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अध्याय उन्नीस: पुंसवन अनुष्ठान समारोह करना
6.19श्रीराजोबाचब्रत॑ पुंसव्नं ब्रह्मनम्भवता यदुदीरितम् ।
तस्य वेदितुमिच्छामि येन विष्णु: प्रसीदति ॥
१॥
श्री-राजा उवबाच--महाराज परीक्षित ने कहा; ब्रतम्-ब्रत; पुंसवनम्--पुंसवन नामक; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; भवता--आपके द्वारा; यत्--जो; उदीरितम्--कहा गया है; तस्थ--उसका; वेदितुम्--जानना; इच्छामि--चाहता हूँ; येन--जिससे;विष्णु:-- भगवान् विष्णु; प्रसीदति--प्रसन्न होते हैं |
महाराज परीक्षित ने कहा--हे प्रभो! आप पुंसवन ब्रत के सम्बन्ध में पहले ही बता चुकेहैं।
अब मैं इसके विषय में विस्तार से सुनना चाहता हूँ क्योंकि मैं समझता हूँ कि इस व्रत कापालन करके भगवान् विष्णु को प्रसन्न किया जा सकता है।
श्रीशुक उबाचशुक्ले मार्गशिरे पक्षे योषिद्ध्तुरनुज्ञया ।
आरभेत ब्रतमिदं सार्वकामिकमादित:ः ॥
२॥
निशम्य मरुतां जन्म ब्राह्मणाननुमन्््य च ।
स्नात्वा शुक्लदती शुक्ले वसीतालड्डू ताम्बरे ।
पूजयेत्प्रातराशात्प्राग्भगवन्तं भ्रिया सह ॥
३॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; शुक्ले--शुक्ल पक्ष के; मार्गशरि-- अगहन ( नवम्बर-दिसम्बर ) मास में;पक्षे--पक्ष ( पखबारे ) में; योषित्--स्त्री; भर्तु:--पति की; अनुज्ञया-- अनुमति से; आरभेत--प्रारम्भ करे; ब्रतम्-ब्रत;इदम्--यह; सार्व-कामिकम्--समस्त कामनाओं को पूरा करने वाले; आदित:--पहले दिन से; निशम्य--सुनकर;मरुतामू-मरुतों के; जन्म--जन्म, उत्पत्ति; ब्राह्मणानू-ब्राह्मणों से; अनुमन््य--उपदेश लेकर; च--तथा; स्नात्वा--नहाकर; शुक्ल-दती--साफ किये गये दाँतों से; शुक्ले-- श्वेत; वबसीत-- धारण करे; अलड्डू ता--आभूषण; अम्बरे--वस्त्र;पूजयेत्--पूजा करे; प्रात:-आशातू् प्राकु--कलेवा से पहले; भगवन्तम्-- श्रीभगवान् की; अया सह--लक्ष्मी सहित |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा--स्त्री को चाहिए कि अगहन मास ( नवम्बर-दिसम्बर ) केशुक्लपश्ष की प्रतिपदा को अपने पति की अनुमति से इस नैमित्यिक भक्ति को तप के ब्रत सहित प्रारम्भ करे क्योंकि इससे सभी मनोकामनाएँ पूरी हो सकती हैं।
भगवान् विष्णु कीउपासना करने के पूर्व स्त्री को चाहिए कि वह मरुतों के जन्म की कथा को सुने।
योग्यब्राह्मणों के निर्देशानुसार वह प्रातःकाल अपने दाँत साफ करे, नहाए, श्रेत साड़ी पहने औरआभूषण धारण करे और फिर कलेवा करने के पूर्व भगवान् विष्णु तथा लक्ष्मी की पूजाकरे।
अलं ते निरपेक्षाय पूर्णकाम नमोउस्तु ते ।
महाविभूतिपतये नमः: सकलसिद्धये ॥
४॥
अलमू--पर्याप्त; ते--तुम्हारे लिए; निरपेक्षाय--उदासीन; पूर्ण-काम--जिसकी कामना सदैव पूर्ण होती है, ऐसे भगवान्;नमः--नमस्कार; अस्तु--हो; ते--तुमको; महा-विभूति--लक्ष्मी के; पतये--पति को; नम:--नमस्कार; सकल-सिद्धये--समस्त सिद्ध्रियों के स्वामी को[
