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अध्याय नौ: प्रह्लाद ने प्रार्थनाओं से भगवान नृसिंहदेव को शांत किया

7.9श्रीनारद उवाचएवं सुरादयः सर्वे ब्रह्मरुद्रपुरः सरा: ।

नोपैतुमशकन्मन्युसंरम्भं सुदुरासदम्‌ ॥

१॥

श्री-नारद उबाच--नारद मुनि ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; सुर-आदय: --देवताओं का समूह; सर्वे--सारे; ब्रह्म-रुद्र-पुरःसराः--ब्रह्मा तथा शिव द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाकर; न--नहीं; उपैतुम्‌-- भगवान्‌ के समक्ष जाने के लिए; अशकनू--समर्थ ;मन्यु-संरम्भम्‌--अत्यन्त क्ुद्ध होकर; सु-दुरासदम्‌--जिन तक पहुँच पाना दुष्कर है ( नूसिंहदेव ), उन्हें |

नारद मुनि ने आगे कहा : ब्रह्मा, शिव इत्यादि अन्य बड़े-बड़े देवताओं का साहस न हुआकि वे भगवान्‌ के समक्ष जायूँ, क्योंकि उस समय वे अत्यन्त कुद्ध थे।

"

साक्षाल्श्री: प्रेषिता देवै्ईट्टा तं महदद्भुतम्‌ ।

अददष्टा श्रुतपूर्वत्वात्सा नोपेयाय शड्धिता ॥

२॥

साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; श्री:--लक्ष्मी जी; प्रेषिता-- भगवान्‌ के समक्ष जाने के लिए प्रार्थना की गईं; देवै:--सारे देवताओं ( ब्रह्मा,शिव इत्यादि ) द्वारा; दृघ्ला--देखकर; तम्‌--उस ( नृसिंहदेव ) को; महत्‌--अत्यन्त विशाल; अद्भुतम्‌-- अद्भुत; अदृष्ट--कभी नदेखा गया; अश्रुत--कभी न सुना गया; पूर्वत्वातू--कभी पहले; सा--वह लक्ष्मी; न--नहीं; उपेयाय-- भगवान्‌ के समक्ष गई;शद्;िता--अत्यधिक भयभीत

वहाँ पर उपस्थित भयभीत सारे देवताओं ने लक्ष्मी जी से प्रार्थना की कि वे भगवान्‌ केसमक्ष जाएँ।

किन्तु उन्होंने भी भगवान्‌ का ऐसा अद्भुत तथा असामान्य रूप कभी नहीं देखा था,अतएव वे उनके पास नहीं जा सकीं।

"

प्रह्मादं प्रेषयामास ब्रह्मावस्थितमन्तिके ।

तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम्‌ ॥

३॥

प्रह्दादम्‌ू--प्रह्माद महाराज से; प्रेषयाम्‌ आस-- अनुरोध किया; ब्रह्मा--ब्रह्माजी ने; अवस्थितम्‌--स्थित; अन्तिके -- अत्यन्तनिकट; तात--मेरे प्रिय पुत्र; प्रशमय--शान्त कराने का प्रयास करो; उपेहि--पास जाओ; स्व-पित्रे--तुम्हारे पिता के आसुरीकार्यों के कारण; कुपितम्‌--अत्यधिक क्ुद्ध; प्रभुमू-- भगवान्‌ को |

तत्पश्चात्‌ ब्रह्मजी ने अपने पास ही खड़े प्रह्मद महाराज से अनुरोध किया-हे पुत्र, भगवान्‌नृसिंहदेव तुम्हारे आसुरी पिता पर अत्यधिक क्रुद्ध हैं।

अतएव तुम आगे जाकर भगवान्‌ को शान्तकरो।

"

तथेति शनकै राजन्महाभागवतो<रभक: ।

उपेत्य भुवि कायेन ननाम विधृताझ्जललि: ॥

४॥

तथा--ऐसा ही हो; इति--इस प्रकार ब्रह्माजी के वचनों को मानकर; शनकै:-- धीरे-धीरे; राजन्‌ू--हे राजा ( युधिष्ठिर ); महा-भागवतः--अत्यन्त महान्‌ भक्त ( प्रह्मद महाराज ); अर्भक:ः--यद्यपि छोटे बालक ही थे; उपेत्य-- धीरे-धीरे निकट जाकर;भुवि--पृथ्वी पर; कायेन--अपने शरीर से; ननाम-- प्रणाम किया; विधृत-अज्जञलि:--हाथ जोड़े हुए।

नारद मुनि ने आगे कहा : हे राजा, यद्यपि महान्‌ भक्त प्रह्मद महाराज केवल छोटे से बालकथे, लेकिन उन्होंने ब्रह्माजी की बातें मान लीं।

वे धीरे-धीरे भगवान्‌ नूसिंहदेव की ओर बढ़े औरहाथ जोड़कर पृथ्वी पर गिर कर उन्हें सादर नमस्कार किया।

"

स्वपादमूले पतितं तमर्भक॑विलोक्य देव: कृपया परिप्लुतः ।

उत्थाप्य तच्छीष्णर्यदधात्कराम्बुजंकालाहिवित्रस्तधियां कृताभयम्‌ ॥

५॥

स्व-पाद-मूले--अपने चरणकमलों पर; पतितम्‌--गिरा हुआ; तम्‌--उस ( प्रहाद महाराज ); अर्भकम्‌--छोटे से बालक को;विलोक्य--देखकर; देव:--नृसिंहदेव ने; कृपया--अपनी अहैतुकी कृपा से; परिप्लुत:-- भावविभोर होकर; उत्थाप्य--उठाकर; तत्‌-शीर्ष्णि--उसके सिर पर; अदधात्‌--रख दिया; कर-अम्बुजमू--अपना कर कमल; काल-अहि--काल रूपी सर्प का(जो तुरन्त ही मार सकता है ); वित्रस्त--डरा हुआ; धियाम्‌--उन सबों के जिनके मन; कृत-अभयम्‌--निर्भय बनाता है।

जब नृसिंहेदव ने देखा कि छोटे से बालक प्रह्मद महाराज ने चरमकमलों पर साष्टांग प्रणामकिया है, तो वे अपने भक्त के प्रति अत्यधिक भाव-विभोर हो उठे।

प्रह्मद को उठाते हुए उन्होंनेअपना कर-कमल उस बालक के सिर पर रख दिया।

उनका हाथ उनके समस्त भक्तों कोअभय-दान करने वाला है।

"

स तत्करस्पर्शधुताखिलाशुभ:सपद्यभिव्यक्तपरात्मदर्शन: ।

तत्पादपद्दां हृदि निर्वृतों दधौहष्यत्तनु: क्लिन्नहदश्रुलोचन: ॥

६॥

सः--वह ( प्रह्नद महाराज ); तत्‌-कर-स्पर्श--नूसिंहदेव के कर कमल द्वारा स्पर्श किये जाने पर; धुत--पवित्र होकर;अखिल--सम्पूर्ण; अशुभ:--अशुभ या भौतिक इच्छाएँ; सपदि--तुरन्त; अभिव्यक्त--प्रकट; पर-आत्म-दर्शन:--परमात्मा कासाक्षात्कार; तत्‌-पाद-पद्मम्‌--नृसिंहदेव के चरणकमल को; हृदि--हृदय में; निर्वृत:--दिव्य आनन्द से पूरित; दधौ--बन्दी बनालिया; हृष्यत्‌-तनुः--शरीर में दिव्य आनन्द का प्रकट्य; क्लिन्न-हत्‌--दिव्य आनन्द के कारण मृदु हुए हृदय वाला; अश्रु-लोचन:--अपनी आँखों में आँसू भर कर।

भगवान्‌ नृसिंहदेव द्वारा प्रह्दाद महाराज का सिर स्पर्श करने से प्रह्द के समस्त भौतिककल्मष तथा इच्छाएँ पूर्णतया धुल गईं।

अतएव वे दिव्य पद को प्राप्त हो गये और उनके शरीर मेंआनन्द के सारे लक्षण प्रकट हो गए।

उनका हृदय प्रेम से पूरित हो उठा, उनकी आँखों में आँसूआ गये और उन्होंने अपने हृदय में भगवान्‌ के चरणकमलों को बन्दी बना लिया।

"

अस्तौषीद्धरिमेकाग्रमनसा सुसमाहितः ।

प्रेमगद्गदया वाचा तन्न्यस्तहदयेक्षण: ॥

७॥

अस्तौषीतू--वह प्रार्थना करने लगा; हरिम्‌-- भगवान्‌ की; एकाग्र-मनसा-- भगवान्‌ के चरणकमलों पर अपने मन को स्थिरकरके; सु-समाहित:--अ त्यन्त मनोयोग से; प्रेम-गद्गदया--दिव्य आनन्द की अनुभूति के कारण बोल सकने में असमर्थ;वाचा--वाणी से; तत्‌-न्यस्त--उन ( नृसिंहदेव ) पर पूर्णतया समर्पित; हृदय-ईक्षण: --हृदय तथा दृष्टि सहित |

प्रह्मद महाराज ने पूर्ण समाधि में पूरे मनोयोग से अपने मन तथा दृष्टि को भगवान्‌ नृसिंहदेवपर स्थिर कर दिया।

तब वे स्थिर मन से अवरुद्ध वाणी से प्रेमपूर्वक प्रार्थना करने लगे।

"

श्रीप्रह्दाद उवाचब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोथ सिद्धाःसत्वैकतानगतयो वचसां प्रवाहैः ।

नाराधितु पुरुगुणैरधुनापि पिप्रु:कि तोष्ट्महति स मे हरिरुग्रजाते: ॥

८॥

श्री-प्रह्माद: उवाच--प्रह्माद महाराज ने प्रार्थना की; ब्रह्मय-आदय:--ब्रह्माजी तथा अन्यों ने; सुर-गणा:--उच्च लोक के निवासी;मुनयः--परम साधु व्यक्ति; अथ-- भी ( यथा चारों कुमार इत्यादि ); सिद्धा:--जिन्‍्होंने सिद्धि या पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है;सत्त्व--आध्यात्मिक स्थिति के लिए; एकतान-गतय: --जिन्होंने बिना विचलन के किसी भी भौतिक कार्यकलाप को ग्रहण करलिया है; वचसाम्‌--वृत्तान्तों या बचनों का; प्रवाहैः--धाराओं के द्वारा; न--नहीं; आराधितुम्‌--प्रसन्न करने के लिए; पुरु-गुणैः --यद्यपि पूर्णतया योग्य; अधुना--अब तक; अपि--भी; पिप्रु:--समर्थ थे; किम्‌--क्या; तोष्टमू--प्रसन्न करने के लिए;अहति--समर्थ है; सः--वह ( भगवान्‌ ); मे--मेरा; हरिः-- भगवान्‌; उग्र-जाते:--असुर परिवार में जन्मा।

प्रह्नद महाराज ने प्रार्थना की: असुर परिवार में जन्म लेने के कारण यह कैसे सम्भव होसकता है कि मैं भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिए उपयुक्त प्रार्थना कर सकूँ ?

आज तक ब्रह्माइत्यादि सारे देवता तथा समस्त मुनिगण उत्तमोत्तम वाणी से भगवान्‌ को प्रसन्न नहीं कर पाये, यद्यपि ये सारे व्यक्ति सतोगुणी एवं परम योग्य हैं, तो फिर मेरे विषय में क्या कहा जाये ?

