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अध्याय तेरह: पापपूर्ण प्रतिक्रिया से राजा इंद्र पीड़ित
6.13श्रीशुक उबाचवृत्रे हते त्रयो लोका विना शक्रेण भूरिद ।
सपालाह्ाभवन्सद्यो विज्वरा निर्वृतेन्द्रिया: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; बृत्रे हते--वृत्रासुर के मारे जाने पर; त्रयः लोका:--तीनों लोक ( उच्च,मध्य तथा अध:लोक ); विना--के सिवा; शक्रेण--इन्द्र, जिसे शक्र भी कहते हैं; भूरि-द--हे अत्यन्त दानी महाराजपरीक्षित; स-पाला:--विभिन्न लोकों के अधिपतियों सहित; हि--निस्सन्देह; अभवन्--हुआ; सद्य:--तुरन्त; विज्वरा: --मृत्यु के भय से रहित; निर्वृत--अत्यधिक प्रसन्न; इन्द्रियाः--जिसकी इन्द्रियाँ |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे महादानी राजा परीक्षित! वृत्रासुर के बध से इन्द्र केअतिरिक्त तीनों लोकों के लोकपाल एवं समस्त निवासी तुरन्त ही प्रसन्न हुए और उनकी सबचिन्ताएँ जाती रहीं।
देवर्षिपितृभूतानि दैत्या देवानुगा: स्वयम् ।
प्रतिजग्मु: स्वशिष्ण्यानि ब्रह्मेशेन्द्रादयस्तत: ॥
२॥
देव--देवता; ऋषि--परम साधु पुरुष; पितृ-पितृलोक के वासी; भूतानि--तथा अन्य जीवात्माएँ; दैत्या:--असुर; देव-अनुगाः --देवताओं के नियमों का पालन करने वाले अन्य लोकों के वासी; स्वयम्--स्वतंत्र रूप से ( इन्द्र की अनुमतिमांगने के बिना ); प्रतिजग्मु;:--वापस चले गये; स्व-धिष्ण्यानि-- अपने-अपने लोकों तथा आवासों को; ब्रह्म-- श्रीत्रह्मा;ईश-- श्रीशिव ; इन्द्र-आदय: --तथा इन्द्र आदि देवता; ततः--तत्पश्चात् |
तत्पश्चात् सभी देवता, महान् साधु पुरुष, पितृलोक तथा भतूलोक के सभी वासी,असुर, देवताओं के अनुचर तथा ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र के अधीन देवगण अपने-अपने धामोंको लौट गये।
किन्तु विदा लेते समय वे इन्द्र से कुछ बोले नहीं।
श्रीराजोबाचइन्द्रस्थानिर्वृतेहैतुं श्रोतुमिच्छामि भो मुने ।
येनासन्सुखिनो देवा हरे्दुःखं कुतोभवत् ॥
३॥
श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने पूछा; इन्द्रस्य--इन्द्र का; अनिर्वृतेः--दुख का; हेतुमू--कारण; श्रोतुमू-- सुनना;इच्छामि--चाहता हूँ; भो:ः--हे भगवान्; मुने--हे मुनि शुकदेव गोस्वामी; येन--जिससे; आसन्ू-- थे; सुखिन: --अत्यन्तप्रसन्न; देवा: --समस्त देवता; हरे: --इन्द्र का; दुःखम्--दुख, अप्रसन्नता; कुतः--कहाँ से; अभवत्-- था।
महाराज परीक्षित ने शुकदेव गोस्वामी से पूछा--हे मुनि! इन्द्र की अप्रसन्नता का कारणक्या था?
मैं इसके विषय में सुनना चाहता हूँ।
जब उसने वृत्रासुर का वध कर दिया तो सभीदेवता प्रसन्न हुए, तो फिर इन्द्र स्वयं क्यों अप्रसन्न था ?
