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अध्याय चार: गजेंद्र की आध्यात्मिक दुनिया में वापसी
8.4श्रीशुक उबाचतदा देवर्षिगन्धर्वा ब्रहोशानपुरोगमा: |
मुमुचुः कुसुमासारंशंसन्तः कर्म तद्धरे: ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तदा--उस अवसर पर ( जब गजेन्द्र का उद्धार हो गया ); देव-ऋषि-गन्धर्वा:--देवता, ऋषि तथा गन्धर्व; ब्रह्म-ईशान-पुरोगमा:--ब्रह्मा तथा शिवजी इत्यादि ने; मुमुचु:--वर्षा की; कुसुम-आसारम्--फूलों का आवरण; शंसन्त:--प्रशंसा करते हुए; कर्म--दिव्य कर्म; तत्ू--उस ( गजेन्द्र मोक्षण ); हरेः-- भगवान्का
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् ने गजेन्द्र का उद्धार कर दिया तो सारे ऋषियों,गन्धर्वों तथा ब्रह्मा, शिव इत्यादि देवताओं ने भगवान् के इस कार्य की प्रशंसा की और भगवान्तथा गजेन्द्र दोनों के ऊपर पुष्पवर्षा की |
नेदुर्दुन्दुभयो दिव्या गन्धर्वा ननृतुर्जगु: |
ऋषयश्चारणा: सिद्धास्तुष्ठवु: पुरुषोत्तमम् ॥
२॥
नेदु:--बजने लगीं; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ; दिव्या:--स्वर्ग लोक के आकाश में; गन्धर्वा:--गन्धर्व लोक के वासी; ननृतु:--नाचने लगे; जगुः--तथा गाने लगे; ऋषय: --सारे ऋषि; चारणा: --चारण लोक के निवासी; सिद्धा:--सिद्ध लोक के वासियोंने; तुष्ठवुः--स्तुति की; पुरुष-उत्तमम्--पुरुषोत्तम भगवान् की |
स्वर्ग लोक में दुन्दुभियाँ बजने लगीं, गन्धर्वलोक के वासी नाचने और गाने लगे तथा महान्ऋषियों और चारणलोक एवं सिद्धलोक के निवासियों ने भगवान् पुरुषोत्तम की स्तुतियाँ कीं |
योउसौ ग्राह: स वै सद्यः परमाश्चर्यरूपधृक् |
मुक्तो देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तम: ॥
३॥
प्रणम्य शिरसाधीशमुत्तमशलोकमव्ययम् |
अगायत यशोधाम कीर्तन्यगुणसत्कथम् ॥
४॥
यः--जो; असौ--वह; ग्राह:--घड़ियाल बन गया; सः--वह; बै--निस्सन्देह; सद्यः--तुरन््त; परम--अत्यन्त सुन्दर; आश्चर्य --अदभुत; रूप-धृक्--रूप धारण किये ( अपने मूल गन्धर्व रूप को ); मुक्त:--मुक्त हो गया; देवल-शापेन--देवल ऋषि केशाप से; हूहू: --हूहू नामक; गन्धर्व-सत्तम:--गयन्धर्वो में श्रेष्ठ; प्रणम्य--प्रणाम करके; शिरसा--सिर के बल; अधीशम्--परमप्रभु को; उत्तम-एलोकम्-- श्रेष्ठ श्लोकों द्वारा पूजा किया जाने वाला; अव्ययम्--नित्य; अगायत--उच्चारण करने लगा; यशः-धाम--भगवान् की महिमा; कीर्तन्य-गुण-सत्-कथम्--जिसकी दिव्य लीलाएँ तथा गुण यशस्वी हैं |
गन्धर्बों में श्रेष्ठ राजा हूहू देवल मुनि द्वारा शापित होने के बाद घड़ियाल बन गया था |
अबभगवान् द्वारा उद्धार किये जाने पर उसने एक सुन्दर गन्धर्व का रूप धारण कर लिया |
