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अध्याय ग्यारह: जड़ भरत ने राजा रहूगण को निर्देश दिया
5.11ब्राह्मण उवाचअकोविद: कोविदवादवादान्वदस्यथो नातिविदां वरिष्ठ: ।
न सूरयो हि व्यवहारमेनंतत्त्वावमशेन सहामनन्ति ॥
१॥
ब्राह्मण: उबाच--ब्राह्मण ने कहा; अकोविद:-- अनु भवहीन; कोबिद-वाद-वादान्-- अनुभवी व्यक्तियों के द्वारा प्रयुक्त शब्द;वदसि--तुम बोल रहे हो; अथो--अत:; न--नहीं; अति-विदाम्--अत्यन्त अनुभवी व्यक्तियों का; वरिष्ठ: --अत्यन्त महत्त्वपूर्ण;न--नहीं; सूरय:--ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति; हि--निस्सन्देह; व्यवहारम्--सांसारिक तथा सामाजिक आचरण ( कर्म ); एनम्--यह; तत्त्व--सत्य का; अवमर्शेन--बुद्धि द्वारा उत्तम न्याय के; सह--साथ; आमनन्ति--विवेचना करते हैं।
ब्राह्मण जड़ भरत ने कहा--' हे राजन्, यद्यपि तुम थोड़ा भी अनुभवी नहीं हो तो भी तुमअत्यन्त अनुभवी व्यक्ति के समान बोलने का प्रयत्न कर रहे हो।
अतः तुम्हें अनुभवी व्यक्ति नहीं माना जा सकता।
अनुभवी व्यक्ति कभी भी तुम्हारे समान स्वामी तथा सेवक अथवा भौतिकसुखों और दुखों के सम्बन्ध में इस प्रकार से नहीं बोलता।
ये तो मात्र बाह्य कार्य हैं।
कोई भीमहान् अनुभवी व्यक्ति परम सत्य को जानते हुए इस प्रकार बातें नहीं करता।
'तथेव राजन्नुरुगाहमेध-वितानविद्योरुविजृम्भितेषु ।
न वेदवादेषु हि तत्त्ववादःप्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधु; ॥
२॥
तथा--अतः; एव--निस्संदेह; राजन्--हे राजन; उरू-गाई-मेध--गृहस्थ जीवन से संबद्ध अनुष्ठान; वितान-विद्या--विस्तारशीलज्ञान; उरु--अत्यधिक; विजृम्भितेषु--रुचि रखने वालों में; न--नहीं; वेद-वादेषु--वेद वाक्य बोलने वाले; हि--निस्सन्देह;तत्त्व-वाद:--आत्म-तत्त्व; प्रायेण--प्राय:; शुद्ध:--समस्त कल्मषों से रहित, विशुद्ध; नु--निस्संदेह; चकास्ति--प्रतीत होते हैं;साथुः--भक्ति को प्राप्त पुरुष?
हे राजन, स्वामी तथा सेवक, राजा तथा प्रजा इत्यादि के प्रसंग तो भौतिक विषय हैं।
वेदों मेंप्रतिपादित भौतिक विषयों में रुचि रखने वाले व्यक्ति यज्ञों को करके तथा भौतिक विषयों केप्रति श्रद्धालु बने रहने पर तुले रहते हैं।
ऐसे लोगों को कभी आत्म-तत्त्व प्रकट नहीं हो पाता।
न तस्थ तत्त्वग्रहणाय साक्षाद्वरीयसीरपि वाच: समासन् ।
स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यंन यस्य हेयानुमितं स्वयं स्थात् ॥
३॥
न--नहीं; तस्थ--उसका ( वेदपाठी का ); तत्त्व-ग्रहणाय--वैदिक ज्ञान के वास्तविक प्रयोजन को स्वीकारने के लिए;साक्षात्-- प्रत्यक्ष; वरीयसी:--परम आदरणीय; अपि--यद्यपि; वाच: --वेद वाक्य; समासन्--अत्यधिक हो गया; स्वप्ने--स्वण में; निरुक्त्या--उदाहरण से; गृह-मेधि-सौख्यम्--इस जगत के भीतर सुख; न--नहीं; यस्य--जिसका; हेय-अनुमितम् --तुच्छ जान पड़ने से; स्वयम्--स्वतः; स्थात्--हो?
