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अध्याय सोलह: जम्बूद्वीप का विवरण

5.16राजोबाचउक्तस्त्वया भूमण्डलायामविशेषो यावदादित्यस्तपति यत्र चासौ ज्योतिषां गणैश्चन्द्रमा वा सह दृश्यते ॥

१॥

राजा उवाच--महाराज पररीक्षित्‌ बोले; उक्त:--पहले ही कहा जा चुका है; त्वया--आपके द्वारा; भू-मण्डल-- भूमण्डल नामकलोक; आयाम-विशेष:--त्रिज्या की विशेष लम्बाई; यावत्‌--जब तक; आदित्य: --सूर्य; तपति--तपता है, दीप्तिमान है;यत्र--वहाँ भी; च-- भी; असौ--वह; ज्योतिषाम्‌--ज्योतिपिंडों का; गणैः--समूह के साथ; चन्द्रमा--चन्द्रमा; वा--या;सह--साथ; दृश्यते--देखा जाता है।

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से कहा--हे ब्राह्मण, आपने मुझे पहले ही बता दिया हैकि भूमण्डल की त्रिज्या वहाँ तक विस्तृत है जहाँ तक सूर्य का प्रकाश और उष्मा पहुँचती हैतथा चन्द्रमा और अन्य नक्षत्र दृष्टिगोचर होते हैं।

तत्रापि प्रियव्रतरथचरणपरिखातैः सप्तभिः सप्त सिन्धव उपक्रिप्ता यत एतस्या:सप्तद्वीपविशेषविकल्पस्त्वया भगवन्खलु सूचित एतदेवाखिलमहं मानतो लक्षणतश्च सर्वविजिज्ञासामि ॥

२॥

तत्र अपि--उस भू-मण्डल में; प्रियव्रत-रथ-चरण-परिखातै: --सुमेरु पर्वत की परिक्रमा करते समय प्रियत्रत महाराज के रथ केपहियों से निर्मित गड्ढों के द्वारा; सप्तभि:ः--सात; सप्त सिन्धव:--सात समुद्र; उपक्लृप्ता:--प्रभूत; यत:ः--जिसके कारण;एतस्या:--इस भूमण्डल का; सप्त-द्वीप--सातों द्वीपों का; विशेष-विकल्प:--सरंचना शैली; त्वया-- आपके द्वारा; भगवन्‌--है महामुनि; खलु--निश्चय ही; सूचित:--वर्णित; एतत्‌--यह; एव--निस्सन्देह; अखिलमू--सम्पूर्ण प्रजा; अहम्‌--मैं;मानत:ः--माप की दृष्टि से; लक्षणत:ः--( तथा ) लक्षणों से; च-- भी; सर्वम्‌--प्रत्येक वस्तु; विजिज्ञासामि--जानने की इच्छाकरता हूँ।

हे भगवन्‌, महाराज प्रियत्रत के रथ के चक्रायमाण पहियों से सात गड्ढे बने, जिससे सातसमुद्रों की उत्पत्ति हुई।

इन सात समुद्रों के ही कारण भूमण्डल सात द्वीपों में विभक्त है।

आपनेइनकी माप, नाम तथा विशिष्टताओं का अत्यन्त सामान्य वर्णन मात्र किया है।

मुझे विस्तार सेइनके सम्बध में जानने की इच्छा है।

कृपया मेरी कामना पूर्ण करें।

भगवतो गुणमये स्थूलरूप आवेशितं मनो ह्ागुणेपि सूक्ष्मतम आत्मज्योतिषि परे ब्रह्मणि भगवतिवासुदेवाख्ये क्षममावेशितुं तदु हैतदगुरोहस्यनुवर्णयितुमिति ॥

३॥

भगवतः -- श्री भगवान्‌ का; गुण-मये-- भौतिक प्रकृति के त्रिगुण युक्त बाह्मस्वरूपों में; स्थूल-रूपे--स्थूल रूप; आवेशितम्‌--प्रविष्ट; मनः--मन; हि--निश्चित रूप से; अगुणे--दिव्य इन्द्रियातीत; अपि--यद्यपि; सूक्ष्मतमे--हृद्देश से अपने लघुतर रूप मेंपरमात्मा; आत्म-ज्योतिषि--जो ब्रह्म तेज से पूर्ण है; परे--परम; ब्रह्मणि-- आत्मस्वरूप; भगवति-- श्रीभगवान्‌ में; वासुदेव-आख्ये--भगवान्‌ वासुदेव के नाम से विख्यात; क्षमम्‌--उपयुक्त; आवेशितुम्‌--आत्मसात्‌; तत्‌--वह; उ ह--निस्सन्देह;एतत्‌--यह; गुरो--हे गुरुदेव; अर्हसि अनुवर्णयितुम्‌--कृपया विस्तारपूर्वक कहें; इति--इस प्रकारजब मन प्रकृति के गुणों से निर्मित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के बाह्मरूप--स्थूल विश्वरूप--पर स्थिर हो जाता है, तो उसे शुद्ध सत्त्व की स्थिति प्राप्त होती है।

उस दिव्य स्थिति में हीभगवान्‌ वासुदेव को जाना जा सकता है जो अपने सूक्ष्मरूप में स्वतः प्रकाशित और गुणातीतहैं।

हे प्रभो, विस्तार से वर्णन करें कि वह रूप जो सारे विश्व में व्याप्त है किस प्रकार देखा जाताहै।

ऋषिरुवाचन वै महाराज भगवतो मायागुणविभूते: काष्ठां ममसा वचसा वाधिगन्तुमलं विबुधायुषापिपुरुषस्तस्मात्प्राधान्येनेव भूगोलकविशेषं नामरूपमानलक्षणतो व्याख्यास्याम: ॥