तब वह भगवान् की इस प्रकार से प्रार्थना करे |
--हे भगवन्।
आप समस्त ऐश्वर्यों सेपूर्ण हैं किन्तु मैं ऐश्वर्य की कामना नहीं करती हूँ।
मैं आपको सहज भाव से सादर नमस्कारकरती हूँ।
आप उन सम्पत्ति की देवी लक्ष्मी देवी के पति और स्वामी हैं, जो समस्त ऐश्वर्यों सेयुक्त हैं।
आप समस्त योग के स्वामी हैं।
मैं आपको केवल नमस्कार करती हूँ।
यथा त्वं कृपया भूत्या तेजसा महिमौजसा ।
जुष्ट ईश गुणै: सर्वैस्ततोसि भगवान्प्रभु: ॥
५॥
यथा--जिस प्रकार; त्वमू--तुम; कृपया--कृपा से; भूत्या--ऐश्वर्य से; तेजसा--तेज से; महिम-ओजसा--महिमा तथाबल से; जुष्ट:--युक्त; ईश--हे ई श्वर; गुणै:--दिव्य गुणों से; सर्वै:--समस्त; तत:--अत: ; असि--हो; भगवान् --श्रीभगवान् प्रभु:--स्वामी ।
हे भगवन्! आप अहैतुकी कृपा, समस्त ऐश्वर्य, समस्त तेज तथा समस्त महिमा, बल एवंदिव्य गुणों से युक्त होने के कारण हर एक के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
विष्णुपत्नि महामाये महापुरुषलक्षणे ।
प्रीयेथा मे महाभागे लोकमातर्नमोस्तु ते ॥
६॥
विष्णु-पत्ति--हे भगवान् विष्ण की पत्नी; महा-माये--हे भगवान् विष्णु की शक्ति; महा-पुरुष-लक्षणे-- भगवान् विष्णुके गुणों एवं ऐश्वर्यों से युक्त; प्रीयेधा:--कृपापूर्वक प्रसन्न हों; मे--मुझ पर; महा-भागे--हे लक्ष्मी की देवी; लोक-मातः--हे संसार की माता; नमः--नमस्कार; अस्तु--हो; ते--तुमको |
[ भगवान् विष्णु को समुचित नमस्कार करने के बाद भक्तों को चाहिए कि वे धन-धान्य की देवी लक्ष्मी माता को सादर नमस्कार करें और इस प्रकार से प्रार्थना करें-- हेविष्णु-पत्ली, हे भगवान् विष्णु की अंतरंगा शक्ति! आप विष्णु के ही समान श्रेष्ठ हैं क्योंकिआपमें भी उनके सारे गुण तथा ऐश्वर्य निहित हैं।
हे धन-धान्य की देवी! आप मुझ पर कृपालु हों।
हे जगन्माता! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ।
नमो भगवते महापुरुषाय महानुभावाय महाविभूतिपतये सह महाविभूतिभिर्बलिमुपहरामीति;अनेनाहरहर्मन्त्रेणविष्णोरावाहनार्घ्यपाद्योपस्पर्शनस्नानवासउपवीतविभूषणगन्धपुष्पधूप दीपोपहाराद्युपचारान्सुसमाहितोपाहरेतू ॥
७॥
नम:--नमस्कार; भगवते-- श्री भगवान् को, जो छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं; महा-पुरुषाय-- श्रेष्ठ भोक्ता;महा-अनुभावाय--सर्वशक्तिमान; महा-विभूति-- धन की देवी के; पतये--पति; सह--साथ; महा-विभूतिभि:--पार्षद;बलिम्--भेंट; उपहरामि-- अर्पित कर रहा हूँ; इति--इस प्रकार; अनेन--इस; अहः-अहः --प्रतिदिन; मन्त्रेण--मंत्र से;विष्णो:-- भगवान् विष्णु का; आवाहन--आवाहन; अर्घ्य-पाद्य-उपस्पर्शन--हाथ, पाँवों तथा मुँह को प्रक्षालित करने केलिए जल; स्नान--नहाने के लिए जल; वास--वस्त्र; उपवीत--यज्ञोपवीत, जनेऊ; विभूषण--गहने; गन्ध--सुगन्धितद्रव्य; पुष्प--फूल; धूप-- धूप; दीप--दीपक; उपहार-- भेंट; आदि--इत्यादि; उपचारान्--निवेदन, भेंट; सु-समाहिता--मनोयोग से; उपाहरेत्--अर्पित करे |
