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अध्याय सात: राजा भरत की गतिविधियाँ
5.7श्रीशुक उबाचभरतस्तु महाभागवतो यदा भगवतावनितलपरिपालनाय सश्ञिन्तितस्तदनुशासनपरः पञ्ञजनींविश्वरूपदुहितरमुपयेमे ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; भरतः--महाराज भरत; तु--लेकिन; महा-भागवतः --ई श्वर का महान् भक्त;यदा--जब; भगवता--अपने पिता भगवान् ऋषभदेव की आज्ञा से; अवनि-तल--पृथ्वी पर; परिपालनाय--शासन करने केलिए; सश्जिन्तितः--हढ़-निश्चय; तत्-अनुशासन-परः -- पृथ्वी पर शासन करने में रत; पञ्ञजनीम्--पंचजनी; विश्वरूप-दुहितरम्--विश्वरूप की पुत्री को; उपयेमे--विवाह कर लिया।
शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को और आगे बताया--हे राजन, भरत महाराजसर्वोच्च भक्त थे।
अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए जिन्होंने उन्हें सिंहासन पर बैठानेका निर्णय पहले ही ले रखा था।
वे तदनुसार पृथ्वी पर राज्य करने लगे।
समस्त संसार पर राज्यकरते हुए वे अपने पिता के आदेशों का पालन करने लगे और उन्होंने विश्वरूप की कन्यापंचजनी से विवाह कर लिया।
तस्यामु ह वा आत्मजान्कार्त्स्थेनानुरूपानात्मन: पञ्ञ जनयामास भूतादिरिव भूतसूक्ष्माणि सुमतिं राष्ट्रभूतसुदर्शनमावरणं धूप्रकेतुमिति ॥
२॥
तस्यथाम्--उसके गर्भ में; उह वा--निस्संदेह; आत्म-जानू--पुत्रों को; कार्त्स्येन--पूर्णत:; अनुरूपान्ू-- अनुरूप, समान;आत्मन:--अपने; पश्च-- पाँच; जनयाम् आस--उत्पन्न किया; भूत-आदि: इब--अहंकार के सहश; भूत-सूक्ष्माणि--पाँच भूत,तन्मात्र; सु-मतिम्ू--सुमति; राष्ट्र-भृतम्--राष्ट्रभृत; सु-दर्शनम्--सुदर्शन; आवरणम्--आवरण; धूम्र-केतुम्-- धूमके तु; इति--इस प्रकार।
जिस प्रकार मिथ्या अहंकार से भूत-तन्मात्र ( सूक्ष्म-इन्द्रिय विषय ) उत्पन्न होते हैं वैसे हीमहाराज भरत को अपनी पत्नी पंचजनी के गर्भ से पाँच पुत्र प्राप्त हुए।
इन पुत्रों के नाम थे--सुमति, राष्ट्रभूत, सुदर्शन, आवरण तथा धूमप्रकेतु।
अजनाभ॑ नामैतद्वर्ष भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति ॥
३॥
अजनाभम्---अजनाभ; नाम--नाम से; एतत्--यह; वर्षम्-द्वीप; भारतम्-- भारत; इति--इस प्रकार; यत:ः--जिससे;आरभ्य--प्रारम्भ करके; व्यपदिशन्ति-- कहते हैं, पुकारते हैं।
पहले इस देश का नाम अजनाभवर्ष था, किन्तु महाराज भरत के शासन काल से इसकानाम भारतवर्ष पड़ा।
स बहुविन्महीपति: पितृपितामहवदुरूवत्सलतया स्वे स्वे कर्मणि वर्तमाना: प्रजा: स्वधर्ममनुवर्तमान:पर्यपालयतू, ॥
४॥