मैं तोबिल्कुल ही अयोग्य हूँ।

"

मन्ये धनाभिजनरूपतप: श्रुतौज-स्तेज:प्रभावबलपौरुषबुद्धियोगा: ।

नाराधनाय हि भवन्ति परस्य पुंसोभकत्या तुतोष भगवान्गजयूथपाय ॥

९॥

मन्ये--मैं मानता हूँ; धन--सम्पत्ति; अभिजन--राजसी परिवार; रूप--सुन्दरता; तप:ः--तपस्या; श्रुत--वेदाध्ययन से प्राप्तज्ञान; ओज:--इन्द्रिय पराक्रम; तेज:--शारीरिक तेज; प्रभाव--प्रभाव; बल--शारीरिक शक्ति; पौरुष--उद्यम; बुद्धि--बुद्धि;योगाः--योग शक्ति; न--नहीं; आराधनाय--प्रसन्न करने के लिए; हि--निस्सन्देह; भवन्ति--हैं; परस्य--दिव्य का; पुंसः--भगवान्‌; भक्त्या--केवल भक्ति से; तुतोष--तुष्ट हो गया था; भगवान्‌-- भगवान्‌; गज-यूथ-पाय--हाथियों के राजा ( गजेन्द्र )के हेतु

प्रह्माद महाराज ने आगे कहा : भले ही मनुष्य के पास सम्पत्ति, राजसी परिवार, सौन्दर्य,तपस्या, शिक्षा, दक्षता, कान्ति, प्रभाव, शारीरिक शक्ति, उद्यम, बुद्ध्धि तथा योगशक्ति क्‍यों न हो,किन्तु मेरी समझ से इन सारी योग्यताओं से भी कोई व्यक्ति भगवान्‌ को प्रसन्न नहीं कर सकता।

किन्तु भक्ति से वह ऐसा कर सकता है।

गजेन्द्र ने ऐसा किया और इस तरह भगवान्‌ उससे प्रसन्नहो गये।

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विप्राद्‌ द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-पादारविन्दविमुखात्श्वपचं वरिष्ठम्‌ ।

मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थ-प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमान: ॥

१०॥

विप्रात्‌-ब्राह्मण की अपेक्षा; द्वि-षट्‌ू-गुण-युतात्‌--बारह ब्राह्मण गुणों से सम्पन्न *; अरविन्द-नाभ--भगवान्‌, विष्णु, जिनकीनाभि से कमल निकला है; पाद-अरविन्द--चरणकमलों की; विमुखात्‌--भक्ति से विमुख; श्र-पचम्‌--निम्नकुल में जन्मे याचाण्डाल को; वरिष्ठम्‌--अत्यन्त यशस्वी; मन्ये--मानता हूँ; तत्‌-अर्पित-- भगवान्‌ के चरणकमलों में शरणागत; मन:--अपनामन; वचन--शब्द; ईहित--प्रत्येक प्रयास; अर्थ--सम्पत्ति; प्राणम्‌ू--तथा जीवन; पुनाति--शुद्ध करता है; सः--वह ( भक्त );कुलम्‌--अपने परिवार को; न--नहीं; तु--लेकिन; भूरिमान:--जो झूठे ही अपने को प्रतिष्ठित पद पर सोचते हैं।

पूर्ण ब्राह्मण के बारह गुण इस प्रकार हैं--धर्म पालन, सत्य भाषण, तपस्या द्वारा इन्द्रिय निग्रह, ईर्ष्या सेरहित होना, बुद्धिमान होना, सहिष्णु होना, शत्रु न बनाना, यज्ञ करना, दान देना, स्थिर रहना, वेदाध्ययन मेंपारंगत होना तथा ब्रत पालना।

शात॑ तल,यदि किसी ब्राह्मण में बारहों योग्यताएँ ( सनत्युजात ग्रन्थ में उल्लिखित ) हों किन्तु यदि वहभक्त नहीं है और भगवान्‌ के चरणकमलों से विमुख है, तो वह उस चाण्डाल भक्त से भी अधमहोता है, जिसने अपना सर्वस्व मन, वचन, कर्म, सम्पत्ति तथा जीवन भगवान्‌ को अर्पित करदिया है।

ऐसा भक्त उस ब्राह्मण से श्रेष्ठ है, क्योंकि भक्त अपने सारे परिवार को पवित्र करसकता है जब कि झूठी प्रतिष्ठा वाला तथाकथित ब्राह्मण अपने आप को आप भी शुद्ध नहीं करपाता।

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नैवात्मनः प्रभुरयं निजलाभपूर्णोमानं जनादविदुष: करुणो वृणीते ।

यद्यज्जनो भगवते विदधीत मानतच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखशभ्री: ॥

११॥

न--न तो; एव--निश्चय ही; आत्मन:--अपने निजी लाभ के लिए; प्रभुः--स्वामी; अयम्‌--यह; निज-लाभ-पूर्ण: --जो सदैवअपने में तुष्ट रहता है ( अन्यों की सेवाओं द्वारा प्रसन्न किये जाने की उसे कोई आवश्यकता नहीं रहती ); मानमू--आदर;जनातू--व्यक्ति से; अविदुष:--जो यह नहीं जानता कि जीवन का लक्ष्य भगवान्‌ को प्रसन्न करना है; करूण:--( भगवान्‌ ) जोइस मूर्ख अज्ञानी व्यक्ति पर इतना दयालु है; वृणीते--स्वीकार करता है; यत्‌ यत्‌--जो भी; जन:--व्यक्ति; भगवते-- भगवान्‌पर; विदधीत--अर्पित करे; मानम्‌--पूजा; तत्‌--वह; च--निस्सन्देह; आत्मने--अपने लाभ के लिए; प्रति-मुखस्य--दर्पण मेंमुख के प्रतिबिम्ब का; यथा--जिस तरह; मुख-श्री:--मुँह का सौन्दर्य ॥

भगवान्‌ सदैव आत्मतुष्ट रहने वाले हैं, अतएव जब उन्हें कोई भेंट अर्पित की जाती है, तोभगवत्कृपा से यह भेंट भक्त के लाभ के लिए ही होती है, क्योंकि भगवान्‌ को किसी की सेवाकी आवश्यकता नहीं है।

उदाहरणार्थ, यदि किसी का मुख सज्जित हो तो दर्पण में उसके मुखका प्रतिबिम्ब भी सज्जित दिखता है।

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तस्मादहं विगतविक्लव ईश्वरस्यसर्वात्मना महि गृणामि यथा मनीषम्‌ ।

नीचोजया गुणविसर्गमनुप्रविष्ट:पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन ॥

१२॥

तस्मात्‌ू--अतएव; अहम्‌--मैं; विगत-विक्लव:--अयोग्य होने का चिन्तन छोड़कर; ईश्वरस्थ--ई श्रर का; सर्व-आत्मना--पूर्णशरणागत होकर; महि--यश; गृणामि-- कीर्तन या वर्णन करूँगा; यथा मनीषम्‌-- अपनी बुद्धि के अनुसार; नीच:--यद्यपिनिम्न कुल ( मेरे पिता असुर रहे और समस्त सद्‌गुणों से विहीन ) में उत्पन्न; अजया--अज्ञान के कारण; गुण-विसर्गम्‌ू-- भौतिकजगत ( जिसमें जीव गुणों के कल्मष के अनुसार जन्म लेता है ); अनुप्रविष्ट:--के भीतर प्रविष्ट; पूयेत--शुद्ध हो; येन--जिससे( भगवान्‌ के यश से ); हि--निस्सन्देह; पुमान्‌ू--मनुष्य; अनुवर्णितेन--कीर्तन किये जाने या पाठ किये जाने पर।

अतएव यद्यपि मैंने असुरकुल में जन्म लिया है, तो भी निस्सन्देह, जहाँ तक मेरी बुद्धि जातीहै मैं पूरे प्रयास से भगवान्‌ की प्रार्थना करूंगा।

जो भी व्यक्ति अज्ञान के कारण इस भौतिकजगत में प्रविष्ट होने को बाध्य हुआ है, वह भौतिक जीवन को पवित्र बना सकता है यदि वहभगवान्‌ की प्रार्थना करे और उनके यश का श्रवण करे।

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सर्वे हामी विधिकरास्तव सत्त्वधाम्नोब्रह्मादयो वयमिवेश न चोद्विजन्त: ।

क्षेमाय भूतय उतात्मसुखाय चास्यविक्रीडितं भगवतो रुचिरावतारैः ॥

१३॥

सर्वे--सभी; हि--निश्चय; अमी--ये; विधि-करा:--आदेश पालनकर्ता; तव--तुम्हारे; सत्त्व-धाम्न:--सदैव दिव्य जगत मेंस्थित रहकर; ब्रह्य-आदय:--ब्रह्मा इत्यादि देवता; वयम्‌--हम; इब--समान; ईश--हे भगवान्‌; न--नहीं; च--तथा;उद्विजन्त:-- भयभीत ( आपके भयानक रूप से ); क्षेमाय--रक्षा के लिए; भूतये--वृद्धि के लिए; उत--कहा जाता है; आत्म-सुखाय--ऐसी लीलाओं से निजी तुष्टि के लिए; च-- भी; अस्य--इस ( भौतिक जगत ) का; विक्रीडितम्‌--प्रकट; भगवतः --आपके; रुचिर--अत्यन्त मनोहर; अवतारैः-- अवतार से।

हे भगवान, ब्रह्म आदि सारे देवता आपके निष्ठावान्‌ दास हैं, क्योंकि वे दिव्य पद पर स्थितहैं।

अतः वे हमारी ( प्रहाद तथा उनके असुर पिता हिरण्यकशिपु की ) तरह नहीं हैं।

इस भयानकरूप में आपका प्राकट्य स्वान्त:सुख के लिए आपकी लीला है।

ऐसा अवतार सदा ही ब्रह्माण्डकी रक्षा तथा सुधार ( अभ्युदय ) के लिए होता है।

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तद्यच्छ मन्युमसुरश्च हतस्त्वयाद्यमोदेत साधुरपि वृश्चिकसर्पहत्या ।

लोकाश्च निर्वृतिमिता: प्रतियन्ति सर्वेरूप॑ नूसिंह विभयाय जना: स्मरन्ति ॥

१४॥

तत्‌--अतएव; यच्छ--कृपया त्याग दें; मन्युमू-- अपना क्रोध; असुरः --मेरा पिता, महा असुर हिरण्यकशिपु; च-- भी; हतः--मारा गया; त्ववा--आपके द्वारा; अद्य--आज; मोदेत-प्रसन्न होते हैं; साधु: अपि--साधु पुरुष भी; वृश्चिक-सर्प-हत्या--साँपया बिच्छू मार कर; लोकाः--सारे लोक; च--निस्सन्देह; निर्वृतिमू-- आनन्द; इता:--प्राप्त किया है; प्रतियन्ति--प्रतीक्षा कररहे हैं ( आपके क्रोध शान्त होने की ); सर्वे--वे सभी; रूपमू--यह रूप; नूसिंह-- हे नूसिंहदेव; विभवाय--उनका भय दूर करनेके लिए; जना:--ब्रह्माण्ड के सारे लोग; स्मरन्ति--स्मरण करेंगे।

अतएव हे नृसिंहदेव भगवान्‌, आप अपना क्रोध अब त्याग दें, क्योंकि मेरा पिता महा असुरहिरण्यकशिपु मारा जा चुका है।

चूँकि साधु पुरुष भी साँप या बिच्छू के मारे जाने पर प्रसन्न होतेहैं, अतएव इस असुर की मृत्यु से सारे लोकों को परम सनन्‍्तोष हुआ है।

अब वे अपने सुख केप्रति आश्वस्त हैं और भय से मुक्त होने के लिए आपके इस कल्याणप्रद अवतार का सदैव स्मरणकरेंगे।

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नाहं बिभेम्यजित तेडतिभयानकास्य-जिह्ार्कनेत्रभ्रुकुटी रभसोग्रदंष्टात्‌ ।

आन्त्रसत्रजः क्षतजकेशरशड्डू 'कर्णा-ब्रिर्ठादभीतदिगिभादरिभिन्नखाग्रात्‌ ॥

१५॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं; बिभेमि-- भयभीत हूँ; अजित--हे अजेय, परम विजयी पुरुष; ते--तुम्हारा; अति--अत्यन्त; भयानक--भयावना; आस्य--मुख; जिह्ला--जीभ; अर्क-नेत्र--सूर्य की तरह चमकती आँखें; भ्रुकुटी--क्रुद्ध भौहें; रभस--प्रबल; उग्र-दंष्रात्‌ू-- भयावने दाँत; आन्त्र-सत्रज:--आँतों की माला पहने; क्षतज--रक्त से सने; केशर--गर्दन के बाल; शड्ढु -कर्णातू--बर्छेजैसे पैने कान; निर्हाद--गर्जना ( आपके द्वारा की गई ) से; भीत--डरा हुआ; दिगिभात्‌--जिससे बड़े-बड़े हाथी भी; अरि-भित्‌--शत्रु को फाड़ने वाला; नख-अग्रात्‌ू--अपने नाखून के अग्र भाग से |

हे अजित भगवान्‌, मैं न तो आपके भयानक मुख तथा जीभ से, न ही सूर्य के समानचमकीली आँखों से या टेढ़ी भौहों से भयभीत हूँ।

मैं आपके तेज नुकीले दाँतों से, आँतों कीमाला से, रक्त रंजित गर्दन के बालों से या बछे जैसे पैने कानों से भी नहीं डर रहा हूँ।

न ही मैंआपके सिंहनाद से भयभीत हूँ जिससे हाथी भाग कर दूर चले जाते हैं।

न मैं आपके नाखूनों सेभयभीत हूँ जो आपके शत्रु को मारने के निमित्त हैं।

"

अस्तोस्म्यहं कृपणवत्सल दुःसहोग्रसंसारचक्रकदनादग्रसतां प्रणीतः ।

बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेड्प्रिमूलंप्रीतोडपवर्गशरणं हृयसे कदा नु ॥

१६॥

त्रस्त:--डरा हुआ; अस्मि--हूँ; अहम्‌--मैं; कृपण-वत्सल--पतित आत्माओं पर अत्यन्त दयालु मेरे प्रभु; दुःसह-- असहनीय;उग्र-- भयानक; संसार-चक्र -- जन्म मृत्यु का चक्कर; कदनात्‌--ऐसी बुरी अवस्था से; ग्रसताम्‌--एक दूसरे को भक्षण करनेवाले बद्धजीवों में से; प्रणीत:--फेंका जाकर; बद्धः--बँधा हुआ; स्व-कर्मभि:--अपने कर्मों के द्वारा; उशत्तम-हहे दुर्जेय;ते--तुम्हारे; अड्धप्नि-मूलम्‌--चरण कमलों के तलवे; प्रीत:--( मुझपर ) प्रसन्न होकर; अपवर्ग-शरणम्‌--जो इस भयावहभौतिक संसार से मुक्ति के लिए शरण हैं; हृयसे--आप मुझे बुला लेंगे; कदा--कब; नु--निस्सन्देह

हे पतितों पर सदय, परम शक्तिशाली दुर्जेय प्रभु, मैं अपने कर्मों के कारण असुरों की संगतिमें आ पड़ा हूँ, अतएवं मैं इस संसार में अपनी जीवन दशा से अत्यधिक भयभीत हूँ।

वह क्षण कब होगा जब आप मुझे उन चरणकमलों की शरण में बुला लेंगे जो बद्ध जीवन से मोक्ष केचरम लक्ष्य हैं?