श्रीशुक उवाचवृत्रविक्रमसंविग्ना: सर्वे देवा: सहर्षिभि: ।
तद्गधायार्थयत्निन्द्रं नैच्छद्धीतो बृहद्वधात् ॥
४॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; वृत्र--वृत्रासुर के; विक्रम--शौर्य से; संविग्ना:--चिन्तायुक्त होकर;सर्वे--सभी; देवा:--देवतागण; सह ऋषिभि:--महान् साधुओं समेत; तत्-वधाय--उसके वध के लिए; आर्थयन्--प्रार्थना की; इन्द्रमू--इन्द्र से; न ऐच्छत्--इनकार कर दिया; भीत:--डरकर; बृहत् -बधात्--ब्राह्मण वध के कारण |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया--जब समस्त ऋषि तथा देवता वृत्रासुर कीअसाधारण शक्ति से विचलित हो रहे थे तो उन्होंने एकत्र होकर इन्द्र से उसका वध करने केलिए याचना की थी।
किन्तु इन्द्र ने ब्राह्मण-हत्या के भय से उनकी प्रार्थना अस्वीकार कर दी थी।
इन्द्र उबाचस्त्रीभूद्रुमजलैरेनो विश्वरूपवधोद्धवम् ।
विभक्तमनुगृह्नद्धिर्वृत्रहत्यां कब मार्ज्म्यहम् ॥
५॥
इन्द्र: उबाच--राजा इन्द्र ने उत्तर दिया; स्त्री--स्त्री; भू--पृथ्वी; द्रम--वृक्ष; जलै:ः--तथा जल के द्वारा; एन:--यह(पाप ); विश्वरूप--विश्वरूप के; वध--वध से; उद्धवम्--उत्पन्न; विभक्तम्--बाँट लिया; अनुगृह्नद्धिः-- अपने अपनेअनुग्रह से; वृत्र-हत्याम्--वृत्र की हत्या से; क्व--कैसे; मार्ज्पि-- मुक्त हो सकूँगा; अहम्ू--मैं
राजा इन्द्र ने उत्तर दिया--जब मैंने विश्वरूप का वध किया, तो मुझे अत्यधिक पाप-बन्धन मिला था, किन्तु स्त्रियों, धरती, वृक्षों तथा जल ने मेरे ऊपर अनुग्रह किया था, जिससेमैं अपने पाप को उन सबों में बाँठ सका।
किन्तु यदि मैं अब एक अन्य ब्राह्मण, वृत्रासुर, कावध करूँ तो भला पाप-बन्धनों से मैं अपने को किस प्रकार मुक्त कर सकूँगा ?
श्रीशुक उवाचऋषयस्तदुपाकर्णय महेन्द्रमिदमब्रुवन् ।
याजयिष्याम भद्गं ते हयमेधेन मा सम भे; ॥
६॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ऋषय: --परम साधुगण; तत्--वह; उपाकर्ण्य--सुनकर; महा-इन्द्रम्--राजा इन्द्र से; इदम्--यह; अब्लुवन्--कहा; याजयिष्याम: --हम महान् यज्ञ करेंगे; भद्रमू--कल्याण; ते--तुम्हारा;हयमेथेन--अश्वमेध यज्ञ से; मा सम भेः--मत भयभीत हो |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--यह सुनकर ऋषियों ने इन्द्र को उत्तर दिया, ' हे स्वर्ग केराजा! तुम्हारा कल्याण हो।
तुम डरो नहीं।
हम तुम्हें ब्राह्मण-हत्या से लगने वाले किसी भीपाप से मुक्ति के लिए एक अश्वमेघ यज्ञ करेंगे।
'हयमेधेन पुरुषं परमात्मानमीश्चरम् ।
इष्ठा नारायण देव॑ मोक्ष्यसेडपि जगद्ठधात् ॥
७॥
हयमेथेन--अश्वमेध यज्ञ से; पुरुषम्--परम पुरुष; परमात्मानमू--परमात्मा को; ई श्ररम्ू--परम नियन्ता; इष्टा--पूजा करके;नारायणम्-- भगवान् नारायण को; देवम्-परमे श्वर; मोक्ष्यसे--तुम मुक्त हो जाओगे; अपि-- भी; जगत्-वधात्--सारेसंसार का वध करने के पाप से
ऋषियों ने आगे कहा--हे राजा इन्द्र! अश्वमेध यज्ञ करके उसके द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान् को, जो परमात्मा, भगवान्, नारायण और परम नियन्ता हैं, प्रसन्न करके मनुष्य सारेसंसार के वध के पाप-फलों से भी मुक्त हो सकता है, वृत्रासुर जैसे एक असुर के वध कीतो बात ही कया है?
