← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 5 की सूची

अध्याय छब्बीसवाँ: नारकीय ग्रहों का विवरण

5.26राजोबाचमहर्ष एतद्वैच्चित्यं लोकस्य कथमिति ॥

१॥

राजाउवाच--राजा बोला; महर्षे --हे महर्षि ( शुकदेव गोस्वामी ); एतत्‌--यह; वैचित्रयम्‌--विचित्रता; लोकस्य--जीवात्माओंकी; कथम्‌--किस प्रकार; इति--इस प्रकार।

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे महाशय, जीवात्माओं को विभिन्न भौतिकगतियाँ क्यों प्राप्त होती हैं? कृपा करके मुझसे कहें।

ऋषिरुवाचत्रिगुणत्वात्कर्तु: श्रद्धया कर्मगतयः पृथग्विधा: सर्वा एव सर्वस्य तारतम्येन भवन्ति ॥

२॥

ऋषि: उबाच--महामुनि ( शुकदेव गोस्वामी ) बोले; त्रि-गुणत्वात्‌--तीन गुणों के कारण; कर्तु:ः--कर्ता का; श्रद्धया-- श्रद्धाके कारण; कर्म-गतय:--कार्यो के कारण स्थितियाँ; पृथक्‌-भिन्न; विधा:--प्रकार; सर्वा:--सभी; एव--इस प्रकार;सर्वस्थ--उन सबों का; तारतम्येन--विभिन्न मात्राओं में; भवन्ति--सम्भव होते हैं।

महामुनि शुकदेव बोले--हे राजन्‌, इस जगत में सतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण में स्थिततीन प्रकार के कर्म होते हैं।

चूँकि सभी मनुष्य इन तीन गुणों से प्रभावित होते हैं, अतः कर्मों के'फल भी तीन प्रकार के होते हैं।

जो सतोगुण के अनुसार कर्म करता है, वह धार्मिक एवं सुखीहोता है, जो रजोगुण में कर्म करता है उसे कष्ट तथा सुख के मिश्रित रूप में प्राप्त होते हैं और जोतमोगुण के वश में कर्म करता है, वह सदैव दुखी रहता है और पशुतुल्य जीवन-बिताता है।

विभिन्न गुणों से भिन्न-भिन्न मात्रा में प्रभावित होने के कारण जीवात्माओं को विभिन्न गतियाँप्राप्त होती हैं।

अथेदानीं प्रतिषिद्धलक्षणस्याधर्मस्य तथेव कर्तु: श्रद्धाया वैसाहश्यात्कर्मफलं विसदृ॒शं भवति याहानाद्यविद्यया कृतकामानां तत्परिणामलक्षणा: सृतयः सहस्त्रशः प्रवृत्तास्तासांप्राचुर्येणानुवर्णयिष्याम: ॥

३॥

अथ--इस प्रकार; इदानीमू--अब ; प्रतिषिद्ध--निषिद्ध; लक्षणस्य--लक्षणों वाला; अधर्मस्य--अपवित्र कार्यो का; तथा--उसी तरह का; एव--निश्चय ही; कर्तुः--कर्ता का; श्रद्धाया:-- श्रद्धा का; वैसाइश्यात्‌ू-- अन्तर के कारण; कर्म-फलमू--कर्मोका फल; विसदृशम्‌--भिन्न; भवति--होता है; या--जो; हि--निस्संदेह; अनादि--अनन्त काल से; अविद्यया--अज्ञानता केकारण; कृत--किया हुआ; कामानाम्‌ू--कामी जनों का; तत्‌-परिणाम-लक्षणा:--ऐसी अपवित्र कामनाओं के फलों केलक्षण; सृतब:ः--जीवन की नारकीय दशाएँ; सहस्त्रश:--हजार प्रकार से; प्रवृत्ताः--फलित; तासामू--उनका; प्राचुर्येण --विस्तार से; अनुवर्णयिष्याम:--वर्णन करूँगा।

जिस प्रकार पवित्र कर्म करने से स्वर्गिक जीवन में विभिन्न गतियाँ प्राप्त होती हैं उसी प्रकारदुष्कर्म करने से नारकीय जीवन में विभिन्न गतियाँ प्राप्त होती हैं।

जो तमोगुण से प्रेरित होने वालेदुष्कर्मो में प्रवृत्त होते हैं अपनी अज्ञानता की कोटि के अनुसार नारकीय जीवन में विभिन्नकोटियों में रखे जाते हैं।

यदि कोई पागलपन के कारण तमोगुण में कार्य करता है, तो उसे सबसेकम कष्ट भोगना पड़ता है।

जो दुष्कर्म करता है, किन्तु पवित्र और अपवित्र कर्मों का अन्तरसमझता है, उसे मध्यम कष्टकारक नरक में स्थान मिलता है।

किन्तु जो नास्तिकतावश बिनासमझे-बूझे दुष्कर्म करता है उसे निकृष्ट नारकीय जीवन बिताना पड़ता है।

अनादिकाल सेअज्ञानतावश प्रत्येक जीव अनेकानेक कामनाओं के कारण हजारों प्रकार के नरक लोकों में लेजाया जाता रहा है।

मैं यथासम्भव उनका वर्णन करने का यत्न करूँगा।

राजोबाचनरका नाम भगवन्कि देशविशेषा अथवा बहिस्त्रिलोक्या आहोस्विदन्तराल इति ॥

४॥

राजा उबाच--राजा ने कहा; नरका:--नारकीय प्रदेश; नाम--नामक; भगवनू--हे भगवान्‌; किम्‌--क्या; देश-विशेषा: --कोई विशेष देश; अथवा--या; बहि:--बाह्य; त्रि-लोक्या:--तीनों लोकों ( ब्रह्माण्ड ) के; आहोस्वित्‌ू--अथवा; अन्तराले--ब्रह्माण्ड के भीतर मध्यवर्ती स्थानों में; इति--इस प्रकार।

राजा परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--भगवान्‌, क्‍या ये नरक ब्रह्माण्ड के बाहर,इसके भीतर या इसी लोक में भिन्न-भिन्न स्थानों पर हैं?

ऋषिरुवाचअन्तराल एव त्रिजगत्यास्तु दिशि दक्षिणस्यामथस्ताद्धूमेरुपरिष्टाच्य जलाद्यस्यामग्निष्वात्तादयः पितृगणादिशि स्वानां गोत्राणां परमेण समाधिना सत्या एवाशिष आशासाना निवसन्ति ॥

५॥

ऋषि: उवाच--ऋषि ने उत्तर दिया; अन्तराले--मध्यवर्ती स्थान में; एब--निश्चय ही; त्रि-जगत्या:--तीनों लोकों के; तु--लेकिन; दिशि--दिशा; दक्षिणस्थाम्‌--दक्षिणी; अधस्तात्‌--नीचे; भूमेः --पृथ्वी पर; उपरिष्टात्‌-- थोड़ा ऊपर; च--तथा;जलात्‌--गर्भोदक सागर से; यस्याम्‌--जिसमें; अग्निष्वात्ता-आदय:-- अग्निष्वात्ता इत्यादि; पितृ-गणा: --पितर-गण; दिशि--दिशा में; स्वानामू--उनके अपने; गोत्राणाम्‌--परिवार के; परमेण--अत्यधिक; समाधिना-- भगवान्‌ के ध्यान में मग्न होकर;सत्याः--सत्य में; एब--निश्चय ही; आशिष:--आशीर्वाद; आशासानाः--कामना करने वाले; निवसन्ति--रहते हैं |

महर्षि शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया--सभी नरकलोक तीनों लोकों तथा गर्भोदक सागरके मध्य में स्थित हैं।

वे ब्रह्माण्ड के दक्षिण की ओर भूमण्डल के नीचे तथा गर्भोदक सागर केजल से थोड़ा ऊपर स्थित हैं।

पितूलोक भी इसी गर्भोदक सागर तथा अध:ः:लोकों के मध्य केप्रदेश में स्थित है, जिसमें अग्निष्वात्ता आदि समस्त पितृलोक के वासी परम समाधि में लीनहोकर भगवान्‌ का ध्यान करते हैं और सदैव अपने गोत्र ( परिवारों ) की मंगल-कामना करते हैं।

यत्र ह वाव भगवान्पितृराजो बैवस्वत: स्वविषयं प्रापितेषु स्वपुरुषैर्जन्तुषु सम्परेतेषु यथाकर्मावच्यंदोषमेवानुल्लड्डितभगवच्छासन: सगणो दमं धारयति ॥

६॥

यत्र--जहाँ; ह वाव--निस्संदेह; भगवान्‌--सर्वशक्तिमान; पितृ-राज:--यमराज, पितरों के राजा; वैवस्वतः--सूर्यदेव के पुत्र;स्व-विषयम्‌--अपना राज्य; प्रापितेषु--पहुँच जाने पर; स्व-पुरुषै:--अपने दूतों द्वारा; जन्तुषु--मानव प्राणी; सम्परेतेषु--मृत;यथा-कर्म-अवद्यम्‌ू-बद्ध जीवन के नियमों तथा विधानों के उल्लंघन की मात्रा के अनुसार; दोषम्‌--दोष, त्रुटि; एब--निश्चयही; अनुल्लड्वित- भगवत्‌-शासन:--जो श्रीभगवान्‌ के आदेश का कभी भी उल्लंघन नहीं करता; सगण: --अपने अनुचरोंसहित; दमम्‌--दण्ड; धारयति--देता है।

पितरों के राजा यमराज हैं जो सूर्यदेव के अत्यन्त शक्तिशाली पुत्र हैं।

बह अपने गणों सहितपितृलोक में रहते हैं और भगवान्‌ द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करते हुए यमदूत समस्तपापियों को मृत्यु के पश्चात्‌ उनके पास ले आते हैं।

अपने कार्यक्षेत्र में लाए जाने के पश्चात्‌ उनकेविशेष पापकर्मों के अनुसार यमराज अपना निर्णय देकर उनको समुचित दंड हेतु अनेक नरकोंमें से किसी एक में भेज देते हैं।

तत्र हैके नरकानेकविंशतिं गणयन्ति अथ तांस्ते राजन्नामरूपलक्षणतो<नुक्रमिष्यामस्तामिस्त्रो उन्धतामिस्त्रोरौरवो महारौरव: कुम्भीपाक: कालसूत्रमसिपत्रवनं सूकरमुखमन्धकूप: कृमिभोजनःसन्दंशस्तप्तसूर्मिवज़ञकण्टकशाल्मली बैतरणी पूयोदः प्राणरोधो विशसनं लालाभक्षःसारमेयादनमवीचिरय:पानमिति; किज्ज क्षारकर्दमो रक्षोगणभोजन: शूलप्रोतो दन्दशूको वटनिरोधनःपर्यावर्तन: सूचीमुखमित्यष्टाविंशतिर्नरका विविधयातनाभूमय: ॥