" अस्मात्प्रियाप्रियवियोगसंयोगजन्म-शोकाग्निना सकलयोनिषु दह्ममान: ।

दुःखौषधं तदपि दुःखमतद्द्धियाहंभूमन्भ्रमामि वद मे तव दास्ययोगम्‌ ॥

१७॥

यस्मात्‌ू--जिसके कारण ( इस संसार में अस्तित्व के कारण ); प्रिय--अच्छा लगने वाला; अप्रिय--न अच्छा लगने वाला;वियोग--विरह; संयोग--तथा मिलन के कारण; जन्म--जिसका जन्म; शोक-अग्निना--शोक की अग्नि से; सकल-योनिषु--किसी भी प्रकार के शरीर में; दह्ममान: --जल कर; दुःख-औषधम्‌--दुखी जीवन के लिए उपचार; तत्‌ू--वह;अपि-भी; दुःखम्‌--कष्ट; अ-तत्‌-धिया--शरीर को आत्मा मानकर; अहम्‌--मैं; भूमन्‌--हे महान; भ्रमामि--घूम रहा हूँ(जन्म मरण के चक्र में ); वद--कृपया उपदेश दें; मे--मुझको; तब--तुम्हारा; दास्य-योगम्‌--सेवा कार्य |

हे महान, हे परमेश्वर, प्रिय तथा अप्रिय परिस्थितियों के संयोग से तथा उनसे बिछुड़ने केकारण मनुष्य स्वर्ग या नरक लोकों में अत्यन्त शोचनीय स्थिति को प्राप्त होता है मानो संताप कीअग्नि में जल रहा हो।

यद्यपि इस दुखमय जीवन से निकलने की अनेक औषधियाँ हैं किन्तुभौतिक जगत में ये औषधियाँ दुखों से भी अधिक कष्टकारक हैं।

अतएव मैं सोच रहा हूँ किइसकी एकमात्र औषधि आपकी सेवा में संलग्न होना है।

कृपया मुझे ऐसी सेवा का उपदेश दें।

"

सोडहं प्रियस्थ सुहृदः परदेवतायालीलाकथास्तव नृसिंह विरिज्ञगीता: ।

अज्जस्तितर्म्यनुगृणन्गुणविप्रमुक्तोदुर्गाणि ते पदयुगालयहंससड़: ॥

१८॥

सः--वह; अहम्‌--मैं ( प्रहाद महाराज ); प्रियस्थ--अत्यन्त प्रिय की; सुहृदः--शुभचिन्तक; परदेवताया: -- भगवान्‌ का;लीला-कथा:--लीलाओं की कथाएँ; तव--तुम्हारी; नूसिंह--हे नूसिंहदेव; विरिज्ल-गीता:--शिष्य परम्परा से ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त;अज्ञ:--सरलता से; तितर्मि--पार कर लूँगा; अनुगृणन्‌--निरन्तर वर्णन करते हुए; गुण--प्रकृति के गुणों से; विप्रमुक्त:--विशेषतया अदूषित होने से; दुर्गाणि--जीवन की समस्त दुखमय परिस्थितियाँ; ते--तुम्हारे; पद-युग-आलय--चरणकमलों मेंलीन; हंस-सड्रः--हंसों अर्थात्‌ मुक्तात्माओं की संगति पाकर ( भौतिक गुणों से जिनका कोई सम्बन्ध नहीं है )

हे भगवान्‌ नृसिंहदेव, मुक्तात्माओं ( हंसों ) की संगति में आपकी दिव्य प्रेमाभक्ति में लगेरहकर मैं प्रकृति के तीन गुणों के स्पर्श से पूर्णतः कल्मषहीन हो सकूँगा और अपने अत्यन्त प्रियस्वामी आपकी महिमाओं का कीर्तन कर सकूँगा।

मैं ब्रह्मा तथा उनकी शिष्य परम्परा के पद-चिन्हों पर ठीक तरह से चलकर आपकी महिमाओं का कीर्तन करूँगा।

इस प्रकार मैं अज्ञान केसागर को निश्चय ही पार कर सकूँगा।

"

बालस्य नेह शरणं पितरौ नृसिंहनार्तस्य चागदमुदन्वति मज्जतो नौ: ।

तप्तस्य तत्प्रतिविधिर्य इहाझ्सेष्ट-स्तावद्विभो तनुभूतां त्वदुपेक्षितानाम्‌ू ॥

१९॥

बालस्य--छोटे बच्चों का; न--नहीं; इह--इस संसार में; शरणम्‌--शरण ( रक्षा ); पितरौ--पिता तथा माता; नूसिंह--नृसिंहदेव; न--न तो; आर्तस्य--किसी रोग से पीड़ित व्यक्ति का; च-- भी; अगदम्‌--दवा; उदन्‍्वति--सागर के जल में;मज्जतः--डूबते व्यक्ति की; नौ:--नाव; तप्तस्थ-- भौतिक दुख से पीड़ित व्यक्ति का; तत्‌ू-प्रतिविधि: --( जगत के दुखों कोरोकने के लिए खोजी गई ) शमन विधि; यः--जो; इह--इस संसार में; अज्लसा--अत्यन्त सरलता से; इष्ट:--स्वीकृत ( दवा केरूप में ); तावत्‌--उसी तरह; विभो--हे स्वामी; तनु-भूताम्‌-- भौतिक शरीर स्वीकार करने वाले जीवों का; त्वतू-उपेक्षितानामू--आपके द्वारा उपेक्षित तथा अस्वीकृत |

हे नृसिंहदेव, हे परमेश्वर, देहात्मबुद्धि के कारण आपके द्वारा उपेक्षित देहधारी जीव अपनेकल्याण के लिए कुछ भी नहीं कर पाते।

वे जो भी उपचार स्वीकार करते हैं, उन से यद्यपिकदाचित क्षणिक लाभ पहुँचता है, किन्तु वे स्थायी नहीं रह पाते।

उदाहरणार्थ, माता तथा पिताअपने बालक की रक्षा नहीं कर पाते, वैद्य तथा दवा रोगी का कष्ट दूर नहीं कर पाते तथा समुद्रमें कोई नाव डूबते हुए मनुष्य को नहीं बचा पाती।

"

यस्मिन्यतो यहिं येन च यस्य यस्माद्‌यस्मै यथा यदुत यस्त्वपर: परो वा ।

भाव: करोति विकरोति पृथक्स्वभावःसजञ्ञोदितस्तदखिलं भवत:ः स्वरूपम्‌ ॥

२०॥

यस्मिनू--जीवन की किसी भी दशा में; यत:--किसी कारण से; यहिं--किसी भी समय ( भूत, वर्तमान या भविष्य ) में; येन--किसी से; च-- भी; यस्य--किसी के विषय में; यस्मात्‌--किसी कारण से; यस्मै--किसी के प्रति ( स्थान, व्यक्ति या काल काविचार किये बिना ); यथा--जिस तरह; यत्‌--चाहे जो भी हो; उत--निश्चय ही; यः--जो; तु--लेकिन; अपर: --दूसरा;'परः--परम; वा--अथवा; भाव: -- प्राणी; करोति--करता है; विकरोति--बदलता है; पृथक्‌-भिन्न; स्वभाव: --प्रकृति( प्रकृति के विभिन्न गुणों ) के वशीभूत होकर; सञ्ञोदित:--प्रभावित होकर; तत्‌--वह; अखिलमू-- समस्त; भवतः--आपका;स्वरूपमू--आपकी विभिन्न शक्तियों से निस्सृत |

हे प्रभु, इस जगत में प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों--सतो, रजो तथा तमो गुणों के अधीनहै।

सर्वोच्च व्यक्ति ब्रह्माजी से लेकर एक श्षुद्र चींटी तक सारे प्राणी इन्हीं गुणों के वशीभूत होकर कार्य करते हैं।

अतएवं इस जगत में सारे व्यक्ति आपकी शक्ति के वशीभूत हैं।

वे जिसकारण से कर्म करते हैं, जिस स्थान में कर्म करते हैं, जिस काल में कर्म करते हैं, जिस पदार्थके कारण कर्म करते हैं, जिस जीवन-लक्ष्य को उन्होंने अन्तिम मान रखा है तथा इस लक्ष्य कोप्राप्त करने की जो विधि है--ये सभी आपकी शक्ति की अभिव्यक्ति के अतिरिक्त कुछ भी नहींहैं।

निस्सन्देह, शक्ति तथा शक्तिमान के अभिन्न होते हैं, वे सब आपकी ही अभिव्यक्तियाँ हैं।

"

माया मन: सृजति कर्ममयं बलीय:कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंस: ।

छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारंसंसारचक्रमज कोउतितरेत्त्वदन्य: ॥

२१॥

माया--भगवान्‌ की बहिरंगा शक्ति; मनः*--मन; सृजति--उत्पन्न करती है; कर्म-मयम्‌--हजारों इच्छाएँ उत्पन्न करके उसकेअनुसार कर्म करती हुई; बलीय:--अत्यन्त शक्तिशाली, दुर्जेय; कालेन--समय द्वारा; चोदित-गुण--जिनके तीनों गुण विश्लुब्धहोते हैं; अनुमतेन--कृपादृष्टि से अनुमति प्राप्त ( काल ); पुंसः-- भगवान्‌ कृष्ण के अंश विष्णु का; छन्दः-मयम्‌--वेदों केनिर्देशों से प्रभावित; यत्‌--जो; अजया--अज्ञान अंधकार के कारण; अर्पित--चढ़ाया गया; षोडश--सोलह; अरम्‌--तीलियाँ;संसार-चक्रम्‌--विभिन्न योनियों में बारम्बार जन्म-मृत्यु का चक्र ( पहिया ); अज--हे अजन्मा; कः--ऐसा कौन है;अतितरेत्‌ू--बाहर निकलने में समर्थ; त्वत्‌-अन्य:--आपके चरणकमलों की शरण लिए बिना।

हे भगवान्‌, हे परम शाश्वत, आपने अपने स्वांश का विस्तार करके काल द्वारा क्षुब्ध होनेवाली अपनी बहिरंगा शक्ति के द्वारा जीवों के सूक्ष्म शरीरों की सृष्टि की है।

इस प्रकार मन जीवको अनन्त प्रकार की इच्छाओं में फाँस लेता है जिन्हें कर्मकाण्ड के वैदिक आदेशों तथा सोलहतत्वों के द्वारा पूरा किया जाना होता है।

भला ऐसा कौन है, जो आपके चरणकमलों की शरणग्रहण किये बिना इस बन्धन से छूट सके ?