ब्रह्मा पितृहा गोघ्नो मातृहाचार्यहाघवान् ।
श्राद: पुल्कसको वापि शुद्धग्रेरन्यस्य कीर्तनात् ॥
८॥
तमश्वमेधेन महामखेनश्रद्धान्वितोउस्माभिरनुष्ठितेन ।
हत्वापि सब्रह्मचराचरं त्वंन लिप्यसे कि खलनिग्रहेण ॥
९॥
ब्रह्-हा--ब्राह्मण की हत्या करने वाला; पितृ-हा--पिता की हत्या करने वाला; गो-घ्नः--गोहत्या करने वाला; मातृ-हा--माता का वध करने वाला; आचार्य-हा--अपने गुरु की हत्या करने वाला; अघ-वान्--ऐसा पापी पुरुष; श्र-अदः --कुत्ता खाने वाला; पुल्कसक:--चाण्डाल, जो शूद्र से भी नीच होता है; वा--अथवा; अपि-- भी; शुद्धबेरनू--शुद्ध कियाजा सकता है; यस्य--जिस ( भगवान् नारायण ) के; कीर्तनातू--नाम जप से; तमू--उसको; अश्वमेधेन-- अश्वमेधयज्ञ केद्वारा; महा-मखेन--समस्त यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ; श्रद्धा-अन्वित: -- श्रद्धा युक्त; अस्माभि: --हमारे द्वारा; अनुष्ठितेन--कियागया; हत्वा--मार कर; अपि-- भी; स-ब्रह्म -चर-अचरम्--ब्राह्मणों समेत सभी जीवात्माएँ; त्वमू--तुम; न--नहीं;लिप्यसे--कल्मषग्रस्त होते हो; किम्ू--तो फिर कया; खल-निग्रहेण --एक दुष्ट असुर को मारने से।
भगवान् नारायण के पवित्र नाम के जप-मात्र से ब्राह्मण, गाय, पिता, माता, गुरू कीहत्या करने वाला मनुष्य समस्त पाप-फलों से तुरन्त मुक्त किया जा सकता है।
अन्य पापीमनुष्य भी, यथा कुत्ते को खाने वाले तथा चांडाल, जो शूद्रों से भी निम्न हैं, इसी प्रकार सेमुक्त हो जाते हैं।
फिर आप तो भक्त हैं और हम सभी महान् अश्वमेध यज्ञ करके आपकीसहायता करेंगे।
यदि आप भी इस प्रकार भगवान् नारायण को प्रसन्न करें तो फिर आपकोडर कैसा?
तब आप मुक्त हो जायेंगे, भले ही आप ब्राह्मणों सहित सारे ब्रह्माण्ड की हत्याक्यों न कर दें।
भला वृत्रासुर जैसे विघ्नकारी एक असुर की हत्या की क्या बात है ?
