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अध्याय सोलह: राजा चित्रकेतु का परम भगवान से मिलन

6.16श्रीबादरायणिरुवाचअथ देवऋषी राजन्सम्परेतं नृपात्मजम्‌ ।

दर्शयित्वेतिहोवाच ज्ञातीनामनुशोचताम्‌ ॥

१॥

श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--इस प्रकार; देव-ऋषि:--परम साधु नारद; राजन्‌-हेराजन; सम्परेतम्‌--मृत; नृप-आत्मजम्‌--राजा के पुत्र को; दर्शयित्वा--दिखलाकर; इति--इस प्रकार; ह--निस्सन्देह;उवाच--बताया; ज्ञातीनामू--समस्त सम्बन्धियों को; अनुशोचताम्‌--शोक करने वाले।

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजा परीक्षित! नारद ऋषि ने अपनी योगशक्ति सेशोकाकुल स्वजनों के समक्ष उस पुत्र को ला दिया और फिर वे इस प्रकार बोले।

श्रीनारद उबाचजीवात्मन्पश्य भद्गं ते मातरं पितरं च ते ।

सुहृदो बान्धवास्तप्ता: शुचा त्वत्कृतया भूशम्‌ ॥

२॥

श्री-नारद: उवाच-- श्री नारद मुनि ने कहा; जीव-आत्मन्‌--हे जीवात्मा; पश्य--देखो; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारे;मातरम्‌--माता; पितरम्‌--पिता; च--तथा; ते--तुम्हारे; सुहदः--मित्र; बान्धवा:--सम्बन्धी; तप्ता:--संतप्त, दुखी;शुच्ा--शोक से; त्वत्‌-कृतया--तुम्हारे कारण; भूशम्‌--अत्यधिक |

श्री नारद मुनि ने कहा--हे जीवात्मा! तुम्हारा कल्याण हो।

जरा अपने माता-पिता कोतो देखो।

तुम्हारे चले जाने ( मरने ) से तुम्हारे समस्त मित्र तथा सम्बन्धी शोकाकुल हैं।

कलेवरं स्वमाविश्य शेषमायु: सुहृद्दतः ।

भुड्द्व भोगान्पितृप्रत्तानधितिष्ठ नूपासनम्‌ ॥

३॥

कलेवरम्‌--शरीर में; स्वमू--अपना; आविश्य--प्रवेश करके; शेषम्‌--शेष, बाकी; आयु:--जीवन अवधि; सुहत्‌-बृतः--अपने मित्र तथा सम्बन्धियों से घिरे हुए; भुड्झ््व-- भोग करो; भोगान्‌--समस्त भोग्य ऐश्वर्य; पितृ-- अपने पिताद्वारा; प्रत्तान्‌-- प्रदत्त; अधितिष्ठ --स्वीकार करो; नृप-आसनम्‌--राजसिंहासन को

तुम असमय ही मरे थे इसलिए तुम्हारी आयु अब भी शेष है।

अतः तुम अपने शरीर मेंपुनः प्रवेश करक

े अपने मित्रों तथा स्वजनों की संगति में शेष जीवन का भोग करो।

अपनेपिता द्वारा प्रदत्त यह समस्त ऐ श्वर्य तथा राजसिंहासन स्वीकार करो।

जीव उबाच'कस्मिझ्जन्मन्यमी महां पितरो मातरोभवन्‌ ।

कर्मभिर्भ्राम्यमाणस्य देवतिर्यडनूयोनिषु ॥

४॥

जीव: उबाच--जीवात्मा ने कहा; कस्मिनू--किस; जन्मनि--जन्म में; अमी--ये सब; महाम्‌--मुझको; पितर: --पितृगण;मातरः--माताएँ; अभवनू-- थे; कर्मभि:--कर्मफल से; भ्राम्यमाणस्य-- भ्रमण करने वालों के; देव-तिर्यक्‌--देवताओंतथा निम्न पशुओं के; नू--तथा मनुष्य जाति के; योनिषु--गर्भो में |

नारद मुनि की योगशक्ति से जीवात्मा थोड़े समय के लिए मृत शरीर में पुनः प्रविष्ट हुआऔर नारद मुनि के अनुरोध पर इस प्रकार बोला, 'मैं ( जीव ) अपने कर्म-फलों के अनुसारएक शरीर से दूसरे शरीर में देहान्तर करता रहता हूँ; इस प्रकार कभी देवताओं की योनि मेंरहता हूँ तो कभी निम्न पशुओं, अथवा वनस्पतियों में और कभी मनुष्य योनि में रहता हूँ।

अतः ये किस जन्म में मेरे माता तथा पिता थे?

वास्तव में न तो कोई मेरी माता है और नकोई पिता।

तो मैं इन दोनों व्यक्तियों को अपने माता-पिता के रूप में केसे स्वीकार करसकता हूँ?

बश्धुज्ञात्यरिमध्यस्थमित्रोदासीनविद्विष: ।

सर्व एव हि सर्वेषां भवन्ति क्रमशो मिथः ॥

५॥

बन्धु--दोस्त; ज्ञाति--कुटुम्बी; अरि--शत्रु; मध्यस्थ--बिचौलिए; मित्र--शुभचिन्तक; उदासीन---उदासीन ; विद्विष:--अथवा द्वेषी; सर्वे-- सभी; एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; सर्वेषाम्‌--सबों का; भवन्ति--होते हैं; क्रमश:--धीरे-धीरे;मिथः--परस्पर |

यह भौतिक जगत नदी की भाँति प्रवहमान है, जो अपने जीवात्मा को लिये जा रही हैऔर जिसमें सभी लोग समयानुसार मित्र, कुटुम्बी तथा शत्रु बनते रहते हैं।

वे उदासीन,मध्यस्थ, द्वेषी तथा कई अन्य प्रकारों से कार्य करते हैं।

इतने पर भी कोई किसी से स्थायीरूप से सम्बद्ध नहीं है।

यथा वस्तूनि पण्यानि हेमादीनि ततस्ततः ।

पर्यटन्ति नरेष्वेब॑ जीवो योनिषु कर्तृषु ॥

६॥

यथा--जिस प्रकार; वस्तूनि--वस्तुएँ; पण्यानि--क्रय-विक्रय के हेतु; हेम-आदीनि--यथा सोना; ततः ततः--यहाँ सेवहाँ; पर्यटन्ति--घूमते रहते हैं; नरेषु--मनुष्यों के बीच; एवम्‌--इस प्रकार; जीव:--जीवात्मा; योनिषु--विभिन्न योनियोंमें; कर्तुषु--विभिन्न भौतिक पिता के रूपों में ।

जिस प्रकार सोना तथा अन्य व्यापारिक वस्तुएँ समय-समय पर क्रम-विक्रम के कारणलगातार एक स्थान से दूसरे स्थान को स्थानान्तरित होती रहती हैं उसी प्रकार जीवात्मा भीअपने कर्मो के कारण पूरे ब्रह्माण्ड में घूमता रहता है।

नित्यस्यार्थस्य सम्बन्धो ह्ानित्यो दृश्यते नूषु ।

यावद्यस्य हि सम्बन्धो ममत्वं तावदेव हि ॥

७॥

नित्यस्य--नित्य; अर्थस्य--वस्तु का; सम्बन्ध:--सम्बन्ध; हि--निस्सन्देह; अनित्य:--अनित्य, क्षणिक; दृश्यते--दिखाईपड़ता है; नूषु--मानव समाज में; यावत्‌--जब तक; यस्य--जिसका; हि--निसन्देह; सम्बन्ध: --सम्बन्ध:; ममत्वम्‌ू--मालिकाना, ममता; तावत्‌--तब तक; एव--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही |

कुछ ही जीवात्माएँ मनुष्य योनि में जन्म लेती हैं और शेष दूसरी पशु-योनि में जन्मती हैं।

यद्यपि ये दोनों ही जीवात्माएँ हैं, किन्तु इनके सम्बन्ध अस्थायी हैं।

कोई पशु किसी मनुष्य केअधिकार में कुछ काल तक रहकर किसी दूसरे के अधिकार में जा सकता है।

जब पशु चला जाता है पहले वाले मालिक का स्वामित्व भी चला जाता है।

जब तक वह पशु उसकेअधिकार में रहता है, उसके प्रति उसका लगाव रहता है, किन्तु उसको बेचते ही सारा लगावछूट जाता है।

एवं योनिगतो जीव: स नित्यो निरहड्डू तः ।

यावद्यत्रोपलभ्येत तावत्स्वत्वं हि तस्य ततू ॥

८॥

एवम्‌--इस प्रकार; योनि-गत:--किसी विशेष योनि में जाकर; जीव: --जीवात्मा; सः--वह; नित्य:--नित्य, शाश्वत;निरहडु तः--अहंकाररहित; यावत्‌--जब तक; यत्र--जहाँ; उपलभ्येत--वह पाया जा सकता है; तावत्‌--तब तक;स्वत्वमू--स्व का ज्ञान; हि--निस्सन्देह; तस्थ--उसका; तत्‌--वह

भले ही एक जीवात्मा मर्त्यदेहों के सम्बन्धों के कारण दूसरी जीवात्मा से सम्बद्ध जानपड़े, किन्तु जीवात्मा शाश्वत है।

वास्तव में शरीर ही जन्मता है और नष्ट होता है, जीवात्मानहीं।

हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि जीवात्मा की उत्पत्ति या मृत्यु होती है।

जीवात्मा कातथाकथित माता-पिता से कोई सम्बन्ध नहीं होता।

जब तक जीवात्मा अपने पूर्व कर्म केफलस्वरूप किन्हीं माता-पिता का पुत्र बन कर प्रकट होता है तभी तक माता-पिता द्वाराप्रदत्त शरीर से उसका नाता रहता है।

इस प्रकार वह अपने को मिथ्या ही उनका पुत्र मानकरअत्यन्त स्नेह जताता है।

मरने के बाद यह सम्बन्ध नष्ट हो जाता है।

ऐसी परिस्थितियों मेंमनुष्य को झूठे ही हर्ष तथा शोक में लीन नहीं होना चाहिए।

एष नित्योव्यय: सूक्ष्म एष सर्वाश्रय: स्वहक्‌ ।

आत्ममायागुणर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभु: ॥

९॥

एष:--यह जीवात्मा; नित्य:--नित्य, शाश्वत; अव्यय:--अविनाशी; सूक्ष्म: --सूक्ष्म ( आँख से न दिखाई पड़ने वाला );एष:--यह जीवात्मा; सर्व-आश्रय: --विभिन्न प्रकार के देहों का कारण; स्व-हक्‌--स्वयं-तेज; आत्म-माया-गुणै: --श्रीभगवान्‌ की माया के गुणों द्वारा; विश्वम्‌--इस भौतिक जगत में; आत्मानम्‌--अपने आपको; सृजते-- प्रकट कर देताहै; प्रभु:--स्वामी |