यहसमझकर कि यह सब किसकी कृपा से सम्भव हो सका, उसने तुरन्त सिर के बल प्रणाम कियाऔर श्रेष्ठ एलोकों से पूजित होने वाले परम नित्य भगवान् के लिए उपयुक्त स्तुतियाँ कीं |
सो<नुकम्पित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम् |
लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्तकिल्बिष: ॥
५॥
सः--वह ( राजा हूहू ); अनुकम्पित:--कृपा पात्र बनकर; ईशेन-- भगवान् द्वारा; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; प्रणम्य--प्रणामकरके; तम्--उसको; लोकस्य--सारे देवताओं तथा मनुष्यों के; पश्यत:--देखते-देखते; लोकम्--लोक को; स्वम्--अपने;अगात्--वापस चला गया; मुक्त--मुक्त होकर; किल्बिष:--अपने पापों के फलों से |
भगवान् की अहैतुकी कृपा से अपने पूर्व रूप को पाकर राजा हूहू ने भगवान् की प्रदक्षिणाकी और उन्हें नमस्कार किया |
तब ब्रह्मा इत्यादि समस्त देवताओं की उपस्थिति में वह गन्धर्वलोक लौट गया |
वह सारे पापफलों से मुक्त हो चुका था |
गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद्विमुक्तोउज्ञानबन्धनात् |
प्राप्तो भगवतो रूप॑ पीतवासाश्चतुर्भुजः ॥
६॥
गजेन्द्र:--हाथियों का राजा गजेन्द्र; भगवत्ू-स्पर्शात्- भगवान् के हाथों का स्पर्श पाने से; विमुक्त:--तुरन्त मुक्त हो गया;अज्ञान-बन्धनातू--सब प्रकार के अज्ञान से, विशेषतया देहात्मबुद्धि से; प्राप्तः:--पाकर; भगवतः-- भगवान् के; रूपम्--वहीशारीरिक स्वरूप; पीत-वासा:--पीले वस्त्र पहने; चतु:-भुज:--तथा चार भुजाओं वाला, जिनमें वह शंख, चक्र, गदा तथाकमल लिए था |
चूँकि गजेन्द्र का प्रत्यक्ष स्पर्श भगवान् ने अपने करकमलों से किया था अतएव वह समस्तभौतिक अज्ञान तथा बन्धन से तुरन्त मुक्त हो गया |
इस प्रकार उसे सारूप्य-मुक्ति प्राप्त हुई जिसमेंउसे भगवान् जैसा ही शारीरिक स्वरूप प्राप्त हुआ |
वह पीत वस्त्र धारण किये चार भुजाओंवाला बन गया |
स वै पूर्वमभूद्राजा पाण्ड्यो द्रविडसत्तम: |
इन्द्रद्युम्न इति ख्यातो विष्णुत्रतपरायण: ॥
७॥
सः--वह हाथी ( गजेन्द्र ); बै--निस्सन्देह; पूर्वम्--पूर्वजन्म में; अभूत्-- था; राजा--राजा; पाण्ड्य:--पाण्डय नामक देश का;द्रविड-सतू-तमः--द्रविड़ देश ( दक्षिण भारत ) में उत्पन्न होने वालों में श्रेष्ठ; इन्द्रद्यम्म:--महाराज इन्द्रद्ुम्म; इति--इस प्रकार;ख्यात:--प्रसिद्ध; विष्णु-ब्रत-परायण:-- भगवान् की सेवा में सदैव लगा रहने वाला प्रथम कोटि का वैष्णव |
यह गजेन्द्र पहले वैष्णव था और द्रविड़ ( दक्षिण भारत ) प्रान्त के पाण्डय नामक देश काराजा था |
अपने पूर्व जन्म में वह इन्द्रद्यम्म महाराज कहलाता था |
स एकदाराधनकाल आत्मवानूगृहीतमौनक्रत ईश्वर हरिम् |
जटाधरस्तापस आप्लुतोच्युतंसमर्चयामास कुलाचलाश्रम: ॥
८ ॥