हे छः ऐश्वर्यों से युक्त भगवान् विष्णु) आप सर्वश्रेष्ठ भोक्ता एवं सर्व-शक्तिमान हैं।
हेमाता लक्ष्मी के पति! मैं विश्वक्सेन जैसे पार्षदों की संगति में रहने वाले आपको सादरनमस्कार करता हूँ।
मैं आपको समस्त पूजा-सामग्री अर्पित करता हूँ।
मनुष्य को चाहिएकि प्रतिदिन अत्यन्त मनोयोग से भगवान् विष्णु की पूजा-यथा उनके हाथ, पाँव तथा मुखधोने के लिए और स्नान के लिए जल इत्यादि पूजा सामग्रियों से पूजा करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करे।
उसे चाहिए कि उन्हें वस्त्र, उपबीत, आभूषण, सुगंधि, पुष्प, अगुरु तथादीपक अर्पित करे।
हविःशेषं च जुहुयादनले द्वादशाहुती ।
नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतये स्वाहेति ॥
८॥
हविः-शेषम्--शेष नैवेद्य; च--तथा; जुहुयात्--अर्पित करे; अनले-- अग्नि में; द्वादश--बारह; आहुती:--आहुतियाँ;३»-हे भगवान्; नम:--नमस्कार; भगवते-- श्रीभगवान् को; महा-पुरुषाय--परम भोक्ता; महा-विभूति-- धन की देवीके; पतये--पति को; स्वाहा--आहुति; इति--इस प्रकार |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--उपर्युक्त समस्त पूजा सामग्री से भगवान् की पूजाकरने के बाद मनुष्य को चाहिए कि वह '३» नमो भगवते महापुरुषाय महाविभूतिपतयेस्वाहा ' इस मंत्र का जप करे और पवित्र अग्नि में बारह बार घी की आहुतियाँ दे।
श्रियं विष्णुं च वरदावाशिषां प्रभवावुभौ ।
भक्त्या सम्पूजयेन्नित्यं यदीच्छेत्सर्वसम्पदः ॥
९॥
श्रियमू--सौभाग्य की देवी को; विष्णुम्-- भगवान् विष्णु को; च--तथा; वर-दौ--वरों को देने वाली; आशिषाम्--आशीर्वादों का; प्रभवौ--साधन; उभौ--दोनों; भक्त्या--भक्ति से; सम्पूजयेत्--पूजे; नित्यम्--प्रतिदिन; यदि--यदि;इच्छेत्--चाहता है; सर्व--समस्त; सम्पदः--ऐश्वर्य
यदि किसी को समस्त ऐश्वर्यों की चाहत है, तो उसका कर्तव्य है कि प्रतिदिन भगवान्विष्णु की पूजा उनकी पत्नी लक्ष्मी सहित करे।
उसे परम आदर से उपर्युक्त विधि से उनकीपूजा करनी चाहिए।
भगवान् विष्णु तथा ऐश्वर्य की देवी का अत्यन्त शक्तिशाली संयोग है।
वे समस्त वरों को देने वाले हैं तथा समस्त सौभाग्य के स्त्रोत हैं।
अतः हर एक का कर्तव्य हैकि लक्ष्मी-नारायण की पूजा करे।
प्रणमेद्ण्डवद्धूमौ भक्तिप्रह्मेण चेतसा ।
दशवारं जपेन्मन्त्रं ततः स्तोत्रमुदीरयेत् ॥
१०॥
प्रणमेत्ू--नमस्कार करना चाहिए; दण्ड-वत्--दण्ड के समान; भूमौ-- भूमि पर; भक्ति--भक्ति से; प्रह्मेण--विनीत;चेतसा-- भाव से; दश-वारम्--दस बार; जपेत्--उच्चारण करना चाहिए; मन्त्रमू--मंत्र; तत:--तब; स्तोत्रम्-- प्रार्थना;उदीरयेत्ू--जप करे
भक्ति के साथ विनीत भाव से भगवान् को नमस्कार करना चाहिए।
