आवश्यकता नहीं रह गई है।

"

कल्पान्त एतदखिलं जठरेण गृहन्‌शेते पुमान्स्वटगनन्तसखस्तदड्ले ।

यन्नाभिसिन्धुरूहकाञ्ननलोकपदा-गर्भ द्युमान्भगवते प्रणतोस्मि तस्मै ॥

१४॥

कल्प-अन्ते--कल्प के अन्त में; एतत्‌--यह ब्रह्माण्ड; अखिलम्‌--समस्त; जठरेण--उदर के भीतर; गृहन्‌ू--ले करके; शेते--लेटा रहता है; पुमानू--परम पुरुष; स्व-हक्‌--अपने आपको देखता हुआ; अनन्त--अनन्त जीव शेष; सख:--के साथ; तत्‌ू-अद्डे--उसकी गोद में; यत्‌--जिसकी; नाभि--नाभि से; सिन्धु--सागर; रूह--उगा हुआ; काझ्नन--सुनहला; लोक--लोक;पद्म--कमल के; गर्भे--पुष्प पुंज में; द्युमान्‌ू-- भगवान्‌ ब्रह्मा; भगवते-- भगवान्‌ को; प्रणतः--नमस्कार करता; अस्मि--हूँ;तस्मै--उसको |

हे भगवन्‌, प्रत्येक कल्प के अन्त में भगवान्‌ गर्भोदकशायी विष्णु ब्रह्माण्ड में दिखाईपड़नेवाली प्रत्येक वस्तु को अपने उदर में समाहित कर लेते हैं।

वे शेषनाग की गोद में लेट जातेहैं, उनकी नाभि से एक डंठल में से सुनहला कमल-पुष्प फूट निकलता है और इस कमल-पुष्पपर ब्रह्माजी उत्पन्न होते हैं।

मैं समझ सकता हूँ कि आप वही परमेश्वर हैं।

अतः मैं आपको सादरनमस्कार करता हूँ।

"

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्माकूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्रयधीश: ।

यहुद्धय॒वस्थितिमखण्डितया स्वदृष्टयाद्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥

१५॥

त्वमू-तुम; नित्य--शाश्वत; मुक्त--मुक्त; परिशुद्ध--विशुद्ध; विबुद्ध:--ज्ञान से पूर्ण; आत्मा--परमात्मा; कूट-स्थ:--परिवर्तनरहित; आदि--मूल; पुरुष:--पुरुष; भगवान्‌--छह ऐश्वर्यों से पूर्ण, भगवान्‌; त्रि-अधीश: --तीनों गुणों के स्वामी;यत्‌--जहाँ से; बुद्धि-- बौद्धिक कार्यो का; अवस्थितिम्‌--समस्त अवस्थाएँ; अखण्डितया--अखंडित, पूर्ण; स्व-दृष्या--दिव्यइृष्टि द्वारा; द्रष्टा--साक्षी; स्थितौ--( ब्रह्माण्ड ) के पालनार्थ; अधिमखः --समस्त यज्ञों के भोक्ता; व्यतिरिक्त:--भिन्न-भिन्नप्रकार से; आस्से--स्थित हो |

है भगवन्‌, अपनी अखंड दिव्य चितवन से आप बौद्धिक कार्यों की समस्त अवस्थाओं केपरम साक्षी हैं।

आप शाश्वत-मुक्त हैं, आप शुद्ध सत्व में विद्यमान रहते हैं और अपरिवर्तित रूप मेंपरमात्मा में विद्यमान हैं।

आप छह ऐश्वर्यों से युक्त आदि भगवान्‌ हैं और भौतिक प्रकृति के तीनोंगुणों के शाश्वत स्वामी हैं।

इस प्रकार आप सामान्य जीवात्माओं से सदैव भिन्न रहते हैं।

विष्णु रूप में आप सारे ब्रह्माण्ड के कार्यो का लेखा-जोखा रखते हैं, तो भी आप पृथक्‌ रहते हैं औरसमस्त यज्ञों के भोक्ता हैं।

"

यस्मिन्विरुद्धगतयो हानिशं पतन्तिविद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात्‌ ।

तद्गह्म विश्वभववमेकमनन्तमाद्य-मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥

१६॥

यस्मिनू--जिसमें; विरुद्ध-गतयः--विरोधी स्वभाव का; हि--निश्चय ही; अनिशम्‌--सदैव; पतन्ति-- प्रकट हैं; विद्या-आदयः--ज्ञान तथा अविद्या इत्यादि; विविध--विभिन्न; शक्तय: --शक्तियाँ; आनुपूर्व्यात्‌--सतत; तत्‌--उस; ब्रह्म--ब्रहा;विश्व-भवम्‌--भौतिक उत्पत्ति का कारण; एकम्‌--एक; अनन्तम्‌--अपार; आद्यम्‌--आदि; आनन्द-मात्रमू--केवलआनन्दमय; अविकारम्‌--अपरिवर्तित; अहम्‌--मैं; प्रपद्ये--नमस्कार करता हूँ।

हे भगवन्‌, ब्रह्म के आप के निर्गुण प्राकट्य में सदैव दो विरोधी तत्त्व रहते हैं--ज्ञान तथाअविद्या।

आपकी विविध शक्तियाँ निरन्तर प्रकट होती हैं, किन्तु निर्गुण ब्रह्म, जो अविभाज्य,आदि, अपरिवर्तित, असीम तथा आनन्दमय है, भौतिक जगत का कारण है।

चूँकि आप वहीनिर्गुण ब्रह्म हैं, अतः मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

"

सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादपदा-माशीस्तथानुभजत:ः पुरुषार्थमूत्ते: ।

अप्येवमर्य भगवान्परिपाति दीनान्‌वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोस्मान्‌ ॥

१७॥

सत्य--वास्तविक; आशिष:--अन्य आशीर्वादों ( बरों ) की तुलना में; हि--निश्चय ही; भगवन्‌--हे भगवन्‌; तब--तुम्हारा;पाद-पदाम्‌--चरणकमल; आशी: --वर; तथा--उस प्रकार से; अनुभजत:ः--भक्तों के लिए; पुरुष-अर्थ--जीवन के वास्तविकलक्ष्य का; मूर्ति:--साक्षात्‌: अपि--यद्यपि; एवम्‌--इस प्रकार; अर्य-हे श्रेष्ठ; भगवान्‌-- श्री भगवान्‌; परिपाति--पालन करताहै; दीनान्‌ू--दीनों का; वाश्रा--गाय; इब--के समान; वत्सकम्‌--बछड़े को; अनुग्रह--कृपा करने के लिए; कातर:--उत्सुक;अस्मान्‌ू--मुझ पर

हे भगवन्‌, हे परमेश्वर, आप सभी वरों के परम साक्षात्‌ रूप हैं, अतः जो बिना किसीकामना के आपकी भक्ति पर दृढ़ रहता है, उसके लिए राजा बनने तथा राज करने की अपेक्षाआपके चरण-कमलों की रज श्रेयस्कर है।

आपके चरणकमल की पूजा का यही वरदान है।

आप अपनी अहैतुकी कृपा से मुझ जैसे अज्ञानी भक्त के लिए पूर्ण परिपालक हैं, जिस प्रकारगाय अपने नवजात बछड़े को दूध पिलाती है और हमले से उसकी रक्षा करके उसकी देखभालकरती है।

"

मैत्रेय उवाचअथाभिष्ठृत एवं बै सत्सड्डूल्पेन धीमता ।

भृत्यानुरक्तो भगवान्प्रतिनन्द्येदमब्रवीत्‌ ॥

१८॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; अथ--तब; अभिष्ठटृतः --पूजा किये जाने पर; एवम्‌--इस प्रकार; बै--निश्चय ही; सत्‌-सड्जूल्पेन--ध्रुव महाराज द्वारा, जिनके हृदय में उत्तम आकाक्षाएँ थीं; धी-मता--अत्यधिक बुद्धिमान होने से; भृत्य-अनुरक्त:--भक्त के प्रति अनुकूल; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; प्रतिनन्द्य--उसको बधाई देकर; इृदम्‌--यह; अब्नवीत्‌--कहा |

मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा : हे विदुर, जब सद्ठिचारों से पूर्ण अन्तःकरण वाले श्रुव महाराज नेअपनी प्रार्थना समाप्त की तो अपने भक्तों तथा दासों पर अत्यन्त दयालु भगवान्‌ ने उन्हें बधाई दी और इस प्रकार कहा।

"

श्रीभगवानुवाचवेदाहं ते व्यवसितं हदि राजन्यबालक ।

तत्प्रयच्छामि भद्गं ते दुरापमपि सुत्रत ॥

१९॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- श्रीभगवान्‌ ने कहा; वेद-- जानता हूँ; अहम्‌--मैं; ते--तुम्हारा; व्यवसितम्--हृढ संकल्प; हदि--हृदय केभीतर; राजन्य-बालक-हे राजा के पुत्र; तत्‌--वह; प्रयच्छामि--तुम्हें दूँगा; भद्रमू--समस्त कल्याण; ते-- तुमको; दुरापमू--यद्यपि प्राप्त करना कठिन है, दुर्लभ; अपि--तो भी; सु-ब्रत--जिसने पवित्र व्रत धारण कर रखा है।

भगवान्‌ ने कहा : हे राजपुत्र ध्रुव, तुमने पवित्र व्रतों का पालन किया है और मैं तुम्हारीआन्तरिक इच्छा भी जानता हूँ।

यद्यपि तुम अत्यन्त महत्वाकांक्षी हो और तुम्हारी इच्छा को पूराकर पाना कठिन है, तो भी मैं उसे पूरा करूँगा।

तुम्हारा कल्याण हो।

"

नान्यैरथिष्ठितं भद्र यद्भ्राजिष्णु ध्रुवक्षितियत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम्‌ ।

मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्नु परस्तात्कल्पवासिनाम्‌ ॥

२०॥

धर्मोडग्नि: कश्यप: शुक्रो मुनयो ये वनौकस: ।

चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत्सतारका: ॥

२१॥

न--नहीं; अन्यैः --अन्यों के द्वारा; अधिष्ठितम्‌ू--शासित; भद्ग--मेंरे अच्छे बालक; यत्‌--जो; भ्राजिष्णु--देदीप्यमान; श्रुव-क्षिति-- शुवलोक नामक स्थान; यत्र--जहाँ; ग्रह--ग्रह; ऋक्ष--तारापुंज; ताराणाम्‌ू--तथा तारे; ज्योतिषाम्‌--नक्षत्रों से;चक्रमू--चक्कर; आहितम्‌--किया जाता है; मेढ्याम्‌--केन्द्रीय दण्ड के चारों ओर; गो--बैलों का; चक्र--झुंड; वत्‌--सदश;स्थास्नु--स्थिर; परस्तातू--परे; कल्प--ब्रह्म का एक दिन ( कल्प ); वासिनामू--रहेन वालों का; धर्म:--धर्म; अग्नि: --अग्नि; कश्यप:--कश्यप; शुक्र :--शुक्र; मुन॒य:ः -- मुनिगण; ये--जो सभी; वन-ओकस: --जंगल में रहकर; चरन्ति--चलतेहैं; दक्षिणी-कृत्य--अपनी दायीं ओर करके; भ्रमन्तः--प्रदक्षिणा लगाते हुए; यत्‌--जो ग्रह; सतारकाः:--समस्त तारों सहित |

भगवान्‌ ने आगे कहा : हे श्वुव, मैं तुम्हें ध्रुव नामक देदीप्यमान ग्रह प्रदान करूँगा जोकल्पान्त में प्रलय के बाद भी अस्तित्व में रहेगा।

अभी तक उस ग्रह में किसी ने राज्य नहीं कियाहै; तथा वह समस्त सौर मण्डल, ग्रहों तथा नक्षत्रों से घिरा हुआ है।

आकाश में सभी ज्योतिष्कइसी ग्रह की प्रदक्षिणा करते हैं, जिस प्रकार कि अनाज को कूटने के लिए सारे बैल एककेन्द्रीय लट्टे के चारों ओर चक्कर लगाते हैं।

धर्म, अग्नि, कश्यप तथा शुक्र जैसे ऋषियों द्वाराबसाये गये सभी तारे श्रुवतारे को अपनी दाईं ओर रखकर उसकी परिक्रमा करते हैं, जो अन्यों केविनष्ट हो जाने पर भी इसी प्रकार बना रहता है।

"

प्रस्थिते तु बन पित्रा दत्त्वा गां धर्मसंश्रयः ।

घदटिंत्रशद्वर्षसाहस्त्रं रक्षिताव्याहतेन्द्रिय:ः ॥

२२॥

प्रस्थिते--प्रस्थान के पश्चात्‌; तु--लेकिन; वनम्‌--जंगल को; पित्रा--तुम्हारे पिता द्वारा; दत्त्वा--देकर; गाम्‌--सम्पूर्ण जगत;धर्म-संभ्रयः--धर्मपूर्वक; षट्‌-त्रिंशत्‌--छत्तीस; वर्ष--वर्ष, साल; साहस्त्रमू--एक हजार; रक्षिता--राज्य करोगे; अव्याहत--बिना नाश के; इन्द्रियः--इन्द्रियों की शक्ति |

जब तुम्हारे पिता तुम्हें अपने राज्य का शासन देकर जंगल के लिए प्रस्थान करेंगे तो तुमलगातार छत्तीस हजार वर्षो तक सारे संसार पर राज्य करोगे और तुम्हारी सारी इन्द्रियाँ उतनी हीशक्तिशाली बनी रहेंगी जितनी कि वे आज हैं।

तुम कभी वृद्ध नहीं होगे।

"

त्वद्नातर्युत्तमे नष्टे मृगयायां तु तन्‍्मना: ।

अन्वेषन्ती वनं माता दावागिनि सा प्रवेक्ष्यति ॥

२३॥

त्वत्‌-तुम्हारा; भ्रातरि-- भ्राता; उत्तमे--उत्तम; नष्टे--मारे जाने पर; मृगयायाम्‌--शिकार में; तु--तब; ततू-मना:--अत्यन्तशोकाकुल; अन्वेषन्ती--ढूँढते हुए; वनम्‌ू--जंगल में; माता--माता; दाव-अग्निमू--जंगल की अग्नि में; सा--वह;प्रवेक्ष्यति--प्रवेश करेगी

भगवान्‌ ने आगे कहा : निकट भविष्य में तुम्हारा भाई उत्तम जंगल में शिकार करने जाएगाऔर जब वह शिकार में मग्न रहेगा तो मार डाला जाएगा।

तुम्हारी विमाता सुरुचि अपने पुत्र कीमृत्यु से पागल होकर उसकी खोज करने जंगल में जाएगी, किन्तु वहाँ वह दावाग्नि में मारीजाएगी।

"

इष्टा मां यज्ञहदयं यज्जैः पुष्कलद॒क्षिणै: ।

भुक्त्वा चेहाशिष: सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि ॥

२४॥

इश्ला--पूजा करके; माम्‌--मुझको; यज्ञ-हदयम्‌--समस्त यज्ञों का हृदय; यज्जैः--महान्‌ यज्ञों से; पुष्कल-दक्षिणै: -- प्रभूत दानवितरित करके; भुक्त्वा-- भोग करने के पश्चात्‌; च--भी; इह--इस संसार में; आशिष:--आशीर्वाद; सत्या:--सच, सही;अन्ते--अन्त में; माम्‌--मुझको; संस्मरिष्यसि--स्मरण करने में समर्थ होगे।

भगवान्‌ ने आगे कहा : मैं समस्त यज्ञों का हृदय हूँ।

तुम अनेक बड़े-बड़े यज्ञ सम्पन्न करोगेऔर प्रचुर दान भी दोगे।

इस प्रकार तुम इस जीवन में भौतिक सुख के वरदान को भोग सकोगेऔर अपनी मृत्यु के समय तुम मेरा स्मरण कर सकोगे।

"