जीवात्मा नित्य तथा अविनाशी है क्योंकि इसका आदि तथा अन्त नहीं है।

न तो उसकाजन्म होता है, न मृत्यु।

वह समस्त प्रकार की देहों का मूल है, तो भी उसकी दैहिक वर्ग में गिनती नहीं होती।

जीवात्मा इतना उच्च है कि परमात्मा के ही समधर्मा है।

तो भी, अत्यन्तसूक्ष्म होने से वह बहिरंगा शक्ति द्वारा मोहित होता रहता है और अपनी इच्छाओं के अनुसारअपने लिए विभिन्न देहें उत्पन्न करता है।

न हास्यास्ति प्रिय: कश्रिन्नाप्रिय: स्व: परोडपि वा ।

एक: सर्वधियां द्रष्टा कर्तृणां गुणदोषयो: ॥

१०॥

न--न तो; हि--निस्सन्देह; अस्य--जीवात्मा का; अस्ति--है; प्रियः--प्रिय; कश्चित्‌ू--कोई; न--न तो; अप्रिय: --अप्रिय; स्व:--अपना; पर: --पराया; अपि-- भी; वा-- अथवा; एक: --एक ; सर्व-धियाम्‌--बुद्धि के विभिन्न प्रकारोंका; द्रष्टा--देखने वाला; कर्तृणाम्‌ू--करने वालों का; गुण-दोषयो: --गुण तथा दोष का, उचित-अनुचित का

इस जीवात्मा को न तो कोई प्रिय है, न कोई अप्रिय।

यह अपने पराये में भेद-भाव नहींरखता।

यह अनन्य है, अर्थात्‌ यह न तो मित्रों तथा शत्रुओं, न ही शुभचिन्तकों या दुराग्रहकरने वालों से प्रभावित होता है।

यह मनुष्यों के विभिन्न गुणों का मात्र दर्शक अथवा साक्षीहै।

नादत्त आत्मा हि गुणं न दोष न क्रियाफलम्‌ ।

उदासीनवदासीनः परावरहगीश्वर: ॥

११॥

न--नहीं; आदत्ते--स्वीकार करता है; आत्मा--परमात्मा; हि--निश्चय ही; गुणम्‌--सुख; न--नहीं; दोषम्‌--दुख; न--नतो; क्रिया-फलम्‌--किसी कर्म का फल; उदासीन-वत्‌--उदासीन पुरुष की तरह; आसीन:--बैठे हुए ( हृदय में ); पर-अवर-हक्‌-कार्य और कारण को देखते हुए; ई श्वरः--पर मे श्वर।

कार्य और कारण का स्त्रष्टा यह आत्मा सकाम कर्मों से जनित सुख तथा दुख कोस्वीकार नहीं करता।

वह भौतिक देह स्वीकार करने या न करने के लिए परम स्वतंत्र है औरभौतिक शरीर न होने के कारण वह सदैव उदासीन या तटस्थ रहता है।

जीवात्मा ईश्वर काभिन्न अंश है और सूक्ष्म मात्रा में उनके गुणों को धारण किए रहता है।

अतः मनुष्य को शोक से प्रभावित नहीं होना चाहिए।

श्रीबादरायणिरुवाचइत्युदीर्य गतो जीवो ज्ञातयस्तस्य ते तदा ।

विस्मिता मुमुचु: शोकं छित्त्वात्मस्नेहश्रूद्धुलामू ॥

१२॥

श्री-बादरायणि: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उदीर्य--कहकर; गत:--चला गया; जीव:--जीवात्मा ( जो महाराज चित्रकेतु के पुत्र रूप में प्रकट हुआ था ); ज्ञातय: --सगे-सम्बन्धी; तस्य--उसके; ते--वे; तदा--उस समय; विस्मिता:-- चकित; मुमुचु:--त्याग दिया; शोकम्‌ू--शोक; छित्त्वा--काट कर; आत्म-स्नेह-- सम्बन्ध केकारण स्नेह की; श्रृद्डलाम्‌ू--लोहे की जंजीर।

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--जब महाराज चित्रकेतु के पुत्र रूप में वहबद्धजीव इस प्रकार बोलकर जब चला गया तो चित्रकेतु तथा मृत पुत्र के अन्य सम्बन्धीअत्यन्त विस्मित हुए।

तब उन्होंने उसके साथ अपने सम्बन्ध से उत्पन्न स्नेह-बन्धन को काटदिया और शोक का परित्याग कर दिया।

निर्ईत्य ज्ञातयो ज्ञातेर्देह कृत्वोचिता: क्रिया: ।

तत्यजुर्दुस्त्यजं स्नेहे शोकमोहभयार्तिदम्‌ ॥

१३॥

निईत्य--हटा कर; ज्ञातय: --राजा चित्रकेतु तथा अन्य सम्बन्धी; ज्ञातेः --पुत्र का; देहम्‌--शरीर; कृत्वा--सम्पन्न करके;उचिता:--समुचित; क्रिया:--क्रियाएँ; तत्यजु:--त्याग दिया; दुस्त्यजम्‌-दुस्त्यज, छोड़ने में कठिन; स्नेहम्‌--स्नेह;शोक-शोक; मोह--मोह; भय--डर; अर्ति--तथा दुख; दम्‌--देने वाला।

मृत बालक के शरीर का दाह-संस्कार तथा यथोचित अनुष्ठान सम्पन्न करने के बादसम्बन्धियों ने उस स्नेह को भी त्याग दिया जिसके कारण मोह, शोक, भय तथा दुख कीप्राप्ति होती है।

निस्सन्देह, ऐसे स्नेह को त्याग पाना कठिन है, किन्तु उन्होंने सरलता सेपरित्याग कर दिया।

बालघ्न्यो ब्रीडितास्तत्र बालहत्याहतप्रभा: ।

बालहत्याव्रतं चेरुब्राह्मणैर्यन्रिरूपितम्‌ ।

यमुनायां महाराज स्मरन्त्यो द्विजभाषितम्‌ ॥

१४॥

बाल-घ््यः--बालक का वध करने वाली; ब्रीडिता: -- अत्यन्त लज्जित; तत्र--वहाँ; बाल-हत्या--बालक को मारने केकारण; हत--हीन; प्रभा: --समस्त शारीरिक द्युति; बाल-हत्या-ब्रतम्‌--बालक की हत्या का प्रायश्ित्त्‌; चेरु:--क्रिया;ब्राह्मणै: --पुरोहितों के द्वारा; यत्‌ू--जो; निरूपितम्‌--कथित; यमुनायाम्‌--यमुना नदी के तट पर; महा-राज--हे राजापरीक्षित; स्मरन्त्यः--स्मरण करते हुए; द्विज-भाषितम्‌--ब्राह्मण के द्वारा दिये गये आदेश ।

रानी कृतद्युति की सौतें, जिन्होंने बालक को विष दिया था, अत्यन्त लज्जित हुई और उनके शरीर कान्तिविहीन हो गये।

हे राजन्‌! शोक करते हुए उन्हें ऋषि अंगिरा के उपदेशस्मरण हो आए और उन्‍होंने पुत्र उत्पन्न करने की कामना का परित्याग कर दिया।

ब्राह्मणों केनिर्देशानुसार वे यमुना के तट पर गईं, वहाँ पर स्नान किया और अपने पापकर्मो के लिएप्रायश्वित्त किया।

स इश्थं प्रतिबुद्धात्मा चित्रकेतुद्विजोक्तिभि: ।

गृहान्धकृपान्निष्क़रान्तः सरःपड्ढादिव द्विपः ॥

१५॥

सः--वह; इत्थम्‌--इस प्रकार; प्रतिबुद्ध-आत्मा--आत्मज्ञान से भली-भाँति परिचित होकर; चित्रकेतु:--राजा चित्रकेतु;द्विज-उक्तिभि:--परम ब्राह्मणों ( अंगिरा तथा नारद मुनि ) के आदेश से; गृह-अन्ध-कूपात्‌-गृहस्थ जीवन के अन्धे कुएँसे; निष्क्रान्त:--बाहर निकल आया; सर: --झील या जलाशय के; पड्ढातू--कीचड़ से; इब--समान; द्विप: --हाथी के

परम ब्राह्मण अंगिरा तथा नारद के उपदेशों से जाग्रत होकर राजा चित्रकेतु आत्मज्ञान सेभलीभाँति अवगत हो गया।

जिस प्रकार हाथी कीचड़-युक्त जलाशय से बाहर निकल आताहै, वैसे ही राजा चित्रकेतु गृहस्थ जीवन के अंधकूप से बाहर निकल आया।

कालि-न्द्ां विधिवत्स्नात्वा कृतपुण्यजलक्रिय: ।

मौनेन संयतप्राणो ब्रह्मपुत्राववन्दत ॥

१६॥

कालिन्द्यामू--यमुना नदी में; विधि-वत्‌--विधिपूर्वक; स्नात्वा--नहा कर; कृत--पूरा करते हुए; पुण्य--पावन; जल-क्रियः--तर्पण, जल देने की क्रिया; मौनेन--गम्भीरतापूर्वक; संयत-प्राण:--मन तथा इन्द्रियों को संयमित करके; ब्रह्म-पुत्रौ--ब्रह्माजी के दोनों पुत्रों ( अंगिरा तथा नारद ) की; अवन्दत--वन्दना की |

राजा ने यमुना जल में स्नान किया और विधिपूर्वक अपने पितरों तथा देवताओं को जलका अर्घध्य दिया।

फिर इन्द्रियों तथा मन को बड़े विकटता से संयमित करते हुए उन्होंनेब्रह्माजी के दोनों पुत्रों ( अंगिरा तथा नारद ) को नमस्कार किया।

अथ तस्मै प्रपन्नाय भक्ताय प्रयतात्मने ।

भगवान्नारदः प्रीतो विद्यामेतामुवाच ह ॥

१७॥

अथ--तदनन्तर; तस्मै--उस; प्रपन्नाय--शरणागत; भक्ताय--भक्त को; प्रयत-आत्मने-- आत्म-संयमी; भगवानू-- अत्यन्तशक्तिमान; नारद: --नारद; प्रीत:--अत्यधिक प्रसन्न; विद्यामू-दिव्य ज्ञान; एतामू--यह; उवाच--बोले; ह--निस्सन्देह।

तत्पश्चात्‌ आत्मसंयमी तथा शरणागत भक्त चित्रकेतु पर अत्यधिक प्रसन्न होकरसर्वाधिक शक्तिमान मुनि नारद ने निम्नानुस्तर दिव्य उपदेश दिया।

नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय धीमहि ।

प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नम: सड्डूर्षणाय च ॥

१८॥

नमो विज्ञानमात्राय परमानन्दमूर्तये ।

आत्मारामाय शान्ताय निवृत्तद्वैतदृष्टये ॥

१९॥

ॐ--हे ईश्वर; नम:--नमस्कार है; तुभ्यमू--तुमको; भगवते-- श्री भगवान्‌; वासुदेवाय--वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण को;धीमहि--ध्यान करने दो; प्रद्यम्नाय--प्रद्यम्न को; अनिरुद्धाय--अनिरुद्ध को; नम:--नमस्कार है; सड्डर्षणाय-- भगवान्‌संकर्षण को; च--भी; नम:ः--नमस्कार है; विज्ञान-मात्राय--ज्ञान से पूर्ण रूप को; परम-आनन्द-मूर्तये--दिव्य आनन्द सेपूर्ण; आत्म-आरामाय--आत्मनिर्भर ( आत्माराम ) भगवान्‌ को; शान्ताय--तथा शान्त; निवृत्त-द्वैत-दृष्टये--जिसकी दृष्टिद्वैत से हट गई है, अथवा जो अद्वितीय है।

[नारद ने चित्रकेतु को निम्नलिखित मंत्र प्रदान किया।

३»कार ( प्रणव ) नाम सेसम्बोधित किये जाने वाले हे ईश्वर, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌! मैं आपको सादर नमस्कारकरता हूँ।

हे भगवान्‌ वासुदेव! मैं आपका ध्यान करता हूँ।

हे भगवान्‌ प्रद्यम्मन, भगवान्‌अनिरुद्ध तथा भगवान्‌ संकर्षण! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

हे दिव्य शक्ति केआगार, हे परमानन्द! मैं आत्मनिर्भर ( आत्माराम ) तथा परम शान्त आपको सादर नमस्कारकरता हूँ।

हे परम सत्य, अद्वितीय! आप ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान्‌ रूप में जाने जाते हैं,अतः आप समस्त ज्ञान के आगार हैं।

मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

आत्मानन्दानु भूत्यैव न्यस्तशक्त्यूमये नमः ।

हृषीकेशाय महते नमस्तेनन्तमूर्तये ॥

२०॥

आत्म-आनन्द--आपके अपने आनन्द की; अनुभूत्या-- अनुभूति से; एब--निश्चय ही; न्यस्त--परित्यक्त; शक्ति-ऊर्मये --भौतिक शक्ति ( माया ) की लहरें; नम:ः--नमस्कार; हषीकेशाय--इन्द्रियों के परम नियामक को; महते--परमात्मा को;नमः--नमस्कार; ते--तुमको; अनन्त--असीम; मूर्तये--जिनका विस्तार ( प्रकाश )

अपने व्यक्तिगत आनन्द का अनुभव करते हुए आप सदैव भौतिक प्रकृति की लहरों केपरे हैं।

अतः हे ईश्वर! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

आप इन्द्रियों के परम नियामक( प्रेरक ) हैं और आपके रूप के प्रकाश ( विस्तार ) अनन्त हैं।

आप परम महान्‌ हैं, अतः मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

वच्स्युपरतेउप्राप्प य एको मनसा सह ।

अनामरूपश्रिन्मात्र: सोउव्यान्न: सदसत्पर: ॥

२१॥

वचसि--जब शब्द ( वाणी ); उपरते--नहीं रहते; अप्राप्प--लक्ष्य न प्राप्त करके; य:--जो; एक:--एक; मनसा--मनके; सह--साथ; अनाम--बिना नाम का; रूप:--अथवा भौतिक रूप; चित्‌-मात्र:--पूर्णतया आध्यात्मिक; सः--वह;अव्यातू--रक्षा करे; न:ः--हमारी; सत्‌-असत्‌-पर:--जो समस्त कारणों का कारण ( परम कारण ) है

बद्धजीव की वाणी तथा मन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ तक नहीं पहुँच पाते क्योंकि वेनितान्त आत्मस्वरूप, स्थूल तथा सूक्ष्म रूपों की अवधारणाओं से परे हैं, अतः उन परभौतिक नाम तथा रूप लागू नहीं होते।

निर्गुण ब्रह्म उनके अन्य रूपों में से है।

वे अपनेआनन्द-स्वरुप से हमारी रक्षा करें।

यस्मिन्निदं यतश्वैदं तिष्ठत्यप्पेति जायते ।

मृण्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नम: ॥

२२॥

यस्मिनू--जिसमें; इदम्‌--यह ( दृश्य जगत ); यत:--जिससे; च-- भी; इदम्‌--यह ( हृश्य जगत ); तिष्ठति--स्थित है;अप्येति--विलीन होता है; जायते--उत्पन्न होता है; मृत्‌-मयेषु--मिट्टी से बनी वस्तुओं में; इब--के जैसा; मृत्‌-जाति: --मिट्टी से जन्मा; तस्मै--उस ( ईश्वर ); ते--तुमको; ब्रह्मणे--परम कारण; नम:--नमस्कार |

जिस प्रकार मिट्टी के पात्र बनाये जाने के बाद पृथ्वी पर स्थित रहते हैं और तोड़ दियेजाने पर पुनः मिट्टी बन जाते हैं, उसी प्रकार से यह हृश्य जगत परम ब्रह् द्वारा उत्पन्न कियाजाता है, उन्हीं में स्थित रहता है और उन्हीं में विलीन हो जाता है।

अतः ब्रह्म के कारणस्वरूप पूर्ण पुरुषोत्तम को हमारा सादर नमस्कार है।

यन्न स्पृशन्ति न विदुर्मनोबुद्धीन्द्रियासव: ।

अन्तर्बहिश्च विततं व्योमवत्तन्नतोस्म्यहम्‌ ॥

२३॥

यत्‌--जिसको; न--नहीं; स्पृशन्ति--छू सकता है; न--नहीं; विदु:--जान सकता है; मन: --मन; बुद्धि--बुद्धि;इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; असव: -- प्राण; अन्त:ः--भीतर; बहि:ः--बाहर; च-- भी; विततम्‌-- प्रसारित; व्योम-वत्‌-- आकाश केसमान; तत्‌--उसको; नतः--प्रणत; अस्मि--हूँ; अहम्‌--मैं |

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ से प्रादुर्भूत होकर परम ब्रह्म व्योम की तरह विस्तृत हो जाता है।

यद्यपि इसको कोई भौतिक पदार्थ स्पर्श नहीं कर सकता, किन्तु यह भीतर तथा बाहरविद्यमान है।

तो भी मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ तथा प्राणशक्ति न तो उसका स्पर्श कर सकती हैं, नउसे जान सकती हैं।

मैं उनको सादर नमस्कार करता हूँ।

देहेन्द्रियप्राणमनोधियो मीयदंशविद्धा: प्रचरन्ति कर्मसु ।

नैवान्यदा लौहमिवाप्रतप्तंस्थानेषु तद्द्रष्टपदेशमेति ॥

२४॥

देह--शरीर; इन्द्रिय--इन्द्रिय; प्राण--प्राणशक्ति; मन:--मन; धिय: --तथा बुद्द्धि; अमी--ये सब; यत्‌-अंश-विद्धा:--ब्रह्म या परमेश्वर की किरणों से प्रभावित; प्रचरन्ति--फैलती हैं; कर्मसु--विभिन्न गतिविधियों में; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अन्यदा--अन्य अवसरों पर; लौहम्‌--लोहा; इब--के समान; अप्रतप्तम्‌ू--( अग्नि से ) अतप्त; स्थानेषु--उनस्थितियों में; तत्‌--वह; द्रष्ट-अपदेशम्‌--किसी दृष्ट वस्तु का नाम; एति--प्राप्त करता है

जिस प्रकार अग्नि के सम्पर्क से तप्त हुआ लोहा भस्म कर देने में समर्थ है उसी प्रकारशरीर, इन्द्रियाँ, प्राणशशक्ति, मन तथा बुद्धि पदार्थ के पिण्ड मात्र होते हुए भी श्रीभगवान्‌द्वारा चेतना के कणमात्र से पूरित होने पर अपने-अपने कार्य करने लगते हैं।

जिस प्रकारअग्नि में तप्त हुए बिना लोहा कुछ भी जला पाने में अशक्त रहता है उसी प्रकार ये शारीरिकइन्द्रियाँ परमेश्वर की कृपादृष्टि के बिना कार्य नहीं कर सकतीं।

नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतयेसकलसात्वतपरिवृढनिकर |

रकमलकुड्मलोपलालितचरणारविन्दयुगल परमपरमेष्ठिन्नमस्ते ॥

२५॥

नम:--नमस्कार; भगवते--छ: ऐश्वर्यों से पूर्ण ब्रह्म आपको; महा-पुरुषाय--परम भोक्ता; महा-अनुभावाय--परम सिद्ध आत्मा या परमात्मा; महा-विभूति-पतये--समस्त योग-शक्तियों के स्वामी; सकल-सात्वत-परिवृढ--समस्त श्रेष्ठ भक्तों का; निकर--समूह; कर-कमल--कमल रूपी हाथों का; कुड्मल--कलियों का;उपलालित--सेवित; चरण-अरविन्द-युगल--जिनके दोनों चरणकमल; परम--सर्वोच्च; परमे-ष्ठटिन्‌ू--वैकुण्ठलोक मेंस्थित; नमः ते--आपको नमस्कार है।

हे वैकुण्ठलोक में आसीन दिव्य ईश्वर! आपके चरणकमल सदैव श्रेष्ठ-भक्तों के समुदायके करकमलों के द्वारा चाँपे जाते हैं।

आप छः ऐश्वर्यों से पूर्ण श्रीभगवान्‌ हैं।

आप पुरुषसूक्तकी स्तुतियों में वर्णित परम पुरुष हैं।

आप परम पूर्ण, समस्त योग-शक्तियों के स्वरूपसिद्धस्वामी हैं।

मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

श्रीशुक उवाचभक्तायैतां प्रपन्नाय विद्यामादिश्य नारद: ।

ययावड्डिरसा साक॑ धाम स्वायम्भुवं प्रभो ॥

२६॥

श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; भक्ताय--भक्त को; एताम्‌--यह; प्रपन्नाय--शरणागत को; विद्याम्‌ू--दिव्य ज्ञान; आदिश्य--उपदेश देकर; नारद:--परम साधु नारद; ययौ--चले गये; अड्भिससा--परम सन्त अंगिरा;साकम्‌--के साथ; धाम--सर्वोच्च लोक के लिए; स्वायम्भुवम्‌--ब्रह्माजी के; प्रभो--हे राजन्‌ |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--चित्रकेतु के पूर्णतः शरणागत होने पर गुरु होजाने के कारण नारद ने इस स्तुति के द्वारा उसे पूरा पूरा उपदेश दिया।

हे राजा परीक्षित!तत्पश्चात्‌ अंगिरा ऋषि सहित नारद मुनि ब्रह्मलोक नामक सर्वोच्च लोक के लिए चल पड़े।