" स त्वं हि नित्यविजितात्मगुण: स्वधाम्नाकालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्ति: ।

चक्रे विसृष्टमजये श्वर घोडशारेनिष्पीड्यमानमुपकर्ष विभो प्रपन्नम्‌ ॥

२२॥

सः--वह ( परम स्वतंत्र व्यक्ति ने अपनी बहिरंगा शक्ति से भौतिक मन की सृष्टि की जो इस भौतिक जगत के समस्त दुख काकारण है ); त्वम्‌ू--तुम ( हो ); हि--निस्सन्देह; नित्य--शा श्वत रूप से; विजित-आत्म--जीता गया; गुण:--जिसका बुद्धिगुण; स्व-धाम्ना--अपनी निजी आध्यात्मिक शक्ति से; काल:--काल तत्त्व ( जो सृजन तथा संहार करता है ); वशी-कृत--आपके अधीन; विसृज्य--जिससे सारे प्रभाव; विसर्ग--तथा सारे कारण; शक्ति: --शक्ति; चक्रे --काल चक्र में ( जन्म-मृत्युका चक्र ); विसृष्टभमू--फेंका जाकर; अजया--आपकी बहिरंगा शक्ति, तमोगुण से; ईश्वर--हे परम नियन्ता; षोडश-अरे--सोलह तीलियों वाले ( पाँच भौतिक तत्त्व, दस इन्द्रियाँ तथा इन सबका नायक मन ); निष्पीड्यमानम्‌--विदलित ( पहिए केनीचे ) होकर; उपकर्ष--कृपया मुझे ले लें ( अपने चरणकमलों की शरण में ); विभो--हे महानतम्‌; प्रपन्नम्‌ू-- आपकी शरण मेंआया।

हे प्रभु, हे महानतम, आपने सोलह अवयवों से इस भौतिक जगत की रचना की है, किन्तुआप उनके भौतिक गुणों से परे हैं।

दूसरे शब्दों में, ये भौतिक गुण पूर्णतया आपके वह में हैंऔर आप कभी भी उनके द्वारा जीते नहीं जाते।

अतएवं काल तत्त्व आपका प्रतिनिधित्व करताहै।

हे प्रभु, हे महान, आपको कोई नहीं जीत सकता किन्तु जहाँ तक मेरी बात है, मैं तोकालचक्र द्वारा पिसा जा रहा हूँ; अतएव मैं आपको पूर्ण आत्म-समर्पण करता हूँ।

अब आप मुझेअपने पाद-पढ् में संरक्षण प्रदान करें।

"

इृष्टा मया दिवि विभोडखिलधिष्णयपाना-मायु: थ्रियो विभव इच्छति याझ्जनोयम्‌ ।

येउस्मत्पितु: कुपितहासविजृम्भितभ्रू-विस्फूर्जितेन लुलिता: स तु ते निरस्त: ॥

२३॥

इृष्टा:--व्यावहारिक रूप से देखा गया; मया--मेरे द्वारा; दिवि--उच्च लोकों में; विभो--हे प्रभु; अखिल--समस्त; धिष्ण्य-पानामू--विभिन्न राज्यों या लोकों के प्रधानों की; आयु:--आयु, उप्र; भ्रियः--ऐश्वर्य; विभव:--यश, प्रभाव; इच्छति--इच्छाकरते हैं; यानू--जो सब; जन: अयमू्‌--ये सारे लोग; ये--जो ( आयु, ऐश्वर्य आदि ); अस्मत्‌ पितु:--हमारे पिता हिरण्यकशिपुके; कुपित-हास--क्रुद्ध होने पर अपनी हँसी द्वारा; विजुम्भित--फैली हुई; भ्रू--भौंहों के; विस्फूर्जितेन--केवल स्वरूप से;लुलिताः--नीचे गिराई हुईं या समाप्त; सः--वह ( मेरा पिता ); तु--लेकिन; ते--तुम्हारे द्वारा; निरस्त:--पूर्णतया विनष्ट |

हे भगवान्‌, सामान्यतः लोग दीर्घ आयु, ऐश्वर्य तथा भोग के लिए उच्च लोकों में जानाचाहते हैं, किन्तु मैंने अपने पिता के कार्यकलापों से इन सबों को देख लिया है।

जब मेरे पिताक्रुद्ध होते थे और देवताओं पर व्यंग्य हँसी हँसते थे तो वे उनकी भौहों की गतियों को देखने सेही तुरन्त विनष्ट हो जाते थे।

तो भी मेरे इतने शक्तिशाली पिता अब एक क्षण में आपके द्वाराध्वस्त कर दिये गये।

"

तस्मादमूस्तनुभूतामहमाशिषो ज्ञआयु: श्रियं विभवमैन्द्रियमाविरिज्च्यात्‌ ।

नेच्छामि ते विलुलितानुरुविक्रमेणकालात्मनोपनय मां निजभृत्यपा श्वम्‌ ॥

२४॥

तस्मात्‌ू--अत; अमू:--इन सारे ( ऐश्वर्यों ); तनु-भृताम्‌-देहधारी जीवों के प्रसंग में; अहम्‌--मैं; आशिष: अज्ञ:--ऐसेआशीर्वाद के फल को भलीभाँति जानता हुआ; आयु:--दीर्घ आयु; श्रियम्‌ू--भौतिक एऐश्वर्य; विभवम्‌--प्रभाव तथा यश;ऐन्द्रियम्‌ू--इन्द्रियतृप्ति के सारे साधन; आविरिज्च्यात्‌-ब्रह्मा से लेकर ( एक क्षुद्र चींटी तक ); न--नहीं; इच्छामि--चाहता हूँ;ते--तुम्हारे द्वारा; विलुलितान्‌ू--समाप्त किये जाने वाले; उरु-विक्रमेण--अत्यन्त शक्तिशाली; काल-आत्मना--काल केस्वामी के रूप में; उपनय--कृपया ले चलें; मामू--मुझको; निज-भृत्य-पार्श्रम्‌ू-- अपने अत्यन्त आज्ञाकारी भक्त की संगति में।

हे भगवन्‌, अब मुझे सांसारिक ऐश्वर्य, योगशक्ति, दीर्घायु तथा ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्रचींटी तक के सारे जीवों द्वारा भोग्य अन्य भौतिक आनन्दों का पूरा-पूरा अनुभव है।

आपशक्तिशाली काल के रूप में इन सबों को नष्ट कर देते हैं।

अतः मैं अपने अनुभव के आधार परइन सबों को नहीं लेना चाहता।

हे भगवान्‌, मेरी प्रार्थना है कि आप मुझे अपने शुद्ध भक्त केसम्पर्क में रखें और निष्ठावान्‌ दास के रूप में उसकी सेवा करने दें।

"

कुत्राशिष: श्रुतिसुखा मृगतृष्णिरूपाःक्वेदं कलेवरमशेषरुजां विरोह: ।

निर्विद्यते न तु जनो यदपीति विद्वान्‌कामानलं मधुलवै: शमयन्दुरापै: ॥

२५॥

कुत्र--कहाँ; आशिष:--आशीर्वाद, वर; श्रुति-सुखा:--सुनने में मधुर लगने वाले; मृगतृष्णि-रूपा:--मरुस्थल में मृगतृष्णा केसमान; क्व--कहाँ; इृदम्‌--यह; कलेवरम्‌--शरीर; अशेष--- असीम; रुजामू-- रोग का; विरोह: --उत्पत्ति स्थान; निर्विद्यते--तुष्ट होता है; न--नहीं; तु--लेकिन; जनः--सामान्य लोग; यत्‌ अपि--यद्यपि; इति--इस प्रकार; विद्वानू--तथाकथितदार्शनिक, विज्ञानी तथा राजनीतिज्ञ; काम-अनलम्‌--कामेच्छा की प्रज्वलित अग्नि; मधु-लवैः--शहद ( सुख ) की बूँदों से;शमयन्‌ू--नियंत्रण करते हुए; दुरापैः -- प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन

इस भौतिक जगत में प्रत्येक जीव कुछ न कुछ भावी सुख की कामना करता है, जोमरुस्थल में मृग-मरीचिका के समान है।

भला मरुस्थल में जल कहाँ?

दूसरे शब्दों में, इसभौतिक जगत में सुख कहाँ?

जहाँ तक इस शरीर की बात है, इसका मूल्य ही क्‍या है?

यहविभिन्न रोगों का स्त्रोत मात्र है।

तथाकथित दार्शनिक, विज्ञानी तथा राजनीतिज्न इसे भली-भाँतिजानते हैं फिर भी वे क्षणिक सुख की आकांक्षा रखते हैं।

सुख प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन हैलेकिन वे अपनी इन्द्रियों को वश में न रख पाने के कारण भौतिक जगत के तथाकथित सुख केपीछे दौते हैं और सही निष्कर्ष तक कभी नहीं पहुँच पाते।

"

क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोधिकेस्मिन्‌जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा ।

न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमायायन्मेडर्पित: शिरसि पद्मकरः प्रसाद: ॥

२६॥

क्व--कहाँ; अहम्‌--मैं हूँ; रज:-प्रभवः --रजोगुणी शरीर में उत्पन्न होकर; ईश--हे ईश्वर; तम:--तमोगुण; अधिके-- बढ़कर;अस्मिनू--इस; जात: --उत्पन्न; सुर-इतर-कुले--नास्तिकों या असुरों के परिवार में ( जो भक्तों से निम्न कोटि हैं ); क्व--कहाँ;तवब--तुम्हारी; अनुकम्पा--अहैतुकी कृपा; न--नहीं; ब्रह्मण: --ब्रह्मजी का; न--नहीं; तु--लेकिन; भवस्थ--शिवजी का;न--न तो; वै--ही; रमाया: -- लक्ष्मी जी का; यत्‌--जो; मे--मेरा; अर्पित: -- चढ़ाया गया; शिरसि--सिर पर; पद्म-कर:--कमल जैसा हाथ; प्रसाद:--कृपा का प्रतीक |

हे प्रभु, हे परमात्मा, कहाँ घोर नारकीय रजो तथा तमोगुणी परिवार में उत्पन्न हुआ मैं औरकहाँ आपकी अहैतुकी कृपा जो ब्रह्माजी, शिव जी या लक्ष्मी जी को कभी प्राप्त नहीं हो पाई ?

आप कभी भी इनके सिरों पर अपना कमल जैसा हाथ नहीं रखते, किन्तु आपने मेरे सिर पर इसेरखा है।

"

नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्या-ज्न्तोर्यथात्मसुहदो जगतस्तथापि ।

संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसाद:सेवानुरूपमुदयो न परावरत्वम्‌ ॥

२७॥

न--नहीं; एघा--यह; पर-अवर--उच्च या निम्न का; मतिः--ऐसा भेद-भाव; भवत:--आपका; ननु--निस्सन्देह; स्थात्‌ू--होवे; जन्तो: --सामान्य जीवों का; यथा--जिस प्रकार; आत्म-सुहृदः --मित्र का; जगतः--समूचे संसारे का; तथापि--फिर भी( मैत्री या मतभेद का ऐसा प्रदर्शन होता है ); संसेवया--भक्त द्वारा की गई सेवा की कोटि के अनुसार; सुरतरो: इब--बैकुण्ठलोक में कल्पवृक्ष की भाँति ( जो भक्त को इच्छानुसार फल देने वाला है ); ते--तुम्हारा; प्रसाद:--आशीर्वाद या आशीष;सेवा-अनुरूपम्‌-- भगवान्‌ के प्रति की गईं सेवा की कोटि के अनुसार; उदय:--अभिव्यक्ति; न--नहीं; पर-अवरत्वम्‌--छोटे-बड़े का भेदभाव

हे भगवान्‌, आप सामान्य जीवों की तरह मित्र तथा शत्रु एवं अनुकूल तथा प्रतिकूल के मध्यभेदभाव नहीं बरतते, क्योंकि आप में ऊँच-नीच की कोई भावना नहीं है।

फिर भी आप सेवा केस्तर के अनुसार ही अपना आशीष प्रदान करते हैं ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कल्पवृक्षइच्छाओं के अनुसार ही फल देता है और ऊँच-नीच में भेदभाव नहीं बरतता।

"

एवं जन॑ निपतितं प्रभवाहिकूपे'कामाभिकाममनु यः प्रपतन्प्रसड्भातू ।

कृत्वात्मसात्सुरर्षिणा भगवन्गृहीतःसोहं कथं नु विसूजे तव भृत्यसेवाम्‌ ॥

२८॥

एवम्‌--इस तरह; जनम्‌--सामान्य व्यक्ति को; निपतितम्‌--गिरा हुआ; प्रभव--भौतिक जगत के; अहि-कूपे--सर्पो से पूर्णअंधे कुएँ में; काम-अभिकामम्‌--इन्द्रियविषयों की कामना; अनु--अनुसरण करते हुए; यः--जो व्यक्ति; प्रपतन्‌ू--( इसअवस्था में ) गिर कर; प्रसड़ात्‌-बुरी संगति के कारण या भौतिक इच्छाओं की अधिकाधिक संगति से; कृत्वा आत्मसात्‌--मुझको ( अपने [ नारद जैसे आध्यात्मिक गुण प्राप्त करने के लिए ) वाध्य करके; सुर-ऋषिणा--महान्‌ सन्त पुरुष ( नारद )द्वारा; भगवन्‌--हे भगवान्‌; गृहीत:--स्वीकार; सः--वह व्यक्ति; अहम्‌--मैं; कथम्‌--कैसे; नु--निस्सन्देह; विसूजे--त्यागसकता हूँ; तब--तुम्हारी; भृत्य-सेवाम्‌-शुद्ध भक्त की सेवा |

हे भगवान्‌, मैं एक-एक करके भौतिक इच्छाओं की संगति में आने से सामान्य लोगों काअनुगमन करते हुए सर्पो के अन्धे कुएँ में गिरता जा रहा था।

किन्तु आपके दास नारद मुनि नेकृपा करके मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया और मुझे यह शिक्षा दी कि इसदिव्य पद को किस तरह प्राप्त किया जाये।

अतएव मेरा पहला कर्तव्य है कि मैं उनकी सेवाकरूँ।

भला मैं उनकी यह सेवा कैसे छोड़ सकता हूँ?