४॥

ऋषि: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; न--नहीं; वै--निस्सन्देह; महा-राज--हे महान्‌ राजा; भगवतः -- श्रीभगवान्‌ का;माया-गुण-विभूते: --माया के गुणों का रूपान्तर; काष्ठाम्‌-- अन्त, इति; मनसा--मनसे; वचसा--वचन से; वा--अथवा;अधिगन्तुमू-- भलीभाँति समझने के लिए; अलम्‌--समर्थ; विबुध-आयुषा--ब्रह्मा के समान आयु वाला; अपि--भी; पुरुष: --व्यक्ति; तस्मात्‌ू--अतः ; प्राधान्येन--प्रमुख स्थानों के सामान्य विवरण से; एब--निश्चित रूप से; भू-गोलक-विशेषम्‌-- भूलोकका विशिष्ट वर्णन; नाम-रूप--नाम तथा स्वरूप; मान--परिमाण, माप; लक्षणत:--लक्षणों के अनुसार; व्याख्यास्याम:--व्याख्या करने का प्रयत्न करूँगा।

ऋषिश्रेष्ठ शुकदेव गोस्वामी बोले, हे राजनू, श्रीभगवान्‌ की माया के विस्तार की कोई सीमानहीं है।

यह भौतिक जगत सत्त्व, रज तथा तम्‌ इन तीन गुणों का रूपान्तर है; फिर भी ब्रह्मा केसमान दीर्घ आयु पाकर भी इसकी व्याख्या कर पाना सम्भव नहीं है।

इस भौतिक जगत में कोईभी पूर्ण नहीं और अपूर्ण मनुष्य सतत चिन्तन के बाद भी इस भौतिक ब्रह्माण्ड का सही वर्णननहीं कर सका।

तो भी, हे राजन्‌, मैं भूगोलक ( भूलोक ) जैसे प्रमुख भूखण्डों की उनके नामों,रूपों, प्रमापों तथा विविध लक्षणों सहित व्याख्या करने का प्रयत्न करूँगा।

यो बायं द्वीप: कुवलयकमलकोशाभ्यन्तरकोशो नियुतयोजनविशाल: समवर्तुलो यथा पुष्करपत्रम्‌, ॥

५॥

यः--जो; वा--अथवा; अयम्‌--यह; द्वीप:--द्वीप; कुवबलय-- भूलोक; कमल-कोश--कमल गुच्छ; अभ्यन्तर-- भीतरी ;कोश:--कोश; नियुत-योजन-विशाल:--दस लाख योजन ( अस्सी लाख मील ) चौड़ा; समवर्तुल:--समान रूप से गोलअथवा समान लम्बाई तथा चौड़ाई वाला; यथा--सहश; पुष्कर-पत्रमू--कमल का पत्ता।

भूमण्डल नाम से विख्यात ग्रह कमल पुष्प के अनुरूप है और इसके सातों द्वीप पुष्प-कोशके सहृश हैं।

इस कोश के मध्य में स्थित जम्बूद्वीप की लम्बाई तथा चौड़ाई दस लाख योजन( अस्सी लाख मील ) है।

जम्बूढ्वीप कमल-पत्र के समान गोल है।

यस्मिन्नव वर्षाणि नवयोजनसहस्त्रायामान्यटष्टभिर्मर्यादागिरिभि: सुविभक्तानि भवन्ति ॥

६॥

यस्मिन्‌--उस जम्बूद्वीप में; नव--नौ ( संख्या ); वर्षाणि -- भूखण्ड अथवा वर्ष; नव-योजन-सहस्त्र--नौ हजार योजन अर्थात्‌७२,००० मील लम्बा; आयामानि--माप वाला, आयाम का; अष्टभि: --आठ; मर्यादा--सीमा सूचक; गिरिभि: --पर्वतों केद्वारा; सुविभक्तानि-- भली-भाँति विभाजित; भवन्ति--हैं |

जम्बूद्वीप में नौ वर्ष ( खण्ड ) हैं जिनमें से प्रत्येक की लम्बाई ९,००० योजन ( ७२,०००मील ) है।

इन खण्डों की सीमा अंकित करने वाले आठ पर्वत हैं, जो उन्हें भली भाँति विलगकरते हैं।

एषां मध्ये इलावृतं नामाभ्यन्तरवर्ष यस्य नाभ्यामवस्थित: सर्वतः सौवर्ण: कुलगिरिराजोमेरुद्वीपायामसमुन्नाह: कर्णिका भूत: कुवलयकमलस्य मूर्थनि द्वात्रिंशत्सहस्त्रयोजनविततो मूलेषोडशसहस्त्रं तावतान्तर्भूम्यां प्रविष्ट: ॥

७॥

एषाम्‌--जम्बूद्वीप के इन समस्त खंड़ों के; मध्ये--मध्य में; इलावृतम्‌ नाम--इलावृत वर्ष नामक; अभ्यन्तर-वर्षम्‌--आन्तरिकखण्ड; यस्य--जिसके; नाभ्याम्‌--नाभि में; अवस्थित: --स्थित; सर्वतः--पूरी तरह, पूर्णरूपेण; सौवर्ण:--स्वर्ण का बनाहुआ; कुल-गिरि-राज:-- प्रसिद्ध पर्वतों में सर्वश्रेष्ठ; मेर:--मेरु पर्वत; द्वीप-आयाम-समुन्नाह:--जिसकी ऊँचाई जम्बूद्वीप कीचौड़ाई के समान है; कर्णिका-भूतः--आवरण के रूप में विद्यमान; कुवबलय--इस लोक के; कमलस्य--कमल पुष्प के सहश;मूर्धनि--शीर्ष पर; द्वा-त्रिंशत्‌--बत्तीस; सहस्त्र--हजार; योजन--योजन ( प्रत्येक ८ मील का ); विततः--विस्तृत; मूले--आधार पर मूल भाग में; षोडश-सहस्त्रमू--सोलह हजार योजन; तावत्‌--तक; आन्तः-भूम्याम्‌--पृथ्वी के भीतर; प्रविष्ट: --धँसा हुआ।

इन खण्डों ( वर्षो ) में से इलावृत नाम का एक वर्ष है जो कमल-कोश के मध्य में स्थित है।