ततो गन्तासि मत्स्थानं सर्वलोकनमस्कृतम्‌ ।

उपरिष्टादषिभ्यस्त्वं यतो नावर्तते गत: ॥

२५॥

ततः--तत्पश्चात्‌; गन्ता असि--तुम जाओगे; मत्‌-स्थानम्‌--मेरे धाम को; सर्व-लोक--समस्त लोकों द्वारा; नम:-कृतम्‌ू--वन्दनीय होकर; उपरिष्टात्‌ू--ऊपर स्थित; ऋषिभ्य:--ऋषियों के लोकों की अपेक्षा; त्वम्‌--तुम; यतः--जहाँ से; न--कभीनहीं; आवर्तते--वापस आओगे; गत:--वहाँ जा करके |

भगवान्‌ ने आगे कहा : हे ध्रुव, इस देह में अपने भौतिक जीवन के पश्चात्‌ तुम मेरे लोक कोजाओगे जो अन्य समस्त लोकों के वासियों द्वारा सदैव वंदनीय है।

यह सप्त-ऋषि के लोकों केऊपर स्थित है और वहाँ जाने के बाद तुम को इस भौतिक जगत में फिर कभी नहीं लौटनापड़ेगा।

"

मैत्रेय उवाचइत्यचितः स भगवानतिदिश्यात्मनः पदम्‌ ।

बालस्य पश्यतो धाम स्वमगादगरुडध्वज: ॥

२६॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा; इति--इस प्रकार; अर्चितः --सम्मानित एवं पूजित होकर; सः--परमे श्वर; भगवान्‌ --भगवान्‌; अतिदिश्य-- प्रदान करके; आत्मन:--अपना; पदम्‌--वासस्थान; बालस्य--जबकि बालक; पश्यतः --देख रहा था;धाम--उनके धाम को; स्वमू--अपनी, निजी; अगात्‌--वे लौट गये; गरुड-ध्वज: -- भगवान्‌ विष्णु जिनकी ध्वजा में गरुड़ काचिह्न है।

मैत्रेय मुनि ने कहा : बालक श्रुव महाराज द्वारा पूजित तथा सम्मानित होकर और उन्हें अपनाधाम देकर भगवान्‌ विष्णु गरुड़ की पीठ पर चढ़ कर श्लुव के देखते-देखते अपने धाम को चलेगये।

"

सोपि सड्डूल्पजं विष्णो: पादसेवोपसादितम्‌ ।

प्राप्य सड्डूल्पनिर्वाणं नातिप्रीतो भ्यगात्पुरम्‌ ॥

२७॥

सः--वह ( ध्रुव ); अपि--यद्यपि; सट्लूल्प-जम्‌--वांछित फल; विष्णो:--विष्णु का; पाद-सेवा--चरणकमल की सेवा करके;उपसादितम्‌-प्राप्त किया; प्राप्य--प्राप्त करके ; सड्डूल्प--अपने हढ़ निश्चय का; निर्वाणम्‌--संतुष्टि; न--नहीं; अतिप्रीत:--अत्यधिक प्रसन्न; अभ्यगात्‌--वापस गया; पुरमू--अपने घर को

भगवान्‌ के चरण-कमलों की उपासना द्वारा अपने संकल्प का मनवांछित फल प्राप्त करकेभी श्रुव महाराज अत्यधिक प्रसन्न नहीं हुए।

तब वे अपने घर चले गए।

"

विदुर उबाचसुदुर्लभं यत्परमं पदं हरे-मायाविनस्तच्चरणार्चनार्जितम्‌ ।

लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित्‌ ॥

२८ ॥

विदुर: उबाच--विदुर ने पूछा; सुदुर्लभम्‌--अत्यन्त दुर्लभ; यत्‌--जो; परमम्‌--परम; पदम्‌--पद, स्थान; हरेः-- भगवान्‌ का;माया-विन:--अत्यन्त वत्सल; तत्‌--उसके; चरण---चरणकमल; अर्चन--पूजन के द्वारा; अर्जितम्‌--उपलब्ध; लब्ध्वा--प्राप्तकरके; अपि--यद्यपि; असिद्ध-अर्थम्‌--अपूर्ण; इब--मानो; एक-जन्मना--एक जीवन काल में; कथम्‌--क्‍्यों; स्वम्‌--अपना; आत्मानम्‌--हृदय; अमन्यत-- अनुभव किया; अर्थ-वित्‌--अत्यन्त चतुर होने से |

श्री विदुर ने पूछा : हे ब्राह्मण, भगवान्‌ का धाम प्राप्त करना बहुत कठिन है।

इसे केवलशुद्ध भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है, क्योंकि अत्यन्त वत्सल तथा कृपालु भगवान्‌ केवलउसी से प्रसन्न होते हैं।

ध्रुव महाराज ने इस पद को एक ही जीवन में प्राप्त कर लिया और वे थेभी बहुत बुद्धिमान और विवेकी।

तो फिर वे प्रसन्न क्यों न थे ?"

मैत्रेय उवाचमातुः सपत्या वाग्बाणैईदि विद्धस्तु तान्स्मरन्‌ ।

नैच्छन्मुक्तिपतेर्मुक्ति तस्मात्तापमुपेयिवान्‌ ॥

२९॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय मुनि ने उत्तर दिया; मातु:--अपनी माता की; स-पत्या:--सौत के; वाक्‌-बाणै:--कटु वचनों के तीरोंसे; हृदि--हृदय में; विद्ध:ः--धँसा हुआ; तु--तब; तानू--उन सबको; स्मरन्‌ू--स्मरण करते हुए; न--नहीं; ऐच्छत्‌--इच्छा की;मुक्ति-पतेः-- भगवान्‌ से, जिनके चरणकमल मुक्ति प्रदाता हैं; मुक्तिम्‌ू--मोक्ष; तस्मात्‌ू--अत:; तापम्‌--शोक; उपेयिवानू--प्राप्त हुआ।

मैत्रेय ने उत्तर दिया : ध्रुव महाराज का हृदय, जो अपनी विमाता के कटु वचनों के बाणों सेबिद्ध हो चुका था, अत्यधिक संतप्त था; अतः जब उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारितकिया, तो वे उसके दुर्व्यवहार को नहीं भूल पाये थे।

उन्होंने इस भौतिक जगत से वास्तविक मोक्ष की माँग नहीं की, वरन्‌ अपनी भक्ति के अन्त में, जब भगवान्‌ उनके समक्ष प्रकट हुए तोवे अपनी उन भौतिक याचनाओं (माँगों) के लिए लज्जित थे, जो उनके मन में थीं।

"

श्रुव उवाचसमाधिना नैकभवेन यत्पदंविदुः सनन्दादय ऊर्ध्वरितसः ।

मासैरहं षड़्भिरमुष्य पादयो-इछायामुपेत्यापगतः पृथड्मति: ॥

३०॥

श्रुव: उबाच-- ध्रुव महाराज ने कहा; समाधिना--समाधि में योग अभ्यास द्वारा; न--कभी नहीं; एक-भवेन--एक जन्म से;यतू्‌--जो; पदम्‌ू--पद, स्थिति; विदु:--समझ गया; सनन्द-आदय: --सनन्दन इत्यादि चारों ब्रह्मचारी; ऊर्ध्व-रेतस:--अच्युतब्रह्मचारी; मासैः--महीनों में; अहम्‌--मैं; षड़िभः --छह; अमुष्य--उनके ; पादयो:--चरणकमलों का; छायामू--आश्रय,शरण; उपेत्य-- प्राप्त करके; अपगत:--गिर पड़ा; पृथक्‌-मतिः -- भगवान्‌ के अतिरिक्त अन्य वस्तुओं पर स्थित मेरा मन।

ध्रुव महाराज ने मन ही मन सोचा--भगवान्‌ के चरणकमलों की छाया में स्थित रहने काप्रयतल करना कोई सरल कार्य नहीं है, क्योंकि सनन्‍्दन इत्यादि जैसे महान्‌ ब्रह्मचारियों ने भी,जिन्होंने समाधि में अष्टांग योग की साधना की, अनेक जन्मों के बाद ही भगवान्‌ के चरणारविन्दकी शरण प्राप्त की है।