श्रीशुक उबाचएवं सञ्जोदितो विप्रैरमरुत्वानहनद्रिपुम् ।
ब्रह्महत्या हते तस्मिन्नाससाद वृषाकपिम् ॥
१०॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; सझ्ञोदित:--प्रोत्साहित होकर; विप्रै:--ब्राह्मणों केद्वारा; मरुत्वानू--इन्द्र ने; अहनत्--वध कर दिया; रिपुम्--अपने शत्रु, वृत्रासुर को; ब्रह्म-हत्या--एक ब्राह्मण की हत्याका पाप; हते--मारे जाने पर; तस्मिन्--जब वह ( वृत्रासुर ) आससाद--पास गया; वृषाकपिम्--इन्द्र जिसको वृषाकपिभी कहते हैं |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--ऋषियों के बचनों से प्रोत्साहित होकर इन्द्र ने वृत्रासुरका वध कर दिया और जब वह मारा गया तो ब्रह्महत्या का पाप फल इन्द्र के पास पहुँचा।
तयेन्द्र: स्मासहत्तापं निर्वृतिर्नामुमाविशत् ।
हीमन्तं वाच्यतां प्राप्त सुखयन्त्यपि नो गुणा: ॥
११॥
तया--उस कार्य से; इन्द्र: --राजा इन्द्र ने; स्म--निस्सन्देह; असहत्--सहन किया; तापम्--क्लेश या दुख; निर्वृतिः--प्रसन्नता; न--नहीं; अमुम्--उसको; आविशत्-- प्रवेश किया; हीमन्तम्--लज्जाशील; वाच्यताम्-- अपयश ; प्राप्तम्--प्राप्त करके; सुखयन्ति--प्रसन्नता प्रदान करते हैं; अपि--यद्यपि; नो--नहीं ; गुणा:--उतम गुण यथा ऐश्वर्य आदि।
देवताओं की सलाह से इन्द्र ने वृत्रासुर का वध कर दिया और इस पापपूर्ण हत्या केकारण उसे कष्ट उठाना पड़ा।
यद्यपि अन्य देवतागण प्रसन्न थे, किन्तु वृत्रासुर की हत्या सेउसे तनिक भी प्रसन्नता नहीं हुई।
इन्द्र के इस क्लेश में अन्य उत्तम गुण, यथा धैर्य तथाऐश्वर्य, उसके सहायक नहीं बन सके।
तां दरदर्शानुधावन्तीं चाण्डालीमिव रूपिणीम् ।
जरया वेषमानाड़ीं यक्ष्मग्रस्तामसृक्पटाम् ॥
१२॥
विकीर्य पलितान्केशांस्तिष्ठ तिष्ठेति भाषिणीम् ।
मीनगन्ध्यसुगन्धेन कुर्वतीं मार्गदूषणम् ॥
१३॥
तामू--ब्रह्म हत्या को; दरदर्श--देखा; अनुधावन्तीम्--पीछा करते हुए; चाण्डालीम्--निम्न श्रेणी की स्त्री; इब--सहृश;रूपिणीम्--रूप धारण करके; जरया--बुढ़ापे के कारण; वेपमान-अड्रीम्--काँपते हुए अंगों वाली; यक्ष्म-ग्रस्ताम्ू--यक्ष्मा रोग से ग्रस्त; असृक्-पटाम्--रक्त से सने वस्त्रों वाली; विकीर्य--बिखेरे हुए; पलितान्-- श्वेत; केशान्ू--बाल; तिष्ठतिष्ठ--ठहरो ठहरो; इति--इस प्रकार; भाषिणीम्--कहते हुए; मीन-गन्धि--मछली की गन्ध; असु--जिसकी श्वास;गन्धेन--गन्ध से; कुर्वतीम्--करती हुई; मार्ग-दूषणम्--सारे रास्ते का प्रदूषण |
इन्द्र ने साक्षात् ब्रह्महत्या के फल को एक चाण्डाल स्त्री के समान प्रकट होकर अपनापीछा करते देखा।
वह अत्यन्त वृद्धा प्रतीत होती थी और उसके शरीर के सभी अंग काँप रहेथे।
यक्ष्मा रोग से पीड़ित होने के कारण उसका सारा शरीर तथा वस्त्र रक्त से सने थे।
उसकीश्वास से मछली की-सी असह्य दुगन्ध निकल रही थी जिससे सारा रास्ता दूषित हो रहा था।