भूमि पर दण्ड केसमान गिरते समय ( दण्डवत करते हुए ) उपर्युक्त मंत्र का दस बार उच्चारण करना चाहिए।
तब उसे निम्नानुसार प्रार्थना करनी चाहिए।
युवां तु विश्वस्थ विभू जगत: कारणं परम् ।
इयं हि प्रकृति: सूक्ष्मा मायाशक्तिर्दुरत्यया ॥
११॥
युवाम्--तुम दोनों; तु--निस्सन्देह; विश्वस्थ--ब्रह्माण्ड के; विभू--स्वामी; जगत:--जगत के; कारणम्--कारण;परमू--सर्व श्रेष्ठ; इयमू--यह; हि--निश्चय ही; प्रकृतिः:--शक्ति; सूक्ष्मा--समझने में कठिन; माया-शक्ति:--अन्तरंगाशक्ति; दुरत्यया--पार पाना कठिन है
हे भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मी! आप दोनों समस्त सृष्टि के स्वामी हैं।
वास्तव में इस सृष्टि के कारण आप ही हैं।
माता लक्ष्मी को समझ पाना अत्यन्त कठिन है क्योंकि वे इतनीशक्तिशाली हैं कि उनकी शक्ति की सीमा का पार पाना कठिन है।
माता लक्ष्मी को भौतिकजगत में बहिरंगा शक्ति के रूप में अंकित किया जाता है, परन्तु वास्तव में वे सदेव ईश्वर कीअन्तरंगा शक्ति हैं।
तस्या अधी श्वरः साक्षात्त्वमेव पुरुष: पर: ।
त्वं सर्वयज्ञ इज्येयं क्रियेयं फलभुग्भवान् ॥
१२॥
तस्या:--उसका; अधी श्वर: -- स्वामी; साक्षात्--प्रत्यक्षतः; त्वम्--तुम; एव--निश्चय ही; पुरुष:-- पुरुष; पर: --परम;त्वमू-तुम; सर्व-यज्ञ:--साक्षात् यज्ञ; इज्या--पूजा; इयम्ू--यह ( लक्ष्मी ); क्रिया--कार्यकलाप; इयम्--यह; फल-भुक्ू-फलों के भोक्ता; भवान्ू--आप।
हे ईश्वर, आप शक्ति के स्वामी हैं, अतः आप परम पुरुष हैं।
आप साक्षात् यज्ञ हैं।
आत्मक्रिया की प्रतिरूप लक्ष्मी आपको अर्पित उपासना की आदि रूपा हैं, जबकि आपसमस्त यज्ञों के भोक्ता हैं।
गुणव्यक्तिरियं देवी व्यज्ञको गुणभुग्भवान् ।
त्वं हि सर्वशरीर्यात्मा श्री: शरीरेन्द्रियाशया: ।
नामरूपे भगवती प्रत्ययस्त्वमपाश्रय: ॥
१३॥
गुण-व्यक्ति: --गुणों का आगार; इयम्--यह; देवी --देवी; व्यज्ञक:--प्रकाशक, प्रकट करने वाले; गुण-भुक्-गुणोंके भोक्ता; भवान्ू--आप; त्वम्--तुम; हि--निस्सन्देह; सर्व-शरीरी आत्मा--समस्त जीवात्माओं की परम आत्मा; श्री:--ऐश्वर्य की देवी; शरीर--शरीर, देह; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आशया:--तथा मन; नाम--नाम; रूपे--तथा रूप; भगवती--लक्ष्मी; प्रत्ययः--प्रकाशक; त्वम्--तुम; अपा श्रय: -- आधार
यहाँ पर उपस्थित माता लक्ष्मी समस्त गुणों की आगार हैं जबकि आप इन गुणों केप्रकाशक तथा भोक्ता हैं।
दरअसल, आपही प्रत्येक वस्तु के भोक्ता हैं।
आप समस्तजीवात्माओं के परमात्मा के रूप में रहते हैं और लक्ष्मी देवी उनके शरीर, इन्द्रिय तथा मन कारूप हैं।
उनके भी पवित्र नाम तथा रूप हैं और आप समस्त नामों तथा रूपों के आधार हैं।
आप उनके प्रकाशन का कारण हैं।
यथा युवां त्रिलोकस्य वरदौ परमेष्ठिनौ ।
तथा म उत्तमश्लोक सनन््तु सत्या महाशिष: ॥
१४॥