वे स्वप्न मनुष्य को स्वतः झूठा और व्यर्थ लगने लगता है।
इसी प्रकार उसे इस लोक में अथवास्वर्ग में, इसी जीवन में अथवा अगले जन्म में, भौतिक सुख की कामना तुच्छ प्रतीत होने लगतीहै।
जब उसे इसका बोध हो जाता है, तो श्रेष्ठ साधन होने पर भी वेद सत्य का प्रत्यक्ष ज्ञान करानेमें अपर्याप्त लगने लगते हैं।
यावन्मनो रजसा पूरुषस्यसत्त्वेन वा तमसा वानुरुद्धम् ।
चेतोभिराकूतिभिरातनोतिनिरह्ठु शं कुशलं चेतरं वा ॥
४॥
यावत्--जब तक; मन: --मन; रजसा--रजोगुण से; पूरुषस्थ--जीवात्मा का; सत्त्वेन--सतोगुण से; वा--अथवा; तमसा--तमोगुण से; वा--अथवा; अनुरुद्धम्--नियंत्रित; चेतोभि:--ज्ञानेन्द्रियों से; आकूतिभि:--कर्मेन्द्रियों से; आतनोति--फैलाता है;निरड्भु शम्-हाथी के समान स्वच्छन्द ( जिसको अंकुश से वश में लिया जाता है ); कुशलम्--कुशलता, कल्याण; च--भी;इतरम्--कुशलता के अतिरिक्त अर्थात् पापकर्म; वा--अथवा।
जब तक जीवात्मा का मन तीन गुणों ( सतो, रजो तथा तमोगुणों ) से दूषित रहता है, तबतक वह स्वच्छन्द, अनियंत्रित हाथी के समान रहता है।
वह इन्द्रियों का उपयोग करके शुभ तथा अशुभ कर्मो के क्षेत्र को केवल बृहत्तर बनाता है।
परिणाम यह निकलता है कि जीवात्मा इससंसार में भौतिक कर्मों के कारण मात्र सुख तथा दुख का अनुभव करता है।
स वासनात्मा विषयोपरक्तोगुणप्रवाहो विकृत: षोडशात्मा ।
बिश्षत्पृथड्नामभि रूपभेद-मन्तर्बहिष्ठ॑ च पुरैस्तनोति ॥
५॥
सः--वह; वासना--अनेक कामनाओं से युक्त; आत्मा--मन; विषय-उपरक्त:-- भौतिक सुख में आसक्त इन्द्रियतृप्ति; गुण-प्रवाह:--सत्व, रजो अथवा तमोगुण की शक्ति से प्रेरित; विकृत:--काम आदि से विरूपित; षोडश-आत्मा-- प्रमुख सोलहतत्त्वों ( पाँच स्थूल तत्त्व तथा दस ज्ञानेन्द्रियाँ एवं मन ) का प्रधान तत्त्व; बिभ्रतू-घूमते हुए; पृथक्-नामभि: --विभिन्न नामों से;रूप-भेदम्--विभिन्न रूप धारण करते हुए; अन्तः-बहिष्ठम्--प्रथम कोटि या निम्न कोटि का गुण, उत्तमता या अधमता; च--तथा; पुरैः--विभिन्न शारीरिक रूपों से; तनोति--प्रकट करता है।
शुभ तथा अशुभ कर्मों की आकांक्षाओं में लीन रहने के कारण मन स्वभावत: काम तथाक्रोध के विकारों से ग्रस्त होता रहता है।
इस प्रकार वह भौतिक इन्द्रिय-सुख के प्रति आकृष्टहोता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि मन सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण से संचालित होता है।
ग्यारह इन्द्रियों तथा पाँच तत्त्वों--इन सब सोलह कलाओं में से मन प्रधान है।
अतः मन के हीकारण विभिन्न देवताओं, मनुष्यों, पशुओं तथा पक्षियों के शरीरों में जन्म लेना पड़ता है।
