← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 6 की सूची

अध्याय दो: विष्णुदत्त द्वारा अजामिल का उद्धार

6.2एवं ते भगवहूता यमदूताभिभाषितम्‌ ।

उपधार्याथ तान्नाजन्प्रत्याहुनंयकोविदा: ॥

१॥

श्री-बादरायणि: उवाच--व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; ते--वे; भगवत्‌-दूता: --भगवान्‌ विष्णु के सेवक; यमदूत--यमराज के सेवकों द्वारा; अभिभाषितम्‌--कहा गया; उपधार्य--सुनकर; अथ--तब;तान्‌ू--उनसे; राजनू--हे राजन; प्रत्याहु:--ठीक से उत्तर दिया; नय-कोविदा:--उत्तम नीति में पटु होने से

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्‌! भगवान्‌ विष्णु के दूत नीति तथा तर्कशाम्््र मेंअति पटु होते हैं।

यमदूतों के कथनों को सुनने के बाद उन्होंने इस प्रकार उत्तर दिया।

श्रीविष्णुदूता ऊचुःअहो कष्ट धर्मदशामधर्म: स्पृशते सभाम्‌ ।

यत्रादण्डब्रेष्वपापेषु दण्डो यैश्चियते वृथा ॥

२॥

श्री-विष्णुदूता: ऊचु:--विष्णुदूतों ने कहा; अहो--हाय; कष्टम्‌ू--कितना दुखदायी है; धर्म-हशाम्‌-- धर्मपालन करने मेंरुचि लेने वाले पुरुषों को; अधर्म:--अधर्म; स्पृशते--प्रभावित कर रहा है; सभाम्‌--सभा को; यत्र--जिसमें;अदण्ड्येषु--न दण्डित होने वाले पुरुषों पर; अपापेषु--पापरहित; दण्ड:--दण्ड; यैः--जिनके द्वारा; प्वियते--निर्धारितकिया जाता है; वृथा--व्यर्थ ही |

विष्णुदूतों ने कहा : हाय! यह कितना दुःखद है कि ऐसी सभा में जहाँ धर्म का पालनहोना चाहिए, वहाँ अधर्म को लाया जा रहा है।

दरअसल, धार्मिक सिद्धान्तों का पालनकरने के अधिकारी जन एक निष्पाप एवं अदण्डनीय व्यक्ति को व्यर्थ ही दण्ड दे रहे हैं।

प्रजानां पितरो ये च शास्तार: साधव: समा: ।

यदि स्यात्तेषु वैषम्यं क॑ यान्ति शरणं प्रजा: ॥

३॥

प्रजानामू--नागरिकों के; पितर:--रक्षक, अभिभावक ( राजा या सरकारी नौकर ); ये--जो; च--तथा; शास्तार:--कानून तथा व्यवस्था का आदेश देने वाले; साधव:--समस्त सदगुणों से युक्त; समा:--हर एक के तुल्य; यदि--यदि;स्थात्‌--है; तेषु--उनमें से; वैषम्यम्‌--पक्षपात; कमू--किसकी; यान्ति-- जायेंगे; शरणम्‌--शरण में; प्रजा:--नागरिक |

राजा या सरकारी शासक को इतना सुयोग्य होना चाहिए कि वह स्नेह और प्रेम के साथनागरिकों के पिता, पालक तथा संरक्षक के रूप में कार्य कर सके।

उसे मानक शास्त्रों केअनुसार नागरिकों को अच्छी सलाह तथा आदेश देने चाहिए और हर एक के प्रति समभावरखना चाहिए।

यमराज ऐसा करता है, क्योंकि वह न्याय का परम स्वामी है और उसकेपदचिन्हों पर चलने वाले भी वैसा ही करते हैं, किन्तु यदि ऐसे लोग दूषित हो जायेँ औरनिर्दोष तथा अबोध व्यक्ति को दण्डित करके पक्षपात प्रदर्शित करें तो फिर सारे नागरिकअपने भरण-पोषण तथा सुरक्षा के लिए शरण लेने हेतु कहाँ जायेंगे ?

यद्यदाचरति श्रेयानितरस्तत्तदीहते ।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

४॥

यत्‌ यत्‌--जो जो; आचरति--सम्पन्न करता है; श्रेयान्‌ू-धार्मिक सिद्धान्तों की पूरी जानकारी से युक्त उच्चकोटि काव्यक्ति; इतर: --अधीन व्यक्ति; तत्‌ तत्‌ू--वही वही; ईहते--करता है; सः--वह ( महापुरुष ); यत्‌--जो जो; प्रमाणम्‌--प्रमाण या सही बात के रूप में; कुरुते--स्वीकार करती है; लोक:--आम जनता; तत्‌--वही; अनुवर्तते--अनुसरणकरती है।

आम जनता समाज में नेता के उदाहरण का अनुगमन और उसके आचरण का अनुसरणकरती है।

नेता जो भी मानता है उसे आप जनता प्रमाण रूप में स्वीकार करती है।

यस्याड्ले शिर आधाय लोक: स्वपिति निर्वृतः ।

स्वयं धर्ममधर्म वा न हि वेद यथा पशु: ॥

५॥

स कथं न्यर्पितात्मानं कृतमैत्रमचेतनम्‌ ।

विस्त्रम्भणीयो भूतानां सघृणो दोग्धुमहति ॥

६॥

यस्य--जिसके; अछ्ले-गोद में; शिर:ः--सिर; आधाय--रखकर; लोक:--आम जनता; स्वपिति--सोती है; निर्वृत:ः--शान्ति से; स्वयम्‌--स्वयं; धर्मम्‌-धार्मिक सिद्धान्त या जीवन-लक्ष्य; अधर्मम्‌--अधार्मिक सिद्धान्त; वा--अथवा; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; वेद--जानते हैं; यथा--जिस तरह; पशु:--पशु; सः--ऐसा व्यक्ति; कथम्‌--कैसे; न्यर्पित-आत्मानम्‌--उस जीव के प्रति जिसने पूर्णतया आत्मसमर्पण कर दिया है; कृत-मैत्रम्‌ू-- श्रद्धा तथा मैत्री से समन्वित;अचेतनम्‌--अविकसित चेतना वाला, मूर्ख; विस्त्रम्भणीय:-- श्रद्धा का विषय बनने के योग्य; भूतानाम्‌ू--जीवों का; स-घृण:--सारे लोगों के कल्याण हेतु मृदु हृदय रखने वाला; दोग्धुम्‌--कष्ट देने के लिए; अरहति--समर्थ है।

सामान्य लोग ज्ञान में इतने उन्नत होते है कि धर्म तथा अधर्म में भेदभाव कर सकें।

अबोध, अप्रबुद्ध नागरिक उस अज्ञानी पशु की तरह है, जो अपने स्वामी की गोद में सिर रखकर शान्तिपूर्वक सोता रहता है और श्रद्धापूर्वक अपने स्वामी द्वारा अपने संरक्षण पर विश्वासकरता है।

यदि नेता वास्तव में दयालु हो तथा जीव की श्रद्धा का भाजन बनने योग्य हो तोवह किसी मूर्ख व्यक्ति को किस तरह दण्ड दे सकता है या जान से मार सकता है, जिसनेश्रद्धा तथा मैत्री में पूर्णतया आत्मसमर्पण कर दिया हो ?