उसने इन्द्र को पुकारा, 'ठहरो! ठहरो! 'नभो गतो दिश्ञः सर्वाः सहस्त्राक्षो विशाम्पते ।
प्रागुदीचीं दिशं तूर्ण प्रविष्टो नूप मानसम् ॥
१४॥
नभः--आकाश को; गत:--जाकर; दिश:--दिशाओं को; सर्वा:--समस्त; सहस्त्र-अक्ष:--इन्द्र, जिसके एक हजारआँखें हैं; विशाम्पते--हे राजा; प्राक्-उदीचीम्--उत्तरपूर्व; दिशम्--दिशा में; तूर्णम्--अत्यन्त बेग से; प्रविष्ट:--प्रवेशकिया; नृप--हे राजा; मानसम्ू--मानस-सरोवर नामक झील में |
हे राजन! इन्द्र पहले आकाश की ओर भागा, किन्तु उसने वहाँ भी उस ब्रह्महत्या रूपिणी स्त्री को अपना पीछा करते देखा।
जहाँ कहीं भी वह गया, यह डायन उसका पीछा करतीरही।
अन्त में बह तेजी से उत्तरपूर्व की ओर गया और मानस सरोवर में घुस गया।
स आवसत्पुष्करनालतन्तू-नलब्धभोगो यदिहाग्निदूत: ।
वर्षाणि साहसत्रमलक्षितो न््तःसश्ञिन्तयन्ब्रह्मवधाद्विमोक्षम् ॥
१५॥
सः--वह ( इन्द्र )) आवसत्--रहता रहा; पुष्कर-नाल-तन्तूनू--कमल नाल के तन्तुजाल में; अलब्ध-भोग: --किसी प्रकारकी भौतिक सुविधा न पाते हुए; यत्--जो; इह--यहाँ; अग्नि-दूत:--अग्निदेव नामक दूत; वर्षाणि--स्वर्गीय वर्षो तक;साहस्रमू--एक हजार; अलक्षित:--अदृश्य; अन्त:--अपने हृदय में; सश्चिन्तयन्--सदैव सोचते हुए; ब्रह्म-बधात्--ब्रहमहत्या से; विमोक्षम्-मुक्ति
सदैव यह सोचते हुए कि ब्रह्महत्या से किस प्रकार छुटकारा प्राप्त हो, राजा इन्द्र, सबोंसे अदृश्य रहकर सरोवर में कमलनाल के सूक्ष्म तन्तुओं के भीतर एक हजार वर्ष तक रहा।
अग्निदेव उसे समस्त यज्ञों का उसका भाग लाकर देते, क्योंकि अग्निदेव जल में प्रवेश करनेसे भयभीत थे, अतः इन्द्र एक तरह से भूखों मर रहा था।
तावत्त्रिणाक॑ नहुष: शशासविद्यातपोयोगबलानुभाव: ।
स सम्पदैश्चर्यमदान्धबुद्धि-नींतस्तिरश्लां गतिमिन्द्रपल्या ॥
१६॥
तावतू--तब तक; त्रिणाकम्--स्वर्गलोक; नहुष:--नहुष; शशास--शासन करता रहा; विद्या--शिक्षा; तप:--तपस्या;योग--योग; बल--तथा शक्ति से; अनुभाव:--से युक्त; सः--वह ( नहुष ); सम्पत्--प्रभूत सम्पत्ति का; ऐश्वर्य--तथाऐश्वर्य; मद--घमंड से; अन्ध--अन्धा; बुद्द्धिः--उसकी बुर्द्धि; नीत:--ले जाया गया; तिरश्वाम्--सर्पों की; गतिम्--गन्तव्य को; इन्द्र-पत्या--इन्द्र की पत्नी शी देवी द्वारा।
जब तक राजा इन्द्र कमलनाल के भीतर जल में रहा, नहुष अपने ज्ञान, तप तथा योग के कारण स्वर्गलोक का शासन चलाने के लिए सक्षम बना दिया गया।
किन्तु शक्ति तथा ऐश्वर्यके मद से अंधा होकर उसने इन्द्र की पत्नी के साथ रमण करने का अवांछित प्रस्ताव रखा।
इस प्रकार वह एक ब्राह्मण द्वारा शापित हुआ और बाद में सर्प बन गया।
ततो गतो ब्रह्मगिरोपहूतऋतम्भरध्याननिवारिताघ: ।
पापस्तु दिग्देवतया हतौजा-स्तं नाभ्यभूदवितं विष्णुपत्या ॥
१७॥