मैंने तो छह महीनों में ही वही फल प्राप्त कर लिया है, तो भी मैं भगवान्‌से भिन्न प्रकार से सोचने के कारण मैं अपने पद से नीचे गिर गया हूँ।

"

अहो बत ममानात्म्य॑ मन्दभाग्यस्य पश्यत ।

भवच्छिद: पादमूलं गत्वा याचे यदन्तवत्‌ ॥

३१॥

अहो--अहो; बत--हाय; मम--मेरा; अनात्म्यम्‌ू--देहात्म बोध; मन्द-भाग्यस्य--अभागे का; पश्यत--जरा देखो तो; भव--भौतिक अस्तित्व; छिदः--छिन्न कर सकने वाले भगवान्‌ के; पाद-मूलमू--चरणकमल के; गत्वा--पास जाकर; याचे-- मैंनेयाचना की; यत्‌--वह जो; अन्त-वत्‌--नाशवान

ओह! जरा देखो तो; मैं कितना अभागा हूँ! मैं उन भगवान्‌ के चरणकमलों से पास पहुँचगया जो जन्म-मरण के चक्र की श्रृंखला को तुरन्त काट सकते हैं, किन्तु फिर भी अपनी मूर्खताके कारण, मैने ऐसी वस्तुओं की याचना की, जो नाशवान्‌ हैं।

"

मतिर्विदूषिता देवै: पतद्धिरसहिष्णुभि: ।

यो नारदवच्स्तथ्यं नाग्राहिषमसत्तम: ॥

३२॥

मतिः--बुद्धि; विदूषिता--दूषित, कल्मष- ग्रस्त; देवै:--देवताओं द्वारा; पतद्धि:--गिरनेवाले के द्वारा; असहिष्णुभि: --असहनशील द्वारा; यः--मैं जो; नारद--नारद मुनि के; वच:ः--उपदेशों का; तथ्यम्‌--सत्य; न--नहीं; अग्राहिषम्‌--स्वीकारकिया; असतू-तमः--सर्वाधिक दुष्ट

चूँकि सभी देवताओं को, जो उच्च लोकों में स्थित हैं, फिर से नीचे आना होगा, अतः वेसभी भक्ति द्वारा मेरे विष्णुलोक को प्राप्त करने के प्रति ईर्ष्यालु हैं।

इन असहिष्णु देवताओं नेमेरी बुद्धि नष्ट कर दी है और यही एकमात्र कारण है, जिससे मैं नारदमुनि के उपदेशों केआशीर्वाद को स्वीकार नहीं कर सका!" दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नहक्‌ ।

तप्ये द्वितीयेउप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहद्रुजा ॥

३३॥

दैवीम्-- भगवान्‌ की; मायाम्‌--माया; उपाश्रित्य--शरण ग्रहण करके; प्रसुप्तः:--निद्रा में स्वप्न देखता; इब--सहश्य; भिन्न-हक्‌--विलग दृष्टि वाला; तप्ये--मैंने पश्चात्ताप किया; द्वितीये--माया में; अपि---यद्यपि; असति--क्षणिक; भ्रातृ- भाई;भ्रातृव्य--शत्रु; हत्‌ू--हृदय के भीतर; रुजा--पक्षात्ताप से।

ध्रुव महाराज पश्चात्ताप करने लगे कि मैं माया के वश में था; वास्तविकता से अपरिचितहोने के कारण मैं उसकी गोद में सोया था।

द्वैत दृष्टि के कारण मैं अपने भाई को शत्रु समझतारहा और झूठे ही यह सोचकर मन ही मन पश्चात्ताप करता रहा कि वे मेरे शत्रु हैं।

"

मयैतत्ार्थितं व्यर्थ चिकित्सेव गतायुषिप्रसाद्य जगदात्मानं तपसा दुष्प्रसादनम्‌ ।

भवच्छिदमयाचेहं भवं भाग्यविवर्जित: ॥

३४॥

मया--मेरे द्वारा; एतत्‌--यह; प्रार्थितम्‌--के लिए प्रार्थना किया गया; व्यर्थम्‌--वृथा ही; चिकित्सा--उपचार; इब--सहश;गत--समाप्त; आयुषि--उसके लिए जिसकी आयु; प्रसाद्य--तुष्ट करके ; जगत्‌-आत्मानम्‌--ब्रह्मण्ड की आत्मा; तपसा--तपस्या से; दुष्प्रसादनम्‌--जिसे प्रसन्न कर पाना कठिन है; भव-छिदम्‌-- भगवान्‌ जो जन्म तथा मृत्यु की श्रृंखला को काटने मेंसमर्थ हैं; अयाचे--याचना की; अहम्‌--मैंने; भवम्‌--जन्म तथा मृत्यु की आवृत्ति; भाग्य--भाग्य; विवर्जित: --रहित, हीन

भगवान्‌ को प्रसन्न कर पाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु मैंने तो समस्त ब्रह्माण्ड के परमात्माको प्रसन्न करके भी अपने लिए व्यर्थ की वस्तुएँ माँगी हैं।

मेरे कार्य ठीक वैसे ही हैं जैसे पहले सेकिसी मृत व्यक्ति का उपचार करना।

जरा देखो तो मैं कितना अभागा हूँ कि जन्म तथा मृत्यु कीश्रृंखला को काटने में समर्थ परमेश्वर से साक्षात्कार कर लेने पर भी मैंने फिर उन्हीं दशाओं के लिए पुनः प्रार्थना की है!" स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितो बत ।

ईश्वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधन: ॥

३५॥

स्वाराज्यम्‌--उनकी भक्ति; यच्छत:--भगवान्‌ से, जो देने के लिए इच्छुक थे; मौढ्यात्‌--मूर्खता से; मान:--सम्पन्नता; मे--मेरेद्वारा; भिक्षित:--याचित; बत--ओह; ईश्वरात्‌-महान्‌ सम्राट से; क्षीण--घटा हुआ; पुण्येन--जिसके पवित्र कर्म; फली-कारानू--चावल के टूटन, कना; इब--सहश; अधनः--निर्धन मनुष्य |

पूरी तरह अपनी मूर्खता और पुण्यकर्मो की न्‍्यूनता के कारण ही मैंने भौतिक नाम, यशतथा सम्पन्नता चाही यद्यपि भगवान्‌ ने मुझे अपनी निजी सेवा प्रदान की थी।

मेरी स्थिति तो उसनिर्धन व्यक्ति की-सी है, जिस बेचारे ने महान्‌ सप्राट के प्रसन्न होने पर मुँहमाँगी वस्तु माँगने केलिए कहे जाने पर अज्ञानवश चावल के कुछ कने ही माँगे।

"

सतण उजायन वै मुकुन्दस्य पदारविन्दयोरजोजुषस्तात भवाहशा जना: ।

वाञ्छन्ति तद्दास्यमृतेर्थमात्मनोयहच्छया लब्धमन:समृचब्द्यः ॥

३६॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ऋषि ने कहा; न--कभी नहीं; बै--निश्चय ही; मुकुन्दस्य-- भगवान्‌ का, जो मुक्ति देनेवाले हैं; पद-अरविन्दयो:--चरणकमलों का; रज:-जुष:--जो लोग धूल का स्वाद लेने के लिए इच्छुक हैं; तात--हे विदुर; भवाहशा: --आपके तुल्य; जना: --व्यक्ति; वाउ्छन्ति--कामना करते हैं; तत्‌--उसका; दास्यमू--दासता; ऋते--बिना; अर्थम्‌--स्वार्थ;आत्मन:--अपने लिए; यह्च्छया-- स्वतः; लब्ध--जितना प्राप्त हो उसी से; मनः-समृद्धयः--अपने आपको धनी समझते हुए

महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, आप जैसे व्यक्ति, जो मुकुन्द ( मुक्तिप्रदाता भगवान्‌ )के चरणकमलों के विशुद्ध भक्त हैं और उनके चरणकमलों में भौंरों के सहश्य आसक्त रहते हैं,सदैव भगवान्‌ के चरणकमलों की सेवा करने में ही प्रसन्न रहते हैं।