अयं हि कृतनिर्वेशो जन्मकोट्यंहसामपि ।

यद्व्याजहार विवशो नाम स्वस्त्ययनं हरे: ॥

७॥

अयमू--यह व्यक्ति ( अजामिल ); हि--निस्सन्देह; कृत-निर्वेश: --सभी तरह के प्रायश्चित्त किये हैं; जन्म--जन्मों का;कोटि--करोड़ों; अंहसाम्‌--पापकर्मों के लिए; अपि-- भी; यत्‌--क्योंकि; व्याजहार--उच्चारण किया है; विवश: --असहाय अवस्था में; नाम--पवित्र नाम; स्वस्ति-अयनम्‌--मोक्ष का साधन; हरेः--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के |

अजामिल पहले ही अपने सारे पापकर्मों के लिए प्रायश्चित्त कर चुका है।

दरअसल,उसने न केवल एक जीवन में किये गये पापों का प्रायश्चित्त किया है, अपितु करोड़ों जीवनोंमें किये गये पापों के लिए किया है, क्योंकि उसने असहाय अवस्था में नारायण-नाम काउच्चारण किया है।

यद्यपि उसने शुद्धरीति से यह उच्चारण नहीं किया, किन्तु उसने अपराधरहित उच्चारण किया है इसलिए अब वह पवित्र है और मोक्ष का पात्र है।

एतेनैव हाघोनोस्य कृतं स्थादघनिष्कृतम्‌ ।

यदा नारायणायेति जगाद चतुरक्षरम्‌ ॥

८॥

एतेन--इस ( कीर्तन ) से; एब--निस्सन्देह; हि--निश्चय ही; अघोन:--पापपूर्ण फलों वाला; अस्य--इस ( अजामिल )का; कृतम्‌--किया हुआ; स्यात्‌--है; अघध--पापों का; निष्कृतम्‌--पूर्ण प्रायश्चित्त; यदा--जब; नारायण--हे नारायण( उसके पुत्र का नाम )) आय--कृपया आइये; इति--इस प्रकार; जगाद--उच्चारण किया; चतु:-अक्षरम्‌--चार अक्षर(ना-रा-य-ण )

विष्णुदूतों ने आगे कहा : यहाँ तक कि पहले भी, खाते समय तथा अन्य अवसरों परयह अजामिल अपने पुत्र को यह कहकर पुकारा करता, प्रिय नारायण! यहाँ तो आओ।

यद्यपि वह अपने पुत्र का नाम पुकारता था, फिर भी वह ना, रा, य तथा ण इन चार अक्षरोंका उच्चारण करता था।

इस प्रकार केवल नारायण नाम का उच्चारण करने से उसने लाखोंजन्मों के पापपूर्ण फलों के लिए पर्याप्त प्रायश्चित्त कर लिए हैं।

स्तेनः सुरापो मित्रश्नुग्ब्रह्महा गुरुतल्पग: ।

स्त्रीराजपितृगोहन्ता ये च पातकिनोपरे ॥

९॥

सर्वेषामप्यघवतामिदमेव सुनिष्कृतम्‌ ।

नामव्याहरणं विष्णोर्यतस्तद्विषया मति: ॥

१०॥

स्तेन:--चुराने वाला; सुरा-प:--शराबी; मित्र-श्रुक्‌ु-- अपने मित्र या सम्बन्धी का विरोधी; ब्रह्म-हा--ब्राह्मण का वधकरने वाला; गुरु-तल्प-ग:--अपने गुरु की पतली के साथ संभोग करने वाला; स्त्री--स्त्रियाँ; राज--राजा; पितृ--पिता;गो--गौवों का; हन्ता--हत्यारा; ये--जो; च-- भी; पातकिन:--पापकर्मे किए; अपरे-- अन्य सारे; सर्वेषाम्‌--उनसबका; अपि-- भी; अघ-वताम्‌-- अनेक पाप कर चुके व्यक्ति; इदम्‌--यह; एबव--निश्चय ही; सु-निष्कृतम्‌--पूर्णप्रायश्चित्त; नाम-व्याहरणम्‌--नाम का कीर्तन; विष्णो:-- भगवान्‌ विष्णु के; यत:--जिससे; तत्‌-विषया--पवित्र नाम काउच्चारण करने वाले पर; मति:--उनका ध्यान।

भगवान्‌ विष्णु के नाम का कीर्तन सोना या अन्य मूल्यवान वस्तुओं के चोर, शराबी,मित्र या सम्बन्धी के साथ विश्वासघात करने वाले, ब्राह्मण के हत्यारे अथवा अपने गुरुअथवा अन्य श्रेष्ठजन की पत्नी के साथ संभोग करने वाले के लिए प्रायश्नित्त की सर्वोत्तम विधि है।

स्त्रियों, राजा या अपने पिता के हत्यारे, गौवों का वध करने वाले तथा अन्य सारेपापी लोगों के लिए भी प्रायश्चित्त की यही सर्वोत्तम विधि है।

भगवान्‌ विष्णु के पवित्र नामका केवल कीर्तन करने से ऐसे पापी व्यक्ति भगवान्‌ का ध्यान आकृष्ट कर सकते हैं और वेइसीलिए विचार करते हैं कि, 'इस व्यक्ति ने मेरे नाम का उच्चारण किया है, इसलिए मेराकर्तव्य है कि उसे सुरक्षा प्रदान करूँ।

'न निष्कृतैरुदितैर्ब्रह्यवादिभि-स्तथा विशुद्धब्॒त्यघवान्ब्रतादिभि: ।

यथा हरे्नामपदैरुदाहतै-स्तदुत्तमशलोकगुणोपलम्भकम्‌ ॥

११॥

न--नहीं; निष्कृतैः--प्रायश्चित्त की विधियों द्वारा; उदितैः--निर्धारित; ब्रह्म-वादिभि: --मनु जैसे विद्वान पंडितों द्वारा;तथा--उस सीमा तक; विशुद्धयति--शुद्ध हो जाता है; अघ-वान्‌--पापी व्यक्ति; ब्रत-आदिभि:--ब्रत तथा अन्य अनुष्ठानोंका पालन करने से; यथा--जिस तरह; हरेः-- भगवान्‌ हरि का; नाम-पदै:ः --नाम के अक्षरों से; उदाहतै:--उच्चरित;तत्‌--वह; उत्तमश्लोक --पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के; गुण--दिव्य गुणों का; उपलम्भकम्‌--किसी को स्मरण दिलातेहुए

वैदिक कर्मकाण्डों का पालन करने अथवा प्रायश्चित्त करने से पापी लोग उस तरह सेशुद्ध नहीं हो पाते जिस तरह एक बार भगवान्‌ हरि के पवित्र नाम का कीर्तन करने से शुद्धबनते हैं।

यद्यपि आनुष्ठानिक प्रायश्चित्त मनुष्य को पापफलों से मुक्त कर सकता है, किन्तुयह भक्ति को जाग्रत नहीं करता जिस तरह परम भगवान्‌ के नाम का कीर्तन मनुष्य कोभगवान्‌ के यश, गुण, लक्षण, लीलाओं तथा साज-सामग्री का स्मरण कराता है।

नैकान्तिकं तद्द्धि कृतेडपि निष्कृतेमनः पुनर्धावति चेदसत्पथे ।

तत्कर्मनिर्हारमभी प्सतां हरे-गुणानुवाद: खलु सत्त्मभावन: ॥

१२॥

न--नहीं; ऐकान्तिकम्‌--पूरी तरह स्वच्छ किया हुआ; तत्‌--हृदय; हि--क्योंकि; कृते--अत्यन्त सुन्दर ढंग से सम्पन्न;अपि--यद्यपि; निष्कृते--प्रायश्चित्त; मन:ः--मन; पुनः--फिर; धावति--दौड़ता है; चेत्‌--यदि; असत्‌-पथे--भौतिककार्यो के मार्ग पर; तत्‌ू--इसलिए; कर्म-निर्हारमू-- भौतिक कर्मों के सकाम फलों का अन्त; अभीप्सताम्‌--उनके लिए जोगम्भीरतापूर्वक चाहते हैं; हरेः--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का; गुण-अनुवाद:--महिमा का निरन्तर कीर्तन; खलु--निस्सन्देह; सत्त्त-भावन:--वास्तव में जीवन को शुद्ध करने वाला