ततः--तत्पश्चात्; गत:--चले गये; ब्रह्म--ब्राह्मणों के; गिरा--शब्दों से; उपहूत:--आमंत्रित होकर; ऋतम्भर--सत्य कापोषण करने वाले परमेश्वर में; ध्यान--ध्यान द्वारा; निवारित--रोका जाकर; अघ:--जिसका पाप; पापः--पाप-पूर्ण कर्म;तु--तब; दिक्-देवतया--रुद्रदेव द्वारा; हत-ओजा:--समस्त शौर्य के क्षीण होने पर; तमू--उस ( इन्द्र ) को; नअभ्यभूत्-परास्त नहीं कर सका; अवितम्--सुरक्षित होने से; विष्णु-पतल्या--धन की देवी
भगवान् विष्णु की पत्नीद्वारासमस्त दिशाओं के देवता रुद्र के प्रताप से इन्द्र के पाप कम हो गये।
चूँकि इन्द्र की रक्षामानस-सरोवर के कमल कुंजों में निवास करने वाली धन की देवी भगवान् विष्णु की पत्नीद्वारा की जा रही थी, अतः इन्द्र के पापों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
अन्त में भगवान्विष्णु की निष्ठा-पूर्वक पूजा करने से इन्द्र के सारे पाप छूट गये।
तब ब्राह्मणों ने उसे पुनःस्वर्गलोक में बुलाकर उसके पूर्व पद पर स्थापित कर दिया।
तं च ब्रह्मर्षयोभ्येत्य हयमेधेन भारत ।
यथादद्ीक्षयां चक्र: पुरुषाराधनेन ह ॥
१८॥
तम्--उसको ( इन्धर को ); च--तथा; ब्रह्म-ऋषय: --सभी ऋषि तथा ब्राह्मण; अभ्येत्य--के पास जाकर; हयमेधेन--अश्वमेध यज्ञ के द्वारा; भारत--हे राजा परीक्षित; यथावत्--विधिपूर्वक; दीक्षयाम् चक्कु:--दीक्षा दी; पुरुष-आराधनेन--परम पुरुष हरि की आराधना द्वारा; ह--निस्सन्देह |
हे राजन्! जब इन्द्र स्वर्गलोक में पहुँच गया तो साधुवत् ब्राह्मण उसके पास गये औरपरमेश्वर को प्रसन्न करने के निमित्तअश्वमेध यज्ञ के लिए उसे समुचित रूप से दीक्षित किया।
अथेज्यमाने पुरुषे सर्वदेवमयात्मनि ।
अश्रमेथधे महेन्द्रेण वितते ब्रह्मगादिभि: ॥
१९॥
स वै त्वाष्टवधो भूयानपि पापचयो नृप ।
नीतस्तेनैव शून्याय नीहार इब भानुना ॥
२०॥
अथ--अतः; इज्यमाने--पूजित होकर; पुरुषे-- श्री भगवान्; सर्व--समस्त; देव-मय-आत्मनि--परमात्मा तथा देवताओंके पालक; अश्रमेधे--अश्वमेध यज्ञ के माध्यम से; महा-इन्द्रेण--राजा इन्द्र द्वारा; वितते--सम्पन्न कराया गया; ब्रह्म-वादिभि:--वैदिक ज्ञान में दक्ष ऋषियों तथा ब्राह्मणों द्वारा; स:ः--वह; वै--निस्सन्देह; त्वाष्ट-वध: --त्वष्टा के पुत्र वृत्रासुरका वध; भूयात्--हो; अपि--यद्यपि; पापचय: -- पाप समूह; नृप--हे राजा; नीत:--लाया गया; तेन--उस ( अश्वयज्ञ )के द्वारा; एव--निश्चय ही; शून्याय--शून्य, कुछ नहीं; नीहार:--कोहरा; इब--सहद्ृश; भानुना--तेजमय सूर्य के द्वारा।
ऋषितुलय ब्राह्मणों द्वारा सम्पन्न किये गये अश्वमेध यज्ञ ने इन्द्र को समस्त पाप-बन्धनों सेमुक्त कर दिया, क्योंकि उस यज्ञ में उसने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा की थी।
हे राजन!यद्यपि उसने गम्भीर पापकृत्य किया था, किन्तु उस यज्ञ से वह पाप कृत्य तुरन्त उसी प्रकारविनष्ट हो गया, जिस प्रकार सूर्य के तेज प्रकाश से कोहरा छँट जाता है।
स वाजिमेधेन यथोदितेनवितायमानेन मरीचिमिश्रे: ।