७॥

तत्र--वहाँ; ह--निश्चय ही; एके --कोई कोई; नरकान्‌--नरकों को; एक-विंशतिम्‌--इक्कीस; गणयन्ति--गिनते हैं; अथ--अतः; तानू--उनको; ते--तुमको; राजन्‌--हे राजन; नाम-रूप-लक्षणत:--नामों, रूपों तथा लक्षणों के अनुसार;अनुक्रमिष्याम: --मैं क्रम से वर्णन करूँगा; तामिस्त्र:ः--तामिस्त्र; अन्ध-तामिस्त्र:--अन्धतामिस्त्र; रौरव: --रौरव; महा-रौरव:--महारौरव; कुम्भी-पाक:--कुम्भीपाक; काल-सूत्रमू--कालसूत्र; असि-पत्रवनम्‌--असिपत्रवन; सूकर-मुखम्‌--सूकरमुख;अन्ध-कूप:--अन्धकूप; कृमि-भोजन:--कृमिभोजन; सन्दंश: --सन्दंश; तप्त-सूर्मि:--तप्तसूर्मि; वज्न-कण्टक-शाल्मली --वज़कंटक-शाल्मली; बैतरणी--वैतरणी; पूयोद:--पूयोद; प्राण-रोध:-- प्राणरोध; विशसनम्‌--विशसन; लाला-भक्ष:--लालाभक्ष; सारमेयादनम्‌--सारेमेयादन; अवीचि:--अवीचि; अयः-पानम्‌--अयःपान; इति--इस प्रकार; किज्ञ--कुछ और;क्षार-कर्दम:--क्षारकर्दम; रक्ष:-गण-भोजन:--रक्षोगणभोजन; शूल-प्रोत:--शूलप्रोत; दन्‍्द-शूकः --न्दशूक; अवट-निरोधन:--अवटनिरोधन; पर्यावर्तन:--पर्यावर्तन; सूची-मुखम्‌--सूचीमुख; इति--इस तरह; अष्टा-विंशति:--अट्ठाईस;नरका:--नरकलोक; विविध--विभिन्न; यातना-भूमय:--नारकीय यातना वाले स्थलकुछ विद्वान नरक लोकों की कुल संख्या इक्कीस बताते हैं, तो कुछ अट्टाईस।

हे राजन्‌, मैं क्रमश: उनके नाम, रूप तथा लक्षणों का वर्णन करूँगा।

विभिन्न नरकों के नाम ये हैं--तामिस्त्र,अन्धतामिस्त्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, सूकरमुख, अन्धकूप,कृमिभोजन, सन्‍्दंश, तप्तसूर्मि, वज़कंटक-शाल्मली, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन,लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि, अयःपान, क्षारकर्दम, रक्षोगणभोजन, शूलप्रोत, दन्दशूक,अवटनिरोधन, पर्यावर्तन तथा सूचीमुख।

ये सभी लोक जीवात्माओं को दण्डित करने के लिएहैं।

तत्र यस्तु परवित्तापत्यकलत्राण्यपहरति स हि कालपाशबद्धो यमपुरुषैरतिभयानकैस्तामिस्त्रे नरकेबलान्निपात्यते अनशनानुदपानदण्डताडनसन्तर्जनादिभिर्यातनाभिर्यात्यमानो जन्तुर्यत्र कश्मलमासादित'एकदैव मूर्च्छामुपयाति तामिस्त्रप्राये ॥

८ ॥

तत्र--नरक लोकों में; यः--जो व्यक्ति; तु--लेकिन; पर-वित्त-अपत्य-कलत्राणि--पराया धन, पत्नी तथा सन्‍्तान; अपहरति--अपहरण करता है; सः--वह व्यक्ति; हि--निश्चय ही; काल-पाश-बद्ध:--काल अथवा यमराज के रस्सों द्वारा बाँधा जाकर;यम-पुरुषै:--यमराज के दूतों द्वारा; अति-भयानकै:--अत्यन्त भयानक; तामिस्त्रे नरके--तामिस्त्र नामक नरक में; बलातू--बलपूर्वक; निपात्यते--फेंक दिया जाता है; अनशन-- भूखों मारना; अनुदपान--बिना जल के; दण्ड-ताडन--डंडे से प्रताड़ित;सन्‍्तर्जन-आदिभि:--डाँट-फटकार इत्यादि; यातनाभि:--कठोर दण्ड द्वारा; यात्यमान:--दण्डित होकर; जन्तु:--जीवात्मा;यत्र--जहाँ; कश्मलमू--दैन्य; आसादित:--प्राप्त करके; एकदा--क भी -क भी; एव-- ही; मूर्च्छाम्‌--मूर्च्छा; उपयाति--प्राप्तकरता है; तामिस्त्र-प्राये--नितान्त अंधकार की स्थिति में |

हे राजन, जो पुरुष दूसरों की वैध पत्नी, सन्‍्तान या धन का अपहरण करता है, उसे मृत्यु केसमय क्रूर यमदूत काल के रस्सों में बाँधकर बलपूर्वक तामिस्त्र नामक नरक में डाल देते हैं।

इसअंधकारपूर्ण लोक में यमदूत पापी पुरुषों को डाँटते, मारते पीटते और प्रताड़ित करते हैं।

उसेभूखा रखा जाता है और पीने को पानी भी नहीं दिया जाता है।

इस प्रकार यमराज के क्रुद्ध दूतउसे कठोर यातना देते हैं और वह इस यातना से कभी-कभी मूर्च्छित हो जाता है।

एवमेवान्धतामिस्त्रे यस्तु वज्ञयित्वा पुरुषं दारादीनुपयुड्रे यत्र शरीरी निपात्यमानो यातनास्थो वेदनयानष्टमतिर्नष्टटदृष्टिश्व भवति यथा वनस्पतिर्वृश्च्यमानमूलस्तस्मादन्धतामिस्त्रं तमुपदिशन्ति ॥

९॥

एवम्‌--इस प्रकार; एब--ही; अन्धतामिस्त्रे--अन्धतामिस्त्र नरक में; यः--जो व्यक्ति; तु--लेकिन; वज्ञयित्वा--ठग कर;पुरुषम्‌--दूसरे व्यक्ति को; दार-आदीन्‌--पली तथा सन्‍्तान; उपयुड्डे -- भोग करता है; यत्र--जहाँ; शरीरी --शरीरधारी व्यक्ति;निपात्यमान:--बलपूर्वक फेंका जाकर; यातना-स्थ: --अत्यन्त दयनीय स्थिति में रहकर; वेदनया--ऐसी बेदना से; नष्ट मति:--जिनकी बुद्धि नष्ट हो गई है; नष्ट दृष्टि:--जिनकी दृष्टि क्षीण हो चुकी है; च-- भी; भवति--हो जाता है; यथा--जितना कि;वनस्पति:--वृक्ष; वृश्च्यमान--काटे जाने पर; मूल: --जिनकी जड़; तस्मात्‌ू--इस कारण; अन्धतामिस्त्रमू--अन्धतामिस्त्र;तमू--उसको; उपदिशन्ति-- कहते हैं

जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को धोखा देकर उसकी पत्नी तथा सन्‍्तान को भोगता है वह अन्धतामिस्त्र नामक नरक में स्थान पाता है।

वहाँ पर उसकी स्थिति जड़ से काटे गए वृक्ष जैसीहोती है।

अंधतामिस्र में पहुँचने के पूर्व ही पापी जीव को अनेक कठिन यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।

ये यातनाएँ इतनी कठोर होती हैं कि वह बुद्धि तथा दृष्टि दोनों को खो बैठता है।

इसी कारण सेबुद्धिमान जन इस नरक को अन्धतामिस््र कहते हैं।

यस्त्विह वा एतदहमिति ममेदमिति भूतद्रोहेण केवल स्वकुटुम्बमेवानुदिनं प्रपुष्णाति स तदिह विहायस्वयमेव तदशुभेन रौरवे निपतति ॥

१०॥

यः--जो; तु-- लेकिन; इह--इस जीवन में; वा--अथवा; एतत्‌--यह देह; अहम्‌--मैं; इति--इस प्रकार; मम--मेरा; इृदम्‌--यह; इति--इस प्रकार; भूत-द्रेहेण--अन्य जीवात्माओं की ईर्ष्या से; केवलम्‌-- अकेले; स्व-कुटुम्बम्‌--अपने कुट॒ुम्बी जनोंको; एव--केवल; अनुदिनम्‌--नित्य-प्रति; प्रपुष्णाति--निर्वाह करता है; सः--ऐसा व्यक्ति; तत्‌ू--वह; इह--यहाँ; विहाय--छोड़कर; स्वयम्‌--स्वयं; एबव--ही; तत्‌ू--उसका; अशुभेन--पाप द्वारा; रौरवे--रौरव में; निपतति--गिर जाता है|

ऐसा व्यक्ति जो अपने शरीर को 'स्व' मान लेता है अपने शरीर तथा अपनी पत्नी और पुत्रोंके पालन के लिए धन कमाने के लिए अहर्निश कठोर श्रम करता है।

ऐसा करने में वह अन्यजीवात्माओं के प्रति हिंसा कर सकता है।

ऐसे पुरुष को मृत्यु के समय अपनी तथा अपने परिवारकी देहों को त्यागना पड़ता है और अन्य प्राणियों के प्रति की गई ईर्ष्या का कर्मफल यह मिलताहै कि उसे रौरव नामक नरक में फेंक दिया जाता है।

ये त्विह यथेैवामुना विहिंसिता जन्तव: परत्र यमयातनामुपगतं त एव रुरवो भूत्वा तथा तमेव विहिंसन्तितस्माद्रौरवमित्याहू रुरुरिति सर्पादतिक्रूरसत्त्वस्थापदेश: ॥

११॥

ये--वे जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; यथा--जितना कि; एब--ही; अमुना--उसके द्वारा; विहिंसिता:--पीड़ित कियेगये; जन्तव:--जीवात्माएँ; परत्र--अगले जन्म में; यम-यातनाम्‌ उपगतम्‌-- यमराज द्वारा यातना पहुँचाये जाने पर; ते--वेजीवात्माएँ; एव--निस्संदेह; रुरव:--रुरु ( एक ईर्ष्यालु पशु ); भूत्वा--बनकर; तथा--उतना; तमू--उसको; एव--ही;विहिंसन्ति--पीड़ा पहुँचाते हैं; तस्मात्‌--इस कारण; रौरवम्‌ू--रौरव; इति--इस प्रकार; आहु: --विद्वानों का कथन है; रुरु:--रुरु नामक पशु; इति--इस प्रकार; सर्पात्‌--सर्प की अपेक्षा; अति-क्रूर--अत्यधिक निर्दय तथा ईर्ष्यालु; सत्त्वस्थ--जीव का;अपदेश:--नाम |