ऐसे पुरुष, जीवन की किसीभी परिस्थिति में संतुष्ट रहते हैं और भगवान्‌ से कभी भी किसी भौतिक सम्पन्नता की याचनानहीं करते।

"

आकर्णयत्मजमायान्तं सम्परेत्य यथागतम्‌ ।

राजा न श्रद्दधे भद्रमभद्ग॒स्य कुतो मम ॥

३७॥

आकर्णरय--सुनकर; आत्म-जम्‌--अपना पुत्र; आयान्तम्‌--आते हुए; सम्परेत्य--मरने के बाद; यथा--जिस प्रकार; आगतम्‌--वापस आया हुआ; राजा--राजा उत्तानपाद; न--नहीं; श्रदधधे--विश्वास हुआ; भद्गरमू--कल्याण; अभद्रस्थ--अशुभ का;कुतः--कहाँ से; मम--मेरा |

जब राजा उत्तानपाद ने सुना कि उसका पुत्र ध्रुव घर वापस आ रहा है, मानो मृत्यु के पश्चात्‌पुनर्जीवित हो रहा हो, तो उसे इस समाचार पर विश्वास नहीं हुआ क्योंकि उसे सन्देह था कि यहहो कैसे सकता है।

उसने अपने को अत्यन्त अभागा समझ लिया था, अतः उसने सोचा कि ऐसासौभाग्य उसे कहाँ नसीब हो सकता है ?"

श्रद्धाय वाक्यं देवरषेईर्षवेगेन धर्षित: ।

वार्ताहर्तुरतिप्रीतो हारं प्रादान्महाधनम्‌ ॥

३८ ॥

श्रद्धाय-- श्रद्धा रखकर; वाक्यम्‌--वचनों में; देवर्षे: --नारद मुनि के; हर्ष-वेगेन--परम संतोष से; धर्षित:--भावविभोरहोकर; वार्ता-हर्तु:--समाचार लानेवाले से; अतिप्रीत:-- अत्यन्त प्रसन्न होकर; हारमू--मोती की माला; प्रादात्‌ू--प्रदान किया;महा-धनम्‌-- अत्यन्त मूल्यवान।

यद्यपि उसे सन्देशवाहक की बातों पर विश्वास नहीं हुआ, किन्तु महर्षि नारद के वचन परउसकी सम्पूर्ण श्रद्धा थी।

अत: वह इस समाचार से अत्यन्त भावविहलल हो उठा और हर्षातिरेक मेंझट उसने संदेशवाहक को एक बहुमूल्य हार भेंट कर दिया।

"

सदश्च॑ं रथमारुह्म कार्तस्वरपरिष्कृतम्‌ ।

ब्राह्मणै: कुलवृद्धैश्व पर्यस्तोमात्यबन्धुभि: ॥

३९॥

शद्डुदुन्दुभिनादेन ब्रह्मघोषेण वेणुभि: ।

निश्चक्राम पुरात्तूर्णमात्मजाभीक्षणोत्सुक: ॥

४०॥

सत्-अश्वम्‌--सुन्दर घोड़ों द्वारा खींचा जानेवाला; रथम्‌--रथ पर; आरुह्म--चढ़ कर; कार्तस्वर-परिष्कृतम्‌--सुवर्णजटित;ब्राह्मणैः--ब्राह्मणों के साथ; कुल-वृद्धैः--परिवार के बूढ़े लोगों के साथ; च--भी; पर्यस्त:--घिरकर; अमात्य--अधिकारियोंतथा मंत्रियों द्वारा; बन्धुभि: --तथा मित्रों से; शद्भ--शंख; दुन्दुभि--तथा दुन्दुभी की; नादेन--ध्वनि से; ब्रहय-घोषेण--वैदिकमंत्रों के उच्चारण से; वेणुभि:--वंशी से; निश्चक्राम--बाहर आया; पुरातू--नगर से; तूर्णम्‌--शीघ्रता से; आत्म-ज--पुत्र को;अभीक्षण--देखने के लिए; उत्सुक: --अत्यन्त इच्छुक |

अपने खोये हुए पुत्र के मुख को देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक राजा उत्तानपाद उत्तम घोड़ोंसे खींचे जानेवाले तथा स्वर्णजटित रथ पर आरूढ़ हुआ।

वह अपने साथ अनेक दिद्वान्‌ ब्राह्मण,परिवार के गुरुजन, अपने अधिकारी तथा मंत्री और अपने सगे मित्रों को लेकर तुरन्त नगर सेबाहर चला गया।

जब वह इस दल के साथ आगे बढ़ रहा था, तो शंख, दुन्दुभी, वंशी तथा वेद-मंत्रों के उच्चारण की मंगलसूचक ध्वनि हो रही थी।

"

सुनीतिः सुरुचिश्वास्य महिष्यौ रुक्मभूषिते ।

आरुह्म शिबिकां सार्धमुत्तमेनाभिजग्मतु: ॥

४१॥

सुनीति:ः--सुनीति; सुरुचि: --सुरुचि; च-- भी; अस्य--राजा की; महिष्यौ--रानियाँ; रुक्म-भूषिते--स्वर्ण आभूषणों सेविभूषित; आरुह्म --चढ़कर; शिवबिकाम्‌--पालकी में; सार्धम्‌--के साथ साथ; उत्तमेन--राजा का अन्य पुत्र; अभिजम्मतु:--सभी साथ-साथ गये।

उस स्वागत-यत्रा में राजा उत्तानपाद की दोनों रानियाँ, सुनीति तथा सुरुचि और राजा कादूसरा पुत्र उत्तम दिख रहे थे।

रानियाँ पालकी में बैठी थीं।

"

त॑ दृष्टोपवनाभ्याश आयान्तं तरसा रथात्‌ ।

अवसुद्य नृपस्तूर्णमासाद्य प्रेमविह्ल: ॥

४२॥

परिरेभेडड्गजं दोर्भ्या दीर्घोत्कण्ठमना: श्वसन्‌ ।

विष्वक्सेनाड्प्रिसंस्पर्शहताशेषाघबन्धनम्‌ ॥

४३ ॥

तम्‌--उसको ( ध्रुव महाराज को ); हृष्ला--देखकर; उपवन--छोटा जंगल; अभ्याशे--निकट; आयान्तम्‌--लौटते हुए; तरसा--तेजी से; रथात्‌--रथ से; अवरुह्म--उतर कर; नृप:--राजा; तूर्णम्‌--तुरन्‍्त; आसाद्य--निकट आकर; प्रेम--प्रेम से; विहल: --विभोर; परिरेभे--आलिंगन किया; अड्ड-जम्‌--अपने पुत्र को; दोर्भ्याम्‌ू--अपनी बाँहों से; दीर्घ--दीर्घ समय तक; उत्कण्ठ--उत्सुक; मनाः:--जिसका मन, राजा; श्रसन्‌--तेजी से साँस लेता; विष्वक्सेन-- भगवान्‌ के; अद्धप्रि--चरणकमल से; संस्पर्श--स्पर्श किया जाकर; हत--नष्ट; अशेष-- अनन्त; अघध-- भौतिक कल्मष; बन्धनम्‌--जिसका बन्धन।

ध्रुव महाराज को एक उपवन के निकट पहुँचा देखकर राजा उत्तानपाद तुरन्त अपने रथ सेनीचे उतर आये।

वे अपने पुत्र श्रुव को देखने के लिए दीर्घकाल से अत्यन्त उत्सुक थे, अतः वेअत्यन्त प्रेमवश दीर्घकाल से खोये अपने पुत्र का आलिंगन करने के लिए आगे बढ़े।

लम्बी-लम्बी साँसें भरते हुए राजा ने उनको अपने दोनों बाहुओं में भर लिया।

किन्तु ध्रुव महाराज पहलेजैसे न थे; वे भगवान्‌ के चरणकमलों के स्पर्श से आध्यात्मिक उन्नति मिलने से पूर्ण रूप सेपवित्र हो चुके थे।

"