सः--वह राजा ( महाराज भरत ); बहु-वित्--महान् ज्ञानी; मही-पति:--पृथ्वी का शासक, राजा; पितृ--पिता; पितामह--बाबा; वत्--सहृश; उरु-वत्सलतया--नागरिकों ( प्रजा ) पर अत्यधिक वत्सल ( स्नेहिल ) होने के कारण; स्वे स्वे-- अपनेअपने; कर्मणि--कर्तव्य में; वर्तमाना: --रहकर; प्रजा: --प्रजा; स्व-धर्मम् अनुवर्तमान: --अपने कर्तव्य में लगे रहकर;पर्यपालयत्ू--शासन किया।
भरत महाराज इस पृथ्वी पर अत्यन्त ज्ञानी तथा अनुभवी राजा थे।
वे स्वयं अपने कार्यों मेंसंलग्न रह कर प्रजा पर अच्छी प्रकार से राज्य करते थे।
वे अपनी प्रजा के प्रति उतने ही वत्सलथे जितने उनके पिता तथा पितामह रह चुके थे।
उन्होंने प्रजा को अपने अपने कर्तव्यों में व्यस्तरख कर इस पृथ्वी पर शासन किया।
ईजे च भगवन्तं यज्ञक्रतुरूपं क्रतुभिरुच्चावचै: श्रद्धयाहताग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्यपशुसोमानांप्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं चातुरहोंत्रविधिना ॥
५॥
ईजे--आराधना की; च--भी; भगवन्तम्-- भगवान् की; यज्ञ-क्रतु-रूपम्--पशु सहित तथा पशु रहित यज्ञों वाले; क्रतुभि:--ऐसे यज्ञों से; उच्चावचै:--अत्यन्त बड़े तथा अत्यन्त छोटे; श्रद्धया- श्रद्धा समेत; आहत--किया गया; अग्नि-होत्र-- अग्नि होत्रयज्ञ का; दर्श--दर्श यज्ञ का; पूर्णमास--पूर्णमास यज्ञ का; चातुर्मास्थ--चातुर्मास्य यज्ञ का; पशु-सोमानामू--पशु तथा सोमरस से सम्पन्न यज्ञों का; प्रकृति--पूर्ण अनुष्ठानों द्वारा; विकृतिभिः--तथा आंशिक अनुष्ठानों द्वारा; अनुसवनम्-प्राय:; चातु:-होबत्र-विधिना--चार प्रकार के पुरोहितों ( ऋत्विजों ) द्वारा निर्देशित यज्ञ विधि-विधानों के द्वारा |
राजा भरत ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक अनेक प्रकार के यज्ञ किये।
इनके नाम हैं अग्निहोत्र, दर्श,पूर्णमास, चातुर्मास्थ, पशु-यज्ञ ( जिसमें अश्व की बलि दी जाती थी ) तथा सोम-यज्ञ ( जिसमेंसोमरस प्रयुक्त होता था ) भेंट किया जाता था ।
कभी ये यज्ञ पूर्ण रूप से तो कभी आंशिक रूपमें सम्पन्न किये जाते थे।
प्रत्येक दशा में समस्त यज्ञों में चातुहोंत्र नियमों का हढ़ता से पालनकिया जाता था।
इस प्रकार भरत महाराज भगवान् की उपासना करते थे।
सम्प्रचरत्सु नानायागेषु विरचिताडुक्रियेष्वपूर्व यत्तत्क्रियाफलं धर्माख्यं परे ब्रह्मणि यज्ञपुरुषेसर्वदेवतालिझनां मन्त्राणामर्थनियामकतया साक्षात्कर्तरि परदेवतायां भगवति वासुदेव एवं भावयमान आत्मनैपुण्यमृदितकषायो हवि:घष्वध्वर्युभिर्गृह्मामाणेषु स यजमानो यज्ञभाजोदेवांस्तान्पुरुषावयवेष्व भ्यध्यायत् ॥
६॥