इस जीवन में ईर्ष्यालु व्यक्ति अनेक जीवात्माओं के प्रति हिसंक कृत्य करता है।

अतः मृत्युके पश्चात्‌ यमराज द्वारा नरक ले जाये जाने पर जो जीवात्माएँ उसके द्वारा पीड़ित की गई थीं वेरुरु नामक जानवर के रूप में प्रकट होकर उसे असहा पीड़ा पहुँचाते हैं।

विद्वान लोग इसे हीरौरव नरक कहते हैं।

रुरु सर्प से भी अधिक ईर्ष्यालु होता है और प्रायः इस संसार में दिखाई नहींपड़ता है।

एवमेव महारौरवो यत्र निपतितं पुरुष क्रव्यादा नाम रुरवस्तं क्रव्येण घातयन्ति यः केवल देहम्भर: ॥

१२॥

एवम्‌--इस तरह; एव--ही; महा-रौरव:ः--महारौरव; यत्र--जहाँ; निपतितम्‌--फेंका जाकर; पुरुषम्‌--व्यक्ति को; क्रव्यादा:नाम--क्रव्याद नामक; रुरब:--रुरु पशु; तम्‌--उसको ( दोषी पुरुष ); क्रव्येण--उसके मांस-भक्षण हेतु; घातयन्ति--मारतेहैं; यः--जो; केवलम्‌ू--केवल; देहम्भर:--अपने शरीर का पालन करने पर तुले रहते हैं।

जो व्यक्ति अन्यों को पीड़ा पहुँचाकर अपने ही शरीर का पालन करता है उसे दण्डस्वरूपमहारौरव नामक नरक दिये जाने को अनिवार्य कहा गया है।

इस नरक में क्रव्याद नामक रुरूपशु उसको सताते और उसका मांस खाते हैं।

तात्पर्य : ऐसे पशुतुल्य व्यक्ति को जो केवल देहात्मबुद्धि में रहता है क्षमा नहीं किया जाता।

उसेमहारौरव नामक नरक में रखा जाता है जहाँ उस पर क्रव्याद नामक रुरु पशु आक्रमण करते हैं।

यस्त्विह वा उग्र: पशून्पक्षचिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचरा:कुम्भीपाके तप्ततैले उपरन्धयन्ति ॥

१३॥

यः--वह व्यक्ति जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; बा--अथवा; उग्र; --अत्यन्त क्रूर; पशून्‌--पशु को; पक्षिण:--पक्षियोंको; वा--अथवा; प्राणत:ः--जीवित अवस्था में; उपरन्धयति--पकाता है; तम्‌--उसको; अपकरुणम्‌--अत्यन्त निष्ठुर; पुरुष-आदैः--जो पुरुष के मांस का भक्षण करते हैं, उनके द्वारा; अपि--यहाँ तक कि; विगर्हितम्‌-- भर्त्सना की जाती है ; अमुत्र--अगले जन्म में; यम-अनुचरा:--यमराज के दूत; कुम्भीपाके-- कुम्भीपाक नरक में; तप्त-तैले--उबलते तेल में; उपरन्धयन्ति--पकाते हैं।

क्रूर व्यक्ति अपने शरीर के पालन तथा अपनी जीभ की स्वाद पूर्ति के लिए निरीह जीवितपशुओं तथा पक्षियों को पका खाते हैं।

ऐसे व्यक्तियों की मनुजाद ( मनुष्य-भक्षक ) भी भर्त्सनाकरते हैं।

अगले जन्मों में वे यमदूतों के द्वारा कुम्भीपाक नरक में ले जाये जाते हैं, जहाँ उन्हेंउ बलते तेल में भून डाला जाता हैं।

यस्त्विह ब्रह्मश्र॒ुक्स कालसूत्रसंज्ञके नरके अयुतयोजनपरिमण्डले ताम्रमये तप्तखलेउपर्यधस्तादग्न्यर्का भ्यामतितप्यमाने भिनिवेशित: क्षुत्पिपासाभ्यां च दह्ममानान्तर्बहिःशरीर आस्ते शेतेचेष्टतेउवतिष्ठति परिधावति च यावन्ति पशुरोमाणि तावद्वर्षमहस्त्राणि ॥

१४॥

यः--जो कोई; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; ब्रह्म-धुुक्‌ --ब्राह्मण की हत्या करने वाला; सः--ऐसा व्यक्ति; कालसूत्र-संज्ञ़के--कालसूत्र नामक; नरके --नरक में; अयुत-योजन-परिमण्डले--अस्सी हजार मील की परिधि वाले; ताम्र-मये--ताम्रसे बने; तप्त--गरम किये हुए; खले--समतल स्थल में; उपरि-अधस्तात्‌ू--ऊपर तथा नीचे; अग्नि--अग्नि द्वारा; अर्कभ्याम्‌--( तथा ) सूर्य द्वारा; अति-तप्यमाने--अत्यधिक गरम किये जाने पर; अभिनिवेशित: --प्रविष्ट कराये जाने पर; श्षुत्‌-पिपासाभ्याम्‌-- भूख तथा प्यास से; च--तथा; दह्ममान--जलाया जाकर; अन्त:-- भीतर से; बहि:--बाहर से; शरीर: --जिसका शरीर; आस्ते--रहता है; शेते--कभी लेटता है; चेष्टते--कभी अपने अंगों को हिलाता-डुलाता है; अवतिष्ठति--कभीखड़ा होता है; परिधावति--कभी इधर-उधर दौड़ता है; च-- भी; यावन्ति--जितने; पशु-रोमाणि--पशु के शरीर के रोम;तावत्‌--उतने; वर्ष-सहस्त्राणि--हजारों वर्ष

ब्राह्मण-हन्ता को कालसूत्र नामक नरक में रखा जाता है, जिसकी परिधि अस्सी हजार मीलकी है और जो पूरे का पूरा ताम्बे से बना है।

इस लोक की ताम्र-सतह ऊपर से तपते सूर्य द्वाराऔर नीचे से अग्नि द्वारा तप्त होने से अत्यधिक गरम रहती है।

इस प्रकार ब्राह्मण का वध करनेवाला भीतर और बाहर से जलाया जाता है।

भीतर-भीतर वह भूख-प्यास से और बाहर सेझुलसा देने वाले सूर्य तथा ताम्र की सतह के नीचे की अग्नि से झुलसता रहता है।

अत: वहकभी लेटता है, कभी बैठता है, कभी खड़ा होता है और कभी इधर-उधर दौड़ता है।

इस प्रकारवह उतने हजार वर्षों तक यातना सहता रहता है जितने कि पशु-शरीर में रोमों की संख्या होती है।

यस्त्विह वै निजवेदपथादनापद्यपगतः पाखण्डं चोपगतस्तमसिपत्रवनं प्रवेश्य कशया प्रहरन्ति तत्रहासावितस्ततो धावमान उभयतो धारैस्तालवनासिपत्रैश्छिद्यमानसर्वाड्ो हा हतोस्मीति परमया वेदनयामूर्च्छितः पदे पदे निपतति स्वधर्महा पाखण्डानुगतं फल भुड़े ॥

१५॥

यः--जो कोई; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्संदेह; निज-वेद-पथात्‌--वेदों द्वारा बताये गये अपने पथ से;अनापदि--बिना आपात काल के; अपगतः--दूर हटा हुआ; पाखण्डम्‌--पाखण्डवाद; च--तथा; उपगत:--पास पहुँचा हुआ;तम्‌--उसको; असि-पत्रवनम्‌-- असिपत्रवन नामक नरक में; प्रवेश्य--प्रविष्ट कराकर; कशया--चाबुक से; प्रहरन्ति--पीटतेहैं; तत्र--वहाँ; ह--ही; असौ--वह; इतः ततः--इधर-उधर; धावमान:--दौड़ते हुए; उभयतः--दोनों ओर; धारैः--तीक्ष्णनौकों से; ताल-वन-असि-पत्रै:--ताड़ वृक्षों की तलवार जैसी पत्तियों से; छिद्यमान--छिदकर; सर्व-अड्डः--जिसका सम्पूर्णशरीर; हा-- हाय; हतः--मर गया; अस्मि--हूँ; इति--इस प्रकार; परमया--असहा; वेदनया--पीड़ा से; मूर्च्छित:--मूर्च्छित,संज्ञाशून्य; पदे पदे--प्रति पग पर; निपतति--गिर पड़ता है; स्व-धर्म-हा--अपने धर्म के नियमों का हन्ता; पाखण्ड-अनुगतम्‌'फलम्‌--नास्तिक पथग्रहण करने का फल; भुड्ढे --भोगता है, सहता है।

यदि कोई व्यक्ति किसी प्रकार की विपत्ति न होने पर भी वैदिक पथ से हटता है, तो यमराजके दूत उसे असिपत्रवन नामक नरक में ले जाकर कोड़ों से पीटते हैं।

जब वह अत्यधिक पीड़ाके कारण इधर-उधर दौड़ता है, तो उसे अपने चारों ओर तलवार के समान तीकण ताड़ वृक्षों कीपत्तियों के बीच छटपटाता है।

इस प्रकार पूरा शरीर क्षत-विक्षत होने से वह प्रति पग-पग पर मूर्च्छित होता रहता है और चीत्कार करता है, 'हाय! अब मैं क्‍या करूँ? मैं किस प्रकार सेबचूँ!' मान्य धार्मिक नियमों से विषथ होने का ऐसा ही दण्ड मिलता है।

ञयस्त्विह वै राजा राजपुरुषो वा अदण्ड्ये दण्डं प्रणयति ब्राह्मणे वा शरीरदण्डं स पापीयान्नरके मुत्रसूकरमुखे निपतति तत्रातिबलैर्विनिष्पिष्यमाणावयवो यथैवेहेक्षुखण्ड आर्तस्वरेण स्वनयन्क्वचिन्मूर्च्छित:कश्मलमुपगतो यथेवेहाहष्टदोषा उपरुद्धा: ॥

१६॥

यः--जो कोई; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; राजा--राजा; राज-पुरुष:--राजा का आदमी; वा--अथवा;अदण्ड्ये--अदण्डनीय को; दण्डम्‌--दण्ड; प्रणयति--देता है; ब्राह्णे--ब्राह्मण को; वा--अथवा; शरीर-दण्डमू--शारीरिकदण्ड; सः--वह व्यक्ति, राजा अथवा राज्याधिकारी; पापीयान्‌ू--पापी मनुष्यों को; नरके--नरक में; अमुत्र--अगले जन्म में;सूकरमुखे--सूकरमुख नरक में; निपतति--गिरता है; तत्र--वहाँ; अति-बलै:ः--अत्यन्त बलशाली यमदूतों द्वारा;विनिष्पिष्यमाण--कुचला जाकर; अवयव:--शरीर के विभिन्न अंग; यथा--सहृश; एव--ही; इह--यहाँ; इक्षु-खण्ड:--गन्नोंके टुकड़े; आर्त-स्वरेण--करूण स्वर से; स्वनयन्‌ू--चिल्लाते हुए; क्वचित्‌--कभी-कभी; मूच्छित:--मूर्च्छित होकर;'कश्मलम्‌ उपगतः --मोह ग्रस्त होकर; यथा--सहृश; एबव--निस्सन्देह; इह--यहाँ; अद्ृष्ट-दोषा:--जो दोषी नहीं है; उपरुद्धा: --दण्ड हेतु बन्दी बनाया गया।