चित्रकेतुस्तु तां विद्यां यथा नारदभाषिताम्‌ ।

धारयामास सप्ताहमब्भक्षः सुसमाहितः ॥

२७॥

चित्रकेतु:--राजा चित्रकेतु ने; तु--निस्सन्देह; तामू--उस; विद्याम्‌-दिव्य ज्ञान को; यथा--जिस प्रकार; नारद-भाषिताम्‌ू--परम साधु नारद द्वारा उपदेश दिया गया; धारयाम्‌ आस--जाप किया; सप्त-अहम्‌--लगातार एक सप्ताहतक; अपू-भक्ष:--केवल जल पीकर; सु-समाहितः--अत्यन्त ध्यानपूर्वक |

केवल जल पीकर उपवास करते हुए राजा चित्रकेतु ने नारद मुनि द्वारा दिये गये मंत्र काएक सप्ताह तक अत्यन्त ध्यानपूर्वक लगातार जप किया।

ततः स सप्तरात्रान्ते विद्यया धार्यमाणया ।

विद्याधराधिपत्यं च लेभेप्रतिहतं नूप ॥

२८ ॥

ततः--इससे; सः--वह; सप्त-रात्र-अन्ते--सात रातों के बाद; विद्यया--स्तुतियों से; धार्यमाणया--अत्यन्त सावधानी सेअभ्यास करने से; विद्याधर-अधिपत्यम्‌--विद्याधरों का स्वामित्व ( बीच के फल के रूप में ); च-- भी; लेभे--प्राप्तकिया; अप्रतिहतम्‌--गुरु द्वारा दिये गये उपदेशों से विचलित न होते हुए; नृप--हे राजा परीक्षित |

हे राजा परीक्षित! अपने गुरु से प्राप्त मंत्र को केवल सात दिनों तक अभ्यास करने परराजा चित्रकेतु को अन्तिम फल के रूप में आत्मज्ञान हो जाने से विद्याधर लोक का राज्यप्राप्त हुआ।

ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगति: ।

जगाम देवदेवस्य शेषस्थ चरणान्तिकम्‌ ॥

२९॥

ततः--तदनन्तर; कतिपय-अहोभि:--कुछ ही दिनों के भीतर; विद्यया--आध्यात्मिक मंत्र से; इद्ध-मन:-गति:--मन केपथ के प्रकाशित होने से; जगाम--गया; देव-देवस्थ-- अन्य देवताओं के स्वामी; शेषस्थ-- भगवान्‌ शेष के; चरण-अन्तिकम्‌--चरणकमल की शरण में।

तदनन्तर कुछ ही दिनों में चित्रकेतु द्वारा जपे गए मंत्र के प्रभाव से उस का मन आत्म-ज्ञान से अत्यधिक प्रकाशित हो गया और उन्होंने अनन्त देव के चरणारविन्द की शरण प्राप्त मृणालगौरं शितिवाससं स्फुरत्‌-किरीटकेयूरकटित्रकड्भूणम्‌ ।

प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनं वृतंददर्श सिद्धेश्वरमण्डलै: प्रभुम्‌ ॥

३०॥

मृणाल-गौरम्‌--कमल के रेशों के समान श्वेत; शिति-वाससम्‌--नीले रेशम के वस्त्र धारण किये; स्फुरत्‌ू--चमकते हुए;किरीट--मुकुट; केयूर--बाजूबंद, बिजावट; कटित्र--करधनी; कड्ढडूणम्‌--जिनके कंगन; प्रसन्न-वक्त्र--स्मित मुख;अरुण-लोचनम्‌--लाल-लाल नेत्र वाला; वृतम्‌--घिरा हुआ; दरदर्श--देखा; सिद्ध-ईश्वर-मण्डलै:--परम सिद्ध भक्तों केद्वारा; प्रभुमू-- श्रीभगवान्‌ को

भगवान्‌ शेष की शरण में पहुँचकर चित्रकेतु ने देखा कि वे कमल-पुष्प के श्वेत रेशों केसमान ही श्वेत वर्ण के थे।

उन्होंने नीला वस्त्र धारण कर रखा था और चमचमाते मुकुट, बाजूबंद, करधनी तथा कंगन से आभूषित थे।

उनका मुख मन्द हँसी से युक्त था।

उनके नेत्ररक्तिम थे।

वे सनत्कुमार जैसे मुक्त पुरुषों से घिरे हुए थे।

तदर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषःस्वस्थामलान्त:ःकरणो भ्ययान्मुनि: ।

प्रवृद्धभक्‍त्या प्रणया श्रुलोचन:प्रहष्टरोमानमदादिपुरुषम्‌ ॥

३१॥

तत्‌-दर्शन-- श्री भगवान्‌ के दर्शन से; ध्वस्त--विनष्ट; समस्त-किल्बिष:--समस्त पाप; स्वस्थ--स्वस्थ; अमल--तथाशुद्ध; अन्तःकरण: --जिसके हृदय का अभ्यन्तर; अभ्ययात्‌--आमने-सामने पहुँच कर; मुनि:--राजा, जो मानसिक तुष्टिसे शान्त था; प्रवृद्ध-भक्त्या--भक्ति बढ़ने की प्रवृत्ति के कारण; प्रणय-अश्रु-लोचन:--प्रेम के कारण अश्रुपूरित नेत्र;प्रहष्ट-रोम--हर्ष के कारण रोमांचित; अनमत्‌--नमस्कार किया; आदि-पुरुषम्‌--आदि पुरुष को

परमेश्वर का दर्शन पाते ही महाराज चित्रकेतु के समस्त भौतिक कल्मष धुल गये और वेपूर्णतः पवित्र हो जाने के कारण अपनी मूल कृष्णचेतना ( भक्ति ) में स्थित हो गये।

वेपूर्णतः पवित्र हो जाने के कारण शान्त एवं गम्भीर हो गये, ईश्वर के प्रेमवश उनकी आँखों सेअश्रु झरने लगे और अन्त में उन्हें रोमांच हो आया।

उन्होंने अत्यन्त भक्ति तथा प्रेम-पूर्वकआदि भगवान्‌ को सादर नमस्कार किया।

स उत्तमश्लोकपदाब्जविष्टरंप्रेमा श्रुलेशैरुपमेहयन्मुहु: ।

प्रेमोपरुद्धाखिलवर्णनिर्गमोनैवाशकत्तं प्रसमीडितुं चिरम्‌ ॥

३२॥

सः--वह; उत्तमश्लोक-पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का; पद-अब्ज--चरणकमल का; विष्टरम्‌ू--आसन ( चौकी )प्रेम -अश्रु--शुद्ध प्रेम के आँसुओं के; लेशै:--बूँदों से; उपमेहयन्‌ू--सिक्त करके; मुहुः--पुनः पुनः; प्रेम-उपरुद्ध--प्रेम से गलारुँधकर; अखिल--समस्त; वर्ण--अक्षरों का; निर्गम:--बाहर निकलना; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अशकत्‌--समर्थ;तम्‌--उसको; प्रसमीडितुम्‌-- प्रार्थना करने में; चिरम्‌--दीर्घ काल तक।

चित्रकेतु के प्रेमाश्रुओं से भगवान्‌ के चरणकमल का आसन ( चौकी ) बार बार भीगजाता था।

आल्हाद के कारण वाणी अवरुद्ध हो जाने से वे लम्बे अन्तराल तक भगवान्‌ कीउचित स्तुति में एक भी शब्द का उच्चारण न कर पाये।

ततः समाधाय मनो मनीषयाबभाष एतत्प्रतिलब्धवागसौ ।

नियम्य सर्वेन्द्रियबाह्यवर्तनंजगदगुरुं सात्वतशास्त्रविग्रहम्‌ ॥

३३॥

ततः--तत्पश्चात्‌; समाधाय--संयमित करके; मन:--मन को; मनीषया--अपनी बुद्धि से; बभाष--बोला; एतत्‌--यह;प्रतिलब्ध--पुनः प्राप्त करके; वाक्‌ू--वाणी; असौ--वह ( राजा चित्रकेतु ); नियम्य--वश में करके; सर्व-इन्द्रिय--समस्त इन्द्रियों को; बाह्म--बाहरी; वर्तनम्‌--घूमने को; जगत्‌-गुरुम्‌--जो सबों का गुरु; सात्वत--भक्ति का; शास्त्र--शास्त्रों का; विग्रहम्‌-मूर्त रूप |

तत्पश्चात्‌ अपनी बुद्धि के द्वारा मन को वश में करके और अपनी इन्द्रियों को बाह्यविषयों से समेट कर वे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्द ढूँढ सके।

इस प्रकार वे उन भगवान्‌ की स्तुति करने लगे जो साक्षात्‌ शास्त्रों ( ब्रह्म-संहिता तथा नारद-पंचरात्र जैसी सात्वत संहिताओं ) के स्वरूप हैं एवं सबों के गुरु हैं।

उन्होंने निम्नवत्‌ स्तुति की।

चित्रकेतुरुवाचअजित जितः सममतिभिःसाधुभिर्भवान्जितात्मभिर्भवता ।

विजितास्तेडपि च भजता-मकामात्मनां य आत्मदोतिकरुणः ॥

३४॥

चित्रकेतु: उबाच--राजा त्रित्रकेतु ने कहा; अजित-हे दुर्जेय भगवान्‌; जित:--जीता गया; सम-मतिभि:--मन को वश मेंकरने वाले पुरुषों द्वारा; साधुभि:--भक्तों के द्वारा; भवान्‌ू--आप; जित-आत्मभि: --जिन्होंने इन्द्रियों को पूरी तरह जीतलिया है; भवता--आपके द्वारा; विजिता:--जीता जाकर; ते--वे; अपि-- भी; च--तथा; भजताम्‌ू-- आपकी भक्ति मेंलगे रहने वालों को; अकाम-आत्मनाम्‌-- भौतिक लाभ की कामना से रहित, निष्काम; य:--जो; आत्म-द:ः--अपने आपको देने वाले; अति-करुण:--अत्यन्त दयालु

चित्रकेतु ने कहा--हे अजेय भगवान्‌! यद्यपि आप को कोई जीत नहीं सकता, किन्तुउन भक्तों के द्वारा अवश्य जीत लिये जाते हैं जिनका अपने मन तथा इन्द्रियों पर संयम है।

वे आपको इसलिए वश में रख पाते हैं क्योंकि आप उन भक्तों पर अकारण दयालु हैं, जोआपसे किसी प्रकार के लाभ की कामना नहीं करते।

निस्सन्देह, आप उन्हें अपने आपकोप्रदान कर देते हैं; इसलिए अपने भक्तों पर आपका भी पूरा नियंत्रण रहता है।