इलावृत्त वर्ष में ही सुवर्ण का बना हुआ सुमेरु पर्वत है।

यह कमल जैसे भूमण्डल के बाह्य-आवरण की तरह है।

इस पर्वत की चौड़ाई जम्बूद्वीप की चौड़ाई के तुल्य, अर्थात्‌ एक लाखयोजन या आठ लाख मील है, जिसमें से १६,००० योजन ( १,२८,००० मील ) पृथ्वी के भीतरहै, जिससे पृथ्वी के ऊपर पर्वत की ऊँचाई केवल ८४,००० योजन ( ६,७२,००० मील ) ही है।

शीर्ष पर इस पर्वत की चौड़ाई ३२,००० योजन ( २,५६,००० मील ) और पाद भाग पर १६,००० योजन है।

उत्तरोत्तेणेलावृतं नील: श्वेतः श्रुड्गरवानिति त्रयो रम्यकहिरण्मयकुरूणां वर्षाणां मर्यादागिरय: प्रागायताउभयत: क्षारोदावधयो द्विसहस्त्रपूथव एकैकशः पूर्वस्मात्पूर्वस्मादुत्तर उत्तरो दशांशाधिकांशेन दैर्घ्य एवहसन्ति ॥

८॥

उत्तर-उत्तरण इलाबृतम्‌--इलावृत वर्ष के सुदूर उत्तर में; नील:--नील; श्वेत:-- श्वेत; श्रृड़वान्‌-- श्रृंगवान्‌; इति--इस प्रकार;त्रयः--तीन पर्वत; रम्यक--रम्यक; हिरण्मय--हिरण्मय; कुरूणाम्‌--कुरु खण्ड के; वर्षाणाम्‌--वर्षो में; मर्यादा-गिरय: --सीमा बताने वाले पर्वत; प्राकु-आयता:--पूर्व दिशा में फैले; उभयतः--पूर्व तथा पश्चिम की ओर; क्षारोद--लवण सागर;अवधय: --तक फैले हुए; द्वि-सहस्त्र-पृथवः--जो दो हजार योजन चौड़ा हैं; एक-एकश:--एक के बाद एक, क्रमशः;पूर्वस्मात्‌-प्रथम की अपेक्षा; पूर्वस्मात्‌ू-प्रथम की अपेक्षा; उत्तर:--और भी उत्तर; उत्तर:--और भी उत्तर; दश-अंश-अधिक-अंशेन--पहले वाले का दशमांश; दैर्घ्य:--लम्बाई में; एब--निस्सन्देह; हसन्ति--घटते ( छोटे होते ) जाते हैं।

इलाबृत-वर्ष के सुदूर उत्तर में क्रमश: नील, श्वेत तथा श्रृंगवान्‌ नामक तीन पर्वत हैं।

ये तीनोंरम्यक, हिरण्मय तथा कुरु इन तीन वर्षों की सीमा-रेखा बनाने वाले हैं और इनको एक दूसरे सेविभक्त करते वाले हैं।

इन पर्वतों की चौड़ाई २,००० योजन ( १६,००० मील ) है।

लम्बाई में येपूर्व से पश्चिम की ओर लवण सागर के तट तक विस्तृत हैं।

दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ने परप्रत्येक पर्वत की लम्बाई अपने पूर्ववर्ती पर्वत की दशमांश होती जाती है, किन्तु इन सबकीऊँचाई एक सी रहती है।

एवं दक्षिणेनेलावृतं निषधो हेमकूटो हिमालय इति प्रागायता यथा नीलादयोयुतयोजनोत्से धाहरिवर्षकिम्पुरुषभारतानां यथासड्ख्यम्‌ ॥

९॥

एवम्‌--इस प्रकार; दक्षिणेन--दक्षिण दिशा में; इलावृतम्‌--इलाबृत वर्ष के; निषध: हेम-कूटः हिमालय:--निषध, हेमकूटतथा हिमालय ये तीन पर्वत; इति--इस प्रकार; प्राकु-आयता: --पूर्व दिशा तक विस्तारित; यथा--जिस प्रकार; नील-आदयः--नील इत्यादि पर्वत; अयुत-योजन-उत्सेधा:--दस हजार योजन ऊँचा; हरि-वर्ष--हरिवर्ष नामक खण्ड; किम्पुरुष--किंपुरुष नामक खण्ड; भारतानाम्‌-- भारतवर्ष नामक खण्ड; यथा-सड्ख्यम्‌--संख्यानुसार, क्रमश: |

इसी प्रकार, इलावृत-वर्ष के दक्षिण में तथा पूर्व से पश्चिम को फैले हुए तीन विशाल पर्वतहैं (उत्तर से दक्षिण को ) जिनके नाम हैं--निषध, हेमकूट तथा हिमालय।

इनमें से प्रत्येक१०,००० योजन (८०,००० मील ) ऊँचा है।

ये हरिवर्ष, किम्पुरुष-वर्ष तथा भारतवर्ष नामकतीन वर्षो की सीमाओं के सूचक हैं।

तथेवेलावृतमपरेण पूर्वेण च माल्यवद्गन्थमादनावानीलनिषधायतौ द्विसहस्त्रं पप्रथतु: केतुमालभद्रा श्रयो:सीमानं विदधाते ॥

१०॥

तथा एव--उसके ही समान; इलावृतम्‌ अपरेण --इलावृत वर्ष के पश्चिम में; पूर्वेण च--और पूर्व दिशा में भी; माल्यवद्‌-गन्ध-मादनौ--पश्चिम में माल्यवान्‌ तथा पूर्व में गन्धमादन सीमा बनाने वाले पर्वत; आ-नील-निषध-आयतौ--उत्तर दिशा मेंनीलपर्वत तक और दक्षिण दिशा में निषध पर्वत तक; द्वि-सहस्त्रमू--दो हजार योजन; पप्रथतु:--फैले हुए हैं; केतुमाल-भद्राश्रयो:--केतुमाल तथ भद्राश्व इन दो वर्षों की; सीमानम्‌--सीमा; विद्धाते--स्थापना करते हैं।