यथा--चूँकि; युवाम्-तुम दोनों; त्रि-लोकस्य--तीनों लोकों में; वर-दौ--वर देने वाले, वरदानी; परमे-प्ठलिनौ--परमशासक; तथा--अतः ; मे--मेरा; उत्तम-शलोक--उत्तम एलोकों से वन्दित, हे भगवान्; सन्तु--हों; सत्या:--पूर्ण; महा-आशिषः:--बड़ी बड़ी अभिलाषाएँ।
आप दोनों ही तीनों लोकों के परम अधिष्ठाता एवं वरदाता हैं, अतः हे उत्तमएलोकभगवान्! आपके अनुग्रह से मेरी अभिलाषाएँ पूर्ण हों।
इत्यभिष्टूय वरदं श्रीनिवासं अिया सह ।
तन्निःसार्योपहरणं दत्त्वाचमनमर्चयेत् ॥
१५॥
इति--इस प्रकार; अभिष्टय--स्तुति करके; वर-दम्--वर देने वाले को; श्री-निवासम्ू--ऐश्वर्य की देवी के धाम, भगवान्विष्णु को; अरिया सह--लक्ष्मी सहित; तत्ू--तब; नि:सार्य--हटाकर; उपहरणम्--पूजा की सामग्री; दत्त्वा--अर्पितकरके; आचमनम्--हाथ तथा मुँह धोने का जल; अर्चयेत्--पूजा कर
ेश्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा--इस प्रकार श्रीनिवास भगवान् विष्णु की पूजाऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी जी के साथ साथ उपर्युक्त विधि से स्तुतियों द्वारा की जाये।
फिरपूजा की सारी सामग्री हटाकर उनका हाथ-मुंह धुलाने के लिये जल अर्पित करे और फिर सेउनकी पूजा करे।
ततः स्तुवीत स्तोत्रेण भक्तिप्रह्मेण चेतसा ।
यज्ञोच्छिष्टमवपष्राय पुनरभ्यर्चयेद्धरिम् ॥
१६॥
ततः--तब; स्तुवीत--स्तुति करे; स्तोत्रेण -- प्रार्थना से; भक्ति--भक्ति से; प्रह्मेण--विनप्र; चेतसा--मन से; यज्ञ-उच्छिष्टमू--यज्ञावशेष; अवप्राय--सूँघकर; पुन:ः--फिर; अभ्यर्चयेत्--पूजा करे; हरिम्-- भगवान् विष्णु की |
तत्पश्चात् अत्यन्त भक्ति एवं विनीत भाव से मनुष्य भगवान् तथा लक्ष्मी की स्तुति करे।
तब यज्ञावशेष को सूँघकर विष्णु तथा लक्ष्मी की पुनः पूजा करे।
पतिं च परया भकत्या महापुरुषचेतसा ॥
प्रियैस्तैस्तैरुपनमेत्प्रेमशील: स्वयं पति: ।
बिभूयात्सर्वकर्माणि पत्या उच्चावचानि च ॥
१७॥
पतिम्--पति; च--तथा; परया--परम; भकक््त्या--भक्ति से; महा-पुरुष-चेतसा--परम पुरुष मानकर; प्रियैः--प्रिय; तैःतैः--उन उन ( भेंटों ) से; उपनमेत् --उपासना करे; प्रेम-शील:--प्रेमपूर्वक; स्वयम्--स्वयं; पति:--पति; बिभूयात् --सम्पन्न करे; सर्व-कर्माणि--सारे कार्य; पत्या:--पत्नी के; उच्च-अवचानि--उच्च तथा निम्न, छोटे बड़े; च--तथा।
पत्नी अपने पति को परमेश्वर का प्रतिनिधि मानकर और उसे प्रसाद देकर विशुद्ध भक्तिसे उसकी पूजा करे।
पति भी अपनी पत्नी से परम प्रमुदित होकर अपने परिवार के कार्यों मेंलग जाए।
कृतमेकतरेणापि दम्पत्योरु भयोरपि ।
पत्यां कुर्यादनर्हायां पतिरितत्समाहित: ॥
१८॥
कृतम्ू--किया गया; एकतरेण--एक के द्वारा; अपि-- भी; दम्-पत्यो:--पति तथा पत्नी का; उभयो:--दोनों; अपि--तोभी; पल्याम्--जब पत्नी; कुर्यात्ू--उसे करना चाहिए, वह करे; अनर्हायाम्--अक्षम; पति:--पति; एतत्--यह;समाहित: --मनोयोग से