धार्मिक शान्त्रों में संस्तुत किये गये प्रायश्चित्त के कर्मकाण्ड हृदय को पूरी तरह स्वच्छबनाने में अपर्याप्त होते हैं, क्योंकि प्रायश्चित्त के बाद मनुष्य का मन पुनः भौतिक कर्मों कीओर दौड़ता है।

फलस्वरूप, जो व्यक्ति भौतिक कार्यो के सकाम फलों से मुक्ति चाहता है,उसके लिए हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन या भगवान्‌ के नाम, यश तथा लीलाओं की महिमाका गायन प्रायश्चित्त की सबसे पूर्ण विधि के रूप में संस्तुत किया जाता है, क्योंकि ऐसेकीर्तन से मनुष्य के हृदय में संचित धूल स्वच्छ हो जाती है।

ओर दौड़ता है।

फलस्वरूप, जो व्यक्ति भौतिक कार्यो के सकाम फलों से मुक्ति चाहता है,उसके लिए हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन या भगवान्‌ के नाम, यश तथा लीलाओं की महिमाका गायन प्रायश्चित्त की सबसे पूर्ण विधि के रूप में संस्तुत किया जाता है, क्योंकि ऐसेकीर्तन से मनुष्य के हृदय में संचित धूल स्वच्छ हो जाती है।

अथेनं मापनयत कृताशेषाघनिष्कृतम्‌ ।

यदसौ भगवतल्नाम प्रियमाण: समग्रहीत्‌ ॥

१३॥

अथ--इसलिए; एनम्‌--उसको ( अजामिल को ); मा--मत; अपनयत--ले जाने का प्रयास करो; कृत--पहले कियाहुआ; अशेष--- असीम; अघ-निष्कृतम्‌--उसके पापकर्मो के लिए प्रायश्चित्त; यत्‌--क्योंकि; असौ--उसने; भगवत्‌-नाम--भगवान्‌ का पवित्र नाम; प्रियमाण:--मरते समय; समग्रहीत्‌--पूर्णरूपेण उच्चारण किया |

इस अजामिल ने मृत्यु के समय असहाय होकर तथा अत्यन्त जोर-जोर से भगवान्‌नारायण के पवित्र नाम का उच्चारण किया है।

एकमात्र उसी उच्चारण ने पूरे पापमय जीवनके फलों से उसे पहले ही मुक्त कर दिया है।

इसलिए हे यमराज के सेवको! तुम उसे नारकीयदशाओं में दण्ड देने के लिए अपने स्वामी के पास ले जाने का प्रयास मत करो।

सद्ठेत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा ।

वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदु: ॥

१४॥

सड्लेत्यम्‌ू--संकेत के रूप में; पारिहास्यम्‌--हँसी मजाक में; वा--अथवा; स्तोभम्‌--संगीतमय मनोरंजन में; हेलनम्‌--उपेक्षा भाव से; एब--निश्चय ही; वा--अथवा; बैकुण्ठ-- भगवान्‌ का; नाम-ग्रहणम्‌--पवित्रनाम का कीर्तन; अशेष--असीम; अघ-हरम्‌--पापमय जीवन के प्रभाव को दूर करने वाला; विदु:--उन्नत योगी जानते हैं

जो व्यक्ति भगवन्नाम का कीर्तन करता है उसे तुरन्त अनगिनत पापों के फलों से मुक्तकर दिया जाता है।

भले ही उसने यह कीर्तन अप्रत्यक्ष रूप में ( कुछ अन्य संकेत करने केलिए ), परिहास में, संगीतमय मनोरंजन के लिए अथवा उपेक्षा भाव से क्‍यों न किया हो।

इसे शास्त्रों में पारंगत सभी विद्वान पंडित स्वीकार करते हैं।

'पतितः स्खलितो भग्नः सन्दृष्टस्तप्त आहतः ।

हरिरित्यवशेनाह पुमान्नाहति यातना: ॥

१५॥

'पतित:--गिरा हुआ; स्खलित:--फिसला हुआ; भग्न:--टूटी हड्डियों वाला; सन्दष्ट:--काटा हुआ; तप्त:--ज्वर या ऐसीही पीड़ादायक स्थिति से बुरी तरह आक्रान्त; आहत:--चोट खाया; हरि: -- भगवान्‌ कृष्ण; इति--इस प्रकार; अवशेन--अकस्मात्‌; आह--कीर्तन करता है; पुमान्‌ू--मनुष्य; न--नहीं; अर्हति--योग्य है; यातना:--नारकीय दशाएँ।

यदि कोई हरिनाम का उचार करता है और तभी किसी आकस्मिक दुर्भाग्य से यथा छतसे गिरने, फिसलने या सड़क पर यात्रा करते समय हड्डी टूट जाने, सर्प द्वारा काटे जाने,पीड़ा तथा तेज ज्वर से आक्रान्त होने या हथियार से घायल होने से, मर जाता है, तो वहकितना ही पापी क्‍यों न हो नारकीय जीवन में प्रवेश करने से बह तुरन्त मुक्त कर दिया जाताहै।

गुरूणां च लघूनां च गुरूणि च लघूनिच ।

प्रायश्षित्तानि पापानां ज्ञात्वोक्तानि महर्षिभि: ॥

१६॥

गुरूणाम्‌-- भारी; च--तथा; लघूनाम्‌-- हल्के; च--तथा; गुरूणि -- भारी; च--तथा; लघूनि-- हल्के; च--भी;प्रायश्चित्तानि--प्रायश्चित्त की विधियाँ; पापानाम्‌ू--पापकर्मो की; ज्ञात्वा--ठीक से जानकर; उक्तानि--नियत की गई है;महा-ऋषिभि:--बड़े-बड़े ऋषियों द्वारा

प्राधिकृत विज्ञ पंण्डितों तथा महर्षियों ने बड़ी ही सावधानी के साथ यह पता लगाया हैकि मनुष्य को भारी से भारी पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए प्रायश्चित की भारी विधि कातथा हल्के पापों के प्रायश्चित्त के लिए हल्की विधि का प्रयोग करना चाहिए।

किन्तु हरे-कृष्ण-कीर्तन सारे पापकर्मो के प्रभावों को, चाहे वे भारी हों या हल्के, नष्ट कर देता है।

तैस्तान्यघानि पूयन्ते तपोदानब्रतादिभि: ।

नाधर्मजं तद्धूदयं तदपीशाड्प्रिसेवया ॥

१७॥

तैः--उनके द्वारा; तानि--वे सब; अधानि--पापकर्म तथा उनके फल; पूयन्ते--विनष्ट हो जाते हैं; तप:ः--तपस्या; दान--दान; ब्रत-आदिभि:--ब्रतों तथा अन्य कार्यो के द्वारा; न--नहीं; अधर्म-जम्‌--अधार्मिक कार्यों से उत्पन्न; तत्‌ू--उसका;हृदयम्‌--हृदय; तत्‌--वह; अपि-- भी; ईश-अड्प्रि-- भगवान्‌ के चरणकमलों की; सेवया--सेवा द्वारा