सम्प्रचरत्सु-- अनुष्ठान प्रारम्भ करते समय; नाना-यागेषु--अनेक प्रकार के यज्ञ; विरचित-अड्गभ-क्रियेषु--जिसमें गौण कृत्यकिये जाते थे; अपूर्वम्--सुदूर; यत्--जो भी; तत्ू--वह; क्रिया-फलम्--यज्ञ का फल; धर्म-आख्यमू-- धर्म के नाम से; परे--दिव्य; ब्रह्मणि--पर ब्रह्म में; यज्ञ-पुरुषे--समस्त यज्ञों का भोक्ता; सर्व-देवता-लिज्ञनाम्-- देवताओं को प्रकट करने वाले;मन्त्राणाम्--मंत्रों का, वैदिक स्तुतियों का; अर्थ-नियाम-कतया--पदार्थों का नियन्ता होने से; साक्षात्-कर्तरि--साक्षात् करनेवाला; पर-देवतायाम्--समस्त देवाताओं के कारण; भगवति--भगवान्; वासुदेवे-- श्रीकृष्ण में; एब--निश्चय ही;भावयमान: --सदैव चिन्तन करते हुए; आत्म-नैपुण्य-मृदित-कषाय: --समस्त काम तथा क्रोध से रहित; हविःषु--यज्ञ में डालीजाने वाली सामग्री, हवि; अध्वर्युभिः--जब अथर्ववेद में वर्णित यज्ञों में दक्ष पुरोहित; गृह्ममाणेषु-- लेते हुए; सः--महाराज भरतने; यजमान:--यज्ञ करने वाला; यज्ञ-भाज:--यज्ञ-फल को पाने वाले; देवान्--समस्त देवताओं को; तान्ू--उन; पुरुष-अवयवेषु-- भगवान् गोविन्द के शरीर के अंग प्रत्यंगों में; अभ्यध्यायत्--सोचा |
विभिन्न यज्ञों के प्रारम्भिक कार्यों को कर लेने के बाद महाराज भरत यज्ञफलों को धर्म केनाम पर भगवान् वासुदेव को अर्पण कर देते थे।
अर्थात्, वे भगवान् वासुदेव कृष्ण को प्रसन्नकरने के लिए समस्त यज्ञ करते थे।
महाराज भरत सोचते थे कि सभी देवता भगवान् वासुदेव केशरीर के अंगस्वरूप हैं और वैदिक मंत्रों में जो भी वर्णित है वे उसके नियन्ता हैं।
इस प्रकार सेचिन्तन के फलस्वरूप महाराज भरत आसक्ति, काम तथा लोभ जैसे भौतिक कल्मष से मुक्त थे।
जब पुरोहितगण अग्नि में हवि अर्पित करने वाले होते तो महाराज भरत को यह ज्ञात हो जाता थाकि विभिन्न देवताओं को दी जाने वाली यह हवि ईश्वर के विभिन्न अवयवों ( अंगों ) के निमित्तहै।
उदाहरणार्थ, इन्द्र भगवान् के बाहु स्वरूप और सूर्य उनके नेत्र हैं।
इस प्रकार महाराज भरत नेविचार किया कि विभिन्न देवताओं को दी जाने वाली आहुतियाँ वास्तव में भगवान् वासुदेव केअंग-प्रत्यंग के निमित्त हैं।
एवं कर्मविशुद्धया विशुद्धसत्त्वस्यान्तईदयाकाशशरीरे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवे महापुरुषरूपोपलक्षणेश्रीवत्सकौस्तुभवनमालारिदरगदादिभिरुपलक्षिते निजपुरुषहल्लिखितेनात्मनि पुरुषरूपेण विरोचमानउच्चैस्तरां भक्तिरनुदिनमेधमानरयाजायत ॥
७॥