सः--वह, इन्द्रद्यम्म महाराज; एकदा--एक बार; आराधन-काले--देव पूजा के समय; आत्मवान्--अत्यन्त मनोयोग से भक्तिमें लगा; गृहीत--धारण किये; मौन-व्रतः--किसी से न बोलने का अनुष्ठान; ईश्वरम्--परम नियन्ता; हरिम्-- भगवान् को;जटा-धरः--जटाधारी; तापस:--तपस्या में तल्लीन; आप्लुत:--भगवत्प्रेम में तल्लीन; अच्युतम्--अच्युत भगवान् को;समर्चयाम् आस--पूजा कर रहा था; कुलाचल-आश्रम: --कुलाचल ( मलयपर्वत ) स्थित उसका आश्रम |
इन्द्रद्यम्म महाराज ने गृहस्थ जीवन से वैराग्य ले लिया और मलय पर्वत चला गया जहाँउसका आश्रम एक छोटी सी कुटिया के रूप में था |
उसके सिर पर जटाएँ थीं और वह सदैवतपस्या में लगा रहता था |
एक बार वह मौन ब्रत धारण किये भगवान् की पूजा में तल्लीन थाऔर भगवत्प्रेम के आनंद में डूबा हुआ था |
यहच्छया तत्र महायशा मुनिःसमागमच्छिष्यगणै: परिश्रितः |
त॑ वीक्ष्य तृष्णीमकृताहणादिककंरहस्युपासीनमृषिश्ुकोप ह ॥
९॥
यहच्छया--अपनी इच्छा से ( बिना बुलाये ); तत्र--वहाँ; महा-यशा:--सुविख्यात; मुनि:--अगस्त्य मुनि; समागमत्--पधारे;शिष्य-गणै: -- अपने शिष्यों से; परिश्रित:--घिरे हुए; तम्--उसको; वीक्ष्य--देखकर; तूष्णीम्ू--मौन; अकृत-अर्हण-आदिकम्--स्वागत-सत्कार किये बिना; रहसि--एकान्त स्थान में; उपासीनमू-- ध्यान में बैठे; ऋषि: --ऋषि; चुकोप--अत्यन्तक्ुद्ध हुआ; ह--ऐसा हुआ कि |
जब इन्द्रद्यम्न महाराज भगवान् की पूजा करते हुए ध्यान में तल्लीन थे तो अगस्त्य मुनिअपनी शिष्य-मण्डली समेत वहाँ पधारे |
जब मुनि ने देखा कि राजा इन्द्रद्यम्न एकान्त स्थान मेंबैठकर मौन साथे हैं और उनके स्वागत के शिष्टाचार का पालन नहीं कर रहे हैं, तो वे अत्यन्तकुब्ध हुए |
तस्मा ड्मं शापमदादसाधु-रयं दुरात्माकृतबुद्धिरद्य |
विप्रावमन्ता विशतां तमिस्त्रयथा गज: स्तब्धमति: स एव ॥
१०॥
तस्मै--महाराज इन्द्रद्यम्न को; इमम्--यह; शापम्--शाप; अदात्--दे डाला; असाधु:--अभद्र; अयम्--यह; दुरात्मा--नीचव्यक्ति; अकृत--अशिक्षित; बुर्द्धिः--उसकी बुद्धि; अद्य--अब; विप्र--ब्राह्ण का; अवमन्ता--अपमान करने वाला;विशताम्-- प्रवेश करे; तमिस्त्रमू--अंधकार में; यथा--जिस तरह; गज:--एक हाथी; स्तब्ध-मति:--कुन्द बुद्धि वाला; सः--वह; एव--निस्सन्देह |
तब अगस्त्य मुनि ने राजा को यह शाप दे डाला---' इन्द्रद्यम्म तनिक भी भद्र नहीं है |
नीचतथा अशिक्षित होने के कारण इसने ब्राह्मण का अपमान किया है |
अतएवं यह अंधकार प्रदेशमें प्रवेश करे और आलसी मूक हाथी का शरीर प्राप्त करे |
श्रीशुक उबाचएवं शप्त्वा गतोगस्त्यो भगवात्रूप सानुग: |
इन्द्रद्युम्नोपि राजर्षिदिष्ट तदुपधारयन् ॥
११॥
आपन्नः कौझ्जरीं योनिमात्मस्मृतिविनाशिनीम् |
हर्यर्चनानुभावेन यद््गजत्वेप्यनुस्मृति: ॥
१२॥