यद्यपि तपस्या, दान, व्रत तथा अन्य विधियों से पापमय जीवन के फलों का निरसनकिया जा सकता है, किन्तु ये पुण्यकर्म किसी के हृदय की भौतिक इच्छाओं का उन्मूलननहीं कर सकते।

किन्तु यदि वह भगवान्‌ के चरणकमलों की सेवा करता है, तो वह तुरन्तही ऐसे सारे कल्मषों से मुक्त कर दिया जाता है।

अज्ञानादथवा ज्ञानादुत्तमएलोकनाम यत्‌ ।

सड्डलीतितमघं पुंसो दहेदेधो यथानल: ॥

१८॥

अज्ञानात्‌ू--अज्ञानवश; अथवा--या; ज्ञानातू--जानकर; उत्तमएलोक-पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का; नाम--पवित्रनाम;यत्‌--जो; सड्लीतितम्‌--संकीर्तन किया गया; अघम्‌--पाप; पुंसः--मनुष्य का; दहेत्‌--जलाकर क्षार कर देता है;एध:--सूखी घास; यथा--जिस तरह; अनलः--अग्नि

जिस तरह अग्नि सूखी घास को जला कर राख कर देती है, उसी तरह भगवतन्नाम, चाहेवह जाने-अनजाने में उच्चारण किया गया हो, मनुष्य के पापकर्मों के सभी फलों को निश्चितरूप से जलाकर राख कर देता है।

यथागदं वीर्यतममुपयुक्तं यहच्छया ।

अजानतो प्यात्मगुणं कुर्यान्मन्त्रोउप्युदाहत: ॥

१९॥

यथा--जिस तरह; अगदम्‌--दवा; वीर्य-तमम्‌--अत्यन्त तेज; उपयुक्तम्‌--उचित रीति से ली गई; यहच्छया--किसी -न-किसी तरह; अजानत: --ज्ञान से विहीन पुरुष द्वारा; अपि-- भी; आत्म-गुणम्‌--अपनी शक्ति से; कुर्यात्‌ू--प्रकट करता है;मन्त्र:--हरे कृष्ण मंत्र; अपि-- भी; उदाहत:--उच्चारण किया गया।

यदि किसी दवा की प्रभावकारी शक्ति से अनजान व्यक्ति उस दवा को ग्रहण करता हैया उसे बलपूर्वक खिलाई जाती है, तो वह दवा उस व्यक्ति के जाने बिना ही अपना कार्यकरेगी, क्योंकि उसकी शक्ति रोगी के जानकारी पर निर्भर नहीं करती हैं।

इसी तरह,भगवतन्नाम के कीर्तन के महत्त्व को न जानते हुए भी यदि कोई व्यक्ति जाने या अनजाने मेंउसका कीर्तन करता है, तो वह कीर्तन अत्यन्त प्रभावकारी होगा।

श्रीशुक उबाचत एवं सुविनिर्णीय धर्म भागवतं नृप ।

त॑ याम्यपाशान्निर्मुच्य विप्र॑ मृत्योरमूमुचन्‌ ॥

२०॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ते--वे ( विष्णुदूत ); एवम्‌--इस प्रकार; सु-विनिर्णीय--सुनिश्चितकरके; धर्ममू--असली धर्म; भागवतम्‌-- भक्ति के रूप में; नृप--हे राजा; तम्‌--उसको ( अजामिल को ); याम्य-पाशात्‌--यमदूतों के पाश से; निर्मुच्य--छुड़ाकर; विप्रम्‌--ब्राह्मण को; मृत्यो:--मृत्यु से; अमूमुचनू--बचा लिया।

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन! तर्क-वितर्कों द्वारा भक्ति के सिद्धान्तों कापूरी तरह से निर्णय कर चुकने के बाद विष्णु के दूतों ने अजामिल को यमदूतों के पाश सेछुड़ा दिया और उसे आसन्न मृत्यु से बचा लिया।

इति प्रत्युदिता याम्या दूता यात्वा यमान्तिकम्‌ ।

यमराज्ञे यथा सर्वमाचचश्षुररिन्दम ॥

२१॥

इति--इस प्रकार; प्रत्युदिता:--( विष्णुदूतों द्वारा ) उत्तर पाकर; याम्या:--यमराज के सेवक; दूता:--दूत; यात्वा--जाकर; यम-अन्तिकम्‌--यमराज के धाम; यम-राज्ञे--यमराज के पास; यथा-- भलीभाँति; सर्वम्‌--सारी बातें;आचचक्षु: --विस्तार से सूचित किया; अरिन्दम--हे शत्रुओं के दमनकर्ता

हे राजा परीक्षित! हे समस्त शत्रुओं के दमनकर्ता! जब यमराज के सेवकों ने विष्णुदूतोंसे उत्तर पा लिया, तो वे यमराज के पास गये और जो कुछ घटित हुआ था, सब कहसुनाया।

द्विजः पाशाद्विनिर्मुक्तो गतभी: प्रकृतिं गत: ।

बवबन्दे शिरसा विष्णो: किड्डरान्दर्शनोत्सवः ॥

२२॥

द्विज:--ब्राह्मण ( अजामिल ); पाशात्‌--फंदे से; विनिर्मुक्त:--छोड़ दिये जाने पर; गत-भी:--भय से मुक्त; प्रकृतिम्‌गतः--होश में आया, चेत हुआ; ववन्दे--अपना सादर प्रणाम अर्पित किया; शिरसा--अपना सिर झुकाकर; विष्णो: --भगवान्‌ विष्णु के; किड्डूरान्‌--सेवकों को; दर्शन-उत्सव:--उन्हें देखकर अतीव प्रसन्न

यमराज के सेवकों के फन्‍्दे से छुड़ा दिये जाने पर ब्राह्मण अजामिल अब भय से मुक्तहोकर होश में आया और तुरन्त ही उसने विष्णुदूतों के चरणकमलों पर शीश झुकाकर उन्हेंनमस्कार किया।

वह उनकी उपस्थिति से अत्यन्त प्रसन्न था, क्योंकि उसने यमराज के दूतों केहाथों से उन्हें अपना जीवन बचाते देखा था।

त॑ं विवक्षुमभिप्रेत्य महापुरुषकिड्डूरा: ।

सहसा पश्यतस्तस्य तत्रान्तर्दधिरिडनघ ॥

२३॥

तम्‌--उसको ( अजामिल को ); विवक्षुमू--बोलने की इच्छा करते हुए; अभिप्रेत्य--समझ कर; महापुरुष-किड्जूरा:--भगवान्‌ विष्णु के दूत; सहसा--एकाएक; पश्यतः तस्थ--उसके देखते-देखते; तत्र--वहाँ; अन्तर्दधिरे--अन्तर्धान हो गये;अनघ--हे निष्पाप महाराज परीक्षित।

हे निष्पाप महाराज परीक्षित! पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ विष्णुदूतों ने देखा कि अजामिलकुछ कहना चाह रहा था, अतः वे सहसा उसके समक्ष से अन्तर्धान हो गये।