अगले जन्म में यमदूत निर्दोष पुरुष या ब्राह्मण को शारीरिक दण्ड देने वाले पापी राजाअथवा राज्याधिकारी को सूकरमुख नामक नरक में ले जाते हैं जहाँ उसे यमराज के दूत उसीप्रकार कुचलते हैं जिस प्रकार गन्ने को पेर कर रस निकाला जाता है।

जिस प्रकार से निर्दोषव्यक्ति दण्डित होते समय अत्यन्त दण्डनीय ढंग से चिललाता है और मूर्च्छित होता है ठीक उसीतरह पापी जीवात्मा भी आर्तनाद करता एवं मूर्च्छित होता है।

निर्दोष व्यक्ति को दण्ड देकरपीड़ित करने का यही फल है।

यस्त्विह वै भूतानामी श्ररोपकल्पितवृत्तीनामविविक्तपरव्यथानां स्वयं पुरुषोपकल्पितवृत्तिर्विविक्तपरव्यथोव्यथामाचरति स परत्रान्थकूपे तदभिद्रोहेण निपतति तत्र हासौ तैर्जन्तुभिःपशुमृगपश्षिसरीसूपर्मशकयूकामत्कुणमक्षिकादिभियें के चाभिद्वुग्धास्तैः सर्वतोभिद्गुह्ममाणस्तमसिविहतनिद्रानिर्वृतिरलब्धावस्थान: परिक्रामति यथा कुशरीरे जीव: ॥

१७॥

यः--जो कोई; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; भूतानामू--कुछ जीवात्माओं को; ईश्वर--परम नियन्ता द्वारा;उपकल्पित--बनाया गया; वृत्तीनामू--जिनकी जीविका; अविविक्त--न जानते हुए; पर-व्यथानाम्‌--पर-पीड़ा; स्वयम्‌-- अपनेआप; पुरुष-उपकल्पित-- श्रीभगवान्‌ द्वारा निर्मित; वृत्तिः--जिनकी जीविका; विविक्त--जानते हुए; पर-व्यथ: --पर पीड़ा;व्यथाम्‌ आचरति--तो भी पीड़ा पहुँचाता है; सः--ऐसा व्यक्ति; परत्र--अगले जन्म में; अन्धकूपे--अन्धकूप नरक में; तत्‌--उनको; अभिद्रोहेण --द्रोह करने से; निपतति--गिरता है; तत्र--वहाँ; ह--निस्सन्देह; असौ--वह व्यक्ति; तैः जन्तुभि:--उन-उनजीवों द्वारा; पशु--पशु; मृग--जंगली जानवर; पक्षि--पक्षी; सरीसूपै: --सर्प; मशक--मच्छर; यूका--जूँ; मत्कुण-- कीड़े;मक्षिक-आदिभि:--मक्खी आदि; ये के--अन्य जितने; च--और; अभिद्गुग्धा:--दण्डित; तैः--उनके द्वारा; सर्वतः--सर्वत्र;अभिव्गुद्यमाण:--पीड़ा पहुँचाये हुए; तमसि--अंधकार में; विहत--विदश्लुब्ध; निद्रा-निर्वृति:--जिनके वासस्थान; अलब्ध--प्राप्त न होने वाले; अवस्थान:--आवास; परिक्रामति--घूमता है; यथा--जिस प्रकार; कु-शरीरे--निम्न योनि के देह में;जीव:--जीव

परमेश्वर की व्यवस्था से खटमल तथा मच्छर जैसे निम्न श्रेणी के जीव मनुष्यों तथा अन्यपशुओं का रक्त चूसते हैं।

इन तुच्छ प्राणियों को इसका ज्ञान नहीं होता है कि उनके काटने सेमनुष्यों को पीड़ा होती होगी।

किन्तु उच्च श्रेणी के मुनष्यों--यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य--में चेतना विकसित रूप में होती है, अतः वे जानते हैं कि किसी का प्राणघात करना कितनाकष्टदायक है।

यदि ज्ञानवान होते हुए भी मनुष्य विवेकहीन तुच्छ प्राणियों को मारता है यासताता है, तो वह निश्चय ही पाप करता है।

श्रीभगवान्‌ ऐसे मनुष्य को अन्धकूप में रखकरदण्डित करते हैं जहाँ उसे वे समस्त पक्षी तथा पशु, सर्प, मच्छर, जूँ, कीड़े, मक्खियाँ तथा अन्यप्राणी, जिनको उसने अपने जीवनकाल में सताया था, उस पर चारों ओर से आक्रमण करते हैं और उसकी नींद हराम कर देते हैं।

आराम न कर सकने के कारण वह अंधकार में घूमता रहताहै।

इस प्रकार अन्धकूप में उसे वैसी ही यातना मिलती है जैसी कि निम्न योनि के प्राणी को।

तेयस्त्विह वा असंविभज्याश्नाति यत्किज्लननोपनतमनिर्मितपञ्ञयज्ञो वायससंस्तुतः स परत्र कृमिभोजनेनरकाधमे निपतति तत्र शतसहस्त्रयोजने कृमिकुण्डे कृमिभूतः स्वयं कृमिभिरेव भक्ष्यमाण: कृमिभोजनोयावत्तदप्रत्ताप्रहूतादो उनिर्वेशमात्मानं यातयते ॥

१८ ॥

यः--कोई व्यक्ति जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वा-- अथवा; असं-विभज्य--बिना बाँटे; अश्नाति--खाता है; यत्‌किज्लन--जो भी; उपनतम्‌-- श्रीकृष्ण की कृपा से प्राप्त; अनिर्मित--बिना किये हुए; पश्ञ-यज्ञ:--पाँच प्रकार के यज्ञ;वायस--कौवे; संस्तुत:ः--सम रूप में वर्णित; सः--ऐसा पुरुष; परत्र--अगले जन्म में; कृमिभोजने--कृमिभोजन लोक में;नरक-अधमे--अत्यन्त निकृष्ट नरक में; निपतति--गिरता है; तत्र--वहाँ; शत-सहस्त्र-योजने-- १, ००,००० योजन वाले(८,००,००० मील वाले ); कृमि-कुण्डे--कीड़ों के कुंड में; कृमि-भूतः--कीड़ों में से एक बनना; स्वयमू--स्वयं;कृमिभि:--अन्य कीड़ों के द्वारा; एव--निश्चय ही; भक्ष्यमाण: -- भक्षित होकर; कृमि-भोजन: -- खाद्य कीड़े; यावत्‌--जहाँतक; तत्‌--वह कुंड चौड़ा है; अप्रत्त-अप्रहूत--बिना बाँटा और बिना दिया हुआ भोजन; अदः--जो खाता है; अनिर्वेशम्‌--जिसने परिशोध नहीं किया; आत्मानम्‌--अपने आपको; यातयते--पीड़ा पहुँचाता है।

जो मनुष्य कुछ भोजन प्राप्त होने पर उसे अतिथियों, वृद्ध पुरुषों तथा बच्चों को न बाँट करस्वयं खा जाता है अथवा बिना पंचयज्ञ किये खाता है, उसे कौवे के समान मानना चाहिए मृत्यु के बाद वह सबसे निकृष्ट नरक कृमिभोजन में रखा जाता है।

इस नरक में एक लाख योजन(८,००,००० मील वाले ) विस्तृत वाला कीड़ों से परिपूर्ण एक कुंड है।

वह इस कुंड में कीड़ाबनकर रहता है और दूसरों कीड़ों को खाता है और ये कीड़े उसे खाते हैं।

जब तक वह पापीअपने पापों का प्रायश्चित नहीं कर लेता, तब तक वह कृमिभोजन के नारकीय कुंड में उतने वर्षोंतक पड़ा रहता है, जितने योजन इस कुंड की चौड़ाई है।

यस्त्विह वै स्तेयेन बलाद्वा हिरण्यरत्लादीनि ब्राह्मणस्य वापहरत्यन्यस्य वानापदि पुरुषस्तममुत्रराजन्यमपुरुषा अयस्मयैरग्निपिण्डै: सन्दंशैस्त्वचि निष्कुषन्ति ॥

१९॥

यः--कोई व्यक्ति जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै-- निस्सन्देह; स्तेयेन--चोरी से; बलात्‌ू--बलपूर्वक; वा--अथवा;हिरण्य--सोना; रत्त--रल; आदीनि--३इ त्यादि; ब्राह्मणस्य--ब्राह्मण का; वा--अथवा; अपहरति--चुराता है; अन्यस्य--अन्योंका; वा--या; अनापदि--आपत्ति के समय नहीं; पुरुष: --व्यक्ति; तमू--उसको; अमुत्र--अगले जीवन में; राजन्‌ू--हे राजा;यम-पुरुषा:--यमराज के दूत; अयः-मयै:--लोहे से निर्मित; अग्नि-पिण्डै:-- अग्नि में तप्त किये गये गोलों से; सन्दंशै:--संडसी से; त्वचि--चमड़ी पर; निष्कृुषन्ति--टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं।

हे राजन, जो पुरुष आपत्तिकाल न होने पर भी ब्राह्मण अथवा अन्य किसी के रत्न तथासोना लूट लेता है, वह सन्दंश नामक नरक में रखा जाता है।

वहाँ पर उसकी चमड़ी संडसी औरलोहे के गरम पिंडों से उतारी जाती है।

इस प्रकार उसका पूरा शरीर खण्ड-खण्ड कर दिया जाताहै।

यस्त्विह वा अगम्यां स्त्रियमगम्यं वा पुरुष योषिदभिगच्छति तावमुत्र कशया ताडयन्तस्तिग्मया सूर्म्यालोहमय्या पुरुषमालिड्डयन्ति स्त्रियं च पुरुषरूपया सूर्म्या ॥

२०॥

यः--जो कोई; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; बा--अथवा; अगम्याम्‌--अनुपयुक्त; स्त्रियम्‌--स्त्री को; अगम्यम्‌-- अगम्य;वा--अथवा; पुरुषम्‌-पुरुष को; योषित्‌--स्त्री; अभिगच्छति--संभोग के लिए पास जाते हैं; तौ--वे दोनों; अमुत्र--अगलेजीवन में; कशया--कोड़ों से; ताडयन्त:--पीटते हुए; तिग्मया--अत्यन्त तप्त; सूर्म्या--मूर्ति द्वारा; लोह-मय्या--लोह सेनिर्मित; पुरुषम्‌-पुरुष; आलिड्डयन्ति--आलिंगन करते हैं; स्त्रियम्‌--स्त्री को; च-- भी; पुरुष-रूपया--पुरुष के रूप में;सूर्म्या--मूर्ति द्वारा