पति-पत्नी दोनों में से कोई एक इस भक्ति को निष्पादित कर सकता है।
उनके मधुरसम्बन्धों के कारण दोनों को फल मिलता है।
अतः यदि पत्नी इस व्रत को करने में असमर्थ हो तो पति सावधानी से इसे करे।
इससे उसकी आज्ञाकारिणी पत्नी को भी उसका फलमिलेगा।
विष्णो्ब्रतमिदं बिश्रन्न विहन्यात्कथञ्ञन ।
विप्रान्स्त्रियो वीरवतीः स्त्रग्गन्थबलिमण्डनै: ।
अर्चेदहरहर्भक्त्या देव॑ नियममास्थिता ॥
१९॥
उद्वास्य देवं स्वे धाम्नि तन्निवेदितमग्रतः ।
अद्यादात्मविशुद्धरर्थ सर्वकामसमृद्धये ॥
२०॥
विष्णो:--विष्णु का; ब्रतम्-ब्रत; इृदम्--यह; बिभ्रतू-करते हुए; न--नहीं; विहन्यात्-- भंग करे; कथञ्नन--किसीकारण से; विप्रान्--ब्राह्मण; स्त्रियः--स्त्रियाँ; वीर-वती: --पतियों तथा पुत्रों से युक्त; स्रकू--मालाओं; गन्ध--चंदन;बलि--भोजन की भेंट; मण्डनै:--तथा आभूषणों से; अर्चेत्--पूजा करे; अह:-अहः --नित्यप्रति; भक्त्या--भक्ति से;देवमू-- भगवान् विष्णु; नियमम्--विधि-विधान; आस्थिता--पालन करते हुए; उद्वास्य--रखकर; देवम्-- भगवान् को;स्वे--उनके अपने; धाम्नि--घर में; तत्--उसको; निवेदितम्-- अर्पित; अग्रतः--दूसरों को बाँट कर; अद्यात्ू-खाए;आत्म-विशुद्धि-अर्थम्--आत्मशुद्धि के लिए; सर्व-काम--समस्त अभिलाषाएँ; समृद्धये--पूर्ण करने के लिए।
मनुष्य को चाहिए कि इस भक्तिपूर्ण विष्णु-त्रत को माने और किसी अन्य कार्य मेंव्यस्त होने के लिए इसके पालन से विचलित न हो।
उसे चाहिए कि नित्यप्रति ब्राह्मणों तथाउन सौभाग्यवती स्त्रियों अर्थात् अपने पतियों के साथ शान्तिपूर्वक रहने वाली स्त्रियों कोबचा हुआ प्रसाद, पुष्प माला, चन्दन तथा आभूषण अर्पित करके उनकी पूजा करे।
पत्नीको चाहिए कि अत्यन्त भक्तिपूर्वक विधि-विधानों के अनुसार भगवान् विष्णु की पूजा करे।
तत्पश्चात् भगवान् विष्णु को शयन कराए और इसके बाद प्रसाद ग्रहण करे।
इस प्रकार पतितथा पतली परिशुद्ध हो जाएंगे और उनकी समस्त कामनाएँ पूरी होंगी।
एतेन पूजाविधिना मासान्द्रादश हायनम् ।
नीत्वाथोपरमेत्साध्वी कार्तिक चरमेहहनि ॥
२१॥
एतेन--इससे; पूजा-विधिना--पूजा की विधि से; मासान् द्वादश--बारह मास; हायनम्--एक वर्ष; नीत्वा--बिताकर;अथ--फिर; उपरमेत्--उपवास करे; साध्वी--एकनिष्ठ पत्नी; कार्तिके--कार्तिक मास में; चरमे अहनि--अन्तिम दिन।
साध्वी स्त्री को चाहिए कि एक वर्ष के लिए इस भक्तिमय सेवा को निरन्तर करे।
जबएक वर्ष बीत जाये तो उसे चाहिए कि कार्तिक मास ( अक्टूबर-नवम्बर ) की पूर्णिमा कोउपवास करे।
श्रोभूतेडप उपस्पृश्य कृष्णमशभ्यर्च्य पूर्ववत् ।
पय:श्रृतेन जुहुयाच्यरूणा सह सर्पिषा ।
पाकयज्ञविधानेन द्वादशैवाहुती: पति: ॥
२२॥