इसी प्रकार से इलाबृत-वर्ष के पूर्व तथा पश्चिम क्रमश माल्यवान्‌ और गन्धमादन नामक दोविशाल पर्वत हैं।

ये दोनों २,००० योजन ( १६,००० मील ) ऊँचे हैं और उत्तर में नीलपर्वत तकतथा दक्षिण में निषध तक फैले हैं।

ये इलावृत-वर्ष की और केतुमाल तथा भद्राश्व नामक वर्षोकी भी सीमाओं के सूचक हैं।

मन्दरो मेरुमन्दरः सुपार्श्व: कुमुद इत्ययुतयोजनविस्तारोन्नाहा मेरो श्चतुर्दिशमवष्टम्भगिरय उपक्रिप्ता: ॥

११॥

मन्दरः--मन्दर नामक पर्वत; मेरू-मन्दर:--मेरू-मन्दर पर्वत; सुपार्श्र:--सुपार्श्व पर्वत; कुमुदः --कुमुद पर्वत; इति--इस प्रकार;अयुत-योजन-विस्तार-उन्नाहा:--जिनकी ऊँचाई तथा चौड़ाई दस हजार योजन है; मेरो:--सुमेरु की; चतुः-दिशम्‌--चारोंदिशाएँ; अवष्टम्भ-गिरय:--पर्वत जो सुमेर॒ की मेखलाओं के सहश हैं; उपक्रिप्ता:--स्थित हैं

सुमेरु पर्वत की चारों दिशाओं में मन्दर, मेरुमन्दर, सुपार्थ तथा कुमुद नामक चार पर्वत हैं,जो इसकी मेखलाओं के सहृश हैं।

ये पर्वत १०,००० योजन ( ८०,००० मील ) ऊँचे तथा इतनेही चौड़े हैं।

चतुर्ष्वेतेषु चूतजम्बूकदम्बन्यग्रोधा श्वत्वार: पादपप्रवरा: पर्वतकेतवइवाधिसहस्त्रयोजनोन्नाहास्तावद्विटपविततय: शतयोजनपरिणाहा: ॥

१२॥

चतुर्षु--चारों पर; एतेषु--मन्दर इत्यादि इन चारों पर; चूत-जम्बू-कदम्ब--आम, जामुन तथा कदम्ब जैसे वृक्ष; न्यग्रोधा:--(तथा ) बट वृक्ष; चत्वार:--चार प्रकार के; पादप-प्रवरा:--वृक्षों में श्रेष्ठ; पर्वत-केतव: --पर्वतों पर ध्वजाएँ; इब--सहृश;अधि--ऊपर; सहस्त्र-योजन-उन्नाहा:--एक हजार योजन ऊँचा; तावत्‌--इतना भी; विटप-विततयः--शाखाओं की लम्बाई;शत-योजन--एक सौ योजन; परिणाहा:--चौड़ी

इन चारों पर्वतों की चोटियों पर ध्वजाओं के रूप में एक एक आगम्र, जामुन, कदम्ब तथावट वृक्ष हैं।

इन वृक्षों का घेरा १०० योजन ( ८०० मील ) तथा ऊँचाई १९,९०० योजन ( ८,८००मील ) है।

इनकी शाखाएँ १,१०० योजन की त्रिज्या में फैली हैं।

हृदाश्चवत्वार: पयोमध्विश्लुरसमृष्ठटजला यदुपस्पर्शिन उपदेवगणा योगैश्वर्याणि स्वाभाविकानि भरतर्षभधारयन्ति; देवोद्यानानि च भवन्ति चत्वारि नन्दनं चेत्ररथं वैभ्राजकं सर्वतोभद्रमिति ॥

१३-१४॥

हृदाः--सरोवर; चत्वार: --चार; पय: --दुग्ध; मधु--शहद; इश्लु-रस--गन्ने का रस; मृष्ट-जला:--विशुद्ध जल से पूरित;यत्‌--जिसका; उपस्पशिन:--तरल पदार्थों का प्रयोग करनेवाले; उपदेव-गणा:--देवतागण; योग-ऐश्वर्याणि--योग की समस्तसिद्धियाँ; स्वाभाविकानि--सरलता से; भरत-ऋषभ--हे भरतवंश में श्रेष्ठ; धारयन्ति-- धारण करते हैं; देव-उद्यानानि--स्वर्गिकउद्यान; च-- भी; भवन्ति-- हैं; चत्वारि--चार; नन्दनम्‌--नन्दनवन; चैत्र-रथम्‌--चैत्ररथ उद्यान; वैश्राजकम्‌--वैशभ्राजक उद्यान;सर्वतः-भद्गम्‌--सर्वतोभद्ग उद्यान; इति--इस प्रकार

भरतवंश में श्रेष्ठ, हे महाराज परीक्षित, इन चारों पर्वतों के मध्य में चार विशाल सरोवर हैं।

इनमें से पहले का जल दुग्ध की तरह, दूसरे का मधु के सहश और तीसरे का इश्लुरस की भाँतिस्वादिष्ट है।

चौथा सरोवर विशुद्ध जल से परिपूर्ण है।

इन चारों सरोवरों की सुविधा का उपभोगसिद्ध, चारण तथा गन्धर्व जैसे अपार्थिव प्राणी, जिन्हें देवता भी कहा जाता है, करते हैं।

'फलस्वरूप उन्हें योग की सहज सिद्द्धियाँ--यथा, सूक्ष्मतम से सूक्ष्मतर और से रूप धारण करनेकी शक्तियाँ--प्राप्त हैं।

इसके अतिरिक्त चार देव-उद्यान भी हैं, जिनके नाम हैं--नन्दन,चैत्ररथ, वैभ्राजक तथा सर्वतोभद्र |