यदि कोई पुरुष या स्त्री विपरीत लिंग वाले अगम्य सदस्य के साथ संभोग करते हैं, तो मृत्युके बाद यमराज के दूत उसे तप्तसूर्मि नामक नरक में दण्ड देते हैं।

वहाँ पर ऐसे पुरुष तथा स्त्रियाँकोड़े से पीटे जाते हैं।

पुरुष को तप्तलोह की बनी स्त्री से और स्त्री को ऐसी ही पुरुष-प्रतिमा सेआलिंगित कराया जाता है।

व्यभिचार के लिए ऐसा ही दण्ड है।

यस्त्विह वै सर्वाभिगमस्तममुत्र निरये वर्तमानं वज़कण्टकशाल्मलीमारोप्य निष्कर्षन्ति ॥

२१॥

यः--जो कोई; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; सर्व-अभिगम:--विवेकहीन होकर पशुओं तथा मनुष्यों केसाथ मैथुन करता है; तम्‌--उसको; अमुत्र--अगले जन्म में; निरये--नरक में; वर्तमानम्‌--विद्यमान; वज़्कण्टक-शाल्मलीम्‌--वज़ के समान काँटों वाला सेमल वृक्ष पर; आरोप्य--चढ़ाकर; निष्कर्षन्ति--नीचे की ओर खींचते हैं |

जो व्यक्ति विवेकहीन होकर--यहाँ तक कि पशुओं के साथ भी--व्यभिचार करता है उसेमृत्यु के बाद वज़्कंटकशाल्मली नामक नरक में ले जाया जाता है।

इस नरक में वज्ञ के समानकठोर काँटों वाला सेमल का वृक्ष है।

यमराज के दूत पापी पुरुष को इस वृक्ष से लटका देते हैंऔर घसीटकर नीचे की ओर खींचते हैं जिससे काँटों के द्वारा उसका शरीर बुरी तरह चिथड़जाता है।

ये त्विह वै राजन्या राजपुरुषा वा अपाखण्डा धर्मसेतून्भिन्दन्ति ते सम्परेत्य बैतरण्यां निपतन्तिभिन्नमर्यादास्तस्यां निरयपरिखाभूतायां नद्यां यादोगणैरितस्ततो भक्ष्यमाणा आत्मना नवियुज्यमानाश्चासुभिरुह्ममाना: स्वाघेन कर्मपाकमनुस्मरन्तोविष्मूत्रपूपषशोणितकेशनखास्थिमेदोमांसवसावाहिन्यामुपतप्यन्ते ॥

२२॥

ये--जो पुरुष; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; राजन्या:--राज परिवार के सदस्य अथवा क्षत्रिय; राज-पुरुषा:--राज्याधिकारी; वा--अथवा; अपाखण्डा: --यद्यपि श्रेष्ठ कुलों में जन्म लेता है; धर्म-सेतून्‌ू--निर्दिष्ट धार्मिक नियमोंकी मर्यादाएँ; भिन्दन्ति--उल्लंघन करते हैं; ते--वे; सम्परेत्य--मरने के पश्चात्‌; बैतरण्याम्‌--वैतरणी में; निपतन्ति--गिर पड़तेहैं; भिन्न-मर्यादाः--जिन्होंने विधि विधानों को तोड़ दिया है; तस्याम्‌--उसमें; निरय-परिखा-भूतायाम्‌--नरक को घेरने वालीखाई; नद्यामू--नदी में; याद:-गणै:--हिंस्त्र जल-जीवों द्वारा; इतः ततः--इधर-उधर; भक्ष्यमाणा:--खाया जाकर; आत्मना--शरीर से; न--नहीं; वियुज्यमाना:--विलग किया जाकर; च--तथा; असुभि:--प्राणवायु द्वारा; उह्ममाना: --ले जाया जाकर;स्व-अधेन--अपने ही पाप कर्मो के द्वारा; कर्म-पाकम्‌--कुकर्मों का फल; अनुस्मरन्त:--स्मरण करते हुए; विट्‌ू--मल; मूत्र--मूत्र; पूथ--पीब; शोणित--रक्त; केश--बाल; नख--नाखून; अस्थि--हड्डियाँ; मेद: --मज्जा; मांस--मांस; बसा--चर्बी ;वाहिन्यामू--नदी में; उपतप्यन्ते-- सन्तप्त होते रहते हैं

जो मनुष्य श्रेष्ठ कुल--यथा क्षत्रिय, राज परिवार या अधिकारी वर्ग--में जन्म ले करकेनियत नियमों के पालन की अवहेलना करता है और इस प्रकार से अधम बन जाता है, वह मृत्युके समय वैतरणी नामक नरक की नदी में जा गिरता है।

यह नदी नरक को घेरने वाली खाईं केसमान है और अत्यन्त हिंस्त्र जलजीवों से पूर्ण है।

जब पापी मनुष्य को वैतरणी नदी में फेंकाजाता है, तो जल के जीव उसे तुरन्त खाने लगते हैं और पापमय शरीर होने के कारण वह अपनेशरीर को त्याग नहीं पाता।

वह निरन्तर अपने पापमय कर्मों को स्मरण करता है और मल, मूत्र,पीब, रक्त, केश, नख, हड्डी, मज्जा, मांस तथा चर्बी से भरी हुई उस नदी में अत्यधिक यातनाएँपाता है।

ये त्विह वै वृषलीपतयो नष्टशौचाचारनियमास्त्यक्तलज्ञा: पशुचर्या चरन्ति ते चापि प्रेत्य'पूयविप्मूत्रएलेष्ममलापूर्णार्णवे निपतन्ति तदेवातिबीभत्सितमएनन्ति ॥

२३॥

ये--जो पुरुष; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; बै--निस्सन्देह; वृषली-पतयः--शूद्रों के पति; नष्ट--नष्ट; शौच-आचार-नियमा:--सफाई, अच्छा आचरण और नियमित जीवन; त्यक्त-लज्जा:--लज्जारहित; पशु-चर्यामू--पशुओं का आचरण;चरन्ति--पालन करते हैं; ते--वे; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; प्रेत्य--मरकर; पूय--पीब; विट्‌ू--मल; मूत्र--मूत्र; एलेष्प--इलेष्मा; मला--लार; पूर्ण--भरा हुआ; अर्णवे--समुद्र में; निपतन्ति--गिरते हैं; तत्‌--वह; एव--एकमात्र; अतिबीभत्सितम्‌--अत्यन्त बीभत्स ( घृणित ); अश्नन्ति-- भोजन करते हैं।

निम्नकुल में जन्मी शूद्र स्त्रियों के निर्लज् पति पशुओं की भाँति रहते हैं, अतः उनमेंआचरण, शुचिता या नियमित जीवन का अभाव रहता है।

ऐसे व्यक्ति मृत्यु के पश्चात्‌ पूयोदनामक नरक में फेंक दिये जाते हैं जहाँ वे मल, पीब, एलेष्मा, लार तथा ऐसी ही अन्य वस्तुओं सेपूर्ण समुद्र में रखे जाते हैं।

जो शूद्र अपने को नहीं सुधार पाते वे इस सागर में गिरकर इन घृणितवस्तुओं को खाने के लिए बाध्य किये जाते हैं।

ये त्विह वै श्वगर्दभपतयो ब्राह्मणादयो मृगया विहारा अतीर्थे च मृगान्निध्नन्ति तानपिसम्परेतॉल्लक्ष्यभूतान्यमपुरुषा इषुभिर्विध्यन्ति ॥

२४॥

ये--वे जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; बै--या; श्व--कुत्तों; गर्दभ--तथा गधे के; पतय: --स्वामी; ब्राह्मण-आदय: --ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य; मृगया विहाराः:--वन में आखेट करने में रुचि दिखाने वाले; अतीर्थे--बताये हुए से इतर; च-- भी;मृगान्‌ू--पशुओं को; निष्तन्ति--मारते हैं; तान्‌ू--उनको; अपि--निस्सन्देह; सम्परेतान्‌ू--मर कर; लक्ष्य-भूतान्‌ू-- लक्ष्यबनाकर; यम-पुरुषा: --यमराज के दूत; इषुभि:--तीरों द्वारा; विध्यन्ति--बीं धते हैं|

यदि इस जीवन में उच्च वर्ग का मनुष्य ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) कुत्ते, गधे तथा खच्चरपालता है और उन्हें जंगल में आखेट करने तथा वृथा ही पशुओं को मारने में अत्यधिक रुचिलेता है, तो मृत्यु के पश्चात्‌ वह प्राणरोध नामक नरक में डाला जाता है।

वहाँ पर यमराज के दूतउसे लक्ष्य बनाकर अपने तीरों से बेध डालते हैं।

ये त्विह वै दाम्भिका दम्भयज्ञेषु पशून्विशसन्ति तानमुष्मिललोके बैशसे नरके पतितान्निरयपतयोयातयित्वा विशसन्ति ॥

२५॥

ये--जो पुरुष; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; बै--निस्सन्देह; दाम्भिका: --सम्पत्ति तथा प्रतिष्ठा से गर्वित; दम्भ-यज्ञेषु--प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किये गये यज्ञ में; पशूनू--पशुओं को; विशसन्ति--मारते हैं; तान्‌--उनको; अमुष्मिन्‌ लोके--अगलेजगत में; वैशसे--वैशस या विशसन; नरके--नरक में; पतितानू--गिरे हुए; निरय-पतय: --यमराज के दूत; यातयित्वा-- प्रचुरपीड़ा प्रदान करके; विशसन्ति--मार डालते हैं।

जो व्यक्ति इस जन्म में अपने ऊँचे पद पर गर्व करता है और केवल भौतिक प्रतिष्ठा के लिएपशुओं की बलि चढ़ाता है, उसे मृत्यु के पश्चात्‌ वैशसन नामक नरक में रखा जाता है।

वहाँ यमके दूत उसे अपार कष्ट देकर अन्त में उसका वध कर देते हैं।

यस्त्विह वै सवर्णा भार्या द्विजो रेत: पाययति काममोहितस्तं पापकृतममूुत्र रेतःकुल्यायां पातयित्वा रेतःसम्पाययन्ति ॥

२६॥

यः--जो कोई; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; सवर्णाम्‌--उसी जाति की; भार्याम्‌--अपनी पत्नी को;द्विज:--उच्च जाति का व्यक्ति ( यथा ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ); रेतः--वीर्य; पाययति--पीने को बाध्य करता है; काम-मोहित:--काम से मोहित; तम्‌--उसको; पाप-कृतम्‌--पाप करते हुए; अमुत्र--अगले जन्म में ; रेत:-कुल्यायाम्‌--वीर्य कीनदी में; पातयित्वा--फेंककर; रेत:--वीर्य ; सम्पाययन्ति--पीने को बाध्य करते हैं।