श्रः-भूते--उसके दूसरे दिन प्रातःकाल; अप:--जल; उपस्पृश्य--छू कर; कृष्णम्--भगवान् कृष्ण को; अभ्यर्च्य--पूजकर; पूर्व-वत्--पहले की तरह; पय:-श्रुतेन--उबाले हुए दूध से; जुहुयात्--अर्पित करे; चरुणा--खीर; सह--सहित;सर्पिषा--घी; पाक-यज्ञ-विधानेन---' गृह्य सूत्रों के आदेशानुसार; द्वादश--बारह; एब--निश्चय ही; आहुती:--आहुतियाँ;'पति:--पति।
दूसरे दिन प्रातःकाल स्नान करके और भगवान् कृष्ण की पूर्वबत् पूजा करके गुह्म-सूत्रोंके निर्देशानुसार वर्णित भोजन बनाए जैसा उत्सवों पर बनाया जाता है।
घी से खीर तैयार करेऔर पति को चाहिए कि वह इस सामग्री से अग्नि में बारह बार आहुति दे।
आशिष: शिरसादाय द्विजैः प्रीते: समीरिता: ।
प्रणम्य शिरसा भकत्या भुझ्जीत तदनुज्ञया ॥
२३॥
आशिष:--आशीर्वाद; शिरसा--सिर से; आदाय--स्वीकार करके; द्विजै:ः--ब्राह्मणों के द्वारा; प्रीते:--प्रसन्न;समीरिता: --उच्चरित; प्रणम्य--प्रणाम करके; शिरसा--शिर के बल; भक्त्या-भक्तिपूर्वक; भुञ्जीत-- भोजन ग्रहण करे;तत्-अनुज्ञया--उनकी अनुमति से |
तत्पश्चात् वह ( पति ) ब्राह्मणों को संतुष्ट करे और जब ब्राह्मण प्रसन्न होकर आशीर्वाद देंतो अपने शिर के द्वारा उन्हें सादर प्रणाम करे और उनकी अनुमति लेकर प्रसाद ग्रहण करे।
आचार्यमग्रतः कृत्वा वाग्यतः सह बन्धुभि: ॥
द््यात्पल्यै चरो: शेषं सुप्रजास्त्व॑ं सुसौ भगम् ॥
२४॥
आचार्यम्--आचार्य को; अग्रत:--सर्वप्रथम; कृत्वा--समुचित स्वागत करके; वाक्ू-यत:--वाणी को वश में करते हुए;सह--साथ; बन्धुभि:--मित्रों तथा स्वजनों के साथ; दद्यात्--प्रदान करे; पल्यै--पत्ली को; चरो:--खीर की आहुति का;शेषम्--शेष भाग; सु-प्रजास्त्वम्-जिससे अच्छी सन्तान निश्चित हो; सु-सौभगम्--जिससे सौभाग्य प्राप्त हो पति को चाहिए कि
भोजन करने के पूर्व सर्वप्रथम आचार्य को सुखद आसन दे औरअपने मित्रों तथा स्वजनों के साथ, वाणी को वश में रखते हुए गुरु को प्रसाद भेंट करे।
तबपत्नी को चाहिए कि घी में पकाई गई खीर की आहुति से बचे भाग को खाए।
इस अवशेषको खाने से विद्वान तथा भक्त पुत्र की और समस्त सौभाग्य की प्राप्ति निश्चित हो जाती है।
एतच्चरित्वा विधिवद्व्रतं विभो-रभीप्सितार्थ लभते पुमानिह ।
स्त्री चैतदास्थाय लभेत सौभगंश्रियं प्रजां जीवपतिं यशो गृहम् ॥
२५॥
एतत्--यह; चरित्वा--करके; विधि-वत्--शास्त्रानुमोदित विधि से; ब्रतम्--त्रत; विभो: -- भगवान् से; अभीष्सित--वांछित; अर्थम्--वस्तु; लभते--प्राप्त करता है; पुमानू--पुरुष; इह--इस जीवन में; स्त्री--सत्री; च--तथा; एतत्--यह;आस्थाय--करके; लभेत--प्राप्त कर सकती है; सौभगम्--सौभाग्य; थ्रियमू--ऐश्वर्य; प्रजामू--संतति; जीव-पतिम्--दीर्घजीवी पति; यश:--ख्याति; गृहम्-घरयदि
इस ब्रत या अनुष्ठान को शास्त्र सम्मत विधि के अनुसार किया जाये तो इसी जीवनमें मनुष्य को ईश्वर से मनवांछित आशीष ( वर ) प्राप्त हो सकते हैं।
जो पत्नी इस अनुष्ठान कोकरती है उसे अवश्य ही सौभाग्य, ऐश्वर्य, पुत्र, दीर्घजीवी पति, ख्याति तथा अच्छा घरबारप्राप्त होता है।