एवम्--इस प्रकार; कर्म-विशुद्धब्ा-- श्री भगवान् को प्रत्येक वस्तु अर्पित करते हुए अपने पुण्यकर्मों के फल की अभिलाषा नकरते हुए, कर्म शुद्धि से; विशुद्ध-सच्त्वस्य-- भरत महाराज का, जिनका जीवन पूर्णतः शुद्ध था; अन्त:-हदय-आकाश-शरीरे--योगियों द्वारा ध्यान किये जाने वाले अन््तर्यामी परमात्मा; ब्रह्मणि--निराकार ब्रह्म में, जिसकी आराधना निर्गुण ज्ञानी करते हैं;भगवति--श्रीभगवान् में; वासुदेवे--वासुदेव श्रीकृष्ण में; महा-पुरुष--परम पुरुष का; रूप--स्वरूप, आकार; उपलक्षणे--लक्षणों वाला; श्रीवत्स-- भगवान् के वक्षस्थल का चिह्न, श्रीवत्स; कौस्तुभ--कौस्तुभ मणि; वन-माला--पुष्पों का हार; अरि-दर--चक्र तथा शंख; गदा-आदिभि:--( तथा ) गदा इत्यादि अन्य लक्षणों से; उपलक्षिते--पहचाना जाकर; निज-पुरुष-हतू-लिखितेन--जो अपने भक्तों के हृदय में चित्र की भाँति स्थित हैं; आत्मनि--अपने मन में; पुरुष-रूपेण-- अपने स्वरूप से;विरोचमाने--चमकता; उच्चैस्तराम्--अति उच्च स्तर पर; भक्ति:--भक्ति; अनुदिनम्ू--दिन प्रति दिन; एधमान--बढ़ता हुआ;रया--बलशाली; अजायत--प्रकट हुआ।
इस प्रकार यज्ञों से परिष्कृत महाराज भरत का हृदय सर्वथा कल्मषहीन हो गया।
दिन प्रतिदिन वासुदेव श्रीकृष्ण के प्रति उनकी भक्ति बढ़ती रही।
वसुदेव पुत्र श्रीकृष्ण आदि भगवान् हैं,जो परमात्मा रूप में तथा निर्गुण ब्रह्म के रूप में प्रकट होते हैं।
योगी लोग अपने हृदय में स्थितपरमात्मा का ध्यान धरते हैं, ज्ञानी परम सत्य निर्गुण ब्रह्म के रूप में उपासना करते हैं और भक्तजन शाम्त्रों में वर्णित दिव्य देहधारी भगवान् वासुदेव की आराधना करते हैं।
उनका शरीरश्रीवत्स, कौस्तुभ मणि तथा पुष्पहार से सुशोभित है और वे हाथों में शंख, चक्र, गदा तथाकमल धारण किये हुए हैं।
नारद जैसे भक्त अपने अन्तःकरण में उनका सदा ध्यान धरते हैं।
एवं वर्षायुतसहस्त्रपर्यन्तावसितकर्मनिर्वाणावसरोधिभुज्यमानं स्वतनयेभ्यो रिक्थं पितृपैतामहं यथादायंविभज्य स्वयं सकलसम्पन्निकेतात्स्वनिकेतात्पुलहा श्रमं प्रवत्राज ॥
८ ॥
एवम्--इस प्रकार सदैव कार्यरत रहकर; वर्ष-अयुत-सहस्त्र--दस हजार वर्षो के एक हजार गुने वर्ष अर्थात् एक करोड़ वर्ष;पर्यन्त--बीतने तक; अवसित-कर्म-निर्वाण-अवसरः --राज्य-ऐश्वर्य का अन्त समझ कर महाराज भरत; अधिभुज्यमानम्--उसकाल तक इस प्रकार भोगी जाकर; स्व-तनयेभ्य:--अपने पुत्रों को; रिक्थम्--सम्पत्ति; पितृ-पैतामहम्-- अपने पिता तथापूर्वजों से प्राप्त: यथा-दायम्--मनु के दाय-भाक् नियम के अनुसार ( यथायोग्य ); विभज्य--बाँट कर; स्वयम्--स्वयं, आप;सकल-सम्पत्--सभी प्रकार के ऐश्वर्यों का; निकेतातू-घर से; स्व-निकेतात्--अपने पैतृक घर से; पुलह-आश्रमम् प्रवत्राज--हरद्वार में पुलह आश्रम चला गया ( जहाँ शालग्राम शिलाएँ प्राप्त होती हैं ) ?