उच्च यानिम्न पद पर स्थित होने के अनुसार ही मन उच्च या निम्न भौतिक देह अंगीकार करता है।
दुःखं सुखं व्यतिरिक्त च तीव्रकालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति ।
आलिड्ग्य मायारचितान्तरात्मास्वदेहिनं संसृतिचक्रकूट: ॥
६॥
दुःखम्--अशुभ कर्मो के कारण दुख; सुखम्-शुभ कर्म से उत्पन्न सुख; व्यतिरिक्तम्ू--मोह; च--तथा; तीब्रम्ू--अत्यन्तकठिन; काल-उपपन्नम्ू--काल-क्रम में प्राप्त; फलमू--फल; आव्यनक्ति--उत्पन्न करता है; आलिड्ग्य--आलिंगन करते हुए;माया-रचित-- प्रकृति द्वारा उत्पन्न; अन्तः-आत्मा--मन; स्व-देहिनम्--स्वयं जीव; संसृति--संसार की प्रतिक्रियाओं का; चक्र-'कूट:--जो जीव को चक्कर में डाल देता है।
सांसारिक मन जीव की आत्मा को आच्छादित करके उसे विभिन्न योनियों में ले जाता है।
इसे संसृति कहते हैं।
मन के ही कारण जीवात्मा को भौतिक दुख तथा सुख का बोध होता है।
इस प्रकार से मोहग्रस्त यह शुभ तथा अशुभ विषयों तथा उनके कर्म को उत्पन्न करता है।
इसप्रकार आत्मा बद्ध हो जाता है।
तावानयं व्यवहारः सदाविःक्षेत्रज्ञसाक्ष्यो भवति स्थूलसूक्ष्म: ।
तस्मान्मनो लिड्रमदो वदन्तिगुणागुणत्वस्यथ परावरस्यथ ॥
७॥
तावान्ू--उस समय तक; अयमू्--यह; व्यवहार: --कृत्रिम उपाधियाँ ( मोटा, दुबला दैव या मानवीय ); सदा--सदैव; आवि:--प्रकट करते हुए; क्षेत्र-ज्ञ--जीवात्मा का; साक्ष्य:--प्रमाण; भवति-- है; स्थूल-सूक्ष्म:--मोटा तथा दुबला; तस्मात्--अतः;मनः--मन; लिड्रमू--कारण; अदः--यह; वदन्ति--कहते हैं; गुण-अगुणत्वस्य--गुणों अथवा अगुणों का; पर-अवरस्य--तथा जीवन की उच्च और निम्न दशाएँ।
मन जीवात्मा को इस संसार में विभिन्न योनियों में फिरता रहता है, जिससे जीवात्मा कोमनुष्यों, देवताओं, स्थूल-कृश मनुष्यों इत्यादि विविध रूपों का लौकिक अनुभव होता है।
विद्वानों का कथन है कि देह का रूपायन बन्धन तथा मुक्ति का कारण मन ही है।
गुणानुरक्त व्यसनाय जन्तोःक्षेमाय नेर्गुण्यमथो मनः स्यात् ।
यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्नन्शिखा: सधूमा भजति ह्ान्यदा स्वम् ।
पदं तथा गुणकर्मानुबद्धवृत्तीर्मन: श्रयतेउन्यत्र तत्त्वम्ू ॥
८॥
गुण-अनुरक्तम्-गुणों के प्रति आसक्त होकर; व्यसनाय--संसार में बद्ध होने के लिए; जन्तो: --जीवात्मा के; क्षेमाय--परमकल्याण के लिए; नैर्गुण्यम्ू--गुणों से अप्रभावित रहकर; अथो--इस प्रकार; मनः--मन; स्थात्--हो जाता है; यथा--जिसप्रकार ( जितना कि ); प्रदीप: --दीपक; घृत-वर्तिम्--घी के भीतर रखी बत्ती; अश्नन्ू--जलकर; शिखा: --ज्वाला, लौ;सधूमा:--धुँआ से युक्त; भजति-- भोगती है; हि--निश्चय ही; अन्यदा--अन्यथा; स्वमू--अपने आप; पदम्--पद; तथा--उसीतरह; गुण-कर्म-अनुबद्धम्-गुणों तथा कर्मो से बद्ध; वृत्तीः--नाना प्रकार के कार्य; मनः--मन; श्रयते--शरण लेता है;अन्यत्र--अन्यथा; तत्त्वम्-- अपनी मूल स्थिति की |