दीर्घतरयेष्वमरपरिवृढा: सह सुरललनाललामयूथपतय उपदेवगणैरुपगीयमानमहिमान: किल विहरन्ति ॥

१५॥

येषु--जिनमें; अमर-परिवृढा: --सर्व श्रेष्ठ देवगण; सह--सहित; सुर-ललना--समस्त देवताओं तथा उपदेवताओं की पत्नियोंके; ललाम--आभूषण सहश उन स्त्रियों के; यूथ-पतय:--पतिगण; उपदेव-गणै: --उपदेवों ( गन्धर्वों ) के द्वारा; उपगीयमान--जिनकी स्तुति हो रही है; महिमान:--जिनका यश; किल--निश्चय ही; विहरन्ति--विहार करते हैं, क्रीड़ा करते हैं|

इन उद्ानों में श्रेष्ठटम देवगण अपनी-अपनी सुन्दर पत्नियों के सहित जो स्वर्गिक सौन्दर्य केआशभृषणों जैसी हैं, एकत्र होकर आनन्द लेते हैं और गन्धर्व-जन उनके यश-गान करते हैं।

मन्दरोत्सड़ एकादशशतयोजनोत्तुड्देवचूतशिरसो गिरिशिखरस्थूलानि फलान्यमृतकल्पानि पतन्ति ॥

१६॥

मन्दर-उत्सड़े--मन्दर पर्वत की निचली ढाल पर; एकादश-शत-योजन-उत्तुड्र-- १,१०० योजन ऊँचा; देवचूत-शिरस:--देवचूतनामक आप्रवृक्ष की चोटी से; गिरि-शिखर-स्थूलानि--जो पर्वताश्रृंगों के समान स्थूल हैं; फलानि--फल; अमृत-कल्पानि--अमृत की भाँति मधुर; पतन्ति--गिरते हैं।

मन्दर पर्वत की निचली ढलान पर देवचूत नामक एक आ्रवृक्ष है, जिसकी ऊँचाई १,१०० योजन है।

इस वृक्ष की चोटी से पर्वतश्ृंग जितने बड़े तथा अमृत तुल्य मधुर फल गिरते रहते हैंजिनका उपभोग दिव्य लोक के निवासी करते हैं।

तेषां विशीर्यमाणानामतिमधुरसुरभिसुगन्धिबहुलारुणरसोदेनारुणोदा नाम नदीमन्दरगिरिशिखरान्निपतन्ती पूर्वेणेलावृतमुपप्लावयति ॥

१७॥

तेषामू--सभी आम्रफलों के ; विशीर्यमाणानाम्‌ू--चोटी से गिरकर फट जाने के कारण; अति-मधुर--अत्यन्त मीठी; सुरभि--महकने वाली; सुगन्धि--सुगन्धयुक्त; बहुल--प्रभूत मात्रा; अरूुण-रस-उदेन--लाल-लाल रस के द्वारा; अरुणोदा--अरुणोदा;नाम--नामक; नदी--सरिता; मन्दर-गिरि-शिखरात्‌--मन्दर पर्वत के शिखर से; निपतन्ती--गिरती हुई; पूर्वण--पूर्व दिशा में;इलावृतम्‌--इलावृत-वर्ष से होकर; उपप्लाववति--बहती है

इतनी ऊँचाई से गिरने के कारण वे सभी आम्रफल फट जाते हैं और उनका मधुर, सुगन्धितरस बाहर निकल आता है।

यह रस अन्य सुगन्धियों से मिलकर अत्यधिक सुरभित हो जाता है।

यही रस पर्वत से झरनों में जाता है और अरुणोदा नामक नदी का रूप धारण कर लेता है जोइलावृत की पूर्व दिशा से होकर बहती है।

यदुपजोषणाद्धवान्या अनुचरीणां पुण्यजनवधूनामवयवस्पर्शसुगन्धवातो दशयोजनंसमन्तादनुवासयति ॥

१८॥

यत्‌--जिसका; उपजोषणात्‌--सुगन्धित जल का प्रयोग करने से; भवान्या:-- भगवान्‌ शिव की पत्नी भवानी की;अनुचरीणाम्‌--अनुचरियों का; पुण्य-जन-वधूनामू--जो परम पवित्र यक्षों की पत्नियाँ हैं; अवयव--शरीर के अंगों के;स्पर्श--स्पर्श से; सुगन्‍्ध-बात:--सुरभित वायु; दश-योजनम्‌--दस योजन ( अस्सी मील ) तक; समन्तात्‌--चारों ओर;अनुवासयति--सुवासित करती है।

यक्षों की पवित्र पत्तियाँ भगवान्‌ शंकर की अद्धांगिनी भवानी की अनुचरी हैं।

अरुणोदानदी के जल का पान करने के कारण उनके शरीर सुगन्धित हो जाते हैं।

वायु उनके शरीर कास्पर्श करके उस सुगन्धि से अस्सी मील तक चारों ओर के समस्त वायुमण्डल को सुरभित करदेती है।

एवं जम्बूफलानामत्युच्यनिपातविशीर्णानामनस्थिप्रायाणामिभकायनिभानां रसेन जम्बू नाम नदीमेरुमन्दशिखरादयुतयोजनादवनितले निपतन्ती दक्षिणेनात्मानं यावदिलावृतमुपस्यन्दयति ॥

१९॥

एवम्‌--इसी प्रकार; जम्बू-फलानाम्‌--जामुन के फलों का; अति-उच्च-निपात--अत्यधिक ऊँचाई से गिरने के कारण;विशीर्णानाम्‌ू--खण्ड-खण्ड हो जाने से; अनस्थि-प्रायाणाम्‌--अत्यन्त लघु बीज होने के कारण; इभ-काय-निभानाम्‌--औरजो हाथी के शरीर के सहृश विशाल हैं; रसेन--रस के द्वारा; जम्बू नाम नदी--जम्बू नामक नदी; मेरू-मन्दर-शिखरात्‌-- मेरुमन्दर पर्वत के शिखर से; अयुत-योजनात्‌--दस हजार योजन ऊँची; अवनि-तले--पृथ्वी तल पर; निपतन्ती--गिरती हुई;दक्षिणेन--दक्षिण दिशा में; आत्मानम्‌--स्वयमेव; यावत्‌--सम्पूर्ण; इलावृतम्‌--इलावृतवर्ष से; उपस्यन्दयति--होकर बहतीहै