तव विभव: खलु भगवन्‌जगदुदयस्थितिलयादीनि ।

विश्वसृजस्तेडशांशास्‌तत्र मृषा स्पर्धन्ति पृथगभिमत्या ॥

३५॥

तवब--तुम्हारा; विभव:--ऐश्वर्य; खलु--निस्सन्देह; भगवन्‌--हे भगवान्‌; जगत्‌--हृश्य जगत का; उदय--सृष्टि; स्थिति--पालन; लय-आदीनि--संहार इत्यादि; विश्व-सृज:--दृश्य जगत के कर्ता; ते--वे; अंश-अंशा:--आपके अंश के भीअंशस्वरूप; तत्र--उसमें; मृषा--व्यर्थ; स्पर्धन्ति--स्पर्धा करते हैं; पृथक्‌ू-- अलग; अभिमत्या--मिथ्या विचार से |

हे ईश्वर! यह दृश्य जगत तथा इसकी उत्पत्ति, पालन एवं संहार--ये सभी आपके ऐश्वर्यहैं।

चूँकि ब्रह्मा तथा अन्य कर्ता ( निर्माता ) आपके अंश के भी क्षुद्र अंश हैं, अतः सृष्टि करनेकी उनकी आंशिक शक्ति उन्हें ईश्वर नहीं बना सकती।

तो भी अपने को पृथक्‌ ईश्वर मानबैठने की चेतना उनके अहंकार मात्र की द्योतक है।

यह वैध नहीं है।

परमाणुपरममहतोस्‌त्वमाद्यन्तान्तरवर्ती त्रयविधुर: ।

आदावन्तेडपि च सत्त्वानांयदध्रूवं तदेवान्तरालेडपि ॥

३६॥

परम-अणु--सूक्ष्म कणों का; परम-महतो:--तथा सबसे बड़े ( परमाणुओं के संयोग से बने ) कणों का; त्वम्‌--तुम्हीं;आदि-अन्त--आदि तथा अन्त; अन्तर--तथा बीच में; वर्ती--स्थित; त्रय-विधुर:--आरम्भ, अन्त अथवा मध्य से विहीन;आदौ- प्रारम्भ में; अन्ते--अन्त में; अपि-- भी; च--तथा; सत्त्वानामू--समस्त अस्तित्वों का; यत्‌--जो; ध्रुवमू--अचल;ततू--वह; एब--निश्चय ही; अन्तराले--मध्य में; अपि-- भी

आप इस दृश्य जगत के ननन्‍हें से नन्‍्हें कण-परमाणु से लेकर विराट ब्रह्माण्डों तथासमस्त भौतिक शक्ति तक की प्रत्येक वस्तु के आदि, मध्य तथा अन्त में विद्यमान हैं।

फिरभी आप नित्य हैं, जिसका न कोई आदि है, न अन्त या मध्य।

आप इन तीनों स्थितियों में विद्यमान देखे जाते हैं; इस तरह आप अटल हैं।

जब इस दृश्य जगत का अस्तित्व नहीं रहतातो आप आदि शक्ति के रूप में विद्यमान रहते हैं।

क्षित्यादिभिरिष किलावृतःसप्तभिर्दशगुणोत्तरैरण्डकोश: ।

यत्र पतत्यणुकल्पःसहाण्डकोटिकोटिभिस्तदनन्त: ॥

३७॥

क्षिति-आदिभि:-- भौतिक जगत के अवयवों द्वारा, यथा पृथ्वी इत्यादि; एषघ:--यह; किल--निस्सन्देह; आवृत:--ढकाहुआ; सप्तभि:--सात; दश-गुण-उत्तरैः--प्रत्येक अपने से पहले वाले से दस गुना; अण्ड-कोश:--अण्डाकार ब्रह्माण्ड;यत्र--जिसमें; पतति--गिरता है; अणु-कल्प:--सूक्ष्म कण की भाँति; सह--के साथ; अण्ड-कोटि-कोटिभि:--ऐसेकरोड़ों ब्रह्मण्डों से; तत्‌--अत: ; अनन्त:--( आप ) अनन्त ( कहलाते हैं )

प्रत्येक ब्रह्माण्ड सात आवरणों--पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सकल भौतिकशक्ति तथा अहंकार--से घिरा है जिनमें से प्रत्येक अपने से पहले वाले से दस गुना बड़ा है।

इस ब्रह्माण्ड के अतिरिक्त भी असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, जो असीम और विशाल हैं और आपमेंस्थित परमाणुओं की भाँति चक्कर लगाते रहते हैं।

इसलिए आप अनन्त कहलाते हैं।

विषयतृषो नरपशवोय उपासते विभूतीर्न परं त्वाम्‌ ।

तेषामाशिष ईशतदनु विनश्यन्ति यथा राजकुलम्‌ ॥

३८॥

विषय-तृष: --इन्द्रिय-तृप्ति के उत्सुक; नर-पशव: --पशुतुल्य मनुष्य; ये--जो; उपासते--अत्यन्त भव्य आराधना करते हैं;विभूती:--परमे श्वर के लघु कण ( देवतागण ); न--नहीं; परम्‌--परमात्मा; त्वामू-तुम ( आप ) को; तेषाम्‌--उनका;आशिष: --आशीर्वाद; ईश--हे परम नियन्ता; तत्‌--उन ( देवताओं ) को; अनु--तत्पश्चात्‌; विनश्यन्ति--विनष्ट होंगे;यथा--जिस प्रकार; राज-कुलम्‌--सरकार ( राज्य ) द्वारा सहायता प्राप्त ( सरकार के भंग होने पर ) ॥

हे भगवन्‌, हे परमेश्वर! इन्द्रियतृप्ति के भूखे तथा विभिन्न देवताओं की उपासना करनेवाले अज्ञानी पुरुष नर-वेश में पशुओं के समान हैं।

वे पाशविक वृत्ति के कारण आपकीउपासना न करके नगण्य देवताओं को, जो आपके यश की लघु चिनगारी के समान हैं,पूजते हैं।

समस्त ब्रह्माण्ड के संहार के साथ ये देवता तथा इनसे प्राप्त आशीर्वाद उसी प्रकारविनष्ट हो जाते हैं जिस प्रकार राजा की सत्ता छिन जाने पर राजकीय अधिकारी।

'कामधियस्त्वयि रचितान परम रोहन्ति यथा करम्भबीजानि ।

ज्ञानात्मन्यगुणमयेगुणगणतोउस्य द्न्द्दजालानि ॥

३९॥

'काम-धिय:--इन्द्रिय-तृप्ति की आकांक्षाएँ; त्वयि--तुममें; रचिता:--सम्पन्न की गई; न--नहीं; परम-- भगवान्‌;रोहन्ति--उगते हैं ( अन्य शरीर उत्पन्न करते हैं ); यथा--जिस प्रकार; करम्भ-बीजानि--भुने बीज; ज्ञान-आत्मनि--तुममेंजो ज्ञान से पूर्ण हैं; अगुण-मये--जो भौतिक गुणों से अप्रभावित रहता है; गुण-गणत:--भौतिक गुणों में से; अस्य--व्यक्ति का; इन्द्र-जालानि--द्वैतता का जाल।

हे परमेश्वर! यदि ऐश्वर्य द्वारा इन्द्रियतृप्ति पाने के इच्छुक व्यक्ति भी समस्त ज्ञान के स्त्रोततथा भौतिक गुणों से परे आपकी उपासना करते हैं, तो उनका पुनर्जन्म नहीं होता जिसप्रकार भुने बीज से पौधे नहीं उत्पन्न होते।

जीवात्माओं को जन्म तथा मृत्यु का चक्र भोगनापड़ता है क्योंकि वे भौतिक प्रकृति द्वारा बद्ध हैं परन्तु आप दिव्य हैं, अतः जो आपसे संगतिकरता है, वह भौतिक प्रकृति के बन्धन से छूट जाता है।

जितमजित तदा भवतायदाह भागवतं धर्ममनवद्यम्‌ ।

निष्किज्ञना ये मुनयआत्मारामा यमुपासतेपवर्गाय ॥

४०॥

जितम्‌ू--जीत लिया; अजित--हे अजित, न जीते जा सकने योग्य; तदा--तब; भवता--आपके द्वारा; यदा--जब;आह--कहा; भागवतम्‌--जो भक्त को ईश्वर के पास पहुँचाने में सहायक होता है; धर्मम्‌-- धर्म; अनवद्यम्‌--दोषरहित( निष्कलुष ); निष्किज्ना:--जो ऐश्वर्य के द्वारा सुखी होने की इच्छा नहीं रखते; ये--जो; मुनयः --बड़े-बड़े विचारकतथा महान्‌ साधु; आत्म-आरामा:--आत्म-तुष्ट, आत्माराम; यम्‌--जिसको; उपासते--पूजते हैं; अपवर्गाय-- भौतिकबन्धन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए

है अजित! जब आपने भागवत-धर्म कह सुनाया जो आप के चरणकमलों में शरण लेनेके लिए अकलुषित धार्मिक प्रणाली थी, तो वह आपकी विजय थी।

आत्मतुष्ट ( आत्माराम )चतुःसन के समान निष्काम व्यक्ति, भौतिक कल्मष से मुक्त होने के लिए आपकी उपासनाकरते हैं।

दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि वे आपके चरणारविन्द की शरण प्राप्तकरने के लिए भागवतधर्म को ग्रहण करते हैं।

विषममतिर्न यत्र नृणांत्वमहमिति मम तवेति च यदन्यत्र ।

विषमधिया रचितो यःस ह्वविशुद्ध: क्षयिष्णुरधर्मबहुल: ॥

४१॥

विषम--असमान ( तेरा धर्म, मेरा धर्म या तेरा विश्वास, मेरा विश्वास ); मतिः--चेतना; न--नहीं ; यत्र--जिसमें; नृणाम्‌--मानव समाज का; त्वम्‌--तुम; अहम्‌--मैं; इति--इस प्रकार; मम--मेरा; तब--तेरा; इति--इस प्रकार; च-- भी; यत्‌--जो; अन्यत्र--और कहीं ( भागवत-धर्म के अतिरिक्त ); विषम-धिया--इस विषम बुद्धि के कारण; रचित: --निर्मित;यः--जो; सः--वह धर्म-पद्धति; हि--निस्सन्देह; अविशुद्ध:--अशुद्ध; क्षयिष्णु:--क्षणिक, नाशवान्‌; अधर्म-बहुल: --अधर्म से पूर्ण

भागवतधर्म को छोड़कर शेष सभी धर्म पारम्पारिक विरोधाभासों से पूर्ण हैं औरकर्मफल की सकाम विचारधारा और 'तू और मैं' तथा 'तेरा और मेरा' जैसे भेदभावों से पूर्णहैं।

श्रीमद्भागवत के अनुयायियों में ऐसी चेतना नहीं रहती।

वे कृष्णभावनामृत से पूरितरहते हैं और अपने को श्रीकृष्ण का और श्रीकृष्ण को अपना मानते हैं।

कुछ निम्नकोटि कीभी धार्मिक पद्धतियाँ हैं, जो शत्रुओं को मारने या योगशक्ति प्राप्त करने के लिए निर्मित हैं,किन्तु ये काम तथा द्वेष से पूर्ण होने के कारण अशुद्ध एवं नाशवानू्‌ हैं।

द्वेषपूर्ण होने से वेअधर्म से पूर्ण हैं।

कः क्षेमो निजपरयो:कियान्वार्थ: स्वपरद्गुहा धर्मेण ।

स्वद्रोहात्तव कोपःपरसम्पीडया च तथाधर्म: ॥

४२॥

कः--क्या; क्षेम:--लाभ; निज-- अपना; परयो: --तथा पराया; कियान्‌ू--कितना; वा-- अथवा; अर्थ:--उद्देश्य; स्व-पर-द्रुहा--जो कर्ता तथा अन्यों के प्रति द्वेष करता है; धर्मेण-- धर्म से; स्व-द्रोहात्‌-- अपने आप द्वेष पूर्ण होने से; तब--तुम्हारा; कोप:--क्रो ध; पर-सम्पीडया--अन्यों को कष्ट पहुँचा कर; च-- भी; तथा-- और; अधर्म:--अधर्म ।

ऐसा धर्म जिससे अपने तथा परायों में द्वेष उत्पन्न होता है किस प्रकार लाभप्रद हो सकताहै?