जब जीवात्मा का मन सांसारिक इन्द्रिय-तृप्ति में लीन हो जाता है, तो जीवन-बंधन तथासांसारिक कष्ट प्राप्त होते हैं।
किन्तु जब वह उनसे अनासक्त हो जाता है, तो वही मुक्ति काकारण बनता है।
जब दीपक की बत्ती से ठीक-ठीक लौ नहीं उठती तो दीपक पर कालिख लगजाती है।
किन्तु घी से भरा होने पर यह ठीक से जलता है और तीक्र प्रकाश निकलता है।
इसी प्रकार जब मन इन्द्रिय-तृप्ति में संलग्न रहता है, तो इससे कष्ट प्राप्त होते हैं और जब यह उनसेविरक्त हो जाता है, तो कृष्णभावनामृत का आदि प्रकाश निकलने लगता है।
एकादशासन्मनसो हि वृत्तयआकूतय: पञ्ञ धियोडभिमान: ।
मात्राणि कर्माणि पुरं च तासांवबदन्ति हैकादश वीर भूमी: ॥
९॥
एकादश- ग्यारह; आसनू-- हैं; मनसः--मन की; हि--निश्चय ही; वृत्तय:--वृत्तियाँ; आकूतय: --कर्मेन्द्रियाँ; पञ्ञ-पाँच;धियः-ज्ञानेन्द्रियाँ; अभिमान:--अहंकार; मात्राणि--विभिन्न विषय; कर्माणि--विभिन्न कर्म; पुरम् च--तथा शरीर, समाज,राष्ट्र, परिवार या जन्मभूमि; तासाम्--इन कार्यों का; वदन्ति--कहते हैं; ह--ओह; एकादश--ग्यारह; वीर--हे वीर पुरुष;भूमी:--कार्य-द्षेत्र, कर्मक्षेत्र ?
पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ।
इनके साथ ही अहंकार भी है।
इस प्रकार मन कीग्यारह प्रकार की वृत्तियाँ हैं।
हे वीर, इन्द्रियों के विषय ( यथा शब्द और स्पर्श ), कायिक कर्म(यथा मलत्याग ) तथा विभिन्न प्रकार के देह, समाज, मैत्री तथा व्यक्तित्व--इन सबको पण्डितलोग मन के कार्य के अन्तर्गत मानते हैं।
गन्धाकृतिस्पर्शरस श्रवांसिविसर्गरत्यरत्यभिजल्पशिल्पा: ।
एकादशं स्वीकरणं ममेतिशय्यामहं द्वादशमेक आहु: ॥
१०॥
गन्ध--गन्ध, महक; आकृति--रूप; स्पर्श--छूने का बोध; रस--स्वाद; श्रवांसि--तथा शब्द; विसर्ग--मलत्याग; रति--संभोग; अर्ति--गति, संचलन; अभिजल्प-- भाषण; शिल्पा:--पकड़ना या छोड़ना, लेना-देना; एकादशम्--ग्यारह;स्वीकरणम्--स्वीकार करते हुए; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; शय्याम्--यह शरीर; अहम्--मैं; द्वादशम्--बारहवाँ; एके --कुछ लोगों ने; आहु:--कहा है|शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद ( रस) तथा गन्ध--ये पांच ज्ञानेन्द्रियों के व्यापार हैं।
भाषण,स्पर्श, संचलन, मलत्याग तथा संभोग--ये कर्मेन्द्रियों के कार्य हैं।
