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अध्याय सत्रह: सर्वोच्च भगवान अदिति के पुत्र बनने के लिए सहमत हुए
8.17श्रीशुक उबाचइत्युक्ता सादिती राजन्स्वभर््रां कश्यपेन वै |
अन्वतिष्ठद्व्रतमिदं द्वादशाहमतन्द्रिता ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्ता--कहे जाने पर; सा--उस; अदिति:--अदिति ने;राजनू--हे राजा; स्व-भर्त्रा--अपने पति; कश्यपेन--कश्यपमुनि से; बै--निस्सन्देह; अनु--इसी प्रकार से; अतिष्ठत्--सम्पन्नकिया; ब्रतम् इदम्--इस पयोत्रत को; द्वादश-अहम्--बारह दिनों तक; अतन्द्रिता--बिना आलस्य के |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा! इस प्रकार अपने पति कश्यपमुनि से दिए जाने परअदिति ने बिना आलस्य के उनके आदेशों का हढ़ता से पालन किया और पयोब्रत अनुष्ठानसम्पन्न किया |
चिन्तयन्त्येकया बुद्धया महापुरुषमी श्वरम् |
प्रगृह्मोन्द्रियदुष्टा श्रान्मनसा बुद्धिसारधि: ॥
२॥
मनश्लैकाग्रया बुद्धया भगवत्यखिलात्मनि |
वबासुदेवे समाधाय चचार ह पयोत्रतम् ॥
३॥
चिन्तयन्ति--निरन्तर चिन्तन करते हुए; एकया--एकचित्त होकर; बुद्धबया--तथा बुद्धि से; महा-पुरुषम्-- भगवान् को;ईश्वरम्--परमनियन्ता भगवान् विष्णु को; प्रगृह्य--पूर्णतया वश में करके; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; दुष्ट--शक्तिशाली; अश्वान्--घोड़ोंको; मनसा--मन द्वारा; बुद्धि-सारथि:--रथ को हाँकने वाली बुद्धि की सहायता से; मनः--मन; च-- भी; एक-अग्रया--एकाग्र होकर; बुद्धया--बुद्धि से; भगवति-- भगवान् को; अखिल-आत्मनि--सभी जीवों के परमात्मा को; वासुदेवे-- भगवान्वासुदेव को; समाधाय--पूर्ण मनोयोग से; चचार--सम्पन्न किया; ह--इस प्रकार; पय:-ब्रतम्--पयोत्रत नामक अनुष्ठान को
अदिति ने पूर्ण अचल ध्यान से भगवान् का चिन्तन किया और इस तरह उन्होंने शक्तिशालीघोड़ों जैसे अपने मन तथा इन्द्रियों को पूरी तरह अपने वश में कर लिया |
उन्होंने अपने मन कोभगवान् वासुदेव पर केन्द्रित कर दिया और इस तरह पयोत्रत नामक अनुष्ठान पूरा किया |
तस्याः प्रादुरभूत्तात भगवानादिपुरुष: |
पीतवासाश्चतुर्बाहु: शद्डुचक्रगदाधर: ॥
४॥
तस्या:--उसके सामने; प्रादुरभूत्ू--प्रकट हुए; तात--हे राजा; भगवान्-- भगवान्; आदि-पुरुष:--आदि पुरुष; पीत-वासा:--पीताम्बर धारण किये; चतु:-बाहु:--चार भुजाओं वाले; शद्भु-चक्र-गदा-धर:--शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किये
है राजा! तब अदिति के समक्ष आदि भगवान् पीताम्बर वस्त्र पहने तथा अपने चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण किए हुए प्रकट हुए |
त॑ नेत्रगोचरं वीक्ष्य सहसोत्थाय सादरम् |
ननाम भुवि कायेन दण्डवत्प्रीतिविहला ॥
५॥