इसी प्रकार रस से भरे और अत्यन्त छोटी गुठली वाले जामुन के फल अत्यधिक ऊँचाई सेगिरकर खण्ड-खण्ड हो जाते हैं।

ये फल हाथी जैसे आकार वाले होते हैं और इनका रस बहकरजम्बूनदी का रूप धारण कर लेता है।

यह नदी इलावृत के दक्षिण में मेरुूमन्दर की चोटी से दसहजार योजन नीचे गिरकर समस्त इलावृत भूखण्ड को रस से आप्लावित करती है।

तावदुभयोरपि रोधसोर्या मृत्तिका तद्रसेनानुविध्यमाना वाय्वर्कसंयोगविपाकेन सदामरलोकाभरणंजाम्बूनदं नाम सुवर्ण भवति; यदु ह वाव विबुधादयः सह युवतिभिर्मुकुटकटककटिसूत्राद्याभरणरूपेणखलु धारयन्ति ॥

२०-२१॥

तावत्‌--सर्वथा; उभयो: अपि--दोनों का; रोधसो: --तटों का; या--जो; मृत्तिका--कीचड़; तत्‌-रसेन--नदी में बहने वालेजम्बू फलों के रस से; अनुविध्यमाना--संपृक्त होकर; वायु-अर्क-संयोग-विपाकेन-- वायु तथा धूप की रासायनिक क्रिया के'फलस्वरूप; सदा--सदैव; अमर-लोक-आभरणम्‌--जो स्वर्गलोक में निवास करने वाले देवताओं के आभूषणों के लिए प्रयुक्तहोता है; जाम्बू-नदम्‌ नाम--जाम्बूनद नामक; सुवर्णम्‌--स्वर्ण; भवति--बन जाता है; यत्‌--जो; उ ह वाव--निस्सन्देह;विबुध-आदय:--देवता आदि; सह--साथ; युवतिभि:--अपनी युवा पत्नियों के; मुकुट--मुकुट; कटक--चूड़ियाँ; कटि-सूत्र--करधनी; आदि--इत्यादि; आभरण--सभी प्रकार के आभूषणों के; रूपेण--रूप में; खलु--निश्चय ही; धारयन्ति--धारण करती हैं।

जम्बू नदी के दोनों तटों का कीचड़ जामुनफल के बहते हुए रस से सिक्त होकर और फिरवायु तथा सूर्य प्रकाश के कारण सूख कर जाम्बू-नद नामक स्वर्ण की प्रचुर मात्रा उत्पन्न करताहै।

स्वर्ग के निवासी इस स्वर्ण का उपयोग विविध आभूषणों के लिए करते हैं।

फलतःस्वर्गलोक के सभी निवासी एवं उनकी तरुण पत्रियाँ स्वर्ण के मुकुटों, चूड़ियों तथा करधनियोंसे आभूषित रहती हैं।

इस प्रकार वे सब जीवन का आनन्द लेते हैं।

यस्तु महाकदम्ब: सुपार्शवनिरूढो यास्तस्य कोटरेभ्यो विनिःसृता: पदञ्णञायामपरिणाहा: पञ्ञ मधुधारा:सुपार्श्शिखरात्पतन्त्योपरेणात्मानमिलावृतमनुमोदयन्ति ॥

२२॥

यः--जो; तु--किन्तु; महा-कदम्ब:--महाकदम्ब नामक वृक्ष; सुपार्थ-निरूढ:--जो सुपार्श्व पर्वत की बगल में खड़ा हुआ है;या:--जो; तस्य--उसका; कोटरेभ्य:--कोटर से; विनिःसृता:--प्रवाहित; पशञ्ञ-पाँच; आयाम--व्याम, आठ फुट की माप;'परिणाहा:--जिसकी माप; पशञ्च--पाँच; मधु-धारा:--मधु की धाराएँ; सुपार्थ-शिखरात्‌--सुपार्श्व पर्वत की चोटी से;पतन्त्य:--गिर रही हैं; अपरेण--सुमेरु पर्वत की पश्चिम दिशा में; आत्मानमू--समग्र; इलावृतम्‌--इलावृत वर्ष को;अनुमोदयन्ति--सुरभित करती हैं|

सुपार्थ पर्वत की बगल में महाकदम्ब नामक अत्यन्त प्रसिद्ध विशाल वृक्ष खड़ा है।

इस वृक्षके कोटर से मधु की पाँच नदियाँ निकलती हैं जिनमें से प्रत्येक लगभग पाँच 'व्याम ' चौड़ी है।

यह प्रवहमान मधु सुपार्श पर्वत की चोटी से सतत नीचे गिरता रहता है और इलावृत-वर्ष की पश्चिम दिशा से प्रारम्भ होकर उसके चारों ओर बहता रहता है।

इस प्रकार सम्पूर्ण स्थल सुहावनीगंध से पूरित है।

या ह्पयुझ्जानानां मुखनिर्वासितो वायु: समन्ताच्छतयोजनमनुवासयति ॥

२३॥

या:--जो ( वे मधु धाराएँ ); हि--निस्सन्देह; उपयुज्ञानानामू--पान करने वालों के; मुख-निर्वासितः वायु:--मुखों सेनिष्कासित वायु; समन्तात्‌--चतुर्दिक्‌; शत-योजनम्‌--एक सौ योजन तक ( आठ सौ मील ); अनुवासयति--सुगन्धित बनादेती है

इस मधु को पीने वालों के मुख से निकली वायु चारों ओर सौ योजन तक के भूभाग कोसुगन्धित बना देती है।