इष्टाधियज्ञं पुरुष पुराण-मिन्द्रो महानास विधूतपाप: ॥
२१॥
सः--वह ( इन्द्र )) वाजिमेधेन--अश्वमेध यज्ञ से; यथा--जिस प्रकार; उदितेन--वर्णित; वितायमानेन--सम्पन्न होकर;मरीचि-मिश्रे:--मरीचि आदि पुरोहितों द्वारा; इश्ठा--पूजा करके; अधियज्ञम्--परम परमात्मा को; पुरुषम् पुराणम्--आदिभगवान्; इन्द्र:--राजा इन्द्र; महानू--पूज्य; आस--हो गया; विधूत-पाप:--समस्त पापों के धुल जाने से ।
मरिचि तथा अन्य महर्षियों ने राजा इन्द्र पर कृपा की और विधिपूर्वक आदि पुरुष,परमात्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा कर के यज्ञ सम्पन्न किया।
इस प्रकार इन्द्र नेअपनी उन्नत स्थिति पुनः प्राप्त कर ली तथा वह प्रत्येक के द्वारा फिर से सम्मानित हुआ।
इदं महाख्यानमशेषपाप्मनांप्रक्षालनं तीर्थपदानुकीर्तनम् ।
भक्त्युच्छुयं भक्तजनानुवर्णनंमहेन्द्रमोक्षं विजयं मरुत्वत: ॥
२२॥
पठेयुराख्यानमिदं सदा बुधा: श्रुण्वन्त्यथो पर्वणि पर्वणीन्द्रियम् ।
धन्यं यशस्यं निखिलाघमोचनंरिपुद्जयं स्वस्त्ययनं तथायुषम् ॥
२३॥
इदम्--यह; महा-आख्यानम्--महान् ऐतिहासिक घटना; अशेष-पाप्मनाम्-- अनन्त पापों की; प्रक्षालनम्--स्वच्छ करनेके लिए; तीर्थपद-अनुकीर्तनम्--तीर्थयद कहे जाने वाले श्रीभगवान् का यशोगान करते हुए; भक्ति-- भक्तियोग का;उच्छुयम्--बढ़ते हुए; भक्त-जन--भक्तगण; अनुवर्णनम्--वर्णन करते हुए; महा-इन्द्र-मोक्षम्--स्वर्ग के राजा की मुक्ति;विजयमू्--विजय; मरुत्वत:--राजा इन्द्र की; पठेयु:--पढ़ना चाहिए; आख्यानम्--कथा; इृदम्--यह; सदा--सदैव;बुधा:--विद्वान पुरुष; श्रृण्वन्ति--सुनते रहते हैं; अथो--भी; पर्वणि पर्वणि--बड़े उत्सवों के अवसर पर; इन्द्रियम्--इन्द्रियों को तीक्ष्ण करने वाला; धन्यम्--धन लाता है; यशस्यम्ू--यश लाता है; नेखिल--सभी; अघ-मोचनम्--पापों सेमुक्त करते हुए; रिपुम्-जयम्--शत्रुओं के ऊपर विजयी बनाता है; स्वस्ति-अयनम्--सबों के लिए कल्याणकारी है;तथा--उसी प्रकार; आयुषम्--आयु।
इस महान् आख्यान में भगवान् नारायण की महिमा का वर्णन हुआ है, भक्तियोग कीमहानता के सम्बन्ध में कथन दिए गए हैं, इन्द्र तथा वृत्रासुर जैसे भक्तों के वर्णन आए हैंतथा पापी जीवन से इन्द्र के मोक्ष एवं असुरों के साथ लड़े गये युद्धों में उसकी विजय केसम्बन्ध में विवरण दिए गये हैं।
इस आख्यान को समझ लेने पर सभी पाप-फलों सेछुटकारा मिल जाता है।
अतः विद्वानों को सदा सलाह दी जाती है कि इस आख्यान को पढ़ें ।
जो ऐसा करेगा उसकी इन्द्रियाँ अपने कार्य में निपुण होंगी, उसका ऐश्वर्य बढ़ेगा और यशचारों ओर फैलेगा।
उसके समस्त पाप-फल मिट जायेंगे, उसे अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्तहोगी और उसकी आयु बढ़ेगी।
चूँकि यह आख्यान सभी तरह से कल्याणकारी है, अतःदिद्वान व्यक्ति इसको प्रत्येक शुभ उत्सव के अवसर पर नियमित रूप से सुनते और दोहरातेहैं।