अजामिलोप्यथाकर्णय्य दूतानां यमकृष्णयो: ।

धर्म भागवतं शुद्ध त्रैवेद्यं च गुणाभ्रयम्‌ ॥

२४॥

भक्तिमान्भगवत्याशु माहात्म्यश्रवणाद्धरे: ।

अनुतापो महानासीत्स्मरतोशुभमात्मन: ॥

२५॥

अजामिल:--अजामिल ने; अपि--भी; अथ--तत्पश्चात्‌; आकर्ण्य--सुनकर; दूतानाम्‌--दूतों का; यम-कृष्णयो: --यमराज तथा भगवान्‌ कृष्ण का; धर्मम्‌--वास्तविक धार्मिक सिद्धान्त; भागवतम्‌--जैसाकि श्रीमद्भागवत में वर्णित हैअथवा जीव तथा पूर्ण पुरुषोत्त्म भगवान्‌ के बीच सम्बन्ध विषयक; शुद्धम्‌-शुद्ध; त्रै-वेद्यम्‌--तीनों बेदों में उल्लिखित;च--भी; गुण-अश्रयम्‌-- प्रकृति के गुणों के अधीन भौतिक धर्म; भक्ति-मान्‌--शुद्ध भक्त ( भौतिक गुणों से शुद्ध कियाहुआ ); भगवति--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के प्रति; आशु--तुरन्त; माहात्म्य--नाम, यश आदि का गुणगान; श्रवणात्‌--सुनने से; हरेः:-- भगवान्‌ के; अनुताप: -- खेद; महान्‌--अत्यधिक; आसीत्‌-- था; स्मरत:--स्मरण करता हुआ;अशुभम्‌--समस्त अशुभ कर्म; आत्मन:--अपने द्वारा किये हुए

यमदूतों तथा विष्णुदूतों के बीच हुए वार्तालापों को सुनकर अजामिल उन धार्मिकसिद्धान्तों को समझ सका जो भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के अधीन कार्य करते हैं।

येसिद्धान्त तीन वेदों में उल्लिखित हैं।

वह उन दिव्य धार्मिक सिद्धान्तों को भी समझ सका जोभौतिक प्रकृति के गुणों से ऊपर हैं और जो जीव तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के बीच केसम्बन्ध से सम्बन्धित हैं।

इतना ही नहीं, अजामिल ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के नाम, यश,गुणों तथा लीलाओं के गुणगान को सुना।

इस तरह वह पूरी तरह शुद्ध भक्त बन गया।

तबउसे अपने विगत पापकर्मों का स्मरण हुआ और उसे अत्यधिक पछतावा हुआ कि उसने येपाप क्‍यों किये।

अहो मे परमं कष्टमभूदविजितात्मन: ।

येन विप्लावितं ब्रह्म वृषल्यां जायतात्मना ॥

२६॥

अहो--हाय; मे--मेरी; परमम्‌-- अत्यधिक; कष्टम्‌--दुखी अवस्था; अभूत्‌--हो गई; अविजित-आत्मन:--क्योंकि मेरीइन्द्रियाँ अनियंत्रित थीं; येन--जिनके द्वारा; विप्लावितम्‌-विनष्ट; ब्रह्म--मेरे सारे ब्राह्मणगुण; वृषल्याम्‌--एक शूद्राणीया दासी से; जायता--उत्पन्न हुए; आत्मना--मेरे द्वारा

अजामिल ने कहा : हाय! अपनी इन्द्रियों का दास बनकर मैं कितना अधम बन गया! मैंअपने सुयोग्य ब्राह्मण पद से नीचे गिर गया और मैंने एक वेश्या के गर्भ से बच्चे उत्पन्नकिये।

धिड्मां विगर्हितं सद्धिर्दुष्कृतं कुलकज्जलम्‌ ।

हित्वा बालां सतीं योहं सुरापीमसतीमगाम्‌ ॥

२७॥

धिक्‌ माम्‌--मुझे धिक्कार है; विगर्हितम्‌--निन्‍्दनीय; सद्द्धिः--ईमानदार व्यक्तियों द्वारा; दुष्कृतम्‌--पापकर्म करने वाला;कुल-कजलमू--जिसने कुल की परम्परा को कलंकित किया हो; हित्वा--त्यागकर; बालाम्‌--युवा पत्नी को; सतीम्‌--सती-साध्वी; यः--जो; अहम्‌--मैंने; सुरापीम्‌--शराब पीने वाली स्त्री के साथ; असतीम्‌--असाध्वी; अगाम्‌--संभोगकिया।

हाय! मुझे धिक्कार है।

मैंने इतना पापपूर्ण कार्य किया है कि अपनी मैने कुल-परम्पराको लज्जित किया है।

दरअसल, मैंने शराब पीने वाली पतित वेश्या के साथ संभोग करने केलिए अपनी सती तथा सुन्दर युवा पत्नी को त्याग दिया है।

धिक्कार है मुझे।

वृद्धावनाथौ पितरौ नान्यबन्धू तपस्विनौ ।

अहो मयाधुना त्यक्तावकृतज्ञेन नीचवत्‌ ॥

२८॥

वृद्धौ--वृद्ध; अनाथौ--जिनकी देखरेख करने वाला कोई न हो; पितरौ--अपने माता-पिता; न अन्य-बन्धू--जिनके कोईअन्य मित्र नहीं था; तपस्विनौ--जिन्होंने बड़े कष्ट सहे थे; अहो--हाय; मया--मेरे द्वारा; अधुना--सम्प्रति; त्यक्तौ-्यागेहुए; अकृत-ज्ञेन--अकृतज्ञ द्वारा; नीच-वत्‌--सबसे निन्दनीय व्यक्ति की तरह।

मेरे माता-पिता वृद्ध थे और उनकी देखरेख करने वाला कोई अन्य पुत्र या मित्र न था।

चूँकि मैंने उनकी देखभाल नहीं की, अतएव उन्हें बहुत ही कष्ट में रहना पड़ा।

हाय! एकनिन्दनीय निम्न जाति के पुरुष की तरह मैंने उस स्थिति में अकृतज्ञतापूर्वक उन्हें छोड़ दिया।

सोडहं व्यक्त पतिष्यामि नरके भूशदारुणे ।

धर्मघ्ना: कामिनो यत्र विन्दन्ति यमयातना: ॥

२९॥

सः--ऐसा व्यक्ति; अहम्‌--मैं; व्यक्तम्‌--अब स्पष्ट है; पतिष्यामि--नीचे गिरूँगा; नरके--नरक में; भूश-दारुणे-- अत्यन्तकष्टमय; धर्म-घ्ना:--धार्मिक सिद्धान्तों को तोड़ने वाले; कामिन:--अत्यधिक कामुक; यत्र--जहाँ; विन्दन्ति--सहते हैं;यम-यातना: --यमराज द्वारा दी जाने वाली कष्टमय दशाएँ।

अब यह स्पष्ट है कि ऐसे कर्मों के फलस्वरूप मुझ जैसे पापी व्यक्ति को उस नारकीयअवस्था में फेंक दिया जाना चाहिए जो धार्मिक सिद्धान्तों को तोड़ने वाले लोगों के निमित्तहोती है और मुझे वहाँ घोर कष्ट सहने चाहिए।

किमिदं स्वण आहो स्वित्साक्षादूष्टमिहाद्धुतम्‌ ।

क्‍्व याता अद्य ते ये मां व्यकर्षन्याशपाणय: ॥

३०॥

किम्‌--क्या; इृदम्‌--यह; स्वप्ने--स्वण में; आहो स्वित्‌ू--अथवा; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; दृष्टमू--देखा हुआ; इह--यहाँ;अद्भुतमू- आश्चर्यजनक; क्व--कहाँ; याता: --चले गये; अद्य-- अभी; ते--वे सभी; ये--जो; माम्‌--मुझको;व्यकर्षनू--घसीट रहे थे; पाश-पाणय:--अपने हाथों में पाश लिये हुए |

क्या मैंने यह सपना देखा था या यह सच्चाई थी?