अथाजिपष्रन्मुहर्मूर्थिन शीतैर्नयनवारिभि: ।

स्नापयामास तनयं जातोद्मममनोरथ: ॥

४४॥

अथ--त्पश्चात्‌; आजिप्रन्‌--सूँघते हुए; मुहुः--बारम्बार; मूर्धिन--सिर पर; शीतैः--ठंडे; नयन--नेत्रों के; वारिभि:--जल से;स्नापयाम्‌ आस--नहला दिया; तनयम्‌--पुत्र को; जात--पूर्ण; उद्यम--बड़ी; मनः-रथ: --उसकी कामना

श्रुव महाराज के मिलन से राजा उत्तानपाद की चिर-अभिलषित साध पूरी हुई, अतः उन्होंनेबारम्बार ध्रुव का सिर सूँघा और अपने ठंडे अश्रुओं की धाराओं से उन्हें नहला दिया।

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अभिवन्द्य पितु: पादावाशीर्भिश्चाभिमन्त्रित: ।

ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणी: ॥

४५॥

अभिवन्द्य-पूजा करके; पितु:--अपने पिता के; पादौ--चरणों को; आशीर्मि: --आशीर्वादों से; च--तथा; अभिमन्त्रित:--सम्बोधित; ननाम--झुकाया; मातरौ--दोनों माताओं को; शीर्ष्णा--अपने सिर से; सत्‌-कृतः--आदर किया गया; सत्‌-जन--सज्ननों के; अग्रणी: --सर्व श्रेष्ठ |

तब समस्त सजनों में सर्वश्रेष्ठ श्ुव महाराज ने सर्वप्रथम अपने पिता के चरणों में प्रणामकिया और उनके पिता ने अनेक प्रश्न पूछते हुए उनका सम्मान किया।

तब उन्होंने अपनी दोनोंमाताओं के चरणों पर अपना सिर झुकाया।

"

सुरुचिस्तं समुत्थाप्य पादावनतमर्भकम्‌ ।

परिष्वज्याह जीवेति बाष्पगद्गदया गिरा ॥

४६॥

सुरुचि:--सुरुचि; तम्‌--उस; समुत्थाप्य--उठाकर; पाद-अवनतम्‌--अपने चरणों पर नत; अर्भकम्‌--नादान बालक को;परिष्वज्य--आलिंगन करके; आह--कहा; जीव--दीर्घायु हो; इति--इस प्रकार; बाष्प--आँसुओं से; गदगदया--रुद्ध;गिरा--वाणी से

ध्रुव महाराज की छोटी माता सुरुचि ने यह देखकर कि निर्दोष बालक उसके चरणों पर नतहै, उसे तुरन्त उठा लिया, अपनी बाँहों में भर लिया और अश्रुपूर्ण गदगद वाणी से आशीर्वाददिया कि मेरे बालक, चिरज्जीवी हो।

"

यस्य प्रसन्नो भगवान्गुणैमैत्रयादिभिहरि: ।

तस्मै नमन्ति भूतानि निम्नमाप इव स्वयम्‌ ॥

४७॥

यस्य--जिस किसी से; प्रसन्न:--प्रसन्न होता है; भगवान्‌-- भगवान्‌; गुणैः--गुणों से; मैत्री-आदिभि: --मित्रता इत्यादि से;हरिः-- भगवान्‌ हरि; तस्मै-- उसको; नमन्ति-- नमस्कार करते हैं; भूतानि--समस्त जीवात्माएँ; निम्ममू--नीचे की ओर;आपः--जल; इब--जिस प्रकार; स्वयम्‌ू--स्वतः

जिस प्रकार स्वभावगत रूप से जल स्वत: नीचे की ओर बहता है, उसी प्रकार श्रीभगवान्‌के साथ मैत्रीपूर्ण आचरण के कारण दिव्य गुणों वाले व्यक्ति को सभी जीवात्माएँ मस्तकझुकाती हैं।

"

उत्तमश्न श्रुवश्चोभावन्योन्यं प्रेमविह्नलौ ।

अड्भसड्जादुत्पुलकावस््रौघं मुहुरूहतु: ॥

४८ ॥

उत्तम: च--उत्तम भी; ध्रुवः च--ध्रुव भी; उभौ--दोनों ; अन्योन्यम्‌--परस्पर; प्रेम-विह्लौ--प्रेम से अभिभूत होकर; अड्र-सझ़त्‌--अंग-स्पर्श के आलिंगन से; उत्पुलकौ--रोमांच हो आया; असख्त्र--अश्रुओं की; ओघम्‌-- धारा; मुहुः --बारम्बार;ऊहतु:--आदान-प्रदान किया।

उत्तम तथा श्रुव महाराज दोनों भाइयों ने परस्पर अश्रुओं का आदान-प्रदान किया।

वे स्नेहकी अनुभूति से विभोर हो उठे और जब उन्होंने एक दूसरे का आलिंगन किया, तो उन्हें रोमांच होआया।

"

सुनीतिरस्य जननी प्राणेभ्योपि प्रियं सुतम्‌ ।

उपगुह्ा जहावाधि तदड़स्पर्शनिर्वृता ॥

४९॥

सुनीति:--सुनीति, श्रुव की असली माता; अस्य--उसकी; जननी--माता; प्राणेभ्य:--प्राणवायु से बढ़कर; अपि-- भी;प्रियम्‌-प्रिय; सुतम्‌-पुत्र को; उपगुह्म --गले लगा कर; जहौ--त्याग दिया; आधिम्‌--सारा शोक; ततू-अड्ग--उसका शरीर;स्पर्श--छूकर; निर्वृता--सन्तुष्ट |

ध्रुव महाराज की असली माता सुनीति ने अपने पुत्र के कोमल शरीर को गले लगा लिया,क्योंकि वह उसे अपने प्राणों से भी अधिक प्यारा था।

इस प्रकार वह सारा भौतिक शोक भूलगई, क्योंकि वह परम प्रसन्न थी।

"

पयः स्तनाभ्यां सुस्त्राव नेत्रजे: सलिलै: शिवैः ।

तदाभिषिच्यमानाभ्यां वीर वीरसुवो मुहु: ॥

५०॥

'पयः--दूध; स्तनाभ्याम्‌--दोनों स्तनों से; सुस्राव--बहने लगा; नेत्र-जैः--नेत्रों से; सलिलैः--अश्रुओं के द्वारा; शिवैः:--शुभ;तदा--उस समय; अभिषिच्यमानाभ्याम्‌-- भीग कर; वीर--हे विदुर; वीर-सुब:ः--वीर को जन्म देनेवाली माता का; मुहुः--लगातारहे विदुर, सुनीति एक वीर की माता थी।

उसके अश्रुओं ने उसके स्तनों से बहनेवाले दूध कीधारा के साथ मिलकर श्लुव महाराज के सार शरीर को भिगो दिया।

यह परम मांगलिक लक्षणथा।

"

तां शशंसुर्जना राज्ञीं दिष्टद्या ते पुत्र आर्तिहा ।

प्रतिलब्धश्िरं नष्टो रक्षिता मण्डलं भुवः ॥

५१॥

तामू--सुनीति को; शशंसु:-- प्रशंसा की; जना:--सामान्य लोग; राज्ञीमू--रानी को; दिछ्ठदय्या-- भाग्य से; ते--तुम्हारा; पुत्र:--पुत्र; आर्ति-हा--तुम्हारे समस्त कष्टों को नष्ट कर देगा; प्रतिलब्ध:--अब लौटा हुआ; चिरम्‌--दीर्घकाल से; नष्ट:--नष्ट;रक्षिता--रक्षा करेगा; मण्डलम्‌--मंडल, भू-गोलक; भुवः-- भूमि को |

राज महल के निवासियों ने रानी की इस प्रकार से प्रशंसा की : हे रानी, दीर्घकाल सेआपका प्रिय पुत्र खोया हुआ था।

यह आपका परम सौभाग्य है कि वह अब वापस आ गया है।

अतः ऐसा प्रतीत होता है कि वह दीर्घकाल तक आपकी रक्षा करेगा और आपके सारे सांसारिककष्टों को दूर कर देगा।

"