यदि कोई मूर्ख द्विज ( ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य ) भोगेच्छा से अपनी पत्ती को अपने वशमें रखने के लिए उसे अपना वीर्य पीने को बाध्य करता है, तो मृत्यु के पश्चात्‌ उसे लालाभक्षनरक में रखा जाता है।

वहाँ उसे वीर्य की नदी में डाल कर वीर्य पीने को विवश किया जाता है।

ये त्विह वै दस्यवोग्निदा गरदा ग्रामान्सार्थान्वा विलुम्पन्ति राजानो राजभटा वा तांश्वापि हि परेत्ययमदूता वच्जदंष्टा: ध्वान: सप्तशतानि विंशतिश्व सरभसं खादन्ति ॥

२७॥

ये--जो व्यक्ति; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; दस्यवः:--चोर तथा डाकू; अग्नि-दाः:--आग लगाने वाले;गरदाः--विष पिलाने वाले; ग्रामान्‌ू--गाँवों को; सार्थान्‌ू--वणिक वर्ग को; वा--अथवा; विलुम्पन्ति--लूटते हैं; राजान:--राजा; राज-भटा:-- अधिकारी जन; वा--अथवा; तान्‌--उनको; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; परेत्य--मरनेपर; यमदूता:--यमराज के दूतगण; वज्ज-दंष्टाः--कठोर दाँतों वाले; श्रान:--कुत्ते; सप्त-शतानि--सात सौ; विंशति:ः--बीस;च--और; सरभसम्‌-- भूक्खड़तापूर्वक ; खादन्ति--निगल जाते हैं।

इस जगत में कुछ लोगों का व्यवसाय ही लूटपाट करना है जो दूसरों के घरों में आग लगातेहैं अथवा उन्हें विष देते हैं।

यही नहीं, राज्य-अधिकारी कभी-कभी वणिक जनों को आयकरअदा करने पर विवश करके तथा अन्य विधियों से लूटते हैं।

मृत्यु के पश्चात्‌ ऐसे असुरों कोसारमेयादन नामक नरक में रखा जाता है।

उस नरक में सात सौ बीस कुत्ते हैं जिनके दाँत वज्के समान कठोर हैं।

ये कुत्ते यमराज के दूतों के आदेश पर ऐसे पापीजनों को भूके भेड़ियों कीभाँति निगल जाते हैं।

यस्त्विह वा अनृतं वदति साक्ष्ये द्रव्यविनिमये दाने वा कथज्ञित्स वै प्रेत्य नरके वीचिमत्यध:शिरानिरवकाशे योजनशतोच्छायादिगरिमूर्ध्न: सम्पात्यते यत्र जलमिव स्थलमएमपृष्ठमवभासतेतदवीचिमत्तिलशो विशीर्यमाणशरीरो न प्नियमाण: पुनरारोपितो निपतति, ॥

२८॥

यः--जो; तु-- लेकिन; इह--इस जीवन में; वा--अथवा; अनृतम्‌--असत्य, झूठ; वदति--बोलता है; साक्ष्ये--साक्षी देने में;द्र॒व्य-विनिमये--वस्तुओं के आदान-प्रदान में; दाने--दान देने में; वा--अथवा; कथज्ित्‌--किसी प्रकार; सः--वह व्यक्ति;वै--निस्संदेह; प्रेत्मय--मरकर; नरके--नरक में; अवीचिमति--अवीचिमत्‌ नामक ( जिसमें जल नहीं है ); अध:-शिरा: --अधोमुख; निरवकाशे--आधारहीन; योजन-शत--आठ सौ मील की; उच्छायात्‌--ऊँचाई वाला; गिरि--पर्वत की; मूर्ध्न:--चोटी से; सम्पात्यते--फेंक दिया जाता है; यत्र--जहाँ; जलम्‌ इब--जल सहश; स्थलम्‌--स्थल, भूमि; अश्म-पृष्ठम्‌--पथरीलीसतह वाले; अवभासते--प्रतीत होता है; तत्‌ू--वह; अवीचिमत्‌--बिना जल या लहरों वाला; तिलशः--तिल के बीजों सहृशसूक्ष्म खंडों में; विशीर्यमाण--फाड़ा जा करके; शरीर: --देह; न प्रियमाण:--न मरने वाले; पुन:--फिर; आरोपित:--चोटीतक उठा हुआ; निपतति--नीचे गिरती है।

इस जीवन में जो व्यक्ति किसी की झूठी गवाही देने, व्यापार करते अथवा दान देते समयकिसी भी तरह का झूठ बोलता है, वह मरने पर यमराज के दूतों द्वारा बुरी तरह से प्रताड़ितकिया जाता है।

ऐसा पापी व्यक्ति आठ सौ मील ऊँचे पर्वत की चोटी से मुँह के बल अवीचिमत्‌नामक नरक में नीचे फेंक दिया जाता है।

इस नरक का कोई आधार नहीं होता और उस कीपथरीली भूमि जल की लहरों के समान प्रतीत होती है, किन्तु इसमें जल नहीं है; इसलिए इसेअवीचिमत्‌ ( जलरहित ) कहा गया है।

वहाँ से बारम्बार गिराये जाने से उस पापी व्यक्ति के शरीरके छोटे छोटे टुकड़े हो जाने पर भी प्राण नहीं निकलते और उसे बारम्बार दण्ड सहना पड़ता है।

यस्त्विह वै विप्रो राजन्यो वैश्यो वा सोमपीथस्तत्कलत्रं वा सुरां ब्रतस्थोपि वा पिबति प्रमादतस्तेषांनिरयं नीतानामुरसि पदाक्रम्यास्थे वह्ििना द्रवमाणं कार्ष्णायसं निषिज्ञन्ति ॥

२९॥

यः--जो; तु-- लेकिन; इह--इस जीवन में; बै--निस्सन्देह; विप्र:--विद्वान ब्राह्मण; राजन्य: --क्षत्रिय; वैश्य: -- वैश्य; वा--अथवा; सोम-पीथ:--सोमरस पान करते हैं; तत्‌--उसकी; कलत्रम्‌--स्त्री; वा-- अथवा; सुराम्‌ू--मदिरा; ब्रत-स्थ:--ब्रतरखने वाला; अपि--निश्चय ही; वा--अथवा; पिबति--पीता है; प्रमादतः--मोहवश; तेषाम्‌--उन सबों को; निरयम्‌--नरकतक; नीतानामू--लाया जाकर; उरसि--वक्षस्थल पर; पदा--पैर से; आक्रम्य--प्रहार कर; अस्ये--मुँह में; वह्निना-- अग्नि से;द्रवमाणम्‌--पिघलाया; कार्ष्णायसम्‌ू--लोह; निषिश्जन्ति--उड़ेलते हैं |

जो ब्राह्मणी या ब्राह्मण मद्यपान करता है उसे यमराज के दूत अयःपान नामक नरक में लेजाते हैं।

यदि कोई क्षत्रिय, वैश्य अथवा व्रत धारण करने वाला मोहवश सोमपान करता है, तोवह भी इस नरक में स्थान पाता है।

अयःपान नरक में यम के दूत उनकी छाती पर चढ़ कर उनकेमुँह के भीतर तप्त पिघला लोहा उड़ेलते हैं।

अथ च यस्त्विह वा आत्मसम्भावनेन स्वयमधमो जन्मतपोविद्याचारवर्णा श्रमवतो वरीयसो न बहु मन्येतस मृतक एव मृत्वा क्षारकर्दमे निरयेउवाक्शिरा निपातितो दुरन्ता यातना हाशनुते ॥

३०॥

अथ--आगे; च-- भी; यः--जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वा--या; आत्म-सम्भावनेन--झूठी प्रतिष्ठा से; स्वयम्‌--स्वयं; अधम:--अत्यन्त नीच; जन्म--जन्म; तप:--तप; विद्या--ज्ञान; आचार--सद-आचरण ; वर्ण-आश्रम-वत:--वर्णा श्रमके नियमों का कठोरता से पालन करते हुए; वरीयस:--अधिक आदरणीय का; न--नहीं; बहु--अधिक; मन्येत--आदर करताहै; सः--वह; मृतक:--मृत शरीर; एव--मात्र; मृत्वा--मरने के बाद; क्षारकर्दमे--क्षारकर्दम नामक; निरये--नरक में;अवाक्‌-शिरा--अधोमुख; निपातित: --गिराया जाकर; दुरन्ता: यातना: --अत्यन्त वेदनामयी स्थिति; हि--निस्सन्देह; अश्नुते--भोगता है।

जो निम्न जाति में उत्पन्न होकर घृणित होते हुए भी इस जीवन में यह सोच कर झूठा गर्वकरता है कि 'मैं महान्‌ हूँ' और उच्च जन्म, तप, शिक्षा, आचार, जाति अथवा आश्रम में अपनेसे बड़ों का उचित आदर नहीं करता वह इसी जीवन में मृत-तुल्य है और मृत्यु के पश्चात्‌क्षारकर्दम नरक में सिर के बल नीचे गिराया जाता है।

वहाँ उसे यमदूतों के हाथों से अत्यन्तकठिन यातनाएँ सहनी पड़ती हैं।

ये त्विह वै पुरुषा: पुरुषमेधेन यजन्ते याश्व स्त्रियो नृपशून्खादन्ति तांश्व ते पशव इव निहता यमसदनेयातयन्तो रक्षोगणा: सौनिका इव स्वधितिनावदायासूक्पिबन्ति नृत्यन्ति च गायन्ति च हृष्यमाणा यथेहपुरुषादा: ॥

३१॥

ये--जो व्यक्ति; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; पुरुषा: --व्यक्ति; पुरुष-मेधेन--नरबलि द्वारा; यजन्ते--आराधना ( देवी काली या भद्गरकाली की ) करते हैं; या:--जो; च--तथा; स्त्रियः--स्त्रियाँ; नू-पशून्‌--बलि चढ़ाये जाने वालेमनुष्य; खादन्ति--खाते हैं; तानू--उनको; च--तथा; ते--वे; पशव: इब--पशुओं के सहृश; निहताः--मारे जाकर; यम-सदने--यमराज के धाम में; यातयन्त:ः--दण्ड देते हुए; रक्ष:-गणा:--राक्षस होकर; सौनिका:--मानने वाले; इब--इहश;स्वधितिना--तलवार से; अवदाय--खण्ड-खण्ड करके; असृक्‌ू--रक्त; पिबन्ति-- पीते हैं; नृत्यन्ति--नाचते हैं; च--तथा;गायन्ति- गाते हैं; च-- भी; हष्यमाणा: -- प्रसन्न होकर; यथा--जिस प्रकार; इह--इस लोक में; पुरुष-अदा: --मनुष्य-भक्षी |

इस संसार में ऐसे भी पुरुष तथा स्त्रियाँ हैं, जो भेरव या भद्रकाली को नर-बलि चढ़ाकरअपने द्वारा बलि किए गये शिकार का मांस खाते हैं।