मैंने भयावह पुरुषों को हाथ में रस्सीलिये मुझको बन्दी बनाने के लिए आते और मुझे दूर घसीटकर ले जाते हुए देखा।

वे कहाँचले गये हैं ?

अथ ते क्‍्व गताः सिद्धाश्चत्वारश्चारुदर्शना: ।

व्यामोचयन्नीयमानं बद्ध्वा पाशैरधो भुवः ॥

३१॥

अथ--इसलिए; ते--वे व्यक्ति; क्ब--कहाँ; गता:--चले गये; सिद्धा:--मुक्त; चत्वार:--चारों व्यक्ति; चारु-दर्शना: --देखने में अतीव सुन्दर; व्यामोचयन्‌--उन्होंने छोड़ दिया; नीयमानम्‌--ले जाये जा रहे मुझे; बद्ध्वा--बन्दी बनाकर;पाशै:--रस्सियों से; अध: भुव:ः--नीचे नरक क्षेत्र को |

और वे मुक्त तथा अति सुन्दर चार पुरुष कहाँ चले गये जिन्होंने मुझे बन्धन से मुक्तकिया और मुझे नारकीय क्षेत्रों में घमलीट कर ले जाये जाने से बचाया ?

अथापि मे दुर्भगस्य विबुधोत्तमदर्शने ।

भविततव्यं मड़लेन येनात्मा मे प्रसीदति ॥

३२॥

अथ--इसलिए; अपि--यद्यपि; मे--मुझ; दुर्भगस्य--इतने अभागे का; विबुध-उत्तम--उच्च भक्तों का; दर्शने--दर्शनकरने से; भवितव्यम्‌ू--होगा; मड्गलेन--शुभ कार्य; येन--जिससे; आत्मा--आत्मा; मे--मेरी; प्रसीदति--वास्तव में सुखीहोती है।

निश्चय ही मैं अति निन्दनीय तथा अभागा हूँ कि पापकर्मों के समुद्र में डूबा हुआ हूँ,किन्तु फिर भी अपने पूर्व आध्यात्मिक कर्मों के कारण मैं उन चार महापुरुषों का दर्शन करसका जो मुझे बचाने आये थे।

उनके आने से अब मैं अत्यधिक सुखी अनुभव करता हूँ।

अन्यथा प्रियमाणस्य नाशुचेर्वृषलीपते: ।

वैकुण्ठनामग्रहणं जिह्ना वक्तुमिहाहति ॥

३३॥

अन्यथा--अन्यथा, नहीं तो; प्रियमाणस्य--मरणासतन्न व्यक्ति का; न--नहीं; अशुचे:--अत्यन्त मलिन; वृषली-पते:--वेश्यागामी; बैकुण्ठ--वैकुण्ठ के भगवान्‌ का; नाम-ग्रहणम्‌--पवित्र नाम का कीर्तन; जिह्ला--जीभ; वक्तुम्‌--कहने में;इह--इस स्थिति में; अहति--समर्थ है।

यदि मैने विगत में भक्ति न की होती तो मुझ मलिन वेश्यागामी को, जो मरणासन्न थाकिस तरह वैकुण्ठपति के पवित्र नाम का उच्चारण करने का अवसर मिल पाता ?

निश्चय हीऐसा सम्भव न हो पाता।

क्व चाहं कितव:ः पापो ब्रह्मध्तो निरपत्रपः ।

क्व च नारायणेत्येतद्धगवन्नाम मड्भलम्‌ ॥

३४॥

क्व--कहाँ; च-- भी; अहम्‌--मैं; कितव:ः--वंचक, ठग; पापः--मूर्त रूप में सारे पाप; ब्रह्म-घ्न:--ब्राह्मण संस्कृति काहत्यारा; निरपत्रप:--निर्लज; क्व--कहाँ; च-- भी; नारायण-- नारायण; इति--इस प्रकार; एतत्‌--यह; भगवत्‌-नाम--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का पवित्र नाम; मड्गलम्‌--सर्व मंगलप्रद |

अजामिल कहता रहा : मैं ऐसा निर्लज्ज ठग हूँ जिसने अपनी ब्राह्मण संस्कृति की हत्याकर दी है।

निस्सन्देह, मैं साक्षात्‌ पाप हूँ।

भला मैं भगवान्‌ नारायण के पवित्रनाम केसर्वमंगलकारी कीर्तन की बराबरी में कहाँ ठहर सकता हूँ?

सोहं तथा यतिष्यामि यतचित्तेन्द्रयानिल: ।

यथा न भूय आत्मानमन्धे तमसि मज्जये ॥

३५॥

सः--ऐसा व्यक्ति; अहम्‌-मैं; तथा--इस तरह से; यतिष्यामि--मैं प्रयत्त करूँगा; यत-चित्त-इन्द्रिय--मन तथा इन्द्रियोंको नियंत्रित करूँगा; अनिल:--तथा आन्तरिक वायु; यथा--जिससे; न--नहीं; भूयः--पुनः; आत्मानम्‌--मेरी आत्मा;अन्धे--अंधकार में; तमसि--अज्ञान में; मजये--मैं डूब रहा हूँ।

मैं ऐसा पापी व्यक्ति हूँ, किन्तु अब मुझे यह अवसर प्राप्त हुआ है, अतः मैं अपने मन,जीवन ( प्राण ) तथा इन्द्रियों को पूरी तरह से वश में करके भक्ति में अपने को लगाऊँगाजिससे मैं पुन: गहन अंधकार तथा भौतिक जीवन के अज्ञान में न गिरूँ।

विमुच्य तमिमं बन्धमविद्याकामकर्मजम्‌ ।

सर्वभूतसुहच्छान्तो मैत्र: करुण आत्मवान्‌ ॥

३६॥

मोचवये ग्रस्तमात्मानं योषिन्मय्यात्ममायया ।

विक्रीडितो ययैवाहं क्रीडामृग इवाधम: ॥

३७॥

विमुच्य--छूटकर; तम्‌--उससे; इमम्‌--यह; बन्धम्‌--बन्धन; अविद्या--अविद्या के कारण; काम--कामेच्छाओं केकारण; कर्म-जम्‌--कार्यों से उत्पन्न; सर्व-भूत--सारे जीवों का; सुहृत्‌--मित्र; शान्त:ः--अत्यन्त शान्त; मैत्र: --मैत्रीपूर्ण ;करुण:--दयालु; आत्म-वान्‌--स्वरूपसिद्ध; मोचये--मैं पाशमुक्त करूँगा; ग्रस्तम्‌--कसा हुआ; आत्मानम्‌--मेरी आत्मा; योषित्‌-मय्या--स्त्री रूप में; आत्म-मायया-- भगवान्‌ की मोहिनी शक्ति से; विक्रीडित:--खिलवाड़ करता;यया--जिससे; एव--निश्चय; अहम्‌--मैं; क्रीडा-मृग:--वशीभूत पशु; इब--सहृश; अधम:--इतना पतित

शरीर से अपनी पहचान बनाने के कारण मनुष्य इन्द्रियतृप्ति के लिए इच्छाओं के अधीनहोता है और इस तरह वह अपने को अनेक प्रकार के पवित्र तथा अपवित्र कार्यो में लगाताहै।

यही भौतिक बन्धन है।

अब मैं अपने आपको उस भौतिक बन्धन से छुड़ाऊँगा जो स्त्री केरूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की मोहिनी शक्ति द्वारा उत्पन्न किया गया है।