अभ्यर्चितस्त्वया नूनं भगवान्प्रणतार्तिहा ।

यदनुध्यायिनो धीरा मृत्युं जिग्यु: सुदुर्जयम्‌ ॥

५२॥

अभ्यर्चित:--पूजित; त्वया--तुम्हारे द्वारा; नूममू--फिर भी; भगवान्‌-- भगवान्‌; प्रणत-आर्ति-हा--जो अपने भक्तों को संकटसे उबार सके; यत्‌--जिसको; अनुध्यायिन:--निरन्तर ध्यान धरते हुए; धीरा:--परम साधु पुरुष; मृत्युमू--मृत्यु को; जिग्यु:--जीत लिया; सुदुर्जयम्‌--जिसे जीतना अत्यन्त कठिन है|

हे रानी, आपने अवश्य ही उन भगवान्‌ की पूजा की होगी, जो भक्तों को बड़े संकट सेउबारनेवाले हैं।

जो मनुष्य निरन्तर उनका ध्यान करते हैं, वे जन्म तथा मृत्यु की प्रक्रिया से आगेनिकल जाते हैं।

यह सिद्धि प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है।

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लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृप: ।

आरोप्य करिणीं हृष्ट: स्तूयमानोविशत्पुरम्‌ ॥

५३॥

लाल्यमानम्‌--प्रशंसित; जनैः --जनता द्वारा; एवम्‌--इस प्रकार; ध्रुवम्‌--महाराज श्रुव को; स-भ्रातरम्‌--अपने भाई के साथ;नृप:--राजा; आरोप्य--चढ़ाकर; करिणीम्‌--हथिनी की पीठ पर; हृष्ट: --प्रसन्न; स्तूयमान:--तथा प्रशंसित होकर; अविशतू --वापस आया; पुरम्‌--अपनी राजधानी को

मैत्रेय मुनि ने आगे बताया : हे विदुर, सभी लोग जब इस प्रकार से श्रुव महाराज की बड़ाईकर रहे थे तो राजा अत्यन्त प्रसन्न था।

उसने श्रुव तथा उनके भाई को एक हथिनी की पीठ परसवार कराया।

इस प्रकार वह अपनी राजधानी लौट आया, जहाँ सभी वर्ग के लोगों ने उसकीप्रशंसा की।

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तत्र तत्रोपसड्डिप्तैलंसन्मकरतोरणै: ।

सवृन्दे: कदलीस्तम्भे: पूगपोतैश्व तद्विधिः ॥

५४॥

तत्र तत्र--जहाँ तहाँ; उपसड्डिप्तैः--बनाये गये; लसत्‌--चमकीले; मकर--मगर के आकार के; तोरणैः--मेहराबदार दरवाजोंसे; स-वृन्दै:--फूलों तथा फलों के गुच्छों से; कदली--केले के वृक्षों के; स्तम्भेः--ख भों से; पूग-पोतैः--सुपारी के नये पौधोंसे; च-- भी; तत्‌ू-विधै:--उस प्रकार का।

सारा नगर केले के स्तम्भों से सजाया गया था, जिनमें फूलों तथा फलों के गुच्छे लटक रहेथे और जहाँ-तहाँ पत्तियों तथा टहनियों से युक्त सुपारी के वृक्ष दिख रहे थे।

ऐसे अनेक तोरण भी बनाये गये थे, जो मगर के आकार के थे।

"

चूतपल्‍लववास:स्त्रड्मुक्तादामविलम्बिभि: ।

उपस्कृतं प्रतिद्वारमपां कुम्भेः सदीपकै: ॥

५५॥

चूत-पल्‍ललव--आम की पत्तियों से; वास:--वस्त्र; स्रक्‌ू--फूल की मालाएँ; मुक्ता-दाम--मोती की लड़ें; विलम्बिभि:--'लटकती हुई; उपस्कृतम्‌--सुसज्जित; प्रति-द्वारम्‌--प्रत्येक द्वार पर; अपाम्‌--जल से पूर्ण; कुम्भैः--जलपात्रों से; स-दीपकै: --जलते हुए दीपों से |

द्वार-द्वार पर जलते हुए दीपक और तरह-तरह के रंगीन वस्त्र, मोती की लड़ों, पुष्पहारों तथालटकती आम की पत्तियों से सज्जित बड़े-बड़े जल के कलश रखे हुए थे।

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प्राकारैगोंपुरागारै: शातकुम्भपरिच्छदै: ।

सर्वतोलड्डू तं श्रीमद्विमानशिखरद्युभि: ॥

५६॥

प्राकारैः--परकोटों से; गोपुर--नगर-द्वारों; आगारैः--घरों से; शातकुम्भ--सुनहले; परिच्छदैः:--अलंकृत काम से, कारीगरीसे; सर्वतः--चारों ओर; अलड्डू तम्‌--सजाया हुआ; श्रीमत्‌--बहुमूल्य, सुन्दर; विमान--विमान; शिखर--चोटी, कँगूरे;झुभिः--चमकते हुए।

राजधानी में अनेक महल, नगर-द्वार तथा परकोटे थे, जो पहले से ही अत्यन्त सुन्दर थे,किन्तु इस अवसर पर उन्हें सुनहले आभूषणों से सजाया गया था।

नगर के महलों के कंँगूरे तोचमक ही रहे थे साथ ही नगर के ऊपर मँडराने वाले सुन्दर विमानों के शिखर भी।

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मृष्टचत्वररथ्याइमार्ग चन्दनचर्चितम्‌ ।

लाजाक्षतै: पुष्पफलैस्तण्डुलैबलिभियुतम्‌ ॥

५७॥

मृष्ट--पूरी तरह स्वच्छ; चत्वर--चौक; रथ्या--मार्ग; अट्ट--चौपालें, अटारियाँ; मार्गमू--गलियाँ; चन्दन--चन्दन से;चर्चितम्‌-छिड़की हुई; लाज--लावा से; अक्षतैः--जौ से; पुष्प--फूलों से; फलैः:--तथा फलों से; तण्डुलैः-- धान से;बलिभि:--उपहार-सामग्रियों से; युतम्‌--युक्त नगर की

सभी चौकें, गलियाँ, मार्ग तथा चौराहों की अटारियाँ अच्छी तरह स्वच्छ करकेचन्दन जल से छिड़की गई थीं और सारे नगर में धान तथा जौ जैसे शुभ अन्न, फूल, फल तथाअन्य अनेक शुभ उपहार-सामग्रियाँ बिखेरी हुई थीं।

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ध्रुवाय पथि दृष्टाय तत्र तत्र पुरस्त्रियः ।

सिद्धार्थक्षतद्यम्बुदूर्वापुष्पफलानि च ॥

५८ ॥

उपजहुः प्रयुज्ञाना वात्सल्यादाशिष: सतीः ।

श्रृण्वंस्तद्वल्गुगीतानि प्राविशद्धवनं पितु: ॥

५९॥

ध्रुवाय-- ध्रुव पर; पथि--मार्ग पर; दृष्टाय--देखी हुई; तत्र तत्र--जहाँ-तहाँ; पुर-स्त्रियः--घरों की महिलाएँ; सिद्धार्थ--सफेदसरसों; अक्षत--जौ; दधि--दही; अम्बु--जल; दूर्वा--दूब; पुष्प--फूल; फलानि--फल; च-- भी; उपजह्ु:--वर्षा की;प्रयुज्ञाना:--उच्चारण करते हुए; वात्सल्यात्‌ू--वासल्यभाव से; आशिष:--आशीर्वाद; सती:--भद्र महिलाएँ; श्रृण्वन्‌ू--सुनतेहुए; तत्‌ू--उनके; वल्गु--अत्यन्त मधुर; गीतानि--गीत; प्राविशत्‌--प्रविष्ट किया; भवनम्‌--महल; पितु:--पिता के |

इस प्रकार जब श्लुव महाराज मार्ग से जा रहे थे तो पास-पड़ोस की समस्त भद्र महिलाएँ उन्हेंदेखने के लिए एकत्र हो गईं, वे वात्सल्य-भाव से अपना-अपना आशीर्वाद देने लगीं और उन परसफेद सरसों, जौ, दही, जल, दूब, फल तथा फूल बरसाने लगीं।