श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; शप्त्वा--शाप देने के बाद; गत:--उस स्थान को त्यागदिया; अगस्त्य:--अगस्त्य मुनि ने; भगवान्--इतने शक्तिशाली; नृप--हे राजा; स-अनुग: --अपने संगियों समेत; इन्द्रद्युम्न: --राजा इन्द्रद्यम्म; अपि--भी; राजर्षि:--यद्यपि वह राजर्षि था; दिष्टमू--विगत कर्मों के कारण; तत्--वह शाप; उपधारयनू--मानते हुए; आपतन्न:--प्राप्त किया; कौज्शरीम्ू--हाथी की; योनिम्--योनि; आत्म-स्मृति-- अपनी याद; विनाशिनीम्ू--नष्ट करनेवाली; हरि--भगवान्; अर्चन-अनुभावेन--पूजा करने के कारण; यत्--उस; गजत्वे--हाथी के शरीर में; अपि-- यद्यपि;अनुस्मृतिः:--अपनी विगत भक्ति को स्मरण करने का सुअवसर |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजा! अगस्त्य मुनि राजा इन्द्रद्यम्न को इस तरह शापदेने के बाद अपने शिष्यों समेत उस स्थान से चले गये |
चूँकि राजा भक्त था अतएवं उसनेअगस्त्य मुनि के शाप का स्वागत किया क्योंकि भगवान् की ऐसी ही इच्छा थी |
अतएवं अगलेजन्म में हाथी का शरीर प्राप्त करने पर भी भक्ति के कारण उसे यह स्मरण रहा कि भगवान् कीपूजा और स्तुति किस तरह की जाती है |
एवं विमोक्ष्य गजयूथपमब्जनाभ-स्तेनापि पार्षदगतिं गमितेन युक्त: |
गन्धर्वसिद्धविबुधेरुपगीयमान-कर्माद्भुतं स्वभवनं गरुडासनोगात् ॥
१३॥
एवम्--इस प्रकार; विमोक्ष्य--उद्धार करके; गज-यूथ-पम्--हाथियों के राजा, गजेन्द्र को; अब्ज-नाभ:--भगवान् जिनकीनाभि से कमल निकलता है; तेन--उसके ( गजेन्द्र ) द्वारा; अपि--भी; पार्षद-गतिम्-- भगवान् के पार्षद का पद; गमितेन--पहले से प्राप्त; युक्त:--के साथ-साथ; गन्धर्व--गन्धर्व लोक के निवासी; सिद्ध--सिद्ध लोक के निवासी; विबुधे:--तथाबड़े-बड़े ऋषि मुनियों के द्वारा; उपगीयमान--महिमामंडित होकर; कर्म--जिसके कार्यकलाप; अद्भुतम्-- आश्चर्यजनक; स्व-भवनम्--अपने धाम को; गरुड-आसन:--गरुड़ पर आसीन होकर; अगातू--लौट गये |
गजेन्द्र को घड़ियाल के चंगुल से तथा इस भौतिक संसार से जो घड़ियाल जैसा लगता है |
घड़ियाल जैसे ही इस भौतिक जगत छुड़ाकर भगवान् ने उसे सारूप्य मुक्ति प्रदान की |
भगवान्के अद्भुत दिव्य कार्यकलापों का यश बखान करने वाले गन्धर्वो, सिद्धों तथा अन्य देवताओंकी उपस्थिति में, भगवान् अपने वाहन गरुड़ की पीठ पर बैठकर अपने अद्भुत धाम को लौटगये और अपने साथ गजेन्द्र को भी लेते गये |
एतन्महाराज तवेरितो मयाकृष्णानुभावो गजराजमोक्षणम् |
स्वर्ग्य यशस्यं कलिकल्मषापहंदुःस्वणनाशं कुरुवर्य श्रुण्वताम् ॥
१४॥
एतत्--यह; महा-राज--हे राजा परीक्षित; तब--तुमसे; ईरित: --वर्णन किया गया; मया--मेरे द्वारा; कृष्ण-अनुभाव:--भगवान् कृष्ण की असीम शक्ति ( जिससे वे भक्त का उद्धार कर सकते हैं ); गज-राज-मोक्षणम्--हाथियों के राजा की मोक्ष-प्राप्ति; स्वर्ग्यम्--स्वर्गलोक के लिए प्रोन्नति; यशस्यम्--भक्त के रूप में अपनी ख्याति बढ़ाने; कलि-कल्मष-अपहम्--कलियुग के कल्मष को कम करने; दुःस्वप्न-नाशम्--बुरे स्वप्नों के कारणों का निराकरण करने; कुरु-वर्य--हे कुरु श्रेष्ठ;श्रुण्वतामू--इस कथा के सुनने वालों को |