तम्--उसको ( भगवान् को ); नेत्र-गोचरम्--उसकी आँखों द्वारा दिखने वाले; वीक्ष्य--देखकर; सहसा--एकाएक; उत्थाय--उठकर; स-आदरमू--अत्यन्त आदर पूर्वक; ननाम--सादर नमस्कार किया; भुवि-- भूमि पर; कायेन--पूरे शरीर से; दण्ड-बत्--डंडे के समान गिरते हुए; प्रीति-विहला--दिव्य आनन्द के कारण अत्यन्त विहल |
जब अदिति की आँखों से भगवान् दिखने लगे तो दिव्य आनन्द के कारण वे इतनी विभोरहो उठीं कि वह तुरन्त ही उठकर भगवान् को सादर नमस्कार करने के लिए भूमि पर दण्ड केसमान गिर गईं |
सोत्थाय बद्धाञ्जलिरीडितुं स्थितानोत्सेह आनन्दजलाकुलेक्षणा |
बभूव तृूष्णीं पुलकाकुलाकृति-स्तदर्शनात्युत्सवगात्रवेपथु; ॥
६॥
सा--वह; उत्थाय--उठकर; बद्ध-अज्जलि: --हाथ जोड़े; ईंडितुमू-- भगवान् की पूजा करने के लिए; स्थिता--स्थित; नउत्सेहे-- प्रयतत नहीं कर सकी; आनन्द--दिव्य आनन्द से; जल--जल से; आकुल-ईक्षणा--पूरित आँखों से; बभूव--हो गई;तृष्णीमू--मौन; पुलक--रोमांच; आकुल--विहल; आकृति: --उसका रूप; तत्-दर्शन--भगवान् के दर्शन करने से; अति-उत्सव--अत्यन्त हर्ष से; गात्र--उसका शरीर; वेपथु;--काँपने लगा |
भगवान् की स्तुति करने में असमर्थ होने के कारण अदिति हाथ जोड़े मौन खड़ी रहीं |
दिव्यआनन्द के कारण उनकी आँखों में आँसू भर आये और उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये |
चूँकिवे भगवान् को अपने समक्ष देख रही थीं अतएव वे आह्वादित हो उठीं और उनका शरीर काँपनेलगा |
प्रीत्या शनेर्गद्गदया गिरा हरिंतुष्टाव सा देव्यदितिः कुरूद्बरह |
उद्वीक्षती सा पिबतीव चक्षुषारमापतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ॥
७॥
प्रीत्या--प्रेम के कारण; शनैः--पुनः-पुन:; गदगदया--थरथराती हुईं; गिरा--वाणी से; हरिम्ू-- भगवान् को; तुष्टाव--तुष्ट;सा--वह; देवी--देवी; अदिति:--अदिति; कुरु-उद्दद--हे महाराज परीक्षित; उद्ीक्षती--टकटकी लगाये हुए; सा--वह; पिबती इब--मानो पी रही हो; चक्षुषा--आँखों से; रमा-पतिमू--लक्ष्मी के पति, भगवान् को; यज्ञ-पतिम्--समस्त यज्ञों केभोक्ता भगवान् को; जगतू-पतिम्--सारे विश्व के प्रभु तथा स्वामी को |
हे महाराज परीक्षित! तब देवी अदिति ने थरथराती हुई वाणी से अत्यन्त प्रेमपूर्वक भगवान्की स्तुति प्रारम्भ की |
ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वे लक्ष्मीपति, समस्त यज्ञों के भोक्ता तथासमग्र विश्व के प्रभु तथा स्वामी भगवान् को अपनी आँखों से पिये जा रही हों |
श्रीअदितिरुवाचयज्ञेश यज्ञपुरुषाच्युत तीर्थपादतीर्थश्रव: श्रवणमड़लनामधेय |
आपन्नलोकवृजिनोपशमोदयाद्यशं नः कृधीश भगवन्नसि दीननाथ: ॥
८॥