सर्वाधिकपतितात्मा होने से मैं माया का शिकार बना और उस नाचने वाले कुत्ते के समान बन गयाजो स्त्री के हाथ के इशारे पर चलता है।

अब मैं सारी कामेच्छाओं को त्याग दूँगा और इसमोह से अपने को मुक्त कर लूँगा।

मैं दयालु एवं समस्त जीवों का शुभेषी मित्र बनूंगा तथाकृष्णभावनामृत में अपने को सदैव लीन रखूँगा।

ममाहमिति देहादौ हित्वामिथ्यार्थधीर्मतिम्‌ ।

धास्ये मनो भगवति शुद्ध तत्कीर्तनादिभि: ॥

३८॥

मम--मेरा; अहमू--मैं; इति--इस प्रकार; देह-आदौ--शरीर तथा उससे सम्बद्ध वस्तुओं में; हित्वा--त्यागकर;अमिथ्या--मिथ्या नहीं; अर्थ--मूल्यों पर; धी:--अपनी चेतना से; मतिम्‌--प्रवृत्ति को; धास्ये--लगाऊँगा; मन:--मेरामन; भगवति--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ में; शुद्धमू-शुद्ध; तत्‌ू--उनका नाम; कीर्तन-आदिभि:--कीर्तन , श्रवण इत्यादिके द्वारा

चूँकि मैंने भक्तों की संगति में भगवान्‌ के पवित्र नाम का केवल कीर्तन किया है,इसलिए मेरा हृदय अब शुद्ध बन रहा है।

इसलिए मैं अब पुनः भौतिक इन्द्रियतृष्ति के झूठेआकर्षणों का शिकार नहीं बनूँगा।

चूँकि अब मैं परम सत्य में स्थित हो चुका हूँ, अतः अबउसके बाद मैं शरीर के साथ अपनी पहचान नहीं करूँगा।

'मैं' तथा 'मेरा ' के मिथ्याविचारों को त्यागकर मैं अपने मन को कृष्ण के चरणकमलों में स्थिर करूँगा।

इति जातसुनिर्वेद: क्षणसड्रेन साधुषु ।

गड़्ाद्वारमुपेयाय मुक्तसर्वानुबन्धन: ॥

३९॥

इति--इस प्रकार; जात-सुनिर्वेद: --( अजामिल ) जो भौतिक देहात्मबुद्धि से विरक्त हो चुका था; क्षण-सट्डेन-- क्षण भरकी संगति से; साधुषु--भक्तों की; गड़्ा-द्वारम्‌--हरद्वार ( हरिद्वार )।

उपेयाय--गया; मुक्त--मुक्त होकर; सर्व-अनुबन्धन:--सभी प्रकार के भौतिक बन्धनों सेभक्तों ( विष्णुदूतों ) की क्षण-भर की संगति के कारण अजामिल ने अपने मन कोसंकल्पपूर्वक भौतिक देहात्मबुद्धि से विलग कर लिया।

इस तरह समस्त भौतिक आकर्षणसे मुक्त हुआ वह तुरन्त हरद्वार के लिए चल पड़ा।

स तस्मिन्देवसदन आसीनो योगमास्थित: ।

प्रत्याहतेन्द्रियग्रामो युयोज मन आत्मनि ॥

४०॥

सः--उसने ( अजामिल ने ); तस्मिन्‌ू--उस स्थान ( हरद्वार ) में; देव-सदने--एक विष्णु मन्दिर में; आसीन: --स्थित होकर;योगम्‌ आस्थित:--भक्तियोग सम्पन्न किया; प्रत्याहत--इन्द्रिय तृप्ति के समस्त कार्यों से विलग; इन्द्रिय-ग्राम:--अपनीइन्द्रियाँ; युयोज--स्थिर किया; मन:--मन; आत्मनि--आत्मा, परमात्मा या पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ पर।

हरद्वार में अजामिल ने एक विष्णुमन्दिर में शरण ली जहाँ उसने भक्तियोग की विधि कोसम्पन्न किया।

उसने अपनी इन्द्रियों को वश में किया और अपने मन को पूरी तरह सेभगवान्‌ की सेवा में लगा दिया।

ततो गुणेभ्य आत्मानं वियुज्यात्मसमाधिना ।

युयुजे भगवद्धाम्नि ब्रह्मण्यनुभवात्मनि ॥

४१॥

ततः--तत्पश्चात्‌; गुणेभ्य: --प्रकृति के गुणों से; आत्मानम्‌--मन को; वियुज्य--विलग करके; आत्म-समाधिना-- भक्तिमें पूरी तरह; युयुजे--लगा दिया; भगवत्‌ू-धाम्नि-- भगवान्‌ के रूप में; ब्रह्मणि--जो परब्रह्म है ( मूर्ति पूजा नहीं );अनुभव-आत्मनि--जिसके विषय में सदैव सोचा जाता है ( चरणकमलों से शुरू करके धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़तेहुए)

अजामिल पूरी तरह से भक्ति में लग गया।

इस तरह उसने इन्द्रियतृप्ति से अपने मन कोविलग कर लिया और वह भगवान्‌ के स्वरूप का चिन्तन करने में पूरी तरह लीन हो गया।

यह[पारतधीस्तस्मित्रद्राक्षीत्पुरुषान्पुर: ।

उपलभ्योपलब्धाय्प्राग्ववन्दे शिरसा द्विज: ॥

४२॥

यहि--जब; उपारत-धी:--उसका मन तथा बुद्द्धि स्थिर थे; तस्मिनू--उस समय; अद्राक्षीत्‌-देखा था; पुरुषान्‌ू--पुरुषोंको ( विष्णुदूतों को ); पुरः--अपने समक्ष; उपलभ्य--पाकर; उपलब्धानू--जो पहले मिल चुके थे; प्राकु--पहले;ववन्दे--नमस्कार किया; शिरसा--सिर के बल; द्विज:--ब्राह्मण ने।

जब ब्राह्मण अजामिल की बुद्धि तथा मन भगवान्‌ के स्वरूप पर स्थिर हो गये तो उसनेपुनः उन चार दिव्य पुरुषों को अपने समक्ष देखा।

वह समझ गया कि ये वही हैं, जिन्हें वह पहले देख चुका है, अतः उनके समक्ष उसने नतमस्तक होकर नमस्कार किया।

हित्वा कलेवरं तीर्थ गड़ायां दर्शनादनु ।

सद्यः स्वरूपं जगृहे भगवत्पाश्श्ववर्तिनामू ॥

४३॥

हित्वा--त्यागकर; कलेवरम्‌-- भौतिक शरीर; तीर्थे--तीर्थस्थान में; गड्जायाम्‌ू--गंगानदी के तट पर; दर्शनात्‌ अनु--दर्शनकरने के बाद; सद्यः--तुरन्त; स्व-रूपम्-- अपना आदि आध्यात्मिक रूप; जगृहे-- धारण कर लिया; भगवत्‌-पार्श्व-वर्तिनामू--जो भगवान्‌ के पार्षद के लिए उपयुक्त है

विष्णुदूतों का दर्शन करने के बाद अजामिल ने गंगानदी के तट पर हरद्वार में अपनाभौतिक शरीर त्याग दिया।