इसके अतिरिक्त एक अन्यधारणा है, जिसके अन्तर्गत मनुष्य सोचता है कि, 'यह मेरा शरीर है, यह मेरा समाज है, यह मेरापरिवार हैं, यह मेरा राष्ट्र है।
' यह ग्यारहवाँ व्यापार मन का है और मिथ्या अहंकार कहलाता है।
कुछ दार्शनिकों के अनुसार यह बारहवाँ व्यापार है और इसका कार्यक्षेत्र शरीर है।
द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै-रेकादशामी मनसो विकाराः ।
सहस्त्रशः शतशः कोटिशश्वक्षेत्रज्ता न मिथो न स्वतः स्यु: ॥
११॥
द्रव्य--भौतिक पदार्थों ( विषयों ) से; स््व-भाव--स्वभाव से; आशय--संस्कृति ( संस्कार ) से; कर्म--पूर्व निर्धारित कर्मफलसे; कालैः--समय से; एकादश --ग्यारह; अमी--ये सब; मनस:--मन के; विकारा:--रूपान्तर ( भेद ); सहस्त्रश:--हजारों में;शतशः--सैकड़ों में; कोटिश: च--तथा करोड़ों में; क्षेत्र-ह्ञत:--आदि भगवान् से; न--नहीं; मिथ:-- परस्पर; न--न तो;स्वतः--अपने आप से; स्युः--हैं |
भौतिक तत्त्व ( द्रव्य या विषय ), प्रकृति ( स्वभाव ), मूल कारण, संस्कार, भाग्य तथासमय (काल )--ये सब भौतिक कारण हैं।
इन भौतिक कारणों से विश्लुब्ध होकर ग्यारहवृत्तियाँ पहले सैकड़ों, फिर हजारों और तब करोड़ों भेदों में रूपान्तरित हो जाती हैं।
किन्तु येसभी भेद स्वत: परस्पर मिश्रण के द्वारा घटित नहीं होते वरन् वे श्रीभगवान् के आदेशानुसार होतेहैं।
क्षेत्रज्ष एता मनसो विभूती-जीवस्य मायारचितस्य नित्या: ।
आविर्तहिताः क्वापि तिरोहिताश्नशुद्धों विचष्टे ह्रविशुद्धकर्तु: ॥
१२॥
क्षेत्र-ज्ः--जीव; एता:--ये सब; मनस:--मन के; विभूती: --विभिन्न वृत्तियाँ; जीवस्थ--जीवात्मा की; माया-रचितस्य--माया द्वारा उत्पन्न; नित्या:--अनादि-काल से; आविर्हिता:--कभी-कभी प्रकट; क्वापि--कहीं; तिरोहिता: च--तथा अप्रकट;शुद्ध:--शुद्ध; विचष्टे--इसे देखता है; हि--निश्चय ही; अविशुद्ध--अशुद्ध; कर्तुः--कर्ता का।
कृष्णचेतना से रहित जीव के मन में माया द्वारा उत्पन्न अनेक विचार तथा वृत्तियाँ होती हैं।
वे अनन्त काल से विद्यमान रही हैं।
कभी-कभी वे जाग्रत तथा स्वप्न अवस्था में प्रकट होती हैं,किन्तु सुषुप्तावस्था या समाधि में वे लुप्त हो जाती हैं।
जो व्यक्ति इस जन्म में ही मुक्त हो चुकाहै, ( जीवन्मुक्त ) इन सब व्यापारों को स्पष्ट देख सकता है।
क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुष: पुराण:साक्षात्स्वयं ज्योतिरज: परेश: ।
नारायणो भगवान्वासुदेव:स्वमाययात्मन्यवधीयमान: ॥
१३॥
यथानिल: स्थावरजड्रमानाम्आत्मस्वरूपेण निविष्ट ईशेत् ।
एवं परो भगवान्वासुदेव:क्षेत्रज् आत्मेदमनुप्रविष्ट: ॥