" मत्प्राणरक्षणमनन्त पितुर्वधश्चमन्ये स्वभृत्यऋषिवाक्यमृतं विधातुम्‌ ।

खड़गं प्रगृह्य यदवोचदसद्विधित्सु-स्त्वामीश्वरो मदपरोवतु कं हरामि ॥

२९॥

मत्‌-प्राण-रक्षणम्‌--मेंरे जीवन की रक्षा करके; अनन्त--हे अनन्त असीम दिव्य गुणों के आगार; पितु:--मेरे पिता का; बधःच--तथा वध; मन्ये--मानता हूँ; स्व-भृत्य--आपके अनन्य दासों का; ऋषि-वाक्यम्‌--तथा नारद मुनि के शब्दों को;ऋतम्‌--सत्य; विधातुम्‌-सिद्ध करने के लिए; खड्गम्‌--तलवार; प्रगृद्य--हाथ में धारण करके; यत्‌--चूँकि; अवोचत्‌--मेरेपिता ने कहा; असत्‌ू-विधित्सु:--बड़े ही अपवित्र ढंग से कर्म करने की इच्छा से; त्वामू--तुमको; ईंश्वरः:--कोई परम नियामक;मत्‌-अपरः--मेरी अपेक्षा दूसरा कोई; अवतु--बचा ले; कम्‌--तुम्हारा सिर; हरामि--अब मैं छिन्न कर दूँगा।

हे भगवान्‌, हे दिव्य गुणों के असीम आगार, आपने मेरे पिता हिरण्यकशिपु का वध कियाहै और मुझे उनकी तलवार से बचा लिया है।

उन्होंने अत्यन्त क्रुद्ध होकर कहा था 'यदि मेरेअतिरिक्त कोई परम नियन्ता है, तो वह तुम्हें बचाए।

अब मैं तुम्हारे सिर को तुम्हारे शरीर सेकाटकर अलग कर दूँगा।

अतएव मैं सोच रहा हूँ कि मुझे बचाने तथा उन्हें मारने--दोनों हीकार्यों में आपने अपने भक्त के वचनों को सत्य करने के लिए ही कर्म किया है।

इसका कोईअन्य कारण नहीं है।

"

एकस्त्वमेव जगदेतममुष्य यत्त्व-माद्यन्तयो: पृथगवस्यसि मध्यतश्न ।

सृष्ठा गुणव्यतिकर निजमाययेदंनानेव तैरवसितस्तदनुप्रविष्ट: ॥

३०॥

एकः--एक; त्वम्‌--तुम; एव--एकमात्र; जगत्‌--हृश्य जगत; एतम्‌--यह; अमुष्य--उस ( समग्र ब्रह्माण्ड ) का; यत्‌--चूँकि;त्वमू--तुम; आदि--प्रारम्भ में; अन्तयो:--अन्त में; पृथक्‌ू--अलग से; अवस्यसि--विद्यमान हो ( कारण रूप में ); मध्यतःच--बीच में भी ( आदि तथा अन्त के मध्य में ); सृष्ठा--उत्पन्न करके; गुण-व्यतिकरम्‌--प्रकृति के तीनों गुणों का रूपान्तर;निज-मायया--अपनी निजी बहिरंगा शक्ति से; इृदम्‌--यह; नाना इब-- अनेक किस्मों की तरह; तैः--उनके ( गुणों के ) द्वारा;अवसित:ः--अनुभव किया; तत्‌--वह; अनुप्रविष्ट: --प्रवेश करके |

हे भगवान्‌, अकेले आप ही अपने आपको विराट्‌ जगत के रूप में प्रकट करते हैं, क्योंकिआप सृष्टि के पूर्व विद्यमान थे, संहार के बाद भी विद्यमान रहते हैं और आदि तथा अन्त के बीचमें पालक होते हैं।

यह सब प्रकृति के तीनों गुणों की क्रिया-प्रतिक्रिया के माध्यम से आपकी बहिरंगा शक्ति द्वारा किया जाता है।

अतएव भीतर तथा बाहर जो कुछ भी विद्यमान है, वहकेवल आप हैं।

"

त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोन्योमाया यदात्मपरबुद्धिरियं हापार्था ।

यद्यस्यथ जन्म निधन स्थितिरीक्षणं चतद्बैतदेव वसुकालवदष्टितर्वो: ॥

३१॥

त्वमू--तुम; वा--या तो; इदम्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड; सत्‌ू-असत्‌--कार्य कारण से युक्त ( आप कारण हैं और आपकी शक्ति कार्यहै); ईश--हे ईश्वर परम नियन्ता; भवानू--आप; ततः--ब्रह्माण्ड से; अन्य:--पृथक्‌ स्थित ( भगवान्‌ सृष्टि करते हैं फिर भी वेसृष्टि से पृथक्‌ रहते हैं ); माया--शक्ति जो पृथक्‌ सृष्टि प्रतीत होती है; यत्‌--जिससे; आत्म-पर-बुद्धिः--अपने तथा पराये कीधारणा; इयम्‌ू--यह; हि--निस्सन्देह; अपार्था--अर्थहीन ( आप ही सब कुछ हैं अतएव 'मेरा' तथा 'तेरा' समझ पाने की आशानहीं है ); यत्‌--जिस वस्तु से; यस्थ--जिसका; जन्म--सृजन; निधनम्‌--संहार; स्थितिः--पालन; ईक्षणम्‌-- अभिव्यक्ति;च--तथा; तत्‌--वह; वा--या; एतत्‌--यह; एव--निश्चय ही; वसुकाल-वत्‌--पृथ्वी होने के गुण तथा उससे आगे पृथ्वी केसूक्ष्म तत्त्व ( गन्‍्ध ) के समान; अष्टि-तर्वो:--बीज ( कारण ) तथा वृक्ष ( कारण का कार्य )।

हे भगवान्‌, हे परमेश्वर, यह समग्र सृष्टि आपके द्वारा उत्पन्न है और विराट जगत आपकीशक्ति का परिणाम है।

यद्यपि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है फिर भी आपअपने को उससे पृथक्‌ रखते हैं।

'मेरा' तथा 'तुम्हारा' की धारणा निश्चय ही एक प्रकार का मोह(माया ) है, क्योंकि प्रत्येक वस्तु आपसे उद्धृूत होने के कारण आपसे भिन्न नहीं है।

निस्सन्देह,विराट जगत आपसे अभिन्न है और संहार भी आपके द्वारा ही किया जाता है।

आप तथा ब्रह्माण्डके बीच का यह सम्बन्ध बीज तथा वृक्ष अथवा सूक्ष्म कारण तथा स्थूल अभिव्यक्ति के उदाहरणके द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

"

न्यस्थेदमात्मनि जगद्ठिलयाम्बुमध्येशेषेत्मना निजसुखानुभवो निरीहः ।

योगेन मीलितहगात्मनिपीतनिद्र-स्तुर्ये स्थितो न तु तमो न गुणांश्व युड्क्षे ॥

३२॥

न्यस्य--फेंककर; इदम्‌--यह; आत्मनि--अपने आप में; जगत्‌--आपके द्वारा उत्पन्न विराट संसार; विलय-अम्बु-मध्ये--कारणार्णव में, जिसमें प्रत्येक वस्तु सुरक्षित शक्ति के रूप में संरक्षित रहती है; शेषे--सोये हुए के समान कर्म करते हो;आत्मना--अपने से; निज--अपना; सुख-अनुभव:--आध्यात्मिक आनन्द की अवस्था का अनुभव; निरीह:--कुछ भी न करतेहुए प्रतीत होना; योगेन--योग शक्ति के द्वारा; मीलित-हक्‌--बन्द आँखें; आत्म--अपने प्राकट्य द्वारा; निपीत--रोका गया;निद्र:--जिसकी नींद; तुर्ये--दिव्य अवस्था में; स्थित:--अपने को रखते हुए; न--नहीं; तु--लेकिन; तम:ः--सोने की भौतिकअवस्था; न--न तो; गुणान्‌-- भौतिक गुण; च--तथा; युद्क्षे--अपने को लगाते हो

हे परमेश्वर, संहार के बाद सृजनात्मक शक्ति आप में स्थित रखी जाती है और आप अपनीअधखुली आँखों से सोते प्रतीत होते हैं।

किन्तु तथ्य तो यह है कि आप एक सामान्य व्यक्ति कीभाँति सोते नहीं, क्योंकि आप भौतिक जगत की सृष्टि के परे सदैव दिव्य अवस्था में रहते हैं औरसदैव दिव्य आनन्द का अनुभव करते हैं।

इस तरह क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में आप भौतिक वस्तुओं को छुए बिना अपनी दिव्य स्थिति में बने रहते हैं।

यद्यपि आप सोते प्रतीत होते हैं, किन्तुयह सोना अविद्या की निद्रा से पृथक्‌ होता है।

"

तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्यासजञ्जोदितप्रकृतिधर्मण आत्मगूढम्‌ ।

अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधे-नभिरभूत्स्वकणिकावटवन्महाब्जम्‌ ॥

३३॥

तस्य--उस भगवान्‌ का; एव--निश्चय ही; ते--तुम्हारा; वपु:--शरीर; इृदम्‌--यह ( ब्रह्माण्ड ); निज-काल-शक्त्या--शक्तिशाली काल द्वारा; सञझ्ञोदित-श्षुब्ध; प्रकृति-धर्मण: --उनका जिनसे प्रकृति के तीनों गुण; आत्म-गूढम्‌--आप में निहित;अम्भसि--कारणार्णव के जल में; अनन्त-शयनात्‌-- अनन्त ( जो आपका अन्य रूप है ) नामक शय्या से; विरमत्‌-समाधे: --समाधि से जगकर; नाभे:--नाभि से; अभूत्‌-- प्रकट हुआ; स्व-कणिका--बीज से; वट-वत्‌--महान्‌ बट वृक्ष की तरह; महा-अब्जम्‌--संसार का महान्‌ कमल ( जो इसी तरह उगा है )

यह विराट भौतिक जगत भी आपका ही शरीर है।

यह पदार्थ का पिंड आपकी काल शक्तिद्वारा क्षुब्ध होता है और इस तरह प्रकृति के तीनों गुण प्रकट होते हैं।

तब आप शेष या अनन्त कीशय्या से जागते हैं और आपकी नाभि से एक क्षुद्र दिव्य बीज उत्पन्न होता है।

इसी बीज से विराटजगत का कमल पुष्प प्रकट होता है ठीक उसी तरह जिस प्रकार एक छोटे बीज से विशाल वटवृक्ष उगता है।

"

तत्सम्भवः 'कविरतोन्यदपश्यमान-स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्त्य ।

नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्ञमानोजातेड्डुरे कथमुहोपलभेत बीजम्‌ ॥

३४॥

तत्‌-सम्भव:ः --उस कमल से उत्पन्न; कवि:--सृष्टि के सूक्ष्म कारण को समझने वाला ( ब्रह्मा ); अतः:--उस ( कमल ) से;अन्यत्‌--अन्य कुछ; अपश्यमान: --देख सकने में अक्षम; त्वामू--आपको; बीजम्‌--कमल के कारण को; आत्मनि-- अपनेमें; ततम्‌--विस्तार कर लिया; सः--उसने ( ब्रह्मा ); बहिः विचिन्त्य--अपने को बाहरी मानकर; न--नहीं; अविन्दत्‌--( आपको ) समझा; अब्द-शतम्‌--देवताओं के अनुसार एक सौ वर्षों तक ( देवताओं का एक दिन हमारे छः मास के तुल्य );अप्सु--जल के भीतर; निमज्ञममान:--गोता लगाकर; जाते अछ्जू रे--जब बीज अंकुरित होकर लता रूप में प्रकट होता है;कथम्‌--कैसे; उह--हे भगवान्‌; उपलभेत--कोई देख सकता है; बीजम्‌--पहले से फलित बीज को |

उस विशाल कमल पुष्प से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए किन्तु उन्हें उस कमल के सिवाय कुछ भी नहींदिखा।

अतएव आप को बाहर स्थित जानकर उन्होंने जल में गोता लगाया और वे एक सौ वर्षोतक उस कमल के उद्गम को खोजने का प्रयत्न करते रहे।

किन्तु उन्हें आपका कोई पता नहींचल पाया क्‍योंकि जब बीज फलीभूत होता है, तो असली बीज नहीं दिख पाता।

"

स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्नितोब्जंकालेन तीब्रतपसा परिशुद्धभाव: ।

त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्म॑भूतेन्द्रयशयमये विततं दरदर्श ॥

३५॥

सः--वह ( ब्रह्मा ); तु--लेकिन; आत्म-योनि:--बिना माता के उत्पन्न ( सीधे पिता विष्णु से उत्पन्न ); अति-विस्मित:--अत्यधिक चकित ( अपने जन्म का उद्गम न पाकर ); आभ्रित:--आसीन; अब्जम्‌--कमल; कालेन--काल के द्वारा; तीब्र-तपसा--धोर तपस्या द्वारा; परिशुद्ध-भावः--पूर्णतया शुद्ध होकर; त्वामू--आपको; आत्मनि--अपने शरीर में; ईश--हे ईश्वर;भुवि--पृथ्वी के भीतर; गन्धम्‌--गन्ध; इब--सहश; अति-सूक्ष्मम्‌--अत्यन्त सूक्ष्म; भूत-इन्द्रिय--तत्त्वों तथा इन्द्रियों से बना;आशय-मये--तथा जो इच्छाओं से पूर्ण ( मन ); विततमू--फैला हुआ; दरदर्श--देखा