एवं कुमुदनिरूढो य: शतवल्शो नाम वटस्तस्य स्कन्धेभ्यो नीचीना:'पयोदधिमधुघृतगुडान्नाद्यम्बरशय्यासनाभरणादय: सर्व एवं कामदुघा नदाःकुमुदाग्रात्पतन्तस्तमुत्तेणेलावृतमुपयोजयन्ति, ॥

२४॥

एवम्‌--इस प्रकार; कुमुद-निरूढ:--कुमुद पर्वत पर उगा हुआ; य:--वह; शत-वल्शः नाम--शतवल्श नामक वृक्ष ( एक सौतने होने के कारण ); वट:--वट-वृशक्ष; तस्य--उसके ; स्कन्धे भ्य:--मोटी-मोटी शाखाओं से; नीचीना:--नीचे गिरकर; पय:--दुग्ध; दधि--दही; मधु--शहद; घृत--घी; गुड--गुड़; अन्न--अनाज; आदि--हत्यादि; अम्बर--वस्त्र; शय्या--बिस्तर;आसन--बैठने का स्थान; आभरण-आदय:-- आभूषणों आदि से युक्त; सर्वे--सब कुछ, प्रत्येक वस्तु; एब--निश्चय ही; काम-दुघा:--समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाली; नदा:--बड़ी नदियाँ; कुमुद-अग्रात्‌--कुमुद पर्वत की चोटी से; पतन्तः--गिरकर, बहकर; तम्‌ू--उस तक; उत्तरेण--उत्तर दिशा में; इलावृतम्‌--इलावृत वर्ष में; उपयोजयन्ति--सुखी बनाती हैं।

इसी प्रकार कुमुद पर्वत के ऊपर एक विशाल वट वृक्ष है, जो एक सौ प्रमुख शाखाओं केकारण शतवल्श कहलाता है।

इन शाखाओं से अनेक जड़ें निकली हुई हैं, जिनमें से अनेकनदियाँ बहती हैं।

ये नदियाँ इलावृत-वर्ष की उत्तर दिशा में स्थित पर्वत की चोटी से नीचे बहकरवहाँ के निवासियों को लाभ पहुँचाती हैं।

इन नदियों के फलस्वरूप लोगों के पास दूध, दही,शहद, घी, राब, अन्न, वस्त्र, बिस्तर, आसन तथा आभूषण हैं।

उनकी समृद्धि के लिए उन्हें जोभी पदार्थ चाहिए वे सब उपलब्ध हैं, जिससे वे सभी अत्यन्त सुखी हैं।

यानुपजुषाणानां न कदाचिदपि प्रजानांवलीपलितक्लमस्वेददौर्गन्ध्यजरामयपृत्युशीतोष्णवैवण्योपसर्गादयस्तापविशेषा भवन्ति यावज्जीवं सुखंनिरतिशयमेव ॥

२५॥

यान्‌--जो ( उपर्युक्त नदियों से उत्पन्न होने वाले समस्त पदार्थ ); उपजुषाणानाम्‌-पूर्णरूप से उपभोग करने वाले पुरुषों का;न--नहीं; कदाचित्‌--किसी भी समय; अपि--निश्चय ही; प्रजानाम्‌ू--प्रजा की; वली--झुर्रियाँ; पलित--पके केश; क्लम--थकान; स्वेद--पसीना; दौर्गन्ध्य--पसीने के कारण दुर्गध; जरा--बुढ़ापा; आमय--रोग; मृत्यु--असामयिक मृत्यु; शीत--कड़ाके की सर्दी; उष्ण--दाहक, गर्मी; वैवर्ण्य--शरीर की कान्ति का धूमिल पड़ना, विवर्णता; उपसर्ग--क्लेश; आदय:--इत्यादि; ताप--दुखों का; विशेषा: --किस्में, प्रकार; भवन्ति-- हैं; यावत्‌--जब तक; जीवम्‌-- जीवन; सुखम्‌--सुख;निरतिशयम्‌--अपार, सीमाहीन; एव--केवल

इस भौतिक जगत के वासी जो इन बहती नदियों से प्राप्त पदार्थों का सेवन करते हैं, उनकेशरीर में न तो झुर्रियाँ पड़ती हैं और न उनके केश सफेद होते हैं।

न तो उन्हें थकान का अनुभवहोता है और न उसके पसीने से उनके शरीर से दुर्गन्‍्ध ही आती है।

उन्हें बुढ़ापा, रोग याआसामयिक मृत्यु नहीं सताती है न ही वे कड़ाके की सर्दी अथवा झुलसती गर्मी से दुखी होते हैंऔर न ही उनके शरीर की कान्ति लुप्त होती है।

वे सभी मृत्युपर्यन्त चिन्ताओं से मुक्त सुखपूर्वकजीवन व्यतीत करते हैं।

कुरड्ढकुररकुसुम्भवैकड्डत्रिकूटशिशिरपतड्ररूुचकनिषधशिनीवासकपिलशड्डुवैदूर्यजारुधिहंसऋषभनागकलञ्जरनारदादयो विंशतिगिरयो मेरो: कर्णिकाया इव केसरभूता मूलदेशे परित उपक्रिप्ता: ॥

२६॥

कुरड्ू--कुरंग; कुरर--कुरर; कुसुम्भ-वैकड्भू-त्रिकूट-शिशिर-पतड्र-रुचक-निषध-शिनीवास-कपिल-शछड्डु-वैदूर्य-जारुधि-हंस-ऋषभ-नाग-कालजझ्ञर-नारद--ये सभी पर्वतों के नाम हैं; आदय: --इत्यादि; विंशति-गिरय:--बीस पर्वत; मेरो: --सुमेरुपर्वत के; कर्णिकाया:--कमलकोश के; इब--सहृश; केसर-भूता:--केसर के समान; मूल-देशे--पाद पृष्ठ पर; परित:--चारोंओर; उपक्लृप्ता:-- श्रीभगवान्‌ के द्वारा आयोजित |