उसे अपना आदि आध्यात्मिक शरीर पुनः मिल गया जो भगवान्‌के पार्षद के लिए उपयुक्त था।

जे जलसाकं विहायसा विप्रो महापुरुषकिड्जरै: ।

हैमं विमानमारुह्म ययौ यत्र भ्रिय: पति: ॥

४४॥

साकम्‌--साथ; विहायसा--आकाश मार्ग द्वारा; विप्र: --ब्राह्मण ( अजामिल ); महापुरुष-किड्जरैः--विष्णुदूतों के साथ;हैमम्‌--सोने का बना; विमानम्‌--विमान में; आरुह्म--सवार होकर; ययौ--गया; यत्र--जहाँ; थ्रियः पति:--लक्ष्मी-पतिविष्णु।

भगवान्‌ विष्णु के दूतों के साथ अजामिल सोने के बने हुए विमान पर सवार हुआ।

वहआकाश मार्ग से जाते हुए सीधे लक्ष्मीपति भगवान्‌ विष्णु के धाम गया।

एवं स विप्लावितसर्व धर्मादास्या: पतिः पतितो गह्ाकर्मणा ।

निपात्यमानो निरये हतक्रतःसद्यो विमुक्तो भगवन्नाम गृहन्‌ ॥

४५॥

एवम्‌--इस तरह से; सः--वह ( अजामिल ); विप्लावित-सर्व-धर्मा:--जिसने सारे धर्मों को त्याग दिया था; दास्याः'पति:--वेश्या का पति; पतित:--पतित; ग्ह-कर्मणा--गर्हित कामों में लगे रहने से; निपात्यमान:--गिरते हुए; निरये--नरक में; हत-ब्रतः--जिसने अपने सारे ब्रतों को तोड़ रखा था; सद्यः--तुरन्त; विमुक्त:--मुक्त; भगवत्‌-नाम--भगवान्‌का पवित्र नाम; गृहन्‌ू--कीर्तन करते हुए

अजामिल ब्राह्मण था जिसने कुसंगति के कारण सारी ब्राह्मण-संस्कृति तथा धार्मिकनियमों को त्याग दिया था।

सर्वाधिक पतित होने से वह चोरी करता, शराब पीता तथा अन्यगहित कार्य करता था।

उसने एक वेश्या भी रख ली थी।

इस तरह उसका यमराज के दूतोंद्वारा नरक ले जाया जाना सुनिश्चित था, किन्तु नारायण के पवित्र नाम का लेश मात्रउच्चारण करने से ही तुरन्त उसे बचा लिया गया।

नातः परं कर्मनिबन्धकृन्तनंमुमुक्षतां तीर्थपदानुकीर्तनात्‌ ।

न यत्पुनः कर्मसु सज्जते मनोरजस्तमोभ्यां कलिलं ततोउन्यथा ॥

४६॥

न--नहीं; अत:ः--इसलिए; परम्‌-- श्रेष्ठठर साधन; कर्म-निबन्ध--सकाम कर्मों के फलस्वरूप कष्ट भोगने की बाध्यता;कृन्तनम्‌--जो पूरी तरह छिन्न कर दे; मुमुक्षताम्‌-- भव-बन्धन के पाश से बाहर निकलने की इच्छा रखने वाले पुरुषों का;तीर्थ-पद--पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के विषय में, जिनके पाँवों पर सारे तीर्थस्थान स्थित हैं; अनुकीर्तनात्‌-- प्रामाणिक गुरुके निर्देशानुसार कीर्तन करने की अपेक्षा; न--नहीं; यत्‌--क्योंकि; पुन:--फिर; कर्मसु--सकाम कर्मों में; सजते--लिप्तहोता है; मनः--मन; रज:-तमोभ्याम्‌--रजो तथा तमो गुणों द्वारा; कलिलम्‌-दूषित; तत:--तत्पश्चात्‌; अन्यथा--किसीअन्य साधन से

अतः जो व्यक्ति भवबन्धन से मुक्त होना चाहता है, उसे चाहिए कि उन पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ के नाम, यश, रूप तथा लीलाओं के कीर्तन तथा गुणगान की विधि को अपनाए,जिनके चरणों पर सारे तीर्थस्थान स्थित हैं।

अन्य साधनों से, यथा पवित्र पश्चात्ताप, ज्ञान,यौगिक ध्यान से उसे उचित लाभ प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी विधियों का पालनकरने पर भी मनुष्य अपने मन को वश में न कर सकने के कारण पुनः सकाम कर्म करनेलगता है, क्योंकि मन प्रकृति के निम्न गुणों से--यथा रजो तथा तमो गुणों से--संदूषितरहता है।

य एत॑ परम गुह्ामितिहासमघापहम्‌ ।

श्रृणुयाच्छुद्धया युक्तो यश्व भक्त्यानुकीर्तयेत्‌ ॥

४७॥

न वै स नरक याति नेक्षितो यमकिड्जरै: ।

यद्यप्यमड़लो मर्त्यों विष्णुलोके महीयते ॥

४८ ॥

यः--जो कोई; एतम्‌--इस; परमम्‌-- अत्यन्त; गुह्मम्‌ू--गोपनीय; इतिहासम्‌--ऐतिहासिक कथा को; अघ-अपहम्‌--पापोंके सारे फलों से मुक्त करने वाली; श्रुणुयात्‌-सुनता है; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; युक्त: --से युक्त; यः:--जो; च-- भी;भकत्या--महती भक्ति से; अनुकीर्तयेत्‌--दुहराता है; न--नहीं; बै--निस्सन्देह; स:ः--ऐसा व्यक्ति; नरकम्‌ू--नरक को;याति--जाता है; न--नहीं ; ईक्षितः --देखा जाता है; यम-किड्जरैः--यमराज के दूतों द्वारा; यदि अपि--यद्यपि;अमड्गल:--अशुभ; मर्त्य:--भौतिक शरीर में; विष्णु-लोके--वैकुण्ठलोक में; महीयते--सादर स्वागत किया जाता हैच

ूँकि इस अतिगोपनीय ऐतिहासिक कथा में सारे पापफलों को नष्ट करने की शक्ति है,अतः जो भी इसे श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक सुनता है या सुनाता है, वह नरकभागी नहीं होता,चाहे उसे भौतिक शरीर मिला हो और चाहे वह कितना ही पापी क्‍यों न रहा हो।

दरअसल,यमराज के आदेशों का पालन करने वाले यमदूत उसे आँख उठाकर देखने के लिए भीउसके पास नहीं जाते।

अपना शरीर त्यागने के बाद वह भगवद्धाम लौट जाता है जहाँ उसकासादर स्वागत किया जाता है और पूजा की जाती है।

प्रियमाणो हरे्नाम गृणन्पुत्रोपचारितम्‌ ।

अजामिलोप्यगाद्धाम किमुत श्रद्धया गृणन्‌ ॥

४९॥

प्रियमाण: --मृत्यु के समय; हरे: नाम--हरि का पवित्र नाम; गृणन्‌--उच्चारण करते हुए; पुत्र-उपचारितम्‌-- अपने पुत्र कीओर इशारा करते; अजामिल: --अजामिल; अपि--तक; अगात्‌--गया; धाम--आध्यात्मिक जगत; किम्‌ उत--क्या कहाजा सकता है; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक ; गृणन्‌--उच्चारण करते हुए

अजामिल ने मृत्यु के समय कष्ट भोगते हुए भगवान्‌ के पवित्र नाम का उच्चारण कियाऔर यद्यपि उसका यह उच्चारण उसके पुत्र की ओर लक्षित था फिर भी वह भगवद्धामवापस गया।

इसलिए यदि कोई श्रद्धापूर्वक तथा निरपराध भाव से भगवन्नाम का उच्चारणकरता है, तो वह भगवान्‌ के पास लौटेगा इसमें सन्देह कहाँ है ?

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