आत्मयोनि के नाम से विख्यात अर्थात्‌ बिना माता के उत्पन्न ब्रह्मजी को आश्चर्य हुआ।

अतएव उन्होंने कमल पुष्प की शरण ग्रहण की और जब वे सैकड़ों वर्षों तक कठोर तपस्याकरने के बाद शुद्ध हुए तो वे देख पाये कि समस्त कारणों के कारण भगवान्‌ उनके अपने पूरेशरीर तथा इन्द्रियों में उसी तरह व्याप्त थे जिस प्रकार गन्ध अत्यन्त सूक्ष्म होने पर भी पृथ्वी मेंअनुभव की जाती है।

"

एवं सहस्त्रवदनाड्प्रिशिर:ःकरोरु -नासाद्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम्‌ ॥

मायामयं सदुपलक्षितसन्निवेशंइष्ठा महापुरुषमाप मुद्दे विरिज्ञ: ॥

३६॥

एवम्‌--इस प्रकार; सहस्त्र--हजार; वदन-- मुख; अड्प्रि--पाँव; शिर:--सिर; कर--हाथ; उरु--जाँघें; नास-आद्य-- नाकइत्यादि ; कर्ण--कान; नयन--आँखें; आभरण--तरह-तरह के गहनों; आयुध--तरह-तरह के हथियारों से; आढ्यम्‌--लैस;माया-मयम्‌--असीम शक्ति द्वारा प्रदर्शित; सत्‌-उपलक्षित--विभिन्न लक्षणों में प्रकट होकर; सन्निवेशम्‌ू--एकसाथ मिलकर;इष्ठा--देख कर; महा-पुरुषम्‌-- भगवान्‌ को; आप--प्राप्त किया; मुदम्‌-दिव्य आनन्द; विरिज्ञ:--ब्रह्मा ने

तब ब्रह्माजी ने आपको हजारों मुखों, पाँवों, सिरों, हाथों, जांघो, नाकों, कानों तथा आँखोंसे युक्त देखा।

आप भलीभाँति वस्त्र धारण किये थे और नाना प्रकार के आभूषणों तथा आयुधोंसे सुशोभित थे।

आपको विष्णु रूप में देखकर तथा आपके दिव्य लक्षणों एवं अधोलोकों सेफैले हुए आपके चरणों को देखकर ब्रह्माजी को दिव्य आनन्द प्राप्त हुआ।

"

तस्मै भवान्हयशिरस्तनुवं हि बिभ्रद्‌वेदद्रुहावतिबलौ मधुकैटभाख्यौ ।

हत्वानयच्छुतिगणां श्र रजस्तमश्नसत्त्व॑ तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ॥

३७॥

तस्मै--उन ब्रह्मा को; भवान्‌ू--आप; हय-शिरः--घोड़े का शिर तथा गर्दन वाले; तनुवम्‌-- अवतार; हि--निस्सन्देह; बिभ्रत्‌ू--स्वीकार करते हुए; बेद-द्रहौ--दो असुर जो वैदिक सिद्धान्तों के विरुद्ध थे; अति-बलौ--अत्यन्त बलशाली; मधु-कैटभ-आख्यौ--मधु तथा कैटभ नाम से विख्यात; हत्वा--मारकर; अनयत्‌-- प्रदान किया; श्रुति-गणान्‌ू--सारे भिन्न-भिन्न वेद (साम, यजुः, ऋग तथा अथर्व ); च--तथा; रज: तम: च--रजो तथा तमो गुणों द्वारा अंकित करके; सत्त्वम्‌--शुद्ध दिव्यसतोगुण; तब--तुम्हारा; प्रिय-तमाम्‌--सर्वाधिक प्रिय; तनुमू--रूप का ( हयग्रीव ); आमनन्ति--आदर करते हैं।

हे भगवान्‌, जब आप घोड़े का शिर धारण करके हयग्रीव रूप में प्रकट हुए तो आपने रजोतथा तमो गुणों से पूर्ण मधु तथा कैटभ नामक दो असुरों का संहार किया।

फिर आपने ब्रह्मा कोवैदिक ज्ञान प्रदान किया।

इसी कारण से सारे महान्‌ ऋषिगण आपके रूपों को दिव्य अर्थात्‌भौतिक गुणों से अछूता मानते हैं।

"

इत्थं नृतिर्यगृषिदेवझषावतारै-लोॉकान्विभावयसि हंसि जगत्प्रतीपान्‌ ।

धर्म महापुरुष पासि युगानुवृत्तंछन्नः कलौ यदभवस्त्रियुगोथ स त्वम्‌ ॥

३८ ॥

इत्थम्‌--इस प्रकार; नृ--यथा मनुष्य ( यथा कृष्ण तथा रामचन्द्र ); तिर्यक्‌--पशु की तरह का ( जेसै शूकर ); ऋषि--महान्‌ऋषि की तरह ( परशुराम ); देव--देवता गण; झष--लचर ( जैसे मछली तथा कछुवा ); अवतारैः--ऐसे विभिन्न अवतारों केद्वारा; लोकान्‌ू--सारे लोकों को; विभावयसि--रक्षा करते हो; हंसि--( कभी-कभी ) मारते हो; जगत्‌ प्रतीपान्‌ू--इस संसार मेंबाधा उत्पन्न करने वालों को; धर्मम्‌-धार्मिक सिद्धान्तों को; महा-पुरुष--हे महान्‌ पुरुष; पासि--रक्षा करते हो; युग-अनुवृत्तम्‌-विभिन्न युगों के अनुसार; छन्न:--ढका हुआ; कलौ--कलियुग में; यत्‌-- क्योंकि; अभव: --हुए हैं ( और भविष्यमें होंगे ); त्रि-युग:ः--त्रियुणग नामक; अथ--अतएव; स:--वही पुरुष; त्वमू-तुम |

हे प्रभु, इस प्रकार आप विभिन्न अवतारों में जैसे मनुष्य, पशु, ऋषि, देवता, मत्स्य याकच्छप के रूप में प्रकट होते हैं और इस प्रकार से विभिन्न लोकों में सम्पूर्ण सृष्टि का पालनकरते हैं तथा आसुरीं सिद्धन्तों का वध करते हैं।

हे भगवान्‌, आप युग के अनुसार धार्मिकसिद्धान्तों की रक्षा करते हैं।

किन्तु कलियुग में आप स्वयं को भगवान्‌ के रूप में घोषित नहींकरते।

इसलिए आप 'त्रियुग' कहलाते हैं, अर्थात्‌ तीन युगों में प्रकट होने वाले भगवान्‌।

"

नैतन्मनस्तव कथासु विकुण्ठनाथसम्प्रीयते दुरितदुष्टमसाधु तीब्रम्‌ ।

कामातुरं हर्षशोकभयैषणार्ततस्मिन्कर्थ तव गतिं विमृशामि दीन: ॥

३९॥

न--निश्चय ही नहीं; एतत्‌--यह; मन: --मन; तब--तुम्हारी; कथासु--दिव्य कथाओं में; विकुण्ठ-नाथ--हे चिन्तारहितबैकुण्ठ के स्वामी; सम्प्रीयते--शान्त हो जाता है या रूचि रखता है; दुरित--पापकर्मो से; दुष्टम्‌--बेईमान; असाधु--झूठा;तीब्रमू--वश में करना कठिन; काम-आतुरम्‌--सदैव विभिन्न इच्छाओं तथा कामेच्छाओं से पूर्ण; हर्ष -शोक--कभी हर्ष द्वारा तोकभी दुख द्वारा; भय--तथा कभी भय द्वारा; एषणा--तथा इच्छा द्वारा; आर्तम्‌--दुखी; तस्मिन्‌ू--उस मानसिक स्थिति में;कथम्‌--कैसे; तब--तुम्हारा; गतिम्‌ू--दिव्य कार्यकलाप; विमृशामि--मैं विचार करूँगा और समझने का प्रयास करूँगा;दीन:ः--अत्यन्त पतित तथा गरीब।

चिन्तारहित वैकुण्ठलोकों के स्वामी, मेरा मन अत्यन्त पापी तथा कामी है, कभी यह सुखीकहलाता है, तो कभी दुखी है।

मेरा मन शोक तथा भय से पूर्ण है और सदैव अधिकाधिक धनकी खोज में रहता है।

इस तरह यह अत्यधिक दूषित गया है और आपकी कथाओं से कभी तुष्टनहीं होता।

अतएव मैं अत्यन्त पतित तथा दलित हूँ।

ऐसी जीवन-स्थिति में भला मैं आपकेकार्यकलापों की व्याख्या करने में किस तरह समर्थ हो सकता हूँ?

" जिह्नैकतोच्युत विकर्षति मावितृप्ताशिश्नोन्यतस्त्वगुदर श्रवण कुतश्चित्‌ ।

घ्राणोउन्यतश्चपलहक्क्व च कर्मशक्ति-ब॑ह्व्य: सपत्य इव गेहपतिं लुनन्ति ॥

४०॥

जिह्मा--जीभ; एकत:ः--एक ओर; अच्युत--हे अच्युत भगवान्‌; विकर्षति-- आकर्षित करती है; मा--मुझको; अवितृप्ता--सन्तुष्ट न होने से; शिश्न: --जननेन्द्रियाँ; अन्यतः--दूसरी ओर; त्वक्‌--चमड़ी ( मुलायम वस्तु को छूने के लिए ); उदरम्‌--पेट( तरह-तरह के भोजन के लिए ); श्रवणम्‌--कान ( किसी मधुर संगीत को सुनने के लिए ); कुतश्चित्‌--किसी अन्य ओर तक;प्राण:--नाक ( सूँघने के लिए ); अन्यतः--और भी दूसरी ओर को; चपल-हक्‌ --चंचल दृष्टि; क्व च--कहीं पर; कर्म-शक्ति:--सक्रिय इन्द्रियाँ; बह्व्य:--अनेक; स-पत्य:--सौतें; इब--सहश; गेह-पतिम्‌--गृहस्थ को; लुनन्ति--नष्ट कर देतीहैं

हे अच्युत भगवान्‌, मेरी दशा उस पुरुष की भाँति है, जिसकी कई पत्लियाँ हों और वे सभीउसे अपने अपने ढंग से आकर्षित करने का प्रयास कर रही हों।

उदाहरणार्थ, जीभ स्वादिष्टव्यंजनों की ओर आकृष्ट होती है, जननेन्द्रियाँ किसी आकर्षक स्त्री के साथ संभोग करने के लिए और स्पर्श इन्द्रियाँ मुलायम वस्तुओं का स्पर्श करने के लिए आकृष्ट होती हैं।

पेट भरा रहने परभी अधिक खाना चाहता है और कान आपके विषय में न सुन कर सामान्यतः सिनेमा गीतों कीओर आकदकृष्ट होते हैं।

प्राण की इन्द्रिय किसी अन्य ओर ही आकृष्ट होती है, चंचल आँखेंइन्द्रियतृप्ति के हश्यों की ओर आकृष्ट होती हैं तथा सक्रिय इन्द्रियाँ अन्यत्र आकृष्ट होती हैं।

इसतरह मैं सचमुच ही दुविधा में रहता हूँ।

"

एवं स्वकर्मपतितं भववैतरण्या-मन्योन्यजन्ममरणाशनभीतभीतम्‌ ।

पश्यञ्जनं स्वपरविग्रहवैरमैत्रहन्तेति पारचर पीपृहि मूढमद्य ॥

४१॥

एवम्‌--इस तरह; स्व-कर्म-पतितम्‌--अपने भौतिक कार्यकलापों के फल के कारण पतित हुआ; भव--अज्ञान जगत ( जन्म,मृत्यु, जरा, व्याधि की तुलना में ); वैतरण्याम्‌--वैतरणी नदी में ( जो मृत्यु के अधीक्षक यमराज के द्वार के समक्ष बहती है );अन्य: अन्य--एक के बाद एक; जन्म--जन्म; मरण--मृत्यु; आशन--विभिन्न प्रकार का भोजन; भीत-भीतम्‌-- अत्यधिकभयभीत; पश्यन्‌--देखते हुए; जनमू--जीव को; स्व--अपना; पर--पराया; विग्रह--शरीर में; बैर-मैत्रमू--मित्रता तथा शत्रुतामानते हुए; हन्त--हाय; इति--इस तरह; पारचर--मृत्यु की नदी के दूसरी ओर स्थित आप; पीपृहि--कृपया हम सबों को ( इसघातक स्थिति से ) बचा लें; मूढम्‌--आध्यात्मिक ज्ञान से विहीन हम सभी मूर्ख हैं; अद्य--आज ( क्योंकि आप स्वयं यहाँउपस्थित हैं )॥