कन्या च विन्देत समग्रलक्षणंपतिं त्ववीरा हतकिल्बिषां गतिम् ।
मृतप्रजा जीवसुता धनेश्वरीसुदुर्भगा सुभगा रूपमछयम् ॥
२६॥
विन्देद्विरूपा विरुजा विमुच्यतेय आमयावीन्द्रियकल्यदेहम् ।
एतत्पठन्नभ्युदये च कर्म-ण्यनन्ततृप्ति: पितृदेवतानाम् ॥
२७॥
तुष्टा: प्रयच्छन्ति समस्तकामान्होमावसाने हुतभुक्श्रीहरिश्च ।
राजन्महन्मरुतां जन्म पुण्यंदितेब्रेतं चाभिहितं महत्ते ॥
२८॥
कन्या--अविवाहित लड़की; च--तथा; विन्देत--प्राप्त कर सकती है; समग्रलक्षणम्--समस्त अच्छे गुणों वाला;पतिम्--पति को; तु--और; अवीरा--पति या पुत्र रहित स्त्री; हत-किल्बिषाम्--दोषरहित; गतिम्--गन्तव्य; मृत-प्रजा--स्त्री जिसके पुत्र मर चुके हैं; जीव-सुता--दीर्घजीवी पुत्रों वाली; धन-ईश्वरी-- धनवान; सु-दुर्भगा--अभागी; सु-भगा--भाग्यवान्; रूपम्--सुन्दरता; अछयमू-- श्रेष्ठ; विन्देत्--प्राप्त कर सकती है; विरूपा--कुरुप स्त्री; विरुजा--रोग से;विमुच्यते--मुक्त हो जाती है; यः--जो; आमया-वी--रूग्ण पुरुष; इन्द्रिय-कल्य-देहम्--हृष्ट पुष्ट देह; एतत्--यह;पठनू--सुनाना; अभ्युदये च कर्मणि--तथा यज्ञ में जिसमें पितरों तथा देवों को आहुति दी जाती है; अनन्त--अपार;तृप्तिः--तुष्टि; पितृ-देवतानाम्-पितरों तथा देवताओं के; तुष्टा:--प्रसन्न होकर; प्रयच्छन्ति-- प्रदान करते हैं; समस्त--सभी; कामान्--इच्छाएँ; होम-अवसाने--इस अनुष्ठान के पूर्ण हो जाने पर; हुत-भुक्ू--यज्ञ का भोक्ता; श्री-हरिः--भगवान् विष्णु; च--तथा; राजन्--हे राजा; महत्--महान्; मरुताम्ू--मरुतों का; जन्म--जन्म; पुण्यम्--पतवित्र;दितेः--दिति का; ब्रतम्-ब्रत; च-- भी; अभिहितम्--कहा गया; महत्--महान्; ते--तुमसे
यदि अविवाहित कन्या इस ब्रत को रखती है, तो उसे सुन्दर पति मिल सकता है।
यदिअवीरा स्त्री ( जिसका कोई पति या पुत्र नहीं है ) इस अनुष्ठान को करती है, तो उसे वैकुण्ठजगत को भेजा जा सकता है।
जिस स्त्री की संतानें जन्म लेने के बाद मर चुकी हों, उसेदीर्घजीवी सन््तान के साथ ही साथ सम्पत्ति भी प्राप्त होती है।
अभागी स्त्री का भाग्य खुलजाता है और कुरूपा स्त्री सुन्दर हो जाती है।
इस व्रत को रखने से रोगी पुरुष को रोग से मुक्ति मिल सकती है और कार्य करने के लिए स्वस्थ शरीर प्राप्त हो सकता है।
यदि इसकथा को कोई अपने पितरों तथा देवों को आहुति देते समय विशेषतया श्राद्ध-पश्ष में सुनातातो देवता तथा पितृलोक के वासी उससे अत्यन्त प्रसन्न होंगे और उसकी समस्त इच्छाओं कोपूर्ण करते हैं।
इस अनुष्ठान के करने से भगवान् विष्णु तथा माता लक्ष्मी उस पर अत्यन्तप्रसन्न होते हैं।
हे राजा परीक्षित! मैंने पूरी तरह से बता दिया है कि दिति ने किस प्रकार इसव्रत को किया और उसे श्रेष्ठ पुत्र--मरुतृगण तथा सुखी जीवन--प्राप्त हुए।
मैंने तुम्हें यथा शक्ति विस्तार से सुनाने का प्रयत्न किया है।