श्री-अदिति: उवाच--देवी अदिति ने कहा; यज्ञ-ईश--हे समस्त यज्ञों के नियन्ता; यज्ञ-पुरुष--सारे यज्ञों के लाभों का भोगकरने वाला पुरुष; अच्युत--कभी न चूकने वाला; तीर्थ-पाद--जिनके चरणकमलों पर सारे पवित्र तीर्थस्थान स्थित हैं; तीर्थ-श्रव:--समस्त सन्त पुरुषों के परम आश्रय के रूप में प्रसिद्ध; श्रवण--जिनके विषय में सुनना; मड़ल--शुभ है; नामधेय--उनके नाम का उच्चारण करना भी शुभ है; आपन्न--शरणागत; लोक--लोगों का; वृजिन--घातक भौतिक स्थिति; उपशम--कम करते हुए; उदय--प्रकट हुआ है; आद्य--आदि भगवान्; शम्--कल्याण; नः--हमारा; कृधि--कृपया हमें प्रदान करें;ईश--हे परमनियन्ता; भगवन्--हे भगवान्; असि--तुम हो; दीन-नाथ:--दीनों के एकमात्र आश्रय |
देवी अदिति ने कहा : हे समस्त यज्ञों के भोक्ता तथा स्वामी, हे अच्युत तथा परम प्रसिद्धपुरुष, जिनका नाम लेते ही मंगल का प्रसार होता है, हे आदि भगवान्, परमनियन्ता, समस्तपवित्र तीर्थस्थानों के आश्रय! आप समस्त दीन-दुखियों के आश्रय हैं और उनका कष्ट कम करनेके लिए प्रकट हुए हैं |
आप हम पर कृपालु हों और हमारे कल्याण का विस्तार करें |
विश्वाय विश्वभवनस्थितिसंयमायस्वैरं गृहीतपुरुशक्तिगुणाय भूम्ने |
स्वस्थाय शश्चदुपबूंहितपूर्णबोध-व्यापादितात्मतमसे हरये नमस्ते ॥
९॥
विश्वाय--समस्त विश्वरूप भगवान् को; विश्व--विश्व के; भवन--सृजन; स्थिति--पालन; संयमाय--तथा संहार के लिए;स्वैरम्-पूर्णतः स्वतंत्र; गृहीत--हाथ में लेकर; पुरु--पूर्णत:; शक्ति-गुणाय--प्रकृति के तीनों गुणों को वश में रखने वाले;भूम्ते--महानतम; स्व-स्थाय--सदा आदि रूप में स्थित रहने वाले; शश्वत्--सनातन रूप से; उपबूंहित--प्राप्त किया; पूर्ण --सम्पूर्ण; बोध--ज्ञान; व्यापादित--पूर्णतया विनष्ट; आत्म-तमसे--आपकी माया; हरये--परमेश्वर; नमः ते--आपको सादरनमस्कार करता हूँ |
हे प्रभु! आप सर्वव्यापी विश्वरूप इस विश्व के परम स्वतंत्र स्त्रष्टा, पालक तथा संहारक हैं |
यद्यपि आप अपनी शक्ति को पदार्थ में लगाते हैं, तो भी आप सदैव अपने आदि रूप में स्थितरहते हैं और कभी उस पद से च्युत नहीं होते क्योंकि आपका ज्ञान अच्युत है और किसी भीस्थिति के लिए सदैव उपयुक्त है |
आप कभी मोहग्रस्त नहीं होते |
हे स्वामी! मैं आपको सादरनमस्कार करती हूँ |
आयु: पर वपुरभीष्टमतुल्यलक्ष्मी-होभूरसा: सकलयोगगुणास्त्रिवर्ग: |
ज्ञानं च केवलमनन्त भवन्ति तुष्टात्त्वत्तो नृणां किमु सपत्नजयादिराशी: ॥
१०॥
आयु:--आयु; परमू--ब्रह्मा के समान दीर्घ; वपु:ः--विशेष प्रकार का शरीर; अभीष्टम्--जीवन लक्ष्य; अतुल्य-लक्ष्मी:--जगतमें अद्वितीय ऐश्वर्य; द्यो--स्वर्गलोक; भू-- भूलोक; रसा:--अधोलोक; सकल--सभी प्रकार के; योग-गुणा:--आठ यौगिकसिद्ध्ियाँ; ब्रि-वर्ग:--धर्म, अर्थ तथा काम; ज्ञानम्--ज्ञान; च--तथा; केवलम्--पूर्ण; अनन्त--हे अनन्त; भवन्ति--सम्भव बनजाते हैं; तुष्ठात्-- आपकी तुष्टि से; त्वत्त:--आपसे; नृणाम्--सभी जीवों को; किम् उ--क्या कहा जाये; सपत्न--शत्रु; जय--जीत; आदि: --इत्यादि; आशी:--ऐसे आशीष या वर |