प्रारब्ध ने महाराज भरत के लिए भौतिक ऐश्वर्य-भोग की अवधि एक करोड़ वर्ष नियत करदी थी।
जब यह अवधि समाप्त हुई तो उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और अपने पूर्वजों सेप्राप्त सम्पत्ति को अपने पुत्रों में बाँट दिया, उन्होंने समस्त ऐश्वर्य के आगार अपने पैतृकगृह कोछोड़ दिया और वे पुलहाश्रम के लिए चल पड़े जो हरद्वार में स्थित है।
वहाँ शालग्राम शिलाएँप्राप्त होती हैं।
यत्र ह वाव भगवान्हरिरद्यापि तत्रत्यानां निजजनानां वात्सल्येन सन्निधाप्यत इच्छारूपेण ॥
९॥
यत्र--जहाँ; ह वाव--निश्चय ही; भगवान्-- श्रीभगवान; हरि: --ईश्वर; अद्य-अपि-- आज भी; तत्रत्यानाम्--उस स्थान में रहतेहुए; निज-जनानाम्--अपने भक्तों के; वात्सल्येन-- अपने दिव्य स्नेह से; सन्निधाप्यते--हृश्य होता है; इच्छा-रूपेण-- भक्त कीइच्छानुसार।
पुलह आश्रम में भगवान् हरि अपने भक्तों के दिव्य वात्सल्य-वश होकर दृश्य होते रहते हैंऔर उन सबकी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं।
यत्राभ्रमपदान्युभयतो नाभिभिर्द षच्चक्रै श्रक्रनदी नाम सरित्प्रवरा सर्वतः पवित्रीकरोति ॥
१०॥
यत्र--जहाँ; आश्रम-पदानि--सभी आश्रम; उभयत:--ऊपर तथा नीचे, दोनों ओर; नाभिभि:--नाभि चिह्न सदश; हृषत्ू--हृश्य;अक्रैः--चक्रों से; चक्र-नदी--चक्र नदी ( जिसे गंडकी कहते हैं ); नाम--नामक; सरित्-प्रवरा--नदियों में श्रेष्ठ; सर्वतः --सर्वत्र; पवित्री-करोति--पवित्र करती है |
पुलह आश्रम में गण्डकी नदी है जो समस्त नदियों में श्रेष्ठ है।
यहाँ इन समस्त स्थलों कोपवित्र करने वाली शालग्राम शिलाएँ ( संगमरमर की बटियाँ ) हैं।
इनमें ऊपर तथा नीचे दोनोंओर नाभि जैसे चक्र दृष्टिगोचर होते हैं।
तस्मिन्वाव किल स एकल: पुलहाश्रमोपवने विविधकुसुमकिसलयतुलसिकाम्बुभिःकन्दमूलफलोपहारैश्व समीहमानो भगवत आराधनं विविक्त उपरतविषयाभिलाष उपभृतोपशमः परांनिर्वृतिमवाप ॥
११॥
तस्मिनू--उस आश्रम में; वाव किल--निस्सन्देह; सः--भरत महाराज; एकल: --अकेले, एकान्त; पुलह-आश्रम-उपवने--पुलह आश्रम के उद्यानों में; विविध-कुसुम-किसलय-तुलसिका-अम्बुभि: --अनेक पुष्प, किसलय तथा तुलसीदल के साथ-साथ जल से; कन्द-मूल-फल-उपहारैः--मूल, कन्द तथा फलों की भेंट से; च--तथा; समीहमान:--करते हुए; भगवतः --भगवान् की; आराधनम्--आराधना, अर्चना; विविक्त: --विशुद्ध; उपरत--मुक्त होकर; विषय-अभिलाष: -- भौतिक इन्द्रिय-सुख की कामना; उपभृत--बढ़ी हुई; उपशमः--शान्ति; पराम्--दिव्य; निर्वुतिमू--सन्तोष, प्रसन्नता; अवाप--प्राप्त किया |
पुलह आश्रम के उपबन में महाराज भरत अकेले रहकर अनेक प्रकार के फूल, किसलयतथा तुलसीदल एकत्र करने लगे।