हे राजा परीक्षित! अब मैंने तुमसे कृष्ण की अद्भुत शक्ति का वर्णन कर दिया है, जिसेभगवान् ने गजेन्द्र का उद्धार करके प्रदर्शित किया था |
हे कुरु श्रेष्ठ) जो लोग इस कथा को सुनतेहैं, वे उच्चलोकों में जाने के योग्य बनते हैं |
इस कथा के श्रवण मात्र से वे भक्त के रूप मेंख्याति अर्जित करते हैं, वे कलियुग के कल्मष से अप्रभावित रहते हैं और कभी दुःस्वप्न नहींदेखते |
यथानुकीर्तयन्त्येतच्छेयस्कामा द्विजातय: |
शुचय: प्रातरुत्थाय दुःस्वप्नाद्युपशान्तये ॥
१५॥
यथा--विचलित हुए बिना; अनुकीर्तयन्ति-- कीर्तन करते हैं; एतत्--गजेन्द्र मोक्ष की यह कथा; श्रेयः-कामा:--अपनाकल्याण चाहने वाले; द्वि-जातय:--ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य जाति वाले; शुचयः--विशेषतया ब्राह्मण, जो सदा स्वच्छ रहतेहैं; प्रातः--प्रातःकाल; उत्थाय--निद्रा से उठकर; दुःस्वप्न-आदि--रात्रि में ठीक से नींद न आने; उपशान्तये--सारे कष्टों कोशमन करने के लिए |
अतएव जो लोग अपना कल्याण चाहते हैं--विशेष रूप से ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य औरइनमें से भी मुख्यतः ब्राह्मण वैष्णब--उन्हें प्रातःकाल बिस्तर से उठकर अपने दुःस्वप्नों के कष्टोंको दूर करने के लिए इस कथा का बिना विचलित हुए यथारूप पाठ करना चाहिए |
इदमाह हरिः प्रीतो गजेन्द्रं कुरुसत्तम |
श्रुण्वतां सर्वभूतानां सर्वभूतमयो विभु: ॥
१६॥
इदम्ू--यह; आह--कहा; हरिः-- भगवा न् ने; प्रीत:--प्रसन्न होकर; गजेन्द्रमू--गजेन्द्र से; कुरू-सत्-तम--हे कुरुवंश मेंसर्वश्रेष्ठ; श्रृण्वताम्--सुनते हुए; सर्व-भूतानामू--हरएक की उपस्थिति में; सर्व-भूत-मय:--सर्वव्यापी भगवान् ने; विभु:--महान् |
हे कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार हरएक के परमात्मा अर्थात् भगवान् ने प्रसन्न होकर सबों के समक्षगजेन्द्र को सम्बोधित किया |
उन्होंने निम्नलिखित आशीष दिए |
श्रीभगवानुवाचये मां त्वां च सरश्वेदं गिरिकन्दरकाननम् |
वेत्रकीचकवेणूनां गुल्मानि सुरपादपान् ॥
१७॥
श्रुज्रणीमानि धिष्ण्यानि ब्रह्मणो मे शिवस्थ च |
क्षीरोदं मे प्रियं धाम श्रेतद्वीपं च भास्वरम् ॥
१८ ॥
श्रीवत्सं कौस्तुभं मालां गदां कौमोदकीं मम |
सुदर्शन पाञ्जजन्यं सुपर्ण पतगेश्वरम् ॥
१९॥
शेषं च मत्कलां सूक्ष्मां अ्रियं देवीं मदाभ्रयाम् |
ब्रह्माणं नारदमृषिं भवं प्रह्दमेव च ॥
२०॥
मत्स्यकूर्मवराहाद्यैरवतारै: कृतानि मे |
कर्माण्यनन्तपुण्यानि सूर्य सोमं हुताशनम् ॥
२१॥
प्रणव सत्यमव्यक्तं गोविप्रान्धर्ममव्ययम् |