मेरु पर्वत के तलहटी के चारों ओर अन्य पर्वत इस सुन्दर ढंग से व्यवस्थित हैं मानों कमलपुष्प की कर्णिका के चारों ओर केसर हों।

इन पर्वतों के नाम हैं--कुरंग, कुरर, कुसुम्भ,वैकंक, त्रिकूट, शिशिर, पतंग, रुचक, निषध, शिनीवास, कपिल, शंख, बैदूर्य, जारुधि, हंस,ऋषभ, नाग, कालझर तथा नारद।

जठरदेवकूटौ मेरूं पूर्वेणाष्टादशयोजनसहस्त्रमुदगायतौ द्विसहस्त्रं पृथुतुड्रों भवत:; एवमपरेण'पवनपारियात्रौ दक्षिणेन कैलासकरवीरीौ प्रागायतावेवमुत्तरतस्त्रिश्रुड्रमकरावष्टभिरेतै: परिसृतो ग्निरिवपरितश्चकास्ति काझ्लननगिरि: ॥

२७॥

जठर-देवकूटौ--जठर तथा देवकूट नामक दो पर्वत; मेरुम्‌--सुमेरु पर्वत; पूर्वण--पूर्व दिशा में; अष्टादश-योजन-सहस्त्रमू--अठारह हजार योजन; उदगायतौ --उत्तर से दक्षिण को फैला हुआ; द्वि-सहस्त्रमू--दो हजार योजन; पृथु-तुड्रौ --चौड़ाई तथाऊँचाई में; भवतः--हैं; एवम्‌--इसी तरह; अपरेण--पश्चिम दिशा में; पवन-पारियात्रौ--पवन तथा पारियात्र नामक दो पर्वत;दक्षिणेन--दक्षिण दिशा में; कैलास-करवीरौ--कैलास तथा करवीर नामक दो पर्वत; प्राकु-आयतौ--पूर्व तथा पश्चिम दिशा मेंविस्तृत; एवम्‌--इसी तरह; उत्तरत:--उत्तर दिशा में; त्रिश्ुद्र-मकरौ--त्रिश्रृंग तथा मकर ये दो पर्वत; अष्टभि: एतै:--इन आठपर्वतों के द्वारा; परिसृत:--घिरा हुआ; अग्नि: इब--अग्नि के सहश; परितः--सर्वत्र; चकास्ति--तेजी से चमकता है; काञझ्जन-गिरि:ः--सुमेरु या मेरु नामक सोने का पर्वत

सुमेरु पर्वत के पूर्व में जठर तथा देवकूट नामक दो पर्वत हैं, जो उत्तर तथा दक्षिण की ओर१८,००० योजन ( १,४४,००० मील ) तक फैले हुए हैं।

इसी प्रकार सुमेरु पर्वत की पश्चिमदिशा में पवन तथा पारियात्र नामक दो पर्वत हैं, जो उतनी ही दूरी तक उत्तर तथा दक्षिण में भीफैले हैं।

सुमेरु के दक्षिण में कैलास तथा करवीर पर्वत हैं, जो पूर्व और पश्चिम में १८,०००योजन तक फैले हुए हैं और सुमेरु की उत्तरी दिशा में त्रिश्रृंग तथा मकर नामक दो पर्वत पूर्वऔर पश्चिम में इतनी ही दूरी में विस्तृत हैं।

इन समस्त पर्वतों की चौड़ाई २,००० योजन(१६,००० मील ) है।

इन आठों पर्वतों से घिरा हुआ स्वर्णनिर्मित सुमेरु पर्वत अग्नि की तरहजाज्वल्यमान है।

मेरोर्मूर्थनि भगवत आत्मयोनेर्मध्यत उपक्रिप्तां पुरीमयुतयोजनसाहस्त्रीं समचतुरस्त्रां शातकौम्भी वदन्ति ॥

२८॥

मेरोः--सुमेरु पर्वत की; मूर्धथनि--चोटी पर; भगवतः--सर्वशक्तिमान प्राणी; आत्म-योने:-- भगवान्‌ ब्रह्मा की; मध्यत:--मध्यमें; उपक्रिप्तामू--स्थित; पुरीम्‌--पुरी, विशाल नगरी; अयुत-योजन--दस हजार योजन; साहस्त्रीमू--एक हजार; सम-चतुरस्त्रामू--चारों ओर समान लम्बाई का; शात-कौम्भीम्‌-- पूर्णतः सोने की बनी हुई; वदन्ति--मुनियों का कथन है।

मेरु की चोटी के मध्य भाग में ब्रह्माजी की पुरी स्थित है।

इसके चारों कोने समान रूप सेएक करोड़ योजन ( आठ करोड़ मील ) तक विस्तृत हैं।

यह पूरे का पूरा स्वर्ण से निर्मित है,इसीलिए विद्वतजन तथा ऋषि-मुनि इसे शातकौम्भी नाम से पुकारते हैं।

तामनुपरितो लोकपालानामष्टानां यथादिशं यथारूपं तुरीयमानेन पुरोष्टावुपक्रिप्ता: ॥

२९॥

ताम्‌ू--ब्रह्मपुरी नामक इस पुरी को; अनुपरितः--घेरे हुए; लोक-पालानाम्‌--लोकों के शासक; अष्टानाम्‌--आठ; यथा-दिशम्‌--दिशाओं के अनुसार; यथा-रूपम्‌--ब्रह्मपुरी के ही समान; तुरीय-मानेन--माप में केवल एक चतुर्थाश; पुर: --पुरी;अष्टौ--आठ; उपक्रिप्ता:--स्थित हैं।

ब्रह्मपुरी के चारों और सभी दिशाओं में लोकों के आठ प्रमुख लोकपालों के निवास-स्थलहैं, जिनमें से पहला राजा इन्द्र का है।

ये निवासस्थल ब्रह्मपुरी के ही समान हैं, किन्तु वे आकारमें एक चौथाई हैं।

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