१४॥
क्षेत्र-क्ञः -- श्रीभगवान् ( एलोक १२ में सामान्य जीव ); आत्मा--सर्वव्यापी; पुरुष:--असीम शक्ति वाला नियन्ता; पुराण:--आदि; साक्षात्- प्रत्यक्ष अनुभव तथा अधिकारियों से श्रवण करके; स्वयम्--व्यक्तिगत; ज्योति:ः--ब्रह्मतेज प्रकट करने वाला;अज:--अजन्मा; परेश:-- श्री भगवान्; नारायण: --समस्त जीवों का आश्रय; भगवान्--छः पूर्ण ऐश्वर्यों से युक्त श्रीभगवान्;वासुदेव:--प्रकट तथा अप्रकट, सबों का आश्रय; स्व-मायया--अपनी शक्ति से; आत्मनि--अपने आप में अथवा सामान्यजीवों में; अवधीयमान:--नियन्ता के रूप में रह कर; यथा--जिस प्रकार; अनिल:--वायु; स्थावर--जड़, न चलने वाले जीव;जड़मानाम्--तथा जंगमों ( सचल ) का; आत्म-स्वरूपेण--परमात्मा रूप के द्वारा; निविष्ट:--निहित; ईशेत्--नियंत्रण करताहै; एवम्--इस प्रकार; पर:--दिव्य; भगवान्-- श्रीभगवान्; वासुदेव: -- प्रत्येक पदार्थ के आश्रय; क्षेत्र-ज्ञ:--श्षेत्रज्ञ नाम सेअभिहित; आत्मा--प्राण शक्ति; इदमू--यह जगत के; अनुप्रविष्ट: -- भीतर प्रविष्ट |
क्षेत्रज्ष दो प्रकार के हैं--जीवात्मा तथा श्रीभगवान्।
( जीवात्मा का वर्णन पीछे किया जाचुका है, यहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की विवेचना की जा रही है) श्रीभगवान् सृष्टि कासर्वव्यापक कारण है।
वह अपने में पूर्ण है और अन्यों पर आश्नित नहीं है।
वह सुनकर तथाप्रत्यक्ष अनुभव ( दर्शन ) से देखा जाता है।
वह आत्मतेजस्वी है और उसे जन्म, मृत्यु, जरा अथवाव्याधि कुछ भी नहीं सताते।
वह ब्रह्मादि समस्त देवताओं का नियन्ता है।
उसका नाम नारायण हैऔर वह संसार के प्रलय के पश्चात् समस्त जीवात्माओं का आश्रय है।
वह परम ऐश्वर्यवान हैऔर समस्त भौतिक वस्तुओं का आश्रय है।
अत: वह वासुदेव अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् केनाम से जाना जाता है।
अपनी शक्ति से ही वह समस्त जीवात्माओं के हृदयों में स्थित है, जिसप्रकार समस्त चराचर प्राणियों में वायु या जीवनीशक्ति ( प्राण ) रहती है।
इस प्रकार वह शरीरको वश में रखता है।
अपने अंश रूप में श्रीभगवान् समस्त देहों में प्रवेश करके उनको नियंत्रितकरता रहता है।
न यावदेतां तनुभृन्नरेन्दरविधूय मायां वयुनोदयेन ।
विमुक्तसज जितषट्सपत्नोवेदात्मतत्त्वं भ्रमतीह तावतू ॥
१५॥
न--नहीं; यावत्ू--जब तक; एताम्--यह; तनु-भृत्--जिसने शरीर अंगीकार किया है, मनुष्य; नरेन््द्र--हे राजन; विधूयमायाम्--संसार से उत्पन्न कल्मष को धोते हुए; बयुना उदयेन--वैदिक साहित्य तथा सत्संगति से दिव्य ज्ञान जगने के कारण;विमुक्त-सड्भ:--समस्त संगति से मुक्त; जित-षट्ू-सपतल:--छ: शत्रुओं ( पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन ) को जीत कर; वेद--जानताहै; आत्म-तत्त्वम्-आत्मतत्त्व को; भ्रमति--घूमता है; इह--इस संसार में; तावत्--तब तक |