हे अनन्त! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मनुष्य को ब्रह्मा जैसी दीर्घायु, उच्च, मध्य या निम्नलोक मेंशरीर, असीम भौतिक ऐश्वर्य, धर्म, अर्थ तथा इन्द्रियतोष, पूर्ण दिव्यज्ञान तथा आठों योगसिद्ध्रियाँबड़ी आसानी से प्राप्त हो सकती हैं |
अपने प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त करने की बात करना तोअत्यन्त नगण्य उपलब्धि है |
श्रीशुक उबाचअदित्यैवं स्तुतो राजन्भगवान्पुष्करेक्षण: |
क्षेत्रज्ञ: सर्वभूतानामिति होवाच भारत ॥
११॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अदित्या--अदिति द्वारा; एवम्ू--इस प्रकार; स्तुतः--स्तुति किये जाने पर;राजन्--हे राजा ( महाराज परीक्षित ); भगवान्-- भगवान् ने; पुष्कर-ईक्षण:--कमल जैसे नेत्रों वाले; क्षेत्र-ज्ञः--परमात्मा;सर्व-भूतानाम्--सभी जीवों के; इति--इस प्रकार; ह--निस्सन्देह; उबाच--उत्तर दिया; भारत--हे भरतवंश में श्रेष्ठ |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे भरतवंश में श्रेष्ठ, राजा परीक्षित! जब अदिति ने सभी जीवोंके परमात्मा कमलनयन की इस तरह पूजा की तो भगवान् ने इस प्रकार उत्तर दिया |
श्रीभगवानुवाचदेवमातर्भवत्या मे विज्ञातं चिरकाडक्षितम् |
यत्सपत्नैईतश्रीणां च्यावितानां स्वधामत: ॥
१२॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; देव-मातः--हे देवताओं की माता; भवत्या: --तुम्हारा; मे--मेरे द्वारा; विज्ञातम्--समझागया; चिर-काड्क्षितम्--दीर्घकाल से तुम्हें जिसकी अभिलाषा थी; यत्--क्योंकि; सपत्नैः --प्रतिद्वन्द्रियों द्वारा; हत-श्रीणाम्--समस्त ऐश्वर्य से विहीन तुम्हारे पुत्रों का; च्यावितानामू--विमुख; स्व-धामत:--अपने-अपने आवासों से |
भगवान् ने कहा : हे देवताओं की माता! मैं तुम्हारी उस दीर्घकालीन अभिलाषा को पहले हीसमझ गया हूँ जो तुम्हारे उन पुत्रों के कल्याण के विषय में है, जो शत्रुओं द्वारा अपने समस्तऐश्वर्य से च्युत कर दिये गये हैं और अपने-अपने घरों से खदेड़ दिये गये हैं |
तान्विनिर्जित्य समरे दुर्मदानसुरर्षभान् |
प्रतिलब्धजयश्रीभि: पुत्रैरिच्छस्युपासितुम् ॥
१३॥
तान्ू--उनको; विनिर्जित्य--हराकर; समरे--युद्ध में; दुर्मदान्ू--बल के कारण गर्वित; असुर-ऋषभान्--असुरों के नेताओं को;प्रतिलब्ध--पुनः प्राप्त करके ; जय--विजय; श्रीभि:--ऐ श्वर्य सहित; पुत्रैः--अपने पुत्रों सहित; इच्छसि--तुम चाहती हो;उपासितुमू--उनके साथ मिल कर मेरी पूजा करना |
हे देवी! मैं समझ रहा हूँ कि तुम अपने पुत्रों को पुनः प्राप्त करके, शत्रुओं को युद्धभूमि मेंपराजित करके तथा अपना धाम तथा ऐश्वर्य पुन: प्राप्त करके उन सब के साथ मिलकर मेरी पूजाकरना चाहती हो |
इन्द्रज्ये्ठे: स्वतनयैहतानां युधि विद्विषाम् |
स्त्रियो रुदन्तीरासाद्य द्रष्टमिच्छसि दु:खिता: ॥
१४॥