ऐसे धर्म का पालन करने से कौन सा कल्याण हो सकता है?

इससे आखिर क्‍यामिलेगा?

आत्म द्वेष के द्वारा अपने आपको तथा अन्यों को कष्ट पहुँचा कर मनुष्य आपके( भगवान्‌ के ) क्रोध का भाजन होता है और अधर्म करता है।

न व्यभिचरति तवेक्षायया हाभिहितो भागवतो धर्म: ।

स्थिरचरसत्त्वकदम्बेष्व्‌अपृथग्धियो यमुपासते त्वार्या: ॥

४३॥

न--नहीं; व्यभिचरति-- असफल होती है; तब--तुम्हारी; ईक्षा--दृष्टि; यया--जिससे; हि--निस्सन्देह; अभिहित: --कथित; भागवत:--आपके उपदेशों तथा गतिविधियों के अनुसार; धर्म:--धार्मिक नियम; स्थिर--अचल; चर--चल;सत्त्व-कदम्बेषु--जीवात्माओं में से; अपूथक्‌-धिय:--जो भेदभाव नहीं विचारते; यम्‌ू--जिसको; उपासते--पालन करतेहैं; तु--निश्चय ही; आर्या:--सभ्यता में अग्रणी लोग।

है भगवन्‌! जीवन के महदुद्देश्य से विचलित न होने वाले आपके दृष्टिकोण के अनुसारमनुष्य का वृत्तिपरक धर्म श्रीमद्भागवत तथा भ्रगवद्गीता में उपदिष्ट होना है।

जो मनुष्यआपके आदेशानुसार इस धर्म का पालन करते हैं, जड़ तथा चेतन समस्त जीवात्माओं कोसमान मानते हैं और किसी को उच्च तथा निम्न नहीं मानते हैं, वे आर्य कहलाते हैं।

ऐसे आर्यआप की अर्थात्‌ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की उपासना करते हैं।

न हि भगवन्नघटितमिदंत्वदर्शनात्रणामखिलपापक्षय: ।

यन्नाम सकृच्छुवणात्‌पुक्कशोपि विमुच्यते संसारात्‌ ॥

४४॥

न--नहीं; हि--निस्सन्देह; भगवन्‌--हे भगवान्‌; अधटितमू--जो कभी न हुआ हो; इृदम्‌--यह; त्वत्‌--तुम्हारे;दर्शनात्‌ू-दर्शन से; नृणाम्‌--समस्त मनुष्यों का; अखिल--सम्पूर्ण; पाप--पापों का; क्षय:--संहार; यत्‌-नाम--जिसकानाम; सकृतू--केवल एक बार; श्रवणात्‌--सुनने से; पुक्कश:--निम्नतम जाति, चण्डाल; अपि-- भी; विमुच्यते--छूटजाता है; संसारातू--इस संसार के बन्धन से।

है भगवन्‌! आपके दर्शनमात्र से किसी के लिए भी समस्त भौतिक कल्मषों से तुरन्त मुक्त हो जाना असम्भव नहीं है।

आपको प्रत्यक्ष देखने की बात तो एक ओर रही; आपकेपवित्र नाम को एक बार सुन लेने से ही चण्डाल तक समस्त भौतिक कल्मष से विमुक्त होजाते हैं।

ऐसी दशा में आपके दर्शनमात्र से ऐसा कौन है, जो भौतिक कल्मष से मुक्त नहीं होपायेगा?

अथ भगवन्वयमशथ्चुनात्वदवलोकपरिमृष्टाशयमला: ।

सुरऋषिणा यत्कथितंतावकेन कथमन्यथा भवति ॥

४५॥

अथ--अत:; भगवनू--हे भगवन्‌; वयम्‌--हम; अधुना--इस समय; त्वत्‌ू-अवलोक--आपके दर्शन से; परिमृष्ट--धुलजाती हैं; आशय-मला:--हृदय की दूषित कामनाएँ; सुर-ऋषिणा--देवताओं में ऋषि ( नारद ) द्वारा; यत्‌--जो;कथितम्‌--कहा गया; तावकेन--जो आपका भक्त है; कथम्‌--किस प्रकार; अन्यथा--और कुछ; भवति--हो सकताहै।

अतः हे भगवन्‌! आपके दर्शन मात्र मेरे समस्त पापकर्मों के कल्मष एवं भौतिकआसक्ति तथा कामासक्त विषयों के फल, जिनसे मेरा मन तथा अन्तःस्थल पूरित था, सदा-सर्वदा के लिए धो दिये हैं।

जो कुछ नारद मुनि ने भविष्यवाणी की है, वह अन्यथा नहीं होसकता।

दूसरे शब्दों में, नारद मुनि के द्वारा शिक्षित किये जाने के कारण ही मुझे आपकासात्रिध्य प्राप्त हो सका है।

विदितमनन्त समस्तंतव जगदात्मनो जनैरिहाचरितम्‌ ।

विज्ञाप्यं परमगुरो:कियदिव सवितुरिव खद्योतै: ॥

४६॥

विदितम्‌--ज्ञात; अनन्त--हे अनन्त; समस्तम्‌--सब कुछ; तब--तुम्हारा; जगत्‌-आत्मन:--समस्त जीवों का परमात्मा;जनै:--जनसमूह या जीवों द्वारा; हह--इस संसार में; आचरितम्‌--किया हुआ; विज्ञाप्पम्‌--सूचित किया गया; परम-गुरो:--परम स्वामी, परमेश्वर को; कियत्‌--कितना; इब--निश्चय ही; सवितु:--सूर्य को; इब--के समान; खद्योतै: --जुगनुओं के द्वारा

हे अनन्त भगवान्‌! इस भौतिक जगत में जीवात्मा जो भी करता है, वह आपको भली-भाँति विदित रहता है क्योंकि आप परमात्मा हैं।

सूर्य की उपस्थिति में जुगनुओं के प्रकाश सेकुछ भी उद्दीप्त नहीं होता ?

इसी प्रकार, चूँकि आप सब कुछ जानने वाले हैं, अतः आपकीउपस्थिति में मेरे बताने के लिए कुछ भी नहीं है।

नमस्तुभ्यं भगवतेसकलजगत्स्थितिलयोदयेशाय ।

दुरवसितात्मगतयेकुयोगिनां भिदा परमहंसाय ॥

४७॥

नमः--नमस्कार; तुभ्यम्‌ू--तुमको; भगवते--हे भगवान्‌; सकल--समस्त; जगत्‌--हृश्य जगत की; स्थिति--पालन;लय--संहार; उदय--तथा उत्पत्ति; ईशाय--ईश्वर को; दुरवसित--समझ पाना असम्भव; आत्म-गतये--जिसकी अपनीस्थिति; कु-योगिनाम्‌--ऐन्द्रिय पदार्थों में आसक्त रहने वालों का; भिदा--भेददृष्टि के मिथ्या ज्ञान के कारण; परम-हंसाय--परम पवित्र को |

हे भगवान्‌! आप ही इस दृश्य जगत के स्त्रष्टा, पालक तथा संहारक हैं, किन्तु घोर संसारी तथा भेदवादी जनों के पास वे नेत्र ही नहीं होते जिनसे वे आपको देख सकें।

वेआपकी वास्तविक स्थिति को न समझ पाने के कारण इस निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि यहहृए्य-जगत आपके ऐश्वर्य से स्वतंत्र है।

हे भगवान्‌! आप परम विशुद्ध हैं और सभी छहोंऐश्वर्यों से ओतप्रोत हैं।

अतः मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।

यं वै श्रसन्तमनु विश्वसृज: श्वसन्तियं चेकितानमनु चित्तय उच्चकन्ति ।

भूमण्डलं सर्षपायति यस्य मूर्थिनतस्मै नमो भगवतेःस्तु सहस्त्रमूथ्नें ॥

४८ ॥

यम्‌--जिसको; बै--निस्सन्देह; श्रसन्तम्‌-चेष्टा से; अनु--पीछे-पीछे; विश्व-सृज:--हृश्य जगत के अधीक्षक; श्रसन्ति--चेष्टा करते हैं; यम्‌ू--जिसको; चेकितानम्‌--देखते हुए; अनु--पीछे; चित्तय:--समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ; उच्चकन्ति--देखती हैं ;भू-मण्डलम्‌-विशाल ब्रह्माण्ड; सर्षपायति--सरसों के बीज सहश बन जाता हैं; यस्य--जिसके; मूर्ध्ि--शीश पर;तस्मै--उनको; नम:--नमस्कार है; भगवते--छ: ऐश्वर्यों से पूर्ण, श्रीभगवान्‌; अस्तु--हो; सहस्त्र-मूध्नें--सहस्त्र फनोंवाले है

भगवान्‌! आपकी चेष्टा से ही भगवान्‌ ब्रह्मा, इन्द्र तथा हश्य जगत के अन्य अधीक्षकअपने अपने कार्यों में निरत हो जाते हैं।

हे ईश्वर! आपके द्वारा भौतिक शक्ति को देखे जानेपर ही इन्द्रियाँ देख पाती हैं।

अनन्त भगवान्‌ समस्त ब्रह्माण्डों को अपने सर पर सरसों के बीजों के समान धारण किये रहते हैं।