वे गंडकी नदी का जल तथा विभिन्न प्रकार के मूल, फल तथाकन्द भी एकत्र करते।
वे इन सबसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वासुदेव को भोजन अर्पित करतेऔर उनकी आराधना करते हुए सन््तुष्ट रहने लगे।
इस प्रकार उनका हृदय अत्यन्त निष्कलुष होगया और उन्हें भौतिक सुख के लिए लेशमात्र भी इच्छा न रही ।
उनकी समस्त भौतिक कामनाएँदूर हो गईं।
इस स्थिर दशा में उन्हें परम सन््तोष हुआ और वे भक्ति में बने रहे।
तयेत्थमविरतपुरुषपरिचर्यया भगवति प्रवर्धभानानुरागभरद्वरुतहदयशैधिल्य:प्रहर्षवेगेनात्मन्युद्धिद्यमानरोमपुलककुलक औत्कण्ठ्यप्रवृत्तप्रणयबाष्पनिरुद्धावलोकनयन एवंनिजरमणारुणचरणारविन्दानुध्यानपरिचितभक्तियोगेनपरिप्लुतपरमाह्ादगम्भीरहदयह्दावगाढधिषणस्तामपि क्रियमाणां भगवत्सपर्या न सस्मार ॥
१२॥
तया--उसके द्वारा; इत्थम्--इस प्रकार; अविरत--निरन्तर; पुरुष--परमे श्वर की; परिचर्यया--सेवा द्वारा; भगवति-- श्री भगवान्में; प्रवर्धभान--निरन्तर बढ़ती हुईं; अनुराग--आसक्ति का; भर--भार से; द्रुत--द्रवित; हृदय--हृदय; शैधिल्य:--शिथधिलता;प्रहर्ष-वेगेन--दिव्य हर्ष के वेग से; आत्मनि--अपने शरीर में; उद्धिद्यमान-रोम-पुलक-कुलक:--रोमांच, रोमों का खड़ा होना;औत्कण्ठ्य--उत्कंठा के कारण; प्रवृत्त--उत्पन्न; प्रणय-बाष्प-निरुद्ध-अवलोक-नयन: --प्रेमा श्रु प्रकट होने से दृष्टि में अबरो ध;एवम्--इस प्रकार; निज-रमण-अरुण-चरण-अरविन्द--ईश्वर के लाल लाल चरणकमलों पर; अनुध्यान-- ध्यान करने से;'परिचित--बढ़ा हुआ; भक्ति-योगेन-- भक्ति के कारण; परिप्लुत--सर्वत्र फैलकर; परम--सर्वोच्च; आह्ाद-- आनन्द का;गम्भीर--अत्यन्त गहरा; हृदय-हृद--हृदय रूपी सरोवर; अवगाढ--डूबा हुआ; धिषण:--जिसकी बुद्धि; तामू--वह; अपि--यद्यपि; क्रियमाणाम्--करते हुए; भगवत्-- श्रीभगवान् का; सपर्यामू--आराधना; न--नहीं; सस्मार--स्मरण रहा |
इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ भक्त महाराज भरत ईश्वर की भक्ति में निरन्तर लगे रहे।
स्वाभाविक रूपसे वासुदेव श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम बढ़ता गया और अन्ततः उनका हृदय द्रवित हो उठा।
'फलतः धीरे-धीरे समस्त विधि-विधानों के प्रति उनकी आसक्ति जाती रही।
उन्हें रोमांच होने लगाऔर आह्ाद के सभी शारीरिक लक्षण ( भाव ) प्रकट होने लगे।
उनके नेत्रों से अश्रुओं कीअविरल धारा बहने लगी जिससे वे कुछ भी देखने में असमर्थ हो गये।
इस प्रकार वे निरन्तर ईश्वरके अरुण चरणारविन्द पर ध्यान लगाये रहते।
उस समय उनका सरोवर के सदृश हृदय आनन्द-जल से पूरित हो गया।
जब उनका मन इस सरोवर में निमग्न हो गया तो वे नियमपूर्वक सम्पन्नकी जाने वाली भगवद् पूजा भी भूल गये।