इन्द्र-ज्येष्ठे: --जिन व्यक्तियों में इन्द्र सबसे बड़ा है; स्व-तनयै: --अपने पुत्रों द्वारा; हतानाम्ू--जो मारे जा चुके हैं; युधि--युद्ध में;विद्विषाम्-शत्रुओं की; स्त्रियः--पत्नियाँ; रुदनन््ती:--विलाप करती; आसाद्य--अपने-अपने पतियों के शवों के निकट आकर;द्रष्टमू इच्छसि--देखना चाहती हो; दु:खिता: --अत्यन्त दुखित |
तुम अपने पुत्रों के शत्रु उन असुरों की पत्नियों को अपने-अपने पतियों की मृत्यु पर विलापकरते हुए देखना चाहती हो जब वे इन्द्रादि देवताओं द्वारा युद्ध में मारे जाएँ |
आत्मजान्सुसमृद्धांस्त्वं प्रत्याहतयश:भथ्रियः |
नाकपृष्ठमधिष्ठाय क्रीडतो द्रष्टमच्छसि ॥
१५॥
आत्म-जान्--अपने पुत्रों को; सु-समृद्धानू--अत्यन्त ऐश्वर्यवान्; त्वमू-तुम; प्रत्याहत--वापस पाकर; यश:--यश; थिय:--ऐश्वर्य; नाक-पृष्ठम्-स्वर्गलोक में; अधिष्ठाय--स्थित; क्रीडत:ः--विलास करते; द्रष्टभू--देखने के लिए; इच्छसि--इच्छा करतीहो
तुम चाहती हो कि तुम्हारे पुत्र खोया हुआ यश तथा ऐश्वर्य प्राप्त करें और पुनः पूर्ववत् अपनेस्वर्गलोक में निवास करें |
प्रायोधुना तेडसुरयूथनाथाअपारणीया इति देवि मे मतिः |
चत्तेनुकूले श्वरविप्रगुप्तान विक्रमस्तत्र सुखं ददाति ॥
१६॥
प्राय:--लगभग; अधुना--इस समय; ते--वे सभी; असुर-यूथ-नाथा: --असुरों के प्रधान; अपारणीया:--अजेय; इति--इसप्रकार; देवि--हे माता अदिति; मे--मेरी; मति: --सम्मति; यत्--क्योंकि; ते--सारे असुर; अनुकूल-ई श्वर-विप्र-गुप्ता: --ब्राह्मणों द्वारा सुरक्षित, जिनकी कृपा से ईश्वर सदैव उपस्थित रहते हैं; न--नहीं; विक्रम: --शक्ति का उपयोग; तत्र--वहाँ;सुखम्--सुख; ददाति--दे सकता है
हे देवताओं की माता! मेरे विचार से असुरों के सारे प्रधान अब अजेय हैं क्योंकि वे उनब्राह्मणों द्वारा सुरक्षित हैं जिन पर भगवान् की सदैव कृपा रहती है |
अतएव उनके विरुद्ध बल-प्रयोग अब सुख का स्त्रोत नहीं बन सकता |
अथाप्युपायो मम देवि चिन्त्यःसनन््तोषितस्य ब्रतचर्यया ते |
ममार्चन॑ नाईति गन्तुमन्यथाश्रद्धानुरूपं फलहेतुकत्वात् ॥
१७॥
अथ--अतएव; अपि--ऐसी स्थिति के बावजूद; उपाय:--कोई साधन; मम--मेरा; देवि--हे देवी; चिन्त्य:--सोचा जानाचाहिए; सन्तोषितस्य--अत्यन्त प्रसन्न; ब्रत-चर्यया--त्रत रखकर; ते--तुम्हारे द्वारा; मम अर्चनम्--मेरी पूजा करना; न--कभीनहीं; अरहति--योग्य है; गन्तुम् अन्यधा--और व्यर्थ होने के लिए; श्रद्धा-अनुरूपम्--अपनी श्रद्धा तथा भक्ति के अनुसार;'फल--फल; हेतुकत्वात्--कारण होने से |
हे देवी अदिति! फिर भी चाँकि मैं तुम्हारे ब्रत-कार्य से प्रसन्न हुआ हूँ अतएव मुझे तुम परकृपा करने के लिए कोई न कोई साधन खोजना होगा क्योंकि मेरी पूजा कभी भी व्यर्थ नहींजाती, प्रत्युत पात्रता के अनुरूप वाँछित फल देने वाली होती है |
त्वयार्चितश्चाहमपत्यगुप्तयेपयोक्रतेनानुगुणं समीडितः |