दाक्षायणीर्धर्मपत्ती: सोमकश्यपयोरपि ॥
२२॥
गड्ढां सरस्वतीं नन््दां कालिन्दीं सितवारणम् |
ध्रुवं ब्रह्मऋषीन्सप्त पुण्यश्लोकांश्व मानवान् ॥
२३॥
उत्थायापररात्रान्ते प्रयता: सुसमाहिता: |
स्मरन्ति मम रूपाणि मुच्यन्ते तेडहसो ईखिलातू ॥
२४॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; ये--जो; माम्--मुझको; त्वामू--तुमको; च-- भी; सर: --झील, तालाब; च--भी;इदम्--यह; गिरि--( त्रिकूट ) पर्वत; कन्दर--गुफाएँ; काननम्--उद्यान; वेत्र--बेंत; कीचक--खोखला बाँस; वेणूनामू--अन्य प्रकार के बाँस के; गुल्मानि--समूह, कुंज; सुर-पादपान्ू--स्वर्गिक वृक्ष; श्रूड्डाणि --चोटियाँ; इमानि--ये; धिष्ण्यानि--घर, धाम; ब्रह्मण: --ब्रह्मा को; मे--मेरा; शिवस्थ--शिव का; च--भी; क्षीर-उदम्--दुग्धसागर; मे--मेरा; प्रियम्-- अत्यन्तप्रिय; धाम--स्थान; श्रेत-द्वीपम्-- श्वेत द्वीप नामक; च-- भी; भास्वरम्--आध्यात्मिक किरणों से सदैव चमचमाता;श्रीवत्सम्-- श्रीवत्स नामक चिह्न; कौस्तुभम्--कौस्तुभ मणि; मालामू--माला; गदाम्--गदा; कौमोदकीम्--कौमोदकीनामक; मम--मेरा; सुदर्शनम्--सुदर्शन चक्र; पाञ्नजन्यम्--पाझ्जजन्य नामक शंख; सुपर्णम्--गरुड़; पतग-ईश्वरम्-पक्षी -राज; शेषम्--शेष नाग नामक आसन; च--तथा; मत्-कलाम्--मेरा अंश; सूक्ष्माम्-- अत्यन्त सूक्ष्म; अियम् देवीम्--सम्पत्तिकी देवी को; मत्-आश्रयाम्--मुझ पर आश्चित; ब्रह्मणम्--ब्रह्माजी को; नारदम् ऋषिम्--नारद ऋषि को; भवम्--शिवजीको; प्रह्मदम् एव च--तथा प्रह्नद को भी; मत्स्य--मत्स्य अवतार; कूर्म--कूर्म अवतार; वराह--वराह अवतार; आद्यिः--आदि;अवतारैः--विभिन्न अवतारों के द्वारा; कृतानि--किये गये; मे--मेरे; कर्माणि--कार्यकलाप; अनन्त--असीम; पुण्यानि--शुभ,पवित्र; सूर्यम्--सूर्यदेव को; सोमम्--चन्द्र देव को; हुताशनम्--अग्निदेव को; प्रणबम्--ओंकार मंत्र को; सत्यम्ू--परम सत्यको; अव्यक्तम्--सम्पूर्ण भौतिकशक्ति को; गो-विप्रान्ू--गायों तथा ब्राह्मणों को; धर्मम्-- भक्ति को; अव्ययम्-- अव्यय;दाक्षायणी:--दक्ष की पुत्रियाँ; धर्म-पत्ती:--वैध्य पत्नियाँ; सोम--चन्द्र देव की; कश्यपयो: --तथा कश्यप ऋषि की; अपि--भी; गड़ाम्ू--गंगा नदी को; सरस्वतीम्--सरस्वती नदी को; नन्दामू--नन्दा नदी को; कालिन्दीमू--यमुना नदी को; सित-वारणम्--ऐरावत हाथी को; ध्रुवम्-- ध्रुव महाराज को; ब्रह्म-ऋषीन्ू--बड़े-बड़े ऋषियों को; सप्त--सात; पुण्य-शलोकान्--अत्यन्त पवित्र; च--तथा; मानवान्--मनुष्यों को; उत्थाय--उठकर; अपर-रात्र-अन्ते--रात्रि के अन्त में; प्रयता: --अत्यन्तसतर्क रहकर; सु-समाहिता:--एकाग्र चित्त से; स्मरन्ति--स्मरण करते हैं; मम--मेरे; रूपाणि--रूपों को; मुच्यन्ते--छूट जातेहैं; ते--ऐसे पुरुष; अंहसः--पापकर्मों के फल से; अखिलात्ू--सभी प्रकार के