हे भगवान्‌, आप सदैव मृत्यु की नदी के दूसरी ओर ( उस पार ) दिव्य रूप में स्थित रहते हैं,किन्तु हम सभी अपने पापकर्मों के फलों के कारण इस ओर कष्ट भोग रहे हैं।

निस्सन्देह, हमइस नदी में गिर गये हैं और जन्म-मृत्यु की वेदनाओं से बारम्बार कष्ट उठा रहे हैं तथा भयानकवस्तुएँ खा रहे हैं।

अब कृपा करके हम पर दृष्टि डालिये--न केवल मुझ पर अपितु उन सबों परजो कष्ट उठा रहे हैं--और अपनी अहैतुकी कृपा तथा दया से हमारा उद्धार कीजिए तथा हमारापालन कीजिये।

"

को न्वत्र तेडखिलगुरो भगवन्प्रयासउत्तारणेस्य भवसम्भवलोपहेतो: ।

मूढेषु वै महदनुग्रह आर्तबन्धोकि तेन ते प्रियजनाननुसेवर्ता न: ॥

४२॥

कः--कौन सा; नु--निस्सन्देह; अत्र--इस मामले में; ते--आपका; अखिल-गुरो--हे सम्पूर्ण सृष्टि के परम गुरु; भगवन्‌--हेभगवान्‌; प्रयास:--प्रयास; उत्तारणे--इन पतित आत्माओं के उद्धार हेतु; अस्य--इसका; भव-सम्भव--सृजन तथा पालन का;लोप--तथा प्रलय का; हेतोः--कारण का; मूढेषु--इस भौतिक जगत में सड़ने वाले मूर्ख व्यक्तियों में; बै--निस्सन्देह; महत्‌-अनुग्रहः-- भगवान्‌ द्वारा दया; आर्त-बन्धो--हे पीड़ित जीवों के मित्र; किम्‌ू--क्या कठिनाई है; तेन--उससे; ते--तुम्हारे; प्रिय-जनानू-प्रिय पुरुषों ( भक्तों ) को; अनुसेवताम्‌--जो सदैव सेवा करने में लगे हैं उनका; न:ः--हमारी तरह ( जो इस तरह लगेहैं)

हे परमेश्वर, हे समग्र जगत के आदि आध्यात्मिक गुरु, आप ब्रह्माण्ड के कार्यो के प्रबन्धकहैं, अतएव आपकी सेवा में लगे हुए पतितात्माओं का उद्धार करने में आपको कौन सी कठिनाईहै?

आप सभी दुखी मानवता के मित्र हैं और महापुरुषों के लिए मूर्खों पर दया दिखलानाआवश्यक है।

अतएव मैं सोचता हूँ कि आप हम जैसे मनुष्यों पर अहैतुकी कृपा प्रदर्शित करेंगेजो आपकी सेवा में लगे हुए हैं।

"

त्वद्वीयगायनमहामृतमग्नचित्त: ।

शोचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थमायासुखाय भरमुद्गहतो विमूढान्‌ ॥

४३॥

न--नहीं; एव--निश्चय ही; उद्विजे--मैं उद्विगन अथवा भयभीत हूँ; पर--हे पर; दुरत्यय--पार करना कठिन; बैतरण्या: --वैतरणी नदी को ( भौतिक जगत की नदी ); त्वत्‌-वीर्य--आपके यश तथा कार्यकलाप का; गायन--कीर्तन करने से यावितरित करने से; महा-अमृत-- अमृत के समान आध्यात्मिक आनन्द के महासागर में; मग्न-चित्त:--लीन चित्त वाला; शोचे--मैं केवल पछता रहा हूँ; तत:--उससे; विमुख-चेतस:--वे मूर्ख तथा धूर्त जो कृष्णभावनामृत से विहीन हैं; इन्द्रिय-अर्थ--इन्द्रियतृप्ति में; माया-सुखाय--क्षणिक मोहमय सुख के लिए; भरम्‌ू--मिथ्या भार या उत्तरदायित्व ( अपने परिवार, समाज तथा राष्ट्रके पालन के लिए तथा उस हेतु विशद प्रबन्ध ); उद्ददतः--उठाये हुए ( इस प्रबन्ध के लिए महान्‌ योजनाएं बना कर );विमूढान्‌--यद्यपि वे मूर्खो तथा धूर्तों के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं ( मैं उनके विषय में भी सोच रहा हूँ )।

हे श्रेष्ठ महापुरुष, मैं भौतिक जगत से तनिक भी भयभीत नहीं हूँ, क्योंकि मैं जहाँ कहीं भीठहरता हूँ आपके यश तथा कार्यकलाप के विचारों में लीन रहता हूँ।

मैं एकमात्र उन मूर्खो तथाधूर्तों के लिए चिन्तित हूँ जो भौतिक सुख के लिए तथा अपने परिवार, समाज तथा देश केपालन हेतु बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं।

मैं मात्र उन के प्रति प्रेम के बारे में चिन्तित हूँ।

"

प्रायेण देव मुनय: स्वविमुक्तिकामा मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठा: ।

नैतान्विहाय कृपणान्विमुमुक्ष एकोनान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोनुपश्ये ॥

४४॥

प्रायेण-- प्रायः सभी मामलों में, सामान्यतया; देव--हे ई श्वर; मुन॒य:--बड़े बड़े सन्त पुरुष; स्व--निजी; विमुक्ति-कामा:--इसभौतिक जगत से मुक्ति के इच्छुक; मौनम्‌--मूक भाव से; चरन्ति--विचरण करते हैं ( हिमालय के जंगल में जहाँभौतिकतावादियों के कार्यकलापों से कोई सम्पर्क नहीं रहता ); विजने--एकान्त स्थान में; न--नहीं; पर-अर्थ-निष्ठा:--कृष्णभावनामृत आन्दोलन का लाभ पहुँचाने के लिए अन्यों के लिए काम करने में रूचि रखने वाला; न--नहीं; एतान्‌ू--इन;विहाय--छोड़कर; कृपणान्‌--मूर्खों तथा धूर्तों को ( जो मनुष्य जीवन का लाभ न जानते हुए भौतिक कार्य में लगे रहते हैं );विमुमुक्षे--मैं मुक्त होना और भगवद्धाम लौट जाना चाहता हूँ; एक:--अकेला; न--नहीं; अन्यम्‌--दूसरा; त्वत्‌--आपके लिएही; अस्य--इसकी; शरणम्‌--शरण; भ्रमत:ः--ब्रह्माण्ड भर में घूमने और भटकने वाले जीव की; अनुपश्ये--मैं देखूँ॥

हे भगवान्‌ नृसिंहदेव, मैं देख रहा हूँ कि सन्त पुरुष तो अनेक हैं, किन्तु वे अपने ही मोक्ष मेंरुचि रखते हैं।

वे बड़े-बड़े नगरों की परवाह न करते हुए मौन व्रत धारण करके ध्यान करने केलिए हिमालय या बन में चले जाते हैं; वे दूसरों की मुक्ति में रुचि नहीं रखते, किन्तु जहाँ तकमेरी बात है मैं इन बेचारे मूर्खो तथा धूर्तों को छोड़कर अकेले अपनी मुक्ति नहीं चाहता।

मैंजानता हूँ कि कृष्णभावनामृत के बिना और आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण किये बिनाकोई सुखी नहीं हो सकता।

अतएव मैं उन सबों को आपके चरणकमलों की शरण में वापसलाना चाहता हँ।

"

यन्मैथुनादिगृहमेधिसुखं हि तुच्छेकण्डूयनेन करयोरिव दुःखदुःखम्‌ ।

तृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाज:कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेत धीर: ॥

४५॥

यतू--जो ( इन्द्रिय तृप्ति के निमित्त है ); मैथुन-आदि--काम चर्चा, काम साहित्य का पठन या विषयी जीवन का भोग ( घर में,या बाहर यथा क्लब में ); गृहमेधि-सुखम्‌--परिवार, समाज, मैत्री इत्यादि से अनुरक्त रहने के आधार पर सभी प्रकार काभौतिक सुख; हि--निस्सन्देह; तुच्छम्‌--तुच्छ, नगण्य; कण्डूयनेन--खुजलाने से; करयो:--दोनों हाथों के ( खुजली दूर करनेके लिए ); इब--सहश; दुःख-दुःखम्‌--विभिन्न प्रकार के दुख ( इन्द्रियतृप्ति की खुजली के पश्चात्‌ होनेवाले ); तृप्यन्ति--तुष्टहो जाते हैं; न--कभी नहीं; इह-- भौतिक इन्द्रिय तृप्ति में; कृपणा:--मूर्ख व्यक्ति; बहु-दुःख-भाज:ः--विभिन्न प्रकार के दुखोंको प्राप्त; कण्डूति-वत्‌--यदि ऐसी खुजलाहट से सीख ले सके; मनसि-जम्‌--जो मात्र मानसिक कल्पना है ( वास्तविक सुखनहीं होता ); विषहेत--तथा ( ऐसी खुजलाहट ) सहन करता है; धीर:--अत्यन्त पूर्ण तथा गम्भीर व्यक्ति (बन सकता है )

विषयी जीवन की तुलना खुजली दूर करने हेतु दो हाथों को रगड़ने से की गई है।

गृहमेथीअर्थात्‌ तथाकथित गृहस्थ जिन्हें कोई आध्यात्मिक ज्ञान नहीं है, सोचते हैं कि यह खुजलानासर्वोत्कृष्ट सुख है, यद्यपि वास्तव में यह दुख का मूल है।

कृपण जो ब्राह्मणों से सर्वथा विपरीतहोते हैं, बारम्बार ऐन्द्रिय भोग करने पर भी तुष्ट नहीं होते।

किन्तु जो धीर हैं और इस खुजलाहटको सह लेते हैं उन्हें मूखों तथा धूर्तो जैसे कष्ट नहीं सहने पड़ते।

"

मौनब्रतश्रुततपो ध्ययनस्वधर्म -व्याख्यारहोजपसमाधय आपवर्ग्या: ।

प्राय: पर पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणांवार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्भिकानाम्‌ ॥

४६ ॥

मौन--चुप्पी; ब्रत--ब्रत; श्रुत--वैदिक ज्ञान; तपः--तपस्या; अध्ययन--शास्त्र का अध्ययन; स्व-धर्म--वर्णाश्रम धर्म कापालन; व्याख्या--शास्त्रों की विवेचना; रहः--एकान्त स्थान में रहना; जप--कीर्तन अथवा मंत्रों का उच्चारण; समाधय:--समाधि में रहना; आपवर्ग्या:--मोशक्ष मार्ग में प्रगति करने के लिए किये जाने वाले दस प्रकार के कार्य; प्रायः--सामान्यतया;परम्‌ू--एकमात्र साधन; पुरुष-हहे प्रभु; ते--वे सब; तु--लेकिन; अजित-इन्द्रियाणाम्‌ू--उन व्यक्तियों का जो इन्द्रियों को वशमें नहीं कर सकते; वार्ता:--जीविका; भवन्ति-- हैं; उत-- इसलिए ऐसा कहा जाता है; न--नहीं; वा--अथवा; अतन्र--इससम्बन्ध में; तु--लेकिन; दाम्भिकानाम्‌ू--मिथ्या गर्व करने वाले व्यक्तियों का।

हे भगवन्‌, मोक्ष मार्ग के लिए दस विधियाँ संस्तुत हैं--मौन रहना, किसी से बातें न करना,ब्रत रखना, सभी प्रकार का वैदिक ज्ञान संचित करना, तपस्या करना, वेदाध्ययन करना,वर्णाश्रम धर्म के कर्तव्यों को पूरा करना, शास्त्रों की व्याख्या करना, एकान्त स्थान में रहना,मौन मंत्रोच्चार करना, समाधि में लीन रहना।

मोक्ष की ये विभिन्न विधियाँ सामान्यतया उन लोगोंके लिए व्यापारिक अभ्यास और जीविकोपार्जन के साधन हैं जिन्होंने इन्द्रियों को जीता नहीं।

चूँकि ऐसे लोग मिथ्या अहंकारी होते हैं अतएव हो सकता है कि ये विधियाँ सफल न भी हों।

"

रूपे इमे सदसती तव वेदसूष्टेबीजाड्लू राविव न चान्यदरूपकस्य ।

युक्ता: समक्षमुभयत्र विचक्षन्ते त्वांयोगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात्‌ ॥

४७॥

रूपे--रूपों में; इमे--इन दो; सत्‌-असती--कार्य तथा कारण; तब--तुम्हारा; बेद-सृष्टे--वेदों में व्याख्यायित; बीज-अह्ढु रौ--बीज तथा अंकुर; इब--सदहृश; न--कभी नहीं; च-- भी; अन्यत्‌-- अन्य कोई; अरूपकस्य--बिना आकार वालेआपका; युक्ता:--आपकी भक्ति में लीन; समक्षम्‌-- आँखों के सामने; उभयत्र--दोनों तरह से ( आध्यात्मिक तथा भौतिक रीति से ); विचक्षन्ते--वास्तव में देख सकते हैं; त्वामू--तुमको; योगेन--केवल भक्ति के द्वारा; वहिम्‌--आग; इब--सहश;दारुषु--काठ में; न--नहीं; अन्यत:--अन्य किसी विधि से; स्थातू--सम्भव है।