हे सहस्त्र-फण वाले परम पुरुष! मैं आपको सादरनमस्कार करता हूँ।

श्रीशुक उबाचसंस्तुतो भगवानेवमनन्तस्तमभाषत ।

विद्याधरपतिं प्रीतश्रित्रकेतुं कुरूद्ददह ॥

४९॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; संस्तुत:--पूजित होकर; भगवान्‌-- श्री भगवान्‌; एवम्‌--इस प्रकार;अनन्त:-- भगवान्‌ अनन्त; तम्‌--उससे; अभाषत--बोले; विद्याधर-पतिम्‌--विद्याधरों के राजा; प्रीत:--प्रसन्न होकर;चित्रकेतुम्‌-चित्रकेतु; कुरु-उद्दद-हे कुरु वंश में श्रेष्ठ

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--हे कुरुवंश में श्रेष्ठ, महाराज परीक्षित! विद्याधरों केराजा चित्रकेतु द्वारा की गई स्तुति से अत्यधिक प्रसन्न होकर भगवान्‌ अनन्तदेव ने इस प्रकारउत्तर दिया।

श्रीभगवानुवाचयन्नारदाड्रिरोभ्यां ते व्याहतं मेडनुशसनम्‌ ।

संसिद्धोउसि तया राजन्विद्यया दर्शनाच्च मे ॥

५०॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ संकर्षण ने उत्तर दिया; यत्‌--जो; नारद-अड्डिरोभ्यामू--नारद तथा अंगिरा द्वारा; ते--तुमसे; व्याहतम्‌--कहे गये; मे--मेरी; अनुशासनम्‌--पूजा; संसिद्ध:--परम सिद्धि प्राप्त असि--हो; तया--उससे;राजनू--हे राजन्‌; विद्यया--मंत्र से; दर्शनात्‌ू-- प्रत्यक्ष दर्शन से; च-- भी; मे--मेरे |

भगवान्‌ अनन्त देव ने इस प्रकार उत्तर दिया--हे राजन्‌! परम साधु नारद तथा अंगिराद्वारा मेरे सम्बन्ध में दिये गये उपदेशों को अंगीकार करने के फलस्वरूप तुम दिव्य ज्ञान सेभली-भाँति अवगत हो चुके हो।

आध्यात्मिक ज्ञान में शिक्षित हो जाने के कारण अब तुमनेमेरा साक्षात्‌ दर्शन किया है, अतः तुम अब पूर्णतया सिद्ध हो चुके हो।

अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावन: ।

शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥

५१॥

अहम्‌--ैं; वै--निस्सन्देह; सर्व-भूतानि--जीवात्माओं के विभिन्न रूपों में विस्तार करके; भूत-आत्मा--समस्तजीवात्माओं की परम आत्मा ( उनके परम निर्देशक तथा भोक्ता ); भूत-भावन:--समस्त जीवात्माओं के दृष्टिगोचर होने केकारण; शब्द-ब्रह्म --दिव्य शब्द का स्पंदन ( हरे कृष्ण मंत्र ); परम्‌ ब्रह्म--परम सत्य; मम--मेरा; उभे--दोनों, उभय( शब्द तथा रूप ); शाश्वती--नित्य; तनू--दोनों शरीर।

समस्त चर तथा अचर जीवात्माएँ मेरे ही प्रकाश ( विस्तार ) हैं और मुझसे पृथक्‌ हैं।

मैंही समस्त जीवों का परमात्मा हूँ; मेरे प्रकाशित करने के ही कारण उनका अस्तित्व है।

मैं हीऊँकार तथा हरे कृष्ण हरे राम मंत्र जैसे दिव्य शब्दों का रूप हूँ और मैं ही परम सत्य हूँ।

येदोनों रूप--दिव्य शब्द तथा श्रीविग्रह का शाश्रत आनन्दमय दिव्य रूप--मेरे शाश्वत रूपहैं, वे भौतिक नहीं हैं।

लोके विततमात्मानं लोक॑ चात्मनि सन्ततम्‌ ।

उभयं चर मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम्‌ ॥

५२॥

लोके--इस भौतिक जगत में; विततम्‌--विस्तीर्ण ( भौतिक सुख के प्रसंग में ); आत्मानम्‌--जीवात्मा; लोकमू-- भौतिकजगत; च--भी; आत्मनि--जीवात्मा में; सन्‍्ततम्‌--विस्तृत; उभयम्‌--दोनों ( भौतिक जगत तथा जीवात्मा ); च--तथा;मया--मेरे द्वारा; व्याप्तम्‌-व्याप्त; मयि--मुझमें; च-- भी; एव--निस्सन्देह; उभयम्‌--दोनों ही; कृतम्‌--उत्पन्न |

बद्धजीव इस भौतिक जगत में, जिसे वह सुख के साधनों से भरा हुआ समझता है, यहसोचकर विस्तार करता है कि वही इस जगत का भोक्ता है।

इसी प्रकार यह भौतिक जगतजीवात्मा के सुख के साधनस्वरूप विस्तार करता है।

इस प्रकार दोनों ही विस्तार करते हैं, किन्तु दोनों ही मेरी शक्तियाँ होने के कारण मुझसे युक्त हैं।

परमेश्वर होने के कारण मैं इन'फलों का कारण हूँ और मनुष्य को यह जानना चाहिए कि ये दोनों ही मुझमें व्याप्त हैं।

यथा सुषुप्त: पुरुषो विश्व पश्यति चात्मनि ।

आत्मानमेकदेशस्थ॑ं मन्यते स्वप्न उत्थित: ॥

५३॥

एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मन: ।

मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत्‌ ॥

५४॥

यथा--जिस प्रकार; सुषुप्त:--सोया हुआ; पुरुष:--व्यक्ति; विश्वम्‌--समस्त ब्रह्माण्डों को; पश्यति--देखता है; च--भी;आत्मनि--अपने भीतर; आत्मानम्‌-- अपने आपको; एक-देश-स्थम्‌--एक स्थान में स्थित होकर; मन्यते--मानता है;स्वप्ने--स्वणावस्था में; उत्थित:--जगकर; एवम्‌--इस प्रकार; जागरण-आदीनि--जागृत अवस्था तथा अन्य; जीव-स्थानानि--जीव की विभिन्न स्थितियाँ; च-- भी; आत्मन:-- श्री भगवान्‌ की; माया-मात्राणि--माया शक्ति के प्रदर्शन;विज्ञाय--जानकर; तत्‌--उनका; द्रष्टारमू--जनक या द्रष्टा; परम्‌--परमात्मा; स्मरेत्‌ू--स्मरण करना चाहिए।

जब मनुष्य गाढ़ निद्रा में होता है, तो वह स्वप्न देखता है और अपने अन्तर में विशालपर्वत तथा नदियाँ या सम्भवतः सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भी देखता है, यद्यपि ये सारी वस्तुएँअत्यन्त दूर हैं।

किन्तु कभी कभी जब वह स्वप्न से जगता है, तो अपने को मनुष्य रूप मेंएक स्थान पर बिस्तर पर लेटा पाता है।

तब वह अपने को अनेक स्थितियों में पाता है यथाविशेष राष्ट्रीयता, परिवार आदि में।

प्रगाढ़-निद्रा, स्वप्न तथा जाग्रत ये समस्त अवस्थाएँभगवान्‌ की ही शक्तियाँ हैं।

मनुष्य को इन अवस्थाओं के मूल स्त्रष्टा को, जो इनसे प्रभावितनहीं होता, सदैव स्मरण रखना चाहिए।

येन प्रसुप्तः पुरुष: स्वापं वेदात्मनस्तदा ।

सुखं च निर्गुणं ब्रह्म तमात्मानमवेहि माम्‌ ॥

५५॥

येन--जिसके ( परकब्रह्म ) द्वारा; प्रसुप्त:--सोया हुआ; पुरुष: --व्यक्ति; स्वापम्‌--स्वप्न के विषय को; वेद--जानता है;आत्मन:--अपना; तदा--उस समय; सुखम्‌--सुख; च--भी; निर्गुणम्‌-- भौतिक परिवेश से किसी प्रकार के सम्पर्क सेरहित, सम्पर्कहीन; ब्रह्म--परमात्मा; तम्‌--उसको; आत्मानम्‌--सर्वव्यापी; अवेहि--जानो; मामू--मुझको |

तुम मुझे परब्रह्म जानो, जो सर्वव्यापी परमात्मा है और जिसके माध्यम से सुप्त जीवात्माअपनी सुप्तावस्था तथा इन्द्रियातीत सुखों का अनुभव कर सकता है।

कहने का तात्पर्य यह है।

कि सुप्त जीवात्माओं की गतिविधियों का कारण मैं ही हूँ।

उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयो: ।

अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत्परम्‌ ॥

५६॥

उभयम्‌--दोनों अवस्थाएँ ( निद्रा तथा जागृति ); स्मरत:--स्मरण रखते हुए; पुंसः--पुरुष का; प्रस्वाप--निद्रा के समयचेतना का; प्रतिबोधयो:--तथा जगते रहने पर चेतना का; अन्वेति--विस्तार होता है; व्यतिरिच्येत--के परे पहुँच सकताहै; तत्‌ू--वह; ज्ञानम्‌--ज्ञान; ब्रह्म--परब्रह्म ; तत्‌ू--वह; परम्‌--दिव्य

यदि निद्रा के समय देखे गये स्वप्न केवल परमात्मा द्वारा ही देखे गए विषय हैं, तो फिरजीवात्मा, जो परमात्मा से पृथक्‌ है, स्वप्नों के क्रियाकलापों को क्‍यों स्मरण रखता है ?