भगवान् ने कहा : समस्त पापपूर्ण कर्मों के फलों से ऐसे व्यक्ति मुक्त हो जाते हैं, जो रात्रिबीतने पर प्रातःकाल ही जग जाते हैं, अत्यन्त ध्यानपूर्वक अपने मनों को मेरे रूप, तुम्हारे रूप,इस सरोवर, इस पर्वत, कन्दराओं, उपवनों, बेंत के वृक्षों, बाँस के वृक्षों, कल्पतरू, मेरे, ब्रह्मातथा शिव के निवास स्थानों, सोना, चाँदी तथा लोहे से बनी त्रिकूट पर्वत की तीन चोटियों, मेरेसुहावने धाम ( क्षीरसागर ), आध्यात्मिक किरणों से नित्य चमचमाते श्वेत द्वीप, मेरे चिन्हश्रीवत्स, कौस्तुभ मणि, मेरी वैजयन्ती माला, कौमोदकी नामक मेरी गदा, मेरे सुदर्शन चक्र,तथा पाञ्जजन्य शंख, मेरे वाहन पक्षीराज गरुड़, मेरी शय्या शेषनाग, मेरी शक्ति का अंशलक्ष्मीजी, ब्रह्मा, नारद मुनि, शिवजी, प्रह्माद, मेरे सारे अवतारों यथा मत्स्य, कूर्म तथा वराह, मेरेअनन्त शुभ कार्यकलापों में जो सुनने वाले को पवित्रता प्रदान करते हैं, मेरे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि,ओड्डार मंत्र, परम सत्य, समग्र भौतिक शक्तियों, गायों तथा ब्राह्मणों में, भक्ति, सोम तथाकश्यप की पत्तियों में जो राजा दक्ष की पुत्रियाँ हैं, गंगा, सरस्वती, नन्दा तथा यमुना नदियों,ऐरावत हाथी, ध्रुव महाराज, सप्तर्षि तथा पवित्र मनुओं में एकाग्र करते हैं |
ये मां स्तुवन्त्यनेनाड़ प्रतिबुध्य निशात्यये |
तेषां प्राणात्यये चाहं ददामि विपुलां गतिम्ू ॥
२५॥
ये--जो; माम्ू--मुझको ( मेरी ); स्तुवन्ति--प्रार्थना करते हैं; अनेन--इस प्रकार; अड़--हे राजा; प्रतिबुध्य--जगकर; निश-अत्यये--रात्रि के अन्त में; तेषामू--उनके लिए; प्राण-अत्यये--मृत्यु के समय; च-- भी; अहम्--मैं; ददामि--देता हूँ;विपुलाम्ू--नित्य, असीम; गतिम्ू--वैकुण्ठ लोक को स्थानान्तरण |
हे प्रिय भक्त! जो लोग रात्रि बीतने पर बिस्तर से उठकर तुम्हारे द्वारा अर्पित इस स्तुति से मेरीप्रार्थना करते हैं मैं उन्हें उनके जीवन के अन्त में वैकुण्ठ लोक में नित्य आवास प्रदान करता हूँ |
श्रीशुक उबाचइत्यादिश्य हृषीकेश: प्राध्माय जलजोत्तमम् |
हर्षयन्विबुधानीकमारुरोह खगाधिपम् ॥
२६॥
श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आदिश्य--उपदेश देकर; हषीकेश: --हषीकेश नाम सेविख्यात भगवान्; प्राध्याय--बजाकर; जल-ज-उत्तमम्--जलचरों में उत्तम, शंख; हर्षयन्--प्रसन्न करते; विबुध-अनीकम्--देवताओं के समूह को, जिसमें ब्रह्मा तथा शिव प्रमुख हैं; आरुरोह--चढ़ गये; खग-अधिपम्--गरुड़ की पीठ पर |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : इस उपदेश को देकर हषीकेश भगवान् ने अपनापाञ्जजन्य शंख बजाया और इस प्रकार ब्रह्मा इत्यादि सारे देवताओं को हर्षित किया |
तब वेअपने वाहन गरुड़ की पीठ पर चढ़ गये |