प्रामाणिक वैदिक ज्ञान द्वारा मनुष्य यह देख सकता है कि विराट जगत में कार्य तथा कारणके रूप भगवान्‌ के ही हैं, क्योंकि यह विराट जगत उन की शक्ति है।

कार्य तथा कारण दोनों हीभगवान्‌ की शक्तियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं हैं।

अतएव हे प्रभु, जिस तरह कोई चतुरमनुष्य कार्य-कारण पर विचार करते हुए यह देख सकता है कि अग्नि किस तरह काठ में व्याप्तहै उसी तरह भक्ति में लगे हुए व्यक्ति समझ सकते हैं कि आप किस प्रकार से कार्य तथा कारणदोनों ही हैं।

"

त्वं वायुरग्निरवनिर्वियदम्बु मात्रा:प्राणेन्द्रियाणि हृदयं चिदनुग्रहश्च ।

सर्व त्वमेव सगुणो विगुणश्र भूमन्‌नान्यत्त्वदस्त्यपि मनोवचसा निरुक्तम्‌ ॥

४८ ॥

त्वमू--तुम ( हो ); वायु;:--वायु; अग्नि:-- अग्नि; अवनि:-- पृथ्वी; वियत्‌-- आकाश; अम्बु--जल; मात्रा:--इन्द्रियविषय;प्राण--प्राणवायु; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; हृदयम्‌--मन; चित्‌ू--चेतना; अनुग्रह: च--तथा मिथ्या अहंकार या देवता; सर्वम्‌--हरवस्तु; त्वम्‌ू--तुम; एब--एकमात्र; स-गुण:--तीन गुणों से युक्त प्रकृति; विगुण:--आध्यात्मिक स्फुलिंग तथा परमात्मा जो भौतिक प्रकृति से परे हैं; च--तथा; भूमन्‌--हे भगवान्‌; न--नहीं; अन्यत्‌--दूसरा; त्वत्‌--तुम्हारी अपेक्षा; अस्ति--है;अपि--यद्यपि; मन:-वचसा--मन तथा वाणी से; निरुक्तम्‌--प्रत्येक प्रकट वस्तुहे परमेश्वर, आप वास्तव में वायु, भूमि, अग्नि, आकाश तथा जल हैं।

आप तन्मात्राएँ,प्राणवायु, पाँचों इन्द्रियाँ, मन, चेतना तथा मिथ्या अहंकार हैं।

निस्सन्देह, आप स्थूल तथा सूक्ष्महर वस्तु हैं।

भौतिक तत्त्व तथा शब्दों या मन से व्यक्त प्रत्येक वस्तु आपके अतिरिक्त अन्य कुछनहीं है।

"

नैते गुणा न गुणिनो महदादयो येसर्वे मनः प्रभूतय: सहदेवमर्त्या: ।

आद्चन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वा-मेवं विमृश्य सुधियो विरमन्ति शब्दात्‌ ॥

४९॥

न--न तो; एते--ये सब; गुणा:--प्रकृति के तीन गुण; न--न तो; गुणिन: --तीन गुणों के अधिष्ठाता देव ( यथा ब्रह्मा रजोगुणके प्रधान देव हैं तथा शिव तमोगुण के ); महत्‌-आदय:--पाँच तत्त्व, इन्द्रियाँ तथा तन्मात्राएँ; ये--जो; सर्वे--सभी; मन:--मन; प्रभूतयः --इत्यादि; सह-देव-मर्त्या:--देवताओं तथा मर्त्य मनुष्यों सहित; आदि-अन्त-वन्तः--जिनका आदि तथा अन्त है;उरुगाय--सभी साधु पुरुषों द्वारा महिमा-मण्डित होने वाले हे परमेश्वर; विदन्ति--समझतेहैं; हि--निस्सन्देह; त्वाम्‌--तुमको;एवम्‌--इस प्रकार; विमृश्य--विचार करके; सुधिय:--सारे बुद्धिमान पुरुष; विरमन्ति--रुक जाते हैं; शब्दात्‌--वेदों काअध्ययन करने या समझने से।

न तो प्रकृति के तीन गुण ( सतो, रजो तथा तमो ), न इन तीनों गुणों के नियामक अधिष्ठातादेव, न पाँच स्थूल तत्त्व, न मन, न देवता, न मनुष्य ही आपको समझ सकते हैं, क्योंकि ये सभीजन्म तथा संहार के वशीभूत रहते हैं।

ऐसा विचार करके आध्यात्मिक दृष्टि से प्रगत व्यक्ति भक्ति करने लगे हैं।

ऐसे बुद्धिमान व्यक्ति वैदिक अध्ययन की परवाह नहीं करते, निस्सन्देह वेव्यावहारिक भक्ति में अपने आपको लगाते हैं।

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तत्तेईत्तम नमः स्तुतिकर्मपूजा:कर्म स्मृतिश्चरणयो: श्रवणं कथायाम्‌ ।

संसेवया त्वयि विनेति षडड़या किभक्ति जन: परमहंसगतौ लभेत ॥

५०॥

तत्‌--अतएव; ते--तुम्हारा; अर्हत्‌-तम-हे सर्वश्रेष्ठ पूज्य; नम:--नमस्कार; स्तुति-कर्म-पूजा: --प्रार्थना तथा अन्य भक्ति कार्योसे भगवान्‌ की पूजा करना; कर्म--आपको समर्पित कर्म; स्मृति:ः--निरन्तर स्मरण; चरणयो: --चरणकमलों का; श्रवणम्‌--निरन्तर सुनना; कथायाम्‌--( आपकी ) कथाओं का; संसेवया--ऐसी भक्ति; त्वयि--तुम में; विना--रहित; इति--इस प्रकार;घट्‌-अड्डया--छह अंगों वाला; किमू-कैसे; भक्तिमू-- भक्ति को; जन:--व्यक्ति; परमहंस-गतौ--परम हंस द्वारा प्राप्त;लभेत--प्राप्त कर सकता है।

अतएव हे श्रेष्ठठम पूज्य भगवान्‌, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ, क्योंकि षडंग भक्तिकिये बिना परमहंस को प्राप्त होने वाला लाभ भला कौन प्राप्त कर सकता है?

षडंग भक्ति केअंग हैं-- प्रार्थना करना, समस्त कर्म फलों को भगवान्‌ को समर्पित करना, पूजा करना, आपकेनिमित्त कर्म करना, आपके चरणकमलों को सदैव स्मरण करना तथा आपके यश का श्रवणकरना।

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श्रीनारद उवाचएतावद्वर्णितगुणो भक्त्या भक्तेन निर्गुण: ।

प्रह्मादं प्रणतं प्रीतो यतमन्युरभाषत ॥

५१॥

श्री-नारदः उवाच-- श्री नारद ने कहा; एतावत्‌--यहाँ तक; वर्णित--वर्णन किया गया; गुण:--दिव्य गुण; भक्त्या--भक्ति से;भक्तेन--भक्त ( प्रह्नाद महाराज ) द्वारा; निर्गुण:--दिव्य भगवान्‌; प्रह्नदम्‌--प्रह्माद महाराज को; प्रणतम्‌-- भगवान्‌ केचरणकमलों की शरण में आया हुआ; प्रीत:--प्रसन्न होकर; यत-मन्यु:--क्रोध को वश में करके; अभाषत--इस प्रकार बोलनेलगे

महान्‌ ऋषि नारद ने कहा : इस प्रकार अपने भक्त प्रह्मद महाराज द्वारा दिव्य पद से प्रार्थनाकिये जाने पर भगवान्‌ नृसिंह देव शान्त हो गये।

उन्होंने अपना क्रोध त्याग दिया और दण्डवत्‌प्रणाम करने वाले प्रह्नाद पर अत्यधिक दयालु होने के कारण उनसे इस प्रकार बोले।

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श्रीभगवानुवाचप्रह्मद भद्र भद्रं ते प्रीतोहं तेडसुरोत्तम ।

वरं वृणीष्वाभिमतं कामपूरोस्म्यहं नृणाम्‌ ॥

५२॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; प्रह्मद--हे प्रह्माद; भद्र--तुम इतने सौम्य हो; भद्रमू-- कल्याण हो; ते--तुम्हारा;प्रीत:ः--प्रसन्न; अहम्‌--मैं ( हूँ ); ते--तुम्हारा; असुर-उत्तम--हे असुर वंश ( नास्तिकों ) में श्रेष्ठ भक्त; वरमू-- आशीर्वाद;वृणीष्व--( मुझसे ) माँग लो; अभिमतम्‌--वांछित; काम-पूर:--हर एक की इच्छा पूरी करने वाला; अस्मि--हूँ; अहम्‌--मैं;नृणाम्‌--सारे मनुष्यों का

श्री भगवान्‌ ने कहा : हे सौम्य प्रह्द, हे असुरोत्तम, तुम्हारा कल्याण हो।

मैं तुमसे अतिप्रसन्न हूँ।

मैं हर जीव की इच्छा पूर्ण करना मेरी लीला है; इसलिए तुम मुझसे कोई मनोवाड्छितवर माँग सकते हो।

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मामप्रीणत आयुष्मन्दर्शन॑ दुर्लभं हि मे ।

इष्टा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं तप्तुमहति ॥

५३॥

मामू--मुझको; अप्रीणतः--बिना प्रसन्न किये; आयुष्मन्‌--हे दीर्घजीवी प्रह्नाद; दर्शनम्‌--दर्शन; दुर्लभभ्‌ू--कभी -क भी; हि--निस्सन्देह; मे--मेरा; हृष्ठा--देख कर; माम्‌--मुझको; न--नहीं; पुन:--फिर; जन्तु:--जीव; आत्मानम्‌--अपने लिए;तप्तुमू--पछताने के लिए; अर्हति--पात्र है, योग्य है।

हे प्रह्मद, तुम दीर्घजीवी होओ, मुझे प्रसन्न किये बिना कोई न तो मुझे जान सकता है, न मेरेमहत्त्व को समझ सकता है, किन्तु जिसने मेरा दर्शन कर लिया है या मुझे प्रसन्न कर लिया है उसेअपनी तुष्टि के लिए पछताना नहीं पड़ता।

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प्रीणन्ति हाथ मां धीरा: सर्वभावेन साधव: ।

श्रेयस्कामा महाभाग सर्वासामाशिषां पतिम्‌ ॥

५४॥

प्रीणन्ति--प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं; हि--निस्सन्देह; अथ--इसके कारण; माम्‌--मुझको; धीरा:--जो गम्भीर तथाबुद्धिमान हैं; सर्व-भावेन--सभी प्रकार से, भक्ति के विभिन्न भावों से; साधव:--सदाचारी पुरुष ( सभी प्रकारसे पूर्ण ); श्रेयस्‌-कामाः--जीवन में श्रेष्ठ लाभ की इच्छा करने वाले; महा-भाग--हे परम भाग्यशाली; सर्वासामू--समस्त; आशिषाम्‌--आशीर्वादों के; पतिम्‌-स्वामी को ( मुझको )॥

हे प्रहाद, तुम अत्यन्त भाग्यशाली हो।

तुम मुझसे यह जान लो कि जो अत्यन्त चतुर तथाऊपर उठे हुए हैं, वे सभी विभिन्न भावों द्वारा मुझे प्रसन्न करने का प्रयत्न करते हैं, क्योंकि मैं हीऐसा व्यक्ति हूँ जो हर एक की सारी इच्छाओं को पूरा कर सकता हूँ।

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श्रीनारद उवाचएवं प्रलोभ्यमानोपि वरैलॉकप्रलोभनै: ।

एकान्तित्वाद्धगवति नैच्छत्तानसुरोत्तम: ॥

५५॥

श्री-नारदः उवाच--नारद मुनि ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; प्रलोभ्यमान:--लुभाया जाकर; अपि--यद्यपि; वरैः --आशीषों से;लोक--जगत को; प्रलोभनैः--विभिन्न प्रकार के लोभों से; एकान्तित्वात्‌-पूर्ण समर्पण करने के कारण; भगवति-- भगवान्‌में; न ऐच्छत्‌--नहीं चाहा; तानू--उन आशीर्वादों को; असुर-उत्तम:--असुरों के परिवार में श्रेष्ठ प्रह्मद महाराज ने |

नारद मुनि ने कहा : प्रह्मद महाराज भौतिक सुख की सदा कामना करने वाले असुरकुल केसर्वश्रेष्ठ पुरुष हैं।

यद्यपि भगवान्‌ ने उन्हें भौतिक सुख के लिए सभी वरदान दिए थे और वे उन्हेंप्रलोभन दे रहे थे फिर भी अपनी अनन्य कृष्ण-भक्ति के कारण उन्होंने इन्द्रिय-तृप्ति के लिएकोई भी भौतिक लाभ स्वीकार करना पसन्द नहीं किया।

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