इत्थं धृतभगवद्व्रत ऐणेयाजिनवाससानुसवनाभिषेकार्द्कपिशकुटिलजटाकलापेन च विरोचमान:सूर्यर्चा भगवन्तं हिरण्मयं पुरुषमुज्जिहाने सूर्यमण्डलेभ्युपतिष्ठन्नेतदु होवाच ॥
१३॥
इत्थम्--इस प्रकार; धृत-भगवत्-ब्रत:-- भगवान् की सेवा का व्रत स्वीकार करके; ऐणेय-अजिन-वासस--मृगचर्म वस्त्र धारणकिये; अनुसवन--प्रति दिन तीन बार; अभिषेक --स्तान द्वारा; अर्द्र--गीला; कपिश-- भूरा; कुटिल-जटा--घुँघराले केशों कीजटा; कलापेन--समूह से; च--तथा; विरोचमान:--अत्यन्त सुन्दर ढंग से सजाई गई; सूर्यर्चा--सूर्य में स्थित भगवान् नारायणके अंश-विस्तार की वैदिक ऋचाओं द्वारा पूजा; भगवन्तम्-- भगवान् को; हिरण्मयम्--स्वर्णकान्ति वाले भगवान्; पुरुषम्--भगवान्; उज्जिहाने--उदय होते हुए; सूर्य-मण्डले--सूर्यमंडल में; अभ्युपतिष्ठन्--पूजा करते हुए; एतत्--यह; उ ह--निश्चय ही;उवाच--कहा।
महाराज भरत अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे।
उनके शीश पर घुँघराले बालों की राशि थी जो दिनमें तीन बार स्नान करने से गीली थी।
वे मृगचर्म धारण करते और स्वर्णिम तेजोमय शरीर तथासूर्य के भीतर वास करने वाले श्रीनारायण की पूजा करते।
वे ऋग्वेद की ऋचाओं का जप करतेहुए भगवान् नारायण की उपासना करते और सूर्योदय होते ही निम्नलिखित एलोक का पाठकरते।
'परोरजः सवितुर्जातवेदोदेवस्य भर्गो मनसेदं जजान ।
सुरेतसाद: पुनराविश्य चष्टेहंसं गृक्माणं नृषद्रिड्रिरामिम: ॥
१४॥
'परः-रज:--रजोगुण से परे ( सतोगुण में स्थित ); सवितुः--सम्पूर्ण ब्रह्मण्ड को आलोकित करने वाले का; जात-वेद:--जिससे भक्तों की कामनाएँ पूरी होती है; देवस्थ-- भगवान् का; भर्ग:--आत्म-तेज; मनसा--मात्र चिन्तन से; इदम्--यह;जजान--उत्पन्न किया; सु-रेतसा--दिव्य-शक्ति से; अद:--यह सृष्टि; पुनः --फिर; आविश्य-- प्रवेश करके ; चष्टे--देखता यापालन करता है; हंसम्--जीव को; गृश्षाणम्-- भौतिक सुख की कामना करते हुए; नृषत्--बुद्धि के लिए; रिड्विरामू--गतिप्रदान करने वाले; इम:ः--नमस्कार है।
'पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् शुद्ध सत्त्व में स्थित हैं।
वे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आलोकित करते हैंऔर अपने भक्तों को सभी वर देते हैं।
ईश्वर ने अपने दिव्य तेज से इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि की है।
वे अपनी ही इच्छा से इस ब्रह्माण्ड में परमात्मा के रूप में प्रविष्ट हुए और अपनी विभिन्न शक्तियोंसे भौतिक सुख की इच्छा रखने वाले समस्त जीवों का पालन करते हैं।
ऐसे बुच्धिदायकभगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ।