ऐसे यज्ञ करने वालों को मृत्यु के पश्चात्‌यमलोक में ले जाया जाता है जहाँ उनके शिकार ( मारे गये व्यक्ति ) राक्षत का रूप धारणकरके अपनी तेज तलवारों से उनके टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं।

जिस प्रकार इस लोक में नर-भक्षकों ने नाचते गाते हुए अपने शिकार का रक्तपान किया था उसी तरह उनके शिकार अबअपने वध करने वालों का रक्तपान करके आनन्दित होते हैं।

ये त्विह वा अनागसोरण्ये ग्रामे वा वैश्रम्भकैरुपसूतानुपवि श्रम्भय्यजिजीविषून्शूलसूत्रादिषूपप्रोतानक्री डनकतया यातयन्ति तेपि च प्रेत्य यमयातनासु शूलादिषु प्रोतात्मानःक्षुत्तृड्भ्यां चाभिहता: कड्डृवटादिभिश्वेतस्ततस्तिग्मतुण्डैराहन्यमाना आत्मशमलं स्मरन्ति ॥

३२॥

ये--जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वा--अथवा; अनागसः--निर्दोष; अरण्ये--वन में; ग्रामे--गाँव में; वा-- अथवा;वैश्रम्भकै:-- श्रद्धा के द्वारा; उपसृतान्‌ू--पास लाये जाकर; उपविश्रम्भय्य--विश्वास के साथ प्रेरणा देकर; जिजीविषूनू--जोरक्षित होना चाहते हैं; शूल-सूत्र-आदिषु--बर्छा, धागा आदि पर; उपप्रोतान्‌--लगा हुआ; क्रीडनकतया--गेंद के सहश;यातयन्ति--पीड़ा पहुँचाते हैं; ते--वे पुरुष; अपि--निश्चय ही; च--तथा; प्रेत्य--मरने के पश्चात्‌; यम-यातनासु--यमराज कीयातनाएँ; शूल-आदिषु--बर्छ आदि पर; प्रोत-आत्मान:--जिनके शरीर जड़ दिये गये हैं; क्षुत्‌-तृड्भ्याम्‌-- भूख तथा प्यास से;च--भी; अभिहता:--अभिभूत; कड्ढू-बट-आदिभि:--बगुला तथा गीध जैसे पक्षियों द्वारा; च--तथा; इतः ततः--इधर-उधर;तिग्म-तुण्डै:--तीखी चोंचों वाले; आहन्यमाना: --मारे जाकर; आत्म-शमलम्‌--अपने पापकर्मों को; स्मरन्ति--स्मरण करतेहैं।

इस जीवन में कुछ व्यक्ति गाँव या वन में रक्षा के लिए आये हुए पशुओं तथा पक्षियों कोशरण देते हैं और उन्हें अपनी सुरक्षा का विश्वास हो जाने के बाद उन्हें बर्छ या डोरे में फाँस करघोर पीड़ा पहुँचाकर उनसे खिलौने जैसा खेलते हैं।

ऐसे व्यक्ति मृत्यु के पश्चात्‌ यमराज के दूतोंद्वारा शूलप्रोत नामक नरक में ले जाये जाते हैं जहाँ उनके शरीरों को तीक्ष्ण नुकीले भालों सेछेदा जाता है।

वे भूख तथा प्यास से तड़पते रहते हैं और उनके शरीरों को गीध तथा बगुले जैसेतीक्ष्ण चोंच वाले पक्षी चारों ओर से नोंचते हैं।

इस प्रकार से यातना पाकर उन्हें पूर्वजन्म में कियेगये पाप-कर्मों का स्मरण होता है।

ये त्विह वै भूतान्युद्रेजयन्ति नरा उल्बणस्वभावा यथा दन्दशूकास्तेपि प्रेत्य नरके दन्दशूकाख्ये निपतन्तियत्र नूप दन्‍्दशूकाः पञ्ञमुखा: सप्तमुखा उपसूत्य ग्रसन्‍्ति यथा बिलेशयान्‌, ॥

३३॥

ये--जो; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वै--निस्सन्देह; भूतानि--जीवात्माओं को; उद्देजयन्ति--वृथा ही पीड़ा पहुँचाते हैं;नराः--मनुष्य; उल्बण-स्वभावा: -- स्वभाव से क्रोधी; यथा--जिस प्रकार; दन्दशूका: --सर्प; ते--वे; अपि-- भी; प्रेत्य-- मरनेके बाद; नरके--नरक में; दन्‍्दशूक-आख्ये--दन्दशूक नामक; निपतन्ति--गिरते हैं; यत्र--जहाँ; नृप--हे राजन; दन्दशूका:--सर्प; पश्च-मुखा:--पाँच फणों वाले; सप्त-मुखा:--सात फण वाले; उपसृत्य--ऊपर पहुँच कर; ग्रसन्ति--खा जाते हैं; यथा--जिस तरह; बिलेशयान्‌--चूहों को

जो व्यक्ति इस जीवन में ईर्ष्यालु सर्पों के समान क्रोधी स्वभाव वाले अन्य जीवों को पीड़ापहुँचाते हैं, वे मृत्यु के पश्चात्‌ दन्दशूक नामक नरक में गिरते हैं।

हे राजन, इस नरक में पाँच यासात फण वाले सर्प हैं, जो इन पापात्माओं को उसी प्रकार खा जाते हैं जिस प्रकार चूहों को सर्पखाते हैं।

ये त्विह वा अन्धावटकुसूलगुहादिषु भूतानि निरुन्धन्ति तथामुत्र तेष्वेबोपवेश्य सगरेण वह्विना धूमेननिरुन्धन्ति ॥

३४॥

ये--जो पुरुष; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वा--अथवा; अन्ध-अवट--अंधकूप; कुसूल--अन्न भण्डार, खत्ती; गुह-आदिषु--तथा गुफाओं आदि में; भूतानि--जीवात्माओं को; निरुन्‍्धन्ति--रोके रखते हैं, बन्दी बनाए रखते हैं; तथा--उसीप्रकार; अमुत्र--अगले जीवन में; तेषु--उन-उन स्थानों में; एब--निश्चय ही; उपवेश्य--घुसाकर; सगरेण--विषाक्त धुएँ से;वहिना--अग्नि से; धूमेन-- धुआँ से; निरुन्धन्ति-- बन्दी बनाए रखते हैं।

जो व्यक्ति इस जीवन में अन्य जीवों को अन्धे कुएँ, खत्ती या पर्वत की गुफाओं में बन्दीबनाकर रखते हैं, वे मृत्यु के पश्चात्‌ अवट-निरोधन नामक नरक में रखे जाते हैं।

वहाँ वे स्वयंअंधे कुओं में धकेल दिये जाते हैं, जहाँ विषैले धुएँ से उनका दम घुटता है और वे घोर यातनाएँउठाते हैं।

यस्त्विह वा अतिथीनभ्यागतान्वा गृहपतिरसकृदुपगतमन्युर्दिधक्षुरिव पापेन चश्लुषा निरीक्षते तस्य चापिनिरये पापदृष्टेक्षिणी वज्तुण्डा गृश्रा: कड्डकाकवटादय: प्रसहोरुबलादुत्पाटयन्ति ॥

३५॥

यः--जो व्यक्ति; तु--लेकिन; इह--इस जीवन में; वा--अथवा; अतिथीन्‌--अतिथियों को; अभ्यागतान्‌ू--अभ्यागतों ( आनेवालों ) को; वा--अथवा; गृह-पति: --गृहस्थ; असकृत्‌--अनेक बार; उपगत--प्राप्त करके; मन्यु:--क्रोध; दिधश्षु:--जलानेका इच्छुक; इब--सहश; पापेन--पापपूर्ण ; चक्षुषा--नेत्रों द्वारा; निरीक्षते--दृष्टि डालता है; तस्य--उसका; च--तथा; अपि--निश्चय ही; निरये-- नरक में; पाप-दृष्टे:--पापपूर्ण दृष्टि वाले की; अक्षिणी--आँखें, नेत्र; वज़-तुण्डा:--वज़ के समान बलिष्ठचोंच वाले; गृश्षा:--गीध; कड्ढ--कंक ( बगुले )।

काक--कौवे; बट-आदय:--तथा अन्य पक्षी; प्रसह्या--आक्रामक रूप से;उरू-बलातू--अत्यन्त बलपूर्वक; उत्पाटयन्ति--बाहर निकाल लेते हैं जो गृहस्थ अपने घर आये अतिथियों अथवा अभ्यागतों को क्रोध भरी कुटिल दृष्टि से देखताहै मानो उन्हें भस्म कर देगा, उसे पर्यावर्तन नामक नरक में ले जाकर रखा जाता है जहाँ उसे वज्जश़ जैसी चोंच वाले गीध, बगुले, कौवे तथा इसी प्रकार के अन्य पक्षी घूरते हैं और सहसा झपट करतेजी से उनकी आँखें निकाल लेते हैं।

यस्त्विह वा आढ्याभिमतिरहड्डू तिस्तिर्यक्प्रेक्षण: सर्वतोभिविशट्ढ़ी अर्थव्ययनाशचिन्तयापरिशुष्यमाणहदयवदनो निर्वृतिमनवगतो ग्रह इवार्थमभिरक्षति स चापि प्रेत्यतदुत्पादनोत्कर्षणसंरक्षणशमलग्रह: सूचीमुखे नरके निपतति यत्र ह वित्तग्रह॑ पापपुरुषं धर्मराजपुरुषावायका इव सर्वतो उड्लेषु सूत्रै: परिवयन्ति, ॥

३६॥

यः--जो व्यक्ति; तु--लेकिन; इह--इस लोक में; वा--अथवा; आढ्य-अभिमतिः --सम्पत्ति के कारण गर्वीला; अहड्डू तिः --अभिमानी; तिर्यक्‌-प्रेक्षण:--कुटिल दृष्टि वाला; सर्वतः अभिविशड्डी--सदैव अन्यों के द्वारा, यहाँ तक कि अपने से श्रेष्ठ जनोंद्वारा भी, ठगे जाने से सशंकित; अर्थ-व्यय-नाश-चिन्तया--व्यय तथा क्षति के विचार के कारण; परिशुष्यमाण --सूख गया हैजो; हृदय-वदन:--जिसका हृदय तथा मुख; निर्वृतिम्‌--प्रसन्नता; अनवगत: --न प्राप्त करके; ग्रह:-- भूत; इब--सहश;अर्थम्‌--सम्पत्ति; अभिरक्षति-- रखवाली करता है; सः--वह; च-- भी; अपि--निस्सन्देह; प्रेत्य--मरने के बाद; तत्‌ू--उस धनका; उत्पादन--आय का; उत्कर्षण--वृद्धि; संरक्षण--सुरक्षा; शमल-ग्रह:--पाप-कर्मों को स्वीकार करता हुआ; सूचीमुखे --सूचीमुख नामक; नरके--नरक में; निपतति--गिर जाता है; यत्र--जहाँ; ह--निस्संदेह; वित्त-ग्रहम्‌ू-- धन हरने वाले भूत कीतरह; पाप-पुरुषम्‌--अत्यन्त पापी मनुष्य को; धर्मराज-पुरुषा:--धर्मराज के दूत; वायका: इब--चतुर दर्जियों की भाँति;सर्वतः--सर्वत्र; अड्जेषु--शरीर के अंगों पर; सूत्रैः -- धागे के द्वारा; परिवयन्ति--सिलते हैं ।