स्वांशेन पुत्रत्वमुपेत्य ते सुतान्गोप्तास्मि मारीचतपस्यधिष्ठित: ॥
१८ ॥
त्वया--तुम्हारे द्वारा; अर्चित:--पूजित होकर; च-- भी; अहम्--मैं; अपत्य-गुप्तये--तुम्हारे पुत्रों की सुरक्षा करते हुए; पयः-ब्रतेन--पयोव्रत द्वारा; अनुगुणम्--जहाँ तक सम्भव है; समीडित:--ठीक से पूजित; स्व-अंशेन-- अपने पूर्ण अंश द्वारा;पुत्रत्वम्--तुम्हारा पुत्र बनकर; उपेत्य--इस अवसर का लाभ उठाकर; ते सुतान्--तुम्हारे अन्य पुत्रों को; गोप्ता अस्मि--सुरक्षाप्रदान करूँगा; मारीच--कश्यपमुनि की; तपसि--तपस्या में; अधिष्ठित:--स्थित |
तुमने अपने पुत्रों की रक्षा के लिए मेरी स्तुति की है और महान् पयोत्रत रखकर मेरी समुचितपूजा की है |
मैं कश्यपमुनि की तपस्या के कारण तुम्हारा पुत्र बनना स्वीकार करूँगा और इसप्रकार तुम्हारे अन्य पुत्रों की रक्षा करूँगा |
उपधाव पतिं भद्दे प्रजापतिमकल्मषम् |
मां च भावयती पत्यावेवं रूपमवस्थितम् ॥
१९॥
उपधाव--जाकर पूजा करो; पतिम्--अपने पति की; भद्वे--हे भद्ग स्त्री; प्रजापतिम्ू--जो प्रजापति है; अकल्मषम्--जो अपनीतपस्या के कारण अत्यधिक शुद्ध बन गया है; माम्ू--मुझको; च-- भी; भाववती--मनन करती हुईं; पत्यौ--अपने पति में;एवम्--इस प्रकार; रूपम्--रूप; अवस्थितम्--वहाँ पर स्थित
तुम अपने पति कश्यप के शरीर के भीतर सदैव मुझे स्थित मानकर उनकी पूजा करोक्योंकि वे अपनी तपस्या से शुद्ध हो चुके हैं |
नैतत्परस्मा आख्येयं पृष्टयापि कथञ्ञन |
सर्व सम्पद्यते देवि देवगुह् सुसंवृतम् ॥
२०॥
न--नहीं; एतत्--यह; परस्मै--बाहरी लोगों को; आख्येयम्--प्रकट किया जाये; पृष्टया अपि--पूछे जाने पर भी; कथञ्लन--किसी के द्वारा; सर्वम्ू--सब कुछ; सम्पद्यते--सफल होता है; देवि--हे नारी; देव-गुह्ाम्--देवताओं के लिए भी गोपनीय; सु-संवृतम्-- भलीभाँति गुप्त रखा गया |
हे नारी! यदि कोई पूछे तो भी तुम्हें यह बात किसी को प्रकट नहीं करनी चाहिए |
यदि परमगोपनीय बात को गुप्त रखा जाता है, तो वह सफल होती है |
श्रीशुक उबाचएतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत |
अदितिर्दुर्लभं लब्ध्वा हरे्जन्मात्मनि प्रभो: |
उपाधावत्पतिं भक्त्या परया कृतकृत्यवत् ॥
२१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एतावत्--इस तरह; उक्त्वा--उससे कहकर; भगवानू-- भगवान्; तत्र एब--उसी स्थान में; अन्तः-अधीयत--अन्तर्धान हो गये; अदिति:--अदिति; दुर्लभम्--अत्यन्त दुर्लभ सफलता; लब्ध्वा--पाकर;हरेः--भगवान् का; जन्म--जन्म; आत्मनि--अपने में; प्रभो: -- भगवान् का; उपाधावत्--तुरन्त गई; पतिम्--अपने पति केपास; भकत्या--भक्तिपूर्वक; परया--महान्; कृत-कृत्य-वत्-- अपने को अत्यन्त सफल मानती हुईं |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ऐसा कहकर भगवान् उस स्थान से अदृश्य हो गये |