एकव्यक्ति के अनुभवों को दूसरा नहीं समझ सकता।

अतः जीवात्मा, जो तथ्यों का ज्ञाता है औरस्वप्न तथा जागृति में प्रकट होने वाली घटनाओं के विषय में जिज्ञासा करता है आकस्मिककार्यों से पृथक्‌ है।

जानने वाला तो ब्रह्म है।

दूसरे शब्दों में जानने का गुण जीवात्मा तथापरमात्मा से सम्बन्धित है।

इसलिए जीवात्मा को भी स्वप्न तथा जागृति की घटनाओं काअनुभव हो सकता है।

दोनों दशाओं में ज्ञाता वही रहता है और गुणरूप में वह परब्रह्म सेएकाकार है।

यदेतद्विस्मृतं पुंसो मद्भावं भिन्नमात्मन: ।

ततः संसार एतस्य देहाद्ेहो मृतेमृति: ॥

५७॥

यत्‌--जो; एतत्‌--यह; विस्मृतम्‌-- भूला हुआ; पुंसः--जीवात्मा का; मत्‌-भावम्‌--मेरी स्थिति; भिन्नम्‌ू--भिन्न, विलग;आत्मन:--परमात्मा से; ततः--उससे; संसार:-- भौतिक, बद्ध जीवन; एतस्य--जीवात्मा का; देहात्‌ू--एक शरीर से;देह:ः--दूसरा शरीर; मृते:--एक मृत्यु से; मृति:--दूसरी मृत्यु

जब जीवात्मा अपने आपको मुझसे भिन्न मानकर ज्ञान तथा आनन्द में मुझसे अपने गुणरूप में दिव्य तादात्म्य को भूल जाता है तभी उसका यह भौतिक बद्ध जीवन प्रारम्भ होता है।

कहने का अभिप्राय यह है कि वह मुझमें तादात्म्य न मानकर अपने सांसारिक वि्तारों में,यथा पत्नी, सन्‍्तान तथा धन में अभिरुचि दिखाने लगता है।

इस प्रकार अपने कर्मों केप्रभाव से एक शरीर के बाद दूसरा शरीर और एक मृत्यु के बाद दूसरी मृत्यु का चक्करलगाता रहता है।

लब्ध्वेह मानुषीं योनिं ज्ञानविज्ञानसम्भवाम्‌ ।

आत्मानं यो न बुद्धग्रेत न क्वचित्क्षेममाप्नुयात्‌ू ॥

५८ ॥

लब्ध्वा--प्राप्त करके; इह--इस संसार ( विशेषतः भारतवर्ष की इस पवित्र भूमि पर ) में; मानुषीम्‌--मनुष्य की;योनिम्‌--योनि; ज्ञान--वैदिक शास्त्रों के माध्यम से ज्ञान का; विज्ञान--तथा जीवन में उस ज्ञान का व्यवहार; सम्भवाम्‌--सम्भाव्यता, सम्भावना; आत्मानम्‌ू--अपना वास्तविक स्वरूप; यः--जो भी; न--नहीं; बुद्धयेत--समझता है; न--क भीनहीं; क्वचित्‌--किसी समय; क्षेमम्‌ू--जीवन में सफलता; आप्नुयात्‌--प्राप्त कर सकता है।

वैदिक ज्ञान तथा उसके व्यवहार के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार द्वारा मनुष्य अपनेजीवन में सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

ऐसा भारत में जन्म लेने वाले मनुष्य के लिए विशेषरूप से सम्भव है।

जो मनुष्य ऐसी उपयुक्त परिस्थिति में जन्म लेकर अपने आपको नहीं जानपाता वह परम सिद्धि को प्राप्त कर सकने में अक्षम रहता है भले ही वह स्वर्ग लोक को प्राप्त क्यों न हो जाए।

स्मृत्वेहायां परिक्लेशं ततः फलविपर्ययम्‌ ।

अभयं चाप्यनीहायां सड्डूल्पाद्विरमेत्कवि: ॥

५९॥

स्मृत्वा--स्मरण करके; ईहायाम्‌--कर्मफल के उद्देश्य से किये गये कर्म के क्षेत्र में; परिक्लेशम्‌--शक्ति का क्षय तथादयनीय स्थिति; ततः--उससे; फल-विपर्ययम्‌--इच्छा से विपरीत फल; अभयमू--निर्भयता; च--भी; अपि--निस्सन्देह;अनीहायाम्‌--जब कर्मफल की कोई आकांक्षा नहीं रह जाती; सड्डल्पात्‌ू-- भौतिक कामना से; विरमेत्‌--रूक जानाचाहिए; कवि: --ज्ञानी पुरुष

यह स्मरण रखते हुए कि कर्मफल हेतु सम्पन्न कर्मों के क्षेत्र में बड़ी बड़ी अड़चनें आतीहैं और इच्छा से विपरीत फल प्राप्त होते हैं चाहे वे भौतिक कर्मों से उत्पन्न हों या वैदिक ग्रंथोंद्वारा बताये सकाम कर्मों के फल हों, बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह सकाम कर्मों कीइच्छा का परित्याग कर दे क्‍योंकि ऐसी चेष्टाओं से जीवन का परम उद्देश्य प्राप्त नहीं होसकता।

दूसरी ओर यदि कोई कर्मफल के हेतु निष्काम भाव से कर्म करता है अर्थात्‌ वहभक्ति-कार्यों में लगता है, तो दयनीय स्थितियों से मुक्त रहकर वह जीवन का परम उद्देश्यप्राप्त कर सकता है।

इस पर विचार करते हुए मनुष्य को चाहिए कि भौतिक कामनाओं कापरित्याग करे।

सुखाय दुःखमोक्षाय कुर्वाते दम्पती क्रिया: ।

ततो<निवृत्तिरप्राप्तिर्दु:खस्य च सुखस्य च ॥

६०॥

सुखाय--सुख के लिए; दुःख-मोक्षाय--दुख से छुटकारा पाने के लिए; कुर्वाते--करते हैं; दम्‌-पती--पत्नी तथा पति;क्रिया:--कर्म; तत:--उससे; अनिवृत्ति:--विश्राम न मिलना; अप्राप्ति:--लाभ न होना; दुःखस्य--दुख का; च--भी;सुखस्य--सुख का; च--भी |

पुरुष तथा स्त्री जैसे दम्पत्ति के रूप में कई प्रकार से पारस्परिक सहयोग करके सुखप्राप्त करने तथा दुख को कम करने के लिए कई प्रकार से योजना बनाते हैं; किन्तुकामनाओं से पूर्ण होने के कारण उनके कर्मों से न तो कभी सुख प्राप्त होता है और न दुखमें कमी आती है।

उल्टे, ये भारी दुख के कारण बनते हैं।

एवं विपर्ययं बुद्ध्वा नृणां विज्ञाभिमानिनाम्‌ ।

आत्मनश्च गति सूक्ष्मां स्थानत्रयविलक्षणाम्‌ ॥

६१॥

इृष्टश्रुताभिर्मात्राभिर्निर्मुक्त: स्वेन तेजसा ।

ज्ञानविज्ञानसन्तृप्तो मद्धक्त: पुरुषो भवेत्‌ ॥

६२॥

एवम्‌--इस प्रकार; विपर्ययम्‌--विपरीत; बुद्ध्वा--समझकर; नृणाम्‌--मनुष्यों का; विज्ञ-अभिमानिनाम्‌--जो अपने कोविज्ञान से पूर्ण मानते हैं; आत्मनः--अपने आप का; च--भी; गतिम्‌--उन्नति; सूक्ष्मम्‌--समझने में अत्यन्त कठिन;स्थान-त्रय--जीवन की तीन दशाएँ ( गाढ़ निद्रा, स्वप्न तथा जागृति ); विलक्षणाम्‌--से विलग; दृष्ट-- प्रत्यक्ष देखा हुआ;श्रुताभि:--अथवा अधिकारियों की सूचना से समझा हुआ; मात्राभि:--वस्तुओं से; निर्मुक्त:--मुक्त होकर; स्वेन-- अपनेआप से; तेजसा--विवेक से; ज्ञान-विज्ञान--ज्ञान तथा इस ज्ञान के व्यवहार से; सन्तृप्त:--पूर्णतया सन्तुष्ट; मत्‌-भक्त:--मेरा भक्त; पुरुष:--पुरुष; भवेत्‌--हो जाना चाहिए।

मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि जो व्यक्ति अपने भौतिक अनुभव पर गर्व करते हैंउन्हें जगते, सोते तथा प्रगाढ़ निद्रा में कल्पित किए गये फलों के विपरीत फल मिलते हैं।

मनुष्य को यह भी समझना चाहिए कि यद्यपि भौतिकतावादी व्यक्ति के लिए आत्मा कोदेख पाना दुष्कर है, तो भी वह इन समस्त स्थितियों से परे है और उसे अपने विवेक केआधार पर इस जन्म में तथा अगले जन्म में कर्म-फल की इच्छा का परित्याग कर देनाचाहिए इस प्रकार दिव्य ज्ञान में अनुभवी बनकर ही किसी को मेरा भक्त बनना चाहिए।

एतावानेव मनुजैयोगनैपुण्यबुद्धिभि: ।

स्वार्थ: सर्वात्मना ज्ञेयो यत्परात्मैकदर्शनम्‌ ॥

६३॥

एतावान्‌ू--इतना; एव--निस्सन्देह; मनुजैः--मनुष्यों के द्वारा; योग--भक्ति योग के द्वारा, परमेश्वर से जुड़ने की विधिद्वारा; नैपुण्य--निपुणता; बुद्धिभि:--बुद्धिमानों के द्वारा; स्व-अर्थ:--जीवन का परम उद्देश्य; सर्व-आत्मना--सब प्रकारसे; ज्ञेः--जानने योग्य; यत्‌--जो; पर--दिव्य ईश्वर का; आत्म--तथा आत्मा का; एक--एकत्व का; दर्शनम्‌--समझ |

जो पुरुष जीवन के परम उद्देश्य को प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें चाहिए कि वे परम पुरुषतथा जीवात्मा का भलीभाँति अवलोकन करें जो अंश तथा पूर्ण होने के कारण गुण रूप सेएक ही हैं।

जीवन की यही सबसे बड़ी समझ है।

इससे बढ़कर और कोई सत्य नहीं है।

त्वमेतच्छुद्धया राजन्नप्रमत्तो वचो मम ।

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नो धारयन्नाशु सिध्यसि ॥

६४॥

त्वमू--तुम; एतत्‌--यह; श्रद्धया--परम श्रद्धापूर्वक; राजनू--हे राजन्‌; अप्रमत्त: --प्रमत्त हुए बिना किसी अन्य निष्कर्षको न पहुँचते हुए; बच: --उपदेश; मम--मेरा; ज्ञान-विज्ञान-सम्पन्न:--ज्ञान तथा विज्ञान से भलीभाँति अवगत होकर;धारयन्‌--स्वीकार करते हुए; आशु--शीघ्र ही; सिध्यसि--सिद्ध हो सकोगे।

हे राजन्‌! यदि तुम भौतिक सुख से विरक्त रह कर परम श्रद्धा सहित मुझसे संलग्नहोकर ज्ञान तथा इसकी जीवन में व्यवहारिकता में निपुण बन कर मेरे इस निष्कर्ष कोस्वीकार करोगे तो तुम परम सिद्धि को प्राप्त होगे।

श्रीशुक उबाचआश्वास्य भगवानित्थ॑ चित्रकेतुं जगद्गुरु: ।

'पश्यतस्तस्य विश्वात्मा ततश्चान्तर्दधे हरि: ॥

६५॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; आश्वास्य--आश्वासन देकर; भगवानू-- भगवान्‌; इत्थम्‌--इस प्रकार;चित्रकेतुम्‌--राजा चित्रकेतु को; जगत्‌-गुरु:--परम गुरु; पश्यत:--देखते देखते; तस्य--उसके ; विश्व-आत्मा--समस्तब्रह्माण्ड का परमात्मा; ततः--वहाँ से; च-- भी; अन्तर्दधे--अन्तर्धान हो गया; हरिः-- भगवान्‌ हरि।

श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--इस प्रकार चित्रकेतु को उपदेश देकर और उसेसिद्धि का आश्वासन देकर जगदगुरु परमात्मा भगवान्‌ संकर्षण उस स्थान से चित्रकेतु केदेखते-देखते अन्तर्धान हो गये।

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