जो व्यक्ति इस लोक में अथवा इस जीवन में अपनी सम्पत्ति पर अभिमान करता है, वहसदैव सोचता रहता है कि वह कितना धनी है और कोई उसकी बराबरी कर सकता है क्‍या?उसकी नजर टेढ़ी हो जाती है और वह सदैव भयभीत रहता है कि कोई उसकी सम्पत्ति ले न ले।

वह अपने से बड़े लोगों पर आशंका करता है।

अपनी सम्पत्ति की हानि के विचार मात्र से उसकामुख तथा हृदय सूखने लगते हैं, अत: वह सदैव अति अभागे दुष्ट मनुष्य की तरह लगता है।

उसेवास्तविक सुख-लाभ नहीं हो पाता और वह यह नहीं जानता कि चिन्तामुक्त जीवन कैसा होताहै।

धन अर्जित करने, उसको बढ़ाने तथा उसकी रक्षा के लिए वह जो पापकर्म करता है उसकेकारण उसे सूचीमुख नामक नरक में रखा जाता है जहाँ यमराज के दूत उसके सारे शरीर को दर्जियों की तरह धागे से सिल देते हैं।

एवंविधा नरका यमालये सन्ति शतशः सहस्त्रशस्तेषु सर्वेषु च सर्व एवाधर्मवर्तिनो ये केचिदिहोदिताअनुदिताश्चावनिपते पर्यायेण विशन्ति तथैव धर्मानुवर्तिन इतरत्र इह तु पुनर्भवे त उभयशेषाभ्यांनिविशन्ति ॥

३७॥

एवमू-विधा: --इस प्रकार के; नरका:--अनेक नरक; यम-आलये---यमराज के लोक में; सन्ति--हैं; शतशः--सैकड़ों;सहस्त्रश:--हजारों; तेषु--उन लोकों में; सर्वेषु--सबों में; च-- भी; सर्वे--सभी; एव--निस्संदेह; अधर्म-वर्तिन:--पुरुष जोवैदिक नियमों या विधि-विधानों का पालन नहीं करते; ये केचित्‌ू--जो भी; इह--यहाँ; उदिता:--वर्णित; अनुदिता:--जिनकावर्णन नहीं हुआ है; च--तथा; अवनि-पते--हे राजन्‌; पर्यायेण--विभिन्न प्रकार पापकर्मों के अनुसार; विशन्ति-- प्रवेश करतेहैं; तथा एव--उसी प्रकार; धर्म-अनुवर्तिन:--जो पवित्र हैं और वैदिक आदेशों के अनुसार कार्य करते हैं; इतरत्र--अन्यत्र;इह--इस लोक में; तु--लेकिन; पुनः-भवे--दूसरे जन्म में; ते--वे सब; उभय-शेषाभ्याम्‌-पुण्यों अथवा पापों के फल केशेष भाग से; निविशन्ति-- प्रवेश करते हैं|

हे राजनू, यमलोक में इसी प्रकार के सैकड़ों-हजारों नरक हैं।

मैने जिन पापी मनुष्यों कावर्णन किया है--और जिनका वहाँपर उल्लेख नहीं हुआ--वे सब अपने पापों की कोटि केअनुसार इन विभिन्न नरकों में प्रवेश करेंगे।

किन्तु जो पुण्यात्मा हैं, वे अन्य लोकों में, अर्थात्‌देवताओं के लोकों में जाते हैं।

तो भी, अपने पुण्य-पाप के फलों के क्षय होने पर पुण्यात्मा तथापापी दोनों ही पुनः पृथ्वी पर लौट आते हैं।

निवृत्तिलक्षणमार्ग आदावेव व्याख्यात:; एतावानेवाण्डकोशो यश्चतुर्दशधा पुराणेषु विकल्पित उपगीयतेयत्तद्धगवतो नारायणस्य साक्षान्महापुरुषस्य स्थविष्ठ रूपमात्ममायागुणमयमनुवर्णितमाहतः पठतिश्रुणोति श्राववति स उपगेयं भगवत: परमात्मनोग्राह्ममपि श्रद्धाभक्तिविशुद्धबुद्धिवेद ॥

३८॥

निवृत्ति-लक्षण-मार्ग:--त्याग अथवा मुक्ति का मार्ग; आदौ-प्रारम्भ में ( द्वितीय तथा तृतीय स्कन्धों में )।

एब--निस्संदेह;व्याख्यात:--कहा जा चुका है; एतावान्‌ू--यह सब; एव--निश्चय ही; अण्ड-कोश:--यह ब्रह्माण्ड जो एक बृहद्‌ अंडे के सहशहै; यः--जो; चतुर्दश-धा--चौदह खण्डों में; पुराणेषु--पुराणों में; विकल्पित:--विभक्त; उपगीयते--वर्णित; यत्‌--जो;तत्‌--वह; भगवतः-- श्रीभगवान्‌ का; नारायणस्थ--नारायण का; साक्षात्‌-- प्रत्यक्ष; महा-पुरुषस्थ--परम पुरुष का;स्थविष्ठम्‌--स्थूल; रूपम्‌--रूप; आत्म-माया--अपनी शक्ति का; गुण--गुणों का; मयम्‌--युक्त; अनुवर्णितम्‌-- वर्णित;आहतः--आदरपूर्वक; पठति--पढ़ता है; श्रेणोति--अथवा सुनता है; श्राववति--अथवा व्याख्या करता है; सः--वह पुरुष;उपगेयम्‌--गीत; भगवतः -- श्री भगवान्‌ का; परमात्मन:--परमात्मा का; अग्राह्ममू--जिसका समझ पाना कठिन है; अपि--यद्यपि; श्रद्धा-- श्रद्धा; भक्ति--तथा भक्ति से; विशुद्ध-शुद्ध; बुद्धिः--जिसकी बुद्धि; वेद--जानती है

प्रारम्भ में ( द्वितीय तथा तृतीय स्कंन्ध में ) मैं यह बता चुका हूँ कि मुक्तिमार्ग पर किस प्रकारअग्रसर हुआ जा सकता है।

पुराणों में चौदह खण्डों में विभक्त अंड सहश विशाल ब्रह्माण्ड कीस्थिति का वर्णन किया गया है।

यह विराट रूप भगवान्‌ का बाह्य शरीर माना जाता है, जिसकीउत्पत्ति उनकी शक्ति और गुणों से हुई है।

इसे ही सामान्यतः विराट रूप कहते हैं।

यदि कोईश्रद्धा सहित भगवान्‌ के इस बाह्य रूप का वर्णन पढ़ता है, अथवा इसके विषय में सुनता याफिर अन्यों को भागवत धर्म अथवा कृष्णभावनामृत समझाता है, तो आत्म-चेतना अथवाकृष्णभावनामृत में उनकी श्रद्धा तथा भक्ति क्रमशः बढ़ती जाती है।

यद्यपि इस भावना कोविकसित कर पाना कठिन है, किन्तु इस विधि से मनुष्य अपने को शुद्ध कर सकता है और धीरे-धीरे परम सत्य को जान सकता है।

रुत्वा स्थूलं तथा सूक्ष्मं रूप॑ भगवतो यतिः ।

स्थूले निर्जितमात्मानं शनैः सूक्ष्मं धिया नयेदिति ॥

३९॥

श्रुत्वा--सुनकरए गुरु-परम्परा से ); स्थूलम्‌--स्थूल; तथा-- और ; सूक्ष्मम्‌--सूक्ष्म; रूपम्‌ू--रूप; भगवत:-- श्रीभगवान्‌ का;यतिः--संन्यासी या भक्त; स्थूले--स्थूल रूप; निर्जितम्‌ू--विजित; आत्मानम्‌--मन को; शनै: --धीरे-धीरे; सूक्ष्ममू-- भगवान्‌के सूक्ष्म रूप में; धिया--बुद्धि से; नयेत्‌--ले जाना चाहिए; इति--इस प्रकार।

जो मुक्ति का इच्छुक है, मुक्ति के पथ को ग्रहण करता है तथा बद्ध जीवन के प्रति आकृष्टनहीं होता, वह यती या भक्त कहलाता है।

ऐसे पुरुष को पहले भगवान्‌ के स्थूल विराट रूप काचिन्तन करते हुए मन को वश में करना चाहिए और तब धीरे-धीरे श्रीकृष्ण के दिव्य रूप ( सत्‌-चित्‌-आनन्द-विग्रह ) का चिन्तन करना चाहिए।

इस प्रकार उसका मन समाधि में स्थिर हो जाताहै।

भक्ति के द्वारा भगवान्‌ के सूक्ष्म रूप का साक्षात्कार किया जा सकता है और यही भक्तों कागन्तव्य है।

इस प्रकार उसका जीवन सफल बन जाता है।

भूद्वीपवर्षसरिदद्विनभःसमुद्र -पातालदिड्नरकभागणलोकसंस्था ।

गीता मया तव नृपाद्भुतमी श्वरस्यस्थूलं वपु: सकलजीवनिकायधाम ॥

४०॥

भू--पृथ्वीलोक ; द्वीप--तथा अन्य लोक; वर्ष--भूभाग; सरित्‌--नदियाँ; अद्वि--पर्वत; नभ:--आकाश; समुद्र--सागर;पाताल--नीचे के लोक; दिक्‌ू--दिशाएँ; नरक--समस्त नरक लोक; भागण-लोक--नक्षत्र तथा उच्चतर लोक; संस्था--स्थिति; गीता--वर्णित; मया--मेरे द्वारा; तब--तुम्हारे लिए; नृप--हे राजन्‌; अद्भुतम्‌--विचित्र; ईश्वरस्थ-- श्रीभगवान्‌ का;स्थूलम्‌--स्थूल; वपु:--शरीर; सकल-जीव-निकाय--समस्त जीव समुदायों का; धाम--आवास |

हे राजन, अभी मैंने तुमसे इस पृथ्वीलोक, अन्य लोक, उनके वर्ष, नदी एवं पर्वत का वर्णनकिया है।

मैंने आकाश, समुद्र, अधोलोक, दिशाएँ, नरक, ग्रह तथा नक्षत्रों का भी वर्णन कियाहै।

ये भगवान्‌ के विराट रूप के अवयव हैं, जिन पर समस्त जीवात्माएँ आश्रित हैं।

इस प्रकार मैंने भगवान्‌ के बाह्य शरीर के अद्भुत विस्तार की व्याख्या की है।

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