भगवान् सेयह परम मूल्यवान आशीर्वाद पाकर कि वे उसके पुत्र रूप में प्रकट होंगे, अदिति ने अपने कोअत्यन्त सफल माना और वह अत्यन्त भक्तिपूर्वक अपने पति के पास गई |
स वै समाधियोगेन कश्यपस्तदबुध्यत |
प्रविष्टमात्मनि हरेरंशं हावितथेक्षण: ॥
२२॥
सः--वह; वै--निस्सन्देह; समाधि-योगेन-- ध्यान द्वारा; कश्यप:--कश्यपमुनि ने; तत्ू--तब; अबुध्यत--समझ सके;प्रविष्टम्[-- प्रवेश कर गया है; आत्मनि--अपने भीतर; हरेः-- भगवान् का; अंशम्-- अंश; हि--निस्सन्देह; अवितथ-ईक्षण: --जिसकी दृष्टि कभी धोखा नहीं खाती |
ध्यान समाधि में स्थित होने के कारण अचूक दृष्टि वाले कश्यपमुनि यह देख सके कि उनकेभीतर भगवान् का स्वांश प्रविष्ट कर गया है |
सोडदित्यां वीर्यमाधत्त तपसा चिरसम्भृतम् |
समाहितमना राजन्दारुण्यग्नि यथानिल: ॥
२३॥
सः--कश्यप ने; अदित्याम्--अदिति के भीतर; वीर्यम्--वीर्य; आधत्त--रख दिया; तपसा--तपस्या द्वारा; चिर-सम्भूतम्--दीर्घकाल तक कई वर्षो से रुका हुआ; समाहित-मना: --भगवान् पर पूर्णतया समाधि लगाये; राजन्--हे राजा; दारुणि--काठमें; अग्निमू-- अग्नि; यथा--जिस तरह; अनिल: --वायु
हे राजा! जिस तरह वायु काठ के दो टुकड़ों के बीच घर्षण को तेज करती है और अग्निउत्पन्न कर देती है उसी तरह भगवान् में पूर्णतया ध्यानमग्न कश्यपमुनि ने अपने वीर्य को अदितिकी कुक्षि में स्थानान््तरित कर दिया |
अदितेर्थिष्ठितं गर्भ भगवन्तं सनातनम् |
हिरण्यगर्भो विज्ञाय समीडे गुह्मनामभि: ॥
२४॥
अदितेः--अदिति के गर्भ में; धिष्ठितम्--स्थापित होकर; गर्भम्-गर्भ; भगवन्तम्-- भगवान् को; सनातनम्--सनातन;हिरण्यगर्भ: --ब्रह्माजी ने; विज्ञाय--यह जानकर; समीडे --स्तुति की; गुह्म-नामभि:--दिव्य नामों के साथ |
जब ब्रह्माजी को यह ज्ञात हो गया कि भगवान् अदिति के गर्भ में हैं, तो वे दिव्य नामों कापाठ करके भगवान् की स्तुति करने लगे |
श्रीब्रह्मोवाचजयोरूगाय भगवलन्नुरुक्रम नमोस्तु ते |
नमो ब्रह्मण्यदेवाय त्रिगुणाय नमो नमः: ॥
२५॥
श्री-ब्रह्मा उवाच--ब्रह्माजी ने स्तुति की; जय--जय हो; उरुगाय--जिनकी महिमा का निरन्तर गान होता है ऐसे भगवान् की;भगवनू--हे भगवान्; उरुक्रम--जिनके कार्यकलाप अत्यन्त यशस्वी हैं; नमः अस्तु ते--मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ;नमः--मेरा सादर नमस्कार; ब्रह्मण्य-देवाय--योगियों के भगवान् को; त्रि-गुणाय--प्रकृति के तीनों गुणों के नियन्ता; नमःनमः--पुनः-पुनः नमस्कार करता हूँ |
ब्रह्मजी ने कहा : हे भगवान्! आपकी जय हो |
आप सब के द्वारा महिमान्वित हैं औरआपके कार्यकलाप असामान्य होते हैं |
हे योगियों के प्रभु, हे प्रकृति के तीनों गुणों के नियन्ता!मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ |
मैं आपको पुनः-पुनः नमस्कार करता हूँ |
नमस्ते पृश्टनगर्भाय वेदगर्भाय वेधसे |