हे राजा रहूणण, जब तक बद्ध-आत्मा भौतिक देह को स्वीकार करता है और भौतिक सुखके कल्मष से मुक्त नहीं हो जाता तथा जब तक अपने छः शत्रुओं को जीत कर आत्मज्ञान कोजागृत करके आत्म-साक्षात्कार के पद को प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक उसे इस जगत मेंविभिन्न स्थानों तथा नाना योनियों में घूमना पड़ता है।
न यावदेतन्मन आत्मलिड्ूंसंसारतापावपनं जनस्य ।
यच्छोकमोहामयरागलो भ-वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते ॥
१६॥
न--नहीं; यावत्--जब तक; एतत्--यह; मन:--मन; आत्म-लिड्रम्--आत्मा की झूठी उपाधि के रूप में; संसार-ताप--इसजगत के कष्टों का; आवपनम्--खेत; जनस्य--जीव का; यत्--जो; शोक--शोक का; मोह--मोह का; आमय--रोग का;राग--आसक्ति का; लोभ--लालच का; बैर--शत्रुता का; अनुबन्धम्--परिणाम; ममताम्--ममता; विधत्ते--देता है।
इस संसार में आत्मा की उपाधि, यह मन, समस्त दुखों का मूल है।
जब तक बद्ध जीवात्माइस तथ्य को नहीं जानता, तब तक उसे देह की दयनीय दशा को स्वीकार करके इस ब्रह्माण्ड मेंविभिन्न योनियों में घूमना पड़ता है।
चूँकि यह मन रोग, शोक, मोह, राग, लोभ तथा वैर से ग्रस्तरहता है इस कारण से इस भौतिक संसार में बन्धन तथा झूठी ममता उत्पन्न होती है।
भ्रातृव्यमेनं तददभ्रवीर्य-मुपेक्षयाध्येधितमप्रमत्त: ।
गुरोहरेश्वरणोपासनास्त्रोजहि व्यलीकं स्वयमात्ममोषम् ॥
१७॥
भ्रातृव्यमू--बलवान शत्रु को; एनम्--इस मन; तत्--वह; अदभ्न-वीर्यम्--अत्यधिक शक्तिमान; उपेक्षया--उपेक्षा से;अध्येधितम्-वृथा ही शक्ति में बढ़ा हुआ; अप्रमत्त:--मोहरहित; गुरोः --गुरु के; हरेः-- श्री भगवान् के; चरण--चरण कमलोंका; उपासना-अस्त्र: --उपासना रूपी अस्त्र; जहि--जीत लो; व्यलीकम्--झूठा, मिथ्या; स्वयम्-- अपने आप; आत्म-मोषम्--जीवात्मा की स्वाभाविक स्थिति को प्रच्छन्न करने वाला?
यह अनियंत्रित मन जीवात्मा का सबसे बड़ा शत्रु है।
यदि इसकी उपेक्षा की जाती है या इसेअवसर प्रदान किया जाता हैं, तो यह प्रबल से प्रबलतर होकर विजयी बन सकता है।
यद्यपि यहयथार्थ नहीं है, किन्तु यह अत्यधिक प्रबल होता है।
यह आत्मा की स्वाभाविक स्थिति कोआच्छादित कर देता है।
हे राजनू, इस मन को गुरु के चरणारविन्द तथा भगवान् की सेवा रूपीअस्त्र से जीतने का प्रयत्त कीजिये।
इसे अत्यन्त सतर्कता से करें।