इस प्रकार श्रुव महाराज स्त्रियोंद्वारा गाये गये मनोहर गीत सुनते हुए अपने पिता के महल में प्रविष्ट हुए।

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महामणिव्रातमये स तस्मिन्भवनोत्तमे ।

लालितो नितरां पित्रा न्यवसद्दिवि देववत्‌ ॥

६०॥

महा-मणि--मूल्यवान मणियों के; ब्रात--समूह; मये--से सज्जित; सः--वह ( ध्रुव ); तस्मिन्‌--उसमें; भवन-उत्तमे--चमकीलेभवन में; लालित:--लाड़-प्यार से; नितराम्‌ू--सदैव; पित्रा--पिता द्वारा; न्‍्यवसत्‌--वहाँ निवास किया; दिवि--स्वर्ग में; देव-बत्‌--देवताओं के समान।

तत्पश्चात्‌ श्रुव महाराज अपने पिता के महल में रहने लगे, जिसकी दीवालें अत्यन्त मूल्यवानमणियों से सज्जित थीं।

उनके वत्सल पिता ने उनकी विशेष देख-रेख की और वे उस महल मेंउसी तरह रहने लगे, जिस प्रकार देवतागण स्वर्गलोक में अपने प्रासादों में रहते हैं।

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परयःफेननिभाः शब्या दान्ता रुक्मपरिच्छदा: ।

आसनानि महाहाणि यत्र रौक्‍्मा उपस्करा: ॥

६१॥

'पयः--दूध; फेन-- फेना, झाग; निभा:--सहृश; शब्या:--बिस्तर; दान्ता:--हाथी-दाँत के बने; रुक्म--सुनहरे; परिच्छदा: --'कामदार; आसनानि---आसन; महा-अर्हाणि--अ त्यन्त मूल्यवान; यत्र--जहाँ; रौैक्मा: --सुनहले; उपस्करा:--सामान ।

महल में जो शयन-शय्या थी, वह दूध के फेन के समान श्वेत तथा अत्यन्त मुलायम थी।

उसके भीतर की पलंगें हाथी-दाँत की थीं, जिनमें सोने की कारीगरी थी और कुर्सियाँ, बेन्चेंतथा अन्य आसन एवं सामान सोने के बने हुए थे।

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यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।

मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारलसंयुता: ॥

६२॥

यत्र--जहाँ; स्फटिक--संगमरमर की; कुड्य्ेषु--दीवारों पर; महा-मारकतेषु--मरकतमणि जैसी बहुमूल्य मणियों से सज्जित;च--भी; मणि-प्रदीपा:--मणियों के दीपक; आभान्ति--प्रकाश कर रहे थे; ललना--स्त्री -मूर्ति; रतत--मणियों से निर्मित;संयुता:--पर रखी |

राजा का महल संगमरमर की दीवालों से घिरा था, जिन पर बहुमूल्य मरकत मणियों सेपच्चीकारी की गई थी और जिन पर हाथ में प्रदीप्त मणिदीपक लिए सुन्दर स्त्रियों जैसी मूर्तियाँलगी थीं।

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उद्यानानि च रम्याणि विचित्रैरमरद्रुमै: ।

कूजद्विहड्रमिथुनेर्गायन्मत्तमधुव्रते: ॥

६३॥

उद्यानानि--बगीचे; च-- भी; रम्याणि-- अत्यन्त सुन्दर; विचित्रै:--विविध; अमर-द्रुमै:--स्वर्ग से लाये गये वृक्षों से; कूजत्‌--गाते हुए; विहड़--पक्षियों के; मिथुनैः--जोड़ों से; गायत्‌--गुंजार करते; मत्त--पागल, उन्मत्त; मधु-ब्रतैः--भौरों से ।

राजा के महल के चारों ओर बगीचे थे, जिनमें उच्चस्थ लोकों से लाये गये अनेक प्रकार केवृक्ष थे।

इन वृक्षों पर मधुर गीत गाते पक्षियों के जोड़े तथा गुंजार करते मदमत्त भौरे थे।

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वाप्यो बैदूर्यसोपाना: पद्मोत्पलकुमुद्दती: ।

हंसकारण्डवकुलैर्जुष्टा श्रक्राहसारसे: ॥

६४॥

वाप्य:--बावड़ियाँ; वैदूर्य--वैदूर्य ( पुखराज ); सोपाना:--सीढ़ियों से; पद्य--कमल; उत्पल--नील कमल; कुमुत्‌-बती:--कुमुदिनियों से पूर्ण; हंस--हंस पक्षी; कारण्डब--तथा बत्तखें; कुलैः--के झुंडों से; जुष्टाः--निवसित; चक्राह्न-- चक्रवाक से;सारसैः--तथा सारसों से |

बावड़ियों में पुखराज की सीढ़ियाँ थीं।

इन बाबड़ियाँ में विविध रंग के कमल तथा कुमुदिनियाँ, हंस, कारण्डव, चक्रवाक, सारस तथा अन्य महत्त्वपूर्ण पक्षी दिखाई पड़ रहे थे।

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उत्तानपादो राजर्षि: प्रभावं तनयस्य तम्‌ ।

श्रुत्वा इष्ठाद्भुततमं प्रपेदे विस्मयं परम्‌ ॥

६५॥

उत्तानपाद:--राजा उत्तानपाद; राज-ऋषि:--साधु प्रकृति का महान्‌ राजा; प्रभावम्‌--प्रभाव; तनयस्य--अपने पुत्र का; तम्‌--उसे; श्रुत्वा--सुनकर; हृष्टा--देखकर; अद्भुत--आश्चर्यमय; तमम्‌--अधिकतम; प्रपेदे--सुखपूर्वक अनुभव किया;विस्मयम्‌--विस्मय; परमू--परम |

राजर्षि उत्तानपाद ने ध्रुव महाराज के यशस्वी कार्यों के विषय में सुना और स्वयं भी देखाकि वे कितने प्रभावशाली और महान्‌ थे, इससे वे अत्यधिक प्रसन्न हुए, क्योंकि श्रुव महाराज केकार्य अत्यन्त विस्मयकारी थे।

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वीक्ष्योढवयसं तं च प्रकृतीनां च सम्मतम्‌ ।

अनुरक्तप्रजं राजा श्लुवं चक्रे भुवः पतिम्‌ ॥

६६॥

वीक्ष्य--देखकर; ऊढ-वयसम्‌--प्रौढ़ अवस्था; तम्‌-- ध्रुव को; च--तथा; प्रकृतीनाम्‌--मंत्रियों द्वारा; च-- भी; सम्मतम्‌--अनुमोदित; अनुरक्त-प्रिय; प्रजमू-- अपनी प्रजा द्वारा; राजा--राजा; ध्रुवम्‌-- ध्रुव महाराज को; चक्रे--बना दिया; भुव:ः--पृथ्वी का; पतिम्‌ू--स्वामी ( राजा )

तत्पचश्चात्‌ जब राजा उत्तानपाद ने विचार करके देखा कि श्रुव महाराज राज्य का भारसँभालने के लिए समुचित प्रौढ़ ( वयस्क ) हो चुके हैं और उनके मंत्री भी सहमत हैं तथा प्रजाको भी वे प्रिय हैं, तो उन्होंने शुव को इस लोक के सम्राट के रूप में सिंहासन पर बिठा दिया।

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आत्मानं च प्रवयसमाकलय्य विशाम्पतिः ।

बन विरक्त: प्रातिष्ठद्विमृशन्नात्मनो गतिम्‌ ॥

६७॥

आत्मानम्‌--स्वयं; च-- भी; प्रववसम्‌--वृद्धावस्था; आकलय्य--समझ कर; विशाम्पति: --राजा उत्तानपाद ने; वनमू--वनको; विरक्त:--विरक्त; प्रातिष्ठत्‌--प्रयाण किया; विमृशन्‌--चिन्तन करते; आत्मन: --अपनी, आत्म की; गतिम्‌--मुक्ति।

अपनी वृद्धावस्था और आत्म-कल्याण पर विचार करके, राजा उत्तानपाद ने अपने आपकोसांसारिक कार्यो से विरक्त कर लिया और जंगल में चले गये।

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