त्रिनाभाय त्रिपृष्ठाय शिपिविष्टाय विष्णवे ॥
२६॥
नमः ते--मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ; पृश्नि-गर्भाय--पृश्नि ( पूर्व जन्म में अदिति ) के गर्भ में वास करने वाले को;वेद-गर्भाय--सदैव वैदिक ज्ञान में निवास करने वाले को; वेधसे--ज्ञान से पूर्ण हैं, जो; त्रि-नाभाय--उन्हें जिनकी नाभि सेनिकले कमलदण्ड के भीतर तीनों लोक निवास करते हैं; त्रि-पृष्ठाय--जो तीनों लोकों से परे हैं; शिपि-विष्टाय--समस्त जीवोंके हृदयों में वास करने वाले को; विष्णवे--सर्वव्यापी भगवान् को
हे सर्वव्यापी भगवान् विष्णु! मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ क्योंकि आप समस्त जीवोंके हृदयों के भीतर स्थित हैं |
तीनों लोक आपकी नाभि के भीतर निवास करते हैं, फिर भी आपइन तीनों लोकों से परे हैं |
पहले आप पृष्टिन के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे |
मैं उन परम स्त्रष्टा कोसादर नमस्कार करता हूँ जिन्हें केवल वैदिक ज्ञान के द्वारा ही जाना जा सकता है |
त्वमादिरन्तो भुवनस्य मध्यम्अनन्तशक्ति पुरुष यमाहु: |
'कालो भवानाक्षिपतीश विश्वस्त्रोतो यथान्तः पतितं गभीरम् ॥
२७॥
त्वमू-- आप; आदि: मूल कारण; अन्त:-- प्रलय के कारण भुवनस्य--ब्रह्माण्ड के मध्यम्-- इस जगत का पालन; अनन्त-शक्तिमू--असीम शक्ति के आगार; पुरुषम्-परम पुरुष को; यमू--जिसको; आहु:--कहते हैं; काल:--शाश्रत काल;भवान्ू--आप; आक्षिपति--आकर्षित करते हुए; ईश--परमेश्वर; विश्वम्--सारे ब्रह्माण्ड को; सत्रोत:--लहरें; यथा--जिस तरह;अन्तः पतितम्--जल के भीतर गिरी हुई; गभीरम्--अत्यन्त गहरे
हे प्रभु! आप तीनों लोकों के आदि, मध्य तथा अन्त हैं और वेदों में आप असीम शक्तियों के आगार परम पुरुष के रूप में विख्यात हैं |
हे स्वामी! जिस प्रकार लहरें गहरे जल में गिरी हुईटहनियों तथा पत्तियों को खींच लेती हैं उसी प्रकार परम शाश्वत काल रूप आप इस ब्रह्माण्ड कीप्रत्येक वस्तु को खींचते हैं |
त्वं वै प्रजानां स्थिरजड्रमानांप्रजापतीनामसि सम्भविष्णु: |
दिवौकसां देव दिवश्च्युतानांपरायणं नौरिव मज्जतोप्सु ॥
२८॥
त्वमू--आप; वै--निस्सन्देह; प्रजानामू--सारे जीवों के; स्थिर-जड्रमानामू--अचल अथवा चल; प्रजापतीनाम्ू--सारेप्रजापतियों के; असि--हो; सम्भविष्णु:--हर एक के जनक; दिव-ओकसाम्--उच्चलोक के निवासियों के; देव--हे परमेश्वर;दिव: च्युतानामू--अपने आवासों से नीचे गिरे हुए देवताओं के; परायणम्--परम आश्रय; नौ:--नाव; इब--सहृश; मज्जत:--डूबने वाले के; अप्सु--जल में
हे प्रभ! आप समस्त चर या अचर जीवों के आदि जनक हैं और आप प्रजापतियों के भीजनक हैं |
हे स्वामी! जिस प्रकार जल में डूबते हुए व्यक्ति के लिए नाव ही एकमात्र सहारा होतीहै उसी तरह आप इस समय अपने स्वर्ग-पद से च्युत देवताओं के एकमात्र आश्रय हैं |
